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योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः

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योग-दर्शन का बीज सूक्त। महर्षि पतञ्जलि-महर्षि पतञ्जलि कृत

पतञ्जलि योग-दर्शन’ आत्म-भू-योग दर्शन है। यह अनन्य, अनूठा और अनुपमेय योग-दर्शन, जो अपने लिए आप ही प्रमाण है।
इस अपूर्व और अद्भुत ग्रंथ के समान अन्य कोई यौगिक ग्रंथ है ही नहीं। एक

तरह से इसे प्रकृति की अद्भुत और चमत्कृत घटना कह सकते हैं।
पतञ्जलि योग-दर्शन प्रामाणिक व अद्वितीय योग-दर्शन ग्रंथ है।

यद्यपि ‘गीता’ में (2-39, 5-2) योग के संदर्भ में सांख्य-दर्शन की पुष्टि है,


जिसके प्रणेता ऋषि कपिल थे। सांख्य-दर्शन का मूल वैदिक दर्शन है और योग-दर्शन सांख्य पर आधारित है।

ऋषि पतञ्जलि शुद्ध, बुद्ध, प्रबुद्ध मानसिकता के प्रखर आध्यात्मिक दार्शनिक हैं,

जो काव्य सौंदर्य की भाषा में नहीं, वरन् गणितीय भाषा में बात करते हैं।

योग-दर्शन के सूत्रात्मक संकेत गणितीय भाषा में अध्यात्म के पथ पर क्रमशः चलाते हुए ब्रह्म-रंध्र तक ले जाते हैं।

यह वैज्ञानिक भाषा में लिखा गया अध्यात्म है। अष्टांग योग के प्रथम पाँच चरणों में

मानव देह के सुप्त बिंदुओं को जाग्रत् कर तन को प्राणायाम से शुद्ध, स्वस्थ और नीरोगी करना है।

धारणा, ध्यान, समाधि-यह अंतर्मन की चित्तवृत्तियों का दर्शन और निर्मलीकरण है।

कल्पों पूर्व अभूतपूर्व प्रज्ञा दृष्टि से ऋषियों की अंतश्चेतना में अनुभूत शाश्वत सत्य कितने सार्थक और सटीक हैं।

कदाचित् आज से अधिक इनकी उपादेयता कभी न रही होगी। यह सर्वथा

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कालातीत और कालजयी ग्रंथ त्रिकालदर्शी तत्त्वों का समीकरण है,

जबकि हम केवल तत्कालदर्शी हैं। ऋषि पतञ्जलि कृत ‘पतञ्जलि योग-दर्शन’ के

यौगिक ग्रंथ में जो देह, मन, चित्त के गुण, स्वभाव और विकारों का विवेचन करते

हुए चित्तवृत्तियों के पूर्ण संयम, निरोध, साधना और अंत में अपने कारण में विलीन

को ही योग मानते हैं। योग प्रभाव और अव्यय (उत्पत्ति और लय) का स्थान है।

यह एक आश्चर्यजनक सत्य है कि महर्षि पतञ्जलि तन और मन दोनों के अध्येता
योग-दर्शन के साथ आयुर्वेद के चिकित्सा-शास्त्र के भी प्रणेता हैं। पाणिनि के

व्याकरण का भाषा-भाष्य भी ऋषि पतञ्जलि का महा अद्भुत भाष्य है। अतः वे

सृष्टि के चरमोत्कर्ष योगाचार्य, आयुर्वेदाचार्य और व्याकरणाचार्य हैं।

प्राणायाम के द्वारा स्वस्थ तन के जो अकाट्य सूत्र दिए हैं,

उन पर विज्ञान भी आज नतमस्तक हो गया है। स्वस्थ तन में ही

स्वस्थ मन और स्वस्थ मन में ही स्वस्थ विचार-शुभ, शांत और

प्राणायाम के द्वारा स्वस्थ तन के जो अकाट्य सूत्र दिए हैं,

उन पर विज्ञान भी आज नतमस्तक हो गया है। स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन और स्वस्थ मन में ही स्वस्थ

विचार-शुभ, शांत और सात्त्विक जीवन-शैली का यही सार योग-दर्शन का ज्ञान है। एक बृहत्तम, एक महत्तम, एक अनन्यतम, प्राण विज्ञान,

जो प्राण वायु से प्राणाधार तक ही पूरा होता है।
इसका प्रथम सूक्त ‘अथ योगानुशासनम्’ एक औपचारिक आरंभिक विषय-परक उद्बोधन तो है,

किंतु इसका दूसरा सूक्त’योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥2॥
और तीसरा सूक्त ‘तदा द्रष्टुः स्वरूपेवस्थानम् ॥3॥

ही मूल केंद्र सूक्त है, जिसकी परिधि में संपूर्ण योग-दर्शन परिक्रमायित है।

योग-दर्शन वस्तुतः ही मूल केंद्र सूक्त है, जिसकी परिधि में संपूर्ण योग-दर्शन

परिक्रमायित है। योग-दर्शन वस्तुतः इन्हीं दो सूक्तों का विस्तार है।

यही वे केंद्र सूक्त हैं, जिनके चारों ओर साधक की-जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, संचित, प्रारब्ध, patanjali darshan

क्रियमाण भूत, वर्तमान, भविष्य, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार की मनोदशाएँ,
भावित भावनाओं की संचेतना परिक्रमा करती हैं, जो योग-दर्शन के अंतिम मंत्र

प्रति प्रसवः कैवल्यं स्वरूप प्रतिष्ठा वाचितिशक्तेरिति-कैवल्यपाद 34 तक जाकर अपने कारण में विलीन हो जाती हैं।

अर्थात् इंद्रियों, मन, चित्त शक्ति का अपने कारण में विलीन होने तक

की यात्रा ही योग-दर्शन का कथ्य और तथ्य विषय हैं।

यही कैवल्य है, यही मोक्ष है, यही निर्वाण है, यही मुक्ति है। कारण में विलीन,

अर्थात् चित्तवृत्ति का मूल उद्गम में लीन होना, अर्थात् अपने निज स्वरूप में स्थित होना है।

वस्तु सब अपनी-अपनी हो जाएँ तो कौन किसका स्वामी और कौन किसका दास है? चित्तवृत्तियों के संयम और निरोध के बाद ही द्रष्टा अपने निज सत्य स्वरूप में अवस्थित हो पाता है।

कर्ता, कर्म, कारण -द्रष्टा, दृश्य, दृग-ग्राह्य, ग्रहण, गृहीता-सभी से निबंध हुआ अपने कारण में विलीन यही बंधन-मुक्त अवस्था है।

योग-दर्शन’ का मंतव्य, गंतव्य और प्रतिपाद्य विषय अपने सत्य स्वरूप कारण में लीन होकर निबंध होना है।

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aitareya Adhyay 2-3

aitareya upanishad Adhyay 2-3

द्वितीय अध्याय

[अध्याय २
प्रथम खण्ड
खण्ड १
ऐतरेयोपनिषद्

सम्बन्ध- प्रथम अध्याय में सृष्टि की उत्पत्ति का क्रम और मनुष्य शरीर का महत्त्व बताया गया और यह बात भी संकेत से कही गयी कि जीवात्मा इस

शरीरमें परमात्माको जानकर कृतकृत्य हो सकता है। अब इस शरीरकी अनित्यता दिखाकर वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये इस

अध्यायमें मनुष्य-शरीरकी उत्पत्तिका वर्णन किया जाता है,

पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति।

यदेतद्रेतस्तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनज्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म॥१॥

व्याख्या- यह संसारी जीव पहले-पहल पुरुष-शरीरमें (पिताके शरीरमें) वीर्यरूपसे गर्भ बनता है-प्रकट होता है। पुरुषके शरीरमें जो यह वीर्य है, वह

सम्पूर्ण अङ्गोंमेंसे निकलकर उत्पन्न हुआ तेज (सार) है। यह पिता अपने स्वरूपभूत उस वीर्यरूप तेजको पहले तो अपने शरीरमें ही धारण-पोषण करता

है-ब्रह्मचर्यके द्वारा बढ़ाता एवं पुष्ट करता है, फिर जब यह उसको स्त्रीके गर्भाशयमें सिञ्चन (स्थापित) करता है, तब इसे गर्भरूपमें उत्पन्न करता है। वह

माताके शरीरमें प्रवेश करना ही इसका पहला जन्म है॥१॥

तत्स्त्रिया आत्मभूतं गच्छति। यथा स्वमङ्गं तथा। तस्मादेनां न हिनस्ति। सास्यैतमात्मानमत्रगतं भावयति॥२॥

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व्याख्या- उस स्त्री (माता) के शरीरमें आया हुआ वह गर्भ-पिताके द्वारा स्थापित किया हुआ तेज उस स्त्रीके आत्मभावको प्राप्त हो जाता है अर्थात् जैसे उसके

दूसरे अङ्ग हैं, उसी प्रकार वह गर्भ भी उसके शरीरका एक अङ्ग-सा ही हो जाता है। यही कारण है कि वह गर्भ उस स्त्रीके उदरमें रहता हुआ भी गर्भिणी स्त्रीको

पीड़ा नहीं पहुँचाता-उसे भाररूप नहीं प्रतीत होता। वह स्त्री अपने शरीरमें आये हुए अपने पतिके आत्मारूप इस गर्भको अपने अङ्गोंकी भाँति ही भोजनके रससे

पुष्ट करती है और अन्य सब प्रकारके आवश्यक नियमोंका पालन करके उसकी भलीभाँति रक्षा करती है॥२॥


व्याख्या- अपने पतिके आत्मस्वरूप उस गर्भकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाली गर्भिणी स्त्री घरके लोगोंद्वारा और विशेषतः उसके पतिद्वारा पालन पोषण

करनेयोग्य होती है। अर्थात् घरके लोगोंका और पतिका यह परम आवश्यक कर्तव्य है कि वे सब मिलकर उसके खान-पान और रहन सहनकी सुव्यवस्था

करके सब प्रकारसे उसकी सँभाल रखें। उस गर्भको पहले अर्थात् प्रसव होनेतक तो स्त्री (माता) अपने शरीरमें धारण करती है; फिर जन्म लेनेके बाद-जन्म लेते ही

उसका पिता जातकर्म आदि संस्कारोंसे और नाना प्रकारके उपचारोंसे उस कुमारको अभ्युदयशील बनाता है और जन्मसे लेकर जबतक वह सर्वथा योग्य

नहीं बन जाता, तबतक हर प्रकारसे उसका पालन-पोषण करता है नाना प्रकारकी विद्या और शिल्पादिका अध्ययन कराके उसे सब प्रकारसे उन्नत

बनाता है। वह पिता जन्मके बाद उस बालकको उपयुक्त बना देनेके पहले-पहले जो उसकी रक्षा करता है, उसे सब प्रकारसे योग्य बनाता है, वह मानो इन

लोकोंको अर्थात् मनुष्योंकी परम्पराको बढ़ानेके द्वारा अपनी ही रक्षा करता है; क्योंकि इसी प्रकार एक से-एक उत्पन्न होकर ये सब मनुष्य विस्तारको प्राप्त हुए

हैं। यह जो इस जीवका गर्भसे बाहर आकर बालकरूपमें उत्पन्न होना है, वह इसका दूसरा जन्म है। इस वर्णनसे पिता और पुत्र दोनोंको अपने-अपने

कर्तव्यकी शिक्षा दी गयी है। पुत्रको तो यह समझना चाहिये कि
उसपर अपने माता-पिताका बड़ा भारी उपकार है; अतः वह उनकी जितनी सेवा कर सके, थोड़ी है और पिताको इस प्रकारका अभिमान नहीं करना चाहिये कि

मैंने इसका उपकार किया है, वरं यह समझना चाहिये कि मैंने अपनी ही वृद्धि करके अपने कर्तव्यका पालन किया है॥३॥

सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः प्रतिधीयते। अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति। स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म॥४॥

व्याख्या- पूर्वोक्त प्रकारसे इस पिताका ही आत्मस्वरूप पुत्र जब कार्य करनेयोग्य हो जाता है, तब वह पिता उसको अपना प्रतिनिधि बना देता है-अग्निहोत्र, देवपूजा

और अतिथि-सेवा आदि वैदिक और लौकिक जितने भी शुभकर्म हैं, उन सबका भार पुत्रको सौंप देता है। गृहस्थका पूरा दायित्व पुत्रपर छोड़कर स्वयं कृतकृत्य

हो जाता है अर्थात् अपनेको पितृ-ऋणसे मुक्त मानता है। उसके बाद इस शरीरकी आयु पूर्ण होनेपर जब वह (पिता) इसे छोड़कर यहाँसे विदा हो जाता है,

तब यहाँसे जाकर दूसरी जगह कर्मानुसार जहाँ जिस योनिमें जन्म लेता है, वह इसका तीसरा जन्म है। इसी तरह यह जन्म-जन्मान्तरकी परम्परा चलती रहती

है। जबतक जन्म-मृत्युके महान् कष्टका विचार करके इससे छुटकारा पानेके लिये जीवात्मा मनुष्य-शरीरमें चेष्टा नहीं करता, तबतक यह परम्परा नहीं टूटती।

अतः इसके लिये मनुष्यको अवश्य चेष्टा करनी चाहिये। यही इस प्रकरणका उद्देश्य प्रतीत होता है॥४॥

सम्बन्ध- इस प्रकार बार-बार जन्म लेना और मरना एक भयानक यन्त्रणा है; और जबतक यह जीव इस रहस्यको समझकर इस शरीररूप पिंजरेको काटकर

इससे सर्वथा अलग न हो जायगा तबतक इसका इस जन्म-मृत्युरूप यन्त्रणासे छुटकारा नहीं होगा—

यह भाव अगले दो मन्त्रोंमें वामदेव ऋषिके दृष्टान्तसे समझाया जाता है

तदुक्तमृषिणा गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा। शतं मा पुर आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति। गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच॥५॥

व्याख्या- उपर्युक्त चार मन्त्रों में कही हुई बातका ही रहस्य यहाँ ऋषिद्वारा बताया गया है। गर्भमें रहते हुए ही अर्थात् गर्भके बाहर आनेसे पहले ही वामदेव

ऋषिको यथार्थ ज्ञान हो गया था, इसलिये उन्होंने माताके उदरमें ही कहा था,

अहो कितने आश्चर्य और आनन्दकी बात है कि गर्भ में रहते रहते ही मैंने इन

अन्तःकरण और इन्द्रियरूप देवताओंके अनेक जन्मोंका रहस्य भलीभाँति जान लिया। अर्थात् मैं इस बातको जान गया कि ये जन्म आदि वास्तवमें इन

अन्त:करण और इन्द्रियोंके ही होते हैं, आत्माके नहीं। इस रहस्यको समझनेसे पहले मुझे सैकड़ों लोहेके समान कठोर शरीररूपी पिंजरोंने अवरुद्ध कर रखा

था। उनमें मेरी ऐसी दृढ़ अहंता हो गयी थी कि उससे छूटना मेरे लिये कठिन हो रहा था। अब मैं बाज पक्षीकी भाँति ज्ञानरूप बलके वेगसे उन सबको तोड़कर

उनसे अलग हो गया हूँ। उन शरीररूप पिंजरोंसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं रहा,

मैं सदाके लिये उन शरीरोंकी अहंतासे मुक्त हो गया हूँ’॥५॥

स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान्कामानाप्त्वामृतः समभवत् समभवत्॥६॥

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व्याख्या- इस प्रकार जन्म-जन्मान्तरके तत्त्वको जाननेवाला अर्थात् जबतक यह जीव इन शरीरोंके साथ एक हुआ रहता है, शरीरको ही अपना स्वरूप माने

रहता है, तबतक इसका जन्म-मृत्युसे छुटकारा नहीं होता, इसको जब बार-बार नाना योनियोंमें जन्म लेकर नाना प्रकारके कष्ट भोगने पड़ते हैं इस रहस्यको

समझनेवाला वह ज्ञानी वामदेव ऋषि गर्भसे बाहर आकर अन्तमें शरीरका नाश होनेपर संसारसे ऊपर उठ गया तथा ऊर्ध्वगतिके द्वारा भगवान्के परमधाममें

