Categories
vedant datshan

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

दूसरा पाद

सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् .॥ १ । २ । १॥

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

सर्वत्र सम्पूर्ण वेदान्त-वाक्योमे; प्रसिद्धोपदेशात्=( जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके कारणरूपपे ) प्रसिद्ध परब्रह्मका ही उपास्यदेवके रूपमें उपदेश हुआ है, इसलिये ( छान्दोग्यश्रुति ३ । १४ में बताया हुआ उपास्यदेव ब्रह्म ही है)।

ब्याख्या छान्दोग्योपनिषद् अध्याय ३ के चौदहवे खण्डके आरम्भमें सबसे पहले यह मन्त्र आया है, सर्व खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत । अथ खलु क्रतुमयः पुरुयो यथानुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेत. प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत । अर्थात् ‘यह सम्पूर्ण चराचर जगत् निश्चय ब्रह्म ही है; क्योकि यह उसीसे उत्पन्न हुआ है,

स्थितिके समय उसीमे चेष्टा करता हैं और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है । साधकको राग-द्वेषरहित शान्तचित्त होकर इस प्रकार उपासना करनी चाहिये

अर्थात् ऐसा ही निश्चयात्मक भाव धारण करना चाहिये क्योकि यह मनुष्य संकल्पमय है। इस लोकमे यह जैसे संकल्पसे युक्त होता है, यहाँसे चले जानेपर परलोकमे यह वैसा ही बन जाता है । अतः उसे उपर्युक्त निश्चय करना चाहिये ।’ इस मन्त्रवाक्यमे उसी परब्रह्मकी उपासना करनेके लिये कहा गया है, जिससे इस जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते है तथा जो समस्त वेदान्तवाक्योमें जगत्के महाकारणरूपसे प्रसिद्ध है । अतः इस प्रकरणमे बताया हुआ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा नहीं।

सम्बन्ध- यहाँ यह प्रश्न उठता है कि छा ० उ० (३।१४१२)में उपास्यदेवको मनोमय और प्राणरूप शरीरवाला कहा गया है। ये विशेषण जीवात्माके हैं। अतः उसको ब्रह्म मान लेनेसे उस वर्णनकी सङ्गति कैसे लगेगी ? इसपर कहते है–

विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ॥ १।२।२॥

च-तथा; विवक्षितगुणोपपत्तेः श्रुतिद्वारा वर्णित गुणोकी सङ्गति उस परब्रह्ममें ही होती है. इसलिये ( इस प्रकरणमे कथित उपास्यदेव ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- छा०३० (३।१४।२)मे उपास्यदेवका वर्णन इस प्रकार उपलब्ध होता है. मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः । अर्थात् ‘वह उपान्यदेव मनोमय, प्राणरूप शरीरवाला, प्रकाशस्वरूप, सत्य-संकल्प, आकाशके सदृश व्यापक, सम्पूर्ण जगत्का कर्ता, पूर्णकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस समस्त जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाणीरहित तथा सभ्रमशून्य है।’ इस वर्णनमे उपास्यटेवके जो उपादेय गुण बताये गये है, वे सब ब्रह्ममे ही सद्भत होते है । ब्रह्मको ‘मनोमय’ तथा ‘प्रागरूप शरीरवाला’ कहना भी अनुचित नहीं है; क्योंकि वह सबका अन्तर्यामी आत्मा है। केनोपनिपझे उसको मनका भी मन तथा प्राणका भी प्राण बताया है। इसलिये इस प्रकरणमे बतलाया हुआ उपाम्यदेव परब्रह्म परमेश्वर ही है।

सम्बन्ध- उपर्युक्त सूत्रमें श्रुतिवर्णित गुणोंकी उपपत्ति ( सङ्गति ) ब्रह्ममें श्रोत्रस्य श्रोनं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचर स उ प्राणस्य प्राणः । (के० उ०१। २) बतायी गयी: अब जीवात्मामें उन गुणोंकी अनुपति बनाकर पोत सिद्धान्ती पुष्टि की जाती है–

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥ १। २ । ३ ॥

तु-परन्तु अनुपपत्तेः-जीवात्मामें श्रुतिवर्णित गुगोंकी सङ्गति न होनेके कारगः शारीरा-जीवानाः न= इस प्रकरणनें कहा हुआ उपास्यदेव) नहीं है।

व्याल्या- उपासनाके लिये श्रुतिमें जो सत्य-संकल्पना, सर्वव्यापकता. सर्वात्मकता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुण बनाये गये हैं. वे जीवात्मानें नहीं पाये जाते; इस कारण इस प्रसङ्गने बताया हुआ उपास्यदेव जीवाला नहीं है. ऐसा मानना ही ठीक है।

सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे उसी वानको सिद्ध किया जाता है

कर्मकर्तृव्यपदेशाच ॥ १ ॥ २ ॥ ४ ॥

कर्मकर्तव्यपदेशात्-उक्त प्रकरणने उपान्यदेवको प्राप्तिक्रियाका कर्म अर्थात् प्राप्त होने योग्य कहा है और जीवात्माको प्रातिक्रियाका कर्ता अर्थात् उस ब्रह्मको प्राप्त करनेवाला बताया है, इसलिये; च-भी (जीवात्मा उपास्य नहीं हो सकता)।

व्याल्या- उ० (३ । १४ । ४) में कहा गया है कि ‘सर्वकर्मा आदि विशेषगोंसे युक्त ब्रह्म हो मेरे हृदय में रहनेवाल मेरा आत्मा है। मरने के बाद यहाँसे जाकर परलोकमें मैं इसीको प्राप्त होऊँगा !* इस प्रकार यहाँ पूर्वोक्त उपास्यदेवको प्राप्त होने योग्य तथा जीवात्माको उसे पानवाल कहा गया है। अतः यहाँ उपास्य देव परब्रह्म परमात्मा है और उपासक जीवात्मा । यही मानना उचित है।

सम्बन्ध प्रकारान्तरले पुनः उक्त चातकी ही पुष्टि करते हैं,
एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान् बोहर्वा याद्वा सर्षपाद् वा श्यानाकाद् वा श्यामाकतण्डुलाद् वैष म आन्नान्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरि क्षाज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥ (छ.० उ० ३।१४।३)
सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरतः सर्वमिदसम्यात्तोऽवाक्यनादर एपस आत्मान्तहृदय एतद् ब्रौतमिनः प्रेत्याभिसंसवितालि। (छ.उ.३।१४।४)

शब्दविशेषात् ॥ १।२। ५॥

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

शब्दविशेषात् ( उपास्य और उपासकके लिये ) शब्दका भेद होनेके कारण भी ( यह सिद्ध होता है कि यहाँ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है )।

व्याख्या- छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रमे कहा गया है* कि यह मेरे हृदयके अंदर रहनेवाला अन्तर्यामी आत्मा है । यह ब्रह्म है । इस कथनमें ‘एप.’ ( यह ) ‘आत्मा’ तथा ‘ब्रह्म’ ये प्रथमान्त शब्द उपास्यदेवके लिये प्रयुक्त हुए है और ‘मे’ अर्थात् ‘मेरा’ यह पष्ठयन्त पद भिन्नरूपसे उपासक जीवात्माके लिये प्रयुक्त हुआ है । इस प्रकार दोनोके लिये प्रयुक्त हुए शब्दोंमे भेद होनेके कारण उपास्यदेव जीवात्मासे भिन्न सिद्ध होता है । अतः जीवात्माको उपास्यदेव नहीं माना जा सकता ।

सम्बन्ध- इसके सिवा

स्मृतेः स्मृति-प्रमाणसे, ॥ १। २ । ६॥

च=भी ( उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है)।

व्याख्या- श्रीमद्भगवद्गीता आदि स्मृति-ग्रन्थसे भी उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है । जैसे- मय्येव मन आधख मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्व न संशयः ॥ ( गीता १२ । ८) ‘मुझमें ही मनको लगा और मुझमे ही बुद्धिको लगा, इसके पश्चात् तू मुझमे ही निवास करेगा अर्थात् मुझे ही प्राप्त करेगा; इसमे कुछ भी संशय नहीं है।’

अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयानि स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ (गीता ८ । ५) ‘और जो पुरुष अन्तकालमे मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्यागकर । जाता है, वह मेरे खरूपको प्राप्त होता है; इसमे कुछ भी संशय नहीं है।’

अतः इस प्रसङ्गके वर्णनमे उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, आत्मा या अन्य कोई नहीं । यही मानना ठीक है । ये दोनों मन्त्र चौबीसवें पृष्ठकी टिप्पणी में देखे ।

सम्बन्ध- छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रोंमें उपास्यदेवको हृदयमें स्थित एकदेशीय बतलाया है तथा तीसरे मन्त्रमें उसे सरसों और सावॉसे भी छोटा बताया है। इस अवस्थामें उसे परब्रह्म कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं

अर्भकौकस्त्वात्तव्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्य
त्वादेवं व्योमवच्च ॥ १।२ । ७॥

