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sutra 19-30

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

advaita  vedanta  adhyay  1  paad  1-19-30

सम्बन्ध-परब्रह्म परमात्माके सिवा, प्रकृति या जीवात्मा कोई भी ‘आनन्द मय’ शब्दसे गृहीत नहीं हो सकता; इस बातको दृढ़ करते हुए प्रकरणका उपसंहार करते हैं

अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १।१९॥

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

व्याख्या- तै० उ० (२८)मे श्रुति कहती है कि इस आनन्दमय परमात्माके तत्वको इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् अन्नमयादि समस्त शरीरोके आत्मस्वरूप आनन्दमय ब्रमको प्राप्त हो जाता है ।’ बृहदारण्यको थी श्रुतिका कथन है कि (ब्रह्मको जाननेवाला पुरुष ) ब्रह्मरूप होकर ही ब्रह्ममे लीन होता है। (बृह० उ० ४ । ४ । ६) श्रुतिके इन वचनोसे यह खत सिद्ध हो जाता है कि जड प्रकृति या जीवात्माको ‘आनन्दमय’ नहीं माना जा सकता, क्योकि चेतन जीवात्मा का जड प्रकृतिमे अथवा अपने ही-जैसे परतन्त्र दूसरे किसी जीवमे लय होना नहीं बन सकता । इसलिये एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही ‘आनन्दमय’ शब्दका वाच्यार्थ है और वही सम्पूर्ण जगत्का कारण है,
दूसरा कोई नहीं ।

सम्बन्ध- तैत्तिरीय श्रुतिमें जहाँ आनन्दमयका प्रकरण आया है, वह ‘विज्ञानमय’ शब्दसे जीवात्माको ग्रहण किया गया है, किन्तु बृहदारण्यक (४।४।२२ ) में ‘विज्ञानमय’ को हृदयाकाशमें शयन करनेवाला अन्तरात्मा बताया गया है। अतः जिज्ञासा होती है कि वहाँ विज्ञानमय’ शब्द जीवात्मा का वाचक है अथवा ब्रहाका ?

इसी प्रकार छान्दोग्य (१।६।६ ) में जो सूर्यमण्डलानर्वती हिरण्मय पुरुषका वर्णन आया है, वहाँ भी यह शङ्का हो सकती है कि इस मन्त्रमें सूर्य के अधिष्ठाता देवताका वर्णन हुआ है या ब्रह्मका ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है,

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अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ १।१।२० ॥

अन्तः हृदयके भीतर शयन करनेवाला विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलके भीतर स्थित हिरण्मय पुरुष ब्रह्म है; तद्धर्मोपदेशात्= क्योकि (उसमे ) उस ब्रह्मके धर्मोका उपदेश किया गया है।

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व्याख्या- उपर्युक्त बृहदारण्यक-श्रुतिमे वर्णित विज्ञानमय पुरुपके लिये इस प्रकार विशेषण आये है–सर्वस्य वशी सर्वस्येशान. सर्वस्याधिपतिः एष सर्वेश्वर एप भूतपालः’ इत्यादि । तथा छान्दोग्यवर्णित सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती पुरुषके लिये सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदिनः ( सब पापोसे ऊपर उठा हुआ ) यह विशेषण दिया गया है। ये विशेषण परब्रह्म परमेश्वरम ही सम्भव हो सकते है। किसी भी स्थिति को प्राप्त देव, मनुष्य आदि यानियोंमें रहनेवाले जीवात्माके ये धर्म नहीं हो सकते। इसलिये वहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष ममझना चाहिये; अन्य किसीको नहीं ।

सम्बन्ध-इसी बानको सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं

भेदव्यपदेशाच्चान्यः ॥ १।१।२१ ॥

च-तथा; भेदव्यपदेशात् भेदका कयन होनेसे; अन्याः सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भिन्न है।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद्के अन्तर्यामिब्राह्मणमें कहा है कि-‘य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः । अर्थात् जो सूर्यमें रहनेवाला सूर्यका अन्तर्वर्ती है, जिसे सूर्य नहीं जानता, सूर्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर सूर्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इस प्रकार वहाँ सूर्यान्तर्वर्ती पुरुषका सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भेद बताया गया है। इसलिये वह हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठातासे भिन्न परब्रह्म परमात्मा ही है ।