पहुँचकर वहाँ समस्त कामनाओंको पाकर अर्थात् सर्वथा आप्तकाम होकर अमृत हो गया! अमृत हो गया। जन्म-मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट गया।

समभवत्’ पदको दुहराकर यहाँ अध्यायकी समाप्तिको सूचित किया गया है॥६॥


॥प्रथम खण्ड समाप्त॥१॥
॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥२॥

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तृतीय अध्याय
[अध्याय ३
प्रथम खण्ड

कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे। कतरः स आत्मा, येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु

चास्वादु च विजानाति॥१॥

व्याख्या- इस उपनिषद्के पहले और दूसरे अध्यायोंमें दो आत्माओंका वर्णन आया है-एक तो वह आत्मा (परमात्मा), जिसने इस सृष्टिकी रचना की और सजीव

पुरुषको प्रकट करके उसका सहयोग देनेके लिये स्वयं उनमें प्रविष्ट हुआ; दूसरा वह आत्मा (जीवात्मा), जिसको सजीव पुरुषरूपमें परमात्माने प्रकट किया था

और जिसके जन्म-जन्मान्तरकी परम्पराका वर्णन दूसरे अध्यायमें गर्भमें आनेसे लेकर मरणपर्यन्त किया गया है। इनमेंसे उपास्य देव कौन है, वह कैसा है,

उसकी क्या पहचान है-इन बातोंका निर्णय करनेके लिये यह तीसरा अध्याय कहा गया है। केनोपनिषद्के आरम्भकी इसके साथ बहुत अंशोंमें समानता है।

मन्त्रका तात्पर्य यह है कि उस उपास्यदेव परमात्माके तत्त्वको जाननेकी इच्छावाले कुछ मनुष्य आपसमें विचार करने लगे जिसकी हमलोग उपासना

करते हैं अर्थात् जिसकी उपासना करके हमें उसे प्राप्त करना चाहिये, वह आत्मा कौन है? दूसरे शब्दोंमें जिसके सहयोगसे मनुष्य नेत्रोंके द्वारा समस्त दृश्य देखता

है, जिससे कानोंद्वारा शब्द सुनता है, जिससे घ्राणेन्द्रियके द्वारा नाना प्रकारकी गन्ध सूंघता है, जिससे वाणीद्वारा वचन बोलता है; जिससे रसनाद्वारा स्वादयुक्त

और स्वादहीन वस्तुको अलग-अलग पहचान लेता है, वह पहले और दूसरे अध्यायमें वर्णित दो आत्माओंमेंसे कौन है?॥१॥

यदेतद्धदयं मनश्चैतत। संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिकृतिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥२॥

व्याख्या- इस प्रकार विचार उपस्थित करके उन्होंने सोचा कि जो यह हृदय

अर्थात् अन्तःकरण है, यही पहले बताया हुआ मन है, इस मनकी जो यह सम्यक्

प्रकारसे जाननेकी शक्ति देखनेमें आती है-अर्थात् जो दूसरोंपर आज्ञाद्वारा शासन करनेकी शक्ति, पदार्थोंका अलग-अलग विवेचन करके जाननेकी शक्ति, देखे-

सुने हुए पदार्थों को तत्काल समझ लेनेकी शक्ति अनुभवको धारण करनेकी

शक्ति, देखनेकी शक्ति, धैर्य अर्थात् विचलित न होनेकी शक्ति, बुद्धि अर्थात्

निश्चय करनेकी शक्ति, मनन करनेकी शक्ति, वेग अर्थात् क्षणभरमें कहीं-से-कहीं चले जानेकी शक्ति, स्मरण-शक्ति, संकल्प शक्ति, मनोरथ-शक्ति, प्राण-शक्ति,

कामना-शक्ति और स्त्री-सहवास आदिकी अभिलाषा-इस प्रकार जो ये शक्तियाँ हैं, वे सब-की-सब उस स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्माके नाम हैं अर्थात् उसकी

सत्ताका बोध करानेवाले लक्षण हैं; इन सबको देखकर इन सबके रचयिता, संचालक और रक्षककी सर्वव्यापिनी सत्ताका ज्ञान होता है॥२॥

एष ब्रह्मेष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्च महाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतीषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि

चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं

तत्प्रज्ञानेत्रम्। प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥३॥

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व्याख्या- इस प्रकार विचार करके उन्होंने निश्चय किया कि सबको उत्पन्न करके

सब प्रकारकी शक्ति प्रदान करनेवाले और उनकी रक्षा करनेवाले स्वच्छ

ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही उपास्यदेव हैं। ये ही ब्रह्मा हैं, ये ही पहले अध्यायमें

वर्णित इन्द्र हैं। ये ही सबकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले समस्त प्रजाओंके

स्वामी प्रजापति हैं। ये सब इन्द्रादि देवता, ये पाँचों महाभूत-जो पृथ्वी, वायु,

आकाश, जल और तेजके रूपमें प्रकट हैं तथा ये छोटे-छोटे मिले हुए-से

बीजरूपमें स्थित समस्त प्राणी तथा उनसे भिन्न दूसरे भी- अर्थात् अंडेसे उत्पन्न

होनेवाले, जेरसे उत्पन्न होनेवाले, पसीनेसे अर्थात् शरीरके मैलसे उत्पन्न होनेवाले

और जमीन फोड़कर उत्पन्न होनेवाले तथा घोड़े, गाय, हाथी, मनुष्य ये सब

मिलकर जो कुछ यह जगत् है; जो भी कोई पंखोंवाले तथा चलने फिरनेवाले और नहीं चलनेवाले जीवोंके समुदाय हैं, वे सब-के-सब प्राणी प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे

शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्य में समर्थ होते हैं और उन प्रज्ञानस्वरूप

परमात्मामें ही स्थित हैं। यह समस्त ब्रह्माण्ड प्रज्ञानस्वरूप परमात्माकी शक्तिसे

ही ज्ञान-शक्तियुक्त है। इसकी स्थितिके आधार प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा ही हैं।

अतः जिनको पहले इन्द्र और प्रजापतिके नामसे कहा गया है, जो सबकी रचना

और रक्षा करनेवाले तथा सबको सब प्रकारकी शक्ति देनेवाले प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा हैं, वे ही हमारे उपास्यदेव ब्रह्म हैं—यह निश्चय हुआ॥३॥


स एतेन प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन्स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वामृतः समभवत्समभवत्॥४॥

व्याख्या- जिसने इस प्रकार प्रज्ञानस्वरूप परमेश्वरको जान लिया, वह इस लोकसे ऊपर उठकर अर्थात् शरीरका त्याग करके उस परमानन्दमय परम

धाममें, जिसके स्वरूपका पूर्वमन्त्रमें वर्णन किया गया है, इस प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्मके साथ सम्पूर्ण दिव्य अलौकिक भोगरूप परम आनन्दको प्राप्त होकर

अमर हो गया अर्थात् सदाके लिये जन्म-मृत्युसे छूट गया।

समभवत्हो गया इस वाक्यकी पुनरुक्ति उपनिषद्की समाप्ति सूचित करनेके लिये की गयी है॥४॥

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॥प्रथम खण्ड समाप्त ॥१॥
॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥३॥
ऋग्वेदीय ऐतरेयोपनिषद् समाप्त aitareya upanishad Adhyay 2-3

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समाधिपाद-१

अथ योगानुशासनम्॥१॥

अथ अब; योगानुशासनम् परम्परागत योगविषयक शास्त्र (आरम्भ करते हैं)।

व्याख्या- इस सूत्रमें महर्षि पतञ्जलिने योगके साथ अनुशासन पदका प्रयोग करके योगशिक्षाकी अनादिता सूचित की है,

और अथ शब्दसे उसके आरम्भ करनेकी प्रतिज्ञा करके योगसाधनाकी कर्तव्यता सूचित की है॥१॥

सम्बन्ध- इस प्रकारके योगशास्त्रके वर्णनकी प्रतिज्ञा करके अब योगके सामान्य लक्षण बतलाते हैं

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥२॥
व्याख्या- इस ग्रन्थमें प्रधानतासे चित्तकी वृत्तियोंके निरोधको ही ‘योग’ नामसे कहा गया है ॥२॥

सम्बन्ध-योग शब्दकी परिभाषा करके अब उसका सर्वोपरि फल बतलाते हैं

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥३॥
व्याख्या- जब चित्तकी वृत्तियोंका निरोध हो जाता है, उस समय द्रष्टा (आत्मा) की अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है, अर्थात् वह कैवल्यअवस्थाको प्राप्त हो जाता है (योग• ४ । ३४) ॥३॥ .

सम्बन्ध- क्या चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेके पहले द्रष्टा अपने स्वरूपमें स्थित नहीं रहता इसपर कहते हैं

वत्तिसारूप्यमितरत्र ॥४॥
व्याख्या- जबतक योग-साधनोंके द्वारा चित्तकी वृत्तियोंका निरोध नहीं हो जाता,

तबतक द्रष्टा अपने चित्तकी वृत्तिके ही अनुरूप अपना स्वरूप समझता रहता है, उसे अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान नहीं होता।
अतः चित्तवृत्तिनिरोधरूप योग अवश्य कर्तव्य है ॥४॥

सम्बन्ध- चित्तकी वृत्तियाँ असंख्य होती हैं, अतः उनको पाँच श्रेणियों में बाँटकर सूत्रकार उनका स्वरूप बतलाते हैं

वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥५॥
व्याख्या- ये चित्तकी वृत्तियाँ आगे वर्णन किये जानेवाले लक्षणोंक अनुसार पाँच प्रकारकी होती हैं तथा हर प्रकारकी वृत्तिके दो भेद होते हैं। एक तो क्लिष्ट यानी

अविद्यादि क्लेशोंको पुष्ट करनेवाली और योगसाधनमें विघ्नरूप होती हैं तथा
दूसरी अक्लिष्ट यानी क्लेशोंको क्षय करनेवाली और योगसाधनमें सहायक होती

हैं। साधकको चाहिये कि इस रहस्यको भलीभाँति समझकर पहले अक्लिष्ट वृत्तियोंसे क्लिष्ट वृत्तियोंको हटावे,

फिर उन अक्लिष्ट वृत्तियोंका भी निरोध करके योग सिद्ध करे ॥५॥

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सम्बन्ध- उक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंके लक्षणोंका वर्णन करनेके लिये पहले उनके नाम बतलाते है

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥६॥
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः

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(१) प्रमाण, (२) विपर्यय, | (३) विकल्प, (४) निद्रा, (५) स्मृति-ये पाँच हैं।

व्याख्या- इन पाँचोंके स्वरूपका वर्णन स्वयं सूत्रकारने अगले सूत्रोंमें किया है,

अतः यहाँ उनकी व्याख्या नहीं की गयी है ।। ६॥

सम्बन्ध- उपर्युक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंमेंसे प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाये जाते हैं-

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥ ७ ॥

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम-(ये तीन), प्रमाणानि-प्रमाण हैं।
व्याख्या-प्रमाणवृत्ति तीन प्रकारकी होती है; उसको इस प्रकार समझना चाहिये

(१) प्रत्यक्ष-प्रमाण बुद्धि, मन और इन्द्रियोंके जानने में आनेवाले

जितने भी पदार्थ हैं, उनका अन्तःकरण और इन्द्रियोंके साथ बिना किसी व्यवधानके सम्बन्ध होनेसे जो भ्रान्ति तथा संशयरहित ज्ञान होता है, वह प्रत्यक्ष

अनुभवसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिन प्रत्यक्ष दर्शनोंसे संसारके पदार्थोकी क्षणभङ्गरताका निश्चय होकर या सब प्रकारसे उनमें दुःखकी प्रतीति

होकर (योग० २ । १५) मनुष्यका सांसारिक पदार्थोंमें वैराग्य हो जाता है, जो | चित्तकी वृत्तियोंको रोकने में सहायक हैं,

जिनसे मनुष्यकी योगसाधनमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ते हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति तो अक्लिष्ट है तथा जिन प्रत्यक्ष दर्शनोंसे मनुष्यको सांसारिक पदार्थ

नित्य और सुखरूप होते हैं, भोगोंमें आसक्ति हो जाती है, जो वैराग्यके विरोधी
भावोंको बढ़ानेवाले हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति क्लिष्ट है।

(२) अनुमान-प्रमाण-किसी प्रत्यक्ष दर्शनके सहारे युक्तियोंद्वारा जो अप्रत्यक्ष पदार्थके स्वरूपका ज्ञान होता है, वह अनुमानसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है।

जैसे धूमको देखकर अग्निकी विद्यमानताका ज्ञान होना, नदीमें बाढ़ आया देखकर दूर-देशमें वृष्टि होनेका ज्ञान होना-इत्यादि । इनमें भी जिन अनुमानोंसे मनुष्यको

संसारके पदार्थोंकी अनित्यता, दुःखरूपता आदि दोषोंका ज्ञान होकर उनमें वैराग्य होता है और योगके साधनोंमें श्रद्धा बढ़ती है, जो आत्मज्ञानमें सहायक हैं,

वे सब वत्तियाँ तो अक्लिष्ट हैं और उनके विपरीत वृत्तियाँ क्लिष्ट हैं।
(३) आगम-प्रमाण-वेद, शास्त्र और आप्त (यथार्थ वक्ता) परुषोंके वचनको

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आगम’ कहते हैं। जो पदार्थ मनुष्यके अन्तःकरण और इन्द्रियोंके प्रत्यक्ष नहीं है एवं जहाँ अनुमानकी भी पहुँच नहीं है, उसके स्वरूपका ज्ञान वेद, शास्त्र और

महापुरुषोंके वचनोंसे होता है, वह आगमसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिस आगम-प्रमाणसे मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है (गीता ५।२२) और

योगसाधनोंमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ते हैं, वह तो अक्लिष्ट है और जिस आगम-प्रमाणसे भोगोंमें प्रवृत्ति और योग-साधनों में अरुचि हो, जैसे स्वर्गलोकके भोगोंकी बड़ाई

सुनकर उनमें और उनके साधनरूप सकाम कर्मोंमें आसक्ति और प्रवृत्ति होती है, वह क्लिष्ट है ॥७॥

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सम्बन्ध- प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाकर अब विपर्ययवृत्तिके लक्षण बतलाते हैं

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥८॥
व्याख्या- किसी भी वस्तुके असली स्वरूपको न समझकर उसे दूसरी ही वस्तु समझ लेना-यह विपरीत ज्ञान ही विपर्ययवृत्ति है-जैसे सीपमें चाँदीकी प्रतीति। यह

वृत्ति भी यदि भोगोंमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली और योगमार्गमें श्रद्धा-उत्साह
बढ़ानेवाली हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है।

जिस दुल्टिस आदिके द्वारा वस्तुओका यथार्थ ज्ञान होता है, उन्हींसे जान भा होता है। यह मिथ्या ज्ञान भी कभी-कभी भोगोंमें वैराग्य करनेवाला हो जाता है। जैसे

भोग्य पदार्थोंकी क्षणभङ्गरताको देखकर, अनुमान करके या
सुनकर उनको सर्वथा मिथ्या मान लेना योग-सिद्धान्तके अनुसार विपरीतवृत्ति है; क्योंकि वे परिवर्तनशील होनेपर भी मिथ्या नहीं हैं तथापि यह मान्यता भोगीमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली होनेसे अक्लिष्ट है।

कुछ महानुभावोंके मतानुसार विपर्ययवृत्ति और अविद्या-दोनों एक ही हैं, परंतु यह युक्तिसङ्गत नहीं मालूम होता; क्योंकि अविद्याका नाश तो केवल

असम्प्रज्ञातयोगसे ही होता है (योग०४।२९-३०) जहाँ प्रमाणवृत्ति भी नहीं रहती। किंतु विपर्ययवृत्तिका नाश तो प्रमाणवृत्तिसे ही हो जाता है। इसके सिवा

योगशास्त्रके मतानुसार विपर्यय ज्ञान चित्तकी वृत्ति है, किंतु अविद्या चित्तवृत्ति नहीं मानी गयी है, क्योंकि वह द्रष्टा और दुश्यके स्वरूपकी उपलब्धिमें हेतुभूत

संयोगकी भी कारण है (योग० २।२३-२४) तथा अस्मिता और राग आदि क्लेशोंकी भी कारण है (योग० २।४), इसके अतिरिक्त प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्ति नहीं है,

परंतु राग-द्वेषादि क्लेशोंका वहाँ भी सद्भाव है, इसलिये भी विपर्ययवृत्ति और अविद्याकी एकता नहीं हो सकती; क्योंकि विपर्ययवृत्ति तो कभी होती है और

कभी नहीं होती, किंतु अविद्या तो कैवल्य-अवस्थाकी प्राप्तितक निरन्तर विद्यमान रहती है। उसका नाश होनेपर तो सभी वृत्तियोंका धर्मी स्वयं चित्त भी अपने

कारणमें विलीन हो जाता है (योग० ४ । ३२)। परंतु प्रमाणवृत्तिके समय विपर्ययवृत्तिका अभाव हो जानेपर भी न तो राग-द्वेषोंका नाश होता है तथा न द्रष्टा

और दृश्यके संयोगका ही। इसके सिवा प्रमाणवृत्ति क्लिष्ट भी होती है, परंतु जिस यथार्थ ज्ञानसे अविद्याका नाश होता है, वह क्लिष्ट नहीं होता। अतः यही मानना

ठीक है कि चित्तका धर्मरूप विपर्ययवृत्ति अन्य पदार्थ है,

patanjali yog darshan

तथा पुरुष और प्रकृतिके संयोगकी कारणरूपा अविद्या उससे सर्वथा भिन्न है।॥ ८॥

सम्बन्ध- अब विकल्पवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥९॥
शब्दज्ञानानुपाती-जो ज्ञान शब्दजनित ज्ञानके साथ-साथ होनेवाला है,

बाढ़ आया देखकर दूर-देशमें वृष्टि होनेका ज्ञान होना-इत्यादि । इनमें भी जिन अनुमानोंसे मनुष्यको संसारके पदार्थोंकी अनित्यता, दुःखरूपता आदि दोषोंका

ज्ञान होकर उनमें वैराग्य होता है और योगके साधनोंमें श्रद्धा बढ़ती है, जो आत्मज्ञान में सहायक हैं, वे सब वृत्तियाँ तो अक्लिष्ट हैं और उनके विपरीत वृत्तियाँ

क्लिष्ट हैं। (३) आगम-प्रमाण-वेद, शास्त्र और आप्त (यथार्थ वक्ता) पुरुषोंके वचनको ‘आगम’ कहते हैं। जो पदार्थ मनुष्यके अन्तःकरण और इन्द्रियोंके प्रत्यक्ष

नहीं है एवं जहाँ अनुमानकी भी पहुँच नहीं है, उसके स्वरूपका ज्ञान वेद, शास्त्र और महापुरुषों के वचनोंसे होता है, वह आगमसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिस

आगम-प्रमाणसे मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है (गीता ५। २२) और योगसाधनोंमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ते हैं, वह तो अक्लिष्ट है और जिस आगम-प्रमाणसे

भोगोंमें प्रवृत्ति और योग साधनोंमें अरुचि हो, जैसे स्वर्गलोकके भोगोंकी बड़ाई सुनकर उनमें और उनके साधनरूप सकाम कर्मोंमें आसक्ति और प्रवृत्ति होती

है, वह क्लिष्ट है ॥७॥ patanjali yog darshan

सम्बन्ध- प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाकर अब विपर्ययवृत्तिके लक्षण बतलाते हैं,

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥ ८॥
व्याख्या-किसी भी वस्तुके असली स्वरूपको न समझकर उसे दूसरी ही वस्तु समझ लेना-यह विपरीत ज्ञान ही विपर्ययवृत्ति है-जैसे सीपमें चाँदीकी प्रतीति ।

यह वृत्ति भी यदि भोगोंमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली और योगमार्गमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ानेवाली हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है।

जिन इन्द्रिय आदिके द्वारा वस्तुओंका यथार्थ ज्ञान होता है, उन्हींसे विपरीत ज्ञान भी होता है। यह मिथ्या ज्ञान भी कभी-कभी भोगोंमें वैराग्य करनेवाला हो जाता

है। जैसे भोग्य पदार्थोंकी क्षणभङ्गरताको देखकर, अनुमान करके या सुनकर उनकोसर्वथा मिथ्या मान लेना योग-सिद्धान्तके अनुसार विपरीतवृत्ति है, क्योंकि

वे परिवर्तनशील होनेपर भी मिथ्या नहीं हैं । तथापि यह मान्यता भोगीमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली होनेसे अक्लिष्ट है। कुछ महानुभावोंके मतानुसार विपर्ययवृत्ति

और अविद्या-दोनों एक ही हैं, परंतु यह युक्तिसङ्गत नहीं मालूम होता क्योंकि अविद्याका नाश तो केवल असम्प्रज्ञातयोगसे ही होता है (योग० ४ । २९-३०) जहाँ

प्रमाणवृत्ति भी नहीं रहती। किंतु विपर्ययवृत्तिका नाश तो प्रमाणवृत्तिसे ही हो जाता है। इसके सिवा योगशास्त्रके मतानुसार विपर्यय ज्ञान चित्तकी वृत्ति है, किंतु

अविद्या चित्तवृत्ति नहीं मानी गयी है; क्योंकि वह द्रष्टा और दृश्यके स्वरूपकी उपलब्धिमें हेतुभूत संयोगकी भी कारण है (योग० २।२३-२४) तथा अस्मिता और

राग आदि क्लेशोंकी भी कारण है (योग० २।४), इसके अतिरिक्त प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्ति नहीं है, परंतु राग-द्वेषादि क्लेशोंका वहाँ भी सद्भाव है, इसलिये भी

विपर्ययवृत्ति और अविद्याकी एकता नहीं हो सकती; क्योंकि विपर्ययवृत्ति तो कभी होती है, और कभी नहीं होती, किंतु अविद्या तो कैवल्य-अवस्थाकी प्राप्तितक

निरन्तर विद्यमान रहती है। उसका नाश होनेपर तो सभी वत्तियोंका धर्मी स्वयं चित्त भी अपने कारणमें विलीन हो जाता है (योग० ४ । ३२)। परंतु प्रमाणवृत्तिके

समय विपर्ययवृत्तिका अभाव हो जानेपर भी न तो राग-द्वेषोंका नाश होता है तथा न द्रष्टा और दृश्यके संयोगका ही। इसके सिवा प्रमाणवृत्ति क्लिष्ट भी होती है;

परंतु जिस यथार्थ ज्ञानसे अविद्याका नाश होता है, वह क्लिष्ट नहीं होता। अतः यही मानना ठीक है कि चित्तका धर्मरूप विपर्ययवृत्ति अन्य पदार्थ है तथा पुरुष

और प्रकृतिके संयोगकी कारणरूपा अविद्या उससे सर्वथा भिन्न है॥८॥

सम्बन्ध- अब विकल्पवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं,

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥९॥

patanjali yog darshan

व्याख्या- केवल शब्दके आधारपर बिना हुए पदार्थकी कल्पना करनेवाली जो

चित्तकी वत्ति है, वह विकल्पवृत्ति है। यह भी यदि वैराग्यकी वृद्धिमें हेतु, योगसाधनों में श्रद्धा और उत्साह बढ़ानेवाली तथा आत्मज्ञानमें सहायक हो तो

अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है। आगम-प्रमाणजनित वृत्तिसे होनेवाले विशुद्ध संकल्पोंके सिवा सुनीसुनायी बातोंके आधारपर मनुष्य जो नाना प्रकारके व्यर्थ

संकल्प करता रहता है, उन सबको विकल्पवृत्तिके ही अन्तर्गत समझना चाहिये। विपर्ययवृत्तिमें तो विद्यमान वस्तुके स्वरूपका विपरीत ज्ञान होता है और

विकल्पवृत्तिमें अविद्यमान वस्तुकी शब्दज्ञानके आधारपर कल्पना होती है, यहीं विपर्यय और विकल्पका भेद है। जैसे कोई मनुष्य सुनी-सुनायी बातोंके आधारपर

अपनी मान्यताके अनुसार भगवान्के रूपकी कल्पना करके भगवान्का ध्यान करता है, पर जिस स्वरूपका वह ध्यान करता है उसे न तो उसने देखा है. न वेद-

शास्त्रसम्मत है और न वैसा कोई भगवान्का स्वरूप वास्तवमें है ही, केवल कल्पनामात्र ही है। यह विकल्पवृत्ति मनुष्यको भगवान्के चिन्तनमें लगानेवाली

होनेसे अक्लिष्ट है;

दूसरी जो भोगोंमें प्रवृत्त करनेवाली विकल्पवृत्तियाँ हैं,

वे क्लिष्ट हैं। इसी प्रकार सभी वृत्तियोंमें क्लिष्ट और अक्लिष्टका भेद समझ लेना चाहिये ॥९॥

सम्बन्ध- अब निद्रावृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं।

अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥१०॥
व्याख्या- जिस समय मनुष्यको किसी भी विषयका ज्ञान नहीं रहता केवलमात्र ज्ञानके अभावकी ही प्रतीति रहती है, वह ज्ञानके अभावका ज्ञान जिस चित्तवृत्तिके

आश्रित रहता है, वह निद्रावत्ति है।* निद्रा भी चित्तकी वृत्तिविशेष है, तभी तो मनुष्य गाढ़ निद्रासे उठकर कहता है कि मुझे आज ऐसी गाढ़ निद्रा आयी जिसमें

किसी बातकी कोई खबर नहीं रही। इस स्मृतिवृत्तिसे ही यह सिद्ध होता है कि निद्रा भी एक वृत्ति है, नहीं तो जगनेपर उसकी स्मृति कैसे होती।

निद्रा भी क्लिष्ट और अक्लिष्ट दो प्रकारकी होती है। जिस निद्रासे जगनेपर साधकके मन और इन्द्रियोंमें सात्त्विकभाव भर जाता है, आलस्यका नाम-निशान

नहीं रहता तथा जो योगसाधनमें उपयोगी और आवश्यक मानी गयी है। (गीता ६।१७) ,वह अक्लिष्ट है, दूसरे प्रकारकी निंद्रा उस अवस्थामें परिश्रमके अभावका

बोध कराकर विश्रामजनित सुखमें आसक्ति उत्पन्न करनेवाली होनेसे क्लिष्ट है ॥ १० ॥

सम्बन्ध- अब स्मृत्तिवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं,

अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः ॥ ११ ॥

व्याख्या- उपर्युक्त प्रमाण, विपर्यय, विकल्प और निद्रा-इन चार प्रकारकी वृत्तियोंद्वारा अनुभवमें आये हुए विषयोंके जो संस्कार चित्तमें पड़े हैं, उनका पुनः

किसी निमित्तको पाकर स्फुरित हो जाना ही स्मृति है। उपर्युक्त
चार प्रकारकी वृत्तियोंके सिवा इस स्मृतिवृत्तिसे जो संस्कार चित्तपर पड़ते हैं ।

उनमें भी पुनः स्मृतिवृत्ति उत्पन्न होती है। स्मृतिवृत्ति भी क्लिष्ट और अक्लिष्ट दोनों ही प्रकारकी होती है। जिस स्मरणसे मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है तथा जो

योगसाधनोंमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ानेवाला एवं आत्मज्ञानमें सहायक है, वह तो अक्लिष्ट है और जिससे भोगोंमें राग-द्वेष बढ़ता है, वह क्लिष्ट है।

स्वप्नको कोई-कोई स्मृतिवृत्ति मानते हैं, परंतु स्वप्नमें जाग्रत्की भाँति सभी वृत्तियोंका आविर्भाव देखा जाता है; अतः उसका किसी एक वृत्तिमें अन्तर्भाव मानना उचित प्रतीत नहीं होता ॥ ११ ॥

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सम्बन्ध- यहाँतक योगकी कर्तव्यता, योगके लक्षण और चित्तवृत्तियोंके लक्षण बतलाये गये; अब उन चित्तवृत्तियोंके निरोधका उपाय बतलाते है,

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १२ ॥

व्याख्या- चित्तकी वृत्तियोंका सर्वथा निरोध करनेके लिये अभ्यास और वैराग्य-ये दो उपाय हैं। चित्तवृत्तियोंका प्रवाह परम्परागत संस्कारोंके बलसे सांसारिक

भोगोंकी ओर चल रहा है। उस प्रवाहको रोकनेका उपाय वैराग्य है और उसे
कल्याणमार्गमें ले जानेका उपाय अभ्यास है * ॥ १२ ॥

सम्बन्ध- उक्त दोनों उपायोंमेंसे पहले अभ्यासका लक्षण बतलाते हैं,

तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ॥ १३॥
व्याख्या- जो स्वभावसे ही चञ्चल है ऐसे मनको किसी एक ध्येयमें स्थिर करनेके लिये बारम्बार चेष्टा करते रहनेका नाम ‘अभ्यास’ है। इसके प्रकार शास्त्रोंमें बहुत

बतलाये गये हैं; इसी पादके ३२ वें सूत्रसे ३९ वेंतक अभ्यासके कुछ भेदोंका वर्णन है; उनमेंसे जिस साधकके लिये जो सुगम हो,

जिसमें उसकी स्वाभाविक रुचि और श्रद्धा हो उसके लिये वही ठीक है ॥ १३ ॥

सम्बन्ध- अब अभ्यासके दृढ़ होनेका प्रकार बतलाते हैं,

स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः ॥१४॥

व्याख्या- अपने साधनके अभ्यासको दृढ़ बनानेके लिये साधकको चाहिये कि साधनमें कभी उकतावे नहीं। यह दृढ़ विश्वास रखे कि किया हुआ अभ्यास कभी

भी व्यर्थ नहीं हो सकता, अभ्यासके बलसे मनुष्य निःसंदेह अपने लक्ष्यकी प्राप्ति कर लेता है। यह समझकर अभ्यासके लिये कालकी अवधि न रखे, आजीवन

अभ्यास करता रहे, साथ ही यह भी ध्यान रखे कि अभ्यासमें व्यवधान (अन्तर) न पड़ने पावे, निरन्तर (लगातार) अभ्यास चलता रहे तथा अभ्यासमें तुच्छ बुद्धि न

करे, उसकी अवहेलना न करे, बल्कि अभ्यासको ही अपने जीवनका आधार बनाकर अत्यन्त आदर और प्रेमपूर्वक उसे साङ्गोपाङ्ग करता रहे। इस प्रकार

किया हुआ अभ्यास दृढ़ होता है * ॥१४॥

सम्बन्ध- अब वैराग्यके लक्षण आरम्भ करते हुए पहले अपर-वैराग्यके लक्षण बतलाते है
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥१५॥

व्याख्या- अन्तःकरण और इन्द्रियोंके द्वारा प्रत्यक्ष अनुभवमें आनेवाले इस लोकके समस्त भोगोंका समाहार यहाँ ‘दष्ट’ शब्दमें किया गया है और जो प्रत्यक्ष

उपलब्ध नहीं हैं, जिनकी बड़ाई वेद, शास्त्र और भोगोंका अनुभव करनेवाले पुरुषोंसे सुनी गयी है, ऐसे भोग्य विषयोंका समाहार् ‘आनुश्रविक’ शब्दमें किया

गया है। उपर्युक्त दोनों प्रकारके भोगोंसे जब चित्त भलीभांति तृष्णारहित हो जाता है, जब उसको प्राप्त करनेकी इच्छाका सर्वथा नाश हो जाता है, ऐसे कामनारहित

चित्तकी जो वशीकार नामक अवस्थाविशेष है, वह ‘अपर-वैराग्य’ है॥१५॥

सम्बन्ध-अब पर-वैराग्यके लक्षण बतलाते है,

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥ १६ ॥

व्याख्या- पहले बतलाये हुए चित्तकी वशीकार-संज्ञारूप वैराग्यसे जब साधककी विषयकामनाका अभाव हो जाता है और उसके चित्तका प्रवाह समानभावसे

अपने ध्येयके अनुभवमें एकाग्र हो जाता है (योग० ३ । १२), उसके बाद समाधि
परिपक्व होनेपर प्रकृति और पुरुषविषयक विवेकज्ञान प्रकट

होता है (योग०३ । ३५), उसके होनेसे जब साधककी तीनों गुणोंमें और उनके कार्यमें किसी प्रकारकी किंचिन्मात्र भी तृष्णा नहीं रहती; (योग० ४ । २६),