चेत यदि कहो अर्भकौकस्त्वात उपास्यदेव हृदयरूप छोटे स्थानवाला है, इसलिये; च तथा तद्वयपदेशात्-उसे अत्यन्त छोटा बताया गया है, इस कारण; न-वह ब्रह्म नहीं हो सकता इति न तो यह कहना ठीक नहीं है। निचाय्यत्वात्-क्योंकि ( वह ) हृदयदेशमें द्रष्टव्य है, इसलिये; एवम् उसके विषयमे ऐसा कहा गया है;
च-तथा; व्योमवत्-वह आकाशकी भाँति सर्वत्र व्यापक है ( इस दृष्टिसे भी ऐसा कहना उचित है)।

व्याख्या-यदि कोई यह शङ्का करे कि छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रोमे उपास्यदेवका स्थान हृदय बताया गया है, जो बहुत छोटा है तथा तीसरे मन्त्रमे उसे वान, जौ, सरसों तथा सावाँसे भी अत्यन्त छोटा कहा गया है। इस प्रकार एकदेशीय और अत्यन्त लघु बताया जानेके कारण यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म नहीं हो सकता; क्योकि परब्रह्म परमात्माको सबसे बड़ा, सर्वव्यापी तथा सर्वशक्तिमान् बताया गया है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योकि

उक्त मन्त्र मे जो परब्रह्म परमात्माको हृदयमे स्थित बताया गया है, वह उसके उपलब्धि स्थानकी अपेक्षासे है । भाव यह है कि परब्रह्म परमात्माका स्वरूप आकाशकी भाँति सूक्ष्म और व्यापक है । अतः वह सर्वत्र है। प्रत्येक प्राणीके हृदयमे भी है और उसके बाहर भी * ( ईशा० ५)। (गीता १३ । १५)। अतएव छ तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः । (ईशा० ५) + बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ (गीता १३ । १५)

वह परमात्मा चराचर सब भूतोके बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचररूप भी वही है तथा वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है और अत्यन्त समीप एवं दूरमे भी स्थित वहीं है। उसे हृदयस्थ बता देनेमात्रसे उसका एकदेशीय होना सिद्ध नहीं होता तथा जो उसे धान, जौ, सरसो और सावॉसे भी छोटा बताया गया है, इससे श्रुतिका उद्देश उसे छोटे आकारवाला बताना नहीं है, अपितु अत्यन्त सूक्ष्म और इन्द्रियोद्वारा अग्राह्य ( ग्रहण करनेमे न आनेवाला) बतलाना है । इसीलिये उसी मन्त्रमे यह भी कहा गया है कि वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक और समस्त लोकोसे भी बड़ा है। भाव यह है कि वह इतना सूक्ष्म होते
हुए भी समस्त लोकोंके बाहर-भीतर व्याप्त और उनसे परे भी है। सर्वत्र वही है । इसलिये यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं ।

सम्बन्ध- परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमे स्थित होकर भी उनके सुख-दुःख से अभिभूत नहीं होता, उसकी इस विशेषताको वतानेके लिये कहते हैं-

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

संभोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेप्यात् ॥ १ । २ । ८ ॥

चेत् यदि कहो; संभोगप्राप्तिः=( सबके हृदयमे स्थित होनेसे चेतन होनेके कारण उसको ) सुख-दुःखोंका भोग भी प्राप्त होता होगा; इति न-तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; चशेष्यात्-क्योकि जीवात्माकी अपेक्षा उस परब्रह्ममे विशेषता है।

व्याख्या- यदि कोई यह शङ्का करे कि आकाशकी भॉति सर्वव्यापक परमात्मा समस्त प्राणियोंके हृदयमे स्थित होनेके कारण उन जीवोंके सुख-दुःखों का भोग भी करता ही होगा; क्योकि वह आकाशकी भॉति जड नहीं, चेतन है और चेतनमे सुख-दुःखकी अनुभूति स्वाभाविक है। तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि परमात्मामे कर्तापनका अभिमान और भोक्तापन नहीं है। वह सबके हृदयमे रहता हुआ भी उनके गुण-दोपोसे सर्वथा असङ्ग है। यही जीवोकी अपेक्षा उसमे विशेषता है ।

जीवात्मा तो अज्ञानके कारण कर्ता और भोक्ता है; किन्तु परमात्मा सर्वथा निर्विकार है । वह केवलमात्र साक्षी है, भोक्ता नहीं (मु० उ० ३।१।१)* इसलिये जीवोंके कर्मफलरूप सुख-दुःखादिसे उसका सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है।

सम्बन्ध- उपर कहे हुए प्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि सबके हृदयमें निवास करते हुए भी परब्रह्म भोक्ता नहीं है। परन्तु वेदान्तमें कहीं-कहीं परमात्मा को भोक्ता भी बताया गया है (क० उ०१।२।२५) । फिर वह वचन तयोरन्यःपिप्पलं स्वाहस्यनननन्यो अभिचाकशीति॥ (मु०३० ३।११), किसी अन्यके विषयमें है या उसका कोई दूसरा ही अर्थ है ? यह निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं

अत्ता चराचरग्रहणात् ॥ १ । २ । ९॥

चराचरग्रहणात-चर और अचर सबको ग्रहण करनेके कारण यहाँ, अत्ता भोजन करनेवाला अर्थात् प्रलयकालमे सबको अपनेमे विलीन करनेवाला ( परब्रह्म परमेश्वर ही है)।

व्याख्या- कठोपनिषद् (१ । २ । २५) मे कहा गया है कि ‘यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ।।’ अर्थात् (संहारकालमे) जिस परमेश्वरके ब्राह्मण और क्षत्रिय अर्थात् समस्त स्थावर जगम प्राणीमात्र भोजन बन जाते हैं तथा सबका संहार करनेवाला मृत्यु उपसेचन (व्यञ्जन-शाक आदि ) बन जाता है,

वह परमेश्वर जहाँ और जैसा है, यह कौन जान सकता है ।’ इस श्रुतिमे जिस भोक्ताका वर्णन है, वह कर्मफलरूप सुख-दुःख आदिका भोगनेवाला नहीं है। अपितु संहारकालमें मृत्युसहित समस्त चराचर जगत्को अपनेमें विलीन कर लेना ही यहाँ उसका भोक्तापन है । इसलिये परब्रह्म परमात्माको ही यहाँ अत्ता या भोक्ता कहा गया है, अन्य किसीको नहीं।

सम्बन्ध-इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं।

प्रकरणाच्च ॥ १।२ । १०॥

प्रकरणात् प्रकरणसे; च=भी ( यही बात सिद्ध होती है)।

व्याख्या- उपर्युक्त मन्त्रके पूर्व बीसवेसे चौबीसवेतक परब्रह्म परमेश्वरका ही प्रकरण है । उसीके स्वरूपका वर्गन करके उसे जाननेका महत्त्व तथा उसकी कृपाको ही उसे जाननेका उपाय बताया गया है । उक्त मन्त्रमे भी उस परमेश्वर को जानना अत्यन्त दुर्लभ बतलाया गया है, जो कि पहलेसे चले आते हुए प्रकरण के अनुरूप है ।

अतः पूर्वापरके प्रसङ्गको देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही अत्ता ( भोजन करनेवाला ) कहा गया है ।

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

सम्बन्ध-अब यहॉ यह जिज्ञासा होती है कि इसके बादवाली श्रुति (१।३।१ ) में ( कर्मफलरूप) ‘ऋत’को पीनेवाले छाया और धूपके सहश दो भोक्ताओंका वर्णन है । यदि परमात्मा कर्मफलका भोक्ता नहीं है तो उक्त दो भोक्ता कौन-कौन-से है ? इसपर कहते है,

गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तदर्शनात् ॥ १।२।११॥

गुहाम्-हृदयरूप गुहामे; प्रविष्टौ प्रविष्ट हुए दोनो; आत्मानौ जीवात्मा और परमात्मा हि-ही हैं; तदर्शनात क्योकि ( दूसरी श्रुतिमें भी ) ऐसा ही देखा जाता है।

व्याख्या- कठोपनिषद् (१ । ३ । १ ) मे कहा है ‘ऋत पिबन्ती सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः।। अर्थात् ‘शुभ कर्मोके फलखरूप मनुष्य-शरीरके भीतर परब्रह्मके उत्तम निवास स्थान (हृदयाकाश ) मे बुद्रिरूप गुहामे छिपे हुए तथा ‘सत्य’ का पान करनेवाले दो है,

वे दोनों छाया और धूपकी भॉति परस्पर विरुद्ध खभाववाले है। यह बात ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी कहते है । तथा जो तीन वार नाचिकेत अग्निका चयन करनेवाले पञ्चाग्नि-सम्पन्न गृहस्थ है, वे भी कहते है ।’ इस मन्त्रमे कहे हुए दोनो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही है। उन्हींका वर्णन छाया और धूपके रूपमें हुआ है ।

परमात्मा सर्वज्ञ, पूर्ण ज्ञानस्वरूप एवं स्वप्रकाश है, अतः उसका धूपके नामसे बर्गन किया गया है । और जीवात्मा अल्पज्ञ है । उसमे जो कुछ स्वन्य ज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है । जैसे छायामे जो थोड़ा प्रकाश होता है, वह धूपका ही अंग होता है। इसलिये जीवात्माको छायाके नाम से कहा गया है। दूसरी श्रुतिमे भी जीवात्मा और परमात्माका एक साथ मनुष्य-शरीर में प्रविट होना इस प्रकार कहा है–सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि’ (छा० उ० ६ । ३ । २) अर्थात् ‘उस देवता ( परमात्मा ) ने ईक्षण (सकल्प) किया कि मै इस जीवात्माके सहित इन तेज आदि तीनों देवताओमे अर्थात् इनके कार्यरूप
शरीरमे प्रविष्ट होकर नाम और रूपको प्रकट करूँ।’