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सम्बन्ध- यहॉतकके विवेचनसे यह सिद्ध किया गया कि जगत्की उत्पत्ति स्थिति और प्रलयका निमित्त और उपादान कारण परब्रह्म परमेश्वर ही है। जीवात्मा या जड़ प्रकृति नही । इसपर यह जिज्ञासा होती है कि श्रुति (छा०३० १।९।१ ) में जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण आकाशको भी बताया गया है, फिर ब्रह्मका लक्षण निश्चित करते हुए यह कैसे कहा गया कि जिससे जगत्के जन्म आदि होते हैं, वह ब्रह्म है । इसपर कहते हैं–

आकाशस्तल्लिंडात् ॥ १।१।२२॥

आकाशः=(वहाँ ) ‘आकाश’ शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है; तल्लिङ्गात्-क्योकि ( उस मन्त्रमे ) जो लक्षण बताये गये हैं, वे उस ब्रह्मके ही हैं।
व्याख्या- छान्दोग्य (१ । ९ । १ ) में इस प्रकार वर्णन आया है ‘सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशम्प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो होवेभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् । अर्थात् ‘ये समस्त भूत (पञ्चतत्त्व और समस्त प्राणी) निःसन्देह आकाशसे ही उत्पन्न होते है और आकाशमे ही विलीन होते हैं । आकाश ही इन सबसे श्रेष्ठ और बड़ा है। वही इन सबका परम आधार है।’ इसमे आकाशके लिये जो विशेषण आये है, वे भूताकाशमे सम्भव नहीं हैं। क्योंकि भूताकाश तो स्वयं भूतोंके समुदायमे आ जाता है । अतः उससे भूतसमुदायकी या प्राणियोंकी उत्पत्ति बतलाना सुसङ्गत नहीं है। उक्त लक्षण एकमात्र परब्रह्म परमात्मामे ही सङ्गत हो सकते है । वही
सर्वश्रेष्ठ, सबसे बड़ा और सर्वाधार है; अन्य कोई नहीं । इसलिये यही सिद्ध होता है कि उस श्रुतिमे ‘आकाश’ नामसे परब्रह्म परमेश्वरको ही जगतका कारण बताया गया है।

सम्बन्ध-अब प्रश्न उठता है कि श्रुति (छा० उ०१।११।५) मे आकाशकी ही भॉति प्राणको भी जगत्का कारण बतलाया गया है। वहाँ ‘प्राण’ शब्द किसका वाचक है ? इसपर कहते है,

महाभारत में वैज्ञानिक तत्त्व

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अत एव प्राणः ॥ १।१ । २३॥

अत एव-इसीलिये अर्थात् श्रुतिमे कहे हुए लक्षण ब्रह्ममे ही सम्भव है, इस कारण वहाँ; प्राणः प्राण (भी ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- छान्दोग्य (१ । ११ । ५) मे कहा है कि सर्वाणि हवा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते । अर्थात् निश्चय ही ये सब भूत प्राणने ही विलीन होते हैं और प्राणसे ही उत्पन्न होते है। ये लक्षण प्राणवायुमे नहीं घट सकते क्योकि समस्त प्राणियोकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का कारण प्राणवायु नहीं हो सकता । अत. यहाँ ‘प्राण’ नामसे ब्रह्मका ही वर्णन हुआ है, ऐसा मानना चाहिये ।

पूर्व प्रकरणमें तो ब्रह्मसूचक लक्षण होनेसे आकाश तथा प्राणको ब्रह्मका वाचक मानना उचित है। किन्तु छान्दोग्योपनिषद (३।१३।७) में जिस ज्योति (तेज )को समस्त विश्वसे उपर सर्वश्रेष्ठ परमधाममें प्रकाशित बताया है तथा जिसकी शरीरान्तर्वी पुरुषमें स्थित ज्योतिके साथ एकता बतायो गयी है, उसके लिये वहाँ कोई ऐसा लक्षण नहीं बताया गया है, जिससे उसको ब्रह्मका वाचक माना जाय ।

इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त ज्योतिः’ शब्द किसका वाचक हे ? इसपर कहते हैं—

ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॥ १।१।२४ ॥

चरणाभिधानात्=( उस प्रसङ्गमे ) उक्त ज्योतिके चार पादोका कथन होने से; ज्योति: ज्योति’ शब्द वहाँ ब्रह्मका वाचक है ।

व्याख्या – छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायमे ज्योति.’का वर्णन इस प्रकार हुआ है, अथ यदत. परो दिवो ज्योतिदीप्यते विश्चत. पृष्ठेषु सर्वत पृष्ठेष्वनुत्तमे वृत्तमेधुलोकेश्विदं वाव तयदिदमस्मिन्नन्त पुरुष ज्योति । (३।१३१७) अर्थात् जो इस वर्गलोकसे ऊपर परम ज्योति प्रकाशित हो रही है, वह समस्त विश्वके पृष्ठपर (सबके ऊपर ) जिससे उत्तम दूसरा कोई लोक नहीं है, उस सर्वोत्तम परमधाममे प्रकाशित हो रही है, वह निस्सन्देह यही है जो कि इस पुरुषमें आन्तरिक ज्योति है । इस प्रसङ्गमें आया हुआ ‘ज्योतिः’ शब्द जड प्रकाशका वाचक नहीं है, यह बात तो इसमे वर्णित लक्षणोंसे ही स्पष्ट हो जाती है । तथापि यह ‘ज्योति शब्द किसका वाचक है ?

ज्ञानका या जीवात्माका अथवा ब्रह्मका ? इसका निर्णय नहीं होता अतः सूत्रकार कहते हैं कि यहाँ जो ज्योति शब्द आया है, वह ब्रह्म का ही वाचक है; क्योंकि इसके पूर्व बारहवें खण्डमे इस ज्योतिर्मय ब्रह्मके चार पादोंका कथन है और समस्त भूतसमुदायको उसका एक पाद बताकर शेष तीन पादोंको अमृतखरूप तथा परमधाममें स्थित बताया है । इसलिये इस प्रसङ्गमे आया हुआ ज्योतिः’ शब्द ब्रह्मके सिवा अन्य किसीका वाचक नहीं हो सकता । माण्डूक्योपनिषद्मे आत्माके चार पादोंका वर्णन करते हुए उसके दूसरे पादको तैजस कहा है । यह ‘तेजस’ भी ज्योतिः’का पर्याय ही है । अतः ‘ज्योतिः’की भाँति ‘तेजस’ शब्द भी ब्रह्मका ही वाचक है,
जीवात्मा या अन्य किसी प्रकाशका नहीं। इस बातका निर्णय भी इसी प्रसङ्गके अनुसार समझ लेना चाहिये।

सम्बन्ध- यहाँ यह शङ्का होती है कि छान्दोग्योपनिषद्के तीमरे अध्याय के बारहवें खण्डमें ‘गायत्री के नामसे प्रकरणका आरम्भ हुआ है। गायत्री एक छन्दका नाम है । अत: उस प्रसङ्गमें ब्रह्मका वर्णन है, यह कैसे माना जाय ? इसपर कहते हैं,

छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगदात
तथा हि दर्शनम् ॥ १।१।२५॥

चेत् यदि कहो ( उस प्रकरणमे ); छन्दोऽभिधानात् गायत्री छन्दका कथन होनेके कारण ( उसीके चार पादोंका वर्णन है) न-ब्रह्मके चार पादोंका वर्णन नहीं है; इति न-तो यह ठीक नहीं ( क्योंकि); तथा उस प्रकारके वर्णनद्वारा वह मन्त्र इस प्रकार है,

तावानस्य महिमा ततो ज्यायारच पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्या मृनं दिवि ।। (छा० उ. ३ । १२ । ६)

चेतोऽर्पणनिगदात् ब्रह्ममे चित्तका समर्पण बताया गया है; तथा हि दर्शनम् = वैसा ही वर्णन दूसरी जगह भी देखा जाता है ।

व्याख्या पूर्व प्रकरणमे गायत्री ही यह सब कुछ है। (छा० उ०३ । १२ । १) इस प्रकार गायत्रीछन्दका वर्णन होनेसे उसीके चार पादोका वहाँ वर्णन है, ब्रह्मका नहीं; ऐसी धारणा बना लेना ठीक नहीं है। क्योकि गायत्रीनामक छन्दके लिये यह कहना नहीं बन सकता कि यह जड़-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् गायत्री ही है ।

इसलिये यहाँ ऐसा समझना चाहिये कि सबके परम कारण सर्वात्मक परब्रह्म परमेश्वरमे चित्तका समाधान करानके लिये उस ब्रह्मका ही वहाँ इस प्रकार गायत्री-नामसे वर्णन किया गया है । इसी तरह अन्यत्र भी उद्गीथ, प्रणव आदि नामोके द्वारा ब्रह्मका वर्णन देखा जाता है । सूक्ष्म तत्वमे बुद्धिका प्रवेश करानके लिये, किसी प्रकारको समानताको लेकर स्थूल वस्तुके नामसे उम्मका वर्णन करना उचित ही है।

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सम्बन्ध- इस प्रकरणमै ‘गायत्री’ शब्द ब्रह्मका ही वाचक है, इस बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं—

भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् ॥ १।१।२६ ॥

भृतादिपादव्यपदेशोपपत्तेः-( यहाँ ब्रह्मको ही गायत्रीके नामसे कहा गया है, यह माननेमे ही ) भूत आदिको पाद बतलाना युक्तिसंगत हो सकता है, इमलिये; च-भी; एवम् ऐसा ही है ।

व्याख्या- छान्दोग्य (३ । १२) के प्रकरणमे गायत्रीको भूत, पृथिवी, शरीर और हृदयरूप चार पाटोमे युक्त बताया गया है। फिर उसकी महिमाका वर्णन करते हुए ‘पुरुष’ नामसे प्रतिपादित परब्रह्म परमात्माके साथ उसकी एकता करके समस्त भूतोको ( अर्थात् प्राणि-समुदायको ) उसका एक पाद बतलाया गया है और अमृतस्वरूप तीन पादोको परमधाममे स्थित कहा गया है । ( छा० उ० ३ । १२।६) । इस वर्णनकी सगति तभी लग सकती है, जब कि गायत्री शब्दको गायत्री छन्दका वाचक न मानकर परब्रह्म परमात्माका वाचक माना जाय । इमलिये यही मानना ठीक है।

सम्बन्ध-उक्त सिद्धान्तकी पुष्टि के लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उपस्थित करके उसका समाधान करते हैं–

उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥ १।१।२७ ॥

चेत् यदि कहो; उपदेशभेदात्-उपदेशमें भिन्नता होनेसे न-गायत्रीशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं है, इति न तो यह कथन ठीक नहीं है। उभयलिन् अपि क्योकि दो प्रकारका वर्णन होनेपर भी; अविरोधात् ( वास्तवमें ) कोई विरोध नहीं है ।

व्याख्या यदि कहा जाय कि पूर्वमन्त्र ( ३ । १२ । ६ ) मे तो तीन पाद दिव्य लोकमे हैं। यह कहकर दिव्य लोकको ब्रह्मके तीन पादोका आधार बताया गया है और बादमे आये हुए मन्त्र (३ । १३ । ७ ) मे ‘ज्योतिः’ नामसे वर्णित ब्रह्मको उस दिव्य लोकसे परे बताया है । इस प्रकार पूर्वापरके वर्णन मे भेद होनेके कारण गायत्रीको ब्रह्मका वाचक बताना सङ्गत नहीं है, तो यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि दोनो जगह के वर्णनको शैलीमे किञ्चित् भेद होनेपर भी वास्तवमे कोई विरोध नहीं है । दोनो स्थलोमे श्रुतिका उद्देश्य गायत्रीशब्द वाच्य तथा ज्योतिःशब्दवाच्य ब्रह्मको सर्वोपरि परम धाममे स्थित बतलाना ही है ।

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सम्बन्ध- अत एव प्राण (१।११२३) इस सूत्रमें यह सिद्ध किया गया है कि श्रुतिमें ‘प्राण’ नामसे ब्रह्मका ही वर्णन है। किन्तु कौपीतकि-उपनिषद (३ । २) में प्रतर्दनके प्रति इन्द्रने कहा है कि ‘मैं ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ; तू आयु तथा अमृतरूपसे मेरी उपासना कर । इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि इस प्रकरणमें आया हुआ ‘प्राण’ शब्द किसका वाचक है ? इन्द्रका ? प्राणवायुका ? जीवात्माका ? अथवा ब्रह्मका इसपर कहते हैं—

प्राणस्तथानुगमात् ॥ १।१।२८ ॥

प्राणः प्राणशब्द ( यहॉ ब्रह्मका ही वाचक है); तथानुगमात-क्योकि पूर्वापरके प्रसङ्गपर विचार करनेसे ऐसा ही ज्ञात होता है।

व्याख्या– इस प्रकरणमे पूर्वापर प्रसङ्गपर भलीभाँति विचार करनेसे ‘प्राण’ शब्द ब्रह्मका ही वाचक सिद्ध होता है, अन्य किसीका नहीं; क्योंकि आरम्भमे प्रतर्दनने परम पुरुषार्थरूप वर माँगा है । उसके लिये परम हितपूर्ण इन्द्रके उपदेशमें कहा हुआ ‘प्राण’ ‘ब्रह्म’ ही होना चाहिये । ब्रह्मज्ञानसे बढ़कर दूसरा कोई हितपूर्ण उपदेश नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त उक्त प्राणको वहाँ प्रज्ञान खरूप बतलाया गया है, जो कि ब्रह्मके ही अनुरूप है तथा अन्तमे उसीको आनन्दस्वरूप अजर एवं अमर कहा गया है। फिर उसीको समस्त लोकोंका पालक, अधिपति एवं सर्वेश्वर बताया गया है । ये सब बाते ब्रह्मके ही उपयुक्त है । प्रसिद्ध प्राणवायु, इन्द्र अथवा जीवात्माके लिये ऐसा कहना उपयुक्त नहीं हो सकता । इसलिये यही समझना चाहिये कि यहाँ ‘प्राण’शब्द ब्रह्मका ही वाचकहै।

सम्बन्ध-उक्त प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्ट शब्दोंमे स्वय अपनेको ही प्राण कहा है । इन्द्र एक प्रभावशाली देवता तथा अजर, अमर है ही; फिर वहाँ ‘प्राण’ गन्द्रको इन्द्रका हो वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं

न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्ध
भूमा ह्यस्मिन् ॥ १।१।२९॥

चेत् यदि कही; वक्त: वक्ता (इन्द्र ) का ( उद्देश्य ); आत्मोपदेशान् अपनको ही प्राग’ नाम से बतलाना है, इसलिये न-प्रागशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकताः इति= नो ) यह कयनः (न)-ठीक नहीं है; हि-क्योंकि; असिन् इस प्रकरणम; अध्यात्मसम्बन्धभृमा अध्यात्मसम्बन्धी उपदेशकी बदलता है।

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व्याख्या- यदि कहा कि इस प्रकरणमे इन्द्रने स्पटरूपसे अपने आपको ही प्राण बतलाया है, ऐसी परिस्थितिमे प्राण गडको इन्द्रका वाचक न मानकर ब्रह्मका वाचक मानना ठीक नहीं है, तो ऐसा कहना उचित नहीं है, क्योकि इस प्रकरणमे अध्यान्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता है । यहो आधिदैविक वर्णन नहीं है, अत उपास्यरूपये बतलाया हुआ तत्त्व इन्द्र नहीं हो सकता । इसलिये यहाँ ‘प्राण’ शब्दको ब्रह्मका ही वाचक समझना चाहिये ।

कौषीतकि-उपनिषद्म या प्रसङ्ग इस प्रकार है म होवाच प्रतर्दनस्वमेव वृणीव यं त्वं मनुप्याय हिततमं मन्यस इति…। (को० उ० ३ । १) स होवाच प्राणोऽसि प्रजात्मा ।।(को० उ० ३।२) ‘एप प्राण एवं प्रज्ञात्माss नन्दोऽजरोऽमृतः…..एप लोकपाल एप लोकाधिपतिरेष सर्वेश्वरः ।(को० उ०३।९) इस प्रसङ्गमें अध्यात्ममम्बन्धी वर्णनकी बहुलता किस प्रकार है, यह पूर्वसूत्रकी टिप्पणीम देखें।

यहाँ यह प्रश्न उठता है कि यदि ‘प्राण’ शब्द इन्द्रका वाचक नहीं है तो इन्द्रने जो यह कहा कि ‘मै ही प्रज्ञानस्वरूप प्राण हूँ, तू मेरी उपासना कर ।’ इस कथनकी क्या गति होगी ? इसपर कहते हैं

शास्त्रदृष्टया तूपदेशो वामदेववत् ॥ १ । १ । ३० ॥

उपदेश: ( यहाँ) इन्द्रका अपनेको प्राण बतलाना; तु-तो; वामदेववत् वामदेवकी भाँति; शास्त्रदृष्टया ( केवल ) शास्त्र-दृष्टि से है ।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (१।४।१०) मे यह वर्णन आया है कि तद् यो यो देवानां प्रत्यबुद्धयत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धत त्पश्यनृषिर्वामठेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभव सूर्यश्चेति । अर्थात् ‘उस ब्रह्मको देवताओंमे जिसने जाना, वही ब्रह्मरूप हो गया । इसी प्रकार ऋषियो और मनुष्योमें भी जिसने उसे जाना,

वह तद्रूप हो गया। उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना कि मै मनु हुआ और मै ही सूर्य हुआ।’ इससे यह बात सिद्ध होती है कि जो महापुरुष उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है, वह उसके साथ एकताका अनुभव करता हुआ ब्रह्मभावापन्न होकर ऐसा कह सकता है ।

अतएव उस वामदेव ऋषिकी भाँति ही इन्द्रका ब्रह्मभावापन्न अवस्थामे शास्त्रदृष्टिसे यह कहना है कि मैं ही ज्ञानखरूप प्राण हूँ अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हूँ। तू मुझ परमात्माकी उपासना कर ।’ अतः ‘प्राण’शब्दको ब्रह्मका वाचक माननेमे कोई आपत्ति नहीं रह जाती है।

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सम्बन्ध- प्रकारान्तरसे शङ्का उपस्थित करके उसके समाधानद्वारा प्राणको ब्रह्मका वाचक सिद्ध करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते है,

जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रित त्वादिह तद्योगात् ॥ १। १ । ३१॥

सब लक्षण ब्रह्मके आश्रित है ( तथा ) इह तद्योगात् इस प्रसङ्गमें ब्रह्मके लक्षणोका भी कथन है, इसलिये ( यहाँ ‘प्राण’शब्द ब्रह्मकाही वाचक है)।
व्याख्या- कौपीतकि-उपनिपद् (३८) के उक्त प्रसङ्गमे जीवके लक्षणों का इस प्रकार वर्णन हुआ है, न वाच विजिज्ञासीत । वक्तार विद्यात् ।। अर्थात् ‘वाणीको जाननेकी इच्छा न करे । वक्ताको जानना चाहिये ।’

यहाँ वाणी आदि कार्य और करणके अध्यक्ष जीवात्माको जाननेके लिये कहा है । इसी प्रकार प्रसिद्ध प्राणके लक्षणका भी वर्णन मिलता है-‘अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति । (३।३) अर्थात् निस्सन्देह प्रज्ञानात्मा प्राण ही इस गरीरको ग्रहण करके उठाता है । शरीरको धारण करना मुख्य प्राणका ही धर्म है, इस कथनको लेकर यदि यह कहो कि ‘प्राण’शब्द ब्रह्मवाचक नहीं होना चाहिये, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि ब्रह्मके
अतिरिक्त जीव और प्राणको भी उपास्य माननेसे त्रिविध उपासनाका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, जो उचित नहीं है । इसके सिवा, जीव और प्राण आदिके धर्मोंका आश्रय भी ब्रह्म ही है, इसलिये ब्रह्मके वर्णनमे उनके धर्मोका आना अनुचित नहीं है । यहाँ ब्रह्मके लोकाधिपति, लोकपाल आदि लक्षणोंका भी स्पष्ट वर्णन मिलता है।

इन सब कारणोंसे यहाँ ‘प्राण’ शब्द ब्रह्मका ही वाचक है । इन्द्र, जीवात्मा अथवा प्रसिद्ध प्राणका नहीं यही मानना ठीक है।

पहला पाद सम्पूर्ण ।

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १।१ । १॥

सम्बन्ध- ध्यानका स्वरूप बतलाते हैं

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