Categories
vedant datshan

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

vedant darshan adhyay 1 paad 2 sutra 16,32

सम्बन्धयदि इस प्रकरणमें नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाले प्रतिविम्ब, नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा- इनमेंसे किसी एकको नेत्रान्तर्वती पुरुष मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं—

अनवस्थितेरसंभवाच्च नेतरः ।।१२।१७ ॥

अनवस्थिते: अन्य किसीकी नेत्रमें निरन्तर स्थिति न होनेके कारण; च= तथा; असंभवात् ( श्रुतिमें बताये हुए अमृतत्व आदि गुग ) दूसरे किसीमे सम्भव न होनेसे; इतर:-ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भी; न नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं है।

व्याख्या- छाया-पुरुष या प्रतिविम्ब नेत्रेन्द्रियमें सदा नहीं रहता; जब कोई पुरुष सामने आता है, तब उसका प्रतिविम्ब नेत्रमे दिखायी देता है और उसके हटते ही अदृश्य हो जाता है । इन्द्रियानुग्राहक देवताकी स्थिति भी नेत्रमे सदा नहीं रहती, जिस समय वह इन्द्रिय अपने विषयको ग्रहण करती है, उसी समय वह उसके सहायक रूपसे उसमें स्थित माना जाता है ।

इसी प्रकार जीवात्मा भी मनके द्वारा एक समय किसी एक इन्द्रियके विषयको ग्रहण करता है तो दूसरे समय दूसरी ही इन्द्रियके विषयको; और सुषुप्तिमे तो किसीके भी विषयको नहीं ग्रहण करता । अतः निरन्तर एक-सी स्थिति आँखमे न रहनेके कारण इन तीनोमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष
नहीं कहा जा सकता । इसके सिवा, नेत्रमे दिखायी देनेवाले पुरुषके जो अमृतत्व और निर्भयता आदि गुण श्रुतिन बताये है, वे ब्रह्मके अतिरिक्त और किसीमे’ सम्भव नहीं है। इस कारण भी उपर्युक्त तीनोंमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं माना जा सकता ।

इसलिये परब्रह्म परमेश्वरको ही यहाँ नेत्रमे दिखायी देनेवाला पुरुष कहा
गया है; यही मानना ठीक है।

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽस्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते। एतदुबै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मास पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः।

किन्तु जो तपस्याके साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक और श्रद्धासे युक्त होकर अध्यात्मविद्याके द्वारा परमात्माकी खोज करके जीवन सार्थक कर लेते हैं,
वे उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकको जीत लेते (प्राप्त कर लेते) हैं। यही प्राणोका केन्द्र है । यह अमृत और निर्मय पद है। यह परम गति है। इससे पुनः लौटकर नहीं आते । इस प्रकार यह निरोध– पुनरावृत्ति-निवारक है।

सम्बन्ध- पूर्वप्रकरणमें यह वात बतायी गयी है कि श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मके लिये भिन्न-भिन्न स्थान आदिका निर्देश किया गया है । अव पुन: अधिदैव, अधिभूत आदिमें उस ब्रह्मकी व्याप्ति वतलाकर उसी बातका समर्थन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

अन्तर्याम्यधिदेवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १। २ । १८॥

अधिदेवादिषु-आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि समस्त वस्तुओंमे; अन्तर्यामी जिसे अन्तर्यामी वतलाया गया है ( वह परब्रह्म ही है ); तद्धर्म व्यपदेशात्-क्योंकि वहाँ उसीके धोका वर्णन है।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (३ । ७ ) में यह प्रसङ्ग आया है। वहाँ उद्दालक ऋषिन याज्ञवल्क्य मुनिसे पहले तो सूत्रात्माके विपयमे प्रश्न किया है। फिर उस अन्तर्यामीके सम्बन्धमे पूछा है, जो इस लोक और परलोकको तथा समस्त भूत-प्राणियोंको उनके भीतर रहकर नियन्त्रणमे रखता है । इसके उत्तरमे याज्ञवल्क्यने सूत्रात्मा तो वायुको वताया है और अन्तर्यामीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उसे जड़-चेतनात्मक समस्त भूतो, सब इन्द्रियो और सपूर्ण जीवोंका नियन्ता बताकर अन्तमे इस प्रकार कहा है,

यह अन्तर्यामी देखनमे न आने वाला किन्तु स्वयं सवको देखनेवाला है, सुननमें न आनेवाला किन्तु स्वयं सत्र कुछ सुननेवाला है और मनन करनेमे न
आनेवाला किन्तु खयं सबका मनन करनेवाला है । वह विशेषरूपसे किसीके जाननमे नहीं आता, किन्तु स्वयं सबको विशेषरूपसे भलीभाँति जानता है । ऐसा यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इससे भिन्न सब कुछ विनाशशील है ।’ इस वर्णनमे आये हुए महत्त्वसूचक विशेषण परब्रह्ममे ही सङ्गत हो सकते हैं । जीवात्माका अन्तर्यामी आत्मा ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई नहीं हो सकता । अतः इस प्रसङ्गमे ब्रह्मको ही अन्तर्यामी बताया गया है..–यही मानना ठीक है ।

सम्बन्ध- पूर्वसूत्रमें विधि-मुखसे यह बात सिद्ध की गयी कि अन्तर्यामी ब्रह्म ही है । अव निषेधमुखसे यह सिद्ध करते हैं कि अव्यक्त जड प्रकृति अन्तर्यामी नहीं हो सकती

न च स्मार्तमतधर्मामिलापात् ॥ १।२ । १६ ॥

सातम्-सांख्यस्मृतिद्वारा प्रतिपादित प्रधान ( जड प्रकृति); च-भी; न= अन्तर्यामी नहीं है; अतद्धर्मामिलापात-क्योकि इस प्रकरणमे बताये हुए द्रष्टापन आदि धर्म प्रकृतिके नहीं है ।

व्याख्या- सांख्य-स्मृतिद्वारा प्रतिपादित जड प्रकृतिके धर्मोका वर्णन वहाँ अन्तर्यामीके लिये नहीं हुआ है। अपितु चेतन परब्रह्मके धर्मोका ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । इस कारण वहाँ कहा हुआ अन्तर्यामी प्रकृति नहीं हो सकती । अतः यही सिद्ध होता है कि इस प्रकरणमे ‘अन्तर्यामी’ के नामसे पर ब्रह्म परमात्माका ही
वर्णन हुआ है।

सम्बन्ध- यह ठीक है कि जड होनेके कारण प्रकृतिको अन्तर्यामी नहीं कहा जा सकता। परन्तु जीवात्मा तो चेतन है तथा वह शरीर और इन्द्रियोंके भीतर रहनेवाला और उनका नियमन करनेवाला भी प्रत्यक्ष है । अतः उसीको अन्तर्यामी मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते है

शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॥ १। २ । २० ॥

शारीरः शरीरमे रहनेवाला जीवात्मा; च-भी; (न= ) अन्तर्यामी नहीं है; हि-क्योकि; उभयेऽपि-माध्यन्दिनी तथा काण्व दोनो ही शाखावाले; एनम्-इस जीवात्माको; भेदेन अन्तर्यामीसे भिन्न समझते हुए; अधीयते अध्ययन करते है।

व्याख्या- माध्यन्दिनी और काण्व-दोनो शाखाओवाले विद्वान् अन्तर्यामीको पृथिवी आदिकी भॉति जीवात्माके भी भीतर रहकर उसका नियमन करनेवाला मानते है । वहाँ जीवात्माको नियम्य और अन्तर्यामीको नियन्ता बताया गया है। इस प्रकार दोनोका पृथक्-पृथक् वर्णन होनेके कारण वहाँ ‘अन्तर्यामी’ पद परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, जीवात्माका नहीं ।

य आत्मनि तिष्ठनात्सनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्थात्मा शरीरं य आत्मान मन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः।
(शतपथबा. १४ । ५ । ३०)

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

यो विज्ञाने तिष्ठन् विनानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञान र शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्पमृतः। (वृ० उ० ३ । ७ 1 २२ )

जो जीवात्मामे रहनेवाला, जीवात्माके भीतर है, जिसे जीवात्मा नही जानता: जीवात्मा जिसका शरीर है और जो उसके भीतर रहकर जीवात्माका नियमन करता है। वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।

सम्बन्ध- उन्नीसवें सूत्रमै यह बात कही गयी है कि द्रष्टापन आदि चंतनके धर्म जड प्रकृनिमें नहीं घट सकते, इसलिये वह अन्तर्यामी नहीं हो सकती । इसपर यह जिज्ञासा होती है कि मुण्डकोपनिपदमें जिसको अझ्यता, अग्राह्यता आदि धर्मोस युक्त वतलाकर अन्तमे भूतोंका कारण बताया गया है, वह तो प्रकृति हो सकती है। क्योंकि उस जगह बताये हुए सभी धर्म प्रकृतिमें पाये जाते है । इसपर कहते है

अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः॥ १।२।२१॥

अदृश्यत्यादिगुणक: अदृश्यता आदि गुणोवाला परब्रह्म परमेश्वर ही है; धर्मोक्तेः क्योंकि उस जगह उसीके सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है।

व्याख्या- मुण्डकोपनिपढ़े यह प्रसङ्ग आया है कि महर्षि शौनक विधि पूर्वक अगिरा ऋपिकी शरणमे गये । वहाँ जाकर उन्होंने पूछा भगवन् ! किसको जान लेनेपर यह सब कुछ जाना हुआ हो जाता है । इसपर अगिराने कहा- ‘जानने योग्य विद्याएँ दो है, एक अपरा, दूसरी परा । उनमेसे अपरा विद्या तो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष है और परा वह है, जिससे उस अक्षर ब्रह्मको जाना जाता है ।’ यह कहकर उस अक्षरको समझानेके लिये अगिराने उसके गुण और धोका वर्णन करते हुए ( मु० १ । १ । ६ मे ) कहा

यत्तदन्द्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्गमचक्षु.श्रोत्रं तपाणिपादम् । नित्यं त्रिभुं सर्वगनं लुसूक्ष्मं तदव्ययं तद्भूतयोनि परिपश्यन्ति धीराः ।।

अर्थात् ‘जो इन्द्रियोद्वारा अगोचर है, पकड़नेमे आनेवाला नहीं है, जिसका कोई गोत्र नहीं है, वर्ग नहीं है, जो आँख, कान तथा हाथ-पैरसे रहित है, नित्य, व्यापक, सर्वत्र परिपूर्ण, अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वथा अविनाशी है । उसको धीर पुरुष देखते हैं, वह समस्त भूतोका परम कारग है ।

फिर नवम मन्त्रम कहा है– ‘यः मर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥’जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, ज्ञान ही जिसका तप है, उसीसे यह विराटप समस्त जगत तथा नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते है । vedant darshan 1-2 sutra 16-32

यहाँ जिन सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है, वे परब्रह्म परमेश्वरके ही हैं। तथा एक ब्रह्मको जान लेनेपर ही सब कुछ जाना हुआ हो सकता है, अन्य किसीके जाननेसे नहीं । इसलिये उस प्रकरणमें जिसे अदृश्यता आदि गुणोंवाला बताया गया है, वह परब्रह्म परमात्मा ही है, जीवात्मा या प्रकृति नहीं।

सम्बन्ध-इसी बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति देते हैं –

विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ॥ १ । २ । २२ ॥

विशेषणभेदव्यपदेशाभ्याम्=परमेश्वरसूचक विशेषणोंका कथन होनेसे तथा प्रकृति और जीवात्मासे उसको भिन्न बताये जानेके कारण च-भी; इतरौ-जीवात्मा और प्रकृति; न-अदृश्यता आदि गुणोंवाला जगत्कारण नहीं हो सकते ।

व्याख्या इस प्रकरणमे जिसको अदृश्यता आदिगुणोसे युक्त और सब भूतोंका कारण बताया गया है, उसके लिये ‘सर्वज्ञ’ आदि विशेषण दिये गये है, जो न तो प्रधान ( जड प्रकृति ) के लिये उपयुक्त हो सकते है और न अल्पज्ञ जीवात्माके लिये ही। इसके सिवा, उन दोनोको ब्रह्मसे भिन्न कहा मया है। मुण्डकोपनिषद् (३ । १ । ७) मे उल्लेख है कि

पश्यस्विहैव निहितं गुहायाम् ।’ अर्थात् वह देखनेवालोके शरीरके भीतर यहीं हृदय-गुफामे छिपा हुआ है।’ इसके अनुसार जीवात्मासे परमात्माकी भिन्नता खतः स्पष्ट हो जाती है। इसके सिवा, मुण्डक० ३ । १ । २ मे भी कहा है कि

समान वृक्षे पुरुषो निमानोऽनीशया शोचति मुह्यमान । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

शरीररूप वृक्षपर रहनेवाला यह जीवात्मा शरीरमे आसक्त होकर डूब रहा है। अपनेको असमर्थ समझकर मोहित हो शोक करता रहता है। परन्तु वह जब वहीं स्थित तथा भक्तजनोद्वारा सेवित अपनेसे भिन्न परमेश्वरको देख लेता है और उसकी महिमाको समझ लेता है, तब सर्वथा शोकरहित हो जाता है । इस प्रकार इस मन्त्रमे स्पष्ट शब्दोद्वारा परमेश्वरको जीवात्मासे तथा शरीररूपी वृक्षसे भी भिन्न बताया गया है । अतः यहाँ जीव और प्रकृति दोनों से कोई भी अदृश्यता आदि गुणोंसे युक्त जगत्-कारण नहीं हो सकता।

सम्बन्ध- इस प्रकरणमें जिसे समस्त भूतोंका कारण बताया गया है, वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, इसकी पुष्टिके लिये दूसरा प्रमाण उपस्थित करते हैं

रूपोपन्यासाच्च ॥ १।२ । २३ ॥

रूपोपन्यासात्-श्रुतिमे उसीके निखिल लोकमय विराट् खरूपका वर्णन किया गया है, इससे; चम्भी (वह परमेश्वर ही समस्त भूतोका कारण सिद्ध होता है)।

व्याख्या- मुण्डकोपनिषद् (२ । १ । ४ ) में परब्रह्म परमेश्वरके सर्वलोकमय विराटखरूपका वर्णन इस प्रकार किया गया है ‘अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यों दिश: श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥’

अग्नि इस परमेश्वरका मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र है, सब दिशाएँ दोनो कान हैं और प्रकट हुए वेद उसकी वाणी हैं । वायु इसका प्राण और संपूर्ण विश्व हृदय है । इसके पैरोंसे पृथिवी उत्पन्न हुई है। यही समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा है । इस प्रकार परमात्माके विराट् स्वरूपका उल्लेख करके उसे सबका अन्तरात्मा बताया गया है। इसलिये उक्त प्रकरणमे भूतयोनि के नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है, यह निश्चय होता है।

सम्बन्ध- यहॉ यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद् (५।१८।२) में ‘वैश्वानर’ के स्वरूपका वर्णन करते हुए ‘धुलोक’ को उसका मस्तक बताया है। ‘वैश्वानर’ शब्द जठराग्निका वाचक है । अतः वह वर्णन जटरानलके विषयमें है या अन्य किसीके ? इस शङ्काका निवारण करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है

वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॥ १ । २ । २४ ॥

वैश्वानरः= ( वहाँ) वैश्वानर’ नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है; साधारणशब्दविशेपात्=क्योकि उस वर्णनमे ‘वैश्वानर’ और ‘आत्मा’ इन साधारण शब्दोकी अपेक्षा ( परब्रह्मके बोधक ) विशेष शब्दोका प्रयोग हुआ है।

व्याख्या- छान्दोग्योपनिषद्म पाँचवे अध्यायके ग्यारहवे खण्डसे जो प्रसङ्ग आरम्भ हुआ है, वह इस प्रकार है.—‘प्राचीनशाल, सत्ययज्ञ, इन्द्रद्युम्न, जन तथा बुडिल ये पाँचो ऋषि श्रेष्ठ गृहस्थ और महान् वेदवेत्ता थे। इन्होने एकत्र होकर परस्पर विचार किया कि ‘हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्मका क्या स्वरूप है ११ जब वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सके तो यह निश्चय किया कि इस समय महर्षि उद्दालक वैश्वानर आत्माके ज्ञाता है, हमलोग उन्हींके पास चले ।’ इम निश्चयके अनुसार वे पॉचो ऋषि उद्दालक मुनिके यहाँ गये । उन्हे देखते ही मुनिने अनुमान कर लिया कि ये लोग मुझसे कुछ पूछो, किन्तु मै इन्हे पूर्णतया उत्तर नहीं दे सकूँगा।

अतः अच्छा हो कि मै इन्हे पहलेसे ही दूसरा उपदेष्टा बतला दूं ।’ यह सोचकर उद्दालकने उनसे कहा ‘आदरणीय महर्षियो ! इस समय केवल राजा अश्वपति ही वैश्वानर आत्माके ज्ञाता है। आइये, हम सब लोग उनके पास चले ।’ यो कहकर उन सबके साथ उद्दालक मुनि वहाँ गये । राजाने उन सबका यथोचित सत्कार किया और दूसरे दिन उनसे यज्ञमे सम्मिलित होनेके लिये प्रार्थना करते हुए उन्हे पर्याप्त धन देनकी बात कही। इसपर उन महर्षियोने कहा—‘हमे धन नहीं चाहिये, हम जिस प्रयोजनसे आपके पास आये हैं, वही दीजिये । हमे पता लगा है, आप वैश्वानर आत्माको जानते है, उसीका हमारे लिये उपदेश करे । vedant darshan 1-2 sutra 16-32

राजाने दूसरे दिन उन्हे अपने पास बुलाया और एक-एकसे क्रमशः पूछा, ‘इस विषयमे आपलोग क्या जानते हैं ?’ उनमेसे उपमन्युपुत्र प्राचीनशालने उत्तर दिया– मैं ‘धुलोक’को आत्मा समझकर उसकी उपासना करता हूँ।’ फिर सत्ययज्ञ बोले-‘मै सूर्यकी उपासना करता हूँ। इन्द्रद्युम्नने कहा-‘मै वायुकी उपासना करता हूँ।’ जनने अपनेको आकाशका और बुडिलने जलका उपासक बताया। इन सबकी बात सुनकर राजाने कहा- आपलोग उस विश्वके आत्मा वैश्वानरकी उपासना तो करते है।

परन्तु उसके एक-एक अङ्गकी ही उपासना आपके द्वारा होती है; अतः यह सर्वाङ्गपूर्ण नहीं है,

क्योकि-‘तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्वैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथावात्मा संदेहोबहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हि दयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ।

अर्थात्उ- स इस विश्वके आत्मा वैश्वानरका धुलोक मस्तक है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, आकाश शरीरका मध्यभाग है, जल वस्ति-स्थान है, पृथिवी दोनो चरण है, वेही वक्षःस्थल है, दर्भ लोम है, गार्हपत्य अग्नि हृदय है
अन्वाहार्यपचन अग्नि मन है और आहवनीय अग्नि मुख है । इस वर्णनसे मालूम होता है कि यहॉ विश्वके आत्मारूप विराट् पुरुपको ही वैश्वानर कहा गया है। क्योकि इस प्रकरणमे जठराग्नि आदिके वाचक साधारण शब्दोकी अपेक्षा, परब्रह्मके वाचक विशेष शब्दोका जगह-जगह प्रयोग हुआ है।

सम्बन्ध- इसी वातको दृढ करनेके लिये दूसरा कारण प्रस्तुत करते हैं–

स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ॥ १।२ । २५॥

सर्यमाणम्- स्मृतिमे जो विराटस्वरूपका वर्णन है, वह, अनुमानम् मूलभूत श्रुतिके वचनका अनुमान कराता हुआ वैश्वानरके ‘परमेश्वर’ होनेका निश्चय करनेवाला है; इति स्यात् इसलिये इस प्रकरणमे वैश्वानर परमात्मा ही है ।

व्याख्या- महाभारत, शान्तिपर्व (१७ । ७० ) मे कहा है, प्यस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः । सूर्यश्चक्षु. दिशः श्रोत्रं तस्मै लोकात्मने नमः ॥’ ‘अग्नि जिसका मुख, धुलोक मस्तक, आकाश नाभि, पृथिवी दोनो चरण, सूर्य नेत्र तथा दिशाएँ कान है, उस सर्वलोकवरूप परमात्माको नमस्कार है।’ इस प्रकार इस स्मृतिमे परमेश्वरका अखिल विश्वके रूपमें वर्णन आया है। स्मृति के वचनसे उसकी मूलभूत किसी श्रुतिका होना सिद्ध होता है। उपर्युक्त छान्दोग्य-श्रुतिम जो वैश्वानरके स्वरूपका वर्णन है, वही पूर्वोक्त स्मृतिवचनका मूल आधार है । अतः यहाँ उस परब्रह्मके विराटरूपको ही वैश्वानर कहा गया है, यह बात स्मृतिसे भी सिद्ध होती है । vedant darshan 1-2 sutra 16-32

अतएव जहाँ-जहाँ आत्मा या परमात्माके वर्णनमे ‘वैश्वानर’ शब्दका प्रयोग आवे, वहाँ उसे परब्रह्मके विराट्खरूपका ही वाचक मानना चाहिये, जठरानल या जीवात्माका नहीं। माण्डूक्योपनिपने ब्रह्मके चार पाटोका वर्णन करते समय ब्रह्मका पहला पाद वैश्वानरको बताया है । वहाँ भी बह परमेश्वरके विराट्वरूपका हीवाचक है; जठराग्नि या जीवात्माका नहीं।

सम्बन्ध- उपर्युक्त वातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उपस्थित करके उसका समाधान करते है

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

शब्दादिभ्योऽन्तःप्रतिष्ठानाच्च नेति चेन्न तथा दृष्टयुपदेशादसंभवात्पुरुषमपि चैनमधीयते ॥ ।। २ । २६ ॥

चेत् यदि कहो; शब्दादिभ्यः शब्दादि हेतुओंसे अर्थात् अन्य श्रुतिमे वैश्वानर शब्द अग्निके अर्थमे विशेषरूपमें प्रयुक्त हुआ है और इस मन्त्रमे गार्हपत्य आदि अग्नियोंको वैश्वानरका अङ्ग बताया गया है, इसलिये; च-तथा; अन्त: प्रतिष्ठानात्-श्रुतिमें वैश्वानरको शरीरके भीतर प्रतिष्ठित कहा गया है। इसलिये भी; न-(यहाँ वैश्वानर शब्द परब्रह्म परमात्माका वाचक) नहीं है; इति न तो यह कहना ठीक नहीं है। तथा दृष्टयुपदेशात्-क्योंकि वहाँ वैश्वानरमें ब्रह्मदृष्टि ‘करनेका उपदेश है; असंभवात् इसके सिवा, केवल जठरानलका विराट्रपमें वर्णन होना संभव नहीं है, इसलिये; च-तथा; एनम् इस वैश्वानरको; पुरुषम् ‘पुरुष’ नाम देकर; अपि-भी; अधीयते-पढ़ते है
( इसलिये उक्त प्रकरणमे वैश्वानर शब्द परब्रह्मका ही वाचक है)।

व्याख्या यदि कहो कि अन्य श्रुतिमे ‘स यो हैतमेवमग्नि वैश्वानरं पुरुषविध पुरुषेन्तःप्रतिष्ठितं वेद । (शतपथब्रा० १०। ६ । १ । ११ ) अर्थात् ‘जो इस वैश्वानर अग्निको पुरुषके आकारका तथा पुरुषके भीतर प्रतिष्ठित जानता है । इस प्रकार वैश्वानर शब्द अग्निके विशेषणरूपसे प्रयुक्त हुआ है, तथा जिस श्रुतिपर विचार चल रहा है, इसमे भी गार्हपत्य आदि तीनो अग्नियोको वैश्वानरका अङ्ग बताया गया है । इसी प्रकार भगवद्गीतामें भी कहा है कि मैं ही वैश्वानररूपसे प्राणियोंके शरीरमे स्थित हो चार प्रकारके अन्नका पाचन करता हूँ।’ (१५।१४) इन सब कारणोसे यहॉ वैश्वानरके नामसे जठराग्निका ही वर्णन है, परमात्माका नहीं, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि
शतपथब्राह्मणकी श्रुतिमें जो वैश्वानर अग्निको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्म दृष्टि करानेके उद्देश्यसे ही है ।

यदि ऐसा न होता तो उसको पुरुष नहीं कहा जाता । तथा श्रीमद्भगवद्गीतामे भी जो वैश्वानर अग्निको सब प्राणियोंके शरीरमें स्थित बताया है, वहाँ भी उसमे परमात्मबुद्धि करानेके लिये भगवान्ने अपनी विभूतिके रूपमे ही कहा है। इसके सिवा, जिसपर विचार चल रहा है, उस श्रुतिमे समस्त ब्रह्माण्डको ‘वैश्वानर’ का शरीर बताया है,

सिरसे लेकर पैरोतक उसके अङ्गोमे समस्त लोकोंकी कल्पना की गयी है। यह जठराग्निके लिये असम्भव भी है । एवं शतपथब्राह्मणमें तथा यहाँ भी इस वैश्वानरको पुरुषके आकारवाला और पुरुष कहा गया है, जो कि जठराग्निके उपयुक्त नहीं है। इन सब कारणोंसे इस प्रकरणमे कहा हुआ वैश्वानर परब्रह्म परमेश्वर ही है। जठराग्नि या अन्य कोई नहीं। vedant darshan 1-2 sutra 16-32

सम्बन्ध- इस प्रसङ्गमें पृथक्-पृथक् उपास्यरूपसे आये हुए ‘दिव’, ‘आदित्य’, ‘वायु,’ ‘आकाश’, ‘जल’ तथा ‘पृथिवी’ भी वैश्वानर नहीं है। यह सिद्ध करनेके लिये कहते हैं

अत एव न देवता भूतं च ॥ १ । २ । २७ ॥

अतः उपर्युक्त कारणोंसे; एच-ही ( यह भी सिद्ध होता है कि); देवता-चौ, सूर्य आदि लोकोंके अधिष्ठाता देवगण; च और; भूतम्-आकाश आदि भूतसमुदाय ( भी ); न वैश्वानर नहीं है ।

व्याख्या- उक्त प्रकरणमे ‘यौ’ ‘सूर्य’ आदि लोकोकी तथा आकाश, वायु आदि भूतसमुदायकी अपने आत्माके रूपमे उपासना करनेका प्रसङ्ग आया है। इसलिये सूत्रकार स्पट कर देते है कि पूर्वसूत्रमे बताये हुए कारणोसे यह भी समझ लेना चाहिये कि उन-उन लोकोके अभिमानी देवताओ तथा आकाश आदि भूतोंका भी वैश्वानर’ शब्दसे ग्रहण नहीं है क्योकि समस्त ब्रह्माण्डको वैश्वानरका शरीर बताया गया है ।

यह कथन न तो देवताओके लिये सम्भव हो सकता है और न भूतोके लिये ही । इसलिये यही मानना चाहिये कि जो विश्वरूप भी है और नर (पुरुप ) भी, वह वैश्वानर है ।’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार परब्रह्म परमेश्वरको ही वैश्वानर कहा गया है ।

सम्बन्ध- पहले २६वे सूत्र में यह बात बतायीं गयी है कि शतपथब्राह्मणके मन्त्रमे जो वैश्वानर अमिको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्मदृष्टि करानके उद्देश्यसे है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शालग्राम-शिलामें विष्णुकी उपासनाके सदृश यहाँ ‘वैश्वानर’ नामक जठराग्निमें परमेश्वरकी प्रतीकोपासना बतलानेके लिये वैश्वानर’ नामसे उस परब्रह्मका वर्णन है। अतः इसपर सूत्रकार आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं—

साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॥ १ । २ । २८॥

साक्षात=”वैश्वानर’ शब्दको साक्षात् परब्रह्मका वाचक माननेमे; अपि-भी; अविरोधम् कोई विरोध नहीं है, ऐसा; जैमिनिः (आह ) आचार्य जैमिनि कहते हैं।

व्याख्या- आचार्य जैमिनिका कथन है कि वैश्वानर शब्दको साक्षात् विश्वरूप परमात्माका वाचक माननेमे कोई विरोध नहीं है । अतः यहाँ जठराग्निको प्रतीक मानकर उसके रूपमे परमात्माकी उपासना माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है।

सम्बन्ध- उपर्युक्त सूत्रोंद्वारा यह बात सिद्ध की गयी कि ‘वैश्वानर’ नामसे इस प्रकरणमें परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन किया गया है। परन्तु निर्विकार निराकार अव्यक्त परब्रह्म परमात्माको इस प्रकार साकार विराट्पमें देशविशेषसे सम्बद्ध बतलाना किस अभिप्रायसे है ? निर्गुण निराकारको सगुण साकार बताना विरुद्ध-सा प्रतीत होता है । इसपर २९ वें सूत्रसे ३१ वें तक विभिन्न आचार्यो का मत बताते हुए अन्तमें ३२ वें सूत्रमें अपना सिद्धान्त कहकर सूत्रकार इस दूसरे पादको समाप्त करते है–

अभिव्यक्तरित्याश्मरथ्यः ॥ १ । २ । २९ ॥

अभिव्यक्ते:-( भक्तोपर अनुग्रह करनेके लिये ) देश-विशेषमे ब्रह्मका प्राकट्य होता है, इसलिये ( अविरोधा)कोई विरोध नहीं है; इति-ऐसा; आश्मरथ्या-आश्मरथ्य आचार्य मानते है।

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

व्याख्या- आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि भक्तजनोपर अनुग्रह करके उन्हें दर्शन देनेके लिये भगवान् समय-समयपर उनकी श्रद्धाके अनुसार नाना रूपोमे प्रकट होते है; तथा अपने भक्तोको दर्शन, स्पर्श और प्रेमालाप आदिके द्वारा सुख पहुँचाने, उनका उद्धार करने और जगत्मे अपनी कीर्ति फैलाकर उसके कथन-मननद्वारा साधकोको परम लाभ पहुँचानेके लिये भगवान् मनष्य आदिके रूपमे भी समय-समयपर प्रकट होते है। यह बात उपनिषद् (केन० ३।२), गीता (४।६-९) और अन्यान्य सद्ग्रन्थोसे भी प्रमाणित है । इस कारण विराटरूपमे उस परब्रह्म परमात्माको सगुण-साकार तथा देश-विशेषसे सम्बद्ध माननेमे कोई विरोध नहीं है,

क्योकि वह सर्वसमर्थ भगवान देश-कालातीत और देशकालसे सम्बन्ध रखनेवाला भी है। वह जिस प्रकार निर्गुण-निराकार है, उसी प्रकार सगुण-साकार भी है । यह बात माण्डूक्यो पनिपमें परब्रह्म परमात्माके चार पादोका वर्णन करके भलीभॉति समझायी गयी है।

सम्बन्ध-अब इस विषयमे वादरि आचार्यका मत उपस्थित करते है

अनुस्मृतेर्बादरिः ॥ १ । २ । ३० ॥

अनुस्मृतेः-विराटपमें परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करनेके लिये; उसको देश-विशेषसे सम्बद्ध बतानेमे ( अविरोधा= ) कोई विरोध नहीं है; (इति) ऐसा; वादरिस वाटरि नामक आचार्य मानते है ।

व्याख्या- परब्रह्म परमेश्वर यद्यपि देशकालातीत है, तो भी उनका निरन्तर भजन, ध्यान, स्मरण करनेके लिये उन्हे देश-विशेपमे स्थित मानने, कहने और समझनेमें कोई विरोध नहीं है; क्योकि भगवान् सर्वसमर्थ है । उनके भक्त उनका जिस-जिस रूपमे चिन्तन करते है, उनपर कृपा करनेके लिये वे उसी उसी रूपमे उनको मिलते है ।

सम्बन्ध-इसी विषयमे आचार्य जैमिनिका मत बताते है

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॥ १ । २ । ३१ ॥

सम्पत्तेः-परब्रह्म परमेश्वर अनन्त ऐश्वर्यसे सम्पन्न है, इसलिय ( उसे देश-विशेषमे सम्बन्ध रखनेवाला माननेने कोई विरोध नहीं है ); इति=ऐसा; जैमिनि: जैमिनि आचार्य मानते हैं। हि-क्योकि तथा ऐसा ही भाव; दर्शयति दूसरी श्रुनि भी प्रकट करती है।

व्याख्या- आचार्य जैमिनिका यह कथन है कि परब्रह्म परमेश्वर अनन्त श्वर्यमे सम्पन्न है. अत: उस निर्विकार, निराकार, देशकालातीत परमात्माको सगुण. साकार और किसी देश-विशेषसे सम्बन्ध रखनेवाला माननेमे कोई विरोध नहीं है: क्योकि दूसरी श्रुति भी ऐसा ही भाव प्रकट करती है। (मु० ३०२।१।४)

सम्बन्ध- अब मुत्रकार अपने मतका वर्णन करते हुए इस पादका उपसंहार करते है..