इससे भी यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त कठोपनिपके मन्त्रमे कहे हुए छाया और धूप सदृश दो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही है । यहाँ जो जीवात्माके साथ-साथ परमात्माको सत्य अर्थात श्रेष्ठ कोंके फलका भोगनेवाला बताया गया है, उसका यह भाव है कि परब्रह्म परमेश्वर ही समस्त देवता आदिके रूपमे प्रकारान्तरसे समस्त यज्ञ और तपरूप शुभ कर्मोंके भोक्ता हैं । परन्तु उनका भोक्तापन सर्वथा निर्दोष है, इसलिये वे भोगते हुए भी अभोक्ता ही हैं।

सम्बन्ध-उपर्युक्त कथनकी सिद्धिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं

विशेषणाच ॥ १। २ । १२ ॥

विशेषणात=( आगेके मन्त्रोंमे ) दोनोके लिये अलग-अलग विशेषण दिये गये हैं, इसलिये; च=भी ( उपर्युक्त दोनो भोक्ताओंको जीवात्मा और परमात्मा मानना ही ठीक है)।

व्याख्या- इसी अध्यायके दूसरे मन्त्रमे उस परम अक्षर ब्रह्मको संसारसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये ‘अभय पद’ बताया गया है । तथा उसके बाद रथके दृष्टान्तमें जीवात्माको रथी और उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्तव्य परमधामके नामसे कहा गया है । इस प्रकार उन दोनोके लिये पृथक्-पृथक् विशेषग होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ जिनको गुहामें प्रविष्ट बताया गया है, वे जीवात्मा और परमात्मा ही है।

सम्बन्ध- यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि परमात्माकी उपलब्धि हृदयमे होती है, इसलिये उसे हृदयमै स्थित वताना तो ठीक है, परन्तु छान्दोग्योपनिपद् (४।१५।१) में ऐसा कहा है कि ‘यह जो नेत्रमै पुरुप दीखता है, यह आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय और ब्रह्म है । अतः यहाँ नेत्र में स्थित पुरुष कौन है ? इसका निर्णय करनेके लिये
अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है.—-

अन्तर उपपत्तेः ॥ १।२।१३ ॥

अन्तरे-जो नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाला कहा गया है, वह ब्रह्म ही है। उपपत्तेः-क्योंकि ऐसा माननेसे ही पूर्वापर-प्रसङ्गकी सङ्गति बैठती है ।

व्याख्या- यह प्रसङ्ग छान्दोग्योपनिषद्मे चौथे अध्यायके दशम खण्डसे आरम्भ हुआ है और पन्द्रहवे खण्डमें समाप्त । प्रसङ्ग यह है कि उपकोशल नामका

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरस् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ (गीता ५ । ३९) अहं हि सर्वयज्ञानां भोत्ता च प्रभुरेव च। (गीता ९ । २३ ) + सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असतं सर्वभूच्चैव निर्गुणं गुणभोक्त च ।। (गीता १३ । १४)

ब्रह्मचारी सत्यकाम नामक ऋपिके आश्रममें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करता हुआ गुरुकी और अग्नियोंकी सेवा करता था । सेवा करते-करते उसे बारह वर्ष व्यतीत हो गये; परन्तु गुरुने उसे न तो उपदेश दिया और न स्नातक ही बनाया । इसके विपरीत उसीके साथ आश्रममे प्रविष्ट होनेवाले दूसरे शिष्योको स्नातक बनाकर घर भेज दिया।

तब आचार्यसे उनकी पत्नीने कहा, ‘भगवन् ! इस ब्रह्मचारीने अग्नियोकी अच्छी प्रकार सेवा की है । तपस्या भी इसने की ही है। अब इसे उपदेश देनको कृपा करे ।’ परन्तु अपनी भार्याकी बातको अनसुनी करके सत्यकाम ऋपि उपकोगलको उपदेश दिये बिना ही बाहर चले गये । तब मनमे दुखी होकर उपकोशलने अनशन व्रत करनेका निश्चय कर लिया। यह देख आचार्य-पत्नीने पूछा—‘ब्रह्मचारी ! तू भोजन क्यो नहीं करता है।