जब वह सर्वथा आप्तकाम निष्काम हो जाता है (योग०२ । २७), ऐसी सर्वथा रागरहित अवस्थाको ‘पर-वैराग्य’ कहते हैं * ॥१६॥

सम्बन्ध- इस प्रकार चित्तवृत्ति-निरोधके उपायोंका वर्णन करके अब चित्तवृत्तिनिरोधरूप निर्बीज-योगका स्वरूप बतलानेके लिये पहले उसके पूर्वकी

अवस्थाका सम्प्रज्ञातयोगके नामसे अवान्तर भेदोंके सहित वर्णन करते हैं,

वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात्सम्प्रज्ञातः ॥ १७॥

व्याख्या- सम्प्रज्ञातयोगके ध्येय पदार्थ तीन माने गये हैं-(१) ग्राह्य (इन्द्रियोंके स्थूल और सूक्ष्म विषय), (२) ग्रहण (इन्द्रियाँ और अन्तःकरण) तथा (३) ग्रहीता (बुद्धिके

साथ एकरूप हुआ पुरुष) (योग० १४१)। जब ग्राह्य पदार्थोक स्थूलरूपमें
समाधि की जाती है, उस समय समाधिमें जबतक शब्द, अर्थ और ज्ञानका

विकल्प वर्तमान रहता है, तबतक तो वह सवितर्क समाधि है; और जब इनका विकल्प नहीं रहता, तब वही निर्वितर्क कही जाती है। इसी प्रकार जब ग्राह्य और

ग्रहणके सूक्ष्मरूपमें समाधि की जाती है उस समय समाधिमें जबतक शब्द, अर्थ और ज्ञानका विकल्प रहता है, तबतक वह सविचार और जब इनका विकल्प

नहीं रहता, तब वही निर्विचार कही जाती है। जब निर्विचार समाधिमें विचारका
सम्बन्ध तो नहीं रहता, परंतु आनन्दका अनुभव और अहङ्कारका सम्बन्ध रहता है,

तबतक वह आनन्दानगता समाधि है और जब उसमें आनन्दकी प्रतीति भी लप्त हो जाती है, तब वही केवल अस्मितानुगत समझी जाती है। यही निर्विचार

समाधिकी निर्मलता है, इनका विस्तृत विचार इसी पादके ४१ वें सूत्रसे ४९ वेंतक किया। गया है ॥ १७॥

सम्बन्ध- अब उस अन्तिम योगका स्वरूप बतलाते हैं, जिसके सिद्ध होनेपर द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है (योगः १।३); जो कि इस शास्त्रका मुख्य प्रतिपाद्य है जिसे कैवल्य-अवस्था भी कहते हैं,

विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ॥ १८॥

patanjali !! yog darshan

व्याख्या- साधकको जब पर-वैराग्यकी प्राप्ति हो जाती है, उस समय स्वभावसे ही चित्त संसारके पदार्थों की ओर नहीं जाता। वह उनसे अपने-आप उपरत हो जाता

है। उस उपरत-अवस्थाकी प्रतीतिका नाम ही यहाँ विराम-प्रत्यय है।
इस उपरतिकी प्रतीतिका अभ्यास-क्रम भी जब बंद हो जाता है, उस समय

चित्तकी वृत्तियोंका सर्वथा अभाव हो जाता है (योग० १।५१); केवलमात्र
अन्तिम उपरत-अवस्थाके संस्कारोंसे युक्त चित्त रहता है (योग०३।९-१०)। फिर

निरोध-संस्कारोंके क्रमकी समाप्ति होनेसे वह चित्त भी अपने कारणमें लीन हो जाता है (योग०४।३२-३४) अतः प्रकृतिके संयोगका अभाव हो जानेपर द्रष्टाकी

अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है। इसीको असम्प्रज्ञातयोग, निर्बीजसमाधि (योग० ११५१) और कैवल्य-अवस्था (योग० २।२५; ३ । ५५:४ । ३४) आदि नामोंसे कहा गया है ॥१८॥

सम्बन्ध- यहाँतक योग और उसके साधनोंका संक्षेपमें वर्णन किया गया,

अब किस प्रकारके साधकका उपर्युक्त योग शीघ्र-से-शीघ्र सिद्ध होता है, यह समझानेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है,

भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥ १९ ॥ patanjali yog darshan

व्याख्या- जो पूर्वजन्ममें योगका साधन करते-करते विदेहअवस्थातक पहुँच चुके थे; अर्थात् शरीरके बन्धनसे छूटकर शरीरके बाहर स्थिर होनेका जिनका अभ्यास

दृढ़ हो चुका था, जो ‘महाविदेह’ स्थितिको प्राप्त कर चुके थे (योग० ३।४३),
एवं जो साधन करते-करते ‘प्रकृतिलय’ (योग० १ । ४५; ३ । ४८) तककी स्थिति

प्राप्त कर चुके थे, किंतु कैवल्य-पदकी प्राप्ति होनेके पहले जिनकी मृत्यु हो गयी, उन दोनों प्रकारके योगियोंका जब पुनर्जन्म होता है, जब वे योगभ्रष्ट साधक पुनः

योगिकुलमें जन्म ग्रहण करते हैं; तब उनको पूर्वजन्मके योगाभ्यास-विषयक संस्कारोंके प्रभावसे अपनी स्थितिका तत्काल ज्ञान हो जाता है (गीता ६।४२-४३)

और वे साधनकी परम्पराके बिना ही निर्बीजसमाधिअवस्थाको प्राप्त कर लेते हैं।
उनकी निर्बीजसमाधि उपायजन्य नहीं है, अतः उसका नाम ‘भवप्रत्यय’ है अर्थात्

वह ऐसी समाधि है कि जिसके सिद्ध होनेमें पुनः मनुष्यजन्म प्राप्त होना ही कारण है, साधनसमुदाय नहीं ॥ १९॥

सम्बन्ध- दूसरे साधकोंका योग कैसे सिद्ध होता है? सो बतलाते हैं,

श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥ २०॥

व्याख्या- किसी भी साधनमें प्रवृत्त होनेका और अविचल भावसे उसमें लगे रहनेका मूल कारण श्रद्धा (भक्तिपूर्वक विश्वास) ही है। श्रद्धाकी कमीके कारण ही

साधकके साधनकी उन्नतिमें विलम्ब होता है, अन्यथा कल्याणके साधनमें विलम्बका कोई कारण नहीं है। साधनके लिये किसी अप्राप्त योग्यता और

परिस्थितिकी आवश्यकता नहीं है। इसीलिये सूत्रकारने श्रद्धाको पहला स्थान दिया है। श्रद्धाके साथ साधकमें वीर्य अर्थात् मन, इन्द्रिय और शरीरका सामर्थ्य

भी परम आवश्यक है; क्योंकि इसीसे साधकका उत्साह बढ़ता है। श्रद्धा और वीर्य-इन दोनोंका संयोग मिलनेपर साधककी स्मरणशक्ति बलवती हो जाती है

तथा उसमें योगसाधनके संस्कारोंका ही बारम्बार प्राकट्य होता रहता है; अतः उसका मन विषयोंसे विरक्त होकर समाहित हो जाता है। इसीको समाधि कहते

हैं (योग० १।४६; ३ । ३)। इससे अन्तःकरण स्वच्छ हो जानेपर साधककी बुद्धि ‘ऋतम्भरा’-सत्यको धारण करनेवाली हो जाती है (योग० १।४८)। इस बुद्धिका ही

नाम समाधिप्रज्ञा है। अतएव पर-वैराग्यकी प्राप्तिपूर्वक साधकका निर्बीजसमाधिरूप योग सिद्ध हो जाता है। गीतामें भी कहा है

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ (४।३९) जितेन्द्रिय साधनपरायण और श्रद्धावान्

मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होकर वह बिना विलम्बके-तत्काल ही परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ २०॥

सम्बन्ध- अब अभ्यास-वैराग्यकी अधिकताके कारण योगकी सिद्धि शीघ्र और अति शीघ्र होनेकी बात कहते हैं,

तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥ २१॥
तीव्रसंवेगानाम्-जिनके साधनकी गति तीव्र हैं, उनकी (निर्बीजसमाधि); आसन्नः-शीघ्र (सिद्ध) होती है।

व्याख्या- जिन पुरुषोंका साधन (अभ्यास और वैराग्य) तेजीसे चलता है, जो सब प्रकारकी विघ्न-बाधाओंको ठुकराकर

अपने साधनमें तत्परतासे लगे रहते हैं, उनका योग शीघ्र सिद्ध होता है ॥२१॥
सम्बन्ध-किंतु

मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः ॥ २२॥

व्याख्या- किसका साधन किस दर्जेका है; इसपर भी योग-सिद्धिकी शीघ्रताका विभाग निर्भर करता है; क्योंकि क्रियात्मक अभ्यास और वैराग्य तीव्र होनेपर भी

विवेक और भावकी न्यूनाधिकताके कारण समाधि सिद्ध होनेके कालमें भेद होना
स्वाभाविक है। जिस साधकमें श्रद्धा, विवेकशक्ति और भाव कुछ उन्नत हैं,

उसका साधन मध्यमात्रावाला है और जिस साधकमें श्रद्धा, विवेक और भाव अत्यन्त उन्नत हैं, उसका साधन अधिमात्रावाला है। साधनमें क्रियाकी अपेक्षा

भावका अधिक महत्त्व है। अभ्यास और वैराग्यका जो क्रियात्मक
बाह्य स्वरूप है, वह तो ऊपरवाले सूत्रमें ‘वेग’के नामसे कहा गया है;

और उनका जो भावात्मक आभ्यन्तर स्वरूप है, वह उनकी मात्रा यानी दर्जा है। व्यवहारमें भी देखा जाता है कि एक ही कामके लिये समानरूपसे परिश्रम किया

जानेपर भी जो उसकी सिद्धिमें अधिक विश्वास रखता है, जिस मनुष्यको उस कामके करनेकी युक्तिका अधिक ज्ञान है एवं जो उसे प्रेम और उत्साहपूर्वक

बिना उकताये करता रहता है; वह दूसरोंकी अपेक्षा उसे शीघ्र पूरा कर लेता है। वही बात समाधि की सिद्धिमें भी समझ लेनी चाहिये।

समाधिकी प्राप्तिके लिये साधन करनेवालोंमें जिसका साधन श्रद्धा, विवेकशक्ति और भाव आदिकी अधिकताके कारण जितने ऊँचे दर्जेका है और जिसकी

चालका क्रम जितना तेज है, उसीके अनुसार वह शीघ्र या अतिशीघ्र समाधिकी प्राप्ति कर सकेगा। यही बात समझानेके लिये सूत्रकारने उपर्युक्त दो सूत्रोंकी

रचना की है-ऐसा मालूम होता है। अतः साधकको चाहिये कि अपने साधनको

सर्वथा निर्दोष बतानेकी चेष्टा रखे, उसमें किसी प्रकारकी शिथिलता न आने दे॥२२॥

सम्बन्ध- अब पूर्वोक्त अभ्यास और वैराग्यकी अपेक्षा निर्बीज-समाधिका सुगम उपाय बतलाया जाता है, patanjali yog darshan

ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥ २३॥
व्याख्या- ईश्वरकी भक्ति यानी शरणागतिका नाम ‘ईश्वरप्रणिधान’ है (देखिये योग० २१ की व्याख्या): इससे भी निर्बीज-समाधि शीघ्र सिद्ध हो सकती है (योग०

२।४५), क्योंकि ईश्वर सर्वसमर्थ हैं, वे अपने शरणापन्न भक्तपर प्रसन्न होकर उसके भावानुसार सब कुछ प्रदान कर सकते हैं (गीता ४ । ११*) ॥ २३ ॥

सम्बन्ध- अब उक्त ईश्वरके लक्षण बतलाते हैं,

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ २४ ॥

व्याख्या-अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश-ये पाँच ‘
क्लेश’ हैं; इनका विस्तृत वर्णन दूसरे पादके तीसरे सूत्रसे नवेंतक है। ‘कर्म’ चार

प्रकारके हैं-पुण्य, पाप, पुण्य और पापमिश्रित तथा पुण्य-पापसे रहित (योग०४।७)। कर्मके फलका नाम ‘विपाक’ है (योग० २।१३) और कर्मसंस्कारोंके

समुदायका नाम ‘आशय’ है (योग० २।१२) । समस्त जीवोंका इन चारोंसे अनादि सम्बन्ध है।

यद्यपि मुक्त जीवोंका पीछे सम्बन्ध नहीं रहता तो भी पहले सम्बन्ध था ही; किंतु ईश्वरका तो कभी भी इनसे न सम्बन्ध था, न है और न होनेवाला है। इस कारण

उन मुक्त पुरुषोंसे भी ईश्वर विशेष है, यह बात प्रकट करनेके लिये ही सूत्रकारने ‘पुरुषविशेषः’ पदका प्रयोग किया है ।। २४ ।।

सम्बन्ध- ईश्वरकी विशेषताका पुनः प्रतिपादन करते हैं,

तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ॥२५॥

व्याख्या- जिससे बढ़कर कोई दूसरी वस्तु हो, वह सातिशय है और जिससे बड़ा कोई न हो वह निरतिशय है। ईश्वर ज्ञानकी अवधि है, उसका ज्ञान सबसे बढ़कर

है; उसके ज्ञानसे बढ़कर किसीका भी ज्ञान नहीं है; इसलिये उसे निरतिशय कहा गया है। जिस प्रकार ईश्वरमें ज्ञानकी पराकाष्ठा है, उसी प्रकार धर्म, वैराग्य, यश

और ऐश्वर्य आदिकी पराकाष्ठाका आधार भी उसीको समझना चाहिये ॥२५॥

सम्बन्ध- और भी उसकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं,

पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥ २६ ॥

व्याख्या- सर्गके आदिमें उत्पन्न होनेके कारण सबका गुरु ब्रह्माको माना जाता है, परंतु उसका कालसे अवच्छेद है (गीता ८ । १७) । ईश्वर स्वयं अनादि और अन्य

सबका आदि है (गीता १०।२-३); वह कालकी सीमासे सर्वथा अतीत है, वहाँतक कालकी पहुँच नहीं है; क्योंकि वह कालका भी महाकाल है। इसलिये वह सम्पूर्ण

पूर्वजोंका भी गुरु यानी सबसे बड़ा, सबसे पुराना और सबको शिक्षा देनेवाला है (श्वेता०३।४।६।१८) ॥२६॥

सम्बन्ध- ईश्वरकी शरणागतिका प्रकार बतलानेके लिये उसके नामका वर्णन करते हैं,

तस्य वाचकः प्रणवः ॥ २७॥
तस्य-उस ईश्वरका; वाचकः-वाचक (नाम); प्रणवः-प्रणव (ॐ कार) है।
व्याख्या-नाम और नामीका सम्बन्ध अनादि और बड़ा ही घनिष्ठ है।। इसी कारण

शास्त्रोंमें नाम-जपकी बड़ी महिमा है (तुलसी० बाल० दोहा १८ से २७), गीतामें भी जपयज्ञको सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ बतलाया है (१० । २५), ‘ॐ’ उस परमेश्वरका वेदोक्त

नाम होनेसे मुख्य है (गीता १७ । २३; कठ० १।२।१५-१७); इस कारण यहाँ उसीका वर्णन किया गया है। इसी वर्णनसे श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि जितने भी

ईश्वरके नाम हैं, उनके जपका भी माहात्म्य समझ लेना चाहिये ।। २७॥

सम्बन्ध- ईश्वरका नाम बतलाकर अब उसके प्रयोगकी विधि बतलाते हैं,

तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥ २८॥

व्याख्या- साधकको ईश्वरके नामका जप और उसके स्वरूपका स्मरण-चिन्तन करना चाहिये ।* इसीको पूर्वोक्त ईश्वरप्रणिधान अर्थात् ईश्वरकी भक्ति या

शरणागति कहते हैं। ईश्वरकी भक्तिके और भी बहत-से प्रकार हैं, परंतु जप और ध्यान सब साधनोंमें मुख्य होनेके कारण यहाँ सूत्रकारने केवल नाम और नामीके

स्मरणरूप एक ही प्रकारका वर्णन किया है । गीतामें भी इसी तरह वर्णन आया है (८ । १३) । इसे उपलक्षण मानकर भगवद्भक्तिके सभी । साधनोंको ईश्वरकी

प्रसन्नताके नाते निर्बीज समाधिकी सिद्धिमें हेतु समझना चाहिये’ अर्थात् ईश्वरकी भक्तिके सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंका ईश्वरप्रणिधानमें अन्तर्भाव समझना चाहिये ॥ २८॥

सम्बन्ध- अब ईश्वरके नाम-जप और स्वरूपचिन्तनके फलका वर्णन करते हैं,

तनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥ २९ ॥
व्याख्या- अगले दो सूत्रोंमें जिन विघ्नोंका वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है, ईश्वरके भजन-स्मरणसे उनका अपने-आप नाश हो जाता है और अन्तरात्माके

(द्रष्टाके) स्वरूपका ज्ञान होकर कैवल्य-अवस्था भी उपलब्ध हो जाती है। अतः यह निर्बीज-समाधिकी प्राप्तिका बहुत ही सुगम उपाय है॥२९॥

सम्बन्ध- पूर्वसूत्रमें जिन अन्तरायोंका अभाव होनेकी बात कही गयी है, उनके नाम बतलाये जाते हैं,

व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥३०॥
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व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि-व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व

और अनवस्थितत्व-ये नौ; (जो कि) चित्तविक्षेपाःचित्तके विक्षेप हैं; ते वे ही; अन्तरायाः अन्तराय (विघ्न) हैं।

व्याख्या-योगसाधनमें लगे हुए साधकके चित्तमें विक्षेप उत्पन्न करके उसको साधनसे विचलित करनेवाले ये नौ योगमार्गके विघ्न माने गये हैं।

(१) शरीर, इन्द्रियसमुदाय और चित्तमें किसी प्रकारका रोग उत्पन्न हो | जाना ‘व्याधि’ है।

(२) अकर्मण्यता अर्थात् साधनोंमें प्रवृत्ति न होनेका स्वभाव ‘स्त्यान’ है।

(३) अपनी शक्तिमें या योगके फलमें संदेह हो जानेका नाम ‘संशय’ है।
(४) योगसाधनोंके अनुष्ठानकी अवहेलना (बे-परवाही) करते रहना ‘प्रमाद’ है।
(५) तमोगुणकी अधिकतासे चित्त और शरीरमें भारीपन हो जाना और उसके कारण साधनमें प्रवृत्तिका न होना ‘आलस्य’ है।
(६) विषयोंके साथ इन्द्रियोंका संयोग होनेसे उनमें आसक्ति हो

जानेके कारण जो चित्तमें वैराग्यका अभाव हो जाता है, उसे ‘अविरति’ कहते हैं।

(७) योगके साधनोंको किसी कारणसे विपरीत समझना अर्थात् यह साधन ठीक नहीं, ऐसा मिथ्या ज्ञान हो जाना ‘भ्रान्तिदर्शन’ है।

(८) साधन करनेपर भी योगकी भूमिकाओंका अर्थात् साधनकी स्थितिका प्राप्त न होना-यह ‘अलब्धभूमिकत्व’ है; इससे साधकका उत्साह कम हो जाता है।

(९) योगसाधनसे किसी भूमिमें चित्तकी स्थिति होनेपर भी उसका न ठहरना अनवस्थितत्व’ है।

इन नौ प्रकारके चित्तविक्षेपोंको ही अन्तराय, विघ्न और योगके प्रतिपक्षी आदि नामोंसे कहा जाता है ॥ ३०॥

सम्बन्ध- इनके साथ-साथ होनेवाले दूसरे विघ्नोंका वर्णन करते हैं,

दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः ॥ ३१॥

दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासाः दुःख, दौर्मनस्य, अङ्गमेजयत्व, श्वास और प्रश्वास-ये पाँच विघ्न, विक्षेपसहभुवः विक्षेपोंके साथ-साथ होनेवाले हैं।

व्याख्या- उपर्युक्त चित्तविक्षेपोंके साथ-साथ होनेवाले दूसरे पाँच विप्न इस प्रकार हैं
(१) दुःख-आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक-इस तरह दुःखके प्रधानतया तीन भेद माने गये हैं। काम-क्रोधादिके कारण व्याधि आदिके कारण

या इन्द्रियोंमें किसी प्रकारकी विकलता होनेके कारण जो मन, इन्द्रिय या शरीरमें ताप या पीड़ा होती है, उसको ‘आध्यात्मिक दुःख’ कहते हैं। मनुष्य, पशु, पक्षी,

सिंह, व्याघ्र, मच्छर और अन्यान्य जीवोंके कारण होनेवाली पीड़ाका नाम ‘आधिभौतिक दुःख’ है तथा सर्दी, गर्मी, वर्षा, भूकम्प आदि दैवी घटनासे होनेवाली

पीड़ाका नाम ‘आधिदैविक दुःख’ है।

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(२) दौर्मनस्य-इच्छाकी पूर्ति न होनेपर जो मनमें क्षोभ होता है, उसे ‘दौर्मनस्य’ कहते हैं।

(३) अङ्गमेजयत्व-शरीरके अङ्गोंमें कम्प होना, ‘अङ्ग-मेजयत्व’ है।

(४) श्वास-बिना इच्छाके बाहरकी वायुका भीतर प्रवेश कर जाना अर्थात् बाहरी कुम्भकमें विघ्न हो जाना ‘श्वास’ है।

(५) प्रश्वास-बिना इच्छाके ही भीतरकी वायुका बाहर निकल जाना अर्थात् भीतरी कुम्भकमें विघ्न हो जाना ‘प्रश्वास’ है।

ये पाँचों विक्षिप्त चित्तमें ही होते हैं, समाहित चित्तमें नहीं; इसलिये इनको ‘विक्षेपसहभू’ कहते हैं ॥ ३१ ॥

सम्बन्ध- उक्त विनोंको दूर करनेका दूसरा उपाय बतलाते हैं,

तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥ ३२ ॥

व्याख्या- उपर्युक्त दोनों प्रकारके विघ्नोंका नाश ईश्वर-प्रणिधानसे तो होता ही है, उसके सिवा यह दूसरा उपाय बतलाया गया है। भाव यह कि किसी एक वस्तुमें

चित्तको स्थित करनेका बार-बार प्रयत्न करनेसे भी एकाग्रता उत्पन्न होकर विनोंका नाश हो जाता है; अतः यह साधन भी किया जा सकता है ॥ ३२॥

सम्बन्ध- चित्तके अन्तरालमें राग-द्वेषादि मल रहनेके कारण मलिन चित्त स्थिर नहीं होता, अतः चित्तको निर्मल बनानेका सुगम उपाय बतलाते हैं,

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥ ३३ ॥

सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणाम्-सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा . और पापात्मा-ये चारों जिनके क्रमसे विषय हैं, ऐसी; मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणाम्-मित्रता, दया, प्रसन्नता

और उपेक्षाकी; भावनातः भावनासे; चित्तप्रसादनम्-चित्त स्वच्छ हो जाता है।

व्याख्या- सुखी मनुष्योंमें मित्रताकी भावना करनेसे, दुःखी मनुष्योंमें दयाकी भावना करनेसे, पुण्यात्मा पुरुषोंमें प्रसन्नताकी भावना करनेसे और पापियोंमें

उपेक्षाकी भावना करनेसे चित्तके राग, द्वेष, घृणा, ईर्ष्या और क्रोध आदि मलोंका

नाश होकर चित्त शुद्ध-निर्मल हो जाता है। अतः साधकको इसका अभ्यास करना चाहिये ॥ ३३ ॥

सम्बन्ध- चित्तशुद्धिका दूसरा उपाय बतलाते हैं,

प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ।। ३४ ॥

व्याख्या- बारम्बार प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालनेका तथा यथाशक्ति बाहर

रोके रखनेका अभ्यास करनेसे मनमें निर्मलता आती है, इससे शरीरकी नाड़ियोंका भी मल नष्ट होता है ॥ ३४ ॥

सम्बन्ध- प्रसंगवश चित्तकी निर्मलताके उपाय बतलाकर, अब मनको स्थिर करनेवाला अन्य साधन बतलाते हैं,

विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी ॥ ३५॥

व्याख्या- अभ्यास करते-करते साधकको दिव्य विषयोंका साक्षात् हो जाता है, उन दिव्य विषयोंका अनुभव करनेवाली वृत्तिका नाम विषयवती प्रवृत्ति है (योग०

३ । ३६) । ऐसी प्रवृत्ति उत्पन्न होनेसे साधकका योगमार्गमें विश्वास और उत्साह बढ़ जाता है, इस कारण यह आत्मचिन्तनके अभ्यासमें भी मनको स्थिर करनेमें

हेतु बन जाती है ॥ ३५॥ ..

सम्बन्ध- इसी प्रकारका और भी उपाय बतलाते हैं,

विशोका वा ज्योतिष्मती ॥३६॥

व्याख्या- अभ्यास करते-करते साधकको यदि शोकरहित प्रकाशमय प्रवृत्तिका

अनुभव हो जाय तो वह भी मनको स्थिर करनेवाली होती है ॥ ३६॥

सम्बन्ध- अब चित्तकी स्थिरताका अन्य उपाय बतलाते हैं,

वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥ ३७॥

व्याख्या- जिस पुरुषके राग-द्वेष सर्वथा नष्ट हो चुके हैं, ऐसे विरक्त पुरुषको ध्येय

बनाकर अभ्यास करनेवाला अर्थात् उसके विरक्त भावका मनन करनेवाला चित्त भी स्थिर हो जाता है ॥ ३७॥

सम्बन्ध- और भी अन्य उपाय बतलाते हैं
स्वप्रनिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥३८॥

व्याख्या- स्वप्नमें कोई अलौकिक अनुभव हुआ हो, जैसे अपने इष्टदेवका दर्शन आदि, तो उसको स्मरण करके वैसा ही चिन्तन करनेसे मन स्थिर हो जाता है

तथा गाढ़ निद्रामें केवल चित्तकी वृत्तियोंके अभावका ही ज्ञान रहता है, किसी भी पदार्थकी प्रतीनि नहीं होती, उसी प्रकार समस्त उसीको लक्ष्य बनाकर अभ्यास

करनेसे भी अनायास ही चित्त स्थिर हो सकता है। जिस कालमें तमोगुणका आविर्भाव होता है; उस समय ‘यह अभ्यास नहीं करना चाहिये।’ जिस समय चित्त

और इन्द्रियोंमें सत्त्वगुण बढ़ा हुआ हो, उस
समय यह साधन अधिक लाभप्रद हो सकता है ॥ ३८॥

सम्बन्ध- मनुष्योंकी रुचि भिन्न-भिन्न होती है; अतः अब सर्वसाधारणके उपयोगी साधनका वर्णन करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं
यथाभिमतध्यानाद्वा ॥ ३९ ॥

व्याख्या- उपर्युक्त साधनोंमेंसे कोई साधन किसी साधकके अनुकूल नहीं पड़ता हो तो उसे अपनी रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करना चाहिये। अपनी

रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करनेसे मन स्थिर हो जाता है॥३९॥ . ..

सम्बन्ध- चित्तकी स्थिरताके उपाय बतलाकर अब यह बतलाते हैं कि चित्तमें जब

स्थिर होनेकी योग्यता परिपक्क हो जाती है, तब उसकी कैसी स्थिति होती है,

परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥ ४० ॥

व्याख्या- अभ्यास करते-करते जब साधकका चित्त भलीभाँति स्थितिकी योग्यता प्राप्त कर लेता है; उस समय साधक अपने चित्तको सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पदार्थोंसे

लेकर बड़े-से-बड़े महान् पदार्थतक चाहे जहाँ, चाहे जब तत्काल स्थिर कर सकता है। उसका अपने चित्तपर पूर्ण अधिकार हो जाता है। चित्तमें स्थिर होनेकी

योग्यता परिपक्व हो जानेकी पहचान भी यही है (गीता ६।१९) ॥४०॥

सम्बन्ध- पहले बतलाये हुए उपायोंसे जब साधकका अपने चित्तपर अधिकार हो जाता है और चित्त अत्यन्त निर्मल होकर उसमें समाधिकी योग्यता आ जाती है,

इसके बाद किस प्रकार क्रमसे सम्प्रज्ञात निर्बीज-समाधि सिद्ध होती है, उसका वर्णन आरम्भ करते हैं,

क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः ॥४१॥

व्याख्या- पूर्वोक्त अभ्यास करते-करते जब साधकका चित्त स्वच्छ स्फटिकमणिकी भाँति अति निर्मल हो जाता है, जब उसकी ध्येयसे अतिरिक्त

बाह्य वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, उस समय साधक इन्द्रियोंके स्थूल या सूक्ष्म विषयोंको (योग० ३।४४), या अन्तःकरण और इन्द्रियोंको (योग० ३ । ४७)

अथवा बुद्धिस्थ पुरुषको (योग० ३।४९)-जिस किसी भी ध्येयको लक्ष्य बनाकर उसमें अपने चित्तको लगाता है तो वह चित्त उस ध्येय वस्तुमें स्थित होकर

तदाकार हो जाता है। इसीको सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं, क्योंकि इस समाधिमें साधकको ध्येय वस्तुके स्वरूपका भली प्रकार ज्ञान हो जाता है,

उसके विषयमें किसी प्रकारका संशय या भ्रम नहीं रहता है।

सम्बन्ध- सामान्यरूपसे सम्प्रज्ञातसमाधिका स्वरूप बतला दिया, अब इसके भेदोंका वर्णन करते हैं,

तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥४२॥

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व्याख्या- ग्राह्य यानी मन और इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण करनेमें आनेवाले पदार्थ

दो प्रकारके होते हैं-(१) स्थूल, (२) सूक्ष्म । इनमेंसे किसी एक स्थूल पदार्थको लक्ष्य

बनाकर उसके स्वरूपको जाननेके लिये जब योगी अपने चित्तको उसमें लगाता है, तब पहले-पहल होनेवाले अनुभवमें उस वस्तुके .. नाम, रूप और ज्ञानके

विकल्पोंका मिश्रण रहता है। अर्थात् उसके स्वरूपके साथ-साथ उसके नाम और प्रतीतिकी भी चित्तमें स्फुरणा रहती है। अतः इस समाधिको सवितर्क समाधि

कहते हैं। इसीका दूसरा नाम सविकल्प योग भी है ॥४२॥

सम्बन्ध- इसके बाद,

स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितका ॥४३॥

व्याख्या- पहले बतलायी हुई स्थितिके बाद जब साधकके चित्तमें ध्येय वस्तुके नामकी स्मृति लुप्त हो जाती है और उसको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका भी

स्मरण नहीं रहता, तब अपने (चित्तके) स्वरूपका भी भान न रहनेके कारण उसके स्वरूपके अभावकी-सी स्थिति हो जाती है, उस समय सब प्रकारके

विकल्पोंका अभाव हो जानेके कारण केवल ध्येय पदार्थके साथ तदाकार हुआ चित्त ध्येयको प्रकाशित करता है, उस अवस्थाका नाम ‘निर्वितर्क’ समाधि है।

इसमें शब्द और प्रतीतिका कोई विकल्प नहीं रहता, अतः इसे ‘निर्विकल्प’ समाधि भी कहते हैं ॥ ४३ ।।

सम्बन्ध- इस प्रकार स्थूल-ध्येय पदार्थों में होनेवाली सम्प्रज्ञात समाधिका भेद बतलाकर अब सूक्ष्म ध्येयमें होनेवाली सम्प्रज्ञात समाधिके भेद बतलाते हैं,

एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥४४॥

व्याख्या- जिस प्रकार स्थूल-ध्येय पदार्थोंमें की जानेवाली समाधिके दो भेद हैं, उसी प्रकार सूक्ष्म-ध्येय पदार्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाली समाधिके भी दो भेद समझ

लेने चाहिये अर्थात् जब किसी सूक्ष्म-ध्येय पदार्थके स्वरूपका यथार्थ स्वरूप जाननेके लिये उसमें चित्तको स्थिर किया जाता है, तब पहले उसके नाम, रूप

और ज्ञानके विकल्पोंसे मिला हुआ अनुभव होता है, वह स्थिति सविचार समाधि है; और उसके बाद जब नामका और ज्ञानका अर्थात् चित्तके निज स्वरूपका भी

विस्मरण होकर केवल ध्येय पदार्थका ही अनुभव होता है, वह स्थिति निर्विचार समाधि है ॥ ४४ ॥

सम्बन्ध- अब सूक्ष्म पदार्थोंमें किन-किनकी गणना है, यह स्पष्ट करते हैं,

सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥ ४५ ॥

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व्याख्या- पृथ्वीका सूक्ष्म विषय गन्धतन्मात्रा, जलका रसतन्मात्रा, तेजका रूपतन्मात्रा, वायुका स्पर्शतन्मात्रा और आकाशका शब्दतन्मात्रा है एवं उन

सबका और मनसहित इन्द्रियोंका सूक्ष्म विषय अहंकार, अहंकारका महत्तत्त्व और महत्तत्त्वका सूक्ष्म विषय यानी कारण प्रकृति है।

उससे आगे कोई सूक्ष्म पदार्थ नहीं है; वही सूक्ष्मताकी अवधि है। अतः प्रकृतिपर्यन्त किसी भी सूक्ष्म पदार्थको लक्ष्य बनाकर उसमें की हुई समाधिको

सविचार और निर्विचार समाधिके अन्तर्गत समझ लेना चाहिये । यद्यपि पुरुष प्रकृतिसे भी सूक्ष्म है, पर वह दृश्य पदार्थों में नहीं है, अतः तद्विषयक समाधि

इसमें नहीं आनी चाहिये; तथापि ग्रहीतृविषयक समाधि बुद्धिमें प्रतिबिम्बित पुरुषमें की जाती है (योग० ३ । ३५) । अतः उसको निर्विचार समाधिके अन्तर्गत

मान लेने में कोई आपत्ति मालूम नहीं होती। क्योंकि कठोपनिषद् (१ । ३ । १०) में जीवात्मासे प्रकृतिको ‘पर’ कहा गया है। इस प्रकार यहाँ सूक्ष्म विषयकी सीमा

प्रकृतिपर्यन्त बतला देनेके कारण मन, इन्द्रियाँ तथा आनन्द और अस्मिताका उसमें अन्तर्भाव प्रतीत होता है; फिर सतरहवें सूत्रमें कहे हुए आनन्द और

अस्मिताको और इकतालीसवें सूत्रमें ग्रहण नामसे कहे हुए
मन और इन्द्रियोंको और ग्रहीता नामसे कहे हुए प्रकृतिस्थ पुरुषको टीकाकारोंने

विचार’ शब्दवाच्य सूक्ष्म विषयसे अलग कैसे कहा-और सूत्रकारोंने तद्विषयक समाधिके भेदोंका वर्णन क्यों नहीं किया, यह विचारणीय है॥४५॥

सम्बन्ध- इकतालीसवें सूत्रसे पैंतालीसवेंतक सम्प्रज्ञातसमाधिका भेद बतलाकर अब उन सब प्रकारकी समाधियोंका सहेतुक दूसरा नाम बतलाते हैं,

ता एव सबीजः समाधिः ॥४६॥

व्याख्या- निर्वितर्क और निर्विचार समाधियाँ निर्विकल्प होनेपर भी निर्बीज नहीं हैं, ये सब-की-सब सबीज समाधि ही हैं, क्योंकि इनमें बीजरूपसे किसी-न-किसी

ध्येय पदार्थको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका अस्तित्व-सा रहता है। अतः सम्पूर्ण वृत्तियोंका पूर्णतया निरोध न होनेके कारण इन समाधियोंमें पुरुषको

कैवल्य-अवस्थाका लाभ नहीं होता ॥ ४६॥

सम्बन्ध- उक्त चार प्रकारकी समाधियोंमेंसे निर्विचार समाधि ही सबसे श्रेष्ठ है,

यह प्रतिपादन करनेके लिये उसकी विशेष अवस्थाका फलसहित वर्णन करते हैं,

निर्विचारवैशारोऽध्यात्मप्रसादः ॥४७॥

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व्याख्या- निर्विचार समाधिके अभ्याससे जब योगीके चित्तकी स्थिति सर्वथा परिपक्क हो जाती है, उसकी समाधि-स्थितिमें किसी प्रकारका किंचिन्मात्र भी

दोष नहीं रहता (योग० १ । ४०) । उस समय योगीकी बुद्धि
अत्यन्त स्वच्छ-निर्मल हो जाती है (योग० ३ । ५) ॥ ४७ ।।

ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥४८॥

व्याख्या- उस अवस्थामें योगीकी बुद्धि वस्तुके सत्य (असली) स्वरूपको ग्रहण करनेवाली होती है; उसमें संशय और भ्रमका लेश भी नहीं रहता ॥४८॥

सम्बन्ध- उक्त ऋतम्भरा प्रज्ञाकी विशेषताका वर्णन करते हैं,

श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥ ४९ ॥

व्याख्या- वेद, शास्त्र और आप्त पुरुषके वचनोंसे वस्तुका सामान्य ज्ञान होता है, पूर्ण ज्ञान नहीं होता। इसी प्रकार अनुमानसे भी साधारण ज्ञान ही होता है। बहुत-

से सूक्ष्म पदार्थोंमें तो अनुमानकी पहुँच ही नहीं है। अतः वेद-शास्त्रोंमें किसी वस्तुके स्वरूपका वर्णन सुननेसे जो तद्विषयक निश्चय होता है, वह श्रुतबुद्धि है;

इसी प्रकार अनुमान (युक्ति) प्रमाणसे जो वस्तुके स्वरूपका निश्चय होता है, वह अनुमान बुद्धि है। ये दोनों प्रकारकी बुद्धि वृत्तियाँ वस्तुके स्वरूपको

सामान्यरूपसे ही विषय करती हैं, उसके अङ्ग प्रत्यङ्गोसहित उसका पूर्ण ज्ञान इनसे नहीं होता; किंतु ऋतम्भरा प्रज्ञासे वस्तुके स्वरूपका यथार्थ और पूर्ण

(अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसहित) ज्ञान हो जाता है। अतः यह उन दोनों प्रकारकी बुद्धियोंसे भिन्न और अत्यन्त श्रेष्ठ है॥४९॥

सम्बन्ध- इस ऋतम्भरा प्रज्ञाका और भी महत्त्व बतलाते हैं,

तजः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥५०॥

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व्याख्या- मनुष्य जिस किसी भी वस्तुका अनुभव करता है, जो कुछ भी क्रिया करता है, उन सबके संस्कार अन्तःकरणमें इकट्ठे हुए रहते हैं, इन्हींको

योगशास्त्रमें कर्माशय (योग० २ । १२) के नामसे कहा है। ये ही मनुष्यको संसारचक्रमें भटकानेवाले मुख्य कारण हैं (योग० २ । १३)

इनके नाशसे ही मनुष्य मुक्तिलाभ कर सकता है। अतः उक्त बुद्धिका महत्त्व प्रकट करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि इस बुद्धिके प्रकट होनेपर जब मनुष्यको

प्रकृतिके यथार्थ रूपका भान हो जाता है; तब उसका प्रकृतिमें और उसके कार्यों में स्वभावसे ही वैराग्य हो जाता है । उस वैराग्यके संस्कार पूर्व इकट्ठे हुए सब

प्रकारके रागद्वेषमय संस्कारोंका नाश कर डालते हैं

(योग० २ । २६,३ । ४९-५०), इससे योगी शीघ्र ही मुक्तावस्थाके समीप पहुँच जाता है ॥५०॥ .

सम्बन्ध- जब निर्बीज-समाधिरूप कैवल्य-अवस्थाका वर्णन करते हुए इस पादकी समाप्ति करते है,

तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥ ५१॥

व्याख्या- जब ऋतम्भरा प्रज्ञाजनित संस्कारके प्रभावसे अन्य सब प्रकारके संस्कारोंका अभाव हो जाता है, उसके बाद उस ऋतम्भरा प्रज्ञासे उत्पन्न संस्कारों

में भी आसक्ति न रहनेके कारण उनका भी निरोध हो जाता है। उनका निरोध होते ही समस्त संस्कारोंका निरोध अपने-आप हो जाता है।

अतः संस्कारके बीजका सर्वथा अभाव हो जानेसे इस अवस्थाका नाम

निर्बीज समाधि है। इसीको कैवल्य-अवस्था भी कहते हैं (योग० ३ । ५०) ॥ ५१ ॥

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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

शांति मंत्र

उपनिषदों का मूल विषय ब्रह्मविद्या को माना गया है। ब्रह्मविद्या का क्षेत्र बड़ा व्यापक है।

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विद्वानों ने विभिन्न उपनिषदों में वर्णित विषयों के आधार पर ब्रह्मविद्या के अन्तर्गत ३२ विद्याओं को समाविष्ट माना है। ये विद्याएँ क्रमश: स्पष्ट करती हैं कि

(१) परब्रह्म अपने सङ्कल्पानुसार सबके कारण हैं,

(२) वे कल्याणगुणाकर वैभवसम्पत्र आनन्दमय हैं,

(३) उनका रूप दिव्य है, upnishad

(४) उपाधि रहित होकर वे सबके प्रकाशक हैं,

(५) वे चराचर के प्राण हैं,

(६) चे प्रकाशमान हैं,

(७) वे इन्द्र, प्राण आदि चेतनाचेतनों के आत्मा हैं,

(८) प्रत्येक पदार्थ की सत्ता, स्थिति एवं यन्त्र उनके अधीन हैं,

(९) समस्त संसार को लीन कर लेने की सामर्थ्य उनमें है,

(१०) उनकी नित्य स्थिति नेत्र में है,

(११) जगत् उनका शरीर है,

(१२) उनके विराट् रूप की कल्पना में अग्नि आदि अङ्ग बनकर रहते हैं,

(१३) स्वर्लोक,आदित्य आदि के अङ्गी बने हुए बे वैश्वानर हैं,

(१४) वे अनन्त ऐश्वर्य सम्पन्न हैं,

(१५) वे नियन्ता हैं,

(१६) वे मुक्त पुरुषों के भोग्य हैं,

(१७) वे सबके आधार हैं,

(१८) वे अन्तर्यामी रूप से सबके हृदय में विराजमान हैं,

(१९) वेसभी देवताओं के उपास्य है,

(२०) वे वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत् और साभ्यों के आत्मा के रूप में उपास्य हैं,

(२१) अधिकारानुसार वे सभी के उपासनीय हैं,

(२२)वेप्रकृतितत्त्व के नियन्ता हैं,

(२३) समस्त जगत् उनका कार्य है,

(२४) उनका साक्षात्कार कर लेना मोक्ष का साधन है,

(२५) ब्रह्मा, रुद्र आदि-आदि देवताओं के अन्तर्यामी होने के कारण उन-उन देवताओं की उपासना के द्वारा वे प्राप्त होते हैं,

(२६) संसार के बन्धन से

मुक्ति उपनिषद् की अपनी शैली अद्भुत है।

गूढ़ रहस्यों को समझने की तीव्र उत्कण्ठा अनुभूति की गहन क्षमता तथाअभिव्यक्ति की सहजता का दर्शन जगह-जगह होता ही रहता है।

कठोपनिषद् में नचिकेता अपनी जिज्ञासा को लेकर यम के सामने इतने अविचल

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भाव से डटे रहते हैं कि यम को द्रवित होना ही पड़ता है। प्रकृति के गूढ़ रहस्यों

को जन सामान्य के लिए सुलभ उपमाओं के माध्यम से व्यक्त करने का बड़ा

सुन्दर प्रयास किया गया है। श्वेताश्वतर उपनिषद् के १.४ में विश्व व्यवस्था को एक विशिष्ट पहिये की उपमा से समझाने का प्रयास किया गया है,

तो १.५ में विश्व के जीवन प्रवाह को एक नदी के प्रसंग से व्यक्त करने का कौशल दिखाया गया है।

ब्राह्मी चेतना किस प्रकार विभिन्न चरणों को पूरा करती हुई ‘जीव’ रूप में व्यक्त होती है, यह

तथ्य मात्र विवेचनात्मक ढंग से समझना-समझाना बड़ा दुष्कर है; किन्तु छान्दोग्योपनिषद् (५.४-८) में ऋषि उसे क्रमश: पाँच प्रकार की अग्नियों में पाँच

आहुतियों के उदाहरण से बहुत सहज रूप से समझाते हैं। प्रत्येक अग्नि में एक हव्य की आहुति होती है,

उससे नये चरण में पदार्थ की उत्पत्ति होती है। उपनिषदों में कर्मकाण्ड का तथा

उनकी फलश्रुतियों का उल्लेख भी जहाँ-तहाँ मिलता है; लेकिन वे वहीं तक सीमित नहीं रह जाते। ,

कर्मकाण्ड के स्थूल स्वरूप को भेदकर उसके मर्म तक पहुँचते हैं, वे सामगान की व्याख्या करते हैं,

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥

ईशावास्योपनिषद ishavasya upanishad

यह ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वशाखीय संहिताका चालीसवाँ अध्याय है। मन्त्र-भागका अंश होनेसे इसका विशेष महत्त्व है। इसीको सबसे पहला

उपनिषद् माना जाता है। शुक्लयजुर्वेदके प्रथम उनतालीस अध्यायोंमें कर्मकाण्डका निरूपण हुआ है। यह उस काण्डका अन्तिम अध्याय है

और इसमें भगवत्तत्त्वरूप ज्ञानकाण्डका निरूपण किया गया है। इसके पहले

मन्त्रमें ‘ईशा वास्यम्’ वाक्य आनेसे इसका नाम ‘ईशावास्य’ माना गया है

शान्तिपाठ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

ॐ सच्चिदानन्दघन

व्याख्या- वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म पुरुषोत्तम सब प्रकारसे सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत् भी उस परब्रह्मसे ही पूर्ण है; क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से

ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्मकी पूर्णतासे जगत् पूर्ण है, इसलिये भी वह

परिपूर्ण है। उस पूर्ण ब्रह्ममें से पूर्णको निकाल लेनेपर भी वह पूर्ण ही बच रहता है।

त्रिविध तापकी शान्ति हो। यह मन्त्र बृहदारण्यक-उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके प्रथम ब्राह्मणकी प्रथम कण्डिकाका पूर्वार्द्धरूप है।

ॐ ईशा वास्यमिद सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्॥१॥

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व्याख्या- मनुष्योंके प्रति वेदभगवान्का पवित्र आदेश है कि अखिल विश्व-

ब्रह्माण्डमें जो कुछ भी यह चराचरात्मक जगत् तुम्हारे देखने-सुननेमें आ रहा है, सब-का

सब सर्वाधार, सर्वनियन्ता, सर्वाधिपति, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वकल्याणगुणस्वरूप परमेश्वरसे व्याप्त है; सदा-सर्वत्र उन्हींसे परिपूर्ण है (गीता ९। ४)।

इसका कोई भी अंश उनसे रहित नहीं है (गीता १०। ३९, ४२)। यों समझकर उन

ईश्वरको निरन्तर अपने साथ रखते हुए-सदा-सर्वदा उनका स्मरण करते हुए ही

तुम इस जगत्में ममता और आसक्तिका त्याग करके केवल कर्तव्य-पालनके लिये

ही विषयोंका यथाविधि उपभोग करो अर्थात्- विश्वरूप ईश्वरकी पूजाके लिये

ही कर्मोंका आचरण करो। विषयोंमें मनको मत फँसने दो, इसीमें तुम्हारा निश्चित कल्याण है (गीता २। ६४; ३। ९; १८। ४६)। वस्तुतः ये भोग्य-पदार्थ किसीके भी

नहीं हैं। मनुष्य भूलसे ही इनमें ममता और आसक्ति कर बैठता है। ये सब

परमेश्वरके हैं और उन्हींकी प्रसन्नताके लिये इनका उपयोग होना चाहिये ॥

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥

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व्याख्या- पूर्व मन्त्रके कथनानुसार जगत्के एकमात्र कर्ता, धर्ता, हर्ता, सर्वशक्तिमान्, सर्वमय परमेश्वरका सतत स्मरण रखते हुए सब कुछ उन्हींका

समझकर उन्हींकी पूजाके लिये शास्त्रनियत कर्तव्यकर्मोंका आचरण करते हुए

ही सौ वर्षतक जीनेकी इच्छा करो-इस प्रकार अपने पूरे जीवनको परमेश्वरके प्रति समर्पण कर दो।

ऐसा समझो कि शास्त्रोक्त स्वकर्मका आचरण करते हुए जीवन-निर्वाह करना

केवल परमेश्वरकी पूजाके लिये ही है, अपने लिये नहीं-भोग भोगनेके लिये नहीं।

यों करनेसे वे कर्म तुझे बन्धनमें नहीं डाल सकेंगे। कर्म करते हुए कर्मोंसे लिप्त न

होनेका यही एकमात्र मार्ग है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी मार्ग

कर्मबन्धनसे मुक्त होनेका नहीं है (गीता २। ५०,५१; ५। १०)॥२॥

सम्बन्ध- इस प्रकार कर्मफलरूप जन्मबन्धनसे मुक्त होनेके निश्चित मार्गका

निर्देश करके अब इसके विपरीत मार्गपर चलनेवाले मनुष्योंकी गतिका वर्णन करते हैं,

असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः। तास्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥३॥

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व्याख्या- मानव-शरीर अन्य सभी शरीरोंसे श्रेष्ठ और परम दुर्लभ है एवं वह

जीवको भगवान्की विशेष कृपासे जन्म-मृत्युरूप संसार-समुद्रसे तरनेके लिये ही मिलता

है। ऐसे शरीरको पाकर भी जो मनुष्य अपने कर्मसमूहको ईश्वर-पूजाके लिये

समर्पण नहीं करते और कामोपभोगको ही जीवनका परम ध्येय मानकर विषयोंकी


आसक्ति और कामनावश जिस किसी प्रकारसे भी केवल विषयोंकी प्राप्ति और उनके यथेच्छ उपभोगमें ही लगे रहते हैं; वे वस्तुतः आत्माकी हत्या करनेवाले ही

हैं, क्योंकि इस प्रकार अपना पतन करनेवाले वे लोग अपने जीवनको केवल व्यर्थ

ही नहीं खो रहे हैं वरं अपनेको और भी अधिक कर्मबन्धनमें जकड़ रहे हैं। इन काम भोग-परायण लोगोंको


चाहे वे कोई भी क्यों न हों, उन्हें चाहे संसारमें कितने ही विशाल नाम, यश, वैभव

या अधिकार प्राप्त हों, मरनेके बाद कर्मोंके फलस्वरूप बार-बार उन कूकर

शूकर, कीट, पतंगादि विभिन्न शोक संतापपूर्ण आसुरी योनियोंमें और भयानक

नरकोंमें भटकना पड़ता है (गीता १६। १६, १९, २०), जो कि ऐसे आसुरी स्वभाववाल

दुष्टोंके लिये निश्चित किये हुए हैं और महान् अज्ञानरूप अन्धकारसे आच्छादित

हैं। इसीलिये श्रीभगवान्ने गीतामें कहा है कि मनुष्यको अपने द्वारा अपना उद्धार

करना चाहिये, अपना पतन नहीं करना चाहिये (६। ५)

सम्बन्ध- जो परमेश्वर सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त हैं, जिनका सतत स्मरण करते हुए

तथा जिनकी पूजाके लिये ही समस्त कर्म करने चाहिये, वे कैसे हैं-इस जिज्ञासापर कहते हैं,

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्। तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥४॥

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व्याख्या- वे सर्वान्तर्यामी सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अचल और एक हैं, तथापि मनसे

भी अधिक तीव्र वेगयुक्त हैं। जहाँतक मनकी गति है, वे उससे भी कहीं आगे

पहलेसे ही विद्यमान हैं। मन तो वहाँतक पहुँच ही नहीं पाता। वे सबके आदि और

ज्ञानस्वरूप हैं अथवा सबके आदि होनेके कारण सबको पहलेसे ही जानते हैं।

पर उनको देवता तथा महर्षिगण भी पूर्णरूपसे नहीं जान सकते (गीता १० । २)।

जितने भी तीव्र वेगयुक्त बुद्धि, मन और इन्द्रियाँ अथवा वायु आदि देवता हैं,

अपनी शक्तिभर परमेश्वरके अनुसंधानमें सदा दौड़ लगाते रहते हैं; परंतु परमेश्वर नित्य अचल रहते हुए ही उन सबको पार करके आगे निकल जाते हैं।

वे सब वहाँतक पहुँच ही नहीं पाते। असीमकी सीमाका पता ससीमको कैसे लग

सकता है। बल्कि वायु आदि देवताओंमें जो शक्ति है, जिसके द्वारा वे जलवर्षण,

प्रकाशन, प्राणिप्राणधारण आदि कर्म करनेमें समर्थ होते हैं, वह इन

अचिन्त्यशक्ति परमेश्वरकी शक्तिका एक अंशमात्र ही है
उनका सहयोग मिले बिना ये सब कुछ भी नहीं कर सकते ॥४

सम्बन्ध- अब परमेश्वरकी अचिन्त्यशक्तिमत्ता तथा व्यापकता प्रकारान्तरसे पुनः वर्णन करते हैं

तदेजति तन्नजति तद् दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥५॥

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व्याख्या- वे परमेश्वर चलते भी हैं और नहीं भी चलते; एक ही कालमें परस्परविरोधी भाव, गुण तथा क्रिया जिनमें रह सकती है, वे ही तो परमेश्वर हैं।

यह उनकी अचिन्त्य शक्तिकी महिमा है। दूसरे प्रकारसे यह भी कहा जा
सकता है कि भगवान् जो अपने दिव्य परमधाममें और लीलाधाममें अपने प्रिय

भक्तोंको सुख पहुँचानेके लिये अप्राकृत सगुण-साकार रूपमें प्रकट रहकर लीला किया करते हैं, यह उनका चलना है; और निर्गुणरूपसे जो सदा-सर्वथा

अचल स्थित हैं, यह उनका न चलना है। इसी प्रकार वे श्रद्धा-प्रेमसे रहित मनुष्योंको कभी दर्शन

नहीं देते, अतः उनके लिये दूर-से-दूर हैं; और प्रेमकी पुकार सुनते ही जिन प्रेमीजनोंके सामने चाहे जहाँ उसी क्षण प्रकट हो जाते हैं, उनके लिये वे समीप

से-समीप हैं। इसके अतिरिक्त वे सदा-सर्वत्र परिपूर्ण हैं, इसलिये दूर-से-दूर भी वे ही हैं और समीप-से-समीप भी वे ही हैं; क्योंकि ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ

वे न हों। सबके अन्तर्यामी होनेके कारण भी वे अत्यन्त समीप हैं; पर जो अज्ञानी लोग उन्हें इस रूपमें नहीं पहचानते, उनके लिये वे बहुत दूर हैं (गीता १३ । १५)।

वस्तुत: वे इस समस्त जगत्के परम आधार हैं और परम कारण वे ही हैं; इसलिये बाहर-भीतर सभी जगह वे ही परिपूर्ण हैं (गीता ७। ७)॥

सम्बन्ध- अब अगले दो मन्त्रों में इन परब्रह्म परमेश्वरको जाननेवाले महापुरुषकी स्थितिका वर्णन किया जाता है

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥६॥

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व्याख्या- इस प्रकार जो मनुष्य प्राणिमात्रको सर्वाधार परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मामें देखता है और सर्वान्तर्यामी परम प्रभु परमात्माको प्राणिमात्रमें देखता

है, वह कैसे किससे घृणा या द्वेष कर सकता है। वह तो सदा-सर्वत्र अपने परम

प्रभुके ही दर्शन करता हुआ (गीता ६। २९-३०)। मन-ही-मन सबको प्रणाम करता रहता है तथा

सबकी सब प्रकारसे सेवा करना और उन्हें सुख पहुँचाना चाहता है॥६॥

यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥७॥

व्याख्या- इस प्रकार जब मनुष्य परमात्माको भलीभाँति पहचान लेता है, जब

उसकी सर्वत्र भगवदृष्टि हो जाती है-जब वह प्राणिमात्रमें एकमात्र तत्त्व

श्रीपरमात्माको ही देखता है, तब उसे सदा-सर्वत्र परमात्माके दर्शन होते रहते हैं।

उस समय उसके अन्तःकरणमें शोक, मोह आदि विकार कैसे रह सकते हैं

वह तो इतना आनन्दमग्न हो जाता है कि शोक-मोहादि विकारोंकी छाया भी कहीं

उसके चित्तप्रदेशमें नहीं रह जाती। लोगोंके देखनेमें वह सब कुछ करता हुआ भी

वस्तुतः अपने प्रभुमें ही क्रीडा करता है (गीता ६। ३१)। उसके लिये प्रभु और

प्रभुकी लीलाके अतिरिक्त अन्य कुछ रह ही नहीं जाता ॥७

सम्बन्ध- अब इस प्रकार परमप्रभु परमेश्वरको तत्त्वसे जाननेका तथा सर्वत्र देखनेका फल बतलाते हैं

पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण _ मस्नाविर शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतो ऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥८॥

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व्याख्या- उपर्युक्त वर्णनके अनुसार परमेश्वरको सर्वत्र जानने-देखनेवाला महापुरुष उन परब्रह्म पुरुषोत्तम सर्वेश्वरको प्राप्त होता है, जो शुभाशुभ

कर्मजनित प्राकृत सूक्ष्म देह तथा पाञ्चभौतिक अस्थि-शिरा-मांसादिमय षड्विकारयुक्त स्थूल देहसे रहित, छिद्ररहित, दिव्य शुद्ध सच्चिदानन्दघन हैं; एवं जो क्रान्तदर्शी-सर्वद्रष्टा हैं,

सबके ज्ञाता, सबको अपने नियन्त्रणमें रखनेवाले सर्वाधिपति हैं, और कर्मपरवश

नहीं वरं स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले हैं तथा जो सनातन कालसे सब प्राणियोंके लिये

उनके कर्मानुसार समस्त पदार्थोंकी यथायोग्य रचना और विभागव्यवस्था करते आये हैं॥

सम्बन्ध- अब अगले तीन मन्त्रोंमें विद्या और अविद्याका तत्त्व समझाया जायगा।

इस प्रकरणमें परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिके साधन ‘ज्ञान’ को विद्याके नामसे कहा

गया है और स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति अथवा इस लोकके विविध भोगैश्वर्यकी

प्राप्तिके साधन ‘कर्म’को अविद्याके नामसे। इन ज्ञान और कर्म-दोनोंके तत्त्वको

भलीभाँति समझकर उनका अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य ही इन दोनों साधनोंके

द्वारा सर्वोत्तम तथा वास्तविक फल प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं-इस

रहस्यको समझानेके लिये पहले, उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं

अन्धंतमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः॥९॥

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व्याख्या- जो मनुष्य भोगोंमें आसक्त होकर उनकी प्राप्तिके साधनरूप अविद्याका-विविध प्रकारके कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं, वे उन कर्मोंके

फलस्वरूप अज्ञानान्धकारसे परिपूर्ण विविध योनियों और भोगोंको ही प्राप्त होते

हैं। वे मनुष्य-जन्मके चरम और परम लक्ष्य श्रीपरमेश्वरको न पाकर निरन्तर जन्म

मृत्युरूप संसारके प्रवाहमें पड़े हुए विविध तापोंसे संतप्त होते रहते हैं।
दूसरे जो मनुष्य न तो अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्तापनके अभिमानसे रहित

कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं और न विवेक-वैराग्यादि ज्ञानके प्राथमिक साधनोंका ही सेवन करते हैं; परंतु केवल शास्त्रोंको पढ़-सुनकर अपनेमें विद्याका-ज्ञानका

मिथ्या आरोप करके ज्ञानाभिमानी बन बैठते हैं, ऐसे, मिथ्या ज्ञानी मनुष्य अपनेको ज्ञानी मानकर

हमारे लिये कोई भी कर्तव्य नहीं है’ इस प्रकार कहते हुए कर्तव्यकर्मोंका त्याग

कर देते हैं और इन्द्रियोंके वशमें होकर शास्त्रविधिसे विपरीत मनमाना आचरण

करने लगते हैं। इससे वे लोग सकामभावसे कर्म करनेवाले विषयासक्त

मनुष्योंकी अपेक्षा भी अधिकतर अन्धकारको-पशु-पक्षी, शूकर-कूकर आदि नीच योनियोंको और रौरव कुम्भीपाकादि घोर नरकोंको प्राप्त होते हैं॥९॥

सम्बन्ध- शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर ज्ञान तथा कर्मका अनुष्ठान करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, उसका संकेतसे वर्णन करते हैं

अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुरविद्यया । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥१०॥

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व्याख्या- सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले ज्ञानका यथार्थ स्वरूप है नित्यानित्यवस्तुका विवेक, क्षणभङ्गर विनाशशील अनित्य ऐहलौकिक और

पारलौकिक भोग-सामग्रियों और उनके साधनोंसे पूर्ण विरक्ति, संयमपूर्ण पवित्र जीवन और एकमात्र सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्मके चिन्तनमें अखण्ड संलग्नता।

इस यथार्थ ज्ञानके अनुष्ठानसे प्राप्त होता है-परब्रह्म पुरुषोत्तम (गीता १८। ४९-५५)। यथार्थ ज्ञानका यह सर्वोत्तम फल, ज्ञानाभिमानमें रत स्वेच्छाचारी

मनुष्योंको जो दुर्गतिरूप फल मिलता है, उससे सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।
इसी प्रकार सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले कर्मका स्वरूप है-कर्ममें कर्तापनके

अभिमानका अभाव, राग-द्वेष और फल-कामनाका अभाव एवं अपने वर्णाश्रम तथा परिस्थितिके अनुरूप केवल भगवत्सेवाके भावसे श्रद्धापूर्वक शास्त्रविहित

कर्मोंका यथायोग्य सेवन। इसके अनुष्ठानसे समस्त दुर्गुण और दुराचारोंका
अशेष रूपसे नाश हो जाता है और हर्ष-शोकादि समस्त विकारोंसे रहित होकर

साधक मृत्युमय संसार-सागरसे तर जाता है। सकामभावसे किये जानेवाले कर्मोंका जो पुनर्जन्मरूप फल उन कर्ताओंको मिलता है, उससे इस यथार्थ कर्म-

सेवनका यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।। इस प्रकार हमने उन परम

ज्ञानी महापुरुषोंसे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक्-पृथक्-रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था॥१०॥

सम्बन्ध- अब उपर्युक्त प्रकारसे ज्ञान और कर्म-दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट शब्दोंमें बतलाते हैं

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभय सह। अविद्यया मृत्युं तीर्वा विद्ययामृतमश्नुते॥११॥

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व्याख्या- कर्म और अकर्मका वास्तविक रहस्य समझनेमें बड़े-बड़े बुद्धिमान् पुरुष भी भूल कर बैठते हैं (गीता ४। १६)। इसी कारण कर्म रहस्यसे अनभिज्ञ

ज्ञानाभिमानी मनुष्य कर्मको ब्रह्मज्ञानमें बाधक समझ लेते हैं और अपने वर्णाश्रमोचित अवश्यकर्तव्य कर्मोंका त्याग कर देते हैं; परंतु इस प्रकारके त्यागसे

उन्हें त्यागका यथार्थ फल-कर्मबन्धनसे छुटकारा नहीं मिलता (गीता १८। ८)। इसी प्रकार ज्ञान (अकर्मावस्था-नैष्कर्म्य)-का तत्त्व न समझनेके कारण मनुष्य अपनेको

ज्ञानी तथा संसारसे ऊपर उठे हुए मान लेते हैं। अतः वे या तो अपनेको पुण्य-पापसे अलिप्त मानकर मनमाने कर्माचरणमें प्रवृत्त हो जाते हैं, या कर्मोंको

भाररूप समझकर उन्हें छोड़ देते हैं और आलस्य, निद्रा तथा प्रमादमें अपने दुर्लभ मानव-जीवनके अमूल्य समयको नष्ट कर देते हैं।

इन दोनों प्रकारके अनर्थोंसे बचनेका एकमात्र उपाय कर्म और ज्ञानके रहस्यको साथ-साथ समझकर उनका यथायोग्य अनुष्ठान करना ही है। इसीलिये इस मन्त्रमें

यह कहा गया है कि जो मनुष्य इन दोनोंके तत्त्वको एक ही साथ भलीभाँति समझ लेता है, वह अपने वर्णाश्रम और परिस्थितिके अनुरूप शास्त्रविहित कर्मोंका

स्वरूपतः त्याग नहीं करता, बल्कि उनमें कर्तापनके अभिमानसे तथा रागद्वेष और फलकामनासे रहित होकर उनका यथायोग्य आचरण करता है। इससे

उसकी जीवनयात्रा भी सुखपूर्वक चलती है और इस भावसे कर्मानुष्ठान करनेके फलस्वरूप उसका अन्तःकरण समस्त दुर्गुणों एवं विकारोंसे रहित होकर

अत्यन्त निर्मल हो जाता है और भगवत्कृपासे वह मृत्युमय संसारसे सहज ही तर जाता है। इस कर्मसाधनके साथ-ही साथ विवेक-वैराग्यसम्पन्न होकर निरन्तर

ब्रह्मविचाररूप ज्ञानाभ्यास करते रहनेसे श्रीपरमेश्वरके यथार्थ ज्ञानका उदय होनेपर वह शीघ्र ही परब्रह्म परमेश्वरको साक्षात् प्राप्त कर लेता है॥११॥

सम्बन्ध- अब अगले तीन मन्त्रों में असम्भूति और सम्भूतिका तत्त्व बतलाया जायगा। इस प्रकरणमें ‘असम्भूति’ शब्दका अर्थ है- जिनकी पूर्णरूपसे सत्ता न

हो, ऐसी विनाशशील देव, पितर और मनुष्यादि योनियाँ एवं उनकी भोग-सामग्रियाँ। इसीलिये चौदहवें मन्त्रमें ‘असम्भूति’ के स्थानपर स्पष्टतया ‘विनाश’

शब्दका प्रयोग किया गया है

। इसी प्रकार सम्भूति शब्दका अर्थ है-जिसकी सत्ता पूर्णरूपसे हो वह सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाला अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम (गीता

७। ६-७)। देव, पितर और मनुष्यादिकी उपासना किस प्रकार करनी चाहिये और अविनाशी परब्रह्मकी किस प्रकार-इस तत्त्वको समझकर उनका अनुष्ठान

करनेवाले
मनुष्य ही उनके सर्वोत्तम फलोंको प्राप्त हो सकते हैं, अन्यथा नहीं। इस भावको समझानेके लिये पहले, उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान

करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽर ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यारताः॥१२॥

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व्याख्या- जो मनुष्य विनाशशील स्त्री, पुत्र, धन, मान, कीर्ति, अधिकार आदि इस लोक और परलोककी भोग-सामग्रियोंमें आसक्त होकर उन्हींको सुखका हेतु

समझते हैं तथा उन्हींके अर्जन-सेवनमें सदा संलग्न रहते हैं एवं इन भोग-सामग्रियोंकी प्राप्ति, संरक्षण तथा वृद्धिके लिये उन विभिन्न देवता, पितर और

मनुष्यादिकी
उपासना करते हैं, जो स्वयं जन्म-मरणके चक्रमें पड़े हुए होनेके कारण अभावग्रस्त और शरीरकी दृष्टिसे विनाशशील हैं, उनके उपासक वे भोगासक्त

मनुष्य अपनी उपासनाके फलस्वरूप विभिन्न देवताओंके लोकोंको और विभिन्न भोगयोनियोंको प्राप्त होते हैं। यही उनका अज्ञानरूप घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है।

(गीता ७। २० से २३) दूसरे जो मनुष्य शास्त्रके तात्पर्यको तथा भगवान्के दिव्य गुण, प्रभाव, तत्त्व और रहस्यको न समझनेके कारण न तो भगवान्का भजन-ध्यान

ही करते हैं और न श्रद्धाका अभाव तथा भोगोंमें आसक्ति होनेके कारण लोकसेवा और शास्त्रविहित देवोपासनामें ही प्रवृत्त होते हैं, ऐसे वे विषयासक्त

मनुष्य झूठ-मूठ ही अपनेको ईश्वरोपासक बतलाकर सरलहृदय जनतासे अपनी पूजा कराने लगते हैं। ये लोग मिथ्याभिमानके कारण देवताओंको तुच्छ बतलाते

हैं और शास्त्रानुसार अवश्यकर्तव्य देवपूजा तथा गुरुजनोंका सम्मान-सत्कार करना भी छोड़ देते हैं। इतना ही नहीं, दूसरोंको भी अपने वाग्जालमें फँसाकर

उनके मनोंमें भी देवोपासना आदिके प्रति अश्रद्धा उत्पन्न कर देते हैं। ये लोग अपनेको ही ईश्वरके समकक्ष मानते-मनवाते हुए मनमाने दुराचरणमें प्रवृत्त हो

जाते हैं। ऐसे दम्भी मनुष्योंको अपने दुष्कर्मोंका कुफल भोगनेके लिये बाध्य होकर कूकर-शूकर आदि नीच योनियोंमें और रौरव-कुम्भीपाकादि नरकोंमें

जाकर भीषण यन्त्रणाएँ भोगनी पड़ती हैं। यही उनका विनाशशील देवताओंकी उपासना करनेवालोंकी अपेक्षा भी अधिकतर घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है

(गीता १६। १८-१९)॥१२॥

सम्बन्ध- शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर सम्भूति और असम्भूतिकी

उपासना करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, अब संकेतसे उसका वर्णन करते हैं

अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्। इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥१३॥

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व्याख्या- अविनाशी ब्रह्मकी उपासनाका यथार्थ स्वरूप है-परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्को सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वाधार, सर्वमय, सम्पूर्ण संसारके कर्ता, धर्ता,

हर्ता, नित्य अविनाशी समझना और भक्ति, श्रद्धा तथा प्रेमपरिपूरित हृदयसे नित्य-निरन्तर उनके दिव्य परम मधुर नाम, रूप, लीला, धाम तथा प्राकृत गुणरहित एवं दिव्य

गुणगणमय सच्चिदानन्दघन स्वरूपका श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि करते रहना। इस प्रकारकी सच्ची उपासनासे उपासकको शीघ्र ही अविनाशी परब्रह्म

पुरुषोत्तमकी प्राप्ति हो जाती है (गीता ९।३४)। ईश्वरोपासनाका मिथ्या स्वाँग भरनेवाले दम्भियोंको जो फल मिलता है, उससे इन सच्चे उपासकोंको मिलनेवाला यह फल

सर्वथा भिन्न और विलक्षण है। इसी प्रकार विनाशशील देवता, पितर, मनुष्य आदिकी उपासनाका यथार्थ स्वरूप है-शास्त्रों एवं श्रीभगवान्के आज्ञानुसार (गीता

१७।१४) देवता, पितर, ब्राह्मण, माता-पिता, आचार्य और ज्ञानी महापुरुषोंकी सेवा-पूजादि अवश्य कर्तव्य समझकर करना और उसको भगवान्की आज्ञाका पालन एवं

उनकी परम सेवा समझना। इस प्रकार निष्कामभावसे देव-पितर-मनुष्य आदिकी सेवा-पूजा करनेवालोंके अन्तःकरणकी शुद्धि होती है तथा उनको

श्रीभगवान्की कृपा एवं प्रसन्नता प्राप्त होती है, जिससे वे मृत्युमय संसारसागरसे तर जाते हैं। विनाशशील देवता आदिकी सकाम उपासनासे जो फल मिलता है,

उससे यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।
इस प्रकार हमने उन धीर तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंसे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक्-पृथक्-रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था॥१३॥

सम्बन्ध- अब उपर्युक्त प्रकारसे सम्भूति और असम्भूति दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट बतलाते हैं

सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभय सह। विनाशेन मृत्यु ती| सम्भूत्यामृतमश्नुते॥१४॥

व्याख्या- जो मनुष्य यह समझ लेता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम नित्य, अविनाशी, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वाधिपति, सर्वात्मा और सर्वश्रेष्ठ हैं, वे

परमेश्वर नित्य निर्गुण (प्राकृत गुणोंसे सर्वथा रहित) और नित्य सगुण (स्वरूपभूत दिव्यकल्याण-गुणगण-विभूषित) हैं और इसीके साथ जो यह भी समझ लेता है कि देवता, पितर,

मनुष्य आदि जितनी भी योनियाँ तथा भोगसामग्रियाँ हैं, सभी विनाशशील, क्षणभङ्गर और जन्म-मृत्युशील होनेके कारण महान् दुःखके कारण हैं; तथापि

इनमें जो सत्ता-स्फूर्ति तथा शक्ति है, वह सभी भगवान्की है और भगवान्के जगच्चक्रके सुचारुरूपसे चलते रहनेके लिये भगवत्प्रीत्यर्थ ही इनकी यथायोग्य सेवा-पूजा आदि

करनेकी शास्त्रोंने आज्ञा दी है और शास्त्र भगवान्की ही वाणी हैं, वह मनुष्य ऐहलौकिक तथा पारलौकिक देव-पितरादि लोकोंके भोगोंमें आसक्त न होकर

कामना ममता आदि हृदयसे निकालकर इन सबकी यथायोग्य शास्त्रविहित सेवा पूजादि करता है। इससे उसकी जीवन-यात्रा सुखपूर्वक चलती है और उसके आभ्यन्तरिक

विकारोंका नाश होकर अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है एवं भगवत्कृपासे वह सहज ही मृत्युमय संसार-सागरसे तर जाता है। विनाशशील देवता आदिकी निष्काम

उपासनाके साथ-ही-साथ अविनाशी परात्पर प्रभुकी उपासनासे वह शीघ्र ही अमृतरूप परमेश्वरको प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है॥१४

सम्बन्ध- श्रीपरमेश्वरकी उपासना करनेवालेको परमेश्वरकी प्राप्ति होती है, यह

कहा गया। अतः भगवान्के भक्तको अन्तकालमें परमेश्वरसे उनकी प्राप्तिके लिये किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥१५॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- भक्त इस प्रकार प्रार्थना करे कि ‘हे भगवन् ! आप अखिल ब्रह्माण्डके पोषक हैं, आपसे ही सबको पुष्टि प्राप्त होती है। आपकी भक्ति ही सत्यधर्म है

और मैं उसमें लगा हुआ हूँ; अतएव मेरी पुष्टि-मेरे मनोरथकी पूर्ति तो आप अवश्य ही करेंगे। आपका दिव्य श्रीमुख–सच्चिदानन्दस्वरूप प्रकाशमय सूर्यमण्डलकी

चमचमाती हुई ज्योतिर्मयी यवनिकासे आवृत है। मैं आपका निरावरण-प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहता हूँ, अतएव आपके पास पहुँचकर आपका निरावरण-दर्शन

करनेमें बाधा देनेवाले जितने भी, जो भी आवरण–प्रतिबन्धक हों, उन सबको मेरे लिये आप हटा लीजिये! अपने सच्चिदानन्दस्वरूपको प्रत्यक्ष प्रकट कीजिये’ ॥१५॥

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह। तेजो यत्ते रूपंकल्याणतमंतत्ते पश्यामियोऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि॥१६॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- भगवन्! आप अपनी सहज कृपासे भक्तोंके भक्ति-साधनमें दृष्टि प्रदान करके उनका पोषण करनेवाले हैं; आप समस्त ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, परम

ज्ञानस्वरूप तथा अपने भक्तोंको अपने स्वरूपका यथार्थ ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं (गीता १०। ११); आप सबका यथायोग्य नियमन, नियन्त्रण और शासन करनेवाले

हैं, आप ही भक्तों या ज्ञानी महापुरुषोंके लक्ष्य हैं और अविज्ञेय होनेपर भी अपने भक्तवत्सल स्वभावके कारण भक्तिके द्वारा उनके जाननेमें आ जाते हैं, आप

प्रजापतिके भी प्रिय हैं। हे प्रभो! इस सूर्यमण्डलकी तप्त रश्मियोंको एकत्र करके अपनेमें लुप्त कर लीजिये। इसके उग्र तेजको समेटकर अपनेमें मिला लीजिये

और मुझे अपने दिव्यस्वरूपके प्रत्यक्ष दर्शन कराइये। अभी तो मैं आपकी कृपासे आपके सौन्दर्य-माधुर्य निधि दिव्य परम कल्याणमय

सच्चिदानन्दस्वरूपका ध्यान-दृष्टिसे दर्शन कर रहा हूँ; साथ ही बुद्धिके द्वारा समझ भी रहा हूँ कि जो आप परम पुरुष इस सूर्यके और समस्त विश्वके आत्मा

हैं, वही मेरे भी आत्मा हैं; अतः मैं भी वही हूँ॥१६॥

सम्बन्ध- ध्यानके द्वारा भगवान्के दिव्य मङ्गलमय स्वरूपके दर्शन करता हुआ साधक अब भगवान्की साक्षात् सेवामें पहुँचनेके लिये व्यग्र हो रहा है और

शरीरका त्याग करते समय सूक्ष्म तथा स्थूल शरीरके सर्वथा विघटनकी भावना करता हुआ भगवान्से प्रार्थना करता है

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त शरीरम्। ॐक्रतो स्मर कृत स्मर क्रतो स्मर कृत स्मर॥१७॥

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व्याख्या– परमधामका यात्री वह साधक अपने प्राण, इन्द्रिय और शरीरको अपनेसे सर्वथा भिन्न समझकर उन सबको उनके अपने-अपने उपादान तत्त्वमें

सदाके लिये विलीन करना एवं सूक्ष्म और स्थूल शरीरका सर्वथा विघटन करना चाहता है। इसलिये कहता है कि प्राणादि समष्टिवायु आदिमें प्रविष्ट हो जायँ और स्थूल शरीर

जलकर भस्म हो जाय। फिर वह अपने आराध्य देव परब्रह्म पुरुषोत्तम श्रीभगवान्से प्रार्थना करता है कि ‘हे यज्ञमय विष्णु–सच्चिदानन्द विज्ञानस्वरूप

परमेश्वर! आप अपने निजजन मुझको और मेरे कर्मोंको स्मरण कीजिये। आप स्वभावसे ही मेरा और मेरे द्वारा बने हुए भक्तिरूप कार्योंका स्मरण करेंगे क्योंकि आपने कहा है,

अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम्’ मैं अपने भक्तका स्मरण करता हूँ और उसे परम गतिमें पहुँचा देता हूँ, अपनी सेवामें स्वीकार कर लेता हूँ, क्योंकि यही

सर्वश्रेष्ठ गति है।’ इसी अभिप्रायसे भक्त यहाँ दूसरी बार फिर कहता है कि ‘भगवन्! आप मेरा और मेरे कर्मोंका स्मरण कीजिये। अन्तकालमें मैं आपकी

स्मृतिमें आ गया तो फिर निश्चय ही आपकी सेवामें शीघ्र पहुँच जाऊँगा॥१७॥

सम्बन्ध- इस प्रकार अपने आराध्य देव परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्से प्रार्थना करके

अब साधक अपुनरावर्ती अर्चि आदि मार्गके द्वारा परम धाममें जाते समय उस मार्गके अग्निअभिमानी देवतासे प्रार्थना करता है

अग्ने नय सुपथा राये अस्माविश्वानिदेव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम* ॥१८॥

व्याख्या-साधक कहता है-हे अग्निदेवता ! मैं अब अपने परम प्रभु भगवान्की सेवामें पहुँचना और सदाके लिये उन्हींकी सेवामें रहना चाहता हूँ। आप शीघ्र ही

मुझे परम सुन्दर मङ्गलमय उत्तरायणमार्गसे भगवान्के परमधाममें पहुँचा दीजिये। आप मेरे कर्मोंको जानते हैं। मैंने जीवनमें भगवान्की भक्ति की है और

उनकी कृपासे इस समय भी मैं ध्याननेत्रोंसे उनके दिव्य स्वरूपके दर्शन और उनके नामोंका उच्चारण कर रहा हूँ। तथापि आपके ध्यानमें मेरा कोई ऐसा कर्म

शेष हो, जो इस मार्गमें प्रतिबन्धकरूप हो, तो आप कृपा करके उसे नष्ट कर

दीजिये। मैं आपको बार-बार विनयपूर्वक नमस्कार करता हूँ* ॥ १८॥

यजुर्वेदीय ईशावास्योपनिषद् समाप्त !!!

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