आमनन्ति चैनमस्मिन् ॥ १ । २ । ३२॥

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

अस्मिन्-इस वेदान्त-शास्त्रमे, एनम् इस परमेश्वरको; ( एवम् ) ऐसा; च= ही; आमनन्ति प्रतिपादन करते है । श्रीमद्भागवत भी ऐमा ही कहा गया है—- यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय । (३।९।१२) ‘महान् यतास्वी परमेश्वर! आपके भक्तजन अपने हृदयमे आपको जिस-जिस रूपमें चिन्तन करते है। आप उन संत-महात्माओपर अनुग्रह करनेके लिये वहीं-वही शरीर धारण कर लेते हैं।

व्याख्या- इस वेदान्तशास्त्रमे सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सबके निवास स्थान, सर्वसमर्थ परब्रह्म परमेश्वरका ज्ञानीजन ऐसा ही प्रतिपादन करते है* इस विषयमे शास्त्र ही प्रमाण है । युक्ति-प्रमाण यहाँ नहीं चल सकता क्योंकि परमात्मा तर्कका विषय नहीं है । वह सगुण, निर्गुण, साकार निराकार, सविशेष-निर्विशेष आदि सब कुछ है ।

यह विश्वास करके साधकको उसके स्मरण और चिन्तनमे लग जाना चाहिये । वह व्यापक भगवान् सभी देशोंमे सर्वदा विद्यमान है । अतः उसको किसी भी देश-विशेषसे संयुक्त मानना विरुद्ध नहीं है तथा वह सब देशोंसे सदा ही निर्लिस है ! इस कारण उसको देश-कालातीत मानना भी उचित ही है । अतः सभी आचार्योंकी मान्यता ठीक है।

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

दूसरा पाद सम्पूर्ण ।

॥अद्वयतारकोपनिषद्॥

Categories
vedant datshan

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

दूसरा पाद

सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् .॥ १ । २ । १॥

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

सर्वत्र सम्पूर्ण वेदान्त-वाक्योमे; प्रसिद्धोपदेशात्=( जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके कारणरूपपे ) प्रसिद्ध परब्रह्मका ही उपास्यदेवके रूपमें उपदेश हुआ है, इसलिये ( छान्दोग्यश्रुति ३ । १४ में बताया हुआ उपास्यदेव ब्रह्म ही है)।

ब्याख्या छान्दोग्योपनिषद् अध्याय ३ के चौदहवे खण्डके आरम्भमें सबसे पहले यह मन्त्र आया है, सर्व खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत । अथ खलु क्रतुमयः पुरुयो यथानुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेत. प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत । अर्थात् ‘यह सम्पूर्ण चराचर जगत् निश्चय ब्रह्म ही है; क्योकि यह उसीसे उत्पन्न हुआ है,

स्थितिके समय उसीमे चेष्टा करता हैं और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है । साधकको राग-द्वेषरहित शान्तचित्त होकर इस प्रकार उपासना करनी चाहिये

अर्थात् ऐसा ही निश्चयात्मक भाव धारण करना चाहिये क्योकि यह मनुष्य संकल्पमय है। इस लोकमे यह जैसे संकल्पसे युक्त होता है, यहाँसे चले जानेपर परलोकमे यह वैसा ही बन जाता है । अतः उसे उपर्युक्त निश्चय करना चाहिये ।’ इस मन्त्रवाक्यमे उसी परब्रह्मकी उपासना करनेके लिये कहा गया है, जिससे इस जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते है तथा जो समस्त वेदान्तवाक्योमें जगत्के महाकारणरूपसे प्रसिद्ध है । अतः इस प्रकरणमे बताया हुआ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा नहीं।

सम्बन्ध- यहाँ यह प्रश्न उठता है कि छा ० उ० (३।१४१२)में उपास्यदेवको मनोमय और प्राणरूप शरीरवाला कहा गया है। ये विशेषण जीवात्माके हैं। अतः उसको ब्रह्म मान लेनेसे उस वर्णनकी सङ्गति कैसे लगेगी ? इसपर कहते है–

विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ॥ १।२।२॥

च-तथा; विवक्षितगुणोपपत्तेः श्रुतिद्वारा वर्णित गुणोकी सङ्गति उस परब्रह्ममें ही होती है. इसलिये ( इस प्रकरणमे कथित उपास्यदेव ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- छा०३० (३।१४।२)मे उपास्यदेवका वर्णन इस प्रकार उपलब्ध होता है. मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः । अर्थात् ‘वह उपान्यदेव मनोमय, प्राणरूप शरीरवाला, प्रकाशस्वरूप, सत्य-संकल्प, आकाशके सदृश व्यापक, सम्पूर्ण जगत्का कर्ता, पूर्णकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस समस्त जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाणीरहित तथा सभ्रमशून्य है।’ इस वर्णनमे उपास्यटेवके जो उपादेय गुण बताये गये है, वे सब ब्रह्ममे ही सद्भत होते है । ब्रह्मको ‘मनोमय’ तथा ‘प्रागरूप शरीरवाला’ कहना भी अनुचित नहीं है; क्योंकि वह सबका अन्तर्यामी आत्मा है। केनोपनिपझे उसको मनका भी मन तथा प्राणका भी प्राण बताया है। इसलिये इस प्रकरणमे बतलाया हुआ उपाम्यदेव परब्रह्म परमेश्वर ही है।

सम्बन्ध- उपर्युक्त सूत्रमें श्रुतिवर्णित गुणोंकी उपपत्ति ( सङ्गति ) ब्रह्ममें श्रोत्रस्य श्रोनं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचर स उ प्राणस्य प्राणः । (के० उ०१। २) बतायी गयी: अब जीवात्मामें उन गुणोंकी अनुपति बनाकर पोत सिद्धान्ती पुष्टि की जाती है–

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥ १। २ । ३ ॥

तु-परन्तु अनुपपत्तेः-जीवात्मामें श्रुतिवर्णित गुगोंकी सङ्गति न होनेके कारगः शारीरा-जीवानाः न= इस प्रकरणनें कहा हुआ उपास्यदेव) नहीं है।

व्याल्या- उपासनाके लिये श्रुतिमें जो सत्य-संकल्पना, सर्वव्यापकता. सर्वात्मकता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुण बनाये गये हैं. वे जीवात्मानें नहीं पाये जाते; इस कारण इस प्रसङ्गने बताया हुआ उपास्यदेव जीवाला नहीं है. ऐसा मानना ही ठीक है।

सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे उसी वानको सिद्ध किया जाता है

कर्मकर्तृव्यपदेशाच ॥ १ ॥ २ ॥ ४ ॥

कर्मकर्तव्यपदेशात्-उक्त प्रकरणने उपान्यदेवको प्राप्तिक्रियाका कर्म अर्थात् प्राप्त होने योग्य कहा है और जीवात्माको प्रातिक्रियाका कर्ता अर्थात् उस ब्रह्मको प्राप्त करनेवाला बताया है, इसलिये; च-भी (जीवात्मा उपास्य नहीं हो सकता)।

व्याल्या- उ० (३ । १४ । ४) में कहा गया है कि ‘सर्वकर्मा आदि विशेषगोंसे युक्त ब्रह्म हो मेरे हृदय में रहनेवाल मेरा आत्मा है। मरने के बाद यहाँसे जाकर परलोकमें मैं इसीको प्राप्त होऊँगा !* इस प्रकार यहाँ पूर्वोक्त उपास्यदेवको प्राप्त होने योग्य तथा जीवात्माको उसे पानवाल कहा गया है। अतः यहाँ उपास्य देव परब्रह्म परमात्मा है और उपासक जीवात्मा । यही मानना उचित है।

सम्बन्ध प्रकारान्तरले पुनः उक्त चातकी ही पुष्टि करते हैं,
एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान् बोहर्वा याद्वा सर्षपाद् वा श्यानाकाद् वा श्यामाकतण्डुलाद् वैष म आन्नान्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरि क्षाज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥ (छ.० उ० ३।१४।३)
सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरतः सर्वमिदसम्यात्तोऽवाक्यनादर एपस आत्मान्तहृदय एतद् ब्रौतमिनः प्रेत्याभिसंसवितालि। (छ.उ.३।१४।४)

शब्दविशेषात् ॥ १।२। ५॥

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

शब्दविशेषात् ( उपास्य और उपासकके लिये ) शब्दका भेद होनेके कारण भी ( यह सिद्ध होता है कि यहाँ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है )।

व्याख्या- छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रमे कहा गया है* कि यह मेरे हृदयके अंदर रहनेवाला अन्तर्यामी आत्मा है । यह ब्रह्म है । इस कथनमें ‘एप.’ ( यह ) ‘आत्मा’ तथा ‘ब्रह्म’ ये प्रथमान्त शब्द उपास्यदेवके लिये प्रयुक्त हुए है और ‘मे’ अर्थात् ‘मेरा’ यह पष्ठयन्त पद भिन्नरूपसे उपासक जीवात्माके लिये प्रयुक्त हुआ है । इस प्रकार दोनोके लिये प्रयुक्त हुए शब्दोंमे भेद होनेके कारण उपास्यदेव जीवात्मासे भिन्न सिद्ध होता है । अतः जीवात्माको उपास्यदेव नहीं माना जा सकता ।

सम्बन्ध- इसके सिवा

स्मृतेः स्मृति-प्रमाणसे, ॥ १। २ । ६॥

च=भी ( उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है)।

व्याख्या- श्रीमद्भगवद्गीता आदि स्मृति-ग्रन्थसे भी उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है । जैसे- मय्येव मन आधख मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्व न संशयः ॥ ( गीता १२ । ८) ‘मुझमें ही मनको लगा और मुझमे ही बुद्धिको लगा, इसके पश्चात् तू मुझमे ही निवास करेगा अर्थात् मुझे ही प्राप्त करेगा; इसमे कुछ भी संशय नहीं है।’

अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयानि स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ (गीता ८ । ५) ‘और जो पुरुष अन्तकालमे मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्यागकर । जाता है, वह मेरे खरूपको प्राप्त होता है; इसमे कुछ भी संशय नहीं है।’

अतः इस प्रसङ्गके वर्णनमे उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, आत्मा या अन्य कोई नहीं । यही मानना ठीक है । ये दोनों मन्त्र चौबीसवें पृष्ठकी टिप्पणी में देखे ।

सम्बन्ध- छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रोंमें उपास्यदेवको हृदयमें स्थित एकदेशीय बतलाया है तथा तीसरे मन्त्रमें उसे सरसों और सावॉसे भी छोटा बताया है। इस अवस्थामें उसे परब्रह्म कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं

अर्भकौकस्त्वात्तव्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्य
त्वादेवं व्योमवच्च ॥ १।२ । ७॥

चेत यदि कहो अर्भकौकस्त्वात उपास्यदेव हृदयरूप छोटे स्थानवाला है, इसलिये; च तथा तद्वयपदेशात्-उसे अत्यन्त छोटा बताया गया है, इस कारण; न-वह ब्रह्म नहीं हो सकता इति न तो यह कहना ठीक नहीं है। निचाय्यत्वात्-क्योंकि ( वह ) हृदयदेशमें द्रष्टव्य है, इसलिये; एवम् उसके विषयमे ऐसा कहा गया है;
च-तथा; व्योमवत्-वह आकाशकी भाँति सर्वत्र व्यापक है ( इस दृष्टिसे भी ऐसा कहना उचित है)।

व्याख्या-यदि कोई यह शङ्का करे कि छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रोमे उपास्यदेवका स्थान हृदय बताया गया है, जो बहुत छोटा है तथा तीसरे मन्त्रमे उसे वान, जौ, सरसों तथा सावाँसे भी अत्यन्त छोटा कहा गया है। इस प्रकार एकदेशीय और अत्यन्त लघु बताया जानेके कारण यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म नहीं हो सकता; क्योकि परब्रह्म परमात्माको सबसे बड़ा, सर्वव्यापी तथा सर्वशक्तिमान् बताया गया है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योकि

उक्त मन्त्र मे जो परब्रह्म परमात्माको हृदयमे स्थित बताया गया है, वह उसके उपलब्धि स्थानकी अपेक्षासे है । भाव यह है कि परब्रह्म परमात्माका स्वरूप आकाशकी भाँति सूक्ष्म और व्यापक है । अतः वह सर्वत्र है। प्रत्येक प्राणीके हृदयमे भी है और उसके बाहर भी * ( ईशा० ५)। (गीता १३ । १५)। अतएव छ तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः । (ईशा० ५) + बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ (गीता १३ । १५)

वह परमात्मा चराचर सब भूतोके बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचररूप भी वही है तथा वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है और अत्यन्त समीप एवं दूरमे भी स्थित वहीं है। उसे हृदयस्थ बता देनेमात्रसे उसका एकदेशीय होना सिद्ध नहीं होता तथा जो उसे धान, जौ, सरसो और सावॉसे भी छोटा बताया गया है, इससे श्रुतिका उद्देश उसे छोटे आकारवाला बताना नहीं है, अपितु अत्यन्त सूक्ष्म और इन्द्रियोद्वारा अग्राह्य ( ग्रहण करनेमे न आनेवाला) बतलाना है । इसीलिये उसी मन्त्रमे यह भी कहा गया है कि वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक और समस्त लोकोसे भी बड़ा है। भाव यह है कि वह इतना सूक्ष्म होते
हुए भी समस्त लोकोंके बाहर-भीतर व्याप्त और उनसे परे भी है। सर्वत्र वही है । इसलिये यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं ।

सम्बन्ध- परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमे स्थित होकर भी उनके सुख-दुःख से अभिभूत नहीं होता, उसकी इस विशेषताको वतानेके लिये कहते हैं-

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

संभोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेप्यात् ॥ १ । २ । ८ ॥

चेत् यदि कहो; संभोगप्राप्तिः=( सबके हृदयमे स्थित होनेसे चेतन होनेके कारण उसको ) सुख-दुःखोंका भोग भी प्राप्त होता होगा; इति न-तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; चशेष्यात्-क्योकि जीवात्माकी अपेक्षा उस परब्रह्ममे विशेषता है।

व्याख्या- यदि कोई यह शङ्का करे कि आकाशकी भॉति सर्वव्यापक परमात्मा समस्त प्राणियोंके हृदयमे स्थित होनेके कारण उन जीवोंके सुख-दुःखों का भोग भी करता ही होगा; क्योकि वह आकाशकी भॉति जड नहीं, चेतन है और चेतनमे सुख-दुःखकी अनुभूति स्वाभाविक है। तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि परमात्मामे कर्तापनका अभिमान और भोक्तापन नहीं है। वह सबके हृदयमे रहता हुआ भी उनके गुण-दोपोसे सर्वथा असङ्ग है। यही जीवोकी अपेक्षा उसमे विशेषता है ।

जीवात्मा तो अज्ञानके कारण कर्ता और भोक्ता है; किन्तु परमात्मा सर्वथा निर्विकार है । वह केवलमात्र साक्षी है, भोक्ता नहीं (मु० उ० ३।१।१)* इसलिये जीवोंके कर्मफलरूप सुख-दुःखादिसे उसका सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है।

सम्बन्ध- उपर कहे हुए प्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि सबके हृदयमें निवास करते हुए भी परब्रह्म भोक्ता नहीं है। परन्तु वेदान्तमें कहीं-कहीं परमात्मा को भोक्ता भी बताया गया है (क० उ०१।२।२५) । फिर वह वचन तयोरन्यःपिप्पलं स्वाहस्यनननन्यो अभिचाकशीति॥ (मु०३० ३।११), किसी अन्यके विषयमें है या उसका कोई दूसरा ही अर्थ है ? यह निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं

अत्ता चराचरग्रहणात् ॥ १ । २ । ९॥

चराचरग्रहणात-चर और अचर सबको ग्रहण करनेके कारण यहाँ, अत्ता भोजन करनेवाला अर्थात् प्रलयकालमे सबको अपनेमे विलीन करनेवाला ( परब्रह्म परमेश्वर ही है)।

व्याख्या- कठोपनिषद् (१ । २ । २५) मे कहा गया है कि ‘यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ।।’ अर्थात् (संहारकालमे) जिस परमेश्वरके ब्राह्मण और क्षत्रिय अर्थात् समस्त स्थावर जगम प्राणीमात्र भोजन बन जाते हैं तथा सबका संहार करनेवाला मृत्यु उपसेचन (व्यञ्जन-शाक आदि ) बन जाता है,

वह परमेश्वर जहाँ और जैसा है, यह कौन जान सकता है ।’ इस श्रुतिमे जिस भोक्ताका वर्णन है, वह कर्मफलरूप सुख-दुःख आदिका भोगनेवाला नहीं है। अपितु संहारकालमें मृत्युसहित समस्त चराचर जगत्को अपनेमें विलीन कर लेना ही यहाँ उसका भोक्तापन है । इसलिये परब्रह्म परमात्माको ही यहाँ अत्ता या भोक्ता कहा गया है, अन्य किसीको नहीं।

सम्बन्ध-इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं।

प्रकरणाच्च ॥ १।२ । १०॥

प्रकरणात् प्रकरणसे; च=भी ( यही बात सिद्ध होती है)।

व्याख्या- उपर्युक्त मन्त्रके पूर्व बीसवेसे चौबीसवेतक परब्रह्म परमेश्वरका ही प्रकरण है । उसीके स्वरूपका वर्गन करके उसे जाननेका महत्त्व तथा उसकी कृपाको ही उसे जाननेका उपाय बताया गया है । उक्त मन्त्रमे भी उस परमेश्वर को जानना अत्यन्त दुर्लभ बतलाया गया है, जो कि पहलेसे चले आते हुए प्रकरण के अनुरूप है ।

अतः पूर्वापरके प्रसङ्गको देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही अत्ता ( भोजन करनेवाला ) कहा गया है ।

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

सम्बन्ध-अब यहॉ यह जिज्ञासा होती है कि इसके बादवाली श्रुति (१।३।१ ) में ( कर्मफलरूप) ‘ऋत’को पीनेवाले छाया और धूपके सहश दो भोक्ताओंका वर्णन है । यदि परमात्मा कर्मफलका भोक्ता नहीं है तो उक्त दो भोक्ता कौन-कौन-से है ? इसपर कहते है,

गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तदर्शनात् ॥ १।२।११॥

गुहाम्-हृदयरूप गुहामे; प्रविष्टौ प्रविष्ट हुए दोनो; आत्मानौ जीवात्मा और परमात्मा हि-ही हैं; तदर्शनात क्योकि ( दूसरी श्रुतिमें भी ) ऐसा ही देखा जाता है।

व्याख्या- कठोपनिषद् (१ । ३ । १ ) मे कहा है ‘ऋत पिबन्ती सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः।। अर्थात् ‘शुभ कर्मोके फलखरूप मनुष्य-शरीरके भीतर परब्रह्मके उत्तम निवास स्थान (हृदयाकाश ) मे बुद्रिरूप गुहामे छिपे हुए तथा ‘सत्य’ का पान करनेवाले दो है,

वे दोनों छाया और धूपकी भॉति परस्पर विरुद्ध खभाववाले है। यह बात ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी कहते है । तथा जो तीन वार नाचिकेत अग्निका चयन करनेवाले पञ्चाग्नि-सम्पन्न गृहस्थ है, वे भी कहते है ।’ इस मन्त्रमे कहे हुए दोनो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही है। उन्हींका वर्णन छाया और धूपके रूपमें हुआ है ।

परमात्मा सर्वज्ञ, पूर्ण ज्ञानस्वरूप एवं स्वप्रकाश है, अतः उसका धूपके नामसे बर्गन किया गया है । और जीवात्मा अल्पज्ञ है । उसमे जो कुछ स्वन्य ज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है । जैसे छायामे जो थोड़ा प्रकाश होता है, वह धूपका ही अंग होता है। इसलिये जीवात्माको छायाके नाम से कहा गया है। दूसरी श्रुतिमे भी जीवात्मा और परमात्माका एक साथ मनुष्य-शरीर में प्रविट होना इस प्रकार कहा है–सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि’ (छा० उ० ६ । ३ । २) अर्थात् ‘उस देवता ( परमात्मा ) ने ईक्षण (सकल्प) किया कि मै इस जीवात्माके सहित इन तेज आदि तीनों देवताओमे अर्थात् इनके कार्यरूप
शरीरमे प्रविष्ट होकर नाम और रूपको प्रकट करूँ।’

इससे भी यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त कठोपनिपके मन्त्रमे कहे हुए छाया और धूप सदृश दो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही है । यहाँ जो जीवात्माके साथ-साथ परमात्माको सत्य अर्थात श्रेष्ठ कोंके फलका भोगनेवाला बताया गया है, उसका यह भाव है कि परब्रह्म परमेश्वर ही समस्त देवता आदिके रूपमे प्रकारान्तरसे समस्त यज्ञ और तपरूप शुभ कर्मोंके भोक्ता हैं । परन्तु उनका भोक्तापन सर्वथा निर्दोष है, इसलिये वे भोगते हुए भी अभोक्ता ही हैं।

सम्बन्ध-उपर्युक्त कथनकी सिद्धिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं

विशेषणाच ॥ १। २ । १२ ॥

विशेषणात=( आगेके मन्त्रोंमे ) दोनोके लिये अलग-अलग विशेषण दिये गये हैं, इसलिये; च=भी ( उपर्युक्त दोनो भोक्ताओंको जीवात्मा और परमात्मा मानना ही ठीक है)।

व्याख्या- इसी अध्यायके दूसरे मन्त्रमे उस परम अक्षर ब्रह्मको संसारसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये ‘अभय पद’ बताया गया है । तथा उसके बाद रथके दृष्टान्तमें जीवात्माको रथी और उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्तव्य परमधामके नामसे कहा गया है । इस प्रकार उन दोनोके लिये पृथक्-पृथक् विशेषग होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ जिनको गुहामें प्रविष्ट बताया गया है, वे जीवात्मा और परमात्मा ही है।

सम्बन्ध- यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि परमात्माकी उपलब्धि हृदयमे होती है, इसलिये उसे हृदयमै स्थित वताना तो ठीक है, परन्तु छान्दोग्योपनिपद् (४।१५।१) में ऐसा कहा है कि ‘यह जो नेत्रमै पुरुप दीखता है, यह आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय और ब्रह्म है । अतः यहाँ नेत्र में स्थित पुरुष कौन है ? इसका निर्णय करनेके लिये
अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है.—-

अन्तर उपपत्तेः ॥ १।२।१३ ॥

अन्तरे-जो नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाला कहा गया है, वह ब्रह्म ही है। उपपत्तेः-क्योंकि ऐसा माननेसे ही पूर्वापर-प्रसङ्गकी सङ्गति बैठती है ।

व्याख्या- यह प्रसङ्ग छान्दोग्योपनिषद्मे चौथे अध्यायके दशम खण्डसे आरम्भ हुआ है और पन्द्रहवे खण्डमें समाप्त । प्रसङ्ग यह है कि उपकोशल नामका

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरस् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ (गीता ५ । ३९) अहं हि सर्वयज्ञानां भोत्ता च प्रभुरेव च। (गीता ९ । २३ ) + सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असतं सर्वभूच्चैव निर्गुणं गुणभोक्त च ।। (गीता १३ । १४)

ब्रह्मचारी सत्यकाम नामक ऋपिके आश्रममें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करता हुआ गुरुकी और अग्नियोंकी सेवा करता था । सेवा करते-करते उसे बारह वर्ष व्यतीत हो गये; परन्तु गुरुने उसे न तो उपदेश दिया और न स्नातक ही बनाया । इसके विपरीत उसीके साथ आश्रममे प्रविष्ट होनेवाले दूसरे शिष्योको स्नातक बनाकर घर भेज दिया।

तब आचार्यसे उनकी पत्नीने कहा, ‘भगवन् ! इस ब्रह्मचारीने अग्नियोकी अच्छी प्रकार सेवा की है । तपस्या भी इसने की ही है। अब इसे उपदेश देनको कृपा करे ।’ परन्तु अपनी भार्याकी बातको अनसुनी करके सत्यकाम ऋपि उपकोगलको उपदेश दिये बिना ही बाहर चले गये । तब मनमे दुखी होकर उपकोशलने अनशन व्रत करनेका निश्चय कर लिया। यह देख आचार्य-पत्नीने पूछा—‘ब्रह्मचारी ! तू भोजन क्यो नहीं करता है।

उसने कहा, ‘मनुष्यके मनमे बहुत-सी कामनाएँ रहती है । मेरे मनमे बड़ा दुःख है, इसलिये में भोजन नहीं करूंगा। तब अग्नियोने एकत्र होकर विचार किया कि इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है, अत. उचित है कि हम इसे
उपदेश करे ऐमा विचार करके अग्नियोने कहा ‘प्राण ब्रह्म है, क ब्रह्म है, ख ब्रह्म है ।’ उपकांशल बोला—‘यह बात तो मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है।

परन्तु ‘क’ और ‘ख’ को नहीं जानता।’ अग्नियोने कहा निस्सन्देह जो ‘क’ है, वही ‘ख’ है और जो ‘ख’ है, वही ‘क’ है तथा प्राण भी वही है । इस प्रकार उन्होने ब्रह्मको ‘क’ सुख-स्वरूप और ‘ख’ आकाशकी भॉति सूक्ष्म एव व्यापक बताया तथा वही प्राणरूपसे सबको सत्ता-स्कृति देनेवाला है। इस प्रकार सकेतसे ब्रह्मका परिचय कराया। उसके बाद गार्हपत्य अग्निने प्रकट होकर कहा-‘सूर्यमे जो यह पुरुष दीखता है, वह मै हूँ, जो उपासक इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह पाणेका नाश करके अच्छे लोकोका अधिकारी होता है तथा पूर्ण आयुष्मान् और उज्ज्वल जीवनसे युक्त होता है। उसका वश कभी नष्ट नहीं होता ।

इसके बाद ‘अन्वाहार्यपचन’ अग्निने प्रकट होकर कहा, ‘चन्द्रमामे जो यह पुरुष दिखायी देता है, वह मैं हूँ । जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर उपासना करता है, वह अच्छे लोकोका अधिकारी होता है ।’ इत्यादि तत्पश्चात आहवनीय अग्निने प्रकट होकर कहा, ‘विजलीमे जो यह पुरुष दीखता है, वह मैं हूँ।’ इसको जानकर उपासना करनेका फल भी उन्होने दूसरी अन्नियोकी भाँति ही बतलाया । तदनन्तर सब अग्नियोंन एक साथ कहा. ‘हे उपकोशल ! हमने तुमको हमारी विद्या ( अग्नि-विद्या ) और आत्म-विद्या दोनों ही बतलायी है ।

आचार्य तुमको इनका मार्ग दिखलावेंगे।’ इतनमें ही उसके गुरु सत्यकाम आ गये। आचार्यने पूछा, ‘सौम्य । तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताकी भाँति चमकता है, तुझे किसने उपदेश दिया है ? उपकाशलने अग्नियोंकी ओर संकेत किया । आचार्यन पूछा. ‘इन्होंने तुझे क्या बतलाया है ? तत्र उपकोशलने अग्नियोंसे सनी नई सब बातें बता दी।

तत्पश्चात आचार्यन कहा. हे सौग्य ! इन्होंने तुझे केवल उत्तम लोकत्राप्तिके साधनका उपदेश दिया है, अब मैं तुझे वह उपदेश देता हूँ, जिसको जान लेनेवालेको पाप उसी प्रकार स्पर्श नहीं कर सकते, जैसे कमलके पत्तेको जल उपकोशलने कहा, ‘भगवन् ! बतलानेकी कृपा कीजिये । इसके उत्तरमें आचार्यने कहा, ‘जो नेत्रमे यह पुरुष दिखलायी देता है, यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय और ब्रह्म है । उसके बाद उसीको संयद्दामा धाननी’ और ‘भामनी’ बतलाकर अन्तमें इन विद्याओका फल अर्चिमार्गले ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है।

इस प्रकरणको देखने से मालूम होता है कि आँखके भीतर दीखनेवाला पुरुष परब्रह्म ही है. जीवात्मा या प्रतिविम्बके लिये यह कथन नहीं है, क्योकि ब्रह्मविद्या के प्रसङ्गमे उसका वर्णन करके उसे आत्मा, अमृत, अभय और ब्रह्म कहा है। इन विशेषणोंकी उपपत्ति ब्रह्ममे ही लग सकती है. अन्य किसीमे नहीं ।

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

सम्बन्ध-अब यह जिज्ञासा होती है कि यहाँ ब्रह्मको ऑसमें दीखनेवाला युरुप क्यों कहा गया ? वह किसी न्शनविशेषमें रहनेवाला थोड़े ही है ? इसपर कहते हैं

स्थानादिव्यपदेशाच ॥ १ । २ । १४ ॥

स्थानादिव्यपदेशात् श्रुतिमे अनेक स्थलोंपर ब्रह्मके लिये स्थान आदिका निर्देश किया गया है. इसलियेः च- भी ( नेत्रान्तर्वी पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)।
गया है । इसी प्रकार अन्य श्रुतियोमे भी वर्गन आया है | अतः यहाँ ब्रह्मको नेत्रमे दीखनेवाला कहना अयुक्त नहीं है। क्योकि ब्रह्म निर्लिप्त है और ऑखमे दीखनेवाला पुरुष भी ऑखके दोपोसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है । इस समानताको लेकर ब्रह्मका तत्व समझानेके लिये ऐसा कहना उचित ही है । इसीलिये वहाँ यह भी कहा है कि ‘ ऑखमे घी या पानी आदि जो भी वस्तु डाली जाती है, वह ऑखकी पलकोंमे ही रहती है, द्रष्टा पुरुपका स्पर्श नहीं कर सकती ।’

सम्बन्ध-उक्त सिद्धान्तको दृढ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं

सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॥ १ । २ । १५॥

च-नया: सुखविशिष्टाभिधानात नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको आनन्दयुक्त बताया गया है, इसलिये एव-भी ( यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- उक्त प्रसङ्गमे यह कहा गया है कि यह नेत्रमे दीखनेवाला पुरुष ही अमृत, अभय और ब्रह्म है।’ इस कथनमे निर्भयता और अमृतत्व-ये दोनो ही सुखके सूचक है । तथा जब अग्नियोने एकत्र होकर पहले-पहल उपदेश दिया है, वहाँ कहा गया है कि जो ‘क’ अर्थात् सुख है, वही ‘ख’ अर्थात् ‘आकाश’ है। भाव यह है कि वह ब्रह्म आकाशकी भॉति अत्यन्त सूक्ष्म, सर्वव्यापी और आनन्दस्वरूप है । इस प्रकार उसे आनन्दयुक्त बतलाया जानेके कारण वह ब्रह्म ही है।

सम्बन्ध-इसके सिवा,

श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ॥ १। २ । १६ ॥

श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानात-उपनिषद् अर्थात् रहस्य-विज्ञानका श्रवण कर लेनेवाले ब्रह्मवेत्ताकी जो गति बतायी है, वही गति इस पुरुपको जाननेवालेकी भी कही गयी है, इससे; च-भी ( यही ज्ञात होता है कि नेत्रमे दीखनवाला पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- इस प्रमङ्गके अन्तमे इस नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको जाननेवालेकी वही पुनरावृत्तिरहित गति अर्थात देवयानमार्गसे जाकर ब्रह्मलोकमे ब्रह्मको प्राप्त होने और वहॉसे पुन. इस संसारमे न लौटनकी बात बतायी गयी है। जो अन्यत्र ब्रह्मवेत्ताके लिये कही गयी है (प्र० उ०१।१०) * । इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ नेत्रमें दीखनेवाला पुरुष ब्रह्म ही है।

सम्बन्ध यदि इस प्रकरणमें नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाले प्रतिविम्ब, नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा- इनमेंसे किसी एकको नेत्रान्तर्वती पुरुष मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं—

अनवस्थितेरसंभवाच्च नेतरः ।।१२।१७ ॥

अनवस्थिते: अन्य किसीकी नेत्रमें निरन्तर स्थिति न होनेके कारण; च= तथा; असंभवात् ( श्रुतिमें बताये हुए अमृतत्व आदि गुग ) दूसरे किसीमे सम्भव न होनेसे; इतर:-ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भी; न नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं है।

व्याख्या- छाया-पुरुष या प्रतिविम्ब नेत्रेन्द्रियमें सदा नहीं रहता; जब कोई पुरुष सामने आता है, तब उसका प्रतिविम्ब नेत्रमे दिखायी देता है और उसके हटते ही अदृश्य हो जाता है । इन्द्रियानुग्राहक देवताकी स्थिति भी नेत्रमे सदा नहीं रहती, जिस समय वह इन्द्रिय अपने विषयको ग्रहण करती है, उसी समय वह उसके सहायक रूपसे उसमें स्थित माना जाता है ।

इसी प्रकार जीवात्मा भी मनके द्वारा एक समय किसी एक इन्द्रियके विषयको ग्रहण करता है तो दूसरे समय दूसरी ही इन्द्रियके विषयको; और सुषुप्तिमे तो किसीके भी विषयको नहीं ग्रहण करता । अतः निरन्तर एक-सी स्थिति आँखमे न रहनेके कारण इन तीनोमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष
नहीं कहा जा सकता । इसके सिवा, नेत्रमे दिखायी देनेवाले पुरुषके जो अमृतत्व और निर्भयता आदि गुण श्रुतिन बताये है, वे ब्रह्मके अतिरिक्त और किसीमे’ सम्भव नहीं है।

इस कारण भी उपर्युक्त तीनोंमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं माना जा सकता । इसलिये परब्रह्म परमेश्वरको ही यहाँ नेत्रमे दिखायी देनेवाला पुरुष कहा गया है; यही मानना ठीक है। अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽस्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते। एतदुबै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मास पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः। किन्तु जो तपस्याके साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक और श्रद्धासे युक्त होकर अध्यात्मविद्याके द्वारा परमात्माकी खोज करके जीवन सार्थक कर लेते हैं,
वे उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकको जीत लेते (प्राप्त कर लेते) हैं। यही प्राणोका केन्द्र है । यह अमृत और निर्मय पद है। यह परम गति है। इससे पुनः लौटकर नहीं आते । इस प्रकार यह निरोध– पुनरावृत्ति-निवारक है।’

सम्बन्ध- पूर्वप्रकरणमें यह वात बतायी गयी है कि श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मके लिये भिन्न-भिन्न स्थान आदिका निर्देश किया गया है । अव पुन: अधिदैव, अधिभूत आदिमें उस ब्रह्मकी व्याप्ति वतलाकर उसी बातका समर्थन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

अन्तर्याम्यधिदेवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १। २ । १८॥

अधिदेवादिषु-आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि समस्त वस्तुओंमे; अन्तर्यामी जिसे अन्तर्यामी वतलाया गया है ( वह परब्रह्म ही है ); तद्धर्म व्यपदेशात्-क्योंकि वहाँ उसीके धोका वर्णन है।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (३ । ७ ) में यह प्रसङ्ग आया है। वहाँ उद्दालक ऋषिन याज्ञवल्क्य मुनिसे पहले तो सूत्रात्माके विपयमे प्रश्न किया है। फिर उस अन्तर्यामीके सम्बन्धमे पूछा है, जो इस लोक और परलोकको तथा समस्त भूत-प्राणियोंको उनके भीतर रहकर नियन्त्रणमे रखता है । इसके उत्तरमे याज्ञवल्क्यने सूत्रात्मा तो वायुको वताया है और अन्तर्यामीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उसे जड़-चेतनात्मक समस्त भूतो, सब इन्द्रियो और सपूर्ण जीवोंका नियन्ता बताकर अन्तमे इस प्रकार कहा है

यह अन्तर्यामी देखनमे न आने वाला किन्तु स्वयं सवको देखनेवाला है, सुननमें न आनेवाला किन्तु स्वयं सत्र कुछ सुननेवाला है और मनन करनेमे न
आनेवाला किन्तु खयं सबका मनन करनेवाला है । वह विशेषरूपसे किसीके जाननमे नहीं आता, किन्तु स्वयं सबको विशेषरूपसे भलीभाँति जानता है । ऐसा यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इससे भिन्न सब कुछ विनाशशील है ।’ इस वर्णनमे आये हुए महत्त्वसूचक विशेषण परब्रह्ममे ही सङ्गत हो सकते हैं । जीवात्माका अन्तर्यामी आत्मा ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई नहीं हो सकता । अतः इस प्रसङ्गमे ब्रह्मको ही अन्तर्यामी बताया गया है..–यही मानना ठीक है ।

सम्बन्ध- पूर्वसूत्रमें विधि-मुखसे यह बात सिद्ध की गयी कि अन्तर्यामी ब्रह्म ही है । अव निषेधमुखसे यह सिद्ध करते हैं कि अव्यक्त जड प्रकृति,अन्तर्यामी नहीं हो सकती

न च स्मार्तमतधर्मामिलापात् ॥ १।२ । १६ ॥

सातम्-सांख्यस्मृतिद्वारा प्रतिपादित प्रधान ( जड प्रकृति); च-भी; न= अन्तर्यामी नहीं है; अतद्धर्मामिलापात-क्योकि इस प्रकरणमे बताये हुए द्रष्टापन आदि धर्म प्रकृतिके नहीं है ।

व्याख्या- सांख्य-स्मृतिद्वारा प्रतिपादित जड प्रकृतिके धर्मोका वर्णन वहाँ अन्तर्यामीके लिये नहीं हुआ है। अपितु चेतन परब्रह्मके धर्मोका ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । इस कारण वहाँ कहा हुआ अन्तर्यामी प्रकृति नहीं हो सकती । अतः यही सिद्ध होता है कि इस प्रकरणमे ‘अन्तर्यामी’ के नामसे पर ब्रह्म परमात्माका ही
वर्णन हुआ है।

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १।१९॥

Categories
sutra 19-30

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

advaita  vedanta  adhyay  1  paad  1-19-30

सम्बन्ध-परब्रह्म परमात्माके सिवा, प्रकृति या जीवात्मा कोई भी ‘आनन्द मय’ शब्दसे गृहीत नहीं हो सकता; इस बातको दृढ़ करते हुए प्रकरणका उपसंहार करते हैं

अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १।१९॥

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

व्याख्या- तै० उ० (२८)मे श्रुति कहती है कि इस आनन्दमय परमात्माके तत्वको इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् अन्नमयादि समस्त शरीरोके आत्मस्वरूप आनन्दमय ब्रमको प्राप्त हो जाता है ।’ बृहदारण्यको थी श्रुतिका कथन है कि (ब्रह्मको जाननेवाला पुरुष ) ब्रह्मरूप होकर ही ब्रह्ममे लीन होता है। (बृह० उ० ४ । ४ । ६) श्रुतिके इन वचनोसे यह खत सिद्ध हो जाता है कि जड प्रकृति या जीवात्माको ‘आनन्दमय’ नहीं माना जा सकता, क्योकि चेतन जीवात्मा का जड प्रकृतिमे अथवा अपने ही-जैसे परतन्त्र दूसरे किसी जीवमे लय होना नहीं बन सकता । इसलिये एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही ‘आनन्दमय’ शब्दका वाच्यार्थ है और वही सम्पूर्ण जगत्का कारण है,
दूसरा कोई नहीं ।

सम्बन्ध- तैत्तिरीय श्रुतिमें जहाँ आनन्दमयका प्रकरण आया है, वह ‘विज्ञानमय’ शब्दसे जीवात्माको ग्रहण किया गया है, किन्तु बृहदारण्यक (४।४।२२ ) में ‘विज्ञानमय’ को हृदयाकाशमें शयन करनेवाला अन्तरात्मा बताया गया है। अतः जिज्ञासा होती है कि वहाँ विज्ञानमय’ शब्द जीवात्मा का वाचक है अथवा ब्रहाका ?

इसी प्रकार छान्दोग्य (१।६।६ ) में जो सूर्यमण्डलानर्वती हिरण्मय पुरुषका वर्णन आया है, वहाँ भी यह शङ्का हो सकती है कि इस मन्त्रमें सूर्य के अधिष्ठाता देवताका वर्णन हुआ है या ब्रह्मका ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है,

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ १।१।२० ॥

अन्तः हृदयके भीतर शयन करनेवाला विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलके भीतर स्थित हिरण्मय पुरुष ब्रह्म है; तद्धर्मोपदेशात्= क्योकि (उसमे ) उस ब्रह्मके धर्मोका उपदेश किया गया है।

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

व्याख्या- उपर्युक्त बृहदारण्यक-श्रुतिमे वर्णित विज्ञानमय पुरुपके लिये इस प्रकार विशेषण आये है–सर्वस्य वशी सर्वस्येशान. सर्वस्याधिपतिः एष सर्वेश्वर एप भूतपालः’ इत्यादि । तथा छान्दोग्यवर्णित सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती पुरुषके लिये सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदिनः ( सब पापोसे ऊपर उठा हुआ ) यह विशेषण दिया गया है। ये विशेषण परब्रह्म परमेश्वरम ही सम्भव हो सकते है। किसी भी स्थिति को प्राप्त देव, मनुष्य आदि यानियोंमें रहनेवाले जीवात्माके ये धर्म नहीं हो सकते। इसलिये वहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष ममझना चाहिये; अन्य किसीको नहीं ।

सम्बन्ध-इसी बानको सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं

भेदव्यपदेशाच्चान्यः ॥ १।१।२१ ॥

च-तथा; भेदव्यपदेशात् भेदका कयन होनेसे; अन्याः सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भिन्न है।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद्के अन्तर्यामिब्राह्मणमें कहा है कि-‘य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः । अर्थात् जो सूर्यमें रहनेवाला सूर्यका अन्तर्वर्ती है, जिसे सूर्य नहीं जानता, सूर्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर सूर्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इस प्रकार वहाँ सूर्यान्तर्वर्ती पुरुषका सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भेद बताया गया है। इसलिये वह हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठातासे भिन्न परब्रह्म परमात्मा ही है ।

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

सम्बन्ध- यहॉतकके विवेचनसे यह सिद्ध किया गया कि जगत्की उत्पत्ति स्थिति और प्रलयका निमित्त और उपादान कारण परब्रह्म परमेश्वर ही है। जीवात्मा या जड़ प्रकृति नही । इसपर यह जिज्ञासा होती है कि श्रुति (छा०३० १।९।१ ) में जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण आकाशको भी बताया गया है, फिर ब्रह्मका लक्षण निश्चित करते हुए यह कैसे कहा गया कि जिससे जगत्के जन्म आदि होते हैं, वह ब्रह्म है । इसपर कहते हैं–

आकाशस्तल्लिंडात् ॥ १।१।२२॥

आकाशः=(वहाँ ) ‘आकाश’ शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है; तल्लिङ्गात्-क्योकि ( उस मन्त्रमे ) जो लक्षण बताये गये हैं, वे उस ब्रह्मके ही हैं।
व्याख्या- छान्दोग्य (१ । ९ । १ ) में इस प्रकार वर्णन आया है ‘सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशम्प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो होवेभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् । अर्थात् ‘ये समस्त भूत (पञ्चतत्त्व और समस्त प्राणी) निःसन्देह आकाशसे ही उत्पन्न होते है और आकाशमे ही विलीन होते हैं । आकाश ही इन सबसे श्रेष्ठ और बड़ा है। वही इन सबका परम आधार है।’ इसमे आकाशके लिये जो विशेषण आये है, वे भूताकाशमे सम्भव नहीं हैं। क्योंकि भूताकाश तो स्वयं भूतोंके समुदायमे आ जाता है । अतः उससे भूतसमुदायकी या प्राणियोंकी उत्पत्ति बतलाना सुसङ्गत नहीं है। उक्त लक्षण एकमात्र परब्रह्म परमात्मामे ही सङ्गत हो सकते है । वही
सर्वश्रेष्ठ, सबसे बड़ा और सर्वाधार है; अन्य कोई नहीं । इसलिये यही सिद्ध होता है कि उस श्रुतिमे ‘आकाश’ नामसे परब्रह्म परमेश्वरको ही जगतका कारण बताया गया है।

सम्बन्ध-अब प्रश्न उठता है कि श्रुति (छा० उ०१।११।५) मे आकाशकी ही भॉति प्राणको भी जगत्का कारण बतलाया गया है। वहाँ ‘प्राण’ शब्द किसका वाचक है ? इसपर कहते है,

महाभारत में वैज्ञानिक तत्त्व

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

अत एव प्राणः ॥ १।१ । २३॥

अत एव-इसीलिये अर्थात् श्रुतिमे कहे हुए लक्षण ब्रह्ममे ही सम्भव है, इस कारण वहाँ; प्राणः प्राण (भी ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- छान्दोग्य (१ । ११ । ५) मे कहा है कि सर्वाणि हवा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते । अर्थात् निश्चय ही ये सब भूत प्राणने ही विलीन होते हैं और प्राणसे ही उत्पन्न होते है। ये लक्षण प्राणवायुमे नहीं घट सकते क्योकि समस्त प्राणियोकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का कारण प्राणवायु नहीं हो सकता । अत. यहाँ ‘प्राण’ नामसे ब्रह्मका ही वर्णन हुआ है, ऐसा मानना चाहिये ।

पूर्व प्रकरणमें तो ब्रह्मसूचक लक्षण होनेसे आकाश तथा प्राणको ब्रह्मका वाचक मानना उचित है। किन्तु छान्दोग्योपनिषद (३।१३।७) में जिस ज्योति (तेज )को समस्त विश्वसे उपर सर्वश्रेष्ठ परमधाममें प्रकाशित बताया है तथा जिसकी शरीरान्तर्वी पुरुषमें स्थित ज्योतिके साथ एकता बतायो गयी है, उसके लिये वहाँ कोई ऐसा लक्षण नहीं बताया गया है, जिससे उसको ब्रह्मका वाचक माना जाय ।

इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त ज्योतिः’ शब्द किसका वाचक हे ? इसपर कहते हैं—

ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॥ १।१।२४ ॥

चरणाभिधानात्=( उस प्रसङ्गमे ) उक्त ज्योतिके चार पादोका कथन होने से; ज्योति: ज्योति’ शब्द वहाँ ब्रह्मका वाचक है ।

व्याख्या – छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायमे ज्योति.’का वर्णन इस प्रकार हुआ है, अथ यदत. परो दिवो ज्योतिदीप्यते विश्चत. पृष्ठेषु सर्वत पृष्ठेष्वनुत्तमे वृत्तमेधुलोकेश्विदं वाव तयदिदमस्मिन्नन्त पुरुष ज्योति । (३।१३१७) अर्थात् जो इस वर्गलोकसे ऊपर परम ज्योति प्रकाशित हो रही है, वह समस्त विश्वके पृष्ठपर (सबके ऊपर ) जिससे उत्तम दूसरा कोई लोक नहीं है, उस सर्वोत्तम परमधाममे प्रकाशित हो रही है, वह निस्सन्देह यही है जो कि इस पुरुषमें आन्तरिक ज्योति है । इस प्रसङ्गमें आया हुआ ‘ज्योतिः’ शब्द जड प्रकाशका वाचक नहीं है, यह बात तो इसमे वर्णित लक्षणोंसे ही स्पष्ट हो जाती है । तथापि यह ‘ज्योति शब्द किसका वाचक है ?

ज्ञानका या जीवात्माका अथवा ब्रह्मका ? इसका निर्णय नहीं होता अतः सूत्रकार कहते हैं कि यहाँ जो ज्योति शब्द आया है, वह ब्रह्म का ही वाचक है; क्योंकि इसके पूर्व बारहवें खण्डमे इस ज्योतिर्मय ब्रह्मके चार पादोंका कथन है और समस्त भूतसमुदायको उसका एक पाद बताकर शेष तीन पादोंको अमृतखरूप तथा परमधाममें स्थित बताया है । इसलिये इस प्रसङ्गमे आया हुआ ज्योतिः’ शब्द ब्रह्मके सिवा अन्य किसीका वाचक नहीं हो सकता । माण्डूक्योपनिषद्मे आत्माके चार पादोंका वर्णन करते हुए उसके दूसरे पादको तैजस कहा है । यह ‘तेजस’ भी ज्योतिः’का पर्याय ही है । अतः ‘ज्योतिः’की भाँति ‘तेजस’ शब्द भी ब्रह्मका ही वाचक है,
जीवात्मा या अन्य किसी प्रकाशका नहीं। इस बातका निर्णय भी इसी प्रसङ्गके अनुसार समझ लेना चाहिये।

सम्बन्ध- यहाँ यह शङ्का होती है कि छान्दोग्योपनिषद्के तीमरे अध्याय के बारहवें खण्डमें ‘गायत्री के नामसे प्रकरणका आरम्भ हुआ है। गायत्री एक छन्दका नाम है । अत: उस प्रसङ्गमें ब्रह्मका वर्णन है, यह कैसे माना जाय ? इसपर कहते हैं,

छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगदात
तथा हि दर्शनम् ॥ १।१।२५॥

चेत् यदि कहो ( उस प्रकरणमे ); छन्दोऽभिधानात् गायत्री छन्दका कथन होनेके कारण ( उसीके चार पादोंका वर्णन है) न-ब्रह्मके चार पादोंका वर्णन नहीं है; इति न-तो यह ठीक नहीं ( क्योंकि); तथा उस प्रकारके वर्णनद्वारा वह मन्त्र इस प्रकार है,

तावानस्य महिमा ततो ज्यायारच पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्या मृनं दिवि ।। (छा० उ. ३ । १२ । ६)

चेतोऽर्पणनिगदात् ब्रह्ममे चित्तका समर्पण बताया गया है; तथा हि दर्शनम् = वैसा ही वर्णन दूसरी जगह भी देखा जाता है ।

व्याख्या पूर्व प्रकरणमे गायत्री ही यह सब कुछ है। (छा० उ०३ । १२ । १) इस प्रकार गायत्रीछन्दका वर्णन होनेसे उसीके चार पादोका वहाँ वर्णन है, ब्रह्मका नहीं; ऐसी धारणा बना लेना ठीक नहीं है। क्योकि गायत्रीनामक छन्दके लिये यह कहना नहीं बन सकता कि यह जड़-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् गायत्री ही है ।

इसलिये यहाँ ऐसा समझना चाहिये कि सबके परम कारण सर्वात्मक परब्रह्म परमेश्वरमे चित्तका समाधान करानके लिये उस ब्रह्मका ही वहाँ इस प्रकार गायत्री-नामसे वर्णन किया गया है । इसी तरह अन्यत्र भी उद्गीथ, प्रणव आदि नामोके द्वारा ब्रह्मका वर्णन देखा जाता है । सूक्ष्म तत्वमे बुद्धिका प्रवेश करानके लिये, किसी प्रकारको समानताको लेकर स्थूल वस्तुके नामसे उम्मका वर्णन करना उचित ही है।

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

सम्बन्ध- इस प्रकरणमै ‘गायत्री’ शब्द ब्रह्मका ही वाचक है, इस बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं—

भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् ॥ १।१।२६ ॥

भृतादिपादव्यपदेशोपपत्तेः-( यहाँ ब्रह्मको ही गायत्रीके नामसे कहा गया है, यह माननेमे ही ) भूत आदिको पाद बतलाना युक्तिसंगत हो सकता है, इमलिये; च-भी; एवम् ऐसा ही है ।

व्याख्या- छान्दोग्य (३ । १२) के प्रकरणमे गायत्रीको भूत, पृथिवी, शरीर और हृदयरूप चार पाटोमे युक्त बताया गया है। फिर उसकी महिमाका वर्णन करते हुए ‘पुरुष’ नामसे प्रतिपादित परब्रह्म परमात्माके साथ उसकी एकता करके समस्त भूतोको ( अर्थात् प्राणि-समुदायको ) उसका एक पाद बतलाया गया है और अमृतस्वरूप तीन पादोको परमधाममे स्थित कहा गया है । ( छा० उ० ३ । १२।६) । इस वर्णनकी सगति तभी लग सकती है, जब कि गायत्री शब्दको गायत्री छन्दका वाचक न मानकर परब्रह्म परमात्माका वाचक माना जाय । इमलिये यही मानना ठीक है।

सम्बन्ध-उक्त सिद्धान्तकी पुष्टि के लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उपस्थित करके उसका समाधान करते हैं–

उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥ १।१।२७ ॥

चेत् यदि कहो; उपदेशभेदात्-उपदेशमें भिन्नता होनेसे न-गायत्रीशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं है, इति न तो यह कथन ठीक नहीं है। उभयलिन् अपि क्योकि दो प्रकारका वर्णन होनेपर भी; अविरोधात् ( वास्तवमें ) कोई विरोध नहीं है ।

व्याख्या यदि कहा जाय कि पूर्वमन्त्र ( ३ । १२ । ६ ) मे तो तीन पाद दिव्य लोकमे हैं। यह कहकर दिव्य लोकको ब्रह्मके तीन पादोका आधार बताया गया है और बादमे आये हुए मन्त्र (३ । १३ । ७ ) मे ‘ज्योतिः’ नामसे वर्णित ब्रह्मको उस दिव्य लोकसे परे बताया है । इस प्रकार पूर्वापरके वर्णन मे भेद होनेके कारण गायत्रीको ब्रह्मका वाचक बताना सङ्गत नहीं है, तो यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि दोनो जगह के वर्णनको शैलीमे किञ्चित् भेद होनेपर भी वास्तवमे कोई विरोध नहीं है । दोनो स्थलोमे श्रुतिका उद्देश्य गायत्रीशब्द वाच्य तथा ज्योतिःशब्दवाच्य ब्रह्मको सर्वोपरि परम धाममे स्थित बतलाना ही है ।

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

सम्बन्ध- अत एव प्राण (१।११२३) इस सूत्रमें यह सिद्ध किया गया है कि श्रुतिमें ‘प्राण’ नामसे ब्रह्मका ही वर्णन है। किन्तु कौपीतकि-उपनिषद (३ । २) में प्रतर्दनके प्रति इन्द्रने कहा है कि ‘मैं ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ; तू आयु तथा अमृतरूपसे मेरी उपासना कर । इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि इस प्रकरणमें आया हुआ ‘प्राण’ शब्द किसका वाचक है ? इन्द्रका ? प्राणवायुका ? जीवात्माका ? अथवा ब्रह्मका इसपर कहते हैं—

प्राणस्तथानुगमात् ॥ १।१।२८ ॥

प्राणः प्राणशब्द ( यहॉ ब्रह्मका ही वाचक है); तथानुगमात-क्योकि पूर्वापरके प्रसङ्गपर विचार करनेसे ऐसा ही ज्ञात होता है।

व्याख्या– इस प्रकरणमे पूर्वापर प्रसङ्गपर भलीभाँति विचार करनेसे ‘प्राण’ शब्द ब्रह्मका ही वाचक सिद्ध होता है, अन्य किसीका नहीं; क्योंकि आरम्भमे प्रतर्दनने परम पुरुषार्थरूप वर माँगा है । उसके लिये परम हितपूर्ण इन्द्रके उपदेशमें कहा हुआ ‘प्राण’ ‘ब्रह्म’ ही होना चाहिये । ब्रह्मज्ञानसे बढ़कर दूसरा कोई हितपूर्ण उपदेश नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त उक्त प्राणको वहाँ प्रज्ञान खरूप बतलाया गया है, जो कि ब्रह्मके ही अनुरूप है तथा अन्तमे उसीको आनन्दस्वरूप अजर एवं अमर कहा गया है। फिर उसीको समस्त लोकोंका पालक, अधिपति एवं सर्वेश्वर बताया गया है । ये सब बाते ब्रह्मके ही उपयुक्त है । प्रसिद्ध प्राणवायु, इन्द्र अथवा जीवात्माके लिये ऐसा कहना उपयुक्त नहीं हो सकता । इसलिये यही समझना चाहिये कि यहाँ ‘प्राण’शब्द ब्रह्मका ही वाचकहै।

सम्बन्ध-उक्त प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्ट शब्दोंमे स्वय अपनेको ही प्राण कहा है । इन्द्र एक प्रभावशाली देवता तथा अजर, अमर है ही; फिर वहाँ ‘प्राण’ गन्द्रको इन्द्रका हो वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं

न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्ध
भूमा ह्यस्मिन् ॥ १।१।२९॥

चेत् यदि कही; वक्त: वक्ता (इन्द्र ) का ( उद्देश्य ); आत्मोपदेशान् अपनको ही प्राग’ नाम से बतलाना है, इसलिये न-प्रागशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकताः इति= नो ) यह कयनः (न)-ठीक नहीं है; हि-क्योंकि; असिन् इस प्रकरणम; अध्यात्मसम्बन्धभृमा अध्यात्मसम्बन्धी उपदेशकी बदलता है।

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

व्याख्या- यदि कहा कि इस प्रकरणमे इन्द्रने स्पटरूपसे अपने आपको ही प्राण बतलाया है, ऐसी परिस्थितिमे प्राण गडको इन्द्रका वाचक न मानकर ब्रह्मका वाचक मानना ठीक नहीं है, तो ऐसा कहना उचित नहीं है, क्योकि इस प्रकरणमे अध्यान्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता है । यहो आधिदैविक वर्णन नहीं है, अत उपास्यरूपये बतलाया हुआ तत्त्व इन्द्र नहीं हो सकता । इसलिये यहाँ ‘प्राण’ शब्दको ब्रह्मका ही वाचक समझना चाहिये ।

कौषीतकि-उपनिषद्म या प्रसङ्ग इस प्रकार है म होवाच प्रतर्दनस्वमेव वृणीव यं त्वं मनुप्याय हिततमं मन्यस इति…। (को० उ० ३ । १) स होवाच प्राणोऽसि प्रजात्मा ।।(को० उ० ३।२) ‘एप प्राण एवं प्रज्ञात्माss नन्दोऽजरोऽमृतः…..एप लोकपाल एप लोकाधिपतिरेष सर्वेश्वरः ।(को० उ०३।९) इस प्रसङ्गमें अध्यात्ममम्बन्धी वर्णनकी बहुलता किस प्रकार है, यह पूर्वसूत्रकी टिप्पणीम देखें।

यहाँ यह प्रश्न उठता है कि यदि ‘प्राण’ शब्द इन्द्रका वाचक नहीं है तो इन्द्रने जो यह कहा कि ‘मै ही प्रज्ञानस्वरूप प्राण हूँ, तू मेरी उपासना कर ।’ इस कथनकी क्या गति होगी ? इसपर कहते हैं

शास्त्रदृष्टया तूपदेशो वामदेववत् ॥ १ । १ । ३० ॥

उपदेश: ( यहाँ) इन्द्रका अपनेको प्राण बतलाना; तु-तो; वामदेववत् वामदेवकी भाँति; शास्त्रदृष्टया ( केवल ) शास्त्र-दृष्टि से है ।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (१।४।१०) मे यह वर्णन आया है कि तद् यो यो देवानां प्रत्यबुद्धयत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धत त्पश्यनृषिर्वामठेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभव सूर्यश्चेति । अर्थात् ‘उस ब्रह्मको देवताओंमे जिसने जाना, वही ब्रह्मरूप हो गया । इसी प्रकार ऋषियो और मनुष्योमें भी जिसने उसे जाना,

वह तद्रूप हो गया। उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना कि मै मनु हुआ और मै ही सूर्य हुआ।’ इससे यह बात सिद्ध होती है कि जो महापुरुष उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है, वह उसके साथ एकताका अनुभव करता हुआ ब्रह्मभावापन्न होकर ऐसा कह सकता है ।

अतएव उस वामदेव ऋषिकी भाँति ही इन्द्रका ब्रह्मभावापन्न अवस्थामे शास्त्रदृष्टिसे यह कहना है कि मैं ही ज्ञानखरूप प्राण हूँ अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हूँ। तू मुझ परमात्माकी उपासना कर ।’ अतः ‘प्राण’शब्दको ब्रह्मका वाचक माननेमे कोई आपत्ति नहीं रह जाती है।

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

सम्बन्ध- प्रकारान्तरसे शङ्का उपस्थित करके उसके समाधानद्वारा प्राणको ब्रह्मका वाचक सिद्ध करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते है,

जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रित त्वादिह तद्योगात् ॥ १। १ । ३१॥

सब लक्षण ब्रह्मके आश्रित है ( तथा ) इह तद्योगात् इस प्रसङ्गमें ब्रह्मके लक्षणोका भी कथन है, इसलिये ( यहाँ ‘प्राण’शब्द ब्रह्मकाही वाचक है)।
व्याख्या- कौपीतकि-उपनिपद् (३८) के उक्त प्रसङ्गमे जीवके लक्षणों का इस प्रकार वर्णन हुआ है, न वाच विजिज्ञासीत । वक्तार विद्यात् ।। अर्थात् ‘वाणीको जाननेकी इच्छा न करे । वक्ताको जानना चाहिये ।’

यहाँ वाणी आदि कार्य और करणके अध्यक्ष जीवात्माको जाननेके लिये कहा है । इसी प्रकार प्रसिद्ध प्राणके लक्षणका भी वर्णन मिलता है-‘अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति । (३।३) अर्थात् निस्सन्देह प्रज्ञानात्मा प्राण ही इस गरीरको ग्रहण करके उठाता है । शरीरको धारण करना मुख्य प्राणका ही धर्म है, इस कथनको लेकर यदि यह कहो कि ‘प्राण’शब्द ब्रह्मवाचक नहीं होना चाहिये, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि ब्रह्मके
अतिरिक्त जीव और प्राणको भी उपास्य माननेसे त्रिविध उपासनाका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, जो उचित नहीं है । इसके सिवा, जीव और प्राण आदिके धर्मोंका आश्रय भी ब्रह्म ही है, इसलिये ब्रह्मके वर्णनमे उनके धर्मोका आना अनुचित नहीं है । यहाँ ब्रह्मके लोकाधिपति, लोकपाल आदि लक्षणोंका भी स्पष्ट वर्णन मिलता है।

इन सब कारणोंसे यहाँ ‘प्राण’ शब्द ब्रह्मका ही वाचक है । इन्द्र, जीवात्मा अथवा प्रसिद्ध प्राणका नहीं यही मानना ठीक है।

पहला पाद सम्पूर्ण ।

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १।१ । १॥

सम्बन्ध- ध्यानका स्वरूप बतलाते हैं

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

Categories
Advaitaarkopanishad

Advaitaarkopanishad yajurvediy upnishad

॥अद्वयतारकोपनिषद्॥

Advaitaarkopanishad yajurvediy upnishad

शुक्लयजुर्वेद से सम्बद्ध इस उपनिषद् में राजयोग का सविस्तार वर्णन है, जिसका सुपरिणाम ब्रह्म प्राप्ति के रूप में विवेचित है। इसमें सर्वप्रथम तारकयोग की व्याख्या करने का निश्चय व्यक्त करते हुए योग के उपाय और उसके फल की विवेचना की गई है।

तदुपरान्त ‘तारक’ का स्वरूप, लक्ष्यत्रय के अनुसंधान की विधि अन्तर्लक्ष्य, बहिर्लक्ष्य एवं मध्यलक्ष्य का लक्षण दो प्रकार के तारक का स्वरूप, तारकयोग की सिद्धि तारकयोग का स्वरूप, शाम्भवी मुद्रा अन्तलक्ष्य के विकल्प, आचार्य का लक्षण एवं अन्त में उपनिषद् की फलश्रुति वर्णित है। इस प्रकार इस उपनिषद् में भवसागर संसार बन्धन से त्राण पाने का अति सुगम उपाय तारक ब्रह्म की साधना का विधान प्रस्तुत किया गया है।

।।शांतिपाठः।।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

ॐ रूप में जिसे अभिव्यक्त किया जाता है, वह परब्रह्म स्वयं में सब प्रकार से पूर्ण है और यह सृष्टि भी स्वयं में पूर्ण है। उस पूर्ण तत्त्व में से इस पूर्ण विश्व की उत्पत्ति हुई है। उस पूर्ण में से यह पूर्ण निकाल लेने पर भी वह शेष भी पूर्ण ही रहता है। आधिदैविक आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक ताप-संताप शान्त हों।

अब अद्वयतारकोपनिषद् की व्याख्या योगियों, संन्यासियों जितेन्द्रियों तथा शम, दम आदि पड्गुणों से पूर्ण साधकों के लिए करते हैं १ ॥

वह नेत्रों को बन्द अथवा अधखुले रखकर अंत: दृष्टि से भृकुटी के ऊर्ध्व स्थल में “मैं चित् स्वरूप हूँ” इस प्रकार का भाव चिन्तन करते हुए सच्चिदानन्द के तेज से युक्त कूट रूप (निश्चल) ब्रह्म का दर्शन करता हुआ ब्रह्ममय ही हो जाता है।। २।॥

जो (तेजोमय परब्रह्म) गर्भ, जन्म, जरा, मरण एवं संहार आदि पापों से तारता है अर्थात् मुक्ति दिला देता है, उसे तारक” ब्रह्म कहा गया है। जीव एवं ईश्वर को मायिक (माया से आवृत) जानते हुए अन्य सभी को नेति-नेति’ कहते हुए छोड़कर जो कुछ शेष बचा रहता है, वही ‘अद्वय ब्रह्म’ कहा गया है॥ ३॥
उस (तेजोमय परब्रह्म) की सिद्धि के लिए तीन लक्ष्यों का अनुसंधान ही करणीय कर्त्तव्य है॥ ४॥

Advaitaarkopanishad yajurvediy upnishad

(उस योगी के) शरीर के बीच में ‘सुषुम्रा’ नामक ब्रह्मनाडी पूर्ण चन्द्रमा की भाँति प्रकाशयुक्त है। वह मूलाधार से शुरू होकर ब्रह्मरन्ध्र तक विद्यमान है। इस नाड़ी के बीच में कोटि-कोटि विद्युत् के सदृश तेजोमयी मृणालसूत्र की तरह सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति प्रख्यात है।

उस शक्ति का मन के द्वारा दर्शन करने मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष-प्राप्ति का अधिकारी बन जाता है। मस्तिष्क के ऊपर विशेष मण्डल में निरन्तर विद्यमान तेज (प्रकाश) को तारक ब्रह्म के योग से जो देखता है, वह सिद्ध हो जाता है। दोनों कानों के छिद्रों को को तर्जनी अँगुलियों के अग्रभाग से बन्द कर लेने पर ‘फूत्कार’ (सर्प के फुफकार की तरह) का शब्द सुनाई पड़ता है। उसमें मन को केन्द्रित करके नेत्रों के मध्य नीली ज्योति को आन्तरिक दृष्टि से देखने पर अत्यधिक आनन्दानुभूति होती है।

ऐसा ही दर्शन हृदय में भी किया जाता है। इस प्रकार के अन्तर्लक्ष्य (अन्तःकरण में देखे जाने योग्य) लक्षणों का अभ्यास मुमुक्षु (मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले साधक) को करना चाहिए॥ ५ ॥

मनुष्य बाह्य सुखोपभोगों की कामना से ही पाप कर्म में प्रवृत्त होता है। पापवृत्ति उक्त कामनाओं के आधार पर ही उभरती है।
अन्तःस्थित कुण्डलिनी की सामर्थ्य का दर्शन मन से होने पर यह विश्वास मन में जम जाता है कि सुखों में श्रेष्ठतम आनन्द का स्त्रोत अपने भीतर ही है,
इसलिए बाह्य उपलब्धियों के निमित्त उभरने वाली पापवृत्ति
उभरती ही नहीं है।

अब बाह्यलक्ष्य के लक्षणों का वर्णन करते हैं। नासिका के अग्रभाग से क्रमश: चार, छः, आठ, दस या बारह अंगुल की दूरी पर नील एवं श्याम रंग जैसा, रक्ताभ वर्ण का आकाश, जो पीत शुक्लवर्ण से युक्त होता है, उस आकाश तत्त्व को जो निरन्तर देखता रहता है, वही वास्तव में सच्चा योगी कहलाता है। उस चलायमान दृष्टि से आकाश में देखने पर वे ज्योति किरणें स्पष्टतया दृष्टिगोचर होती हैं, उन दिव्य किरणों को देखने वाला ही योगी होता है।

Advaitaarkopanishad yajurvediy upnishad

जब दोनों चक्षुओं के कोने में तप्त सुवर्ण की भाँति ज्योति मयूख (किरण) का दर्शन होता है, तो फिर उसकी दृष्टि एकाग्र हो जाती है। मस्तिष्क के ऊर्ध्व में लगभग १२ अंगुल की दूरी पर ज्योति का दर्शन करने वाला योगी अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य चाहे जिस स्थल पर स्थित सिर के ऊर्ध्व में आकाश ज्योति का दर्शन करता है, वहीं ( पूर्ण) योगी कहलाता है॥ ६॥

इसके अनन्तर अब ‘मध्यलक्ष्य’ के लक्षण का वर्णन करते हैं। जो प्रात: काल के समय में चित्रादि वर्ण से युक्त अखण्ड सूर्य का चक्रवत्, अग्रि की ज्वाला की भाँति तथा उनसे विहीन अन्तरिक्ष के समान देखता है। उस आकार के सदृश होकर प्रतिष्ठित रहता है । पुनः उसके दर्शन मात्र से वह गुणरहित ‘आकाश’ रूप हो जाता है।

विस्फुरित (प्रकाशित) होने वाले तारागणों से प्रकाशमान एवं प्रातःकाल के अंधेरे की भाँति ‘परमाकाश’ होता है। ‘महाकाश’ कालाग्रि के समान प्रकाशमान होता है। ‘तत्त्वाकाश’ सर्वोत्कृष्ट प्रकाश एवं प्रखर ज्योति-सम्पन्न होता है। ‘सूर्याकाश’ करोड़ों सूर्यो के सदृश होता है। इस तरह बाह्य एवं अन्तः में प्रतिष्ठित ये ‘पाँच आकाश’ तारक-ब्रह्म के ही लक्ष्य हैं। इस क्रिया विधि द्वारा आकाश का दर्शन करने वाला उसी की भाँति समस्त बन्धनों को काटकर मुक्ति-प्राप्ति का अधिकारी हो जाता है। तारक का लक्ष्य ही अमनस्क फल-प्रदाता कहा गया है। ७ ॥

इस तारक योग की दो विधियाँ बतलाई गई हैं । जिसमें प्रथम पूर्वार्द्ध है और द्वितीय उत्तरार्द्ध। इस सन्दर्भ में यह श्लोक द्रष्टव्य है, यह योग पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दो प्रकार का होता है। पूर्व को ‘तारक’ एवं उत्तर को अमनस्क’ (मन: शून्य होना) कहा गया है । ८ ॥

Advaitaarkopanishad yajurvediy upnishad

अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2

हम आँखों के तारक (पुतलियों) से सूर्य एवं चन्द्र का दर्शन ( प्रतिफलन ) करते हैं। जिस तरह से हम आँखों के तारकों से ब्रह्म-ब्रह्माण्ड के सूर्य एवं चन्द्र को देखते हैं, वैसे ही अपने सिर रूपी ब्रह्माण्ड के मध्य में विद्यमान सूर्य एवं चन्द्र का निर्धारण करके उनका हमेशा दर्शन करना चाहिए तथा दोनों को एक ही रूप जान करके मन को एकाग्र कर उनका चिन्तन करना चाहिए,

क्योंकि यदि मन को इस भाव से ओत-प्रोत न किया जायेगा, तो समस्त इन्द्रियाँ विषयों में प्रवृत्त होने लगेंगी। इस कारण योगी- साधक को अपनी अन्त: की दृष्टि से ‘तारक’ का निरन्तर अनुसंधान करते रहना चाहिए।। ९ ॥

इस ‘तारक’ की दो विधियाँ कहीं गई हैं , जिसमें प्रथम मूर्त (मूर्ति) एवं द्वितीय अमूर्त (अमूर्ति) है। जो इन्द्रियों के अंत (अर्थात् मनश्चक्षु) में है , वह मूर्त तारक है तथा जो दोनों भृकुटियों से बाहर है, वह अमूर्त है। आंतरिक पदार्थों के विवेचन में सर्वत्र मन को एकाग्र करके अभ्यास करते रहना चाहिए।

सात्विक दर्शन से युक्त मन द्वारा अपने अंतःकरण में सतत निरीक्षण करने से दोनों तारकों के ऊर्ध्व भाग में सच्चिदानंदमय ज्योतिरूप परब्रह्म का दर्शन होता है। इससे ज्ञात होता है कि ब्रह्म शुक्ल-शुभ्र तेज स्वरूप है। उस ब्रह्म को मनसाहित नेत्रों की अंतःदृष्टि से देखकर जानना चाहिए।

अमूर्त तारक भी इसी विधि से मनः संयुक्त नेत्रों से ज्ञात हो जाता है। रूप दर्शन के संबंध में मन नेत्रों के आश्रित रहता है और बाहर के सदृश अंतः में भी रूप ग्रहण का कार्य इन दोनों के द्वारा ही सम्पन्न होता है। इस कारण मन के सहित नेत्रों के द्वारा ही ‘तारक’ का प्रकाश होता है।।१०।।

जो मनुष्य अपनी आन्तरिक दृष्टि के द्वारा दोनों भृकुटियों के स्थल से थोड़ा सा ऊपरी भाग में स्थित तेजोमय प्रकाश का दर्शन करता है, वही तारक योगी होता है। उसके साथ मन के द्वारा तारक की सुसंयोजना करते हुए प्रयत्नपूर्वक दोनों भौंहों को कुछ थोड़ा सा ऊँचाई पर स्थिर करे।

Advaitaarkopanishad yajurvediy upnishad

यही तारक का पूर्वाद्ध योग कहलाता है। द्वितीय उत्तरार्द्ध भाग को अमूर्त कहा गया है । तालु-मूल के ऊर्ध्व भाग में महान् ज्योति किरण मण्डल स्थित
है। उसी का ध्यान योगियों का ध्येय (लक्ष्य) होता है । उसी से अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।॥ ११॥

योगी-साधक की अन्तः एवं बाह्य लक्ष्य को देखने की सामर्थ्य वाली दृष्टि जब स्थिर हो जाती है, तब वह स्थिति ही शांभवी मुद्रा कहलाती है। इस मुद्रा से ओत-प्रोत ज्ञानी पुरुष का निवास स्थल अत्यंत पवित्र माना जाता है तथा सभी लोक उसकी दृष्टि-मात्र से पवित्र हो जाते हैं। जो भी इस परम योगी की पूजा करता है, वह उसको प्राप्त करते हुए मुक्ति का अधिकारी हो जाता है।।१२।।

अन्तर्लक्ष्य उज्ज्वल शुभ्र ज्योति के रूप में हो जाता है। परम सद्गुरु का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर सहस्र दल कमल में स्थित उज्ज्वल-ज्योति अथवा बुद्धि-गुहा में स्थित रहने वाली ज्योति अथवा फिर वह सोलह कला के अन्तः में विद्यमान तुरीय चैतन्य स्वरूप अन्तर्लक्ष्य होता है। यही दर्शन सदाचार का मूल है॥ १३ ॥

वेदज्ञान से सम्पन्न, आचार्य (श्रेष्ठ आचरण वाला) , विष्णुभक्त, मत्सर आदि विकारों से राहित, योग का ज्ञाता, योग के प्रति निष्ठा रखने वाला, योगात्मा, पवित्रता युक्त, गुरुभक्त, परमात्मा की प्राति में विशेष रूप से संलग्न रहने वाला- इन उपर्युक्त लक्षणों से सम्पन्न पुरुष ही गुरु रूप में अभिहित किया जाता है।।१४-१५।।

गु अक्षर का अर्थ है-अन्धकार एवं रु अक्षर का अर्थ है अन्धकार को रोकने में समर्थ। अन्धकार (अज्ञान) को दूर करने वाला ही गुरु कहलाता है॥ १६ ॥

Advaitaarkopanishad yajurvediy upnishad

गुरु ही पराकाष्ठा है, गुरु ही परम (श्रेष्ठ) धन है । जो श्रेष्ठ उपदेश करता है, वही गुरु से गुरुतर अर्थात् श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम गुरु है, ऐसा जानना चाहिए ॥ १८ ॥

जो मनुष्य एक बार (गुरु या इस उपनिषद् का) उच्चारण ( पाठ) करता है, उसकी संसार सागर से निवृत्ति हो जाती है। समस्त जन्मों के पाप तत्क्षण ही विनष्ट हो जाते हैं । समस्त इच्छाओं-आकांक्षाओं की पूर्ति हो जाती है। सभी पुरुषार्थ सफल -सिद्ध हो जाते हैं। जो ऐसा जानता है, वही उपनिषद् का यथार्थ ज्ञानी है, यही
उपनिषद् है ।।१९।।

ॐ पूर्णमदः……….इति शान्तिः ।।

।।इति अद्वयतारकोपनिषत्समाप्ता ।।

शिवाय नमः

Advaitaarkopanishad yajurvediy upnishad

इतिहासं पुराणं पंचम वेदानां वेदम् ।।62।।

Categories
वेद पुराण

puran tatha paryavaran

puran tatha paryavaran

संस्कृत वाड.मय में पुराणों का एक विशिष्ट स्थान है । इसमें वेदों के गुढ़ार्थ के स्पष्टीकरण की अपूर्व क्षमता है। अतः पुराण सर्वथा वेदानुकूल है । पुराणों का एक भी विषय वेद विरुद्ध नहीं है। और इसकी प्रमाणिकता के प्रति भी संदेह नहीं हैं ।

वेद पुराण-स्मृति न्याय दर्शन आदि में पुराणों की अति प्राचीनकता सिद्ध की गयी है :

ऋचः समानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह ।
उच्छिष्टाज्जाज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रिताः ।। 2411
अर्थववेद।111/7/24

इतिहासं पुराणं पंचम वेदानां वेदम् ।।62।।
न्याय दर्शन। 14/1/62

पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं व्रहमणा स्मृतम् ।
अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ।।
मत्स्य पुराण 153/3

पुराण क्या है ? इसका अर्थ क्या – क्या है ? अनेक ग्रन्थों में
इसकी व्याख्या कैसे की गई है ।

puran tatha paryavaran

पुरा अपि नवं पुराणम् ‘ से यह प्रतीत होता है कि
पुराना होने पर भी जो नवीन हो वह पुराण है ।
वायु पुराण के अनुसार

यस्मात् पुरा ह्यनतीदं पुराणं तेन तत स्मृतम ।
वायु०।11/1/83

जो पूर्व में सजीव था वह पुराण कहा गया है। हमारे धर्म-शास्त्रों में पुराणों की बड़ी महिमा बखान किया गया है

उन्हें साक्षात हरि का रुप बताया गया है । जिस प्रकार सम्पूर्ण जगत को आलोकित करने के लिए भगवान सूर्य के रुप
में प्रकट होकर बाहरी अन्धकार को नष्ट कर देते हैं। उसी प्रकार हमारे हृदयान्धकर को दूर करने के लिए हरि पुराण विग्रह
धारण करते हैं। वेदों की भॉति पुराण भी हमारे यहाँ अनादि माने गये हैं और उनका रचयिता कोई नहीं माना गया है लेकिन बाद में व्यवस्थित ढंग से संकलन कर्ता वेद व्यास को माना जाता है । इराकी प्राचीनता के विषय में इसरो ही स्पष्ट हो जाता है कि सृष्टि कर्ता ब्रह्मा जी भी पुराणों का स्मरण करते हैं ।

puran tatha paryavaran

पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रहमणा स्मृत् ।
पुराण विघा महर्षियों का सर्वस्व है। 20वीं तथा 21वीं शताब्दी जिसे विज्ञान का मध्यान्ह काल माना जाता है, किन्तु जितने भी ज्ञान विज्ञान आज तक उच्च भूमि पर पहुंच चुके हैं, जितने अभी अधूरे तथा अभी गर्भ में ही हैं। उनमें से एक

भी ऐसा नहीं है, जिसके सम्बन्ध में पुराणों में कोई उल्लेख न मिलता हो । हजारों वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों को इन सब बातों
का ज्ञान था , जो आज के ज्ञान-विज्ञान में है अथवा नहीं है। राजनीति , धर्म-नीति, इतिहास, समाज-विज्ञान,

ग्रह-नक्षत्र ,विज्ञान, आयुर्वेद, भुगोल, ज्योतिष आदि समस्त विधाओं का प्रतिपादन पुराणों में हुआ है । पहले हम समझते
थे कि पुराणों में कथायें ही होगी परन्तु जब हमने इसका अध्ययन किया तब तो हम चकित रह गये । संसार का ऐसा

puran tatha paryavaran

कोई भी ज्ञान नहीं है जो पुराणों में न हो । वेदों का जहाँ मुख्य प्रतिपाघ विषय यज्ञ है वहीं पुराणों का मुख्य विषय
लोकवृत (चरित्र) है । लोकवृत्तीय समाज में प्रमुख स्थान मानव का होता है । समस्त जीवों का मूलाधार जल, वायु, सूर्य तथा पृथ्वी है। अतः इसी लिए पुराणों में इसके संरक्षण की बात कही गयी है । वैसे पुराणों के समय में पर्यावरण जैसी कोई समस्या की बात नहीं कही गयी है।

पुराणों के समय में पर्यावरण जैसी कोई समस्या नहीं थी फिर भी पुराणों में इसके संरक्षण को धर्म बताया गया है। अतः इससे यह प्रमाणित होता है कि प्राचीन काल में हमारे ऋषि पर्यावरण के संरक्षण तथा पर्याप्त संतुलन बनाए रखने की बात पर बल देते थे। यह तथ्य आज के परिवेश को देखते हुए भी अति प्रासांगिक है क्योंकि वर्तमान में

मानव विज्ञान तथा

puran tatha paryavaran

उसके द्वारा बनाए गए यंत्रों पर आधारित होता जा रहा है जिससे न केवल पर्यावरण असंतुलित हो रहा है अपितु प्रदूषित भी होता जा रहा है । यहाँ पर यह यक्ष प्रश्न भी हमारे सामने आता है कि वर्तमान यान्त्रिक जीवन शैली को

अपना कर के आज का मानव किस दिशा में प्रगति कर रहा है ? क्या इस प्रकार की असंतुलित सोच से हम संपूर्ण मानव जाति का ही अस्तित्व तो खतरे में नहीं डाल रहे है ? इन प्रश्नों से उपजी शंकाओं का समाधान केवल पुराणों में वर्णित तथा समाव

ऋषिओं द्वारा दिए गए प्राकृतिक नियमों पर चल कर ही प्राप्त हो सकता है । अतएव , समस्त मानव जाति को पुराणों में
दिए गए सुविचरित आख्यानों पर पर्याप्त ध्यान देना चाहिए तथा अपनी जीवन शैली को पर्यावरण के अनुकूल बनाना चाहिए

पर्यावरण क्या है ?

puran tatha paryavaran

सरकत 4 वृ धातु का अर्थ है आवृत करना, जो भूमण्डल को परितः आवृत करे वहीं पर्यावरण है । पर्यावरण की परिधि मे समय सृष्टि गृहीत है । वैदिक वृत ही अवेस्ता में वॅरेथ (warrenth) अंग्रेजी में वीदर (Weather) हो
गया है। पर्यावरण शब्द · परि ‘ और आवरण से मिलकर बना है । इसके अन्तर्गत हमारे चारो ओर का विस्तृत वातावरण

आता है जिसमें सभी जीवित एवं निर्जीव वस्तुएँ और पदार्थ सम्पूर्ण जड़ और चेतन जगत सम्मिलित है । पृथ्वी के चारों
ओर प्रकृति तथा मानव निर्मित समस्त दृश्य या अदृश्य पदार्थ पर्यावरण के अंग हैं। हमारे चारों ओर का वातावरण और उसमें पाये जाने वाले प्राकृतिक

puran tatha paryavaran

अप्राकृतिक जड तथा चेतन जगत सभी का मिला-जुला नाम पर्यावरण है और उसके पारस्परिक तालमेल तथा अन्योन्य किया व पारस्परिक प्रभाव को पर्यावरण सन्तुलन कहते हैं। पर्यावरण अनेक कारकों का सम्मिश्रण है . अर्थात तापकम , प्रकाश , जल , मिट्टी इत्यादि । कोई वाह्य वल पदार्थ या स्थिति जो किसी भी प्रकार किसी प्राणी के जीवन

को पभावित करती है उसे पर्यावरण का कारक माना जाता है हमारा पर्यावरण , हमारे चारो ओर का समय वातावरण
है जिसमें जल,वायु, पेड़-पौधे , मिट्टी और प्रकृति के अन्य तत्व तथा जीव-जन्तु आदि शामिल है । हमारे चारों ओर का

वातावरण एवं परिवेश जिसमें हम आप और अन्य जीवधारी रहते हैं , सब मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते हैं। पर्यावरण का तात्पर्य उस समूची भौतिक जैविक व्यवस्था से भी है जिसमें समस्त जीवधारी रहते हैं , स्वभाविक विकास करते

हैं तथा फलते-फूलते हैं । इस तरह वो अपनी स्वभाविक प्रवृत्तियों का विकास करते हैं । ऐसा पुराणों में दिए गाए
उद्धरणों से भी स्पष्ट होता है।

puran tatha paryavaran

किसी भी जीव के पर्यावरण में वे सभी भौतिक व जैविक घटक सम्मिलित होते हैं । पृथ्वी से करोड़ों मील दूर होते हुए भी जीवो के पर्यावरण के लिए सूर्य का प्रकाश उतना ही महत्वपूर्ण है जितना जल, वायु तथा मिट्टी आदि । पर्यावरण के सभी घटक और कारक एक दूसरे को प्रभावित करते हैं । जैसे

सूर्य-उर्जा से जल व वायु गर्म होती है जिससे वाष्प बनती है और वायु उपर उठती है, वायु के बहने के साथ वाष्प बादलों के रुप में एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाती है । बादलों द्वारा सूर्य की उर्जा को पृथ्वी तक
पहुचने में बाधा उत्पन्न होती है । जिससे जल बरसता है फिर पेड़-पौधे पनपते हैं । अतः सपष्ट है कि पर्यावरण के किसी भी कारक के बिना अन्य कारक प्रभावित नहीं हो सकते हैं

वस्तुतः पर्यावरण के कारक आपस में इस तरह गुंथे होते हैं
जैसे जाल का ताना बाना ।
पर्यावरण एक व्यापक शब्द है , सीधे शब्दों में हम कह सकते हैं कि पर्यावरण है तो हम हैं , इसके बिना किसी भी प्राणी अथवा वनस्पति का कोई भी अस्तित्व नहीं है । जल, थल और वायुमण्टल किसी भी स्थान के पर्यावरण के मुख्य अंग होते है । इसके साथ मानव की जीवन कियाओं को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाले सभी

भौतिक तत्वों तथा अन्य जीवों का भी पर्यावरण के निर्माण में
यापर महत्वपूर्ण योगदान होता है । पर्यावरण मे समय के अनुसार
परिवर्तन होना स्वभाविक ही है । जीवों तथा वनस्पतियों के
विकास का सीधा सम्बन्ध पर्यावरण से है । इस लिए एक निश्चित सीमा तक प्राकृतिक परिवर्तनो को यथा वारिश , अकाल , हांडावात , बाढ़

तथा भूकंप आदि का सामना करने का तथा उससे बचाव का उपाय इत्यादि करते हुए जीवों को प्रकृति के ही अनकूल ढलने के लिए सामर्थ्य स्वय पर्यावरण ही प्रदान करता है । ऐसा वैज्ञानिकों द्वारा सिद्ध किया जा चुका है । जैसे कि चार्ल्स डारविन का प्राकृतिक चयन का सिद्धांत जिसके अनुसार प्रत्येक जीव की अग्रिम तथा विकसित प्रजाति के रुप में जन्म का कारण प्राकृतिक घटनागो तथा पारिस्थिकी से उसका संघर्ष है ।

puran tatha paryavaran

अतएव इस धरा पर विभिन्न प्रकार के जीव जन्तुओ तथा वनस्पतियों में
पाई जाने वाली विभिन्नताओं का अप्रत्यक्ष कारण पर्यावरण ही पृथ्वी का धरातल और उसकी सारी प्राकृतिक दशायें प्राकृतिक सशाधन . भूमि , जल पर्वत – मंदान . पाधे सम्पूर्ण प्राणी जगत , जो पृथ्वी पर विधमान होकर मानव को प्रभावित करती हैं । वे पर्यावरण के अन्तर्गत आती हैं ।

यधपि हमारे देश की प्राचीन संस्कृति पर्यावरण के संरक्षण के अनुरुप ही रही है । प्रत्येक जीव की पर्यावरण के कारकों के प्रति एक निश्चित सहनशीलता होती है सहनशीलता की सीमा से अधिकता के कारण मानवीय जीवन कियाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है । ऐसा पौराणिक धर्म ग्रन्थों में वर्णित है 

पर्यावरण के घटक पारस्परिक ताल-मेल नहीं रखते तो पर्यावरण में असतुलन की स्थिति व्याप्त हो जाती है। इसी लिए पारिरिशकी सन्तुलन को बनाये रखने के लिए हमारे प्राचीन मनीषीगण पर्यावरण के उपादनों पर दैवीय रुपों का प्रत्यारोपण किया है । इसी लिए पर्यावरण के सहायक तत्वों के सम्वर्धन के प्रति ऋषि गण काफी उत्साहित दिखाई देते है तथा पर्यावरण के विकास के तत्वों को धर्म तथा धार्मिक कियाओ से जोड़कर आम जनता को इसकी (पर्यावरण) महत्ता का दर्शन कराया ।

puran tatha paryavaran

जिससे आम जनता भी पर्यावरण के विकास में अपना योगदान दे सके । पौराणिक युगीन साहित्यकार शूद्रक ने अपने प्रसिद्ध सस्कृत नाटक ‘मृच्छकटिकम’ में भी तरह तरह को पर्यावरण पर आधारित उत्सवों जैसे वसन्तोत्सव , शरदोत्सव आदि का हर्षोल्लास से तत्कालीन नगरो में मनाए जाने का जिक्र किया है जिसमें आम जनता भी बढ़ चढ़ कर भाग लेती थी ।

इससे यह सिद्ध होता है कि पौराणिक समाज विशेष रुप से नगरीय समाज पर्यावरण के संतुलन के प्रति जागरुक था। पौराणिक कालीन संस्कृत साहित्य के महाकवि कालिदास के लगभग समस्त नाटकों में प्राकृतिक सौन्दर्य का विशद तथा मनोहारी वर्णन है जिससे यह पता चला है कि जीवन के प्रत्येक स्तर चाहे वह साहित्य सृजन हो या
फिर धार्मिक कियाओं का संपादन हो पौराणिक समाज
पर्यावरण के समस्त घटकों में उचित संतुलन बनाए रखने के
प्रति सचेष्ट था।

puran tatha paryavaran

विभूतिपाद-३

Categories
vibhutipaad 1-18

yog darshan vibhutipaad 1-18

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

yog darshan vibhutipaad 1-18

विभूतिपाद-३

सम्बन्ध- दूसरे पादमें योगाङ्गोंके वर्णनका आरम्भ करके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार–इन पाँच बहिरङ्ग-साधनोंका फलसहित वर्णन किया गया; शेष धारणा, ध्यान और समाधि-इन तीन अन्तरङ्ग-साधनोंका वर्णन इस पादमें किया जाता है; क्योंकि ये तीनों जब किसी एक ध्येयमें पूर्णतया किये जाते हैं, तब इनका नाम संयम हो जाता है। योगकी विभूतियाँ प्राप्त करनेके लिये संयमकी आवश्यकता है, अतः इन अन्तरङ्ग-साधनोंका वर्णन साधनपाद में न करके इस विभूतिपादमें करते हुए पहले धारणाका स्वरूप बतलाते हैं

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१॥

व्याख्या- नाभिचक्र, हृदय-कमल आदि शरीरके भीतरी देश हैं और आकाश या सूर्य-चन्द्रमा आदि देवता या कोई भी मूर्ति तथा कोई भी पदार्थ बाहरके देश हैं, उनमेंसे किसी एक देशमें चित्तकी वृत्तिको लगानेका नाम ‘धारणा’ है।॥१॥

सम्बन्ध- ध्यानका स्वरूप बतलाते हैं

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥२॥

व्याख्या- जिस ध्येय वस्तुमें चित्तको लगाया जाय, उसीमें चित्तका एकाग्र हो जाना अर्थात् केवल ध्येयमात्रकी एक ही तरहकी वृत्तिका प्रवाह चलना, उसके बीचमें किसी भी दूसरी वृत्तिका न उठना ‘ध्यान’ है ॥२॥

सम्बन्ध-समाधिका स्वरूप बतलाते हैं

yog darshan vibhutipaad 1-18

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥३॥

व्याख्या- ध्यान करते-करते जब चित्त ध्येयाकारमें परिणत हो जाता है, उसके अपने स्वरूपका अभाव-सा हो जाता है, उसको ध्येयसे भिन्न उपलब्धि नहीं होती, उस समय उस ध्यानका ही नाम ‘समाधि’ हो जाता है। यह लक्षण निर्वितर्क समापत्तिके नामसे पहले पादमें किया गया है (योग० १ । ४३) ॥ ३॥

सम्बन्ध- उक्त तीनों साधनोंका सांकेतिक नाम बतलाते हैं

त्रयमेकत्र संयमः ॥४॥

व्याख्या- किसी एक ध्येय पदार्थमें धारणा, ध्यान और समाधि-ये तीनों होनेसे संयम कहलाता है। अतः इस ग्रन्थमें जहाँ-तहाँ किसी विषयमें संयम करनेको कहा जाय या संयमका फल बतलाया जाय तो संयमके नामसे किसी एक ध्येयमें तीनोंका होना समझ लेना चाहिये ॥ ४ ॥

सम्बन्ध- संयमकी सिद्धिका फल बतलाते हैं

तज्जयात्प्रज्ञालोकः ॥५॥

व्याख्या- साधन करते-करते जब योगी संयमपर विजय प्राप्त कर लेता है, अर्थात् चित्तमें ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेता है कि जिस विषयमें वह संयम करना चाहे, उसीमें तत्काल संयम हो जाता है, उस समय योगीको बुद्धिका प्रकाश प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसकी बुद्धिमें अलौकिक ज्ञानशक्ति आ जाती है। इसीको प्रथम पादमें अध्यात्मप्रसादके और ऋतम्भरा प्रज्ञाके नामसे कहा है (योग० १ । ४७-४८) ॥ ५॥

सम्बन्ध- संयमके प्रयोगकी विधिका वर्णन करते हैं

तस्य भूमिषु विनियोगः ॥६॥

व्याख्या- संयमका प्रयोग क्रमसे करना चाहिये अर्थात् पहले स्थूल विषयमें संयम करना चाहिये। वह स्थिर हो जानेपर सूक्ष्म विषयोंमें क्रमसे संयम करना चाहिये। इसी प्रकार जिस-जिस स्थलमें संयम स्थिर होता जाय, उस-उससे आगे बढ़ते रहना चाहिये ॥६॥

सम्बन्ध- उक्त तीनों साधनोंकी विशेषता बतलाते हैं

त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥७॥

व्याख्या- इसके पहले अर्थात् दूसरे पादमें जो योगके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार-ये पाँच अङ्ग बतलाये गये हैं, उनकी अपेक्षा उपर्युक्त धारणा, ध्यान और समाधि-ये तीनों साधन अन्तरङ्ग हैं; क्योंकि इन तीनोंका योग-सिद्धिके साथ निकटतम सम्बन्ध है ॥७॥

सम्बन्ध- निर्बीज समाधिकी विशेषताका वर्णन करते हैं

तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ॥८॥

yog darshan vibhutipaad 1-18

व्याख्या- पर-वैराग्यकी दृढ़तासे जब समाधिप्रज्ञाके संस्कारोंका भी निरोध हो जाता है, तब निर्बीज समाधि सिद्ध होती है (योग० १ । ५१) । अतः धारणा, ध्यान और समाधि भी उसके अन्तरङ्ग साधन नहीं हो सकते; क्योंकि उसमें सब प्रकारकी वृत्तियोंका अभाव किया जाता है (योग० १ । १८); किसी भी ध्येयमें चित्तको स्थिर करनेका अभ्यास नहीं किया जाता ॥८॥

सम्बन्ध- गुणोंका स्वभाव चञ्चल है, उनमें प्रतिक्षण परिणाम होता रहता है। चित्त गुणोंका ही कार्य है, अतः वह भी कभी एक अवस्थामें नहीं रह सकता। अतः निरोध समाधिके समय उसका कैसा परिणाम होता है, यह बतलानेके लिये कहते हैं

व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षण चित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥९॥

व्याख्या- निरोधसमाधिमें चित्तकी सम्पूर्ण वृत्तियोंका अभाव हो जानेपर भी उनके संस्कारोंका नाश नहीं होता । उस कालमें केवल संस्कार ही शेष रहते हैं, यह बात पहले पादमें कही है (योग० १ । १८) । अतः निरोधकालमें चित्त व्युत्थान और निरोध दोनों ही प्रकारके संस्कारमें व्याप्त रहता है, क्योंकि चित्त धर्मी है और संस्कार उसके धर्म हैं; धर्मी अपने धर्ममें सदैव व्याप्त रहता है यह नियम है (योग० ३ । १४) । उस निरोधकालमें जो व्युत्थानके संस्कारोंका दब जाना और निरोधसंस्कारोंका प्रकट हो जाना है तथा चित्तका निरोध संस्कारोंसे सम्बन्धित हो जाना है, यह व्युत्थानधर्मसे निरोधधर्ममें परिणत होनारूप निरोध-परिणाम है। निरोध-समाधिकी अपेक्षा सम्प्रज्ञात-समाधि
यहाँ समाधि-परिणाम और एकाग्रता-परिणामके लक्षण पहले न करके पहले निरोध-परिणामका स्वरूप बतलाया है।

इसका यह कारण मालूम होता है कि आठवें सूत्रमें निरोधसमाधिका वर्णन आ गया। इसलिये पहले निरोध-परिणामका लक्षण बतलाना आवश्यक हो गया; क्योंकि पहले (योग० १।५१ में) निरोध-समाधिका लक्षण करते हुए सब वृत्तियोंके निरोधसे निर्बीज-समाधिका होना बतलाया है। अतः उसमें परिणाम न होनेकी धारणा स्वाभाविक हो जाती है। परन्तु जबतक चित्तकी गुणोंसे भिन्न सत्ता रहती है, भी व्युत्थान-अवस्था ही है (योग० ३ । ८) । अतः उसके संस्कारोंको यहाँ व्युत्थान-संस्कारोंके ही अन्तर्गत समझना चाहिये ॥९॥

सम्बन्ध- इसके बाद क्या होता है, सो बतलाते हैं

yog darshan vibhutipaad 1-18

तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥ १०॥

व्याख्या- पहले सूत्रके कथनानुसार जब व्युत्थानके संस्कार सर्वथा दब जाते हैं और निरोधके संस्कार बढ़कर भरपूर हो जाते हैं, उस समय उस संस्कारमात्र शेष चित्तमें निरोध-संस्कारोंकी अधिकतासे केवल निर्मल. निरोध-संस्कारधारा चलती रहती है अर्थात् केवल निरोध-संस्कारोंका ही प्रवाह चलता रहता है। यह निरुद्ध चित्तका अवस्था-परिणाम है ॥ १० ॥

सम्बन्ध- अब सम्प्रज्ञात-समाधिमें चित्तका जैसा परिणाम होता है, उसका वर्णन करते हैं

सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥११॥

व्याख्या- निरोध-समाधिके पहले जब योगीका सम्प्रज्ञात योग सिद्ध होता है, उस समय चित्तकी विक्षिप्तावस्थाका क्षय होकर एकाग्र-अवस्थाका उदय हो जाता है। निर्वितर्क और निर्विचार सम्प्रज्ञात-समाधिमें केवल ध्येयमात्रका ही ज्ञान रहता है, चित्तके निज स्वरूपतकका भान नहीं रहता
वह अपने कारणमें विलीन नहीं हो जाता, तबतक उसमें परिणामी होना अनिवार्य है। इसलिये निरोध-परिणाम किस प्रकार होता है, यह जाननेकी इच्छा स्वाभाविक हो जाती है। (योग० १।४३); वह चित्तका विक्षिप्तावस्थासे एकाग्र-अवस्थामें परिणत हो जानारूप समाधि-परिणाम है ॥ ११ ॥

सम्बन्ध- उसके बादकी स्थितिका वर्णन करते हैं।

yog darshan vibhutipaad 1-18

ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रता परिणामः ॥ १२ ॥

व्याख्या- जब चित्त विक्षिप्त-अवस्थासे एकाग्र-अवस्थामें प्रवेश करता है, उस समय चित्तका जो परिणाम होता है उसका नाम समाधि-परिणाम है। जब चित्त भलीभाँति समाहित हो चुकता है, उसके बाद जो चित्तमें परिणाम होता रहता है, उसे एकाग्रता-परिणाम कहते हैं। उसमें शान्त होनेवाली वृत्ति
और उदय होनेवाली वृत्ति एक-सी ही होती है।

महाभारत तथा ज्योतिष विज्ञान

पहले कहे हुए समाधि-परिणाममें तो शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली वृत्तिमें भेद होता है, किन्तु इसमें शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली वृत्तिमें भेद नहीं होता, यही समाधि-परिणाममें और एकाग्रता-परिणाममें अन्तर है । सम्प्रज्ञात-समाधिकी प्रथम अवस्थामें समाधि परिणाम होता है और उसकी परिपक्व-अवस्थामें एकाग्रता-परिणाम होता है। इस एकाग्रता-परिणामके समय होनेवाली स्थितिको ही पहले पादमें निर्विचार-समाधिकी निर्मलताके नामसे कहा है (योग० १।४७) ॥ १२ ॥

सम्बन्ध- उपर्युक्त परिणामोंके नाम बतलाते हुए उनके उदाहरणसे अन्य समस्त वस्तुओंमें होनेवाले परिणामोंकी व्याख्या करते हैं

एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥ १३ ॥

व्याख्या- पहले नवें और दसवें सूत्रमें तो निरोध-समाधिके समय होनेवाले चित्तके धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणामका वर्णन किया गया है तथा ग्यारहवें और बारहवें सूत्रमें सम्प्रज्ञात-समाधिके समय होनेवाले चित्तके धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था परिणामका वर्णन किया गया है। इसी तरह संसारकी समस्त वस्तुओंमें ये परिणाम बराबर होते रहते हैं, क्योंकि तीनों ही गुण परिणामी हैं, अतः उनके कार्योंमें परिवर्तन होते रहना अनिवार्य है। इसलिये इस सूत्रमें यह बात कही गयी है कि ऊपरके वर्णनसे ही पाँचों भूतोंमें और समस्त इन्द्रियोंमें होनेवाले धर्म, लक्षण और अवस्था-परिणामोंको समझ लेना चाहिये। इनका भेद उदाहरणसहित समझाया जाता है।

यह ध्यानमें रखना चाहिये कि सांख्य और योगके सिद्धान्तमें कोई भी पदार्थ बिना हुए उत्पन्न नहीं होता। जो कुछ वस्तु उत्पन्न होती है, वह उत्पन्न होनेसे पहले भी अपने कारणमें विद्यमान थी और लुप्त होनेके बाद भी विद्यमान है (योग०.४ । १२)।।

yog darshan vibhutipaad 1-18

(१) धर्म-परिणाम- जब किसी धर्मीमें एक धर्मका लय होकर दूसरे धर्मका उदय होता है, उसे ‘धर्म-परिणाम’ कहते हैं। जैसे नवें सूत्र में चित्तरूप धर्मीके व्युत्थानसंस्काररूप धर्मका दब जाना और निरोधसंस्काररूप धर्मका प्रकट होना बतलाया गया है । यही धर्मों में विद्यमान रहनेवाले चित्तरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है। इसी प्रकार ग्यारहवें सूत्रमें जो सर्वार्थतारूप धर्मका क्षय और एकाग्रतारूप धर्मका उदय बतलाया गया है, यह भी चित्तरूप धर्मीका धर्म परिणाम है। इसी तरह मिट्टीमें पिण्डरूप धर्मका क्षय और घटरूप धर्मका उदय होना, फिर घटरूप धर्मका क्षय और ठीकरी. (फूटे हुए घटके टुकड़े) रूप धर्मका उदय होना-सब प्रकारके धर्मों में विद्यमान रहनेवाले मिट्टीरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है। इसी तरह अन्य समस्त वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये।

(२) लक्षण-परिणाम- यह परिणाम भी धर्म-परिणामके साथ-साथ हो जाता है। यह लक्षण-परिणाम धर्ममें होता है (योग० ४ । १२) । वर्तमान धर्मका लुप्त हो जाना उसका अतीत लक्षण-परिणाम है, अनागत धर्मका प्रकट होना उसका वर्तमान लक्षण-परिणाम है और प्रकट होनेसे पहले वह अनागत लक्षणवाला रहता है। इन तीनोंको धर्मका ‘लक्षण-परिणाम’ कहते हैं। ग्यारहवें सूत्रमें जो चित्तके सर्वार्थता-धर्मका क्षय होना बतलाया गया है, वह उसका अतीत लक्षण-परिणाम है और जो एकाग्रतारूप धर्मका उदय होना बतलाया है, वह उसका वर्तमान लक्षण-परिणाम है। उदय होनेसे पहले वह अनागत लक्षण-परिणाममें था। इसी प्रकार दूसरी वस्तुओंके परिणामोंके विषयमें भी समझ लेना चाहिये।

(३) अवस्था-परिणाम- जो वर्तमान लक्षणयुक्त धर्ममें नयापनसे पुरानापन आता-जाता हैं, वह प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है और वर्तमान लक्षणको छोड़कर अतीत लक्षणमें चला जाता है, यह लक्षणका ‘अवस्था परिणाम’ है। एकादश सूत्रके वर्णनानुसार जब चित्तरूप धर्मीका वर्तमान । लक्षणवाला सर्वार्थतारूप धर्म दबकर अतीत लक्षणको प्राप्त होता है, उस । वर्तमान कालमें जो उसके दबनेका क्रम है वह उसका अवस्था-परिणाम है
और जो एकाग्रतारूप धर्म अनागत लक्षणसे वर्तमान लक्षणमें आता है तब उसका जो उदय होनेका क्रम हैं, वह भी अवस्था-परिणाम है। दसवें सूत्रमें निरुद्ध चित्तके अवस्था-परिणामका और बारहवेंमें एकाग्रचित्तके अवस्था परिणामका वर्णन है। इस प्रकार यह एक अवस्थाको छोड़कर दूसरी अवस्थामें परिवर्तन होते जाना ही अवस्था-परिणाम है । यह अवस्था परिणाम

प्रतिक्षण होता रहता है। कोई भी त्रिगुणमय वस्तु क्षणभर भी एक अवस्थामें नहीं रहती। यही बात दसवें और बारहवें सूत्रोंमें निरोधधर्मके और एकाग्रधर्मके वर्तमान लक्षण-परिणाममें एक प्रकारके संस्कार और वृत्तियोंका क्षय और उदय बतलाकर दिखलायी गयी है। हम बालकसे जवान और जवानसें बूढ़े किसी एक दिनमें या एक घड़ीमें नहीं हुए, हमारा यह अवस्था परिणाम अर्थात् अवस्थाका परिवर्तन प्रतिक्षणमें होता हुआ ही यहाँतक पहुँचा है। इसीको अवस्था-परिणाम कहते हैं। यह परिणाम विचारद्वारा समझमें आता है, सहसा प्रतीत नहीं होता। आगे कहेंगे भी कि क्रमका ज्ञान परिणामके अवसानमें होता है (योग० ४।३३)।

धर्मपरिणाममें तो धर्मीके धर्मका परिवर्तन होता है, लक्षण-परिणाममें पहले धर्मका अतीत हो जाना और नये धर्मका वर्तमान हो जाना—इस प्रकार धर्मका लक्षण बदलता है और अवस्था-परिणाममें धर्मके वर्तमान लक्षणसे युक्त रहते हुए ही उसकी अवस्था बदलती रहती है। पहले परिणामकी अपेक्षा दूसरा सूक्ष्म है और दूसरेकी अपेक्षा तीसरा सूक्ष्म है ॥ १३॥

सम्बन्ध- धर्म और धर्मीका विवेचन करनेके लिये धर्मीका स्वरूप बतलाते हैं

शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥ १४ ॥

व्याख्या- द्रव्यमें सदा विद्यमान रहनेवाली अनेकों शक्तियोंका नाम धर्म है और उसके आधारभूत द्रव्यका नाम धर्मी है । भाव यह है कि जिस कारणरूप पदार्थसे जो कुछ बन चुका है, जो बना हुआ है और जो बन सकता है; वे सब उसके धर्म हैं, वे एक धर्मीमें अनेक रहते हैं तथा अपने-अपने निमित्तोंके मिलनेपर प्रकट और शान्त होते रहते हैं। उनके तीन भेद इस प्रकार हैं

(१) अव्यपदेश्य- जो धर्म धर्मीमें शक्तिरूपसे विद्यमान रहते हैं, व्यवहारमें आने लायक न होनेके कारण जिनका निर्देश नहीं किया जा सकता, वे ‘अव्यपदेश्य’ कहलाते हैं। इन्हींको अनागत या आनेवाले भी कहते हैं। जैसे जलमें बर्फ और मिट्टीमें बर्तन अपना व्यापार करनेके लिये प्रकट होनेसे पहले शक्तिरूपमें छिपे रहते हैं।

(२) उदित— जो धर्म पहले शक्तिरूपसे धर्मीमें छिपे हुए थे, वे जब अपना कार्य करनेके लिये प्रकट हो जाते हैं, तब ‘उदित’ कहलाते हैं। इन्हींको ‘वर्तमान’ भी कहते हैं। जैसे जलमें शक्तिरूपसे विद्यमान बर्फका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना, मिट्टीमें शक्तिरूपसे विद्यमान बर्तनोंका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना।

(३) जो धर्म अपना व्यापार पूरा करके धर्मीमें विलीन हो जाते हैं, वे ‘शान्त’ कहलाते हैं, इन्हींको ‘अतीत’ भी कहते हैं। जैसे बर्फका गलकर जलमें विलीन हो जाना और घड़ेका फूटकर मिट्टीमें विलीन हो जाना। म धर्मोकी शान्त, उदित और अव्यपदेश्य-इन तीनों स्थितियोंमें ही धर्मी सदा ही अनुगत रहता है। किसी कालमें धर्मीके बिना धर्म नहीं रहते ॥ १४ ॥

yog darshan vibhutipaad 1-18

सम्बन्ध- एक ही धर्मीके भिन्न-भिन्न अनेक धर्म-परिणाम कैसे होते हैं, यह बतलाते हैं

क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥ १५ ॥

व्याख्या- एक ही द्रव्यका किसी एक क्रमसे जो परिणाम होता है, दूसरे क्रमसे उससे भिन्न दूसरा ही परिणाम होता है। अन्य प्रकारके क्रमसे तीसरा ही परिणाम होता है। जैसे हमें रूईस वस्त्र बनाना है तो पहले रूईको धुनकर उसकी पूनी बनाकर चरखेपर कातकर उसका सूत बनाना पड़ेगा, फिर उस सूतका लम्बा ताना करेंगे, फिर उसे तानेमेंसे पार करके रोलपर चढ़ायेंगे, फिर ‘वै’ मेंसे पार करके उसके आधे तन्तुओंको ऊपर उठायेंगे, आधोंको नीचे ले जायँगे और बीचमें भरनीका सूत फेंककर उस धागेको यथास्थान बैठायेंगे, फिर ऊपरवाले धागोंको नीचे लायेंगे और नीचेवालोंको ऊपर ले जायँगे, इस तरह क्रमसे करते रहनेपर अन्तमें वस्त्ररूपमें रूईका परिणाम होगा।

पर यदि हमें उसी रूईसे दीपककी बत्ती बनानी है तो उसे कुछ फैलाकर थोड़ा बट दे देनेसे तुरंत बन जायगी और यदि कुएँ मेंसे जल निकालनेकी रस्सी बनानी है तो पहले सूत बनाकर उन धागोंको तीन या चार भागोंमें लम्बा करके बट लगानेसे रस्सी बन जायगी। इनमें भी जैसा वस्त्र या जैसी बत्ती या जिस प्रकारकी रस्सी बनानी है वैसे ही उनमें क्रमका भेद करना पड़ेगा। इसी तरह दूसरी वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये।

इससे यह सिद्ध हो गया कि क्रममें परिवर्तन करनेसे एक ही धर्मी भिन्न-भिन्न नाम-रूपवाले धर्मीसे युक्त हो जाता है, उसके परिणामकी भिन्नताका कारण क्रमकी भिन्नता ही है, दूसरा कुछ नहीं। क्रमकी भिन्नता सहकारी कारणोंके सम्बन्धसे होती है। जैसे ठंडके सम्बन्धसे जलमें बर्फरूप धर्मके प्रकट होनेका क्रम चलता और गर्मीके संयोगसे स्टीम (भाप) बननेका क्रम आरम्भ हो जाता है ॥ १५॥ बार

सम्बन्ध- उक्त संयम किस ध्येय-वस्तुमें सिद्ध कर लेनेपर उससे क्या फल मिलता है, इसका वर्णन यहाँसे इस पादकी समाप्तिपर्यन्त किया गया है। इनको ही योगकी विभूति अर्थात् भिन्न-भिन्न प्रकारका महत्त्व कहते हैं।
ऊपर तीन प्रकारके परिणामोंका वर्णन किया गया, अतः पहले इनमें संयम करनेका फल बतलाते हैं

परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ॥ १६ ॥

व्याख्या- धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणाम इस प्रकार जिन तीन परिणामोंका पहले वर्णन किया गया है, उन तीनों परिणामोंमें संयम अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि कर लेनेसे योगीको उनका साक्षात्कार होकर भूत और भविष्यका ज्ञान हो जाता है। अभिप्राय यह है कि जिस वर्तमान वस्तुके विषयमें योगी यह जानना चाहे कि इसका मूल कारण क्या है और यह किस ढंगसे बदलती हुई कितने कालमें वर्तमान रूपमें आयी है और भविष्यमें किस प्रकार बदलती हुई कितने कालमें किस प्रकार अपने कारणमें विलीन होगी? तो ये सब बातें उक्त तीनों परिणामोंमें संयम करनेसे जान सकता है ॥ १६॥

yog darshan vibhutipaad 1-18

सम्बन्ध- इसी प्रकार अब दूसरी विभूतियोंका वर्णन करते हैं

शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभाग संयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥ १७॥

व्याख्या- वस्तुके नाम, रूप और ज्ञान-यह तीनों यद्यपि परस्पर भिन्न हैं, जैसे घट यह शब्द मिट्टीसे बने हुए जिस पदार्थका संकेत करता है, उस पदार्थसे सर्वथा भिन्न वस्तु है। इसी प्रकार उस घटरूप पदार्थकी जो प्रतीति होती है, वह चित्तकी वृत्तिविशेष है। अतः वह भी घटरूप पदार्थसे सर्वथा भिन्न वस्तु है, क्योंकि शब्द वाणीका धर्म है, घटरूप पदार्थ मिट्टीका धर्म है और वृत्ति चित्तका धर्म है तथापि तीनोंका परस्पर अभ्यासके कारण मिश्रण हुआ रहता है। अतः जब योगी विचारद्वारा इनके विभागको समझकर उस विभागमें संयम कर लेता है, तब उसको समस्त प्राणियोंकी वाणीके अर्थका ज्ञान हो जाता है ॥ १७॥

संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् ॥ १८॥

व्याख्या- प्राणी जो कुछ कर्म करता है एवं अपने इन्द्रियों और मन-बुद्धिद्वारा जो कुछ अनुभव करता है, वे सब उसके अन्तःकरणमें संस्काररूपमें संचित रहते हैं। उक्त संस्कार दो प्रकारके होते हैं-एक वासनारूप, जो कि स्मृतिके कारण हैं. दूसरे धर्माधर्मरूप जो कि जाति, आयु
और भोगके कारण हैं, ये दोनों ही प्रकारके संस्कार अनेक जन्म-जन्मान्तरोंसे संगृहीत होते आ रहे हैं (योग० २ । १२, ४।८ से ११)। उन संस्कारोंमें संयम करके उनको प्रत्यक्ष कर लेनेसे योगीको पूर्वजन्मका ज्ञान हो जाता है। जैसे अपने पूर्व संस्कारोंके साक्षात्कारसे अपने पूर्वजन्मका ज्ञान होता है,
उसी प्रकार दूसरेके संस्कारोंमें संयम करनेसे उसके पूर्वजन्मका भी ज्ञान हो सकता है ॥ १८॥

yog darshan vibhutipaad 1-18

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

Categories
yog darshan

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥ ३६॥

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

वाल्मीकीय रामायणवनकाण्डमें अगस्त्याश्रमके वर्णनमें आता है
यदाप्रभृति चाक्रान्ता दिगियं पुण्यकर्मणा। तदाप्रभृति निर्वैराः – प्रशान्ता रजनीचराः॥ अयं दीर्घायुषस्तस्य लोके विश्रुतकर्मणः।
अगस्त्यस्याश्रमः श्रीमान् विनीतमृगसेवितः ॥ नात्र जीवन्मृषावादी क्रूरो वा यदि वा शठः। नृशंसः पापवृत्तो वा मुनिरेष तथाविधः ।।
(सर्ग ११ । ८३, ८६, ९०) तुलसीकृत रामायणके अयोध्याकाण्डमें भी आया है खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।
(वाल्मीकि-आश्रमवर्णन) तथा बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा ॥ (चित्रकूटवर्णन) सत्यप्रतिष्ठायाम्-सत्यकी दृढ़स्थिति हो जानेपर (योगीमें); क्रिया फलाश्रयत्वम्-क्रियाफलके आश्रयका भाव (आ जाता है)।

व्याख्या- जब योगी सत्यका पालन करनेमें पूर्णतया परिपक्व हो जाता है, उसमें किसी प्रकारकी कमी नहीं रहती, उस समय वह योग कर्तव्यपालन रूप क्रियाओंके फलका आश्रय बन जाता है। जो कर्म किसीने नहीं किया है, उसका भी फल उसे प्रदान कर देनेकी शक्ति उस योगीमें आ जाती है, अर्थात् जिसको जो वरदान, शाप या आशीर्वाद देता है, वह सत्य हो जाता है ॥ ३६॥

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥३७॥

व्याख्या- जब साधकमें चोरीका अभाव पूर्णतया प्रतिष्ठित हो जाता है, तब पृथ्वीमें जहाँ कहीं भी गुप्त स्थानमें पड़े हुए समस्त रत्न उसके सामने
प्रकट हो जाते हैं अर्थात् उसकी जानकारीमें आ जाते हैं ॥३७॥

ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥३८॥

व्याख्या- जब साधकमें ब्रह्मचर्यकी पूर्णतया दृढ़ स्थिति हो जाती है, तब उसके मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरमें अपूर्व शक्तिका प्रादुर्भाव हो जाता है, साधारण मनुष्य किसी काममें भी उसकी बराबरी
नहीं कर सकते ॥ ३८॥

अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः ॥ ३९॥

व्याख्या- जब योगीमें अपरिग्रहका भाव पूर्णतया स्थिर हो जाता है, तब उसे अपने पूर्वजन्मोंकी और वर्तमान जन्मकी सब बातें मालूम हो जाती हैं अर्थात् मैं पहले किस योनिमें हुआ था, मैंने उस समय क्या-क्या काम किये, किस प्रकार रहा ये सब स्मरण हो जाते हैं और इस जन्मकी भी बीती हुई सब बातें स्मरण हो जाती हैं। यह ज्ञान भी संसारमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाला और जन्म-मरणसे छुटकारा पानेके लिये योगसाधनमें प्रवृत्त करनेवाला है। जीत
यहाँतक यमोंकी सिद्धिका जो फल बतलाया गया है, उसके सिवा निष्कामभावसे यमोंका सेवन करनेसे कैवल्यकी प्राप्तिमें भी सहायता मिलती
है ॥ ३९॥

सम्बन्ध- अब नियमोंके पालनका फल बतलाते हैं; परंतु इन सूत्रोंमें पूर्णप्रतिष्ठाकी शर्त नहीं रखी गयी है। इससे यह मालूम होता है कि साधक इनका जितना पालन करता है, उतना ही उसे लाभ मिलता चला जाता है। सबसे पहले अगले सूत्रमें बाह्य शौचका फल बतलाते हैं

शौचात्स्वाङजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

व्याख्या- बाह्य शुद्धिके पालनसे साधककी अपने शरीरमें अपवित्र बद्धि होकर उसमें वैराग्य हो जाता है अर्थात् उसमें आसक्ति नहीं रहती और दूसरे सांसारिक मनुष्योंके साथ संसर्ग करनेकी इच्छा नहीं रहती अर्थात उनके सङ्गमें भी प्रवृत्ति या आसक्ति नहीं रहती ॥ ४० ॥

सम्बन्ध- भीतरकी शुद्धिका फल बतलाते हैं

सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ॥४१॥

व्याख्या- मैत्री आदिकी भावनाके द्वारा अथवा जप, तप आदि अन्य किसी साधनद्वारा आन्तरिक शौचके लिये अभ्यास करनेसे. राग-द्वेष, ईर्ष्या आदि मलोंका अभाव होकर मनुष्यका अन्तःकरण निर्मल और स्वच्छ हो जाता है। मनकी व्याकुलताका नाश होकर उसमें सदैव प्रसन्नता बनी रहती है; विक्षेप-दोषका नाश होकर एकाग्रता आ जाती है और सब इन्द्रियाँ मनके वशमें हो जाती हैं, अतः उसमें आत्मदर्शनकी योग्यता आ जाती है।
इस प्रकार इसके ऊपरवाले सूत्रमें तो बाह्य शौचका फल बतलाया गया है और इसमें भीतरकी शुद्धिका फल बतलाया गया है ॥४१॥

संतोषादनुत्तमसुखलाभः ॥४२॥

व्याख्या- संतोषसे अर्थात् चाहरहित होनेपर जो अनन्त सुख मिलता है, उसकी बराबरी दूसरा कोई सांसारिक सुख नहीं कर सकता। वह ही ‘ सर्वोत्तम सुख है ॥ ४२ ॥

कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥४३॥
yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

व्याख्या- स्वधर्म-पालनके लिये व्रत-उपवास आदि करने या अन्य सब प्रकारके कष्ट सहन करनेका नाम ‘तप’ है (योग० २।१ की टीका) । इसके अभ्याससे शरीर और इन्द्रियोंके मलका नाश हो जाता है, तब योगीका शरीर स्वस्थ, स्वच्छ और हलका हो जाता है तथा तीसरे पादके पैंतालीसवें और छियालीसवें सूत्रमें बतलायी हुई काय-सम्पद्प शरीर-सम्बन्धी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं एवं सूक्ष्म, दूर देशमें और व्यवधानयुक्त स्थानमें स्थित विषयोंको देखना, सुनना आदि इन्द्रियसम्बन्धी सिद्धि भी प्राप्त हो जाती है ॥४३॥

स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥४४॥

व्याख्या- शास्त्राभ्यास, मन्त्रजप और अपने जीवनका अध्ययनरूप स्वाध्यायके प्रभावसे योगी जिस इष्टदेवका दर्शन करना चाहता है, उसीका दर्शन हो जाता है ।। ४४ ॥

समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥ ४५ ॥

महाभारत तथा पर्यावरण विज्ञान

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

व्याख्या- ईश्वरकी शरणागतिसे योगसाधनमें आनेवाले विघ्नोंका नाश होकर शीघ्र ही समाधि निष्पन्न हो जाती है (योग० १ । २३), क्योंकि ईश्वरपर निर्भर रहनेवाला साधक तो केवल तत्परतासे साधन करता रहता है, उसे साधनके परिणामकी चिन्ता नहीं रहती। उसके साधनमें आनेवाले विघ्नोंको दूर करनेका और साधनकी सिद्धिका भार ईश्वरके जिम्मे पड़ जाता है, अतः साधनका अनायास और शीघ्र पूर्ण होना स्वाभाविक ही है ॥ ४५ ॥

सम्बन्ध- यहाँतक यम और नियमोंका फलसहित वर्णन किया गया; अब आसनके लक्षण, उपाय और उसका फल क्रमसे बतलाते हैं

स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥

व्याख्या- हठयोगमें आसनोंके बहुत भेद बतलाये गये हैं, परंतु यहाँ सूत्रकारने उनका वर्णन नहीं करके बैठनेका तरीका साधककी इच्छापर ही छोड़ दिया है। भाव यह है कि जो साधक अपनी योग्यताके अनुसार जिस रीतिसे बिना हिले-डुले स्थिरभावसे सुखपूर्वक बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके बहुत समयतक बैठ सके वही आसन उसके लिये उपयुक्त है। इसके सिवा,
जिसपर बैठकर साधन किया जाता है, उसका नाम भी आसन है; अतः वह .
भी स्थिर और सुखपूर्वक बैठनेलायक होना चाहिये ॥ ४६॥

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

व्याख्या- शरीरको सीधा और स्थिर करके सुखपूर्वक बैठ जानेके बाद शरीर-सम्बन्धी सब प्रकारकी चेष्टाओंका त्याग कर देना ही प्रयत्नकी शिथिलता . है, इससे और परमात्मामें मन लगानेसे-इन दो उपायोंसे आसनकी सिद्धि होती है।

यहाँ बहुत-से टीकाकारोंने अनन्तका अर्थ शेषनाग और समापत्तिका अर्थ समाधि किया है। भोजराजने अनन्तका अर्थ आकाशादि किया है और समापत्तिका अर्थ चित्तका तद्रूप हो जाना किया है; किंतु योगके अङ्गोंमें समाधि अन्तिम अङ्ग है, उसीके लिये आसन आदि अङ्गोंका अनुष्ठान है।
आसनको समाधिका बहिरंग साधन भी बतलाया गया है। अतः किसी प्रकारकी भी समाधिको आसनकी स्थिरताका उपाय बतलाना युक्तिसंगत नहीं होता। सज्जन विद्वान् अनुभवी महानुभाव इसपर विचार करें ॥४७॥

ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥

व्याख्या- आसन-सिद्धि हो जानेसे शरीरपर सर्दी, गर्मी आदि द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता, शरीरमें उन सबको बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके सहन करनेकी शक्ति आ जाती है। अतः वे द्वन्द्व चित्तको चञ्चल बनाकर साधनमें विघ्न नहीं डाल सकते ॥४८॥

सम्बन्ध- अब प्राणायामका सामान्य लक्षण बतलाते हैं

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥

व्याख्या- प्राणवायुका शरीरमें प्रविष्ट होना श्वास है और बाहर निकलना प्रश्वास है। इन दोनोंकी गतिका रुक जाना अर्थात् प्राणवायुकी गमनागमनरूप क्रियाका बंद हो जाना ही प्राणायामका सामान्य लक्षण है।
यहाँ आसनकी सिद्धिके बाद प्राणायामका सम्पन्न होना बतलाया है। इसमें यह प्रतीत होता है कि आसनकी स्थिरताका अभ्यास किये बिना ही जो प्राणायाम करते हैं, वे गलत रास्तेंपर हैं। प्राणायामका अभ्यास करते समय
आसनकी स्थिरता परम आवश्यक है ॥४९॥

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

सम्बन्ध- उक्त प्राणायामके भेदोंको समझानेके लिये तीन प्रकारके प्राणायामोंका वर्णन करते हैं

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥५०॥

व्याख्या- अगले सूत्रमें जिस प्राणायामके लक्षण किये गये हैं उसे
चौथा प्राणायाम बतलाया है। इससे यह सिद्ध होता है कि इस सूत्रमें तीन प्रकारके प्राणायामोंका वर्णन है और उन तीनों प्रकारके ही प्राणायामोंको साधक देश, काल और संख्याद्वारा देखता रहता है कि वे किस अवस्थातक पहुँच चुके हैं। इस प्रकार परीक्षा करते-करते वे प्राणायाम जैसे-जैसे उन्नत होते जाते हैं वैसे-ही-वैसे उनमें लम्बाई और हलकापन बढ़ता चला जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्तम्भवृत्तिरूप तृतीय प्राणायाममें भी देशका सम्बन्ध रहता है, अन्यथा वह देश, काल और संख्याद्वारा परिदृष्ट कैसे होगा? प्राणायामके तीन भेदोंको इस प्रकार समझना चाहिये।

(१) बाह्यवृत्ति- प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालकर बाहर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रहना और साथ-ही-साथ इस बातकी भी परीक्षा करते रहना कि वह बाहर आकर कहाँ ठहरा है, कितने समयतक ठहरा है और उतने समयमें स्वाभाविक प्राणकी गतिकी कितनी संख्या होती है। यह ‘बाह्यवृत्ति’ प्राणायाम है, इसे रेचक’ भी कहते हैं; क्योंकि इसमें रेचनपूर्वक प्राणको रोका जाता है । अभ्यास करते-करते यह दीर्घ (लम्बा) अर्थात् बहुत कालतक रुके रहनेवाला और सूक्ष्म अर्थात् हलका अनायास साध्य हो,जाता है।

(२) आभ्यन्तरवृत्ति- प्राणवायुको भीतर ले जाकर भीतर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रहना और साथ-ही-साथ यह देखते रहना कि आभ्यन्तर देशमें कहाँतक जाकर प्राण रुकता है; वहाँ कितने कालतक सुखपूर्वक ठहरता है और उतने समयमें प्राणकी स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है। यह ! आभ्यन्तर’ प्राणायाम है; इसे ‘पूरक’ प्राणायाम भी कहते हैं; क्योंकि इसमें शरीरके अंदर ले जाकर प्राणको रोका जाता है। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता जाता है।

(३) स्तम्भवृत्ति- शरीरके भीतर जाने और बाहर निकलनेवाली जो प्राणोंकी स्वाभाविक गति है, उसे प्रयत्नपूर्वक बाहर या भीतर निकलने या ले
जानेका अभ्यास न करके प्राणवायु स्वभावसे बाहर निकला हो या भीतर गया हो, जहाँ हो, वहीं उसकी गतिको स्तम्भित कर देना (रोक देना) और यह देखते रहना कि प्राण किस देशमें रुके हैं, कितने समयतक सुखपूर्वक रुके रहते हैं, इस समयमें स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है, यह ‘स्तम्भवृत्ति’ . प्राणायाम है; इसे ‘कुम्भक’ प्राणायाम भी कहते हैं। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता है। कोई-कोई टीकाकार इसे केवल ‘कुम्भक’ कहते हैं और कोई-कोई चौथे प्राणायामको केवल कुम्भक कहते हैं । इस तीसरे और अगले सूत्रमें बतलाये हुए चौथे प्राणायामके भेदका निर्णय करनेमें बहुत मतभेद है।
– साधक किसी भी प्राणायामका अभ्यास करें, उसके साथ मन्त्र अवश्य रहना चाहिये ॥ ५० ॥

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

सम्बन्ध- चौथे प्राणायामका वर्णन करते हैं

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥ ५१ ॥

व्याख्या- बाहर और भीतरके विषयोंके चिन्तनका त्याग कर देनेसे अर्थात इस समय प्राण बाहर निकल रहे हैं या भीतर जा रहे हैं अथवा चल रहे हैं कि ठहरे हुए हैं, इस जानकारीका त्याग करके मनको इष्टचिन्तनमें लगा देनेसे देश, काल और संख्याके ज्ञानके बिना ही अपने-आप जो प्राणोंकी गति जिस-किसी देशमें रुक जाती है; वह चौथा प्राणायाम है । यह पहले बतलाये हुए तीन प्रकारके प्राणायामोंसे सर्वथा भिन्न है, यह बात दिखलानेके लिये

सूत्रमें ‘चतुर्थः’ पदका प्रयोग किया गया है। कि
यह अनायास होनेवाला राजयोगका प्राणायाम है। इसमें मनकी चञ्चलता शान्त होनेके कारण अपने-आप प्राणोंकी गति रुकती है और पहले बतलाये हुए प्राणायामोंमें प्रयत्नद्वारा प्राणोंकी गतिको रोकनेका अभ्यास करते करते प्राणोंकी गतिका निरोध होता है, यही इसकी विशेषता है ॥ ५१ ॥

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥ ५२ ॥

व्याख्या- जैसे-जैसे मनुष्य प्राणायामका अभ्यास करता है, वैसे-ही वैसे उसके संचित कर्म-संस्कार और अविद्यादि क्लेश दुर्बल होते चले जाते हैं। ये कर्म, संस्कार और अविद्यादि क्लेश ही ज्ञानका आवरण (परदा) है। इस परदेके कारण ही मनुष्यका ज्ञान ढका रहता है, अतः वह मोहित हुआ रहता है। जब यह परदा दुर्बल होते-होते सर्वथा क्षीण हो जाता है, तब साधकका ज्ञान सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो जाता है (गीता ५। १६)। इसलिये साधकको प्राणायामका अभ्यास अवश्य करना चाहिये ।। ५२ ॥

सम्बन्ध- प्राणायामका दूसरा फल बतलाते हैं

धारणासु च योग्यता मनसः ॥ ५३॥

व्याख्या- प्राणायामके अभ्याससे मनमें धारणाकी योग्यता भी आ जाती है, यानी उसे चाहे जिस जगह अनायास ही स्थिर किया जा सकता है ।। ५३॥

सम्बन्ध-अब प्रत्याहारके लक्षण बतलाते हैं

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां
प्रत्याहारः ॥ ५४॥

व्याख्या- उक्त प्रकारसे प्राणायामका अभ्यास करते-करते मन और इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाते हैं, उसके बाद इन्द्रियोंकी बाह्यवृत्तिको सब ओरसे समेटकर मनमें विलीन करनेके अभ्यासका नाम ‘प्रत्याहार’ है। जब साधनकालमें साधक इन्द्रियोंके विषयोंका त्याग करके चित्तको अपने ध्येयमें लगाता है, उस समय जो इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर न जाकर चित्तमें विलीन-सा हो जाना है, यह प्रत्याहार सिद्ध होनेकी पहचान है। यदि उस समय भी इन्द्रियाँ पहलेके अभ्याससे इसके सामने बाह्य विषयोंका चित्र उपस्थित करती रहें तो समझना चाहिये कि प्रत्याहार नहीं हुआ। उपनिषदोंमें भी ‘वाक्’ शब्दसे उपलक्षित इन्द्रियोंको मनमें निरुद्ध करनेकी बात कहकर यही भाव दिखलाया है॥ ५४॥

सम्बन्ध- अब प्रत्याहारका फल बतलाकर इस द्वितीय पादकी समाप्ति करते हैं

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥ ५५ ॥

व्याख्या- प्रत्याहार सिद्ध हो जानेपर योगीकी इन्द्रियाँ उसके सर्वथा वशमें हो जाती हैं, उनकी स्वतन्त्रताका सर्वथा अभाव हो जाता है। प्रत्याहारकी सिद्धि हो जानेके बाद इन्द्रिय-विजयके लिये अन्य साधनकी आवश्यकता नहीं रहती ॥ ५५ ॥

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः। (कठ० १।३।१३) . ‘बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह वाक आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनमें विलीन कर दे अर्थात् इनकी ऐसी स्थिति कर दे कि इनकी कोई भी क्रिया न हो मनमें विषयोंकी स्फुरणा न रहे।

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

Categories
yog darshan

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध-उक्त दृश्यके भेदोंका वर्णन अपने ग्रन्थकी परिभाषामें करते हैं

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥ १९॥

व्याख्या- (१) विशेष-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश-ये पाँच स्थूल भूत तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मनः—इस प्रकार सब मिलकर सोलहोंका नाम ‘विशेष’ है। गुणोंके विशेष धर्मोकी अभिव्यक्ति (प्रकटता) इन्हींसे होती है, इसलिये इनको विशेष कहते हैं। सांख्यकारिकामें इनका नाम विकार रखा है (सां. का० ३).

(२) अविशेष-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-ये पाँच तन्मात्राएँ हैं, इन्हींको सूक्ष्म महाभूत भी कहते हैं, क्योंकि ये स्थूल पञ्च महाभूतोंके कारण हैं तथा छठा अहंकार जो कि मन और इन्द्रियोंका कारण है, इन छहोंका नाम ‘अविशेष’ है। इनका स्वरूप इन्द्रियगोचर नहीं है, इसलिये इनको ‘अविशेष’ कहते हैं।

(३) लिङ्गमात्र- उपर्युक्त बाईस तत्त्वोंका कारणभूत जो महत्तत्त्व है, जिसका वर्णन उपनिषदोंमें और गीतामें बुद्धिके नामसे किया गया है, (कठ० १।३ । १०; गीता १३ । ५) उसका नाम ‘लिङ्गमात्र’ है। इसकी उपलब्धि केवल सत्तामात्रसे ही होती है, इस कारण इसको ‘लिङ्गमात्र’ कहते हैं। ..

(४) अलिङ्ग- मूल प्रकृति, (सां० का?). जो, कि तीनों गुणोंकी साम्यावस्था मानी गयी है, महत्तत्त्व जिसका पहला परिणाम (कार्य) है, उपनिषद्
और गीतामें जिसका वर्णन अव्यक्त नामसे किया गया है (कठ० १।३ । ११; गीता १३ । ५) उसका नाम ‘अलिङ्ग’ है । साम्यावस्थाको प्राप्त गुणोंके स्वरूपकी अभिव्यक्ति नहीं होती, इसलिये प्रकृतिको चिह्नरहित (अव्यक्त) कहते हैं।

इस प्रकार चार अवस्थाओंमें विद्यमान रहनेवाले ये सत्त्वादि गुण ही दृश्य नामसे कहे गये हैं ॥ १९ ॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध-अब द्रष्टाके स्वरूपका वर्णन करते हैं

द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥२०॥

व्याख्या- केवल चेतनमात्र ही जिसका स्वरूप है, ऐसा आत्मतत्त्व स्वरूपसे सर्वथा शुद्ध, निर्विकार है तो भी बुद्धिके सम्बन्धसे बुद्धिवृत्तिके अनुरूप देखनेवाला होनेसे ‘द्रष्टा’ कहलाता है।

वास्तवमें द्रष्टा पुरुष (आत्मतत्त्व) सर्वथा शुद्ध, निर्विकार, कूटस्थ, असङ्ग है तथापि इसका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ अनादिसिद्ध अविद्यासे माना जाता है। जबतक उस अविद्याके नाशद्वारा यह प्रकृतिसे अलग होकर अपने असली स्वरूपमें स्थित नहीं हो जाता तबतक बुद्धिके साथ एकताको प्राप्त हुआ-सा बुद्धिकी वृत्तियोंको देखता रहता है और जबतक उनको देखता है, तभीतक इसकी ‘द्रष्टा’ संज्ञा है। दृश्यका सम्बन्ध न रहनेपर द्रष्टा किसका? फिर तो यह केवल चेतनमात्र, सर्वथा शुद्ध और निर्विकार है ही ॥ २० ॥

सम्बन्ध-दृश्य और द्रष्टाके स्वरूपका वर्णन करनेके बाद अब दृश्यके स्वरूपकी सार्थकताका प्रतिपादन करते हैं

तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥ २१॥

व्याख्या- उक्त द्रष्टाको अपने दर्शनद्वारा भोग प्रदान करनेके लिये और द्रष्टाके निज स्वरूपका दर्शन कराकर अपवर्ग (मुक्ति) प्रदान करनेके लिये इस प्रकार पुरुषका प्रयोजन सिद्ध करनेके लिये ही दृश्य है। इसी में उसके होनेकी सार्थकता है। अठारहवें सूत्रमें दृश्यके लक्षणोंका वर्णन करते समय भी यही बात कही गयी है ।। २१ ।

सम्बन्ध-पुरुषको अपवर्ग प्रदान कर देनेके बाद प्रकृतिका कोई कार्य शेष नहीं रहता, फिर उसका बना रहना निरर्थक है; अतः उसका अभाव हो जाना चाहिये इसपर कहते हैं

कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ॥ २२ ॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

व्याख्या- प्रकृतिका प्रयोजन किसी एक ही पुरुषके लिये भोग और अपवर्ग प्रदान करना नहीं है, वह तो सभी पुरुषोंके लिये समान है। अतः जिसका कार्य वह कर चुकी, उस कृतार्थ-मुक्त पुरुषके लिये उसकी आवश्यकता न रहनेके कारण यद्यपि वह उसके लिये नष्ट हो जाती है, तो भी दूसरे सब जीवोंको भोग और अपवर्ग प्रदान करना तो शेष है ही। इसलिये उसका सर्वथा नाश नहीं होता, वह विद्यमान रहती है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि प्रकृति परिणामी होनेपर भी अनादि और नित्य है। यहाँ जो मुक्त पुरुषके लिये उसका नष्ट होना बतलाया गया है, वह भी अदृश्य होना ही .. बतलाया गया है; क्योंकि योगके सिद्धान्तमें किसी भी वस्तुका सर्वथा अभाव नहीं माना गया है ।। २२ ॥

सम्बन्ध-अब संयोगके स्वरूपका वर्णन करते हैं

स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥२३॥

व्याख्या- दृश्यका स्वरूप द्रष्टाके ही लिये है, यह बात पहले कह आये हैं, इसी भावको लेकर इस सूत्रमें पुरुषको प्रकृतिका स्वामी बतलाया है
और प्रकृतिको पुरुषका ‘स्व’ अर्थात् अपना यानी अधिकृत पदार्थ कहा है। उस प्रकृतिके साथ पुरुषका सम्बन्ध उन दोनोंके स्वरूपको जाननेके लिये ही है, अतः उस दर्शन (ज्ञान) शक्तिसे जबतक मनुष्य इस प्रकृतिके नाना रूपोंको देखता रहता है, तबतक तो भोगोंको भोगता रहता है। जब इनके : दर्शनसे विरक्त होकर अपने स्वरूप-दर्शनकी ओर झाँकता है, तब स्वरूपका दर्शन हो जाता. है (योग० ३ । ३५) । फिर संयोगकी कोई आवश्यकता न रहनेसे उसका अभाव हो जाता है । यही पुरुषकी कैवल्य’ अवस्था है (योग०३ । ३४) ॥ २३ ।।

सम्बन्ध-अब उक्त संयोगका कारण बतलाते हैं

तस्य हेतुरविद्या ॥ २४ ॥

व्याख्या- सर्वथा निर्विकार असङ्ग चेतन पुरुषका जो यह जड प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है यह अनादिसिद्ध अविद्यासे ही है, वास्तवमें नहीं है।
यहाँ अविद्या विपर्ययवृत्तिका नाम नहीं है, किंतु अपने स्वरूपके अनादिसिद्ध अज्ञानका नाम अविद्या है। इसीलिये अपने स्वरूपके ज्ञानसे इसका नाश हो जाता है और उसके बाद प्रयोजन न रहनेपर वह ज्ञान भी शान्त हो जाता है। यही पुरुषका ‘कैवल्य’ है ।। २४ ॥

सम्बन्ध-अब कारणसहित संयोगके अभावसे सिद्ध होनेवाले सर्वथा दुःखनाशरूप ‘हान’का वर्णन करते हैं

तदभावात्संयोगाभावो हानं तदृशेः कैवल्यम् ॥ २५ ॥

व्याख्या- जब आत्मदर्शनरूप ज्ञानसे अविद्याका यानी अज्ञानका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब अज्ञानजनित संयोगका भी अपने-आप अभाव हो जाता है, फिर पुरुषका प्रकृतिसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता और उसके जन्म-मरण आदि सम्पूर्ण दुःखोंका सदाके लिये अत्यन्त अभाव हो जाता है तथा पुरुष अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है—यही उसका कैवल्य अर्थात् सर्वथा अकेलापन है ॥२५॥

सम्बन्ध-अब उक्त दुःखोंके अत्यन्त अभावरूप ‘हान’का उपाय बतलाते हैं

विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२६॥
yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

अथ योगानुशासनम्॥१॥

व्याख्या- प्रकृति तथा उसके कार्य-बुद्धि, अहंकार, इन्द्रियाँ और शरीर-इन सबके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेसे तथा आत्मा इनसे सर्वथा भिन्न और असङ्ग है, आत्माका इनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, इस प्रकार पुरुषके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे जो प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका अलग-अलग यथार्थ ज्ञान होता है,

इसीका नाम ‘विवेकज्ञान’ है (योग ३। ५४) । उस समय चित्त विवेकज्ञानमें निमग्न और कैवल्यके अभिमुख रहता है। यह ज्ञान जब समाधिकी निर्मलता-स्वच्छता होनेपर पूर्ण और निश्चल हो जाता है, उसमें किसी प्रकारका भी मल नहीं रहता (योग) ४ । ३१), तब वह अविप्लव विवेकज्ञान कहलाता है। ऐसा विवेकज्ञान ही समस्त दुःखोंके अत्यन्त अभावरूप मुक्तिका उपाय है। इससे संसारके बीज अविद्यादि क्लेशोंका और समस्त कर्मोंका सर्वथा अभाव हो जाता है (योग ४। ३०)।

उसके बाद चित्त अपने आश्रयरूप-महत्तत्त्व आदिके सहित अपने कारणमें विलीन हो जाता है तथा प्रकृतिका जो स्वाभाविक परिणाम-क्रम है, वह उसके लिये बंद हो जाता है
(योग० ४।३२) ॥२६॥

सम्बन्ध-उक्त विवेकज्ञानके समय साधककी बुद्धि किस प्रकारकी होती है, यह बतलाते हैं

तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥ २७॥

व्याख्या- जब निर्मल और अचल विवेकख्यातिके द्वारा योगीके चित्तका आवरण और मल सर्वथा नष्ट हो जाता है (योग० ४।३१) उस समय उस चित्तमें दूसरे सांसारिक ज्ञानोंका उदय नहीं होता। अतः सात प्रकारकी उत्कर्ष अवस्थावाली प्रज्ञा (बुद्धि) उत्पन्न होती है । उनमें पहली चार प्रकारकी तो कार्यविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस कारण वे ‘कार्यविमुक्तिप्रज्ञा’ कहलाती हैं और अन्तकी तीन चित्तविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस कारण उनका नाम ‘चित्तविमुक्तिप्रज्ञा’ है। कार्यविमुक्तिप्रज्ञा यानी कर्तव्यशून्य अवस्थाके चार भेद इस प्रकार हैं

(१) ज्ञेयशून्य अवस्था- जो कुछ जानना था जान लिया; अब कुछ भी जानना शेष नहीं रहा अर्थात् जितना गुणमय दृश्य है (योग० २ । १८, १९), वह सब अनित्य और परिणामी है यह पूर्णतया जान लिया।

(२) हेयशून्य अवस्था- जिसका अभाव करना था, उसका अभाव कर दिया; अर्थात् द्रष्टा और दृश्यके संयोगका, जो कि हेयका हेतु है, अभाव कर दिया, अब कुछ भी अभाव करनेयोग्य शेष नहीं रहा।

(३) प्राप्यप्राप्त अवस्था— जो कुछ प्राप्त करना था, प्राप्त कर लिया अर्थात् समाधिद्वारा केवल अवस्थाकी प्राप्ति हो चुकी; अतः अब कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहा।

(४) चिकीर्षाशून्य अवस्था- जो कुछ करना था, कर लिया अर्जत हानका उपाय जो निर्मल और अचल विवेकज्ञान है, उसे सिद्ध कर लिया
अब और कुछ करना शेष नहीं रहा।

चित्तविमुक्तिप्रज्ञाके तीन भेद इस प्रकार हैं

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

(१) चित्तकी कृतार्थता- चित्तने अपना अधिकार ‘भोग और अपने देना पूरा कर दिया, अब उसका कोई प्रयोजन शेष नहीं रहा।

(२) गुणलीनता- चित्त अपने कारणरूप गुणोंमें लीन हो रहा है. क्योंकि अब उसका कोई कार्य शेष नहीं रहा।

(३) आत्मस्थिति- पुरुष सर्वथा गुणोंसे अतीत होकर अपने स्वरूपमें अचल भावसे स्थित हो गया।

इस सात प्रकारकी प्रान्तभूमिप्रज्ञाको अनुभव करनेवाला योगी कुशल . (जीवन्मुक्त) कहलाता है और चित्त जब अपने कारणमें लीन हो जाता है,
तब भी कुशल (विदेहमुक्त) कहलाता है ॥ २७॥

सम्बन्ध-अब उक्त निर्मल विवेकज्ञानकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं

योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥ २८॥

व्याख्या- आगे बतलाये जानेवाले योगके आठ अङ्गोंका अनुष्ठान करनेसे अर्थात् उनको आचरणमें लानेसे चित्तके मलका अभाव होकर वह सर्वथा निर्मल हो जाता है, उस समय योगीके ज्ञानका प्रकाश विवेकख्यातितक हो जाता है अर्थात् उसे आत्माका स्वरूप, बुद्धि, अहंकार और इन्द्रियोंसे सर्वथा भिन्न प्रत्यक्ष दिखलायी देता है ॥ २८॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध- उक्त योगाङ्गोंके नाम और उनकी संख्या बतलाते हैं

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयो ऽष्टावङ्गानि ॥ २९॥

व्याख्या- इन आठोंके लक्षण और फलोंका वर्णन अगले सूत्रोंमें स्वयं सूत्रकारने ही किया है, अतः यहाँ विस्तारकी आवश्यकता नहीं है ॥ २९॥

सम्बन्ध- पहले यमोंका वर्णन करते हैं

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥३०॥

व्याख्या- (१) अहिंसा-मन, वाणी और शरीरसे किसी प्राणीको कभी किसी प्रकार किंचिन्मात्र भी दुःख न देना ‘अहिंसा’ है, परदोष-दर्शनका सर्वथा त्याग भी इसीके अन्तर्गत है।

(२) सत्य-इन्द्रिय और मनसे प्रत्यक्ष देखकर, सुनकर या अनुमान करके जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा-का-वैसा ही भाव प्रकट करनेके लिये प्रिय और हितकर तथा दूसरेको उद्वेग उत्पन्न न करनेवाले जो वचन बोले जाते हैं, उनका नाम ‘सत्य’ है। इसी प्रकार कपट और छलरहित व्यवहारका नाम सत्यव्यवहार समझना चाहिये।

(३) अस्तेय- दूसरेके स्वत्वका अपहरण करना, छलसे या अन्य , किसी उपायसे अन्यायपूर्वक अपना बना लेना ‘स्तेय’ (चोरी) है, इसमें सरकारकी टैक्सकी चोरी और घूसखोरी भी सम्मिलित है; इन सब प्रकारकी चोरियोंके अभावका नाम ‘अस्तेय’ है।

(४) ब्रह्मचर्य- मन, वाणी और शरीरसे होनेवाले सब प्रकारके मैथुनोंका सब अवस्थाओंमें सदा त्याग करके सब प्रकारसे वीर्यकी रक्षा करना ‘ब्रह्मचर्य’ है।

अतः साधकको चाहिये कि न तो कामदीपन करनेवाले पदार्थोंका सेवन करे, न ऐसे दृश्योंको देखे, न ऐसी बातोंको सुने, न ऐसे साहित्यको पढ़े और न ऐसे विचारोंको ही मनमें लावे तथा स्त्रियोंका और स्त्री आसक्त पुरुषोंका संग भी ब्रह्मचर्यमें बाधक है, अतः ऐसे संगसे सदा सावधानीके साथ अलग रहे।

(५) अपरिग्रह- अपने स्वार्थके लिये ममतापूर्वक धन, सम्पत्ति
कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा। सर्वत्र मैथुनत्यागी ब्रह्मचर्य प्रचक्षते ॥
(गरुड० पूर्व आचार० २३८ । ६) और भोग-सामग्रीका संचय करना ‘परिग्रह’ है, इसके अभावका नाम ‘अपरिग्रह’ है ॥ ३०॥

सम्बन्ध-उक्त यमोंकी सबसे ऊँची अवस्था बतलाते हैं

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥३१॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

व्याख्या- उक्त अहिंसादिका अनुष्ठान जब सार्वभौम अर्थात् सबके साथ, सब जगह और सब समय समानभावसे किया जाता है, तब ये महाव्रत हो जाते हैं। जैसे किसीने नियम लिया कि मछलीके सिवा अन्य जीवोंकी हिंसा नहीं करूँगा तो यह जाति-अवछिन्न अहिंसा है, इसी तरह कोई नियम ले कि मैं तीर्थों में हिंसा नहीं करूँगा तो यह देश-अवछिन्न अहिंसा है। कोई यह नियम करे कि मैं एकादशी, अमावास्या और पूर्णिमाको हिंसा नहीं करूँगा तो यह कालावच्छिन्न अहिंसा है।

कोई नियम करे कि मैं विवाहके अवसरके सिवा अन्य किसी निमित्तसे हिंसा नहीं करूँगा तो यह समयावच्छिन्न (निमित्तसे सम्बन्धित) अहिंसा है। इसी प्रकार सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहके भी भेद समझ लेने चाहिये। ऐसे यम व्रत तो हैं, परंतु सार्वभौम न होनेके कारण महाव्रत नहीं हैं। उपर्युक्त प्रकारका प्रतिबन्ध न लगाकर जब सभी प्राणियोंके साथ सब देशोंमें सदा-सर्वदा इनका पालन किया जाय, किसी भी निमित्तसे इनमें शिथिलता आनेका अवकाश न दिया जाय, तब ये सार्वभौम होनेपर ‘महाव्रत’ कहलाते हैं ॥ ३१ ॥

सम्बन्ध- यमोंका वर्णन करके अब नियमोंका वर्णन करते हैं
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥३२॥

व्याख्या- (१) शौच-जल, मृत्तिकादिके द्वारा शरीर, वस्त्र और मकान आदिके मलको दूर करना बाहरकी शुद्धि है, इसके सिवा अपने वर्णाश्रम और योग्यताके अनुसार न्यायपूर्वक धनको और शरीरनिर्वाहके लिये आवश्यक अन्न आदि पवित्र वस्तुओंको प्राप्त करके उनके द्वारा शास्त्रानुकूल शुद्ध भोजनादि करना तथा सबके साथ यथायोग्य पवित्र बर्ताव करना—यह भी बाहरी शुद्धिके ही अन्तर्गत है। जप, तप और शुद्ध विचारोंके द्वारा एवं मैत्री आदिकी भावनासे अन्तःकरणके राग-द्वेषादि मलोंका नाश करना भीतरकी पवित्रता है।

(२) संतोष- कर्तव्यकर्मका पालन करते हुए उसका जो कुछ परिणाम हो तथा प्रारब्धके अनुसार अपने-आप जो कुछ भी प्राप्त हो एवं जिस अवस्था
और परिस्थितिमें रहनेका संयोग प्राप्त हो जाय, उसीमें संतुष्ट रहना और किसी प्रकारकी भी कामना या तृष्णा न करना ‘संतोष’ है।

(३) तप, (४) स्वाध्याय और (५) ईश्वर-प्रणिधान-इन तीनोंकी व्याख्या क्रियायोगके वर्णनमें कर चुके हैं (देखिये योग० २ । १ की व्याख्या) उसी प्रकार यहाँ भी समझ लेना चाहिये ॥ ३२ ॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध- यम-नियमोंके अनुष्ठानमें विघ्न उपस्थित होनेपर उन विघ्नोंको हटानेका उपाय बतलाते हैं

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥ ३३ ॥

व्याख्या- जब कभी संगदोषसे या अन्यायपूर्वक किसीके द्वारा सताये नारपर बदला लेनेके लिये या अन्य किसी भी कारणसे मनमें अहिंसादिके विरोधी भाव बाधा पहुँचावें अर्थात् हिंसा, झूठ, चोरी आदिमें प्रवृत्त होकर यम-नियमादिका त्याग कर देनेकी परिस्थिति उत्पन्न कर दें तो उस समय उन विरोधी विचारोंका नाश करनेके लिये उन विचारोंमें दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षकी भावना करनी चाहिये ।। ३३ ।।

सम्बन्ध- इस दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षभावनाका ही अगले सूत्रोंमें वर्णन करते हैं

वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोध मोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥ ३४ ॥

व्याख्या- स्वयं किये हुए, दूसरोंसे करवाये हुए, दूसरोंको करते . देखकर अनुमोदन किये हुए—इस तरह तीन प्रकारसे होनेवाले हिंसा, झूठ, चोरी और व्यभिचार आदि अवगुण, जो कि यम-नियमोंके विरोधी हैं, उनका नाम ‘वितर्क’ है।

ये दोष कभी लोभसे, कभी क्रोधसे और कभी मोहसे एवं कभी छोटे रूपमें, कभी मध्यम और कभी भयंकररूपमें साधकके सामने उपस्थित होकर उसे सताते हैं। उस समय साधकको सावधान होकर विचार करना चाहिये कि ये हिंसादि दोष महान् हानिकारक और नरकमें ले जानेवाले हैं, इनका परिणाम अनन्तकालतक बारम्बार दुःख भोगना और अज्ञानके वशमें होकर शूकर-कूकर आदि मूढ़ योनियोंमें पड़ना है, अतः इनसे सर्वथा दूर रहकर दृढ़तापूर्वक यम-नियमोंका पालन करते रहना चाहिये । इस प्रकारके विचारोंको बारम्बार करते रहना ही ‘प्रतिपक्षकी भावना’ है ॥ ३४॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध- इस प्रकार यम-नियमोंके विरोधी हिंसादिको हटानेका उपाय उसमें दोष देखना बतलाकर अब यम-नियमोंमें प्रीति उत्पन्न करनेके लिये उनके पालनका भिन्न-भिन्न फल बतलाते हैं

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥ ३५॥

व्याख्या- जब योगीका अहिंसाभाव पूर्णतया दृढ़ स्थिर हो जाता है तब उसके निकटवर्ती हिंसक जीव भी वैरभावसे रहित हो जाते हैं। इतिहास ग्रन्थोंमें जहाँ मुनियोंके आश्रमोंकी शोभाका वर्णन आता है, वहाँ वनचर जीवोंमें स्वाभाविक वैरका अभाव दिखलाया गया है, यह उन ऋषियोंके अहिंसाभावकी प्रतिष्ठाका द्योतक है॥ ३५ ॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

साधनपाद-२

Categories
yog darshan

yog darshan sadhanpaad

साधनपाद-२

yog darshan sadhanpaad

सम्बन्ध- पहले पादमें योगका स्वरूप, उसके भेद और उसके फलका संक्षेपमें वर्णन किया गया। साथ ही उसके उपायभूत अभ्यास और वैराग्यका तथा ईश्वरप्रणिधान आदि दूसरे साधनोंका भी वर्णन किया गया, किंतु उसमें बतलायी हुई रीतिसे निर्बीज समाधि वही साधक प्राप्त कर सकता है, जिसका अन्तःकरण स्वभाव से ही शुद्ध है एवं जो योगसाधनामें तत्पर है। अतः अब साधारण साधकोंके लिये क्रमशः अन्तःकरणकी शुद्धिपूर्वक निर्बीज-समाधि प्राप्त करनेका उपाय बतलानेके लिये साधनपाद नामक दूसरे पादका आरम्भ किया जाता है

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥१॥ –

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि-तप-स्वाध्याय और. ईश्वर-शरणागति ये तीनों; क्रियायोगः क्रियायोग हैं।

व्याख्या- (१) तप- अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति और योग्यताके अनुसार स्वधर्मका पालन करना और उसके पालनमें जो शारीरिक या मानसिक अधिक-से-अधिक कष्ट प्राप्त हो, उसे सहर्ष सहन करना-इसका नाम ‘तप’ है। व्रत, उपवास आदि भी इसीमें आ जाते हैं। निष्कामभावसे इस तपका पालन करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण अनायास ही शुद्ध हो जाता है, यह गीतोक्त कर्मयोगका ही अङ्ग है।

(२) स्वाध्याय- जिनसे अपने कर्तव्य-अकर्तव्यका बोध हो सके, ऐसे वेद, शास्त्र, महापुरुषोंके लेख आदिका पठन-पाठन और भगवान्के ॐ कार आदि किसी नामका या गायत्रीका और किसी भी इष्टदेवताके मन्त्रका जप करना ‘स्वाध्याय’ है। इसके सिवा अपने जीवनके अध्ययनका नाम भी स्वाध्याय है। अतः साधकको प्राप्त विवेकके द्वारा अपने दोषोंको खोजकर निकालते रहना चाहिये।

(३) ईश्वर- प्रणिधान– ईश्वरके शरणापन्न हो जानेका नाम ‘ईश्वर प्रणिधान’ है। उसके नाम, रूप, लीला, धाम, गुण और प्रभाव आदिका श्रवण, कीर्तन और मनन करना, समस्त कर्मोको भगवान्के समर्पण कर देना, अपनेको भगवान्के हाथका यन्त्र बनाकर जिस प्रकार वह नचावे, वैसे ही नाचना, उसकी आज्ञाका पालन करना, उसीमें अनन्य प्रेम करना-ये सभी ईश्वर-प्रणिधानके अङ्ग हैं। यद्यपि तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान-ये तीनों ही यम, नियम आदि योगके अङ्गोंमें नियमोंके अन्तर्गत आ जाते हैं तथापि इन तीनों साधनोंका विशेष महत्त्व और इनकी सुगमता दिखलानेके लिये पहले क्रियायोगके नामसे इनका अलग वर्णन किया गया है ॥ १ ॥

सम्बन्ध-उपर्युक्त क्रियायोगका फल बतलाते हैं

समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥ २ ॥

yog darshan sadhanpaad

व्याख्या-उपर्युक्त क्रियायोग अविद्यादि दोषोंको क्षीण करनेवाला और समाधिकी सिद्धि करनेवाला है अर्थात् इसके साधनसे साधकके अविद्यादि क्लेशोंका क्षय होकर उसको कैवल्य-अवस्थातक समाधिकी प्राप्ति हो सकती है ॥२॥

सम्बन्ध- दूसरे सूत्रमें क्रियायोगका फल समाधिसिद्धि और क्लेशोंका क्षय बतलाया गया, उनमें से समाधिके लक्षण और फलका वर्णन तो पहले पादमें हो चुका है, परंतु क्लेश कितने हैं, उनके नाम क्या हैं, वे किस-किस अवस्थामें रहते हैं, उनका क्षय कैसे होता है और उनका नाश क्यों करना चाहिये-इन सब बातोंका वर्णन नहीं हुआ। अतः प्रसङ्गानुसार इस प्रकरणका आरम्भ करते हैं

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥३॥

व्याख्या- ये अविद्यादि पाँचों ही जीवमात्रको संसारचक्रमें घुमानेवाले महादुःखदायक हैं। इस कारण सूत्रकारने इनका नाम ‘क्लेश’ रखा है।
कितने ही टीकाकारोंका तो कहना है कि ये पाँचों क्लेश ही पाँच प्रकारका विपर्ययज्ञान है। कुछ इनमेंसे केवल अविद्या और विपर्ययवृत्तिकी ही एकता ..
करते हैं; किंतु ये दोनों ही बातें युक्तिसंगत नहीं मालूम होती; क्योंकि प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्तिका अभाव है, पर अविद्यादि पाँचों क्लेश वहाँ भी विद्यमान रहते हैं । ऋतम्भरा प्रज्ञामें विपर्ययका लेश भी नहीं स्वीकार किया जा सकता, परंतु जिस अविद्यारूप क्लेशको द्रष्टा और दृश्यके संयोगका हेतु माना गया है, वह तो वहाँ भी रहता ही है, अन्यथा संयोगके अभावसे हेयका नाश होकर साधकको उसी क्षण कैवल्य-अवस्थाकी प्राप्ति हो जानी चाहिये थी। इसके सिवा एक बात और भी है। इस ग्रन्थमें कैवल्य-स्थितिको प्राप्त सिद्ध योगीके कर्म अशुक्ल और अकृष्ण अर्थात् पुण्य-पापके संस्कारोंसे रहित माने गये हैं (योग० ४ । ७), इससे यह सिद्ध होता है कि जीवन्मुक्त योगीद्वारा भी कर्म अवश्य किये जाते हैं। तब यह भी मानना पड़ेगा कि व्युत्थान-अवस्थामें जब वह कर्म करता है तो विपर्यय-वृत्तिका प्रादुर्भाव भी स्वाभाविक होता है;

क्योंकि पाँचों ही वृत्तियाँ चित्तका धर्म हैं और व्युत्थान-अवस्थामें चित्त . विद्यमान रहता है, यह स्वीकार करना ही पड़ेगा। किंतु जीवन्मुक्त योगीमें
अविद्या भी रहती है, यह नहीं माना जा सकता, क्योंकि यदि अविद्या वर्तमान है तो वह जीवन्मुक्त ही कैसा; इसी तरह और भी बहुत-से कारण हैं (देखिये योग० १।८ की टीका),जिनसे विपर्यय और अविद्याकी एकता माननेमें सिद्धान्तकी हानि होती है। अतः विद्वान् सज्जनोंको इसपर विचार करना
चाहिये ॥३॥

सम्बन्ध- अब क्लेशोंकी अवस्थाके भेद बतलाते हुए यह बात कहते हैं कि इन सबका मूल कारण अविद्यारूप क्लेश है

अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥४॥

व्याख्या- (१) प्रसुप्त – चित्तमें विद्यमान रहते हुए भी जिस समय जो क्लेश अपना कार्य नहीं करता, उस समय उसे प्रसुप्त कहा जाता है। प्रलयकाल
और सुषुप्तिमें चारों ही क्लेशोंकी प्रसुप्त-अवस्था रहती है।

(२) तनु- क्लेशोंमें जो कार्य करनेकी शक्ति है, उसका जब योगके साधनोंद्वारा ह्रास कर दिया जाता है; तब वे हीन शक्तिवाले क्लेश ‘तनु’ कहलाते हैं। देखने में भी आता है कि ये राग-द्वेषादि क्लेश साधारण मनुष्योंकी भाँति साधकोंपर अपना आधिपत्य नहीं जमा सकते अर्थात् साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा साधकोंपर उनका प्रभाव बहुत कम पड़ता है।

(३) विच्छिन्न- जब कोई क्लेश उदार होता है, उस समय दूसरा क्लेश दब जाता है, वह उसकी ‘विच्छिन्नावस्था’ है, जैसे रागकी उदार-अवस्थाके क्षणमें द्वेष दब जाता है और द्वेषकी उदार-अवस्थाके क्षणमें राग दबा रहता है।

(४) उदार- जिस समय जो क्लेश अपना कार्य पूर्णतया कर रहा हो उस समय वही ‘उदार’ कहलाता है। … उपर्युक्त पाँच क्लेशोंमेंसे अस्मितादि चार क्लेशोंके ही प्रसुप्तादि चार अवस्थाभेद बतलाये गये हैं, अविद्याके नहीं; क्योंकि वह अन्य चारोंका कारण है, उसके नाशसे सबका सदाके लिये समूल नाश हो जाता है ॥४॥

सम्बन्धः-अब अविद्याका स्वरूप बतलाते है

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥५॥

व्याख्या- इस लोक और परलोकके समस्त भोग और भोगोंका आयतन यह मनुष्य शरीर भी अनित्य है, इस बातको प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा समझकर भी जिसके प्रभावसे मनुष्य उनमें नित्यत्वबुद्धि करके राग-द्वेषादि कर लेता है, यह अनित्यमें नित्यकी अनुभूतिरूप अविद्या है। शिश। का इसी प्रकार
हाड़, मांस, मज्जा आदि अपवित्र धातुओंके समुदायरूप अपने और स्त्री आदिके शरीरोंको प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा अपवित्र समझते हुए भी जिसके कारण मनुष्य अपने शरीरमें पवित्रताका अभिमान करता है और स्त्री-पुत्र आदिके शरीरोंसे प्यार करता है, यह अपवित्रमें पवित्रकी अनुभूतिरूप
अविद्या है। वैसे ही प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा विचार करनेपर सभी भोग दुःखरूप हैं यह बात विचारशील साधककी समझमें आ जाती है (योग० २ । १५) । इसपर भी मनुष्य उन भोगोंको सुखदायक समझकर उनके भोगनेमें प्रवृत्त हुआ रहता है, यही दुःखमें सुखकी अनुभूतिरूप अविद्या है।
यद्यपि यह बात थोड़ा-सा विचार करते ही समझमें आ जाती है कि जड शरीर आत्मा नहीं है तथापि मनुष्य इसीको अपना स्वरूप माने रहता है,आत्मा इससे सर्वथा असङ्ग और चेतन है इस बातका अनुभव नहीं कर सकता, इसका नाम अनात्मामें आत्मभावका अनुभूतिरूप अविद्या है।
प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम-प्रमाणसे वस्तुस्थितिका सामान्य ज्ञान हो जानेपर विपर्ययवृत्ति नहीं रहती, तो भी अविद्याका नाश नहीं होता; इससे यह सिद्ध होता है कि चित्तकी विपर्ययवृत्तिका नाम अविद्या नहीं है ॥५॥

yog darshan sadhanpaad

सम्बन्ध-अब अस्मिताका स्वरूप बतलाते हैं

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥६॥

व्याख्या- दृक्-शक्ति अर्थात् द्रष्टा-पुरुष और दर्शन-शक्ति अर्थात् बुद्धि-ये दोनों सर्वथा भिन्न और विलक्षण हैं। द्रष्टा चेतन है और बुद्धि जड है। इनकी एकता हो ही नहीं सकती। तथापि अविद्याके कारण दोनोंकी एकता-सी हो रही हैं (योग० २ । २४) । इसीको द्रष्टा और दृश्यका संयोग कहते हैं। यही प्रकृति और पुरुषके स्वरूपकी उपलब्धिका हेतु माना गया है (योग० २ । २३) । इस संयोगके रहते हुए भी पुरुष और बुद्धिका भिन्न-भिन्न स्वरूप विचारके द्वारा और सम्प्रज्ञात-समाधिके द्वारा समझमें तो आता है; परंतु जबतक निर्बीज-समाधिद्वारा अविद्याका सर्वथा नाश नहीं कर दिया जाता, तबतक संयोगका अभाव नहीं होता है। इस कारण इनके शुद्ध स्वरूपका अनुभव नहीं होता (योग० ३ । ३५) । अतः साधकको चाहिये कि तत्परतासे उत्साहपूर्वक योगसाधनमें लगकर शीघ्र ही अविद्याके नाशद्वारा संयोगरूप अस्मिता नामक क्लेशका नाश कर दे और कैवल्य-स्थितिको प्राप्त कर ले॥६॥

सम्बन्ध-अब राग नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं
सुखानुशयी रागः ॥७॥
सुखानुशयी-सुखकी. प्रतीतिके पीछे रहनेवाला क्लेश; रागः=’राग’ है।
व्याख्या-प्रकृतिस्थ जीवको जब कभी जिस किसी अनुकूल पदार्थमें सुखकी प्रतीति हुई है या होती है, उसमें और उसके निमित्तोंमें उसकी आसक्ति (प्रीति) हो जाती है, उसीको ‘राग’ कहते हैं। अतः इस राग नामक क्लेशको सुखकी प्रतीतिके साथ-साथ रहनेवाला कहा गया है ॥७॥

सम्बन्ध-अब द्वेष नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं

दुःखानुशयी द्वेषः ॥८॥

दुःखानुशयी-दुःखकी प्रतीतिके पीछे रहनेवाला क्लेश; द्वेषः=’द्वेष’ है।
व्याख्या-मनुष्यको जब कभी जिस किसी प्रतिकूल पदार्थमें दुःखकी प्रतीति हुई है या होती है, उसमें और उसके निमित्तोंमें उसका द्वेष हो जाता है; अतः यह द्वेषरूप क्लेश दुःखकी प्रतीतिके पीछे यानी साथ-साथ रहनेवाला है॥८॥

सम्बन्ध- अब अभिनिवेश नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं

स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥९॥

व्याख्या- यह मरणभयरूप क्लेश सभी प्राणियोंमें अनादि कालसे . स्वाभाविक है; अतः कोई भी जीव यह नहीं चाहता कि मैं न रहूँ, सभी अपनी । विद्यमानता चाहते हैं। एक छोटे-से-छोटा कीट भी मरणसे डरकर अपनी रक्षाका उपाय करता है। (इससे पूर्वजन्मकी सिद्धि होती है,
क्योंकि यदि मरण-दुःख पहले अनुभव किया हुआ नहीं होता तो उसका भय कैसे होता?) यह मरणभय जीवोंके अन्तःकरणमें इतना गहरा बैठा हुआ है कि मूर्खके जैसा ही विवेकशीलपर भी इसका प्रभाव पड़ता है, इसीलिये इसका नाम ‘अभिनिवेश’ अर्थात् ‘अत्यन्त गहराई में प्रविष्ट’ रखा गया है॥९॥ . .

सम्बन्ध- इन पाँच प्रकारके क्लेशोंको तनु अर्थात् सूक्ष्म बना देनेका उपाय ‘क्रियायोग’ पहले बतला चुके । ‘क्रियायोग के द्वारा सूक्ष्म किये हुए क्लेशोंका नाश किस उपायसे करना चाहिये, यह बात अगले सूत्र में बतलाते हैं। yog darshan sadhanpaad

ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥१०॥

व्याख्या- क्रियायोग या ध्यानयोगद्वारा सूक्ष्म किये हुए क्लेशोंका नाश
निर्बीज समाधिके द्वारा चित्तको उसके कारणमें विलीन करके करना चाहिये; क्योंकि क्रियायोग या ध्यानद्वारा क्षीण कर दिये जानेपर भी जो लेशमात्र क्लेश शेष रह जाते हैं, उनका नाश द्रष्टा और दृश्यके संयोगका अभाव होनेपर ही होता है, उसके पहले क्लेशोंका सर्वथा नाश नहीं होता, यह भाव है ॥ १० ॥ .

सम्बन्ध-अब क्लेशोंको क्षीण करनेका क्रियायोगसे अतिरिक्त दूसरा साधन . . बतलाते हैं

ध्यानहेयास्तवृत्तयः ॥ ११॥

व्याख्या- उन क्लेशोंकी जो स्थूल वृत्तियाँ हैं, उनका यदि पूर्वोक्त क्रियायोगके द्वारा नाश करके उन क्लेशोंको सूक्ष्म नहीं बना दिया गया हो तो पहले ध्यानके द्वारा उनकी स्थूल वृत्तियोंका नाश करके उनको सूक्ष्म बना लेना चाहिये,
तभी निर्बीज-समाधिकी सिद्धि सुगमतासे हो सकेगी। उसके बाद निर्बीज-समाधिसे क्लेशोंका सर्वथा अभाव अपने-आप हो जायगा ॥११॥

सम्बन्ध-उपर्युक्त क्लेश किस प्रकार जीवके महान् दुःखोंके कारण हैं; इस बातको । स्पष्ट करनेके लिये अलग प्रकरण आरम्भ किया जाता है

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥ १२॥

व्याख्या- कर्लोक संस्कारोंकी जड़ उपर्युक्त पाँचों क्लेश ही हैं। अविद्यादि क्लेशोंके न रहनेपर किये हुए कर्मोंसे कर्माशय नहीं बनता, बल्कि वैसे राग-द्वेषरहित निष्काम कर्म तो पूर्वसंचित कर्माशयका भी नाश करनेवाले होते हैं (गीता ४ । २३) । यही क्लेशमूलक कर्माशय जिस प्रकार इस जन्ममें
दुःख देता है, उस प्रकार भविष्यमें होनेवाले जन्मोंमें भी दुःखदायक है। अतः साधकको इसकी जड़ काट डालनी चाहिये अर्थात् पूर्वोक्त क्लेशोंका सर्वथा नाश कर देना चाहिये ॥ १२॥

सम्बन्ध-उस कर्माशयका फल कबतक मिलता रहता है और वह क्या है, इसको स्पष्ट करते हैं

सति मूले तद्विपाको जात्यायु गाः॥१३॥

व्याख्या- जबतक क्लेशरूप जड़ विद्यमान रहती है, तबतक इस कर्मोके संस्कार-समुदायरूप कर्माशयका विपाक यानी परिणाम-बार-बार अच्छी बुरी योनियोंमें जन्म होना, वहाँपर निश्चित आयुतक जीते रहकर फिर मरण-दुःखको भोगना और जीवनावस्थामें जो विवेकदृष्टि से सभी दुःखरूप हैं, ऐसे भोगोंका सम्बन्ध होना-ऐसे तीन प्रकारका होता रहता है ॥ १३ ॥

सम्बन्ध-वे जाति, आयु और भोगरूप परिणाम किस प्रकारके होते हैं, यह बतलाते हैं

ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥ १४॥

समाधिपाद-१

yog darshan sadhanpaad

व्याख्या- जो जन्म पुण्यकर्मका परिणाम है, वह सुखदायक होता है और जो पापकर्मका परिणाम है, वह दुःखदायक होता है। इसी प्रकार आयुका जितना समय शुभकर्मका परिणाम है, उतना समय सुखदायक होता है और जितना पापकर्मका परिणाम है, उतना दुःखदायक होता है। वैसे ही जो-जो भोग अर्थात् सांसारिक मनुष्योंके, अन्य प्राणियोंके पदार्थोके और क्रिया एवं परिस्थिति आदिके संयोग-वियोग पुण्यकर्मके परिणाम होते हैं, वे हर्षप्रद होते हैं और जो पापकर्मके परिणाम होते हैं, वे शोकप्रद होते हैं ॥ १४ ॥

सम्बन्ध–यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि यदि यही बात है तब तो जिसका परिणाम केवल दुःखप्रद फल (जन्म, आयु और भोग) हैं ऐसे कर्माशयका ही उसके मूलसहित नाश करना उचित है। उसके साथ सुखप्रद कर्माशयका नाश करनेकी बात क्यों कही? इसपर कहते हैं

परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ॥१५॥

व्याख्या-(१) परिणामदुःख– जो ‘कर्मविपाक’ भोगकालमें स्थूल दृष्टिसे सुखप्रद प्रतीत होता है, उसका भी परिणाम (नतीजा) दुःख ही है। जैसे स्त्रीप्रसङ्गके समय मनुष्यको सुख भासता है; परंतु उसका परिणाम बल, वीर्य, तेज, स्मृति आदिका ह्रास प्रत्यक्ष देखने में आता है, ऐसे ही दूसरे भोगोंमें
भी समझ लेना चाहिये । व भोगोंको भोगते-भोगते मनुष्य थक जाता है, उन्हें भोगनेकी शक्ति उसमें नहीं रहती, परंतु तृष्णा बनी रहती है, इससे वह भोगरूप सुख भी दुःख ही है। गीतामें भी कहा है

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥

(१८ । ३८) ‘जो सुख विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होता है, वह यद्यपि भोगकालमें अमृतके सदृश भासता है; परंतु परिणाममें विषके सदृश है, इसलिये वह सुख राजस कहा गया है।’ यह भोगके अन्तमें अनुभव होनेवाला दुःख भी परिणाम-दुःखकी ही गणनामें है।

इन्द्रियों और पदार्थोंके सम्बन्धसे जब मनुष्यको किसी भी प्रकारके भोगमें सुखकी प्रतीति होती है, तब उसमें राग-आसक्ति अवश्य हो जाती है। इसलिये वह सुख रागरूप क्लेशसे मिला हुआ है। आसक्तिवश मनुष्य उस भोगकी प्राप्तिके साधनरूप अच्छे-बुरे कर्मोंका आरम्भ भी करेगा ही। भोग्यवस्तुओंकी प्राप्तिमें असमर्थ

yog darshan sadhanpaad

होनेसे या विघ्न आनेपर द्वेष होना भी अवश्यम्भावी है। इसके सिवा, प्राणियोंकी हिंसाके बिना भोगकी सिद्धि भी नहीं होती। अतः राग, द्वेष और हिंसादिका परिणाम अवश्य ही दुःख है। यह भी परिणाम-दुःखता है।

(२) तापदुःख-सभी प्रकारके भोगरूप सुख विनाशशील हैं; उनसे वियोग होना निश्चित है, अतः भोगकालमें उनके विनाशकी सम्भावनासे भयके कारण तापदुःख बना रहता है। इसी तरह मनुष्यको जो सुखकारक भोग प्राप्त होते हैं वे सातिशय ही होते हैं, अर्थात् उसे जो कुछ प्राप्त है, उससे बढ़कर दूसरोंको भी प्राप्त है यह देखकर वह ईर्ष्यासे जलता रहता है। यह भी तापदुःख है। तथा भोगकी अपूर्णतासे भी भोगकालमें संताप बना रहता है, यह भी तापदुःख है।

(३) संस्कारदुःख- जिन-जिन भोगोंमें मनुष्यको सुखका अनुभव होता है, उस अनुभवके संस्कार उसके हृदयमें जम जाते हैं। जब उन भोग सामग्रियोंसे उसका वियोग हो जाता है, तब वे संस्कार पहलेके सुखभोगकी स्मृतिद्वारा महान् दुःखके हेतु हो जाते हैं। देखनेमें भी आता है कि जब किसी मनुष्यकी स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदि भोगसामग्री नष्ट हो जाती है, तब वह उनको याद कर-करके रोता रहता है कि मेरी स्त्री मुझे अमुक-अमुक प्रकारसे । सुख देती थी, मेरे पास इतना धन था, मैं अपने धनसे स्वयं सुख भोगता था और लोगोंको सुख पहुँचाता था, आज मेरी यह दशा है कि मैं भिखारी होकर लोगोंसे सहायता माँगता फिरता हूँ-इत्यादि । इसके सिवा, वे भोग-संस्कार, भोगासक्तिकी वृद्धिमें कारण होनेसे जन्मान्तरमें भी दुःखके हेतु हैं।

yog darshan sadhanpaad

(४) गुणवृत्तिविरोध– गुणोंके कार्यका नाम गुणवृत्ति है, गुणोंके कार्यमें परस्पर अत्यन्त विरोध है। जैसे सत्त्वगुणका कार्य प्रकाश, ज्ञान और सुख है, तो तमोगुणका कार्य अन्धकार, अज्ञान और दुःख है। इस प्रकार इनके कार्योंमें विरोध होनेके कारण दुविधा बनी रहती है; सुख-भोगकालमें भी शान्ति नहीं मिलती; क्योंकि तीनों गुण एक साथ रहनेवाले हैं। सुखके अनुभवकालमें सत्त्वगुणकी प्रधानता रहते हुए भी रजोगुण और तमोगुणका अभाव नहीं हो जाता, अतः उस समय भी दुःख और शोक विद्यमान रहते हैं; इसलिये भी वह दुःख ही है। जैसे ध्यानकालमें और सत्सङ्ग करते समय सत्त्वगुणकी प्रधानता रहती है, अतः सात्त्विक सुख होता है, परंतु वहाँ भी सांसारिक स्फुरणा और तन्द्रा उस सुखमें विघ्न कर देते हैं ऐसे ही अन्य कामोंमें भी समझ लेना चाहिये।

yog darshan sadhanpaad

उपर्युक्त परिणामदुःख, तापदुःख और संस्कारदुःख तथा गुणवृत्तियोंके विरोधसे होनेवाले दुःखको विचारद्वारा विवेकी पुरुष समझता है। इस कारण उसकी दृष्टिमें सभी ‘कर्मविपाक’ दुःखरूप ही हैं अर्थात् साधारण मनुष्य समुदाय जिन भोगोंको सुखरूप समझता है, विवेकीके लिये वे भी दुःख ही हैं॥ १५॥

सम्बन्ध-उपर्युक्त वर्णनसे यह सिद्ध हो गया है कि जन्म, आयु और भोगरूप यह बात गीताके पाँचवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें इस प्रकार कही गयी है

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ ।

अर्थात् इन्द्रिय और विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले जितने भी भोग हैं, वे सब-के-सब दुःखोंके ही कारण हैं तथा सभी आदि और अन्तवाले हैं, अतः विवेकी मनुष्य उनमें नहीं रमता।

सभी कर्म-विपाक दुःखरूप हैं; इसलिये उनका मूलसहित उच्छेद करना मनुष्यका कर्तव्य है। अतः अब उनको त्याज्य (नाश करनेयोग्य) बतलाकर उनसे मुक्ति पानेका उपाय बतलाते हुए अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं

हेयं दुःखमनागतम् ॥ १६ ॥

व्याख्या- वर्तमान जन्मके पहले जो अनेक योनियोंमें दुःख भोगे जा चुके, वे तो अपने-आप समाप्त हो गये, उनके विषयमें कोई विचार नहीं करना है। तथा जो वर्तमान हैं वे भी भोग देकर दूसरे क्षणमें अपने-आप लुप्त हो जायँगे, उनके लिये भी उपायकी आवश्यकता नहीं है। परन्तु जो दुःख अभीतक प्राप्त नहीं हुए हैं, भविष्यमें होनेवाले हैं, उनका नाश उपायद्वारा अवश्य-कर्तव्य है; इसलिये उन्हींको ‘हेय’ बतलाया गया है ॥ १६॥

सम्बन्ध- जिसका नाश करना हो, उसके मूल कारणको जाननेकी आवश्यकता है; क्योंकि मूल कारणके नाशसे ही उसका पूर्णतया नाश हो सकता है; नहीं तो वह पुनः उत्पन्न हो सकता हैअतः उक्त ‘हेय’का हेतु (कारण) बतलाते हैं।

द्रष्टदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥ १७ ॥

व्याख्या- ऊपर जो नाश करनेयोग्य आनेवाले दुःख बतलाये गये हैं, उनका मूल कारण द्रष्टा और दृश्यका अर्थात् पुरुष और प्रकृतिका संयोग यानी’ जड-चेतनकी ग्रन्थि है। अतः इस संयोगका नाश कर
देनेसे मनुष्य सर्वथा . दुःखोंसे निवृत्त हो सकता है ॥ १७ ॥

सम्बन्ध- पूर्व सूत्रमें द्रष्टा, दृश्य और उनका संयोग-इन तीनके नाम आये हैं, उनमेंसे पहले दृश्यका स्वभाव, स्वरूप और प्रयोजन बतलाते हैं

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥१८॥

व्याख्या- सत्त्व, रज और तम-ये तीनों गुण और इनका कार्य जो कुछ भी देखने, सुनने और समझनेमें आता है, वह सब-का-सब दृश्यके अन्तर्गत है। सत्त्वगुणका मुख्य धर्म प्रकाश है, रजोगुणका मुख्य धर्म क्रिया (हलचल) है और तमोगुणका मुख्य धर्म स्थिति अर्थात् जडता और सुषुप्ति आदि है ।
इन तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाको ही प्रधान या प्रकृति कहते हैं। यह सांख्यका मत है। अतः सब अवस्थाओंमें अनुगत तीनों गुणोंका जो प्रकाश, क्रिया और स्थितिरूप स्वभाव है, वही दृश्यका स्वभाव है। पाँच स्थूल भूत, पाँच तन्मात्रा, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन, बुद्धि और अहंकार-ये सब (तेईस तत्त्व) प्रकृतिके कार्य होनेसे उसके स्वरूप हैं।

भोगासक्त पुरुषको अपना स्वरूप दिखलाकर भोग प्रदान करना और मुक्ति चाहनेवाले योगीको द्रष्टाका स्वरूप दिखलाकर मुक्ति प्रदान करना दृश्यका प्रयोजन है। द्रष्टाको उसका निज स्वरूप दिखा देनेके बाद इसका कोई प्रयोजन नहीं रहता, उस पुरुषके लिये यह अस्त (लुप्त) हो जाता है (२ । २२) ॥ १८॥

yog darshan sadhanpaad

॥अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2॥

Categories
jyotish

mahabharat mai jyotish

महाभारत तथा ज्योतिष विज्ञान

mahabharat mai jyotish

भारतीय ज्योतिष विश्व का अत्यन्त प्राचीन विज्ञान है। वैज्ञानिकों के मतानुसार, पृथ्वी सूर्य का अंश है तथा सूर्य की गतिविधि का प्रभाव पृथ्वी पर स्थित प्राणियों पर पड़ता है। अतः प्राचीन काल से ही मनष्य, सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहों के रहस्यों के समाधान ढूंढ रहा है। ज्योतिष का साक्षात् सूर्य की रश्मियों से सम्बन्ध होने के कारण यह अति प्राचीन क्रमबद्ध तथा लोकोपयोगी विज्ञान है। यह विज्ञन के समान अपने समस्त तथ्यों को प्रमाणित रूप में व्यक्त करता है साथ ही विज्ञान का विशेष गुण प्रत्यक्ष प्रमाण का होना भी ज्योतिष शास्त्र को ज्योतिष विज्ञान बना देता है। चन्द्रशेखरन ने ज्योतिष को प्रत्यक्ष शास्त्र माना है।

ज्योतिष विज्ञान सामान्य परिचय

ज्योतिष एक महान शास्त्र है, जिसमें ग्रह नक्षत्र आदि की गति और स्थिति का अध्ययन किया जाता है। आकाश में स्थित ज्योतिपिण्डों के संचार और उनसे बनाने वाले गणितगत पारस्परिक सम्बन्धों के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करने वाली विद्या का नाम ‘ज्योतिषशास्त्र’ है।

अप्रत्यक्षाणि शास्त्राणि विवादस्तेषुकेवलम् । प्रत्यक्षं ज्योतिष शास्त्रं चन्द्राकौयस्य साक्षिणौ।। जात. सार. पृ. 5
कि नभोमण्डल में स्थित विविध ज्योतिषियों से सम्बन्धित विद्या को ज्योतिर्विद्या कहते
प्राचीन ऋषियों तथा विद्वानों के मतानुसार ज्योतिष शास्त्र षड्वेदाङ्गों में से एक है, यथा –

शिक्षा,

कल्प,

व्याकरण,

ज्योतिष,

निरूक्त,

छन्द

चूंकि वेद अपौरूषेय है अतः वेदाङ्ग भी अपौरूषेय माने गये हैं। वेदों में अनेक स्थानों पर ज्योतिष विज्ञान का वर्णन मिलता है। यथा – ऋग्वेद में बारह राशियों का वर्णन’, यजुर्वेद में नक्षत्रदश (ज्योतिषी) का वर्णन’, छान्दोग्य उपनिषद में नक्षत्र विद्या का वर्णन आदि। षड्वेदाङ्गों में ज्योतिष शास्त्र को नेत्रस्थानीय माना गया है। इस सन्दर्भ में श्रीमद् भास्कराचार्य का कथन है –
mahabharat mai jyotish

शब्द शास्त्रं मुखं ज्योतिषं चक्षुषी, श्रोत्रमुक्तं निरूक्तं कल्पः करौ। या तु शिक्षास्य वेदस्य सा नासिका, पादपद्मयछन्द आद्यैर्बुधैः ।।
ज्योतिष शास्त्र के प्रमुख रूप से दो भाग हैं –

mahabharat mai jyotish

काल ज्योतिष 2. फलित ज्योतिष।

काल ज्योतिष को ‘गणित ज्योतिष’ भी कहा जाता है। इसमें सिद्धान्त, करण तथा तंत्र तीन शाखाएं हैं। इसके अनुसार सृष्टि के आरम्भ से अब तक बीते गये वर्ष, मास, दिन, वर्ष अयन, ऋतु, ग्रहों की गति, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, नक्षत्र, योग-करण आदि का अध्ययन किया जाता है। हजारों वर्ष पूर्व ज्योतिष विज्ञान की इस शाखा में भारतीय आचार्यों ने सिद्धता प्राप्त कर अनेक सिद्धान्त ग्रन्थों की रचना की थी। यह खगोल ज्ञान है जिसे आधुनिक विज्ञान में Astronomy कहते हैं। फलित ज्योतिष के दो स्कन्ध माने गये हैं –

होरा तथा संहिता।

होरा शास्त्र के अनुसार मनुष्य के जन्म से मृत्युपर्यन्त जीवन की घटनाओं की फलित के अनुभूत सिद्धान्तों के अनुसार व्याख्या की जाती है। इसका दार्शनिक आधार पुनर्जन्म और कर्मवाद है। संहिता शास्त्र में वर्षा, भूकम्प, ग्रहण प्रभाव, ग्रह निर्माण का ज्ञान, यज्ञ के मूहूर्त, शकुन-अपशकुन, रत्न परीक्षण, अङ्ग लक्षण आदि का अध्ययन किया जाता है।’

महाभारत तथा ज्योतिष विज्ञान
mahabharat mai jyotish

वैदिक युग में यज्ञादि धार्मिक कार्यों को सही समय पर करने के लिए ज्योतिष का विकास हुआ। वेदाङ्ग ज्योतिष में यज्ञों के सन्दर्भ में ज्योतिष की महत्ता को निम्नलिखित रूप व्यक्त किया गया है

वेदा हि यज्ञार्थमभि प्रवृत्ताः कालनुपूर्व्या विहिताश्च यज्ञाः ।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिष वेद सवेदयज्ञम् ।।’ ज्योतिष के महत्व का वर्णन पुनः वेदाङ्ग ज्योतिष में मिलता है, यथा –
यथा शिक्षा मयूराणां नागानां मणयो यथा। तद्वद् वेदाङ्गशास्त्राणां ज्योतिषं मूर्धानि स्थितम्।।’

रामायण काल में ज्योतिष विज्ञान अत्यन्त विकसित था। उस काल में ज्योतिषी को ‘लाक्षणिक’, ‘लक्षणी’, ‘कार्तान्तिक’, ‘गणक’ या ‘दैवज्ञ’ कहा जाता था। इस सन्दर्भ में अयोध्या काण्ड में सीता के वनवास की पूर्व-घोषणा ज्योतिषियों द्वारा उनके पितृ गृह में किये जाने का उल्लेख मिलता है। महाभारत के रचनाकार महर्षि वेदव्यास ने ज्योतिष के महत्व को स्पष्ट करते हुए अनुशासन पर्व में शिवसहस्रनामस्तोत्र में भगवान शिव का एक नाम ‘नक्षत्र विग्रह मतिः’ बताया है

ज्यो. पीयू. 2 सं. विज्ञा. पृ. 69 ३ वेदाङ् ज्यो. 4, नारदी. ज्यो. पृ. 2
पुरा पितृगृहे सत्यं वस्तव्यं किल में वने ।। लक्षणिभ्यो द्विजातिभ्यः श्रुत्वाहं वचनं गृहे। वा. रा. (अयो. का.) 29.8-9

जिसका अर्थ है – नक्षत्र, ग्रह, तारा आदि की गति को जानने वाले।’ महर्षि व्यास ने महाभारत में काल गणना का प्रारम्भ, विभिन्न मापें यथा – चतुर्युग, कल्प, मन्वन्तर आदि, आकाशीय गणना यंत्र, तिथि गणना का वैज्ञानिक विश्लेषण, ग्रहों के प्रभाव, फलित ज्योतिष यथा – मूहूर्त नक्षत्र, स्वप्न, व्रतोपवास, श्राद्ध आदि का विस्तृत उल्लेख किया है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में ज्योतिष विज्ञान अत्यन्त विकसित था।

महाभारत तथा काल ज्योतिष
mahabharat mai jyotish

भारतीय ज्योतिष का प्राचीनतम इतिहास सुदूर भूतकाल के गर्भ में छिपा हुआ है। अतः प्राचीन वैदिक ग्रन्थों में तथा महाकाव्यों (रामायण तथा महाभारत) में इस विज्ञान का पर्याप्त उल्लेख मिलता है, जिससे उस काल में प्रचलित ज्योतिष विज्ञान की विकसित दशा का बोध होता है। आधुनिक समय में ज्योतिष के रूप में केवल फलित ज्योतिष को महत्व दिया जाता है जबकि प्राचीनकाल में काल ज्योतिष (गणित ज्योतिष) ही प्रधान माना जाता था।

mahabharat mai jyotish

mahabharat krishi – 2

ज्योतिष की सबसे प्राचीन पुस्तक ‘वेदाङ्ग ज्योतिष’ में ‘ज्योतिष’ शब्द स्पष्टतः ‘गणित ज्योतिष’ (Astronomy) का सूचक है। आज विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि काल की गणना गति से तथा गति की गणना काल से होती है तथा ये दोनों अन्योन्याश्रित है। इस वैज्ञानिक सिद्धान्त का उल्लेख ऋग्वेद में प्राप्त होता है।

महाभारत में ज्योतिष विषयक तथ्यों का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। महर्षि व्यास ने महाभारत के शान्तिपर्व में काल की प्रबलता तथा महत्व का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में व्यास द्वारा युधिष्ठिर को समझाते हुए कथन है कि

नक्षत्र विग्रहमतिर्गुणबुद्धिर्लयोऽगमः।
महा. भा. अनु. पर्व. 17.59 2
याजुष’-वेदाङ्ग ज्यो.

में ‘ज्योतिष’ के स्थान पर ‘गणित’ पाठ है। अर्थात् – ‘ज्योतिष और ‘गणित’ शब्द एक दूसरे के परिपूरक हैं
द्वादशारं नहि तज्जराक्ष वर्वति चक्रं परिद्यामृतस्य । आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानि विंशतिश्वं तस्युः ।। ऋ.वे. 1.184.11

विधि के विधान से प्रेरित हो सभी क्षत्रिय काल के गाल में चले गये हैं। काल समस्त प्रजा वर्ग के कर्म का साक्षी है। वही मनुष्य के कर्मों का फल समयानुसार प्रदान करता है। अतः इस वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में

‘काल’ अर्थात् ‘समय’ के महत्व से सभी भली-भांति परिचित थे।

श्रीमद्भागवत में लिखित एक प्रसङ्गानुसार, राजा परीक्षित द्वारा महामुनि शुकदेव के प्रति यह प्रश्न किया गया कि काल क्या है ? उसका सूक्ष्मतम और महत्तम रूप क्या है ? इसका उत्तर देते हुए शुकदेव का कथन है कि “विषयों का रूपान्तर (बदलना) ही काल का आकार है। उसी को निमित्त बना वह काल तत्त्व अपने को अभिव्यक्त करता है। वह अव्यक्त से व्यक्त होता है। इस कथन के अनुसार काल अमूर्त तत्त्व है तथा घटने वाली घटनाओं से ही इसे ज्ञात किया जा सकता है।

mahabharat mai jyotish

आज भी विज्ञान इस तथ्य को स्वीकार करता है।
महर्षि वेदव्यास ने शान्ति पर्व में भीष्म पितामह और युधिष्ठिर के संवाद में काल का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में भीष्म द्वारा दूरदर्शी, तत्कालज्ञ और दीर्घसूत्री-इन तीन मत्स्यों का दृष्टान्त देते हुए काल को परिभाषित किया गया है, जिसके अनुसार काष्ठा, कला, मूहूर्त, दिन, रात, लव, मास, पक्ष, छः ऋतुएं, संवत्सर

और कल्प इन्हें ‘काल’ कहा जाता है तथा पृथ्वी को देश कहा जाता है। इनमें से पृथ्वी का तो दर्शन होता है किन्तु काल दिखायी नहीं देता है। अतः अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि के लिए जिस देश और काल को उपयोगी मानकर उसका विचार किया जाता है, उसको ठीक-ठीक ग्रहण करना चाहिए। मनुष्यों में काल को ही कार्य-सिद्ध हेतु देश और काल को प्रधान माना गया है तथा धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और मोक्षशास्त्र में भी इन देश और काल को कार्य सिद्धि का प्रधान उपाय माना
mahabharat mai jyotish

काङ्क्षमाणाः श्रियं कृत्स्नां पृथिव्यां च महद् यशः । कृतान्तविधिसंयुक्ताः कालेन निधनं गताः ।। कर्मसूत्रात्मकं विद्धि साक्षिणं शुभपापयोः । सुख दुःखगुणोदकं कालं कालफलप्रदम् ।।
महा. भा. शान्ति पर्व 33.15-19 2 भा. विज्ञा. उज्ज्व. परं पृ. 83

गया है। अतः जो मनुष्य सोच-विचार कर तथा सतत् सावधान होकर, अपने अभीष्ट देश और काल का ठीक-ठीक उपयोग करता है, वह उनके सहयोग से इच्छित फल प्राप्त कर लेता है। इस वर्णन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में काल के महत्व और उसके उचित उपयोग से सभी भली-भांति परिचित थे।

महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के शान्ति पर्व में काल गणना हेतु सूक्ष्म माप का वर्णन किया है। इस पर्व में महर्षि व्यास द्वारा अपने पुत्र शुकदेव को काल के विभाग को समझाते हुए कथन हैं –

काष्ठा निमेषा दशपञ्च चैव
त्रिंशत्रु काष्ठा गणयेत् कलांताम्। त्रिंशत्कालश्चापि भवेन्मूहूर्ता
भागः कलाया दशमश्चयः स्यात्।। त्रिंशन्मूहूर्त तु भवेदहश्च
रात्रिश्च संख्या मुनिभिः प्रणीता। मासः स्मृतोरात्र्यहनीच त्रिंशत्
संवत्सरो द्वादशमास उक्तः ।।

अर्थात् पंद्रह निमेष की एक काष्ठा और तीस काष्ठा की एक कला गिननी चाहिए। तीस कला का एक मूहूर्त होता है। उसके साथ कला का दसवां भाग और सम्मिलित होता है अर्थात् तीस कला और तीन काष्ठा का एक मूहूर्त होता है।

तीस
काष्ठाः कला मूहूर्ताश्च दिवा रात्रिस्तथा लवाः । मासाः पक्षाः षड्ऋतृवः कल्पः संवत्सरास्तथा।। परीक्ष्यकारी युक्तश्च स सम्यगुपपादयेत् । देशकालवीभप्रेतौ ताभ्यां फलमवाप्नुयात् ।।
महा. भा. शान्ति. पर्व. 137.21-24 2 महा. भा. शान्ति पर्व. 231.12-13
,

मूहूर्त का एक दिन-रात होता है। महर्षियों ने दिन और रात्रि के मूहूर्तों की संख्या उतनी ही बतायी है। तीस रात-दिन का एक मास और बारह मासों का एक संवत्सर बताया गया है। इस वर्णन के अनुसार व्यास ऋषि ने गणना करते हुए कहा है –
1 काष्ठा

15 निमेष 30 काष्ठा 303 कला 30 मूहूर्त 30 दिन

mahabharat mai jyotish

1 कला 1 मूहूर्त 1 दिन
1 मास 1 संवत्सर (वर्ष)

12 मास

यहां महाभारतकार ने काल की सामान्य इकाई (माप) बतायी है।
इस काल का सूक्ष्मतम अंश परमाणु तथा महत्तम अंश ब्रह्म आयु माना गया है। इसे विस्तृत रूप में बताते हुए शुकमुनि उसके विभिन्न मापों का उल्लेख करते हैं यथा –

2 परमाणु 3 अणु 3 त्रसरेणु 100 त्रुटि 3 वेध
1 अणु – 1 त्रसरेणु – 1 त्रुटि – 1 वेध – 1 लव – 1 निमेष – 1क्षण – 1 काष्ठा – 1 लघु
15 लघु –
2 नाड़िका 30 मूहूर्त 7 दिन रात – 2 सप्ताह
1 नाड़िका 1 मूहूर्त 1 दिन रात 1 सप्ताह
1 पक्ष
2 पक्ष
1 मास
2 मास
1 ऋतु
3 लव 3 निमेष 5 क्षण 15 काष्ठा

ऋतु

1 अयन
2 अयन
1 वर्ष
शुकमुनि की उपर्युक्त गणना के अनुसार एक दिन रात में 3280500000 परमाणु काल होता है तथा एक दिन रात में 86400 सेकेण्ड होते हैं। इसका अर्थ है सूक्ष्मतम माप अर्थात् –

1 परमाणु काल = 1 सेकेण्ड का 37968वां हिस्सा।’
प्राचीन भारत में काल विभाजन अत्यन्त सूक्ष्मता के साथ किया गया था। ई. स. 1564-1642 में ‘गैलिलियो द्वारा पहली बार समय का विभाजन ‘सेकेण्ड’ के रूप में किया गया ऐसा पाश्चात्य विद्वानों का अभिप्राय है, किन्तु महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में सेकण्ड का भी विभाजन कर व्यक्त किया है।

प्राचीन काल में अमरकोष, विष्णुपुराण, मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में भी समय की गणना दिखाई देती है। यथा – नीचे निम्नवत् तालिका है –
1/4 निमेष = 1 त्रुटि 2 त्रुटि = 1 लव 2 लव = 1 निमेष 5 निमेष = 1 काष्ठा 10 काष्ठा = 1 कला 40 कला = 1 नाडिका
2 नाडिका = 1 मूहूर्त 15 मूहूर्त = 1 अहोरात्र 7 अहोरात्र = 1 सप्ताह 15 अहोरात्र = 1 पक्ष
2 पक्ष
= 1 मास
12 मास
= 1 वर्ष

प्राचीनकाल में दिनों और मासों का नाम निश्चित करने के लिए भी चन्द्रमा की कलाओं ग्रहों और नक्षत्रों की गति पर आधारित पूर्णतया वैज्ञानिक पद्धति विकसित की गई थी। अतः यह जानकर आश्चर्य होता है कि काल का यह अतिसूक्ष्म ज्ञान कैसे सम्भव हो सका होगा ? वेदाङ्ग ज्योतिष तथा ज्योतिष के तत्कालीन अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों के अतिरिक्त इसका उल्लेख कल्प सूत्र, निरूक्त, व्याकरण ग्रन्थों मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति तथा महाभारत में भी मिलता है।’

भा. विज्ञा. उज्ज्व. परं. पृ. 84 2 सं. विज्ञा. पृ. 80
काल ज्योतिष के विद्वानों के अनुसार, काल को मापने हेतु बड़ी इकाईयों (जैसे – युग, चतुर्युग, कल्प, मन्वन्तर तथा छोटी इकाईयों (जैसे – लव, निमेष, मूहूर्त आदि) की आवश्यकता होती है।

महाभारत युग में काल गणना हेतु बड़ी इकाईयों का प्रयोग प्रचलित था। प्राचीन ज्योतिषविदों के अनुसार, विश्व के जीवनकाल को चार युगों में बांटा गया है, यथा – कृत, त्रेता, द्वापर और कलियुग। आधुनिक समय में कलियुग चल रहा है। मनुस्मृति, पुराण और महाभारत के कथनानुसार यह माना जाता है कि कलियुग के अन्त में प्रलय होगा और तब नयी सृष्टि होगी। अतः प्रत्येक युग के आरम्भ में संध्या है और अन्त में सन्ध्यांश है। इस सन्दर्भ में वर्षों की संख्या निम्नलिखित हैं –
mahabharat mai jyotish

कृत
2000
युग वर्ष
युग
वर्ष संध्या 400
संध्या 200 (सतयुग)
मुख्य भाग 4000 द्वापर
मुख्य भाग संध्यांश400
संध्यांश200 त्रेता ( संध्या 300
संध्या 100 __ मुख्य भाग 3000 कलि
मुख्य भाग संध्यांश 300
संध्यांश100 चारों युग मिलकर = 1 दैवयुग = 12,000 वर्ष

1000 दैवयुग = ब्रह्मा का 1 दिन 1000 इस वर्णन में जिन वर्षों की संख्या दी गयी है वे मानव वर्ष नहीं हैं अपितु दैव वर्ष है तथा प्रत्येक दैव वर्ष 360 मानव वर्षों के बराबर होता है।

महाभारत के शान्ति पर्व में महर्षि व्यास तथा शुकदेव के मध्य चारों युगों के वर्ष आदि की काल गणना का विस्तृत उल्लेख किया गया है। इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास का कथन है कि देवताओं के चार हजार वर्षों का एक कृत युग (सत्य युग) होता है। इस युग में चार सौ दिव्य वर्षों की संध्या तथा उतने ही वर्षों का एक संध्यांश भी होता है। संध्या और संध्यांशों सहित अन्य तीन युगों में यह संख्या क्रमशः एक-एक चौथाई घटती जाती है।’ इस कथन को गणित के नियमानुसार निम्नलिखित रूप से स्पष्ट किया जा सकता है –

देवताओं का सत्ययुग = 4000 वर्ष
400 दिव्य वर्ष (संध्या)
400 दिव्यवर्ष (संध्यांश) कुल सत्ययुग = 4800 वर्ष तथा क्रमानुसार प्रत्येक युग 1/4 वर्ष कम होता जाता है।
त्रेता युग = 4800 – 4800 x 1/4
4800 – 1200
3600 वर्ष द्वापर युग 3600-4800 x 1/4
3600 – 12000
2400 वर्ष कलियुग
2400 – 4800 x 1/4
2400 – 1200 = 1200 वर्ष

mahabharat mai jyotish

इस तरह, संध्या तथा संध्यांशों सहित सत्य युग 4800 वर्षों का, त्रेतायुग 3600 वर्षों का, द्वापर युग 2400 वर्षों का और कलियुग 1200 वर्षों का होता है तथा कुल मिलाकर चारों युग 12000 वर्षों का होता है।

महर्षि वेदव्यास द्वारा पुनः शुकदेव के प्रति ब्रह्मा के दिन की काल गणना करते हुए कथन है कि देवताओं के बारह हजार वर्षों का एक चतुर्यग होता है, यह विद्वानों की मान्यता है। एक सहस्र चतुर्युग को ब्रह्मा का एक दिन बताया जाता है। इतने ही युगों की उनकी एक रात्रि भी होती है। भगवान ब्रह्मा अपने दिन के

ये ते रात्र्यहनी पूर्व कीर्तिते जीवलौकिके। तयोः संख्याय वर्षाग्रं ब्राह्मे वक्ष्याम्यहःक्षपे।।
इतरेषु ससंध्येषु संध्यांशेषु ततस्त्रिषु । एकपादेन हीयन्ते सहस्राणि शतानि च।।महा. भा. शान्ति पर्व 231.18-21

आरम्भ में संसार की सृष्टि करते हैं और रात में जब प्रलय का समय होता है, तब सबको अपने में लीन करके योगनिद्रा का आश्रय ले सो जाते हैं, फिर प्रलय का अन्त होने अर्थात् रात बीतने पर वे जाग उठते हैं। एक हजार चतुर्युग का जो ब्रह्मा का एक दिन बताया गया है और उतनी ही बड़ी जो उनकी रात्रि कही गयी है, उसको जो लोग ठीक-ठीक जानते हैं वे ही दिन और रात अर्थात् काल तत्त्व को जानने वाले हैं।’ इस वर्णन के अनुसार, व्यास ऋषि का कथन है कि
12000 वर्ष 1000 चतुर्युग 1000 चतुर्युग

1 चतुर्युग 1 दिन (ब्रह्मा का) 1 रात्रि (ब्रह्मा की)
mahabharat mai jyotish

यहां भी वर्ष का तात्पर्य मानव वर्ष नहीं अपितु दैव वर्ष है। अतः इस कथन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में काल ज्योतिष का गूढ़ ज्ञान प्रचलित था। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के आदि पर्व में पांच वर्षों के एक युग का उल्लेख किया है।

इस सन्दर्भ में पाण्डवों के जन्म के प्रसङ्ग में ऋषि वैशम्पायन द्वारा जनमेजय के प्रति कथन है कि एक-एक वर्ष के अन्तर से उत्पन्न हुए कुरूओं में श्रेष्ठ पाण्डु के वे पांचों पुत्र (युग के) पांच वर्षों के समान लगते थे।’ इस वर्णन में पांचों पाण्डवों से पञ्च संवत्सरों की उपमा दी गयी है। इन पांचों वर्षों के युग की अपेक्षा बड़े युग की कल्पना महाभारत काल में पूर्ण हो गयी थी, इसमें संशय नहीं है।
mahabharat mai jyotish

एतां द्वादशसाहस्री युगाख्यां कषयो विदु: सहस्रपरिवर्तं तद् ब्राह्म दिवसमुच्यते।।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदोजनाः ।। महा. भा. शान्ति पर्व 231.29-31

अनुसंवत्सरं जाता अपि ये कुरुसत्तमाः ।। पाण्डुपुत्रा व्यराजन्त पञ्च संवत्सरा इव।। महा. भा. आदि पर्व. 123.22 3 भा. ज्यो. इति. पृ. 71

महाभारतकार ने महाभारत में कहीं-कहीं चतुर्युग को सिर्फ युग कहा है। इस सन्दर्भ में महाभारत के वन पर्व में महर्षि मार्कण्डेय द्वारा चारों युगों की वर्ष–संख्या का वर्णन करते हुए युधिष्ठिर के प्रति कथन है कि बारह हजार दिव्य वर्षों का चतुर्युग होता है। यहां बारह सहस्रों की संज्ञा ‘युग’ है।

मनुस्मृति तथा अन्य ज्योतिष ग्रन्थों में भी यही गणना स्वीकार की गयी है। उनमें इतना और कह दिया गया है कि चतुर्युगों के बारह हजार वर्ष मानवी वर्ष नहीं है बल्कि देवताओं के वर्ष हैं। अर्थात्
मानवी एक वर्ष = देवताओं का एक दिन मानवी 360 वर्ष = देवताओं का एक वर्ष
इस सन्दर्भ में भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में भी ‘चतुर्युग’ की गणना का उल्लेख किया है।

mahabharat mai jyotish

महाभारत तथा मानव शरीर विज्ञान