उसने कहा, ‘मनुष्यके मनमे बहुत-सी कामनाएँ रहती है । मेरे मनमे बड़ा दुःख है, इसलिये में भोजन नहीं करूंगा। तब अग्नियोने एकत्र होकर विचार किया कि इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है, अत. उचित है कि हम इसे
उपदेश करे ऐमा विचार करके अग्नियोने कहा ‘प्राण ब्रह्म है, क ब्रह्म है, ख ब्रह्म है ।’ उपकांशल बोला—‘यह बात तो मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है।

परन्तु ‘क’ और ‘ख’ को नहीं जानता।’ अग्नियोने कहा निस्सन्देह जो ‘क’ है, वही ‘ख’ है और जो ‘ख’ है, वही ‘क’ है तथा प्राण भी वही है । इस प्रकार उन्होने ब्रह्मको ‘क’ सुख-स्वरूप और ‘ख’ आकाशकी भॉति सूक्ष्म एव व्यापक बताया तथा वही प्राणरूपसे सबको सत्ता-स्कृति देनेवाला है। इस प्रकार सकेतसे ब्रह्मका परिचय कराया। उसके बाद गार्हपत्य अग्निने प्रकट होकर कहा-‘सूर्यमे जो यह पुरुष दीखता है, वह मै हूँ, जो उपासक इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह पाणेका नाश करके अच्छे लोकोका अधिकारी होता है तथा पूर्ण आयुष्मान् और उज्ज्वल जीवनसे युक्त होता है। उसका वश कभी नष्ट नहीं होता ।

इसके बाद ‘अन्वाहार्यपचन’ अग्निने प्रकट होकर कहा, ‘चन्द्रमामे जो यह पुरुष दिखायी देता है, वह मैं हूँ । जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर उपासना करता है, वह अच्छे लोकोका अधिकारी होता है ।’ इत्यादि तत्पश्चात आहवनीय अग्निने प्रकट होकर कहा, ‘विजलीमे जो यह पुरुष दीखता है, वह मैं हूँ।’ इसको जानकर उपासना करनेका फल भी उन्होने दूसरी अन्नियोकी भाँति ही बतलाया । तदनन्तर सब अग्नियोंन एक साथ कहा. ‘हे उपकोशल ! हमने तुमको हमारी विद्या ( अग्नि-विद्या ) और आत्म-विद्या दोनों ही बतलायी है ।

आचार्य तुमको इनका मार्ग दिखलावेंगे।’ इतनमें ही उसके गुरु सत्यकाम आ गये। आचार्यने पूछा, ‘सौम्य । तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताकी भाँति चमकता है, तुझे किसने उपदेश दिया है ? उपकाशलने अग्नियोंकी ओर संकेत किया । आचार्यन पूछा. ‘इन्होंने तुझे क्या बतलाया है ? तत्र उपकोशलने अग्नियोंसे सनी नई सब बातें बता दी।

तत्पश्चात आचार्यन कहा. हे सौग्य ! इन्होंने तुझे केवल उत्तम लोकत्राप्तिके साधनका उपदेश दिया है, अब मैं तुझे वह उपदेश देता हूँ, जिसको जान लेनेवालेको पाप उसी प्रकार स्पर्श नहीं कर सकते, जैसे कमलके पत्तेको जल उपकोशलने कहा, ‘भगवन् ! बतलानेकी कृपा कीजिये । इसके उत्तरमें आचार्यने कहा, ‘जो नेत्रमे यह पुरुष दिखलायी देता है, यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय और ब्रह्म है । उसके बाद उसीको संयद्दामा धाननी’ और ‘भामनी’ बतलाकर अन्तमें इन विद्याओका फल अर्चिमार्गले ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है।

इस प्रकरणको देखने से मालूम होता है कि आँखके भीतर दीखनेवाला पुरुष परब्रह्म ही है. जीवात्मा या प्रतिविम्बके लिये यह कथन नहीं है, क्योकि ब्रह्मविद्या के प्रसङ्गमे उसका वर्णन करके उसे आत्मा, अमृत, अभय और ब्रह्म कहा है। इन विशेषणोंकी उपपत्ति ब्रह्ममे ही लग सकती है. अन्य किसीमे नहीं ।

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

सम्बन्ध-अब यह जिज्ञासा होती है कि यहाँ ब्रह्मको ऑसमें दीखनेवाला युरुप क्यों कहा गया ? वह किसी न्शनविशेषमें रहनेवाला थोड़े ही है ? इसपर कहते हैं

स्थानादिव्यपदेशाच ॥ १ । २ । १४ ॥

स्थानादिव्यपदेशात् श्रुतिमे अनेक स्थलोंपर ब्रह्मके लिये स्थान आदिका निर्देश किया गया है. इसलियेः च- भी ( नेत्रान्तर्वी पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)।
गया है । इसी प्रकार अन्य श्रुतियोमे भी वर्गन आया है | अतः यहाँ ब्रह्मको नेत्रमे दीखनेवाला कहना अयुक्त नहीं है। क्योकि ब्रह्म निर्लिप्त है और ऑखमे दीखनेवाला पुरुष भी ऑखके दोपोसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है । इस समानताको लेकर ब्रह्मका तत्व समझानेके लिये ऐसा कहना उचित ही है । इसीलिये वहाँ यह भी कहा है कि ‘ ऑखमे घी या पानी आदि जो भी वस्तु डाली जाती है, वह ऑखकी पलकोंमे ही रहती है, द्रष्टा पुरुपका स्पर्श नहीं कर सकती ।’

सम्बन्ध-उक्त सिद्धान्तको दृढ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं

सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॥ १ । २ । १५॥

च-नया: सुखविशिष्टाभिधानात नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको आनन्दयुक्त बताया गया है, इसलिये एव-भी ( यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- उक्त प्रसङ्गमे यह कहा गया है कि यह नेत्रमे दीखनेवाला पुरुष ही अमृत, अभय और ब्रह्म है।’ इस कथनमे निर्भयता और अमृतत्व-ये दोनो ही सुखके सूचक है । तथा जब अग्नियोने एकत्र होकर पहले-पहल उपदेश दिया है, वहाँ कहा गया है कि जो ‘क’ अर्थात् सुख है, वही ‘ख’ अर्थात् ‘आकाश’ है। भाव यह है कि वह ब्रह्म आकाशकी भॉति अत्यन्त सूक्ष्म, सर्वव्यापी और आनन्दस्वरूप है । इस प्रकार उसे आनन्दयुक्त बतलाया जानेके कारण वह ब्रह्म ही है।

सम्बन्ध-इसके सिवा,

श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ॥ १। २ । १६ ॥

श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानात-उपनिषद् अर्थात् रहस्य-विज्ञानका श्रवण कर लेनेवाले ब्रह्मवेत्ताकी जो गति बतायी है, वही गति इस पुरुपको जाननेवालेकी भी कही गयी है, इससे; च-भी ( यही ज्ञात होता है कि नेत्रमे दीखनवाला पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- इस प्रमङ्गके अन्तमे इस नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको जाननेवालेकी वही पुनरावृत्तिरहित गति अर्थात देवयानमार्गसे जाकर ब्रह्मलोकमे ब्रह्मको प्राप्त होने और वहॉसे पुन. इस संसारमे न लौटनकी बात बतायी गयी है। जो अन्यत्र ब्रह्मवेत्ताके लिये कही गयी है (प्र० उ०१।१०) * । इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ नेत्रमें दीखनेवाला पुरुष ब्रह्म ही है।

सम्बन्ध यदि इस प्रकरणमें नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाले प्रतिविम्ब, नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा- इनमेंसे किसी एकको नेत्रान्तर्वती पुरुष मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं—

अनवस्थितेरसंभवाच्च नेतरः ।।१२।१७ ॥

अनवस्थिते: अन्य किसीकी नेत्रमें निरन्तर स्थिति न होनेके कारण; च= तथा; असंभवात् ( श्रुतिमें बताये हुए अमृतत्व आदि गुग ) दूसरे किसीमे सम्भव न होनेसे; इतर:-ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भी; न नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं है।

व्याख्या- छाया-पुरुष या प्रतिविम्ब नेत्रेन्द्रियमें सदा नहीं रहता; जब कोई पुरुष सामने आता है, तब उसका प्रतिविम्ब नेत्रमे दिखायी देता है और उसके हटते ही अदृश्य हो जाता है । इन्द्रियानुग्राहक देवताकी स्थिति भी नेत्रमे सदा नहीं रहती, जिस समय वह इन्द्रिय अपने विषयको ग्रहण करती है, उसी समय वह उसके सहायक रूपसे उसमें स्थित माना जाता है ।

इसी प्रकार जीवात्मा भी मनके द्वारा एक समय किसी एक इन्द्रियके विषयको ग्रहण करता है तो दूसरे समय दूसरी ही इन्द्रियके विषयको; और सुषुप्तिमे तो किसीके भी विषयको नहीं ग्रहण करता । अतः निरन्तर एक-सी स्थिति आँखमे न रहनेके कारण इन तीनोमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष
नहीं कहा जा सकता । इसके सिवा, नेत्रमे दिखायी देनेवाले पुरुषके जो अमृतत्व और निर्भयता आदि गुण श्रुतिन बताये है, वे ब्रह्मके अतिरिक्त और किसीमे’ सम्भव नहीं है।

इस कारण भी उपर्युक्त तीनोंमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं माना जा सकता । इसलिये परब्रह्म परमेश्वरको ही यहाँ नेत्रमे दिखायी देनेवाला पुरुष कहा गया है; यही मानना ठीक है। अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽस्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते। एतदुबै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मास पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः। किन्तु जो तपस्याके साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक और श्रद्धासे युक्त होकर अध्यात्मविद्याके द्वारा परमात्माकी खोज करके जीवन सार्थक कर लेते हैं,
वे उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकको जीत लेते (प्राप्त कर लेते) हैं। यही प्राणोका केन्द्र है । यह अमृत और निर्मय पद है। यह परम गति है। इससे पुनः लौटकर नहीं आते । इस प्रकार यह निरोध– पुनरावृत्ति-निवारक है।’

सम्बन्ध- पूर्वप्रकरणमें यह वात बतायी गयी है कि श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मके लिये भिन्न-भिन्न स्थान आदिका निर्देश किया गया है । अव पुन: अधिदैव, अधिभूत आदिमें उस ब्रह्मकी व्याप्ति वतलाकर उसी बातका समर्थन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

अन्तर्याम्यधिदेवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १। २ । १८॥

अधिदेवादिषु-आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि समस्त वस्तुओंमे; अन्तर्यामी जिसे अन्तर्यामी वतलाया गया है ( वह परब्रह्म ही है ); तद्धर्म व्यपदेशात्-क्योंकि वहाँ उसीके धोका वर्णन है।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (३ । ७ ) में यह प्रसङ्ग आया है। वहाँ उद्दालक ऋषिन याज्ञवल्क्य मुनिसे पहले तो सूत्रात्माके विपयमे प्रश्न किया है। फिर उस अन्तर्यामीके सम्बन्धमे पूछा है, जो इस लोक और परलोकको तथा समस्त भूत-प्राणियोंको उनके भीतर रहकर नियन्त्रणमे रखता है । इसके उत्तरमे याज्ञवल्क्यने सूत्रात्मा तो वायुको वताया है और अन्तर्यामीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उसे जड़-चेतनात्मक समस्त भूतो, सब इन्द्रियो और सपूर्ण जीवोंका नियन्ता बताकर अन्तमे इस प्रकार कहा है

यह अन्तर्यामी देखनमे न आने वाला किन्तु स्वयं सवको देखनेवाला है, सुननमें न आनेवाला किन्तु स्वयं सत्र कुछ सुननेवाला है और मनन करनेमे न
आनेवाला किन्तु खयं सबका मनन करनेवाला है । वह विशेषरूपसे किसीके जाननमे नहीं आता, किन्तु स्वयं सबको विशेषरूपसे भलीभाँति जानता है । ऐसा यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इससे भिन्न सब कुछ विनाशशील है ।’ इस वर्णनमे आये हुए महत्त्वसूचक विशेषण परब्रह्ममे ही सङ्गत हो सकते हैं । जीवात्माका अन्तर्यामी आत्मा ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई नहीं हो सकता । अतः इस प्रसङ्गमे ब्रह्मको ही अन्तर्यामी बताया गया है..–यही मानना ठीक है ।

सम्बन्ध- पूर्वसूत्रमें विधि-मुखसे यह बात सिद्ध की गयी कि अन्तर्यामी ब्रह्म ही है । अव निषेधमुखसे यह सिद्ध करते हैं कि अव्यक्त जड प्रकृति,अन्तर्यामी नहीं हो सकती

न च स्मार्तमतधर्मामिलापात् ॥ १।२ । १६ ॥

सातम्-सांख्यस्मृतिद्वारा प्रतिपादित प्रधान ( जड प्रकृति); च-भी; न= अन्तर्यामी नहीं है; अतद्धर्मामिलापात-क्योकि इस प्रकरणमे बताये हुए द्रष्टापन आदि धर्म प्रकृतिके नहीं है ।

व्याख्या- सांख्य-स्मृतिद्वारा प्रतिपादित जड प्रकृतिके धर्मोका वर्णन वहाँ अन्तर्यामीके लिये नहीं हुआ है। अपितु चेतन परब्रह्मके धर्मोका ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । इस कारण वहाँ कहा हुआ अन्तर्यामी प्रकृति नहीं हो सकती । अतः यही सिद्ध होता है कि इस प्रकरणमे ‘अन्तर्यामी’ के नामसे पर ब्रह्म परमात्माका ही
वर्णन हुआ है।

advaita vedanta adhyay 1 paad 2 sutra 1-16

अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १।१९॥

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *