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vedant darshan 1-2 sutra 16-32

vedant darshan adhyay 1 paad 2 sutra 16,32

सम्बन्धयदि इस प्रकरणमें नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाले प्रतिविम्ब, नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा- इनमेंसे किसी एकको नेत्रान्तर्वती पुरुष मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं—

अनवस्थितेरसंभवाच्च नेतरः ।।१२।१७ ॥

अनवस्थिते: अन्य किसीकी नेत्रमें निरन्तर स्थिति न होनेके कारण; च= तथा; असंभवात् ( श्रुतिमें बताये हुए अमृतत्व आदि गुग ) दूसरे किसीमे सम्भव न होनेसे; इतर:-ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भी; न नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं है।

व्याख्या- छाया-पुरुष या प्रतिविम्ब नेत्रेन्द्रियमें सदा नहीं रहता; जब कोई पुरुष सामने आता है, तब उसका प्रतिविम्ब नेत्रमे दिखायी देता है और उसके हटते ही अदृश्य हो जाता है । इन्द्रियानुग्राहक देवताकी स्थिति भी नेत्रमे सदा नहीं रहती, जिस समय वह इन्द्रिय अपने विषयको ग्रहण करती है, उसी समय वह उसके सहायक रूपसे उसमें स्थित माना जाता है ।

इसी प्रकार जीवात्मा भी मनके द्वारा एक समय किसी एक इन्द्रियके विषयको ग्रहण करता है तो दूसरे समय दूसरी ही इन्द्रियके विषयको; और सुषुप्तिमे तो किसीके भी विषयको नहीं ग्रहण करता । अतः निरन्तर एक-सी स्थिति आँखमे न रहनेके कारण इन तीनोमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष
नहीं कहा जा सकता । इसके सिवा, नेत्रमे दिखायी देनेवाले पुरुषके जो अमृतत्व और निर्भयता आदि गुण श्रुतिन बताये है, वे ब्रह्मके अतिरिक्त और किसीमे’ सम्भव नहीं है। इस कारण भी उपर्युक्त तीनोंमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं माना जा सकता ।

इसलिये परब्रह्म परमेश्वरको ही यहाँ नेत्रमे दिखायी देनेवाला पुरुष कहा
गया है; यही मानना ठीक है।

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽस्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते। एतदुबै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मास पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः।

किन्तु जो तपस्याके साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक और श्रद्धासे युक्त होकर अध्यात्मविद्याके द्वारा परमात्माकी खोज करके जीवन सार्थक कर लेते हैं,
वे उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकको जीत लेते (प्राप्त कर लेते) हैं। यही प्राणोका केन्द्र है । यह अमृत और निर्मय पद है। यह परम गति है। इससे पुनः लौटकर नहीं आते । इस प्रकार यह निरोध– पुनरावृत्ति-निवारक है।

सम्बन्ध- पूर्वप्रकरणमें यह वात बतायी गयी है कि श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मके लिये भिन्न-भिन्न स्थान आदिका निर्देश किया गया है । अव पुन: अधिदैव, अधिभूत आदिमें उस ब्रह्मकी व्याप्ति वतलाकर उसी बातका समर्थन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

अन्तर्याम्यधिदेवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १। २ । १८॥

अधिदेवादिषु-आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि समस्त वस्तुओंमे; अन्तर्यामी जिसे अन्तर्यामी वतलाया गया है ( वह परब्रह्म ही है ); तद्धर्म व्यपदेशात्-क्योंकि वहाँ उसीके धोका वर्णन है।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (३ । ७ ) में यह प्रसङ्ग आया है। वहाँ उद्दालक ऋषिन याज्ञवल्क्य मुनिसे पहले तो सूत्रात्माके विपयमे प्रश्न किया है। फिर उस अन्तर्यामीके सम्बन्धमे पूछा है, जो इस लोक और परलोकको तथा समस्त भूत-प्राणियोंको उनके भीतर रहकर नियन्त्रणमे रखता है । इसके उत्तरमे याज्ञवल्क्यने सूत्रात्मा तो वायुको वताया है और अन्तर्यामीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उसे जड़-चेतनात्मक समस्त भूतो, सब इन्द्रियो और सपूर्ण जीवोंका नियन्ता बताकर अन्तमे इस प्रकार कहा है,

यह अन्तर्यामी देखनमे न आने वाला किन्तु स्वयं सवको देखनेवाला है, सुननमें न आनेवाला किन्तु स्वयं सत्र कुछ सुननेवाला है और मनन करनेमे न
आनेवाला किन्तु खयं सबका मनन करनेवाला है । वह विशेषरूपसे किसीके जाननमे नहीं आता, किन्तु स्वयं सबको विशेषरूपसे भलीभाँति जानता है । ऐसा यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इससे भिन्न सब कुछ विनाशशील है ।’ इस वर्णनमे आये हुए महत्त्वसूचक विशेषण परब्रह्ममे ही सङ्गत हो सकते हैं । जीवात्माका अन्तर्यामी आत्मा ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई नहीं हो सकता । अतः इस प्रसङ्गमे ब्रह्मको ही अन्तर्यामी बताया गया है..–यही मानना ठीक है ।

सम्बन्ध- पूर्वसूत्रमें विधि-मुखसे यह बात सिद्ध की गयी कि अन्तर्यामी ब्रह्म ही है । अव निषेधमुखसे यह सिद्ध करते हैं कि अव्यक्त जड प्रकृति अन्तर्यामी नहीं हो सकती

न च स्मार्तमतधर्मामिलापात् ॥ १।२ । १६ ॥

सातम्-सांख्यस्मृतिद्वारा प्रतिपादित प्रधान ( जड प्रकृति); च-भी; न= अन्तर्यामी नहीं है; अतद्धर्मामिलापात-क्योकि इस प्रकरणमे बताये हुए द्रष्टापन आदि धर्म प्रकृतिके नहीं है ।

व्याख्या- सांख्य-स्मृतिद्वारा प्रतिपादित जड प्रकृतिके धर्मोका वर्णन वहाँ अन्तर्यामीके लिये नहीं हुआ है। अपितु चेतन परब्रह्मके धर्मोका ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । इस कारण वहाँ कहा हुआ अन्तर्यामी प्रकृति नहीं हो सकती । अतः यही सिद्ध होता है कि इस प्रकरणमे ‘अन्तर्यामी’ के नामसे पर ब्रह्म परमात्माका ही
वर्णन हुआ है।

सम्बन्ध- यह ठीक है कि जड होनेके कारण प्रकृतिको अन्तर्यामी नहीं कहा जा सकता। परन्तु जीवात्मा तो चेतन है तथा वह शरीर और इन्द्रियोंके भीतर रहनेवाला और उनका नियमन करनेवाला भी प्रत्यक्ष है । अतः उसीको अन्तर्यामी मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते है

शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॥ १। २ । २० ॥

शारीरः शरीरमे रहनेवाला जीवात्मा; च-भी; (न= ) अन्तर्यामी नहीं है; हि-क्योकि; उभयेऽपि-माध्यन्दिनी तथा काण्व दोनो ही शाखावाले; एनम्-इस जीवात्माको; भेदेन अन्तर्यामीसे भिन्न समझते हुए; अधीयते अध्ययन करते है।

व्याख्या- माध्यन्दिनी और काण्व-दोनो शाखाओवाले विद्वान् अन्तर्यामीको पृथिवी आदिकी भॉति जीवात्माके भी भीतर रहकर उसका नियमन करनेवाला मानते है । वहाँ जीवात्माको नियम्य और अन्तर्यामीको नियन्ता बताया गया है। इस प्रकार दोनोका पृथक्-पृथक् वर्णन होनेके कारण वहाँ ‘अन्तर्यामी’ पद परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, जीवात्माका नहीं ।

य आत्मनि तिष्ठनात्सनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्थात्मा शरीरं य आत्मान मन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः।
(शतपथबा. १४ । ५ । ३०)

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

यो विज्ञाने तिष्ठन् विनानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञान र शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्पमृतः। (वृ० उ० ३ । ७ 1 २२ )

जो जीवात्मामे रहनेवाला, जीवात्माके भीतर है, जिसे जीवात्मा नही जानता: जीवात्मा जिसका शरीर है और जो उसके भीतर रहकर जीवात्माका नियमन करता है। वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।

सम्बन्ध- उन्नीसवें सूत्रमै यह बात कही गयी है कि द्रष्टापन आदि चंतनके धर्म जड प्रकृनिमें नहीं घट सकते, इसलिये वह अन्तर्यामी नहीं हो सकती । इसपर यह जिज्ञासा होती है कि मुण्डकोपनिपदमें जिसको अझ्यता, अग्राह्यता आदि धर्मोस युक्त वतलाकर अन्तमे भूतोंका कारण बताया गया है, वह तो प्रकृति हो सकती है। क्योंकि उस जगह बताये हुए सभी धर्म प्रकृतिमें पाये जाते है । इसपर कहते है

अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः॥ १।२।२१॥

अदृश्यत्यादिगुणक: अदृश्यता आदि गुणोवाला परब्रह्म परमेश्वर ही है; धर्मोक्तेः क्योंकि उस जगह उसीके सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है।

व्याख्या- मुण्डकोपनिपढ़े यह प्रसङ्ग आया है कि महर्षि शौनक विधि पूर्वक अगिरा ऋपिकी शरणमे गये । वहाँ जाकर उन्होंने पूछा भगवन् ! किसको जान लेनेपर यह सब कुछ जाना हुआ हो जाता है । इसपर अगिराने कहा- ‘जानने योग्य विद्याएँ दो है, एक अपरा, दूसरी परा । उनमेसे अपरा विद्या तो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष है और परा वह है, जिससे उस अक्षर ब्रह्मको जाना जाता है ।’ यह कहकर उस अक्षरको समझानेके लिये अगिराने उसके गुण और धोका वर्णन करते हुए ( मु० १ । १ । ६ मे ) कहा

यत्तदन्द्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्गमचक्षु.श्रोत्रं तपाणिपादम् । नित्यं त्रिभुं सर्वगनं लुसूक्ष्मं तदव्ययं तद्भूतयोनि परिपश्यन्ति धीराः ।।

अर्थात् ‘जो इन्द्रियोद्वारा अगोचर है, पकड़नेमे आनेवाला नहीं है, जिसका कोई गोत्र नहीं है, वर्ग नहीं है, जो आँख, कान तथा हाथ-पैरसे रहित है, नित्य, व्यापक, सर्वत्र परिपूर्ण, अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वथा अविनाशी है । उसको धीर पुरुष देखते हैं, वह समस्त भूतोका परम कारग है ।

फिर नवम मन्त्रम कहा है– ‘यः मर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥’जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, ज्ञान ही जिसका तप है, उसीसे यह विराटप समस्त जगत तथा नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते है । vedant darshan 1-2 sutra 16-32

यहाँ जिन सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है, वे परब्रह्म परमेश्वरके ही हैं। तथा एक ब्रह्मको जान लेनेपर ही सब कुछ जाना हुआ हो सकता है, अन्य किसीके जाननेसे नहीं । इसलिये उस प्रकरणमें जिसे अदृश्यता आदि गुणोंवाला बताया गया है, वह परब्रह्म परमात्मा ही है, जीवात्मा या प्रकृति नहीं।

सम्बन्ध-इसी बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति देते हैं –

विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ॥ १ । २ । २२ ॥

विशेषणभेदव्यपदेशाभ्याम्=परमेश्वरसूचक विशेषणोंका कथन होनेसे तथा प्रकृति और जीवात्मासे उसको भिन्न बताये जानेके कारण च-भी; इतरौ-जीवात्मा और प्रकृति; न-अदृश्यता आदि गुणोंवाला जगत्कारण नहीं हो सकते ।

व्याख्या इस प्रकरणमे जिसको अदृश्यता आदिगुणोसे युक्त और सब भूतोंका कारण बताया गया है, उसके लिये ‘सर्वज्ञ’ आदि विशेषण दिये गये है, जो न तो प्रधान ( जड प्रकृति ) के लिये उपयुक्त हो सकते है और न अल्पज्ञ जीवात्माके लिये ही। इसके सिवा, उन दोनोको ब्रह्मसे भिन्न कहा मया है। मुण्डकोपनिषद् (३ । १ । ७) मे उल्लेख है कि

पश्यस्विहैव निहितं गुहायाम् ।’ अर्थात् वह देखनेवालोके शरीरके भीतर यहीं हृदय-गुफामे छिपा हुआ है।’ इसके अनुसार जीवात्मासे परमात्माकी भिन्नता खतः स्पष्ट हो जाती है। इसके सिवा, मुण्डक० ३ । १ । २ मे भी कहा है कि

समान वृक्षे पुरुषो निमानोऽनीशया शोचति मुह्यमान । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

शरीररूप वृक्षपर रहनेवाला यह जीवात्मा शरीरमे आसक्त होकर डूब रहा है। अपनेको असमर्थ समझकर मोहित हो शोक करता रहता है। परन्तु वह जब वहीं स्थित तथा भक्तजनोद्वारा सेवित अपनेसे भिन्न परमेश्वरको देख लेता है और उसकी महिमाको समझ लेता है, तब सर्वथा शोकरहित हो जाता है । इस प्रकार इस मन्त्रमे स्पष्ट शब्दोद्वारा परमेश्वरको जीवात्मासे तथा शरीररूपी वृक्षसे भी भिन्न बताया गया है । अतः यहाँ जीव और प्रकृति दोनों से कोई भी अदृश्यता आदि गुणोंसे युक्त जगत्-कारण नहीं हो सकता।

सम्बन्ध- इस प्रकरणमें जिसे समस्त भूतोंका कारण बताया गया है, वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, इसकी पुष्टिके लिये दूसरा प्रमाण उपस्थित करते हैं

रूपोपन्यासाच्च ॥ १।२ । २३ ॥

रूपोपन्यासात्-श्रुतिमे उसीके निखिल लोकमय विराट् खरूपका वर्णन किया गया है, इससे; चम्भी (वह परमेश्वर ही समस्त भूतोका कारण सिद्ध होता है)।

व्याख्या- मुण्डकोपनिषद् (२ । १ । ४ ) में परब्रह्म परमेश्वरके सर्वलोकमय विराटखरूपका वर्णन इस प्रकार किया गया है ‘अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यों दिश: श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥’

अग्नि इस परमेश्वरका मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र है, सब दिशाएँ दोनो कान हैं और प्रकट हुए वेद उसकी वाणी हैं । वायु इसका प्राण और संपूर्ण विश्व हृदय है । इसके पैरोंसे पृथिवी उत्पन्न हुई है। यही समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा है । इस प्रकार परमात्माके विराट् स्वरूपका उल्लेख करके उसे सबका अन्तरात्मा बताया गया है। इसलिये उक्त प्रकरणमे भूतयोनि के नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है, यह निश्चय होता है।

सम्बन्ध- यहॉ यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद् (५।१८।२) में ‘वैश्वानर’ के स्वरूपका वर्णन करते हुए ‘धुलोक’ को उसका मस्तक बताया है। ‘वैश्वानर’ शब्द जठराग्निका वाचक है । अतः वह वर्णन जटरानलके विषयमें है या अन्य किसीके ? इस शङ्काका निवारण करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है

वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॥ १ । २ । २४ ॥

वैश्वानरः= ( वहाँ) वैश्वानर’ नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है; साधारणशब्दविशेपात्=क्योकि उस वर्णनमे ‘वैश्वानर’ और ‘आत्मा’ इन साधारण शब्दोकी अपेक्षा ( परब्रह्मके बोधक ) विशेष शब्दोका प्रयोग हुआ है।

व्याख्या- छान्दोग्योपनिषद्म पाँचवे अध्यायके ग्यारहवे खण्डसे जो प्रसङ्ग आरम्भ हुआ है, वह इस प्रकार है.—‘प्राचीनशाल, सत्ययज्ञ, इन्द्रद्युम्न, जन तथा बुडिल ये पाँचो ऋषि श्रेष्ठ गृहस्थ और महान् वेदवेत्ता थे। इन्होने एकत्र होकर परस्पर विचार किया कि ‘हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्मका क्या स्वरूप है ११ जब वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सके तो यह निश्चय किया कि इस समय महर्षि उद्दालक वैश्वानर आत्माके ज्ञाता है, हमलोग उन्हींके पास चले ।’ इम निश्चयके अनुसार वे पॉचो ऋषि उद्दालक मुनिके यहाँ गये । उन्हे देखते ही मुनिने अनुमान कर लिया कि ये लोग मुझसे कुछ पूछो, किन्तु मै इन्हे पूर्णतया उत्तर नहीं दे सकूँगा।

अतः अच्छा हो कि मै इन्हे पहलेसे ही दूसरा उपदेष्टा बतला दूं ।’ यह सोचकर उद्दालकने उनसे कहा ‘आदरणीय महर्षियो ! इस समय केवल राजा अश्वपति ही वैश्वानर आत्माके ज्ञाता है। आइये, हम सब लोग उनके पास चले ।’ यो कहकर उन सबके साथ उद्दालक मुनि वहाँ गये । राजाने उन सबका यथोचित सत्कार किया और दूसरे दिन उनसे यज्ञमे सम्मिलित होनेके लिये प्रार्थना करते हुए उन्हे पर्याप्त धन देनकी बात कही। इसपर उन महर्षियोने कहा—‘हमे धन नहीं चाहिये, हम जिस प्रयोजनसे आपके पास आये हैं, वही दीजिये । हमे पता लगा है, आप वैश्वानर आत्माको जानते है, उसीका हमारे लिये उपदेश करे । vedant darshan 1-2 sutra 16-32

राजाने दूसरे दिन उन्हे अपने पास बुलाया और एक-एकसे क्रमशः पूछा, ‘इस विषयमे आपलोग क्या जानते हैं ?’ उनमेसे उपमन्युपुत्र प्राचीनशालने उत्तर दिया– मैं ‘धुलोक’को आत्मा समझकर उसकी उपासना करता हूँ।’ फिर सत्ययज्ञ बोले-‘मै सूर्यकी उपासना करता हूँ। इन्द्रद्युम्नने कहा-‘मै वायुकी उपासना करता हूँ।’ जनने अपनेको आकाशका और बुडिलने जलका उपासक बताया। इन सबकी बात सुनकर राजाने कहा- आपलोग उस विश्वके आत्मा वैश्वानरकी उपासना तो करते है।

परन्तु उसके एक-एक अङ्गकी ही उपासना आपके द्वारा होती है; अतः यह सर्वाङ्गपूर्ण नहीं है,

क्योकि-‘तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्वैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथावात्मा संदेहोबहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हि दयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ।

अर्थात्उ- स इस विश्वके आत्मा वैश्वानरका धुलोक मस्तक है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, आकाश शरीरका मध्यभाग है, जल वस्ति-स्थान है, पृथिवी दोनो चरण है, वेही वक्षःस्थल है, दर्भ लोम है, गार्हपत्य अग्नि हृदय है
अन्वाहार्यपचन अग्नि मन है और आहवनीय अग्नि मुख है । इस वर्णनसे मालूम होता है कि यहॉ विश्वके आत्मारूप विराट् पुरुपको ही वैश्वानर कहा गया है। क्योकि इस प्रकरणमे जठराग्नि आदिके वाचक साधारण शब्दोकी अपेक्षा, परब्रह्मके वाचक विशेष शब्दोका जगह-जगह प्रयोग हुआ है।

सम्बन्ध- इसी वातको दृढ करनेके लिये दूसरा कारण प्रस्तुत करते हैं–

स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ॥ १।२ । २५॥

सर्यमाणम्- स्मृतिमे जो विराटस्वरूपका वर्णन है, वह, अनुमानम् मूलभूत श्रुतिके वचनका अनुमान कराता हुआ वैश्वानरके ‘परमेश्वर’ होनेका निश्चय करनेवाला है; इति स्यात् इसलिये इस प्रकरणमे वैश्वानर परमात्मा ही है ।

व्याख्या- महाभारत, शान्तिपर्व (१७ । ७० ) मे कहा है, प्यस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः । सूर्यश्चक्षु. दिशः श्रोत्रं तस्मै लोकात्मने नमः ॥’ ‘अग्नि जिसका मुख, धुलोक मस्तक, आकाश नाभि, पृथिवी दोनो चरण, सूर्य नेत्र तथा दिशाएँ कान है, उस सर्वलोकवरूप परमात्माको नमस्कार है।’ इस प्रकार इस स्मृतिमे परमेश्वरका अखिल विश्वके रूपमें वर्णन आया है। स्मृति के वचनसे उसकी मूलभूत किसी श्रुतिका होना सिद्ध होता है। उपर्युक्त छान्दोग्य-श्रुतिम जो वैश्वानरके स्वरूपका वर्णन है, वही पूर्वोक्त स्मृतिवचनका मूल आधार है । अतः यहाँ उस परब्रह्मके विराटरूपको ही वैश्वानर कहा गया है, यह बात स्मृतिसे भी सिद्ध होती है । vedant darshan 1-2 sutra 16-32

अतएव जहाँ-जहाँ आत्मा या परमात्माके वर्णनमे ‘वैश्वानर’ शब्दका प्रयोग आवे, वहाँ उसे परब्रह्मके विराट्खरूपका ही वाचक मानना चाहिये, जठरानल या जीवात्माका नहीं। माण्डूक्योपनिपने ब्रह्मके चार पाटोका वर्णन करते समय ब्रह्मका पहला पाद वैश्वानरको बताया है । वहाँ भी बह परमेश्वरके विराट्वरूपका हीवाचक है; जठराग्नि या जीवात्माका नहीं।

सम्बन्ध- उपर्युक्त वातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उपस्थित करके उसका समाधान करते है

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शब्दादिभ्योऽन्तःप्रतिष्ठानाच्च नेति चेन्न तथा दृष्टयुपदेशादसंभवात्पुरुषमपि चैनमधीयते ॥ ।। २ । २६ ॥

चेत् यदि कहो; शब्दादिभ्यः शब्दादि हेतुओंसे अर्थात् अन्य श्रुतिमे वैश्वानर शब्द अग्निके अर्थमे विशेषरूपमें प्रयुक्त हुआ है और इस मन्त्रमे गार्हपत्य आदि अग्नियोंको वैश्वानरका अङ्ग बताया गया है, इसलिये; च-तथा; अन्त: प्रतिष्ठानात्-श्रुतिमें वैश्वानरको शरीरके भीतर प्रतिष्ठित कहा गया है। इसलिये भी; न-(यहाँ वैश्वानर शब्द परब्रह्म परमात्माका वाचक) नहीं है; इति न तो यह कहना ठीक नहीं है। तथा दृष्टयुपदेशात्-क्योंकि वहाँ वैश्वानरमें ब्रह्मदृष्टि ‘करनेका उपदेश है; असंभवात् इसके सिवा, केवल जठरानलका विराट्रपमें वर्णन होना संभव नहीं है, इसलिये; च-तथा; एनम् इस वैश्वानरको; पुरुषम् ‘पुरुष’ नाम देकर; अपि-भी; अधीयते-पढ़ते है
( इसलिये उक्त प्रकरणमे वैश्वानर शब्द परब्रह्मका ही वाचक है)।

व्याख्या यदि कहो कि अन्य श्रुतिमे ‘स यो हैतमेवमग्नि वैश्वानरं पुरुषविध पुरुषेन्तःप्रतिष्ठितं वेद । (शतपथब्रा० १०। ६ । १ । ११ ) अर्थात् ‘जो इस वैश्वानर अग्निको पुरुषके आकारका तथा पुरुषके भीतर प्रतिष्ठित जानता है । इस प्रकार वैश्वानर शब्द अग्निके विशेषणरूपसे प्रयुक्त हुआ है, तथा जिस श्रुतिपर विचार चल रहा है, इसमे भी गार्हपत्य आदि तीनो अग्नियोको वैश्वानरका अङ्ग बताया गया है । इसी प्रकार भगवद्गीतामें भी कहा है कि मैं ही वैश्वानररूपसे प्राणियोंके शरीरमे स्थित हो चार प्रकारके अन्नका पाचन करता हूँ।’ (१५।१४) इन सब कारणोसे यहॉ वैश्वानरके नामसे जठराग्निका ही वर्णन है, परमात्माका नहीं, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि
शतपथब्राह्मणकी श्रुतिमें जो वैश्वानर अग्निको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्म दृष्टि करानेके उद्देश्यसे ही है ।

यदि ऐसा न होता तो उसको पुरुष नहीं कहा जाता । तथा श्रीमद्भगवद्गीतामे भी जो वैश्वानर अग्निको सब प्राणियोंके शरीरमें स्थित बताया है, वहाँ भी उसमे परमात्मबुद्धि करानेके लिये भगवान्ने अपनी विभूतिके रूपमे ही कहा है। इसके सिवा, जिसपर विचार चल रहा है, उस श्रुतिमे समस्त ब्रह्माण्डको ‘वैश्वानर’ का शरीर बताया है,

सिरसे लेकर पैरोतक उसके अङ्गोमे समस्त लोकोंकी कल्पना की गयी है। यह जठराग्निके लिये असम्भव भी है । एवं शतपथब्राह्मणमें तथा यहाँ भी इस वैश्वानरको पुरुषके आकारवाला और पुरुष कहा गया है, जो कि जठराग्निके उपयुक्त नहीं है। इन सब कारणोंसे इस प्रकरणमे कहा हुआ वैश्वानर परब्रह्म परमेश्वर ही है। जठराग्नि या अन्य कोई नहीं। vedant darshan 1-2 sutra 16-32

सम्बन्ध- इस प्रसङ्गमें पृथक्-पृथक् उपास्यरूपसे आये हुए ‘दिव’, ‘आदित्य’, ‘वायु,’ ‘आकाश’, ‘जल’ तथा ‘पृथिवी’ भी वैश्वानर नहीं है। यह सिद्ध करनेके लिये कहते हैं

अत एव न देवता भूतं च ॥ १ । २ । २७ ॥

अतः उपर्युक्त कारणोंसे; एच-ही ( यह भी सिद्ध होता है कि); देवता-चौ, सूर्य आदि लोकोंके अधिष्ठाता देवगण; च और; भूतम्-आकाश आदि भूतसमुदाय ( भी ); न वैश्वानर नहीं है ।

व्याख्या- उक्त प्रकरणमे ‘यौ’ ‘सूर्य’ आदि लोकोकी तथा आकाश, वायु आदि भूतसमुदायकी अपने आत्माके रूपमे उपासना करनेका प्रसङ्ग आया है। इसलिये सूत्रकार स्पट कर देते है कि पूर्वसूत्रमे बताये हुए कारणोसे यह भी समझ लेना चाहिये कि उन-उन लोकोके अभिमानी देवताओ तथा आकाश आदि भूतोंका भी वैश्वानर’ शब्दसे ग्रहण नहीं है क्योकि समस्त ब्रह्माण्डको वैश्वानरका शरीर बताया गया है ।

यह कथन न तो देवताओके लिये सम्भव हो सकता है और न भूतोके लिये ही । इसलिये यही मानना चाहिये कि जो विश्वरूप भी है और नर (पुरुप ) भी, वह वैश्वानर है ।’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार परब्रह्म परमेश्वरको ही वैश्वानर कहा गया है ।

सम्बन्ध- पहले २६वे सूत्र में यह बात बतायीं गयी है कि शतपथब्राह्मणके मन्त्रमे जो वैश्वानर अमिको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्मदृष्टि करानके उद्देश्यसे है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शालग्राम-शिलामें विष्णुकी उपासनाके सदृश यहाँ ‘वैश्वानर’ नामक जठराग्निमें परमेश्वरकी प्रतीकोपासना बतलानेके लिये वैश्वानर’ नामसे उस परब्रह्मका वर्णन है। अतः इसपर सूत्रकार आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं—

साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॥ १ । २ । २८॥

साक्षात=”वैश्वानर’ शब्दको साक्षात् परब्रह्मका वाचक माननेमे; अपि-भी; अविरोधम् कोई विरोध नहीं है, ऐसा; जैमिनिः (आह ) आचार्य जैमिनि कहते हैं।

व्याख्या- आचार्य जैमिनिका कथन है कि वैश्वानर शब्दको साक्षात् विश्वरूप परमात्माका वाचक माननेमे कोई विरोध नहीं है । अतः यहाँ जठराग्निको प्रतीक मानकर उसके रूपमे परमात्माकी उपासना माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है।

सम्बन्ध- उपर्युक्त सूत्रोंद्वारा यह बात सिद्ध की गयी कि ‘वैश्वानर’ नामसे इस प्रकरणमें परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन किया गया है। परन्तु निर्विकार निराकार अव्यक्त परब्रह्म परमात्माको इस प्रकार साकार विराट्पमें देशविशेषसे सम्बद्ध बतलाना किस अभिप्रायसे है ? निर्गुण निराकारको सगुण साकार बताना विरुद्ध-सा प्रतीत होता है । इसपर २९ वें सूत्रसे ३१ वें तक विभिन्न आचार्यो का मत बताते हुए अन्तमें ३२ वें सूत्रमें अपना सिद्धान्त कहकर सूत्रकार इस दूसरे पादको समाप्त करते है–

अभिव्यक्तरित्याश्मरथ्यः ॥ १ । २ । २९ ॥

अभिव्यक्ते:-( भक्तोपर अनुग्रह करनेके लिये ) देश-विशेषमे ब्रह्मका प्राकट्य होता है, इसलिये ( अविरोधा)कोई विरोध नहीं है; इति-ऐसा; आश्मरथ्या-आश्मरथ्य आचार्य मानते है।

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

व्याख्या- आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि भक्तजनोपर अनुग्रह करके उन्हें दर्शन देनेके लिये भगवान् समय-समयपर उनकी श्रद्धाके अनुसार नाना रूपोमे प्रकट होते है; तथा अपने भक्तोको दर्शन, स्पर्श और प्रेमालाप आदिके द्वारा सुख पहुँचाने, उनका उद्धार करने और जगत्मे अपनी कीर्ति फैलाकर उसके कथन-मननद्वारा साधकोको परम लाभ पहुँचानेके लिये भगवान् मनष्य आदिके रूपमे भी समय-समयपर प्रकट होते है। यह बात उपनिषद् (केन० ३।२), गीता (४।६-९) और अन्यान्य सद्ग्रन्थोसे भी प्रमाणित है । इस कारण विराटरूपमे उस परब्रह्म परमात्माको सगुण-साकार तथा देश-विशेषसे सम्बद्ध माननेमे कोई विरोध नहीं है,

क्योकि वह सर्वसमर्थ भगवान देश-कालातीत और देशकालसे सम्बन्ध रखनेवाला भी है। वह जिस प्रकार निर्गुण-निराकार है, उसी प्रकार सगुण-साकार भी है । यह बात माण्डूक्यो पनिपमें परब्रह्म परमात्माके चार पादोका वर्णन करके भलीभॉति समझायी गयी है।

सम्बन्ध-अब इस विषयमे वादरि आचार्यका मत उपस्थित करते है

अनुस्मृतेर्बादरिः ॥ १ । २ । ३० ॥

अनुस्मृतेः-विराटपमें परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करनेके लिये; उसको देश-विशेषसे सम्बद्ध बतानेमे ( अविरोधा= ) कोई विरोध नहीं है; (इति) ऐसा; वादरिस वाटरि नामक आचार्य मानते है ।

व्याख्या- परब्रह्म परमेश्वर यद्यपि देशकालातीत है, तो भी उनका निरन्तर भजन, ध्यान, स्मरण करनेके लिये उन्हे देश-विशेपमे स्थित मानने, कहने और समझनेमें कोई विरोध नहीं है; क्योकि भगवान् सर्वसमर्थ है । उनके भक्त उनका जिस-जिस रूपमे चिन्तन करते है, उनपर कृपा करनेके लिये वे उसी उसी रूपमे उनको मिलते है ।

सम्बन्ध-इसी विषयमे आचार्य जैमिनिका मत बताते है

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सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॥ १ । २ । ३१ ॥

सम्पत्तेः-परब्रह्म परमेश्वर अनन्त ऐश्वर्यसे सम्पन्न है, इसलिय ( उसे देश-विशेषमे सम्बन्ध रखनेवाला माननेने कोई विरोध नहीं है ); इति=ऐसा; जैमिनि: जैमिनि आचार्य मानते हैं। हि-क्योकि तथा ऐसा ही भाव; दर्शयति दूसरी श्रुनि भी प्रकट करती है।

व्याख्या- आचार्य जैमिनिका यह कथन है कि परब्रह्म परमेश्वर अनन्त श्वर्यमे सम्पन्न है. अत: उस निर्विकार, निराकार, देशकालातीत परमात्माको सगुण. साकार और किसी देश-विशेषसे सम्बन्ध रखनेवाला माननेमे कोई विरोध नहीं है: क्योकि दूसरी श्रुति भी ऐसा ही भाव प्रकट करती है। (मु० ३०२।१।४)

सम्बन्ध- अब मुत्रकार अपने मतका वर्णन करते हुए इस पादका उपसंहार करते है..

आमनन्ति चैनमस्मिन् ॥ १ । २ । ३२॥

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अस्मिन्-इस वेदान्त-शास्त्रमे, एनम् इस परमेश्वरको; ( एवम् ) ऐसा; च= ही; आमनन्ति प्रतिपादन करते है । श्रीमद्भागवत भी ऐमा ही कहा गया है—- यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय । (३।९।१२) ‘महान् यतास्वी परमेश्वर! आपके भक्तजन अपने हृदयमे आपको जिस-जिस रूपमें चिन्तन करते है। आप उन संत-महात्माओपर अनुग्रह करनेके लिये वहीं-वही शरीर धारण कर लेते हैं।

व्याख्या- इस वेदान्तशास्त्रमे सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सबके निवास स्थान, सर्वसमर्थ परब्रह्म परमेश्वरका ज्ञानीजन ऐसा ही प्रतिपादन करते है* इस विषयमे शास्त्र ही प्रमाण है । युक्ति-प्रमाण यहाँ नहीं चल सकता क्योंकि परमात्मा तर्कका विषय नहीं है । वह सगुण, निर्गुण, साकार निराकार, सविशेष-निर्विशेष आदि सब कुछ है ।

यह विश्वास करके साधकको उसके स्मरण और चिन्तनमे लग जाना चाहिये । वह व्यापक भगवान् सभी देशोंमे सर्वदा विद्यमान है । अतः उसको किसी भी देश-विशेषसे संयुक्त मानना विरुद्ध नहीं है तथा वह सब देशोंसे सदा ही निर्लिस है ! इस कारण उसको देश-कालातीत मानना भी उचित ही है । अतः सभी आचार्योंकी मान्यता ठीक है।

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दूसरा पाद सम्पूर्ण ।

॥अद्वयतारकोपनिषद्॥

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दूसरा पाद

सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् .॥ १ । २ । १॥

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सर्वत्र सम्पूर्ण वेदान्त-वाक्योमे; प्रसिद्धोपदेशात्=( जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके कारणरूपपे ) प्रसिद्ध परब्रह्मका ही उपास्यदेवके रूपमें उपदेश हुआ है, इसलिये ( छान्दोग्यश्रुति ३ । १४ में बताया हुआ उपास्यदेव ब्रह्म ही है)।

ब्याख्या छान्दोग्योपनिषद् अध्याय ३ के चौदहवे खण्डके आरम्भमें सबसे पहले यह मन्त्र आया है, सर्व खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत । अथ खलु क्रतुमयः पुरुयो यथानुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेत. प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत । अर्थात् ‘यह सम्पूर्ण चराचर जगत् निश्चय ब्रह्म ही है; क्योकि यह उसीसे उत्पन्न हुआ है,

स्थितिके समय उसीमे चेष्टा करता हैं और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है । साधकको राग-द्वेषरहित शान्तचित्त होकर इस प्रकार उपासना करनी चाहिये

अर्थात् ऐसा ही निश्चयात्मक भाव धारण करना चाहिये क्योकि यह मनुष्य संकल्पमय है। इस लोकमे यह जैसे संकल्पसे युक्त होता है, यहाँसे चले जानेपर परलोकमे यह वैसा ही बन जाता है । अतः उसे उपर्युक्त निश्चय करना चाहिये ।’ इस मन्त्रवाक्यमे उसी परब्रह्मकी उपासना करनेके लिये कहा गया है, जिससे इस जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते है तथा जो समस्त वेदान्तवाक्योमें जगत्के महाकारणरूपसे प्रसिद्ध है । अतः इस प्रकरणमे बताया हुआ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा नहीं।

सम्बन्ध- यहाँ यह प्रश्न उठता है कि छा ० उ० (३।१४१२)में उपास्यदेवको मनोमय और प्राणरूप शरीरवाला कहा गया है। ये विशेषण जीवात्माके हैं। अतः उसको ब्रह्म मान लेनेसे उस वर्णनकी सङ्गति कैसे लगेगी ? इसपर कहते है–

विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ॥ १।२।२॥

च-तथा; विवक्षितगुणोपपत्तेः श्रुतिद्वारा वर्णित गुणोकी सङ्गति उस परब्रह्ममें ही होती है. इसलिये ( इस प्रकरणमे कथित उपास्यदेव ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- छा०३० (३।१४।२)मे उपास्यदेवका वर्णन इस प्रकार उपलब्ध होता है. मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः । अर्थात् ‘वह उपान्यदेव मनोमय, प्राणरूप शरीरवाला, प्रकाशस्वरूप, सत्य-संकल्प, आकाशके सदृश व्यापक, सम्पूर्ण जगत्का कर्ता, पूर्णकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस समस्त जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाणीरहित तथा सभ्रमशून्य है।’ इस वर्णनमे उपास्यटेवके जो उपादेय गुण बताये गये है, वे सब ब्रह्ममे ही सद्भत होते है । ब्रह्मको ‘मनोमय’ तथा ‘प्रागरूप शरीरवाला’ कहना भी अनुचित नहीं है; क्योंकि वह सबका अन्तर्यामी आत्मा है। केनोपनिपझे उसको मनका भी मन तथा प्राणका भी प्राण बताया है। इसलिये इस प्रकरणमे बतलाया हुआ उपाम्यदेव परब्रह्म परमेश्वर ही है।

सम्बन्ध- उपर्युक्त सूत्रमें श्रुतिवर्णित गुणोंकी उपपत्ति ( सङ्गति ) ब्रह्ममें श्रोत्रस्य श्रोनं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचर स उ प्राणस्य प्राणः । (के० उ०१। २) बतायी गयी: अब जीवात्मामें उन गुणोंकी अनुपति बनाकर पोत सिद्धान्ती पुष्टि की जाती है–

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अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥ १। २ । ३ ॥

तु-परन्तु अनुपपत्तेः-जीवात्मामें श्रुतिवर्णित गुगोंकी सङ्गति न होनेके कारगः शारीरा-जीवानाः न= इस प्रकरणनें कहा हुआ उपास्यदेव) नहीं है।

व्याल्या- उपासनाके लिये श्रुतिमें जो सत्य-संकल्पना, सर्वव्यापकता. सर्वात्मकता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुण बनाये गये हैं. वे जीवात्मानें नहीं पाये जाते; इस कारण इस प्रसङ्गने बताया हुआ उपास्यदेव जीवाला नहीं है. ऐसा मानना ही ठीक है।

सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे उसी वानको सिद्ध किया जाता है

कर्मकर्तृव्यपदेशाच ॥ १ ॥ २ ॥ ४ ॥

कर्मकर्तव्यपदेशात्-उक्त प्रकरणने उपान्यदेवको प्राप्तिक्रियाका कर्म अर्थात् प्राप्त होने योग्य कहा है और जीवात्माको प्रातिक्रियाका कर्ता अर्थात् उस ब्रह्मको प्राप्त करनेवाला बताया है, इसलिये; च-भी (जीवात्मा उपास्य नहीं हो सकता)।

व्याल्या- उ० (३ । १४ । ४) में कहा गया है कि ‘सर्वकर्मा आदि विशेषगोंसे युक्त ब्रह्म हो मेरे हृदय में रहनेवाल मेरा आत्मा है। मरने के बाद यहाँसे जाकर परलोकमें मैं इसीको प्राप्त होऊँगा !* इस प्रकार यहाँ पूर्वोक्त उपास्यदेवको प्राप्त होने योग्य तथा जीवात्माको उसे पानवाल कहा गया है। अतः यहाँ उपास्य देव परब्रह्म परमात्मा है और उपासक जीवात्मा । यही मानना उचित है।

सम्बन्ध प्रकारान्तरले पुनः उक्त चातकी ही पुष्टि करते हैं,
एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान् बोहर्वा याद्वा सर्षपाद् वा श्यानाकाद् वा श्यामाकतण्डुलाद् वैष म आन्नान्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरि क्षाज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥ (छ.० उ० ३।१४।३)
सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरतः सर्वमिदसम्यात्तोऽवाक्यनादर एपस आत्मान्तहृदय एतद् ब्रौतमिनः प्रेत्याभिसंसवितालि। (छ.उ.३।१४।४)

शब्दविशेषात् ॥ १।२। ५॥

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शब्दविशेषात् ( उपास्य और उपासकके लिये ) शब्दका भेद होनेके कारण भी ( यह सिद्ध होता है कि यहाँ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है )।

व्याख्या- छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रमे कहा गया है* कि यह मेरे हृदयके अंदर रहनेवाला अन्तर्यामी आत्मा है । यह ब्रह्म है । इस कथनमें ‘एप.’ ( यह ) ‘आत्मा’ तथा ‘ब्रह्म’ ये प्रथमान्त शब्द उपास्यदेवके लिये प्रयुक्त हुए है और ‘मे’ अर्थात् ‘मेरा’ यह पष्ठयन्त पद भिन्नरूपसे उपासक जीवात्माके लिये प्रयुक्त हुआ है । इस प्रकार दोनोके लिये प्रयुक्त हुए शब्दोंमे भेद होनेके कारण उपास्यदेव जीवात्मासे भिन्न सिद्ध होता है । अतः जीवात्माको उपास्यदेव नहीं माना जा सकता ।

सम्बन्ध- इसके सिवा

स्मृतेः स्मृति-प्रमाणसे, ॥ १। २ । ६॥

च=भी ( उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है)।

व्याख्या- श्रीमद्भगवद्गीता आदि स्मृति-ग्रन्थसे भी उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है । जैसे- मय्येव मन आधख मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्व न संशयः ॥ ( गीता १२ । ८) ‘मुझमें ही मनको लगा और मुझमे ही बुद्धिको लगा, इसके पश्चात् तू मुझमे ही निवास करेगा अर्थात् मुझे ही प्राप्त करेगा; इसमे कुछ भी संशय नहीं है।’

अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयानि स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ (गीता ८ । ५) ‘और जो पुरुष अन्तकालमे मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्यागकर । जाता है, वह मेरे खरूपको प्राप्त होता है; इसमे कुछ भी संशय नहीं है।’

अतः इस प्रसङ्गके वर्णनमे उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, आत्मा या अन्य कोई नहीं । यही मानना ठीक है । ये दोनों मन्त्र चौबीसवें पृष्ठकी टिप्पणी में देखे ।

सम्बन्ध- छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रोंमें उपास्यदेवको हृदयमें स्थित एकदेशीय बतलाया है तथा तीसरे मन्त्रमें उसे सरसों और सावॉसे भी छोटा बताया है। इस अवस्थामें उसे परब्रह्म कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं

अर्भकौकस्त्वात्तव्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्य
त्वादेवं व्योमवच्च ॥ १।२ । ७॥

चेत यदि कहो अर्भकौकस्त्वात उपास्यदेव हृदयरूप छोटे स्थानवाला है, इसलिये; च तथा तद्वयपदेशात्-उसे अत्यन्त छोटा बताया गया है, इस कारण; न-वह ब्रह्म नहीं हो सकता इति न तो यह कहना ठीक नहीं है। निचाय्यत्वात्-क्योंकि ( वह ) हृदयदेशमें द्रष्टव्य है, इसलिये; एवम् उसके विषयमे ऐसा कहा गया है;
च-तथा; व्योमवत्-वह आकाशकी भाँति सर्वत्र व्यापक है ( इस दृष्टिसे भी ऐसा कहना उचित है)।

व्याख्या-यदि कोई यह शङ्का करे कि छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रोमे उपास्यदेवका स्थान हृदय बताया गया है, जो बहुत छोटा है तथा तीसरे मन्त्रमे उसे वान, जौ, सरसों तथा सावाँसे भी अत्यन्त छोटा कहा गया है। इस प्रकार एकदेशीय और अत्यन्त लघु बताया जानेके कारण यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म नहीं हो सकता; क्योकि परब्रह्म परमात्माको सबसे बड़ा, सर्वव्यापी तथा सर्वशक्तिमान् बताया गया है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योकि

उक्त मन्त्र मे जो परब्रह्म परमात्माको हृदयमे स्थित बताया गया है, वह उसके उपलब्धि स्थानकी अपेक्षासे है । भाव यह है कि परब्रह्म परमात्माका स्वरूप आकाशकी भाँति सूक्ष्म और व्यापक है । अतः वह सर्वत्र है। प्रत्येक प्राणीके हृदयमे भी है और उसके बाहर भी * ( ईशा० ५)। (गीता १३ । १५)। अतएव छ तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः । (ईशा० ५) + बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ (गीता १३ । १५)

वह परमात्मा चराचर सब भूतोके बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचररूप भी वही है तथा वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है और अत्यन्त समीप एवं दूरमे भी स्थित वहीं है। उसे हृदयस्थ बता देनेमात्रसे उसका एकदेशीय होना सिद्ध नहीं होता तथा जो उसे धान, जौ, सरसो और सावॉसे भी छोटा बताया गया है, इससे श्रुतिका उद्देश उसे छोटे आकारवाला बताना नहीं है, अपितु अत्यन्त सूक्ष्म और इन्द्रियोद्वारा अग्राह्य ( ग्रहण करनेमे न आनेवाला) बतलाना है । इसीलिये उसी मन्त्रमे यह भी कहा गया है कि वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक और समस्त लोकोसे भी बड़ा है। भाव यह है कि वह इतना सूक्ष्म होते
हुए भी समस्त लोकोंके बाहर-भीतर व्याप्त और उनसे परे भी है। सर्वत्र वही है । इसलिये यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं ।

सम्बन्ध- परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमे स्थित होकर भी उनके सुख-दुःख से अभिभूत नहीं होता, उसकी इस विशेषताको वतानेके लिये कहते हैं-

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संभोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेप्यात् ॥ १ । २ । ८ ॥

चेत् यदि कहो; संभोगप्राप्तिः=( सबके हृदयमे स्थित होनेसे चेतन होनेके कारण उसको ) सुख-दुःखोंका भोग भी प्राप्त होता होगा; इति न-तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; चशेष्यात्-क्योकि जीवात्माकी अपेक्षा उस परब्रह्ममे विशेषता है।

व्याख्या- यदि कोई यह शङ्का करे कि आकाशकी भॉति सर्वव्यापक परमात्मा समस्त प्राणियोंके हृदयमे स्थित होनेके कारण उन जीवोंके सुख-दुःखों का भोग भी करता ही होगा; क्योकि वह आकाशकी भॉति जड नहीं, चेतन है और चेतनमे सुख-दुःखकी अनुभूति स्वाभाविक है। तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि परमात्मामे कर्तापनका अभिमान और भोक्तापन नहीं है। वह सबके हृदयमे रहता हुआ भी उनके गुण-दोपोसे सर्वथा असङ्ग है। यही जीवोकी अपेक्षा उसमे विशेषता है ।

जीवात्मा तो अज्ञानके कारण कर्ता और भोक्ता है; किन्तु परमात्मा सर्वथा निर्विकार है । वह केवलमात्र साक्षी है, भोक्ता नहीं (मु० उ० ३।१।१)* इसलिये जीवोंके कर्मफलरूप सुख-दुःखादिसे उसका सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है।

सम्बन्ध- उपर कहे हुए प्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि सबके हृदयमें निवास करते हुए भी परब्रह्म भोक्ता नहीं है। परन्तु वेदान्तमें कहीं-कहीं परमात्मा को भोक्ता भी बताया गया है (क० उ०१।२।२५) । फिर वह वचन तयोरन्यःपिप्पलं स्वाहस्यनननन्यो अभिचाकशीति॥ (मु०३० ३।११), किसी अन्यके विषयमें है या उसका कोई दूसरा ही अर्थ है ? यह निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं

अत्ता चराचरग्रहणात् ॥ १ । २ । ९॥

चराचरग्रहणात-चर और अचर सबको ग्रहण करनेके कारण यहाँ, अत्ता भोजन करनेवाला अर्थात् प्रलयकालमे सबको अपनेमे विलीन करनेवाला ( परब्रह्म परमेश्वर ही है)।

व्याख्या- कठोपनिषद् (१ । २ । २५) मे कहा गया है कि ‘यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ।।’ अर्थात् (संहारकालमे) जिस परमेश्वरके ब्राह्मण और क्षत्रिय अर्थात् समस्त स्थावर जगम प्राणीमात्र भोजन बन जाते हैं तथा सबका संहार करनेवाला मृत्यु उपसेचन (व्यञ्जन-शाक आदि ) बन जाता है,

वह परमेश्वर जहाँ और जैसा है, यह कौन जान सकता है ।’ इस श्रुतिमे जिस भोक्ताका वर्णन है, वह कर्मफलरूप सुख-दुःख आदिका भोगनेवाला नहीं है। अपितु संहारकालमें मृत्युसहित समस्त चराचर जगत्को अपनेमें विलीन कर लेना ही यहाँ उसका भोक्तापन है । इसलिये परब्रह्म परमात्माको ही यहाँ अत्ता या भोक्ता कहा गया है, अन्य किसीको नहीं।

सम्बन्ध-इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं।

प्रकरणाच्च ॥ १।२ । १०॥

प्रकरणात् प्रकरणसे; च=भी ( यही बात सिद्ध होती है)।

व्याख्या- उपर्युक्त मन्त्रके पूर्व बीसवेसे चौबीसवेतक परब्रह्म परमेश्वरका ही प्रकरण है । उसीके स्वरूपका वर्गन करके उसे जाननेका महत्त्व तथा उसकी कृपाको ही उसे जाननेका उपाय बताया गया है । उक्त मन्त्रमे भी उस परमेश्वर को जानना अत्यन्त दुर्लभ बतलाया गया है, जो कि पहलेसे चले आते हुए प्रकरण के अनुरूप है ।

अतः पूर्वापरके प्रसङ्गको देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही अत्ता ( भोजन करनेवाला ) कहा गया है ।

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सम्बन्ध-अब यहॉ यह जिज्ञासा होती है कि इसके बादवाली श्रुति (१।३।१ ) में ( कर्मफलरूप) ‘ऋत’को पीनेवाले छाया और धूपके सहश दो भोक्ताओंका वर्णन है । यदि परमात्मा कर्मफलका भोक्ता नहीं है तो उक्त दो भोक्ता कौन-कौन-से है ? इसपर कहते है,

गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तदर्शनात् ॥ १।२।११॥

गुहाम्-हृदयरूप गुहामे; प्रविष्टौ प्रविष्ट हुए दोनो; आत्मानौ जीवात्मा और परमात्मा हि-ही हैं; तदर्शनात क्योकि ( दूसरी श्रुतिमें भी ) ऐसा ही देखा जाता है।

व्याख्या- कठोपनिषद् (१ । ३ । १ ) मे कहा है ‘ऋत पिबन्ती सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः।। अर्थात् ‘शुभ कर्मोके फलखरूप मनुष्य-शरीरके भीतर परब्रह्मके उत्तम निवास स्थान (हृदयाकाश ) मे बुद्रिरूप गुहामे छिपे हुए तथा ‘सत्य’ का पान करनेवाले दो है,

वे दोनों छाया और धूपकी भॉति परस्पर विरुद्ध खभाववाले है। यह बात ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी कहते है । तथा जो तीन वार नाचिकेत अग्निका चयन करनेवाले पञ्चाग्नि-सम्पन्न गृहस्थ है, वे भी कहते है ।’ इस मन्त्रमे कहे हुए दोनो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही है। उन्हींका वर्णन छाया और धूपके रूपमें हुआ है ।

परमात्मा सर्वज्ञ, पूर्ण ज्ञानस्वरूप एवं स्वप्रकाश है, अतः उसका धूपके नामसे बर्गन किया गया है । और जीवात्मा अल्पज्ञ है । उसमे जो कुछ स्वन्य ज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है । जैसे छायामे जो थोड़ा प्रकाश होता है, वह धूपका ही अंग होता है। इसलिये जीवात्माको छायाके नाम से कहा गया है। दूसरी श्रुतिमे भी जीवात्मा और परमात्माका एक साथ मनुष्य-शरीर में प्रविट होना इस प्रकार कहा है–सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि’ (छा० उ० ६ । ३ । २) अर्थात् ‘उस देवता ( परमात्मा ) ने ईक्षण (सकल्प) किया कि मै इस जीवात्माके सहित इन तेज आदि तीनों देवताओमे अर्थात् इनके कार्यरूप
शरीरमे प्रविष्ट होकर नाम और रूपको प्रकट करूँ।’

इससे भी यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त कठोपनिपके मन्त्रमे कहे हुए छाया और धूप सदृश दो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही है । यहाँ जो जीवात्माके साथ-साथ परमात्माको सत्य अर्थात श्रेष्ठ कोंके फलका भोगनेवाला बताया गया है, उसका यह भाव है कि परब्रह्म परमेश्वर ही समस्त देवता आदिके रूपमे प्रकारान्तरसे समस्त यज्ञ और तपरूप शुभ कर्मोंके भोक्ता हैं । परन्तु उनका भोक्तापन सर्वथा निर्दोष है, इसलिये वे भोगते हुए भी अभोक्ता ही हैं।

सम्बन्ध-उपर्युक्त कथनकी सिद्धिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं

विशेषणाच ॥ १। २ । १२ ॥

विशेषणात=( आगेके मन्त्रोंमे ) दोनोके लिये अलग-अलग विशेषण दिये गये हैं, इसलिये; च=भी ( उपर्युक्त दोनो भोक्ताओंको जीवात्मा और परमात्मा मानना ही ठीक है)।

व्याख्या- इसी अध्यायके दूसरे मन्त्रमे उस परम अक्षर ब्रह्मको संसारसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये ‘अभय पद’ बताया गया है । तथा उसके बाद रथके दृष्टान्तमें जीवात्माको रथी और उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्तव्य परमधामके नामसे कहा गया है । इस प्रकार उन दोनोके लिये पृथक्-पृथक् विशेषग होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ जिनको गुहामें प्रविष्ट बताया गया है, वे जीवात्मा और परमात्मा ही है।

सम्बन्ध- यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि परमात्माकी उपलब्धि हृदयमे होती है, इसलिये उसे हृदयमै स्थित वताना तो ठीक है, परन्तु छान्दोग्योपनिपद् (४।१५।१) में ऐसा कहा है कि ‘यह जो नेत्रमै पुरुप दीखता है, यह आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय और ब्रह्म है । अतः यहाँ नेत्र में स्थित पुरुष कौन है ? इसका निर्णय करनेके लिये
अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है.—-

अन्तर उपपत्तेः ॥ १।२।१३ ॥

अन्तरे-जो नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाला कहा गया है, वह ब्रह्म ही है। उपपत्तेः-क्योंकि ऐसा माननेसे ही पूर्वापर-प्रसङ्गकी सङ्गति बैठती है ।

व्याख्या- यह प्रसङ्ग छान्दोग्योपनिषद्मे चौथे अध्यायके दशम खण्डसे आरम्भ हुआ है और पन्द्रहवे खण्डमें समाप्त । प्रसङ्ग यह है कि उपकोशल नामका

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरस् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ (गीता ५ । ३९) अहं हि सर्वयज्ञानां भोत्ता च प्रभुरेव च। (गीता ९ । २३ ) + सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असतं सर्वभूच्चैव निर्गुणं गुणभोक्त च ।। (गीता १३ । १४)

ब्रह्मचारी सत्यकाम नामक ऋपिके आश्रममें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करता हुआ गुरुकी और अग्नियोंकी सेवा करता था । सेवा करते-करते उसे बारह वर्ष व्यतीत हो गये; परन्तु गुरुने उसे न तो उपदेश दिया और न स्नातक ही बनाया । इसके विपरीत उसीके साथ आश्रममे प्रविष्ट होनेवाले दूसरे शिष्योको स्नातक बनाकर घर भेज दिया।

तब आचार्यसे उनकी पत्नीने कहा, ‘भगवन् ! इस ब्रह्मचारीने अग्नियोकी अच्छी प्रकार सेवा की है । तपस्या भी इसने की ही है। अब इसे उपदेश देनको कृपा करे ।’ परन्तु अपनी भार्याकी बातको अनसुनी करके सत्यकाम ऋपि उपकोगलको उपदेश दिये बिना ही बाहर चले गये । तब मनमे दुखी होकर उपकोशलने अनशन व्रत करनेका निश्चय कर लिया। यह देख आचार्य-पत्नीने पूछा—‘ब्रह्मचारी ! तू भोजन क्यो नहीं करता है।

उसने कहा, ‘मनुष्यके मनमे बहुत-सी कामनाएँ रहती है । मेरे मनमे बड़ा दुःख है, इसलिये में भोजन नहीं करूंगा। तब अग्नियोने एकत्र होकर विचार किया कि इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है, अत. उचित है कि हम इसे
उपदेश करे ऐमा विचार करके अग्नियोने कहा ‘प्राण ब्रह्म है, क ब्रह्म है, ख ब्रह्म है ।’ उपकांशल बोला—‘यह बात तो मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है।

परन्तु ‘क’ और ‘ख’ को नहीं जानता।’ अग्नियोने कहा निस्सन्देह जो ‘क’ है, वही ‘ख’ है और जो ‘ख’ है, वही ‘क’ है तथा प्राण भी वही है । इस प्रकार उन्होने ब्रह्मको ‘क’ सुख-स्वरूप और ‘ख’ आकाशकी भॉति सूक्ष्म एव व्यापक बताया तथा वही प्राणरूपसे सबको सत्ता-स्कृति देनेवाला है। इस प्रकार सकेतसे ब्रह्मका परिचय कराया। उसके बाद गार्हपत्य अग्निने प्रकट होकर कहा-‘सूर्यमे जो यह पुरुष दीखता है, वह मै हूँ, जो उपासक इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह पाणेका नाश करके अच्छे लोकोका अधिकारी होता है तथा पूर्ण आयुष्मान् और उज्ज्वल जीवनसे युक्त होता है। उसका वश कभी नष्ट नहीं होता ।

इसके बाद ‘अन्वाहार्यपचन’ अग्निने प्रकट होकर कहा, ‘चन्द्रमामे जो यह पुरुष दिखायी देता है, वह मैं हूँ । जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर उपासना करता है, वह अच्छे लोकोका अधिकारी होता है ।’ इत्यादि तत्पश्चात आहवनीय अग्निने प्रकट होकर कहा, ‘विजलीमे जो यह पुरुष दीखता है, वह मैं हूँ।’ इसको जानकर उपासना करनेका फल भी उन्होने दूसरी अन्नियोकी भाँति ही बतलाया । तदनन्तर सब अग्नियोंन एक साथ कहा. ‘हे उपकोशल ! हमने तुमको हमारी विद्या ( अग्नि-विद्या ) और आत्म-विद्या दोनों ही बतलायी है ।

आचार्य तुमको इनका मार्ग दिखलावेंगे।’ इतनमें ही उसके गुरु सत्यकाम आ गये। आचार्यने पूछा, ‘सौम्य । तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताकी भाँति चमकता है, तुझे किसने उपदेश दिया है ? उपकाशलने अग्नियोंकी ओर संकेत किया । आचार्यन पूछा. ‘इन्होंने तुझे क्या बतलाया है ? तत्र उपकोशलने अग्नियोंसे सनी नई सब बातें बता दी।

तत्पश्चात आचार्यन कहा. हे सौग्य ! इन्होंने तुझे केवल उत्तम लोकत्राप्तिके साधनका उपदेश दिया है, अब मैं तुझे वह उपदेश देता हूँ, जिसको जान लेनेवालेको पाप उसी प्रकार स्पर्श नहीं कर सकते, जैसे कमलके पत्तेको जल उपकोशलने कहा, ‘भगवन् ! बतलानेकी कृपा कीजिये । इसके उत्तरमें आचार्यने कहा, ‘जो नेत्रमे यह पुरुष दिखलायी देता है, यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय और ब्रह्म है । उसके बाद उसीको संयद्दामा धाननी’ और ‘भामनी’ बतलाकर अन्तमें इन विद्याओका फल अर्चिमार्गले ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है।

इस प्रकरणको देखने से मालूम होता है कि आँखके भीतर दीखनेवाला पुरुष परब्रह्म ही है. जीवात्मा या प्रतिविम्बके लिये यह कथन नहीं है, क्योकि ब्रह्मविद्या के प्रसङ्गमे उसका वर्णन करके उसे आत्मा, अमृत, अभय और ब्रह्म कहा है। इन विशेषणोंकी उपपत्ति ब्रह्ममे ही लग सकती है. अन्य किसीमे नहीं ।

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सम्बन्ध-अब यह जिज्ञासा होती है कि यहाँ ब्रह्मको ऑसमें दीखनेवाला युरुप क्यों कहा गया ? वह किसी न्शनविशेषमें रहनेवाला थोड़े ही है ? इसपर कहते हैं

स्थानादिव्यपदेशाच ॥ १ । २ । १४ ॥

स्थानादिव्यपदेशात् श्रुतिमे अनेक स्थलोंपर ब्रह्मके लिये स्थान आदिका निर्देश किया गया है. इसलियेः च- भी ( नेत्रान्तर्वी पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)।
गया है । इसी प्रकार अन्य श्रुतियोमे भी वर्गन आया है | अतः यहाँ ब्रह्मको नेत्रमे दीखनेवाला कहना अयुक्त नहीं है। क्योकि ब्रह्म निर्लिप्त है और ऑखमे दीखनेवाला पुरुष भी ऑखके दोपोसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है । इस समानताको लेकर ब्रह्मका तत्व समझानेके लिये ऐसा कहना उचित ही है । इसीलिये वहाँ यह भी कहा है कि ‘ ऑखमे घी या पानी आदि जो भी वस्तु डाली जाती है, वह ऑखकी पलकोंमे ही रहती है, द्रष्टा पुरुपका स्पर्श नहीं कर सकती ।’

सम्बन्ध-उक्त सिद्धान्तको दृढ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं

सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॥ १ । २ । १५॥

च-नया: सुखविशिष्टाभिधानात नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको आनन्दयुक्त बताया गया है, इसलिये एव-भी ( यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- उक्त प्रसङ्गमे यह कहा गया है कि यह नेत्रमे दीखनेवाला पुरुष ही अमृत, अभय और ब्रह्म है।’ इस कथनमे निर्भयता और अमृतत्व-ये दोनो ही सुखके सूचक है । तथा जब अग्नियोने एकत्र होकर पहले-पहल उपदेश दिया है, वहाँ कहा गया है कि जो ‘क’ अर्थात् सुख है, वही ‘ख’ अर्थात् ‘आकाश’ है। भाव यह है कि वह ब्रह्म आकाशकी भॉति अत्यन्त सूक्ष्म, सर्वव्यापी और आनन्दस्वरूप है । इस प्रकार उसे आनन्दयुक्त बतलाया जानेके कारण वह ब्रह्म ही है।

सम्बन्ध-इसके सिवा,

श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ॥ १। २ । १६ ॥

श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानात-उपनिषद् अर्थात् रहस्य-विज्ञानका श्रवण कर लेनेवाले ब्रह्मवेत्ताकी जो गति बतायी है, वही गति इस पुरुपको जाननेवालेकी भी कही गयी है, इससे; च-भी ( यही ज्ञात होता है कि नेत्रमे दीखनवाला पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- इस प्रमङ्गके अन्तमे इस नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको जाननेवालेकी वही पुनरावृत्तिरहित गति अर्थात देवयानमार्गसे जाकर ब्रह्मलोकमे ब्रह्मको प्राप्त होने और वहॉसे पुन. इस संसारमे न लौटनकी बात बतायी गयी है। जो अन्यत्र ब्रह्मवेत्ताके लिये कही गयी है (प्र० उ०१।१०) * । इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ नेत्रमें दीखनेवाला पुरुष ब्रह्म ही है।

सम्बन्ध यदि इस प्रकरणमें नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाले प्रतिविम्ब, नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा- इनमेंसे किसी एकको नेत्रान्तर्वती पुरुष मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं—

अनवस्थितेरसंभवाच्च नेतरः ।।१२।१७ ॥

अनवस्थिते: अन्य किसीकी नेत्रमें निरन्तर स्थिति न होनेके कारण; च= तथा; असंभवात् ( श्रुतिमें बताये हुए अमृतत्व आदि गुग ) दूसरे किसीमे सम्भव न होनेसे; इतर:-ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भी; न नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं है।

व्याख्या- छाया-पुरुष या प्रतिविम्ब नेत्रेन्द्रियमें सदा नहीं रहता; जब कोई पुरुष सामने आता है, तब उसका प्रतिविम्ब नेत्रमे दिखायी देता है और उसके हटते ही अदृश्य हो जाता है । इन्द्रियानुग्राहक देवताकी स्थिति भी नेत्रमे सदा नहीं रहती, जिस समय वह इन्द्रिय अपने विषयको ग्रहण करती है, उसी समय वह उसके सहायक रूपसे उसमें स्थित माना जाता है ।

इसी प्रकार जीवात्मा भी मनके द्वारा एक समय किसी एक इन्द्रियके विषयको ग्रहण करता है तो दूसरे समय दूसरी ही इन्द्रियके विषयको; और सुषुप्तिमे तो किसीके भी विषयको नहीं ग्रहण करता । अतः निरन्तर एक-सी स्थिति आँखमे न रहनेके कारण इन तीनोमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष
नहीं कहा जा सकता । इसके सिवा, नेत्रमे दिखायी देनेवाले पुरुषके जो अमृतत्व और निर्भयता आदि गुण श्रुतिन बताये है, वे ब्रह्मके अतिरिक्त और किसीमे’ सम्भव नहीं है।

इस कारण भी उपर्युक्त तीनोंमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं माना जा सकता । इसलिये परब्रह्म परमेश्वरको ही यहाँ नेत्रमे दिखायी देनेवाला पुरुष कहा गया है; यही मानना ठीक है। अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽस्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते। एतदुबै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मास पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः। किन्तु जो तपस्याके साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक और श्रद्धासे युक्त होकर अध्यात्मविद्याके द्वारा परमात्माकी खोज करके जीवन सार्थक कर लेते हैं,
वे उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकको जीत लेते (प्राप्त कर लेते) हैं। यही प्राणोका केन्द्र है । यह अमृत और निर्मय पद है। यह परम गति है। इससे पुनः लौटकर नहीं आते । इस प्रकार यह निरोध– पुनरावृत्ति-निवारक है।’

सम्बन्ध- पूर्वप्रकरणमें यह वात बतायी गयी है कि श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मके लिये भिन्न-भिन्न स्थान आदिका निर्देश किया गया है । अव पुन: अधिदैव, अधिभूत आदिमें उस ब्रह्मकी व्याप्ति वतलाकर उसी बातका समर्थन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है

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अन्तर्याम्यधिदेवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १। २ । १८॥

अधिदेवादिषु-आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि समस्त वस्तुओंमे; अन्तर्यामी जिसे अन्तर्यामी वतलाया गया है ( वह परब्रह्म ही है ); तद्धर्म व्यपदेशात्-क्योंकि वहाँ उसीके धोका वर्णन है।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (३ । ७ ) में यह प्रसङ्ग आया है। वहाँ उद्दालक ऋषिन याज्ञवल्क्य मुनिसे पहले तो सूत्रात्माके विपयमे प्रश्न किया है। फिर उस अन्तर्यामीके सम्बन्धमे पूछा है, जो इस लोक और परलोकको तथा समस्त भूत-प्राणियोंको उनके भीतर रहकर नियन्त्रणमे रखता है । इसके उत्तरमे याज्ञवल्क्यने सूत्रात्मा तो वायुको वताया है और अन्तर्यामीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उसे जड़-चेतनात्मक समस्त भूतो, सब इन्द्रियो और सपूर्ण जीवोंका नियन्ता बताकर अन्तमे इस प्रकार कहा है

यह अन्तर्यामी देखनमे न आने वाला किन्तु स्वयं सवको देखनेवाला है, सुननमें न आनेवाला किन्तु स्वयं सत्र कुछ सुननेवाला है और मनन करनेमे न
आनेवाला किन्तु खयं सबका मनन करनेवाला है । वह विशेषरूपसे किसीके जाननमे नहीं आता, किन्तु स्वयं सबको विशेषरूपसे भलीभाँति जानता है । ऐसा यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इससे भिन्न सब कुछ विनाशशील है ।’ इस वर्णनमे आये हुए महत्त्वसूचक विशेषण परब्रह्ममे ही सङ्गत हो सकते हैं । जीवात्माका अन्तर्यामी आत्मा ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई नहीं हो सकता । अतः इस प्रसङ्गमे ब्रह्मको ही अन्तर्यामी बताया गया है..–यही मानना ठीक है ।

सम्बन्ध- पूर्वसूत्रमें विधि-मुखसे यह बात सिद्ध की गयी कि अन्तर्यामी ब्रह्म ही है । अव निषेधमुखसे यह सिद्ध करते हैं कि अव्यक्त जड प्रकृति,अन्तर्यामी नहीं हो सकती

न च स्मार्तमतधर्मामिलापात् ॥ १।२ । १६ ॥

सातम्-सांख्यस्मृतिद्वारा प्रतिपादित प्रधान ( जड प्रकृति); च-भी; न= अन्तर्यामी नहीं है; अतद्धर्मामिलापात-क्योकि इस प्रकरणमे बताये हुए द्रष्टापन आदि धर्म प्रकृतिके नहीं है ।

व्याख्या- सांख्य-स्मृतिद्वारा प्रतिपादित जड प्रकृतिके धर्मोका वर्णन वहाँ अन्तर्यामीके लिये नहीं हुआ है। अपितु चेतन परब्रह्मके धर्मोका ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । इस कारण वहाँ कहा हुआ अन्तर्यामी प्रकृति नहीं हो सकती । अतः यही सिद्ध होता है कि इस प्रकरणमे ‘अन्तर्यामी’ के नामसे पर ब्रह्म परमात्माका ही
वर्णन हुआ है।

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अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १।१९॥

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sutra 19-30

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

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सम्बन्ध-परब्रह्म परमात्माके सिवा, प्रकृति या जीवात्मा कोई भी ‘आनन्द मय’ शब्दसे गृहीत नहीं हो सकता; इस बातको दृढ़ करते हुए प्रकरणका उपसंहार करते हैं

अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १।१९॥

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व्याख्या- तै० उ० (२८)मे श्रुति कहती है कि इस आनन्दमय परमात्माके तत्वको इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् अन्नमयादि समस्त शरीरोके आत्मस्वरूप आनन्दमय ब्रमको प्राप्त हो जाता है ।’ बृहदारण्यको थी श्रुतिका कथन है कि (ब्रह्मको जाननेवाला पुरुष ) ब्रह्मरूप होकर ही ब्रह्ममे लीन होता है। (बृह० उ० ४ । ४ । ६) श्रुतिके इन वचनोसे यह खत सिद्ध हो जाता है कि जड प्रकृति या जीवात्माको ‘आनन्दमय’ नहीं माना जा सकता, क्योकि चेतन जीवात्मा का जड प्रकृतिमे अथवा अपने ही-जैसे परतन्त्र दूसरे किसी जीवमे लय होना नहीं बन सकता । इसलिये एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही ‘आनन्दमय’ शब्दका वाच्यार्थ है और वही सम्पूर्ण जगत्का कारण है,
दूसरा कोई नहीं ।

सम्बन्ध- तैत्तिरीय श्रुतिमें जहाँ आनन्दमयका प्रकरण आया है, वह ‘विज्ञानमय’ शब्दसे जीवात्माको ग्रहण किया गया है, किन्तु बृहदारण्यक (४।४।२२ ) में ‘विज्ञानमय’ को हृदयाकाशमें शयन करनेवाला अन्तरात्मा बताया गया है। अतः जिज्ञासा होती है कि वहाँ विज्ञानमय’ शब्द जीवात्मा का वाचक है अथवा ब्रहाका ?

इसी प्रकार छान्दोग्य (१।६।६ ) में जो सूर्यमण्डलानर्वती हिरण्मय पुरुषका वर्णन आया है, वहाँ भी यह शङ्का हो सकती है कि इस मन्त्रमें सूर्य के अधिष्ठाता देवताका वर्णन हुआ है या ब्रह्मका ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है,

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अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ १।१।२० ॥

अन्तः हृदयके भीतर शयन करनेवाला विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलके भीतर स्थित हिरण्मय पुरुष ब्रह्म है; तद्धर्मोपदेशात्= क्योकि (उसमे ) उस ब्रह्मके धर्मोका उपदेश किया गया है।

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व्याख्या- उपर्युक्त बृहदारण्यक-श्रुतिमे वर्णित विज्ञानमय पुरुपके लिये इस प्रकार विशेषण आये है–सर्वस्य वशी सर्वस्येशान. सर्वस्याधिपतिः एष सर्वेश्वर एप भूतपालः’ इत्यादि । तथा छान्दोग्यवर्णित सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती पुरुषके लिये सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदिनः ( सब पापोसे ऊपर उठा हुआ ) यह विशेषण दिया गया है। ये विशेषण परब्रह्म परमेश्वरम ही सम्भव हो सकते है। किसी भी स्थिति को प्राप्त देव, मनुष्य आदि यानियोंमें रहनेवाले जीवात्माके ये धर्म नहीं हो सकते। इसलिये वहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष ममझना चाहिये; अन्य किसीको नहीं ।

सम्बन्ध-इसी बानको सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं

भेदव्यपदेशाच्चान्यः ॥ १।१।२१ ॥

च-तथा; भेदव्यपदेशात् भेदका कयन होनेसे; अन्याः सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भिन्न है।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद्के अन्तर्यामिब्राह्मणमें कहा है कि-‘य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः । अर्थात् जो सूर्यमें रहनेवाला सूर्यका अन्तर्वर्ती है, जिसे सूर्य नहीं जानता, सूर्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर सूर्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इस प्रकार वहाँ सूर्यान्तर्वर्ती पुरुषका सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भेद बताया गया है। इसलिये वह हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठातासे भिन्न परब्रह्म परमात्मा ही है ।

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सम्बन्ध- यहॉतकके विवेचनसे यह सिद्ध किया गया कि जगत्की उत्पत्ति स्थिति और प्रलयका निमित्त और उपादान कारण परब्रह्म परमेश्वर ही है। जीवात्मा या जड़ प्रकृति नही । इसपर यह जिज्ञासा होती है कि श्रुति (छा०३० १।९।१ ) में जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण आकाशको भी बताया गया है, फिर ब्रह्मका लक्षण निश्चित करते हुए यह कैसे कहा गया कि जिससे जगत्के जन्म आदि होते हैं, वह ब्रह्म है । इसपर कहते हैं–

आकाशस्तल्लिंडात् ॥ १।१।२२॥

आकाशः=(वहाँ ) ‘आकाश’ शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है; तल्लिङ्गात्-क्योकि ( उस मन्त्रमे ) जो लक्षण बताये गये हैं, वे उस ब्रह्मके ही हैं।
व्याख्या- छान्दोग्य (१ । ९ । १ ) में इस प्रकार वर्णन आया है ‘सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशम्प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो होवेभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् । अर्थात् ‘ये समस्त भूत (पञ्चतत्त्व और समस्त प्राणी) निःसन्देह आकाशसे ही उत्पन्न होते है और आकाशमे ही विलीन होते हैं । आकाश ही इन सबसे श्रेष्ठ और बड़ा है। वही इन सबका परम आधार है।’ इसमे आकाशके लिये जो विशेषण आये है, वे भूताकाशमे सम्भव नहीं हैं। क्योंकि भूताकाश तो स्वयं भूतोंके समुदायमे आ जाता है । अतः उससे भूतसमुदायकी या प्राणियोंकी उत्पत्ति बतलाना सुसङ्गत नहीं है। उक्त लक्षण एकमात्र परब्रह्म परमात्मामे ही सङ्गत हो सकते है । वही
सर्वश्रेष्ठ, सबसे बड़ा और सर्वाधार है; अन्य कोई नहीं । इसलिये यही सिद्ध होता है कि उस श्रुतिमे ‘आकाश’ नामसे परब्रह्म परमेश्वरको ही जगतका कारण बताया गया है।

सम्बन्ध-अब प्रश्न उठता है कि श्रुति (छा० उ०१।११।५) मे आकाशकी ही भॉति प्राणको भी जगत्का कारण बतलाया गया है। वहाँ ‘प्राण’ शब्द किसका वाचक है ? इसपर कहते है,

महाभारत में वैज्ञानिक तत्त्व

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अत एव प्राणः ॥ १।१ । २३॥

अत एव-इसीलिये अर्थात् श्रुतिमे कहे हुए लक्षण ब्रह्ममे ही सम्भव है, इस कारण वहाँ; प्राणः प्राण (भी ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- छान्दोग्य (१ । ११ । ५) मे कहा है कि सर्वाणि हवा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते । अर्थात् निश्चय ही ये सब भूत प्राणने ही विलीन होते हैं और प्राणसे ही उत्पन्न होते है। ये लक्षण प्राणवायुमे नहीं घट सकते क्योकि समस्त प्राणियोकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का कारण प्राणवायु नहीं हो सकता । अत. यहाँ ‘प्राण’ नामसे ब्रह्मका ही वर्णन हुआ है, ऐसा मानना चाहिये ।

पूर्व प्रकरणमें तो ब्रह्मसूचक लक्षण होनेसे आकाश तथा प्राणको ब्रह्मका वाचक मानना उचित है। किन्तु छान्दोग्योपनिषद (३।१३।७) में जिस ज्योति (तेज )को समस्त विश्वसे उपर सर्वश्रेष्ठ परमधाममें प्रकाशित बताया है तथा जिसकी शरीरान्तर्वी पुरुषमें स्थित ज्योतिके साथ एकता बतायो गयी है, उसके लिये वहाँ कोई ऐसा लक्षण नहीं बताया गया है, जिससे उसको ब्रह्मका वाचक माना जाय ।

इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त ज्योतिः’ शब्द किसका वाचक हे ? इसपर कहते हैं—

ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॥ १।१।२४ ॥

चरणाभिधानात्=( उस प्रसङ्गमे ) उक्त ज्योतिके चार पादोका कथन होने से; ज्योति: ज्योति’ शब्द वहाँ ब्रह्मका वाचक है ।

व्याख्या – छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायमे ज्योति.’का वर्णन इस प्रकार हुआ है, अथ यदत. परो दिवो ज्योतिदीप्यते विश्चत. पृष्ठेषु सर्वत पृष्ठेष्वनुत्तमे वृत्तमेधुलोकेश्विदं वाव तयदिदमस्मिन्नन्त पुरुष ज्योति । (३।१३१७) अर्थात् जो इस वर्गलोकसे ऊपर परम ज्योति प्रकाशित हो रही है, वह समस्त विश्वके पृष्ठपर (सबके ऊपर ) जिससे उत्तम दूसरा कोई लोक नहीं है, उस सर्वोत्तम परमधाममे प्रकाशित हो रही है, वह निस्सन्देह यही है जो कि इस पुरुषमें आन्तरिक ज्योति है । इस प्रसङ्गमें आया हुआ ‘ज्योतिः’ शब्द जड प्रकाशका वाचक नहीं है, यह बात तो इसमे वर्णित लक्षणोंसे ही स्पष्ट हो जाती है । तथापि यह ‘ज्योति शब्द किसका वाचक है ?

ज्ञानका या जीवात्माका अथवा ब्रह्मका ? इसका निर्णय नहीं होता अतः सूत्रकार कहते हैं कि यहाँ जो ज्योति शब्द आया है, वह ब्रह्म का ही वाचक है; क्योंकि इसके पूर्व बारहवें खण्डमे इस ज्योतिर्मय ब्रह्मके चार पादोंका कथन है और समस्त भूतसमुदायको उसका एक पाद बताकर शेष तीन पादोंको अमृतखरूप तथा परमधाममें स्थित बताया है । इसलिये इस प्रसङ्गमे आया हुआ ज्योतिः’ शब्द ब्रह्मके सिवा अन्य किसीका वाचक नहीं हो सकता । माण्डूक्योपनिषद्मे आत्माके चार पादोंका वर्णन करते हुए उसके दूसरे पादको तैजस कहा है । यह ‘तेजस’ भी ज्योतिः’का पर्याय ही है । अतः ‘ज्योतिः’की भाँति ‘तेजस’ शब्द भी ब्रह्मका ही वाचक है,
जीवात्मा या अन्य किसी प्रकाशका नहीं। इस बातका निर्णय भी इसी प्रसङ्गके अनुसार समझ लेना चाहिये।

सम्बन्ध- यहाँ यह शङ्का होती है कि छान्दोग्योपनिषद्के तीमरे अध्याय के बारहवें खण्डमें ‘गायत्री के नामसे प्रकरणका आरम्भ हुआ है। गायत्री एक छन्दका नाम है । अत: उस प्रसङ्गमें ब्रह्मका वर्णन है, यह कैसे माना जाय ? इसपर कहते हैं,

छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगदात
तथा हि दर्शनम् ॥ १।१।२५॥

चेत् यदि कहो ( उस प्रकरणमे ); छन्दोऽभिधानात् गायत्री छन्दका कथन होनेके कारण ( उसीके चार पादोंका वर्णन है) न-ब्रह्मके चार पादोंका वर्णन नहीं है; इति न-तो यह ठीक नहीं ( क्योंकि); तथा उस प्रकारके वर्णनद्वारा वह मन्त्र इस प्रकार है,

तावानस्य महिमा ततो ज्यायारच पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्या मृनं दिवि ।। (छा० उ. ३ । १२ । ६)

चेतोऽर्पणनिगदात् ब्रह्ममे चित्तका समर्पण बताया गया है; तथा हि दर्शनम् = वैसा ही वर्णन दूसरी जगह भी देखा जाता है ।

व्याख्या पूर्व प्रकरणमे गायत्री ही यह सब कुछ है। (छा० उ०३ । १२ । १) इस प्रकार गायत्रीछन्दका वर्णन होनेसे उसीके चार पादोका वहाँ वर्णन है, ब्रह्मका नहीं; ऐसी धारणा बना लेना ठीक नहीं है। क्योकि गायत्रीनामक छन्दके लिये यह कहना नहीं बन सकता कि यह जड़-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् गायत्री ही है ।

इसलिये यहाँ ऐसा समझना चाहिये कि सबके परम कारण सर्वात्मक परब्रह्म परमेश्वरमे चित्तका समाधान करानके लिये उस ब्रह्मका ही वहाँ इस प्रकार गायत्री-नामसे वर्णन किया गया है । इसी तरह अन्यत्र भी उद्गीथ, प्रणव आदि नामोके द्वारा ब्रह्मका वर्णन देखा जाता है । सूक्ष्म तत्वमे बुद्धिका प्रवेश करानके लिये, किसी प्रकारको समानताको लेकर स्थूल वस्तुके नामसे उम्मका वर्णन करना उचित ही है।

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

सम्बन्ध- इस प्रकरणमै ‘गायत्री’ शब्द ब्रह्मका ही वाचक है, इस बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं—

भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् ॥ १।१।२६ ॥

भृतादिपादव्यपदेशोपपत्तेः-( यहाँ ब्रह्मको ही गायत्रीके नामसे कहा गया है, यह माननेमे ही ) भूत आदिको पाद बतलाना युक्तिसंगत हो सकता है, इमलिये; च-भी; एवम् ऐसा ही है ।

व्याख्या- छान्दोग्य (३ । १२) के प्रकरणमे गायत्रीको भूत, पृथिवी, शरीर और हृदयरूप चार पाटोमे युक्त बताया गया है। फिर उसकी महिमाका वर्णन करते हुए ‘पुरुष’ नामसे प्रतिपादित परब्रह्म परमात्माके साथ उसकी एकता करके समस्त भूतोको ( अर्थात् प्राणि-समुदायको ) उसका एक पाद बतलाया गया है और अमृतस्वरूप तीन पादोको परमधाममे स्थित कहा गया है । ( छा० उ० ३ । १२।६) । इस वर्णनकी सगति तभी लग सकती है, जब कि गायत्री शब्दको गायत्री छन्दका वाचक न मानकर परब्रह्म परमात्माका वाचक माना जाय । इमलिये यही मानना ठीक है।

सम्बन्ध-उक्त सिद्धान्तकी पुष्टि के लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उपस्थित करके उसका समाधान करते हैं–

उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥ १।१।२७ ॥

चेत् यदि कहो; उपदेशभेदात्-उपदेशमें भिन्नता होनेसे न-गायत्रीशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं है, इति न तो यह कथन ठीक नहीं है। उभयलिन् अपि क्योकि दो प्रकारका वर्णन होनेपर भी; अविरोधात् ( वास्तवमें ) कोई विरोध नहीं है ।

व्याख्या यदि कहा जाय कि पूर्वमन्त्र ( ३ । १२ । ६ ) मे तो तीन पाद दिव्य लोकमे हैं। यह कहकर दिव्य लोकको ब्रह्मके तीन पादोका आधार बताया गया है और बादमे आये हुए मन्त्र (३ । १३ । ७ ) मे ‘ज्योतिः’ नामसे वर्णित ब्रह्मको उस दिव्य लोकसे परे बताया है । इस प्रकार पूर्वापरके वर्णन मे भेद होनेके कारण गायत्रीको ब्रह्मका वाचक बताना सङ्गत नहीं है, तो यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि दोनो जगह के वर्णनको शैलीमे किञ्चित् भेद होनेपर भी वास्तवमे कोई विरोध नहीं है । दोनो स्थलोमे श्रुतिका उद्देश्य गायत्रीशब्द वाच्य तथा ज्योतिःशब्दवाच्य ब्रह्मको सर्वोपरि परम धाममे स्थित बतलाना ही है ।

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

सम्बन्ध- अत एव प्राण (१।११२३) इस सूत्रमें यह सिद्ध किया गया है कि श्रुतिमें ‘प्राण’ नामसे ब्रह्मका ही वर्णन है। किन्तु कौपीतकि-उपनिषद (३ । २) में प्रतर्दनके प्रति इन्द्रने कहा है कि ‘मैं ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ; तू आयु तथा अमृतरूपसे मेरी उपासना कर । इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि इस प्रकरणमें आया हुआ ‘प्राण’ शब्द किसका वाचक है ? इन्द्रका ? प्राणवायुका ? जीवात्माका ? अथवा ब्रह्मका इसपर कहते हैं—

प्राणस्तथानुगमात् ॥ १।१।२८ ॥

प्राणः प्राणशब्द ( यहॉ ब्रह्मका ही वाचक है); तथानुगमात-क्योकि पूर्वापरके प्रसङ्गपर विचार करनेसे ऐसा ही ज्ञात होता है।

व्याख्या– इस प्रकरणमे पूर्वापर प्रसङ्गपर भलीभाँति विचार करनेसे ‘प्राण’ शब्द ब्रह्मका ही वाचक सिद्ध होता है, अन्य किसीका नहीं; क्योंकि आरम्भमे प्रतर्दनने परम पुरुषार्थरूप वर माँगा है । उसके लिये परम हितपूर्ण इन्द्रके उपदेशमें कहा हुआ ‘प्राण’ ‘ब्रह्म’ ही होना चाहिये । ब्रह्मज्ञानसे बढ़कर दूसरा कोई हितपूर्ण उपदेश नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त उक्त प्राणको वहाँ प्रज्ञान खरूप बतलाया गया है, जो कि ब्रह्मके ही अनुरूप है तथा अन्तमे उसीको आनन्दस्वरूप अजर एवं अमर कहा गया है। फिर उसीको समस्त लोकोंका पालक, अधिपति एवं सर्वेश्वर बताया गया है । ये सब बाते ब्रह्मके ही उपयुक्त है । प्रसिद्ध प्राणवायु, इन्द्र अथवा जीवात्माके लिये ऐसा कहना उपयुक्त नहीं हो सकता । इसलिये यही समझना चाहिये कि यहाँ ‘प्राण’शब्द ब्रह्मका ही वाचकहै।

सम्बन्ध-उक्त प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्ट शब्दोंमे स्वय अपनेको ही प्राण कहा है । इन्द्र एक प्रभावशाली देवता तथा अजर, अमर है ही; फिर वहाँ ‘प्राण’ गन्द्रको इन्द्रका हो वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं

न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्ध
भूमा ह्यस्मिन् ॥ १।१।२९॥

चेत् यदि कही; वक्त: वक्ता (इन्द्र ) का ( उद्देश्य ); आत्मोपदेशान् अपनको ही प्राग’ नाम से बतलाना है, इसलिये न-प्रागशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकताः इति= नो ) यह कयनः (न)-ठीक नहीं है; हि-क्योंकि; असिन् इस प्रकरणम; अध्यात्मसम्बन्धभृमा अध्यात्मसम्बन्धी उपदेशकी बदलता है।

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व्याख्या- यदि कहा कि इस प्रकरणमे इन्द्रने स्पटरूपसे अपने आपको ही प्राण बतलाया है, ऐसी परिस्थितिमे प्राण गडको इन्द्रका वाचक न मानकर ब्रह्मका वाचक मानना ठीक नहीं है, तो ऐसा कहना उचित नहीं है, क्योकि इस प्रकरणमे अध्यान्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता है । यहो आधिदैविक वर्णन नहीं है, अत उपास्यरूपये बतलाया हुआ तत्त्व इन्द्र नहीं हो सकता । इसलिये यहाँ ‘प्राण’ शब्दको ब्रह्मका ही वाचक समझना चाहिये ।

कौषीतकि-उपनिषद्म या प्रसङ्ग इस प्रकार है म होवाच प्रतर्दनस्वमेव वृणीव यं त्वं मनुप्याय हिततमं मन्यस इति…। (को० उ० ३ । १) स होवाच प्राणोऽसि प्रजात्मा ।।(को० उ० ३।२) ‘एप प्राण एवं प्रज्ञात्माss नन्दोऽजरोऽमृतः…..एप लोकपाल एप लोकाधिपतिरेष सर्वेश्वरः ।(को० उ०३।९) इस प्रसङ्गमें अध्यात्ममम्बन्धी वर्णनकी बहुलता किस प्रकार है, यह पूर्वसूत्रकी टिप्पणीम देखें।

यहाँ यह प्रश्न उठता है कि यदि ‘प्राण’ शब्द इन्द्रका वाचक नहीं है तो इन्द्रने जो यह कहा कि ‘मै ही प्रज्ञानस्वरूप प्राण हूँ, तू मेरी उपासना कर ।’ इस कथनकी क्या गति होगी ? इसपर कहते हैं

शास्त्रदृष्टया तूपदेशो वामदेववत् ॥ १ । १ । ३० ॥

उपदेश: ( यहाँ) इन्द्रका अपनेको प्राण बतलाना; तु-तो; वामदेववत् वामदेवकी भाँति; शास्त्रदृष्टया ( केवल ) शास्त्र-दृष्टि से है ।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (१।४।१०) मे यह वर्णन आया है कि तद् यो यो देवानां प्रत्यबुद्धयत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धत त्पश्यनृषिर्वामठेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभव सूर्यश्चेति । अर्थात् ‘उस ब्रह्मको देवताओंमे जिसने जाना, वही ब्रह्मरूप हो गया । इसी प्रकार ऋषियो और मनुष्योमें भी जिसने उसे जाना,

वह तद्रूप हो गया। उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना कि मै मनु हुआ और मै ही सूर्य हुआ।’ इससे यह बात सिद्ध होती है कि जो महापुरुष उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है, वह उसके साथ एकताका अनुभव करता हुआ ब्रह्मभावापन्न होकर ऐसा कह सकता है ।

अतएव उस वामदेव ऋषिकी भाँति ही इन्द्रका ब्रह्मभावापन्न अवस्थामे शास्त्रदृष्टिसे यह कहना है कि मैं ही ज्ञानखरूप प्राण हूँ अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हूँ। तू मुझ परमात्माकी उपासना कर ।’ अतः ‘प्राण’शब्दको ब्रह्मका वाचक माननेमे कोई आपत्ति नहीं रह जाती है।

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सम्बन्ध- प्रकारान्तरसे शङ्का उपस्थित करके उसके समाधानद्वारा प्राणको ब्रह्मका वाचक सिद्ध करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते है,

जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रित त्वादिह तद्योगात् ॥ १। १ । ३१॥

सब लक्षण ब्रह्मके आश्रित है ( तथा ) इह तद्योगात् इस प्रसङ्गमें ब्रह्मके लक्षणोका भी कथन है, इसलिये ( यहाँ ‘प्राण’शब्द ब्रह्मकाही वाचक है)।
व्याख्या- कौपीतकि-उपनिपद् (३८) के उक्त प्रसङ्गमे जीवके लक्षणों का इस प्रकार वर्णन हुआ है, न वाच विजिज्ञासीत । वक्तार विद्यात् ।। अर्थात् ‘वाणीको जाननेकी इच्छा न करे । वक्ताको जानना चाहिये ।’

यहाँ वाणी आदि कार्य और करणके अध्यक्ष जीवात्माको जाननेके लिये कहा है । इसी प्रकार प्रसिद्ध प्राणके लक्षणका भी वर्णन मिलता है-‘अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति । (३।३) अर्थात् निस्सन्देह प्रज्ञानात्मा प्राण ही इस गरीरको ग्रहण करके उठाता है । शरीरको धारण करना मुख्य प्राणका ही धर्म है, इस कथनको लेकर यदि यह कहो कि ‘प्राण’शब्द ब्रह्मवाचक नहीं होना चाहिये, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि ब्रह्मके
अतिरिक्त जीव और प्राणको भी उपास्य माननेसे त्रिविध उपासनाका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, जो उचित नहीं है । इसके सिवा, जीव और प्राण आदिके धर्मोंका आश्रय भी ब्रह्म ही है, इसलिये ब्रह्मके वर्णनमे उनके धर्मोका आना अनुचित नहीं है । यहाँ ब्रह्मके लोकाधिपति, लोकपाल आदि लक्षणोंका भी स्पष्ट वर्णन मिलता है।

इन सब कारणोंसे यहाँ ‘प्राण’ शब्द ब्रह्मका ही वाचक है । इन्द्र, जीवात्मा अथवा प्रसिद्ध प्राणका नहीं यही मानना ठीक है।

पहला पाद सम्पूर्ण ।

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १।१ । १॥

सम्बन्ध- ध्यानका स्वरूप बतलाते हैं

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vibhutipaad 1-18

yog darshan vibhutipaad 1-18

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

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विभूतिपाद-३

सम्बन्ध- दूसरे पादमें योगाङ्गोंके वर्णनका आरम्भ करके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार–इन पाँच बहिरङ्ग-साधनोंका फलसहित वर्णन किया गया; शेष धारणा, ध्यान और समाधि-इन तीन अन्तरङ्ग-साधनोंका वर्णन इस पादमें किया जाता है; क्योंकि ये तीनों जब किसी एक ध्येयमें पूर्णतया किये जाते हैं, तब इनका नाम संयम हो जाता है। योगकी विभूतियाँ प्राप्त करनेके लिये संयमकी आवश्यकता है, अतः इन अन्तरङ्ग-साधनोंका वर्णन साधनपाद में न करके इस विभूतिपादमें करते हुए पहले धारणाका स्वरूप बतलाते हैं

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१॥

व्याख्या- नाभिचक्र, हृदय-कमल आदि शरीरके भीतरी देश हैं और आकाश या सूर्य-चन्द्रमा आदि देवता या कोई भी मूर्ति तथा कोई भी पदार्थ बाहरके देश हैं, उनमेंसे किसी एक देशमें चित्तकी वृत्तिको लगानेका नाम ‘धारणा’ है।॥१॥

सम्बन्ध- ध्यानका स्वरूप बतलाते हैं

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥२॥

व्याख्या- जिस ध्येय वस्तुमें चित्तको लगाया जाय, उसीमें चित्तका एकाग्र हो जाना अर्थात् केवल ध्येयमात्रकी एक ही तरहकी वृत्तिका प्रवाह चलना, उसके बीचमें किसी भी दूसरी वृत्तिका न उठना ‘ध्यान’ है ॥२॥

सम्बन्ध-समाधिका स्वरूप बतलाते हैं

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तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥३॥

व्याख्या- ध्यान करते-करते जब चित्त ध्येयाकारमें परिणत हो जाता है, उसके अपने स्वरूपका अभाव-सा हो जाता है, उसको ध्येयसे भिन्न उपलब्धि नहीं होती, उस समय उस ध्यानका ही नाम ‘समाधि’ हो जाता है। यह लक्षण निर्वितर्क समापत्तिके नामसे पहले पादमें किया गया है (योग० १ । ४३) ॥ ३॥

सम्बन्ध- उक्त तीनों साधनोंका सांकेतिक नाम बतलाते हैं

त्रयमेकत्र संयमः ॥४॥

व्याख्या- किसी एक ध्येय पदार्थमें धारणा, ध्यान और समाधि-ये तीनों होनेसे संयम कहलाता है। अतः इस ग्रन्थमें जहाँ-तहाँ किसी विषयमें संयम करनेको कहा जाय या संयमका फल बतलाया जाय तो संयमके नामसे किसी एक ध्येयमें तीनोंका होना समझ लेना चाहिये ॥ ४ ॥

सम्बन्ध- संयमकी सिद्धिका फल बतलाते हैं

तज्जयात्प्रज्ञालोकः ॥५॥

व्याख्या- साधन करते-करते जब योगी संयमपर विजय प्राप्त कर लेता है, अर्थात् चित्तमें ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेता है कि जिस विषयमें वह संयम करना चाहे, उसीमें तत्काल संयम हो जाता है, उस समय योगीको बुद्धिका प्रकाश प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसकी बुद्धिमें अलौकिक ज्ञानशक्ति आ जाती है। इसीको प्रथम पादमें अध्यात्मप्रसादके और ऋतम्भरा प्रज्ञाके नामसे कहा है (योग० १ । ४७-४८) ॥ ५॥

सम्बन्ध- संयमके प्रयोगकी विधिका वर्णन करते हैं

तस्य भूमिषु विनियोगः ॥६॥

व्याख्या- संयमका प्रयोग क्रमसे करना चाहिये अर्थात् पहले स्थूल विषयमें संयम करना चाहिये। वह स्थिर हो जानेपर सूक्ष्म विषयोंमें क्रमसे संयम करना चाहिये। इसी प्रकार जिस-जिस स्थलमें संयम स्थिर होता जाय, उस-उससे आगे बढ़ते रहना चाहिये ॥६॥

सम्बन्ध- उक्त तीनों साधनोंकी विशेषता बतलाते हैं

त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥७॥

व्याख्या- इसके पहले अर्थात् दूसरे पादमें जो योगके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार-ये पाँच अङ्ग बतलाये गये हैं, उनकी अपेक्षा उपर्युक्त धारणा, ध्यान और समाधि-ये तीनों साधन अन्तरङ्ग हैं; क्योंकि इन तीनोंका योग-सिद्धिके साथ निकटतम सम्बन्ध है ॥७॥

सम्बन्ध- निर्बीज समाधिकी विशेषताका वर्णन करते हैं

तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ॥८॥

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व्याख्या- पर-वैराग्यकी दृढ़तासे जब समाधिप्रज्ञाके संस्कारोंका भी निरोध हो जाता है, तब निर्बीज समाधि सिद्ध होती है (योग० १ । ५१) । अतः धारणा, ध्यान और समाधि भी उसके अन्तरङ्ग साधन नहीं हो सकते; क्योंकि उसमें सब प्रकारकी वृत्तियोंका अभाव किया जाता है (योग० १ । १८); किसी भी ध्येयमें चित्तको स्थिर करनेका अभ्यास नहीं किया जाता ॥८॥

सम्बन्ध- गुणोंका स्वभाव चञ्चल है, उनमें प्रतिक्षण परिणाम होता रहता है। चित्त गुणोंका ही कार्य है, अतः वह भी कभी एक अवस्थामें नहीं रह सकता। अतः निरोध समाधिके समय उसका कैसा परिणाम होता है, यह बतलानेके लिये कहते हैं

व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षण चित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥९॥

व्याख्या- निरोधसमाधिमें चित्तकी सम्पूर्ण वृत्तियोंका अभाव हो जानेपर भी उनके संस्कारोंका नाश नहीं होता । उस कालमें केवल संस्कार ही शेष रहते हैं, यह बात पहले पादमें कही है (योग० १ । १८) । अतः निरोधकालमें चित्त व्युत्थान और निरोध दोनों ही प्रकारके संस्कारमें व्याप्त रहता है, क्योंकि चित्त धर्मी है और संस्कार उसके धर्म हैं; धर्मी अपने धर्ममें सदैव व्याप्त रहता है यह नियम है (योग० ३ । १४) । उस निरोधकालमें जो व्युत्थानके संस्कारोंका दब जाना और निरोधसंस्कारोंका प्रकट हो जाना है तथा चित्तका निरोध संस्कारोंसे सम्बन्धित हो जाना है, यह व्युत्थानधर्मसे निरोधधर्ममें परिणत होनारूप निरोध-परिणाम है। निरोध-समाधिकी अपेक्षा सम्प्रज्ञात-समाधि
यहाँ समाधि-परिणाम और एकाग्रता-परिणामके लक्षण पहले न करके पहले निरोध-परिणामका स्वरूप बतलाया है।

इसका यह कारण मालूम होता है कि आठवें सूत्रमें निरोधसमाधिका वर्णन आ गया। इसलिये पहले निरोध-परिणामका लक्षण बतलाना आवश्यक हो गया; क्योंकि पहले (योग० १।५१ में) निरोध-समाधिका लक्षण करते हुए सब वृत्तियोंके निरोधसे निर्बीज-समाधिका होना बतलाया है। अतः उसमें परिणाम न होनेकी धारणा स्वाभाविक हो जाती है। परन्तु जबतक चित्तकी गुणोंसे भिन्न सत्ता रहती है, भी व्युत्थान-अवस्था ही है (योग० ३ । ८) । अतः उसके संस्कारोंको यहाँ व्युत्थान-संस्कारोंके ही अन्तर्गत समझना चाहिये ॥९॥

सम्बन्ध- इसके बाद क्या होता है, सो बतलाते हैं

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तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥ १०॥

व्याख्या- पहले सूत्रके कथनानुसार जब व्युत्थानके संस्कार सर्वथा दब जाते हैं और निरोधके संस्कार बढ़कर भरपूर हो जाते हैं, उस समय उस संस्कारमात्र शेष चित्तमें निरोध-संस्कारोंकी अधिकतासे केवल निर्मल. निरोध-संस्कारधारा चलती रहती है अर्थात् केवल निरोध-संस्कारोंका ही प्रवाह चलता रहता है। यह निरुद्ध चित्तका अवस्था-परिणाम है ॥ १० ॥

सम्बन्ध- अब सम्प्रज्ञात-समाधिमें चित्तका जैसा परिणाम होता है, उसका वर्णन करते हैं

सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥११॥

व्याख्या- निरोध-समाधिके पहले जब योगीका सम्प्रज्ञात योग सिद्ध होता है, उस समय चित्तकी विक्षिप्तावस्थाका क्षय होकर एकाग्र-अवस्थाका उदय हो जाता है। निर्वितर्क और निर्विचार सम्प्रज्ञात-समाधिमें केवल ध्येयमात्रका ही ज्ञान रहता है, चित्तके निज स्वरूपतकका भान नहीं रहता
वह अपने कारणमें विलीन नहीं हो जाता, तबतक उसमें परिणामी होना अनिवार्य है। इसलिये निरोध-परिणाम किस प्रकार होता है, यह जाननेकी इच्छा स्वाभाविक हो जाती है। (योग० १।४३); वह चित्तका विक्षिप्तावस्थासे एकाग्र-अवस्थामें परिणत हो जानारूप समाधि-परिणाम है ॥ ११ ॥

सम्बन्ध- उसके बादकी स्थितिका वर्णन करते हैं।

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ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रता परिणामः ॥ १२ ॥

व्याख्या- जब चित्त विक्षिप्त-अवस्थासे एकाग्र-अवस्थामें प्रवेश करता है, उस समय चित्तका जो परिणाम होता है उसका नाम समाधि-परिणाम है। जब चित्त भलीभाँति समाहित हो चुकता है, उसके बाद जो चित्तमें परिणाम होता रहता है, उसे एकाग्रता-परिणाम कहते हैं। उसमें शान्त होनेवाली वृत्ति
और उदय होनेवाली वृत्ति एक-सी ही होती है।

महाभारत तथा ज्योतिष विज्ञान

पहले कहे हुए समाधि-परिणाममें तो शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली वृत्तिमें भेद होता है, किन्तु इसमें शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली वृत्तिमें भेद नहीं होता, यही समाधि-परिणाममें और एकाग्रता-परिणाममें अन्तर है । सम्प्रज्ञात-समाधिकी प्रथम अवस्थामें समाधि परिणाम होता है और उसकी परिपक्व-अवस्थामें एकाग्रता-परिणाम होता है। इस एकाग्रता-परिणामके समय होनेवाली स्थितिको ही पहले पादमें निर्विचार-समाधिकी निर्मलताके नामसे कहा है (योग० १।४७) ॥ १२ ॥

सम्बन्ध- उपर्युक्त परिणामोंके नाम बतलाते हुए उनके उदाहरणसे अन्य समस्त वस्तुओंमें होनेवाले परिणामोंकी व्याख्या करते हैं

एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥ १३ ॥

व्याख्या- पहले नवें और दसवें सूत्रमें तो निरोध-समाधिके समय होनेवाले चित्तके धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणामका वर्णन किया गया है तथा ग्यारहवें और बारहवें सूत्रमें सम्प्रज्ञात-समाधिके समय होनेवाले चित्तके धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था परिणामका वर्णन किया गया है। इसी तरह संसारकी समस्त वस्तुओंमें ये परिणाम बराबर होते रहते हैं, क्योंकि तीनों ही गुण परिणामी हैं, अतः उनके कार्योंमें परिवर्तन होते रहना अनिवार्य है। इसलिये इस सूत्रमें यह बात कही गयी है कि ऊपरके वर्णनसे ही पाँचों भूतोंमें और समस्त इन्द्रियोंमें होनेवाले धर्म, लक्षण और अवस्था-परिणामोंको समझ लेना चाहिये। इनका भेद उदाहरणसहित समझाया जाता है।

यह ध्यानमें रखना चाहिये कि सांख्य और योगके सिद्धान्तमें कोई भी पदार्थ बिना हुए उत्पन्न नहीं होता। जो कुछ वस्तु उत्पन्न होती है, वह उत्पन्न होनेसे पहले भी अपने कारणमें विद्यमान थी और लुप्त होनेके बाद भी विद्यमान है (योग०.४ । १२)।।

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(१) धर्म-परिणाम- जब किसी धर्मीमें एक धर्मका लय होकर दूसरे धर्मका उदय होता है, उसे ‘धर्म-परिणाम’ कहते हैं। जैसे नवें सूत्र में चित्तरूप धर्मीके व्युत्थानसंस्काररूप धर्मका दब जाना और निरोधसंस्काररूप धर्मका प्रकट होना बतलाया गया है । यही धर्मों में विद्यमान रहनेवाले चित्तरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है। इसी प्रकार ग्यारहवें सूत्रमें जो सर्वार्थतारूप धर्मका क्षय और एकाग्रतारूप धर्मका उदय बतलाया गया है, यह भी चित्तरूप धर्मीका धर्म परिणाम है। इसी तरह मिट्टीमें पिण्डरूप धर्मका क्षय और घटरूप धर्मका उदय होना, फिर घटरूप धर्मका क्षय और ठीकरी. (फूटे हुए घटके टुकड़े) रूप धर्मका उदय होना-सब प्रकारके धर्मों में विद्यमान रहनेवाले मिट्टीरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है। इसी तरह अन्य समस्त वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये।

(२) लक्षण-परिणाम- यह परिणाम भी धर्म-परिणामके साथ-साथ हो जाता है। यह लक्षण-परिणाम धर्ममें होता है (योग० ४ । १२) । वर्तमान धर्मका लुप्त हो जाना उसका अतीत लक्षण-परिणाम है, अनागत धर्मका प्रकट होना उसका वर्तमान लक्षण-परिणाम है और प्रकट होनेसे पहले वह अनागत लक्षणवाला रहता है। इन तीनोंको धर्मका ‘लक्षण-परिणाम’ कहते हैं। ग्यारहवें सूत्रमें जो चित्तके सर्वार्थता-धर्मका क्षय होना बतलाया गया है, वह उसका अतीत लक्षण-परिणाम है और जो एकाग्रतारूप धर्मका उदय होना बतलाया है, वह उसका वर्तमान लक्षण-परिणाम है। उदय होनेसे पहले वह अनागत लक्षण-परिणाममें था। इसी प्रकार दूसरी वस्तुओंके परिणामोंके विषयमें भी समझ लेना चाहिये।

(३) अवस्था-परिणाम- जो वर्तमान लक्षणयुक्त धर्ममें नयापनसे पुरानापन आता-जाता हैं, वह प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है और वर्तमान लक्षणको छोड़कर अतीत लक्षणमें चला जाता है, यह लक्षणका ‘अवस्था परिणाम’ है। एकादश सूत्रके वर्णनानुसार जब चित्तरूप धर्मीका वर्तमान । लक्षणवाला सर्वार्थतारूप धर्म दबकर अतीत लक्षणको प्राप्त होता है, उस । वर्तमान कालमें जो उसके दबनेका क्रम है वह उसका अवस्था-परिणाम है
और जो एकाग्रतारूप धर्म अनागत लक्षणसे वर्तमान लक्षणमें आता है तब उसका जो उदय होनेका क्रम हैं, वह भी अवस्था-परिणाम है। दसवें सूत्रमें निरुद्ध चित्तके अवस्था-परिणामका और बारहवेंमें एकाग्रचित्तके अवस्था परिणामका वर्णन है। इस प्रकार यह एक अवस्थाको छोड़कर दूसरी अवस्थामें परिवर्तन होते जाना ही अवस्था-परिणाम है । यह अवस्था परिणाम

प्रतिक्षण होता रहता है। कोई भी त्रिगुणमय वस्तु क्षणभर भी एक अवस्थामें नहीं रहती। यही बात दसवें और बारहवें सूत्रोंमें निरोधधर्मके और एकाग्रधर्मके वर्तमान लक्षण-परिणाममें एक प्रकारके संस्कार और वृत्तियोंका क्षय और उदय बतलाकर दिखलायी गयी है। हम बालकसे जवान और जवानसें बूढ़े किसी एक दिनमें या एक घड़ीमें नहीं हुए, हमारा यह अवस्था परिणाम अर्थात् अवस्थाका परिवर्तन प्रतिक्षणमें होता हुआ ही यहाँतक पहुँचा है। इसीको अवस्था-परिणाम कहते हैं। यह परिणाम विचारद्वारा समझमें आता है, सहसा प्रतीत नहीं होता। आगे कहेंगे भी कि क्रमका ज्ञान परिणामके अवसानमें होता है (योग० ४।३३)।

धर्मपरिणाममें तो धर्मीके धर्मका परिवर्तन होता है, लक्षण-परिणाममें पहले धर्मका अतीत हो जाना और नये धर्मका वर्तमान हो जाना—इस प्रकार धर्मका लक्षण बदलता है और अवस्था-परिणाममें धर्मके वर्तमान लक्षणसे युक्त रहते हुए ही उसकी अवस्था बदलती रहती है। पहले परिणामकी अपेक्षा दूसरा सूक्ष्म है और दूसरेकी अपेक्षा तीसरा सूक्ष्म है ॥ १३॥

सम्बन्ध- धर्म और धर्मीका विवेचन करनेके लिये धर्मीका स्वरूप बतलाते हैं

शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥ १४ ॥

व्याख्या- द्रव्यमें सदा विद्यमान रहनेवाली अनेकों शक्तियोंका नाम धर्म है और उसके आधारभूत द्रव्यका नाम धर्मी है । भाव यह है कि जिस कारणरूप पदार्थसे जो कुछ बन चुका है, जो बना हुआ है और जो बन सकता है; वे सब उसके धर्म हैं, वे एक धर्मीमें अनेक रहते हैं तथा अपने-अपने निमित्तोंके मिलनेपर प्रकट और शान्त होते रहते हैं। उनके तीन भेद इस प्रकार हैं

(१) अव्यपदेश्य- जो धर्म धर्मीमें शक्तिरूपसे विद्यमान रहते हैं, व्यवहारमें आने लायक न होनेके कारण जिनका निर्देश नहीं किया जा सकता, वे ‘अव्यपदेश्य’ कहलाते हैं। इन्हींको अनागत या आनेवाले भी कहते हैं। जैसे जलमें बर्फ और मिट्टीमें बर्तन अपना व्यापार करनेके लिये प्रकट होनेसे पहले शक्तिरूपमें छिपे रहते हैं।

(२) उदित— जो धर्म पहले शक्तिरूपसे धर्मीमें छिपे हुए थे, वे जब अपना कार्य करनेके लिये प्रकट हो जाते हैं, तब ‘उदित’ कहलाते हैं। इन्हींको ‘वर्तमान’ भी कहते हैं। जैसे जलमें शक्तिरूपसे विद्यमान बर्फका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना, मिट्टीमें शक्तिरूपसे विद्यमान बर्तनोंका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना।

(३) जो धर्म अपना व्यापार पूरा करके धर्मीमें विलीन हो जाते हैं, वे ‘शान्त’ कहलाते हैं, इन्हींको ‘अतीत’ भी कहते हैं। जैसे बर्फका गलकर जलमें विलीन हो जाना और घड़ेका फूटकर मिट्टीमें विलीन हो जाना। म धर्मोकी शान्त, उदित और अव्यपदेश्य-इन तीनों स्थितियोंमें ही धर्मी सदा ही अनुगत रहता है। किसी कालमें धर्मीके बिना धर्म नहीं रहते ॥ १४ ॥

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सम्बन्ध- एक ही धर्मीके भिन्न-भिन्न अनेक धर्म-परिणाम कैसे होते हैं, यह बतलाते हैं

क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥ १५ ॥

व्याख्या- एक ही द्रव्यका किसी एक क्रमसे जो परिणाम होता है, दूसरे क्रमसे उससे भिन्न दूसरा ही परिणाम होता है। अन्य प्रकारके क्रमसे तीसरा ही परिणाम होता है। जैसे हमें रूईस वस्त्र बनाना है तो पहले रूईको धुनकर उसकी पूनी बनाकर चरखेपर कातकर उसका सूत बनाना पड़ेगा, फिर उस सूतका लम्बा ताना करेंगे, फिर उसे तानेमेंसे पार करके रोलपर चढ़ायेंगे, फिर ‘वै’ मेंसे पार करके उसके आधे तन्तुओंको ऊपर उठायेंगे, आधोंको नीचे ले जायँगे और बीचमें भरनीका सूत फेंककर उस धागेको यथास्थान बैठायेंगे, फिर ऊपरवाले धागोंको नीचे लायेंगे और नीचेवालोंको ऊपर ले जायँगे, इस तरह क्रमसे करते रहनेपर अन्तमें वस्त्ररूपमें रूईका परिणाम होगा।

पर यदि हमें उसी रूईसे दीपककी बत्ती बनानी है तो उसे कुछ फैलाकर थोड़ा बट दे देनेसे तुरंत बन जायगी और यदि कुएँ मेंसे जल निकालनेकी रस्सी बनानी है तो पहले सूत बनाकर उन धागोंको तीन या चार भागोंमें लम्बा करके बट लगानेसे रस्सी बन जायगी। इनमें भी जैसा वस्त्र या जैसी बत्ती या जिस प्रकारकी रस्सी बनानी है वैसे ही उनमें क्रमका भेद करना पड़ेगा। इसी तरह दूसरी वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये।

इससे यह सिद्ध हो गया कि क्रममें परिवर्तन करनेसे एक ही धर्मी भिन्न-भिन्न नाम-रूपवाले धर्मीसे युक्त हो जाता है, उसके परिणामकी भिन्नताका कारण क्रमकी भिन्नता ही है, दूसरा कुछ नहीं। क्रमकी भिन्नता सहकारी कारणोंके सम्बन्धसे होती है। जैसे ठंडके सम्बन्धसे जलमें बर्फरूप धर्मके प्रकट होनेका क्रम चलता और गर्मीके संयोगसे स्टीम (भाप) बननेका क्रम आरम्भ हो जाता है ॥ १५॥ बार

सम्बन्ध- उक्त संयम किस ध्येय-वस्तुमें सिद्ध कर लेनेपर उससे क्या फल मिलता है, इसका वर्णन यहाँसे इस पादकी समाप्तिपर्यन्त किया गया है। इनको ही योगकी विभूति अर्थात् भिन्न-भिन्न प्रकारका महत्त्व कहते हैं।
ऊपर तीन प्रकारके परिणामोंका वर्णन किया गया, अतः पहले इनमें संयम करनेका फल बतलाते हैं

परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ॥ १६ ॥

व्याख्या- धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणाम इस प्रकार जिन तीन परिणामोंका पहले वर्णन किया गया है, उन तीनों परिणामोंमें संयम अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि कर लेनेसे योगीको उनका साक्षात्कार होकर भूत और भविष्यका ज्ञान हो जाता है। अभिप्राय यह है कि जिस वर्तमान वस्तुके विषयमें योगी यह जानना चाहे कि इसका मूल कारण क्या है और यह किस ढंगसे बदलती हुई कितने कालमें वर्तमान रूपमें आयी है और भविष्यमें किस प्रकार बदलती हुई कितने कालमें किस प्रकार अपने कारणमें विलीन होगी? तो ये सब बातें उक्त तीनों परिणामोंमें संयम करनेसे जान सकता है ॥ १६॥

yog darshan vibhutipaad 1-18

सम्बन्ध- इसी प्रकार अब दूसरी विभूतियोंका वर्णन करते हैं

शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभाग संयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥ १७॥

व्याख्या- वस्तुके नाम, रूप और ज्ञान-यह तीनों यद्यपि परस्पर भिन्न हैं, जैसे घट यह शब्द मिट्टीसे बने हुए जिस पदार्थका संकेत करता है, उस पदार्थसे सर्वथा भिन्न वस्तु है। इसी प्रकार उस घटरूप पदार्थकी जो प्रतीति होती है, वह चित्तकी वृत्तिविशेष है। अतः वह भी घटरूप पदार्थसे सर्वथा भिन्न वस्तु है, क्योंकि शब्द वाणीका धर्म है, घटरूप पदार्थ मिट्टीका धर्म है और वृत्ति चित्तका धर्म है तथापि तीनोंका परस्पर अभ्यासके कारण मिश्रण हुआ रहता है। अतः जब योगी विचारद्वारा इनके विभागको समझकर उस विभागमें संयम कर लेता है, तब उसको समस्त प्राणियोंकी वाणीके अर्थका ज्ञान हो जाता है ॥ १७॥

संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् ॥ १८॥

व्याख्या- प्राणी जो कुछ कर्म करता है एवं अपने इन्द्रियों और मन-बुद्धिद्वारा जो कुछ अनुभव करता है, वे सब उसके अन्तःकरणमें संस्काररूपमें संचित रहते हैं। उक्त संस्कार दो प्रकारके होते हैं-एक वासनारूप, जो कि स्मृतिके कारण हैं. दूसरे धर्माधर्मरूप जो कि जाति, आयु
और भोगके कारण हैं, ये दोनों ही प्रकारके संस्कार अनेक जन्म-जन्मान्तरोंसे संगृहीत होते आ रहे हैं (योग० २ । १२, ४।८ से ११)। उन संस्कारोंमें संयम करके उनको प्रत्यक्ष कर लेनेसे योगीको पूर्वजन्मका ज्ञान हो जाता है। जैसे अपने पूर्व संस्कारोंके साक्षात्कारसे अपने पूर्वजन्मका ज्ञान होता है,
उसी प्रकार दूसरेके संस्कारोंमें संयम करनेसे उसके पूर्वजन्मका भी ज्ञान हो सकता है ॥ १८॥

yog darshan vibhutipaad 1-18

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

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yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥ ३६॥

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

वाल्मीकीय रामायणवनकाण्डमें अगस्त्याश्रमके वर्णनमें आता है
यदाप्रभृति चाक्रान्ता दिगियं पुण्यकर्मणा। तदाप्रभृति निर्वैराः – प्रशान्ता रजनीचराः॥ अयं दीर्घायुषस्तस्य लोके विश्रुतकर्मणः।
अगस्त्यस्याश्रमः श्रीमान् विनीतमृगसेवितः ॥ नात्र जीवन्मृषावादी क्रूरो वा यदि वा शठः। नृशंसः पापवृत्तो वा मुनिरेष तथाविधः ।।
(सर्ग ११ । ८३, ८६, ९०) तुलसीकृत रामायणके अयोध्याकाण्डमें भी आया है खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।
(वाल्मीकि-आश्रमवर्णन) तथा बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा ॥ (चित्रकूटवर्णन) सत्यप्रतिष्ठायाम्-सत्यकी दृढ़स्थिति हो जानेपर (योगीमें); क्रिया फलाश्रयत्वम्-क्रियाफलके आश्रयका भाव (आ जाता है)।

व्याख्या- जब योगी सत्यका पालन करनेमें पूर्णतया परिपक्व हो जाता है, उसमें किसी प्रकारकी कमी नहीं रहती, उस समय वह योग कर्तव्यपालन रूप क्रियाओंके फलका आश्रय बन जाता है। जो कर्म किसीने नहीं किया है, उसका भी फल उसे प्रदान कर देनेकी शक्ति उस योगीमें आ जाती है, अर्थात् जिसको जो वरदान, शाप या आशीर्वाद देता है, वह सत्य हो जाता है ॥ ३६॥

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥३७॥

व्याख्या- जब साधकमें चोरीका अभाव पूर्णतया प्रतिष्ठित हो जाता है, तब पृथ्वीमें जहाँ कहीं भी गुप्त स्थानमें पड़े हुए समस्त रत्न उसके सामने
प्रकट हो जाते हैं अर्थात् उसकी जानकारीमें आ जाते हैं ॥३७॥

ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥३८॥

व्याख्या- जब साधकमें ब्रह्मचर्यकी पूर्णतया दृढ़ स्थिति हो जाती है, तब उसके मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरमें अपूर्व शक्तिका प्रादुर्भाव हो जाता है, साधारण मनुष्य किसी काममें भी उसकी बराबरी
नहीं कर सकते ॥ ३८॥

अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः ॥ ३९॥

व्याख्या- जब योगीमें अपरिग्रहका भाव पूर्णतया स्थिर हो जाता है, तब उसे अपने पूर्वजन्मोंकी और वर्तमान जन्मकी सब बातें मालूम हो जाती हैं अर्थात् मैं पहले किस योनिमें हुआ था, मैंने उस समय क्या-क्या काम किये, किस प्रकार रहा ये सब स्मरण हो जाते हैं और इस जन्मकी भी बीती हुई सब बातें स्मरण हो जाती हैं। यह ज्ञान भी संसारमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाला और जन्म-मरणसे छुटकारा पानेके लिये योगसाधनमें प्रवृत्त करनेवाला है। जीत
यहाँतक यमोंकी सिद्धिका जो फल बतलाया गया है, उसके सिवा निष्कामभावसे यमोंका सेवन करनेसे कैवल्यकी प्राप्तिमें भी सहायता मिलती
है ॥ ३९॥

सम्बन्ध- अब नियमोंके पालनका फल बतलाते हैं; परंतु इन सूत्रोंमें पूर्णप्रतिष्ठाकी शर्त नहीं रखी गयी है। इससे यह मालूम होता है कि साधक इनका जितना पालन करता है, उतना ही उसे लाभ मिलता चला जाता है। सबसे पहले अगले सूत्रमें बाह्य शौचका फल बतलाते हैं

शौचात्स्वाङजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

व्याख्या- बाह्य शुद्धिके पालनसे साधककी अपने शरीरमें अपवित्र बद्धि होकर उसमें वैराग्य हो जाता है अर्थात् उसमें आसक्ति नहीं रहती और दूसरे सांसारिक मनुष्योंके साथ संसर्ग करनेकी इच्छा नहीं रहती अर्थात उनके सङ्गमें भी प्रवृत्ति या आसक्ति नहीं रहती ॥ ४० ॥

सम्बन्ध- भीतरकी शुद्धिका फल बतलाते हैं

सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ॥४१॥

व्याख्या- मैत्री आदिकी भावनाके द्वारा अथवा जप, तप आदि अन्य किसी साधनद्वारा आन्तरिक शौचके लिये अभ्यास करनेसे. राग-द्वेष, ईर्ष्या आदि मलोंका अभाव होकर मनुष्यका अन्तःकरण निर्मल और स्वच्छ हो जाता है। मनकी व्याकुलताका नाश होकर उसमें सदैव प्रसन्नता बनी रहती है; विक्षेप-दोषका नाश होकर एकाग्रता आ जाती है और सब इन्द्रियाँ मनके वशमें हो जाती हैं, अतः उसमें आत्मदर्शनकी योग्यता आ जाती है।
इस प्रकार इसके ऊपरवाले सूत्रमें तो बाह्य शौचका फल बतलाया गया है और इसमें भीतरकी शुद्धिका फल बतलाया गया है ॥४१॥

संतोषादनुत्तमसुखलाभः ॥४२॥

व्याख्या- संतोषसे अर्थात् चाहरहित होनेपर जो अनन्त सुख मिलता है, उसकी बराबरी दूसरा कोई सांसारिक सुख नहीं कर सकता। वह ही ‘ सर्वोत्तम सुख है ॥ ४२ ॥

कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥४३॥
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व्याख्या- स्वधर्म-पालनके लिये व्रत-उपवास आदि करने या अन्य सब प्रकारके कष्ट सहन करनेका नाम ‘तप’ है (योग० २।१ की टीका) । इसके अभ्याससे शरीर और इन्द्रियोंके मलका नाश हो जाता है, तब योगीका शरीर स्वस्थ, स्वच्छ और हलका हो जाता है तथा तीसरे पादके पैंतालीसवें और छियालीसवें सूत्रमें बतलायी हुई काय-सम्पद्प शरीर-सम्बन्धी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं एवं सूक्ष्म, दूर देशमें और व्यवधानयुक्त स्थानमें स्थित विषयोंको देखना, सुनना आदि इन्द्रियसम्बन्धी सिद्धि भी प्राप्त हो जाती है ॥४३॥

स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥४४॥

व्याख्या- शास्त्राभ्यास, मन्त्रजप और अपने जीवनका अध्ययनरूप स्वाध्यायके प्रभावसे योगी जिस इष्टदेवका दर्शन करना चाहता है, उसीका दर्शन हो जाता है ।। ४४ ॥

समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥ ४५ ॥

महाभारत तथा पर्यावरण विज्ञान

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

व्याख्या- ईश्वरकी शरणागतिसे योगसाधनमें आनेवाले विघ्नोंका नाश होकर शीघ्र ही समाधि निष्पन्न हो जाती है (योग० १ । २३), क्योंकि ईश्वरपर निर्भर रहनेवाला साधक तो केवल तत्परतासे साधन करता रहता है, उसे साधनके परिणामकी चिन्ता नहीं रहती। उसके साधनमें आनेवाले विघ्नोंको दूर करनेका और साधनकी सिद्धिका भार ईश्वरके जिम्मे पड़ जाता है, अतः साधनका अनायास और शीघ्र पूर्ण होना स्वाभाविक ही है ॥ ४५ ॥

सम्बन्ध- यहाँतक यम और नियमोंका फलसहित वर्णन किया गया; अब आसनके लक्षण, उपाय और उसका फल क्रमसे बतलाते हैं

स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥

व्याख्या- हठयोगमें आसनोंके बहुत भेद बतलाये गये हैं, परंतु यहाँ सूत्रकारने उनका वर्णन नहीं करके बैठनेका तरीका साधककी इच्छापर ही छोड़ दिया है। भाव यह है कि जो साधक अपनी योग्यताके अनुसार जिस रीतिसे बिना हिले-डुले स्थिरभावसे सुखपूर्वक बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके बहुत समयतक बैठ सके वही आसन उसके लिये उपयुक्त है। इसके सिवा,
जिसपर बैठकर साधन किया जाता है, उसका नाम भी आसन है; अतः वह .
भी स्थिर और सुखपूर्वक बैठनेलायक होना चाहिये ॥ ४६॥

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

व्याख्या- शरीरको सीधा और स्थिर करके सुखपूर्वक बैठ जानेके बाद शरीर-सम्बन्धी सब प्रकारकी चेष्टाओंका त्याग कर देना ही प्रयत्नकी शिथिलता . है, इससे और परमात्मामें मन लगानेसे-इन दो उपायोंसे आसनकी सिद्धि होती है।

यहाँ बहुत-से टीकाकारोंने अनन्तका अर्थ शेषनाग और समापत्तिका अर्थ समाधि किया है। भोजराजने अनन्तका अर्थ आकाशादि किया है और समापत्तिका अर्थ चित्तका तद्रूप हो जाना किया है; किंतु योगके अङ्गोंमें समाधि अन्तिम अङ्ग है, उसीके लिये आसन आदि अङ्गोंका अनुष्ठान है।
आसनको समाधिका बहिरंग साधन भी बतलाया गया है। अतः किसी प्रकारकी भी समाधिको आसनकी स्थिरताका उपाय बतलाना युक्तिसंगत नहीं होता। सज्जन विद्वान् अनुभवी महानुभाव इसपर विचार करें ॥४७॥

ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥

व्याख्या- आसन-सिद्धि हो जानेसे शरीरपर सर्दी, गर्मी आदि द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता, शरीरमें उन सबको बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके सहन करनेकी शक्ति आ जाती है। अतः वे द्वन्द्व चित्तको चञ्चल बनाकर साधनमें विघ्न नहीं डाल सकते ॥४८॥

सम्बन्ध- अब प्राणायामका सामान्य लक्षण बतलाते हैं

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥

व्याख्या- प्राणवायुका शरीरमें प्रविष्ट होना श्वास है और बाहर निकलना प्रश्वास है। इन दोनोंकी गतिका रुक जाना अर्थात् प्राणवायुकी गमनागमनरूप क्रियाका बंद हो जाना ही प्राणायामका सामान्य लक्षण है।
यहाँ आसनकी सिद्धिके बाद प्राणायामका सम्पन्न होना बतलाया है। इसमें यह प्रतीत होता है कि आसनकी स्थिरताका अभ्यास किये बिना ही जो प्राणायाम करते हैं, वे गलत रास्तेंपर हैं। प्राणायामका अभ्यास करते समय
आसनकी स्थिरता परम आवश्यक है ॥४९॥

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सम्बन्ध- उक्त प्राणायामके भेदोंको समझानेके लिये तीन प्रकारके प्राणायामोंका वर्णन करते हैं

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥५०॥

व्याख्या- अगले सूत्रमें जिस प्राणायामके लक्षण किये गये हैं उसे
चौथा प्राणायाम बतलाया है। इससे यह सिद्ध होता है कि इस सूत्रमें तीन प्रकारके प्राणायामोंका वर्णन है और उन तीनों प्रकारके ही प्राणायामोंको साधक देश, काल और संख्याद्वारा देखता रहता है कि वे किस अवस्थातक पहुँच चुके हैं। इस प्रकार परीक्षा करते-करते वे प्राणायाम जैसे-जैसे उन्नत होते जाते हैं वैसे-ही-वैसे उनमें लम्बाई और हलकापन बढ़ता चला जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्तम्भवृत्तिरूप तृतीय प्राणायाममें भी देशका सम्बन्ध रहता है, अन्यथा वह देश, काल और संख्याद्वारा परिदृष्ट कैसे होगा? प्राणायामके तीन भेदोंको इस प्रकार समझना चाहिये।

(१) बाह्यवृत्ति- प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालकर बाहर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रहना और साथ-ही-साथ इस बातकी भी परीक्षा करते रहना कि वह बाहर आकर कहाँ ठहरा है, कितने समयतक ठहरा है और उतने समयमें स्वाभाविक प्राणकी गतिकी कितनी संख्या होती है। यह ‘बाह्यवृत्ति’ प्राणायाम है, इसे रेचक’ भी कहते हैं; क्योंकि इसमें रेचनपूर्वक प्राणको रोका जाता है । अभ्यास करते-करते यह दीर्घ (लम्बा) अर्थात् बहुत कालतक रुके रहनेवाला और सूक्ष्म अर्थात् हलका अनायास साध्य हो,जाता है।

(२) आभ्यन्तरवृत्ति- प्राणवायुको भीतर ले जाकर भीतर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रहना और साथ-ही-साथ यह देखते रहना कि आभ्यन्तर देशमें कहाँतक जाकर प्राण रुकता है; वहाँ कितने कालतक सुखपूर्वक ठहरता है और उतने समयमें प्राणकी स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है। यह ! आभ्यन्तर’ प्राणायाम है; इसे ‘पूरक’ प्राणायाम भी कहते हैं; क्योंकि इसमें शरीरके अंदर ले जाकर प्राणको रोका जाता है। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता जाता है।

(३) स्तम्भवृत्ति- शरीरके भीतर जाने और बाहर निकलनेवाली जो प्राणोंकी स्वाभाविक गति है, उसे प्रयत्नपूर्वक बाहर या भीतर निकलने या ले
जानेका अभ्यास न करके प्राणवायु स्वभावसे बाहर निकला हो या भीतर गया हो, जहाँ हो, वहीं उसकी गतिको स्तम्भित कर देना (रोक देना) और यह देखते रहना कि प्राण किस देशमें रुके हैं, कितने समयतक सुखपूर्वक रुके रहते हैं, इस समयमें स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है, यह ‘स्तम्भवृत्ति’ . प्राणायाम है; इसे ‘कुम्भक’ प्राणायाम भी कहते हैं। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता है। कोई-कोई टीकाकार इसे केवल ‘कुम्भक’ कहते हैं और कोई-कोई चौथे प्राणायामको केवल कुम्भक कहते हैं । इस तीसरे और अगले सूत्रमें बतलाये हुए चौथे प्राणायामके भेदका निर्णय करनेमें बहुत मतभेद है।
– साधक किसी भी प्राणायामका अभ्यास करें, उसके साथ मन्त्र अवश्य रहना चाहिये ॥ ५० ॥

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सम्बन्ध- चौथे प्राणायामका वर्णन करते हैं

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥ ५१ ॥

व्याख्या- बाहर और भीतरके विषयोंके चिन्तनका त्याग कर देनेसे अर्थात इस समय प्राण बाहर निकल रहे हैं या भीतर जा रहे हैं अथवा चल रहे हैं कि ठहरे हुए हैं, इस जानकारीका त्याग करके मनको इष्टचिन्तनमें लगा देनेसे देश, काल और संख्याके ज्ञानके बिना ही अपने-आप जो प्राणोंकी गति जिस-किसी देशमें रुक जाती है; वह चौथा प्राणायाम है । यह पहले बतलाये हुए तीन प्रकारके प्राणायामोंसे सर्वथा भिन्न है, यह बात दिखलानेके लिये

सूत्रमें ‘चतुर्थः’ पदका प्रयोग किया गया है। कि
यह अनायास होनेवाला राजयोगका प्राणायाम है। इसमें मनकी चञ्चलता शान्त होनेके कारण अपने-आप प्राणोंकी गति रुकती है और पहले बतलाये हुए प्राणायामोंमें प्रयत्नद्वारा प्राणोंकी गतिको रोकनेका अभ्यास करते करते प्राणोंकी गतिका निरोध होता है, यही इसकी विशेषता है ॥ ५१ ॥

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥ ५२ ॥

व्याख्या- जैसे-जैसे मनुष्य प्राणायामका अभ्यास करता है, वैसे-ही वैसे उसके संचित कर्म-संस्कार और अविद्यादि क्लेश दुर्बल होते चले जाते हैं। ये कर्म, संस्कार और अविद्यादि क्लेश ही ज्ञानका आवरण (परदा) है। इस परदेके कारण ही मनुष्यका ज्ञान ढका रहता है, अतः वह मोहित हुआ रहता है। जब यह परदा दुर्बल होते-होते सर्वथा क्षीण हो जाता है, तब साधकका ज्ञान सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो जाता है (गीता ५। १६)। इसलिये साधकको प्राणायामका अभ्यास अवश्य करना चाहिये ।। ५२ ॥

सम्बन्ध- प्राणायामका दूसरा फल बतलाते हैं

धारणासु च योग्यता मनसः ॥ ५३॥

व्याख्या- प्राणायामके अभ्याससे मनमें धारणाकी योग्यता भी आ जाती है, यानी उसे चाहे जिस जगह अनायास ही स्थिर किया जा सकता है ।। ५३॥

सम्बन्ध-अब प्रत्याहारके लक्षण बतलाते हैं

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां
प्रत्याहारः ॥ ५४॥

व्याख्या- उक्त प्रकारसे प्राणायामका अभ्यास करते-करते मन और इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाते हैं, उसके बाद इन्द्रियोंकी बाह्यवृत्तिको सब ओरसे समेटकर मनमें विलीन करनेके अभ्यासका नाम ‘प्रत्याहार’ है। जब साधनकालमें साधक इन्द्रियोंके विषयोंका त्याग करके चित्तको अपने ध्येयमें लगाता है, उस समय जो इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर न जाकर चित्तमें विलीन-सा हो जाना है, यह प्रत्याहार सिद्ध होनेकी पहचान है। यदि उस समय भी इन्द्रियाँ पहलेके अभ्याससे इसके सामने बाह्य विषयोंका चित्र उपस्थित करती रहें तो समझना चाहिये कि प्रत्याहार नहीं हुआ। उपनिषदोंमें भी ‘वाक्’ शब्दसे उपलक्षित इन्द्रियोंको मनमें निरुद्ध करनेकी बात कहकर यही भाव दिखलाया है॥ ५४॥

सम्बन्ध- अब प्रत्याहारका फल बतलाकर इस द्वितीय पादकी समाप्ति करते हैं

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥ ५५ ॥

व्याख्या- प्रत्याहार सिद्ध हो जानेपर योगीकी इन्द्रियाँ उसके सर्वथा वशमें हो जाती हैं, उनकी स्वतन्त्रताका सर्वथा अभाव हो जाता है। प्रत्याहारकी सिद्धि हो जानेके बाद इन्द्रिय-विजयके लिये अन्य साधनकी आवश्यकता नहीं रहती ॥ ५५ ॥

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः। (कठ० १।३।१३) . ‘बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह वाक आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनमें विलीन कर दे अर्थात् इनकी ऐसी स्थिति कर दे कि इनकी कोई भी क्रिया न हो मनमें विषयोंकी स्फुरणा न रहे।

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

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yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध-उक्त दृश्यके भेदोंका वर्णन अपने ग्रन्थकी परिभाषामें करते हैं

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥ १९॥

व्याख्या- (१) विशेष-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश-ये पाँच स्थूल भूत तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मनः—इस प्रकार सब मिलकर सोलहोंका नाम ‘विशेष’ है। गुणोंके विशेष धर्मोकी अभिव्यक्ति (प्रकटता) इन्हींसे होती है, इसलिये इनको विशेष कहते हैं। सांख्यकारिकामें इनका नाम विकार रखा है (सां. का० ३).

(२) अविशेष-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-ये पाँच तन्मात्राएँ हैं, इन्हींको सूक्ष्म महाभूत भी कहते हैं, क्योंकि ये स्थूल पञ्च महाभूतोंके कारण हैं तथा छठा अहंकार जो कि मन और इन्द्रियोंका कारण है, इन छहोंका नाम ‘अविशेष’ है। इनका स्वरूप इन्द्रियगोचर नहीं है, इसलिये इनको ‘अविशेष’ कहते हैं।

(३) लिङ्गमात्र- उपर्युक्त बाईस तत्त्वोंका कारणभूत जो महत्तत्त्व है, जिसका वर्णन उपनिषदोंमें और गीतामें बुद्धिके नामसे किया गया है, (कठ० १।३ । १०; गीता १३ । ५) उसका नाम ‘लिङ्गमात्र’ है। इसकी उपलब्धि केवल सत्तामात्रसे ही होती है, इस कारण इसको ‘लिङ्गमात्र’ कहते हैं। ..

(४) अलिङ्ग- मूल प्रकृति, (सां० का?). जो, कि तीनों गुणोंकी साम्यावस्था मानी गयी है, महत्तत्त्व जिसका पहला परिणाम (कार्य) है, उपनिषद्
और गीतामें जिसका वर्णन अव्यक्त नामसे किया गया है (कठ० १।३ । ११; गीता १३ । ५) उसका नाम ‘अलिङ्ग’ है । साम्यावस्थाको प्राप्त गुणोंके स्वरूपकी अभिव्यक्ति नहीं होती, इसलिये प्रकृतिको चिह्नरहित (अव्यक्त) कहते हैं।

इस प्रकार चार अवस्थाओंमें विद्यमान रहनेवाले ये सत्त्वादि गुण ही दृश्य नामसे कहे गये हैं ॥ १९ ॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध-अब द्रष्टाके स्वरूपका वर्णन करते हैं

द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥२०॥

व्याख्या- केवल चेतनमात्र ही जिसका स्वरूप है, ऐसा आत्मतत्त्व स्वरूपसे सर्वथा शुद्ध, निर्विकार है तो भी बुद्धिके सम्बन्धसे बुद्धिवृत्तिके अनुरूप देखनेवाला होनेसे ‘द्रष्टा’ कहलाता है।

वास्तवमें द्रष्टा पुरुष (आत्मतत्त्व) सर्वथा शुद्ध, निर्विकार, कूटस्थ, असङ्ग है तथापि इसका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ अनादिसिद्ध अविद्यासे माना जाता है। जबतक उस अविद्याके नाशद्वारा यह प्रकृतिसे अलग होकर अपने असली स्वरूपमें स्थित नहीं हो जाता तबतक बुद्धिके साथ एकताको प्राप्त हुआ-सा बुद्धिकी वृत्तियोंको देखता रहता है और जबतक उनको देखता है, तभीतक इसकी ‘द्रष्टा’ संज्ञा है। दृश्यका सम्बन्ध न रहनेपर द्रष्टा किसका? फिर तो यह केवल चेतनमात्र, सर्वथा शुद्ध और निर्विकार है ही ॥ २० ॥

सम्बन्ध-दृश्य और द्रष्टाके स्वरूपका वर्णन करनेके बाद अब दृश्यके स्वरूपकी सार्थकताका प्रतिपादन करते हैं

तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥ २१॥

व्याख्या- उक्त द्रष्टाको अपने दर्शनद्वारा भोग प्रदान करनेके लिये और द्रष्टाके निज स्वरूपका दर्शन कराकर अपवर्ग (मुक्ति) प्रदान करनेके लिये इस प्रकार पुरुषका प्रयोजन सिद्ध करनेके लिये ही दृश्य है। इसी में उसके होनेकी सार्थकता है। अठारहवें सूत्रमें दृश्यके लक्षणोंका वर्णन करते समय भी यही बात कही गयी है ।। २१ ।

सम्बन्ध-पुरुषको अपवर्ग प्रदान कर देनेके बाद प्रकृतिका कोई कार्य शेष नहीं रहता, फिर उसका बना रहना निरर्थक है; अतः उसका अभाव हो जाना चाहिये इसपर कहते हैं

कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ॥ २२ ॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

व्याख्या- प्रकृतिका प्रयोजन किसी एक ही पुरुषके लिये भोग और अपवर्ग प्रदान करना नहीं है, वह तो सभी पुरुषोंके लिये समान है। अतः जिसका कार्य वह कर चुकी, उस कृतार्थ-मुक्त पुरुषके लिये उसकी आवश्यकता न रहनेके कारण यद्यपि वह उसके लिये नष्ट हो जाती है, तो भी दूसरे सब जीवोंको भोग और अपवर्ग प्रदान करना तो शेष है ही। इसलिये उसका सर्वथा नाश नहीं होता, वह विद्यमान रहती है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि प्रकृति परिणामी होनेपर भी अनादि और नित्य है। यहाँ जो मुक्त पुरुषके लिये उसका नष्ट होना बतलाया गया है, वह भी अदृश्य होना ही .. बतलाया गया है; क्योंकि योगके सिद्धान्तमें किसी भी वस्तुका सर्वथा अभाव नहीं माना गया है ।। २२ ॥

सम्बन्ध-अब संयोगके स्वरूपका वर्णन करते हैं

स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥२३॥

व्याख्या- दृश्यका स्वरूप द्रष्टाके ही लिये है, यह बात पहले कह आये हैं, इसी भावको लेकर इस सूत्रमें पुरुषको प्रकृतिका स्वामी बतलाया है
और प्रकृतिको पुरुषका ‘स्व’ अर्थात् अपना यानी अधिकृत पदार्थ कहा है। उस प्रकृतिके साथ पुरुषका सम्बन्ध उन दोनोंके स्वरूपको जाननेके लिये ही है, अतः उस दर्शन (ज्ञान) शक्तिसे जबतक मनुष्य इस प्रकृतिके नाना रूपोंको देखता रहता है, तबतक तो भोगोंको भोगता रहता है। जब इनके : दर्शनसे विरक्त होकर अपने स्वरूप-दर्शनकी ओर झाँकता है, तब स्वरूपका दर्शन हो जाता. है (योग० ३ । ३५) । फिर संयोगकी कोई आवश्यकता न रहनेसे उसका अभाव हो जाता है । यही पुरुषकी कैवल्य’ अवस्था है (योग०३ । ३४) ॥ २३ ।।

सम्बन्ध-अब उक्त संयोगका कारण बतलाते हैं

तस्य हेतुरविद्या ॥ २४ ॥

व्याख्या- सर्वथा निर्विकार असङ्ग चेतन पुरुषका जो यह जड प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है यह अनादिसिद्ध अविद्यासे ही है, वास्तवमें नहीं है।
यहाँ अविद्या विपर्ययवृत्तिका नाम नहीं है, किंतु अपने स्वरूपके अनादिसिद्ध अज्ञानका नाम अविद्या है। इसीलिये अपने स्वरूपके ज्ञानसे इसका नाश हो जाता है और उसके बाद प्रयोजन न रहनेपर वह ज्ञान भी शान्त हो जाता है। यही पुरुषका ‘कैवल्य’ है ।। २४ ॥

सम्बन्ध-अब कारणसहित संयोगके अभावसे सिद्ध होनेवाले सर्वथा दुःखनाशरूप ‘हान’का वर्णन करते हैं

तदभावात्संयोगाभावो हानं तदृशेः कैवल्यम् ॥ २५ ॥

व्याख्या- जब आत्मदर्शनरूप ज्ञानसे अविद्याका यानी अज्ञानका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब अज्ञानजनित संयोगका भी अपने-आप अभाव हो जाता है, फिर पुरुषका प्रकृतिसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता और उसके जन्म-मरण आदि सम्पूर्ण दुःखोंका सदाके लिये अत्यन्त अभाव हो जाता है तथा पुरुष अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है—यही उसका कैवल्य अर्थात् सर्वथा अकेलापन है ॥२५॥

सम्बन्ध-अब उक्त दुःखोंके अत्यन्त अभावरूप ‘हान’का उपाय बतलाते हैं

विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२६॥
yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

अथ योगानुशासनम्॥१॥

व्याख्या- प्रकृति तथा उसके कार्य-बुद्धि, अहंकार, इन्द्रियाँ और शरीर-इन सबके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेसे तथा आत्मा इनसे सर्वथा भिन्न और असङ्ग है, आत्माका इनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, इस प्रकार पुरुषके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे जो प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका अलग-अलग यथार्थ ज्ञान होता है,

इसीका नाम ‘विवेकज्ञान’ है (योग ३। ५४) । उस समय चित्त विवेकज्ञानमें निमग्न और कैवल्यके अभिमुख रहता है। यह ज्ञान जब समाधिकी निर्मलता-स्वच्छता होनेपर पूर्ण और निश्चल हो जाता है, उसमें किसी प्रकारका भी मल नहीं रहता (योग) ४ । ३१), तब वह अविप्लव विवेकज्ञान कहलाता है। ऐसा विवेकज्ञान ही समस्त दुःखोंके अत्यन्त अभावरूप मुक्तिका उपाय है। इससे संसारके बीज अविद्यादि क्लेशोंका और समस्त कर्मोंका सर्वथा अभाव हो जाता है (योग ४। ३०)।

उसके बाद चित्त अपने आश्रयरूप-महत्तत्त्व आदिके सहित अपने कारणमें विलीन हो जाता है तथा प्रकृतिका जो स्वाभाविक परिणाम-क्रम है, वह उसके लिये बंद हो जाता है
(योग० ४।३२) ॥२६॥

सम्बन्ध-उक्त विवेकज्ञानके समय साधककी बुद्धि किस प्रकारकी होती है, यह बतलाते हैं

तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥ २७॥

व्याख्या- जब निर्मल और अचल विवेकख्यातिके द्वारा योगीके चित्तका आवरण और मल सर्वथा नष्ट हो जाता है (योग० ४।३१) उस समय उस चित्तमें दूसरे सांसारिक ज्ञानोंका उदय नहीं होता। अतः सात प्रकारकी उत्कर्ष अवस्थावाली प्रज्ञा (बुद्धि) उत्पन्न होती है । उनमें पहली चार प्रकारकी तो कार्यविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस कारण वे ‘कार्यविमुक्तिप्रज्ञा’ कहलाती हैं और अन्तकी तीन चित्तविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस कारण उनका नाम ‘चित्तविमुक्तिप्रज्ञा’ है। कार्यविमुक्तिप्रज्ञा यानी कर्तव्यशून्य अवस्थाके चार भेद इस प्रकार हैं

(१) ज्ञेयशून्य अवस्था- जो कुछ जानना था जान लिया; अब कुछ भी जानना शेष नहीं रहा अर्थात् जितना गुणमय दृश्य है (योग० २ । १८, १९), वह सब अनित्य और परिणामी है यह पूर्णतया जान लिया।

(२) हेयशून्य अवस्था- जिसका अभाव करना था, उसका अभाव कर दिया; अर्थात् द्रष्टा और दृश्यके संयोगका, जो कि हेयका हेतु है, अभाव कर दिया, अब कुछ भी अभाव करनेयोग्य शेष नहीं रहा।

(३) प्राप्यप्राप्त अवस्था— जो कुछ प्राप्त करना था, प्राप्त कर लिया अर्थात् समाधिद्वारा केवल अवस्थाकी प्राप्ति हो चुकी; अतः अब कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहा।

(४) चिकीर्षाशून्य अवस्था- जो कुछ करना था, कर लिया अर्जत हानका उपाय जो निर्मल और अचल विवेकज्ञान है, उसे सिद्ध कर लिया
अब और कुछ करना शेष नहीं रहा।

चित्तविमुक्तिप्रज्ञाके तीन भेद इस प्रकार हैं

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

(१) चित्तकी कृतार्थता- चित्तने अपना अधिकार ‘भोग और अपने देना पूरा कर दिया, अब उसका कोई प्रयोजन शेष नहीं रहा।

(२) गुणलीनता- चित्त अपने कारणरूप गुणोंमें लीन हो रहा है. क्योंकि अब उसका कोई कार्य शेष नहीं रहा।

(३) आत्मस्थिति- पुरुष सर्वथा गुणोंसे अतीत होकर अपने स्वरूपमें अचल भावसे स्थित हो गया।

इस सात प्रकारकी प्रान्तभूमिप्रज्ञाको अनुभव करनेवाला योगी कुशल . (जीवन्मुक्त) कहलाता है और चित्त जब अपने कारणमें लीन हो जाता है,
तब भी कुशल (विदेहमुक्त) कहलाता है ॥ २७॥

सम्बन्ध-अब उक्त निर्मल विवेकज्ञानकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं

योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥ २८॥

व्याख्या- आगे बतलाये जानेवाले योगके आठ अङ्गोंका अनुष्ठान करनेसे अर्थात् उनको आचरणमें लानेसे चित्तके मलका अभाव होकर वह सर्वथा निर्मल हो जाता है, उस समय योगीके ज्ञानका प्रकाश विवेकख्यातितक हो जाता है अर्थात् उसे आत्माका स्वरूप, बुद्धि, अहंकार और इन्द्रियोंसे सर्वथा भिन्न प्रत्यक्ष दिखलायी देता है ॥ २८॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध- उक्त योगाङ्गोंके नाम और उनकी संख्या बतलाते हैं

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयो ऽष्टावङ्गानि ॥ २९॥

व्याख्या- इन आठोंके लक्षण और फलोंका वर्णन अगले सूत्रोंमें स्वयं सूत्रकारने ही किया है, अतः यहाँ विस्तारकी आवश्यकता नहीं है ॥ २९॥

सम्बन्ध- पहले यमोंका वर्णन करते हैं

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥३०॥

व्याख्या- (१) अहिंसा-मन, वाणी और शरीरसे किसी प्राणीको कभी किसी प्रकार किंचिन्मात्र भी दुःख न देना ‘अहिंसा’ है, परदोष-दर्शनका सर्वथा त्याग भी इसीके अन्तर्गत है।

(२) सत्य-इन्द्रिय और मनसे प्रत्यक्ष देखकर, सुनकर या अनुमान करके जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा-का-वैसा ही भाव प्रकट करनेके लिये प्रिय और हितकर तथा दूसरेको उद्वेग उत्पन्न न करनेवाले जो वचन बोले जाते हैं, उनका नाम ‘सत्य’ है। इसी प्रकार कपट और छलरहित व्यवहारका नाम सत्यव्यवहार समझना चाहिये।

(३) अस्तेय- दूसरेके स्वत्वका अपहरण करना, छलसे या अन्य , किसी उपायसे अन्यायपूर्वक अपना बना लेना ‘स्तेय’ (चोरी) है, इसमें सरकारकी टैक्सकी चोरी और घूसखोरी भी सम्मिलित है; इन सब प्रकारकी चोरियोंके अभावका नाम ‘अस्तेय’ है।

(४) ब्रह्मचर्य- मन, वाणी और शरीरसे होनेवाले सब प्रकारके मैथुनोंका सब अवस्थाओंमें सदा त्याग करके सब प्रकारसे वीर्यकी रक्षा करना ‘ब्रह्मचर्य’ है।

अतः साधकको चाहिये कि न तो कामदीपन करनेवाले पदार्थोंका सेवन करे, न ऐसे दृश्योंको देखे, न ऐसी बातोंको सुने, न ऐसे साहित्यको पढ़े और न ऐसे विचारोंको ही मनमें लावे तथा स्त्रियोंका और स्त्री आसक्त पुरुषोंका संग भी ब्रह्मचर्यमें बाधक है, अतः ऐसे संगसे सदा सावधानीके साथ अलग रहे।

(५) अपरिग्रह- अपने स्वार्थके लिये ममतापूर्वक धन, सम्पत्ति
कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा। सर्वत्र मैथुनत्यागी ब्रह्मचर्य प्रचक्षते ॥
(गरुड० पूर्व आचार० २३८ । ६) और भोग-सामग्रीका संचय करना ‘परिग्रह’ है, इसके अभावका नाम ‘अपरिग्रह’ है ॥ ३०॥

सम्बन्ध-उक्त यमोंकी सबसे ऊँची अवस्था बतलाते हैं

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥३१॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

व्याख्या- उक्त अहिंसादिका अनुष्ठान जब सार्वभौम अर्थात् सबके साथ, सब जगह और सब समय समानभावसे किया जाता है, तब ये महाव्रत हो जाते हैं। जैसे किसीने नियम लिया कि मछलीके सिवा अन्य जीवोंकी हिंसा नहीं करूँगा तो यह जाति-अवछिन्न अहिंसा है, इसी तरह कोई नियम ले कि मैं तीर्थों में हिंसा नहीं करूँगा तो यह देश-अवछिन्न अहिंसा है। कोई यह नियम करे कि मैं एकादशी, अमावास्या और पूर्णिमाको हिंसा नहीं करूँगा तो यह कालावच्छिन्न अहिंसा है।

कोई नियम करे कि मैं विवाहके अवसरके सिवा अन्य किसी निमित्तसे हिंसा नहीं करूँगा तो यह समयावच्छिन्न (निमित्तसे सम्बन्धित) अहिंसा है। इसी प्रकार सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहके भी भेद समझ लेने चाहिये। ऐसे यम व्रत तो हैं, परंतु सार्वभौम न होनेके कारण महाव्रत नहीं हैं। उपर्युक्त प्रकारका प्रतिबन्ध न लगाकर जब सभी प्राणियोंके साथ सब देशोंमें सदा-सर्वदा इनका पालन किया जाय, किसी भी निमित्तसे इनमें शिथिलता आनेका अवकाश न दिया जाय, तब ये सार्वभौम होनेपर ‘महाव्रत’ कहलाते हैं ॥ ३१ ॥

सम्बन्ध- यमोंका वर्णन करके अब नियमोंका वर्णन करते हैं
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥३२॥

व्याख्या- (१) शौच-जल, मृत्तिकादिके द्वारा शरीर, वस्त्र और मकान आदिके मलको दूर करना बाहरकी शुद्धि है, इसके सिवा अपने वर्णाश्रम और योग्यताके अनुसार न्यायपूर्वक धनको और शरीरनिर्वाहके लिये आवश्यक अन्न आदि पवित्र वस्तुओंको प्राप्त करके उनके द्वारा शास्त्रानुकूल शुद्ध भोजनादि करना तथा सबके साथ यथायोग्य पवित्र बर्ताव करना—यह भी बाहरी शुद्धिके ही अन्तर्गत है। जप, तप और शुद्ध विचारोंके द्वारा एवं मैत्री आदिकी भावनासे अन्तःकरणके राग-द्वेषादि मलोंका नाश करना भीतरकी पवित्रता है।

(२) संतोष- कर्तव्यकर्मका पालन करते हुए उसका जो कुछ परिणाम हो तथा प्रारब्धके अनुसार अपने-आप जो कुछ भी प्राप्त हो एवं जिस अवस्था
और परिस्थितिमें रहनेका संयोग प्राप्त हो जाय, उसीमें संतुष्ट रहना और किसी प्रकारकी भी कामना या तृष्णा न करना ‘संतोष’ है।

(३) तप, (४) स्वाध्याय और (५) ईश्वर-प्रणिधान-इन तीनोंकी व्याख्या क्रियायोगके वर्णनमें कर चुके हैं (देखिये योग० २ । १ की व्याख्या) उसी प्रकार यहाँ भी समझ लेना चाहिये ॥ ३२ ॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध- यम-नियमोंके अनुष्ठानमें विघ्न उपस्थित होनेपर उन विघ्नोंको हटानेका उपाय बतलाते हैं

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥ ३३ ॥

व्याख्या- जब कभी संगदोषसे या अन्यायपूर्वक किसीके द्वारा सताये नारपर बदला लेनेके लिये या अन्य किसी भी कारणसे मनमें अहिंसादिके विरोधी भाव बाधा पहुँचावें अर्थात् हिंसा, झूठ, चोरी आदिमें प्रवृत्त होकर यम-नियमादिका त्याग कर देनेकी परिस्थिति उत्पन्न कर दें तो उस समय उन विरोधी विचारोंका नाश करनेके लिये उन विचारोंमें दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षकी भावना करनी चाहिये ।। ३३ ।।

सम्बन्ध- इस दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षभावनाका ही अगले सूत्रोंमें वर्णन करते हैं

वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोध मोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥ ३४ ॥

व्याख्या- स्वयं किये हुए, दूसरोंसे करवाये हुए, दूसरोंको करते . देखकर अनुमोदन किये हुए—इस तरह तीन प्रकारसे होनेवाले हिंसा, झूठ, चोरी और व्यभिचार आदि अवगुण, जो कि यम-नियमोंके विरोधी हैं, उनका नाम ‘वितर्क’ है।

ये दोष कभी लोभसे, कभी क्रोधसे और कभी मोहसे एवं कभी छोटे रूपमें, कभी मध्यम और कभी भयंकररूपमें साधकके सामने उपस्थित होकर उसे सताते हैं। उस समय साधकको सावधान होकर विचार करना चाहिये कि ये हिंसादि दोष महान् हानिकारक और नरकमें ले जानेवाले हैं, इनका परिणाम अनन्तकालतक बारम्बार दुःख भोगना और अज्ञानके वशमें होकर शूकर-कूकर आदि मूढ़ योनियोंमें पड़ना है, अतः इनसे सर्वथा दूर रहकर दृढ़तापूर्वक यम-नियमोंका पालन करते रहना चाहिये । इस प्रकारके विचारोंको बारम्बार करते रहना ही ‘प्रतिपक्षकी भावना’ है ॥ ३४॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध- इस प्रकार यम-नियमोंके विरोधी हिंसादिको हटानेका उपाय उसमें दोष देखना बतलाकर अब यम-नियमोंमें प्रीति उत्पन्न करनेके लिये उनके पालनका भिन्न-भिन्न फल बतलाते हैं

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥ ३५॥

व्याख्या- जब योगीका अहिंसाभाव पूर्णतया दृढ़ स्थिर हो जाता है तब उसके निकटवर्ती हिंसक जीव भी वैरभावसे रहित हो जाते हैं। इतिहास ग्रन्थोंमें जहाँ मुनियोंके आश्रमोंकी शोभाका वर्णन आता है, वहाँ वनचर जीवोंमें स्वाभाविक वैरका अभाव दिखलाया गया है, यह उन ऋषियोंके अहिंसाभावकी प्रतिष्ठाका द्योतक है॥ ३५ ॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

साधनपाद-२

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साधनपाद-२

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सम्बन्ध- पहले पादमें योगका स्वरूप, उसके भेद और उसके फलका संक्षेपमें वर्णन किया गया। साथ ही उसके उपायभूत अभ्यास और वैराग्यका तथा ईश्वरप्रणिधान आदि दूसरे साधनोंका भी वर्णन किया गया, किंतु उसमें बतलायी हुई रीतिसे निर्बीज समाधि वही साधक प्राप्त कर सकता है, जिसका अन्तःकरण स्वभाव से ही शुद्ध है एवं जो योगसाधनामें तत्पर है। अतः अब साधारण साधकोंके लिये क्रमशः अन्तःकरणकी शुद्धिपूर्वक निर्बीज-समाधि प्राप्त करनेका उपाय बतलानेके लिये साधनपाद नामक दूसरे पादका आरम्भ किया जाता है

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥१॥ –

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि-तप-स्वाध्याय और. ईश्वर-शरणागति ये तीनों; क्रियायोगः क्रियायोग हैं।

व्याख्या- (१) तप- अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति और योग्यताके अनुसार स्वधर्मका पालन करना और उसके पालनमें जो शारीरिक या मानसिक अधिक-से-अधिक कष्ट प्राप्त हो, उसे सहर्ष सहन करना-इसका नाम ‘तप’ है। व्रत, उपवास आदि भी इसीमें आ जाते हैं। निष्कामभावसे इस तपका पालन करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण अनायास ही शुद्ध हो जाता है, यह गीतोक्त कर्मयोगका ही अङ्ग है।

(२) स्वाध्याय- जिनसे अपने कर्तव्य-अकर्तव्यका बोध हो सके, ऐसे वेद, शास्त्र, महापुरुषोंके लेख आदिका पठन-पाठन और भगवान्के ॐ कार आदि किसी नामका या गायत्रीका और किसी भी इष्टदेवताके मन्त्रका जप करना ‘स्वाध्याय’ है। इसके सिवा अपने जीवनके अध्ययनका नाम भी स्वाध्याय है। अतः साधकको प्राप्त विवेकके द्वारा अपने दोषोंको खोजकर निकालते रहना चाहिये।

(३) ईश्वर- प्रणिधान– ईश्वरके शरणापन्न हो जानेका नाम ‘ईश्वर प्रणिधान’ है। उसके नाम, रूप, लीला, धाम, गुण और प्रभाव आदिका श्रवण, कीर्तन और मनन करना, समस्त कर्मोको भगवान्के समर्पण कर देना, अपनेको भगवान्के हाथका यन्त्र बनाकर जिस प्रकार वह नचावे, वैसे ही नाचना, उसकी आज्ञाका पालन करना, उसीमें अनन्य प्रेम करना-ये सभी ईश्वर-प्रणिधानके अङ्ग हैं। यद्यपि तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान-ये तीनों ही यम, नियम आदि योगके अङ्गोंमें नियमोंके अन्तर्गत आ जाते हैं तथापि इन तीनों साधनोंका विशेष महत्त्व और इनकी सुगमता दिखलानेके लिये पहले क्रियायोगके नामसे इनका अलग वर्णन किया गया है ॥ १ ॥

सम्बन्ध-उपर्युक्त क्रियायोगका फल बतलाते हैं

समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥ २ ॥

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व्याख्या-उपर्युक्त क्रियायोग अविद्यादि दोषोंको क्षीण करनेवाला और समाधिकी सिद्धि करनेवाला है अर्थात् इसके साधनसे साधकके अविद्यादि क्लेशोंका क्षय होकर उसको कैवल्य-अवस्थातक समाधिकी प्राप्ति हो सकती है ॥२॥

सम्बन्ध- दूसरे सूत्रमें क्रियायोगका फल समाधिसिद्धि और क्लेशोंका क्षय बतलाया गया, उनमें से समाधिके लक्षण और फलका वर्णन तो पहले पादमें हो चुका है, परंतु क्लेश कितने हैं, उनके नाम क्या हैं, वे किस-किस अवस्थामें रहते हैं, उनका क्षय कैसे होता है और उनका नाश क्यों करना चाहिये-इन सब बातोंका वर्णन नहीं हुआ। अतः प्रसङ्गानुसार इस प्रकरणका आरम्भ करते हैं

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥३॥

व्याख्या- ये अविद्यादि पाँचों ही जीवमात्रको संसारचक्रमें घुमानेवाले महादुःखदायक हैं। इस कारण सूत्रकारने इनका नाम ‘क्लेश’ रखा है।
कितने ही टीकाकारोंका तो कहना है कि ये पाँचों क्लेश ही पाँच प्रकारका विपर्ययज्ञान है। कुछ इनमेंसे केवल अविद्या और विपर्ययवृत्तिकी ही एकता ..
करते हैं; किंतु ये दोनों ही बातें युक्तिसंगत नहीं मालूम होती; क्योंकि प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्तिका अभाव है, पर अविद्यादि पाँचों क्लेश वहाँ भी विद्यमान रहते हैं । ऋतम्भरा प्रज्ञामें विपर्ययका लेश भी नहीं स्वीकार किया जा सकता, परंतु जिस अविद्यारूप क्लेशको द्रष्टा और दृश्यके संयोगका हेतु माना गया है, वह तो वहाँ भी रहता ही है, अन्यथा संयोगके अभावसे हेयका नाश होकर साधकको उसी क्षण कैवल्य-अवस्थाकी प्राप्ति हो जानी चाहिये थी। इसके सिवा एक बात और भी है। इस ग्रन्थमें कैवल्य-स्थितिको प्राप्त सिद्ध योगीके कर्म अशुक्ल और अकृष्ण अर्थात् पुण्य-पापके संस्कारोंसे रहित माने गये हैं (योग० ४ । ७), इससे यह सिद्ध होता है कि जीवन्मुक्त योगीद्वारा भी कर्म अवश्य किये जाते हैं। तब यह भी मानना पड़ेगा कि व्युत्थान-अवस्थामें जब वह कर्म करता है तो विपर्यय-वृत्तिका प्रादुर्भाव भी स्वाभाविक होता है;

क्योंकि पाँचों ही वृत्तियाँ चित्तका धर्म हैं और व्युत्थान-अवस्थामें चित्त . विद्यमान रहता है, यह स्वीकार करना ही पड़ेगा। किंतु जीवन्मुक्त योगीमें
अविद्या भी रहती है, यह नहीं माना जा सकता, क्योंकि यदि अविद्या वर्तमान है तो वह जीवन्मुक्त ही कैसा; इसी तरह और भी बहुत-से कारण हैं (देखिये योग० १।८ की टीका),जिनसे विपर्यय और अविद्याकी एकता माननेमें सिद्धान्तकी हानि होती है। अतः विद्वान् सज्जनोंको इसपर विचार करना
चाहिये ॥३॥

सम्बन्ध- अब क्लेशोंकी अवस्थाके भेद बतलाते हुए यह बात कहते हैं कि इन सबका मूल कारण अविद्यारूप क्लेश है

अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥४॥

व्याख्या- (१) प्रसुप्त – चित्तमें विद्यमान रहते हुए भी जिस समय जो क्लेश अपना कार्य नहीं करता, उस समय उसे प्रसुप्त कहा जाता है। प्रलयकाल
और सुषुप्तिमें चारों ही क्लेशोंकी प्रसुप्त-अवस्था रहती है।

(२) तनु- क्लेशोंमें जो कार्य करनेकी शक्ति है, उसका जब योगके साधनोंद्वारा ह्रास कर दिया जाता है; तब वे हीन शक्तिवाले क्लेश ‘तनु’ कहलाते हैं। देखने में भी आता है कि ये राग-द्वेषादि क्लेश साधारण मनुष्योंकी भाँति साधकोंपर अपना आधिपत्य नहीं जमा सकते अर्थात् साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा साधकोंपर उनका प्रभाव बहुत कम पड़ता है।

(३) विच्छिन्न- जब कोई क्लेश उदार होता है, उस समय दूसरा क्लेश दब जाता है, वह उसकी ‘विच्छिन्नावस्था’ है, जैसे रागकी उदार-अवस्थाके क्षणमें द्वेष दब जाता है और द्वेषकी उदार-अवस्थाके क्षणमें राग दबा रहता है।

(४) उदार- जिस समय जो क्लेश अपना कार्य पूर्णतया कर रहा हो उस समय वही ‘उदार’ कहलाता है। … उपर्युक्त पाँच क्लेशोंमेंसे अस्मितादि चार क्लेशोंके ही प्रसुप्तादि चार अवस्थाभेद बतलाये गये हैं, अविद्याके नहीं; क्योंकि वह अन्य चारोंका कारण है, उसके नाशसे सबका सदाके लिये समूल नाश हो जाता है ॥४॥

सम्बन्धः-अब अविद्याका स्वरूप बतलाते है

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥५॥

व्याख्या- इस लोक और परलोकके समस्त भोग और भोगोंका आयतन यह मनुष्य शरीर भी अनित्य है, इस बातको प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा समझकर भी जिसके प्रभावसे मनुष्य उनमें नित्यत्वबुद्धि करके राग-द्वेषादि कर लेता है, यह अनित्यमें नित्यकी अनुभूतिरूप अविद्या है। शिश। का इसी प्रकार
हाड़, मांस, मज्जा आदि अपवित्र धातुओंके समुदायरूप अपने और स्त्री आदिके शरीरोंको प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा अपवित्र समझते हुए भी जिसके कारण मनुष्य अपने शरीरमें पवित्रताका अभिमान करता है और स्त्री-पुत्र आदिके शरीरोंसे प्यार करता है, यह अपवित्रमें पवित्रकी अनुभूतिरूप
अविद्या है। वैसे ही प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा विचार करनेपर सभी भोग दुःखरूप हैं यह बात विचारशील साधककी समझमें आ जाती है (योग० २ । १५) । इसपर भी मनुष्य उन भोगोंको सुखदायक समझकर उनके भोगनेमें प्रवृत्त हुआ रहता है, यही दुःखमें सुखकी अनुभूतिरूप अविद्या है।
यद्यपि यह बात थोड़ा-सा विचार करते ही समझमें आ जाती है कि जड शरीर आत्मा नहीं है तथापि मनुष्य इसीको अपना स्वरूप माने रहता है,आत्मा इससे सर्वथा असङ्ग और चेतन है इस बातका अनुभव नहीं कर सकता, इसका नाम अनात्मामें आत्मभावका अनुभूतिरूप अविद्या है।
प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम-प्रमाणसे वस्तुस्थितिका सामान्य ज्ञान हो जानेपर विपर्ययवृत्ति नहीं रहती, तो भी अविद्याका नाश नहीं होता; इससे यह सिद्ध होता है कि चित्तकी विपर्ययवृत्तिका नाम अविद्या नहीं है ॥५॥

yog darshan sadhanpaad

सम्बन्ध-अब अस्मिताका स्वरूप बतलाते हैं

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥६॥

व्याख्या- दृक्-शक्ति अर्थात् द्रष्टा-पुरुष और दर्शन-शक्ति अर्थात् बुद्धि-ये दोनों सर्वथा भिन्न और विलक्षण हैं। द्रष्टा चेतन है और बुद्धि जड है। इनकी एकता हो ही नहीं सकती। तथापि अविद्याके कारण दोनोंकी एकता-सी हो रही हैं (योग० २ । २४) । इसीको द्रष्टा और दृश्यका संयोग कहते हैं। यही प्रकृति और पुरुषके स्वरूपकी उपलब्धिका हेतु माना गया है (योग० २ । २३) । इस संयोगके रहते हुए भी पुरुष और बुद्धिका भिन्न-भिन्न स्वरूप विचारके द्वारा और सम्प्रज्ञात-समाधिके द्वारा समझमें तो आता है; परंतु जबतक निर्बीज-समाधिद्वारा अविद्याका सर्वथा नाश नहीं कर दिया जाता, तबतक संयोगका अभाव नहीं होता है। इस कारण इनके शुद्ध स्वरूपका अनुभव नहीं होता (योग० ३ । ३५) । अतः साधकको चाहिये कि तत्परतासे उत्साहपूर्वक योगसाधनमें लगकर शीघ्र ही अविद्याके नाशद्वारा संयोगरूप अस्मिता नामक क्लेशका नाश कर दे और कैवल्य-स्थितिको प्राप्त कर ले॥६॥

सम्बन्ध-अब राग नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं
सुखानुशयी रागः ॥७॥
सुखानुशयी-सुखकी. प्रतीतिके पीछे रहनेवाला क्लेश; रागः=’राग’ है।
व्याख्या-प्रकृतिस्थ जीवको जब कभी जिस किसी अनुकूल पदार्थमें सुखकी प्रतीति हुई है या होती है, उसमें और उसके निमित्तोंमें उसकी आसक्ति (प्रीति) हो जाती है, उसीको ‘राग’ कहते हैं। अतः इस राग नामक क्लेशको सुखकी प्रतीतिके साथ-साथ रहनेवाला कहा गया है ॥७॥

सम्बन्ध-अब द्वेष नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं

दुःखानुशयी द्वेषः ॥८॥

दुःखानुशयी-दुःखकी प्रतीतिके पीछे रहनेवाला क्लेश; द्वेषः=’द्वेष’ है।
व्याख्या-मनुष्यको जब कभी जिस किसी प्रतिकूल पदार्थमें दुःखकी प्रतीति हुई है या होती है, उसमें और उसके निमित्तोंमें उसका द्वेष हो जाता है; अतः यह द्वेषरूप क्लेश दुःखकी प्रतीतिके पीछे यानी साथ-साथ रहनेवाला है॥८॥

सम्बन्ध- अब अभिनिवेश नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं

स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥९॥

व्याख्या- यह मरणभयरूप क्लेश सभी प्राणियोंमें अनादि कालसे . स्वाभाविक है; अतः कोई भी जीव यह नहीं चाहता कि मैं न रहूँ, सभी अपनी । विद्यमानता चाहते हैं। एक छोटे-से-छोटा कीट भी मरणसे डरकर अपनी रक्षाका उपाय करता है। (इससे पूर्वजन्मकी सिद्धि होती है,
क्योंकि यदि मरण-दुःख पहले अनुभव किया हुआ नहीं होता तो उसका भय कैसे होता?) यह मरणभय जीवोंके अन्तःकरणमें इतना गहरा बैठा हुआ है कि मूर्खके जैसा ही विवेकशीलपर भी इसका प्रभाव पड़ता है, इसीलिये इसका नाम ‘अभिनिवेश’ अर्थात् ‘अत्यन्त गहराई में प्रविष्ट’ रखा गया है॥९॥ . .

सम्बन्ध- इन पाँच प्रकारके क्लेशोंको तनु अर्थात् सूक्ष्म बना देनेका उपाय ‘क्रियायोग’ पहले बतला चुके । ‘क्रियायोग के द्वारा सूक्ष्म किये हुए क्लेशोंका नाश किस उपायसे करना चाहिये, यह बात अगले सूत्र में बतलाते हैं। yog darshan sadhanpaad

ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥१०॥

व्याख्या- क्रियायोग या ध्यानयोगद्वारा सूक्ष्म किये हुए क्लेशोंका नाश
निर्बीज समाधिके द्वारा चित्तको उसके कारणमें विलीन करके करना चाहिये; क्योंकि क्रियायोग या ध्यानद्वारा क्षीण कर दिये जानेपर भी जो लेशमात्र क्लेश शेष रह जाते हैं, उनका नाश द्रष्टा और दृश्यके संयोगका अभाव होनेपर ही होता है, उसके पहले क्लेशोंका सर्वथा नाश नहीं होता, यह भाव है ॥ १० ॥ .

सम्बन्ध-अब क्लेशोंको क्षीण करनेका क्रियायोगसे अतिरिक्त दूसरा साधन . . बतलाते हैं

ध्यानहेयास्तवृत्तयः ॥ ११॥

व्याख्या- उन क्लेशोंकी जो स्थूल वृत्तियाँ हैं, उनका यदि पूर्वोक्त क्रियायोगके द्वारा नाश करके उन क्लेशोंको सूक्ष्म नहीं बना दिया गया हो तो पहले ध्यानके द्वारा उनकी स्थूल वृत्तियोंका नाश करके उनको सूक्ष्म बना लेना चाहिये,
तभी निर्बीज-समाधिकी सिद्धि सुगमतासे हो सकेगी। उसके बाद निर्बीज-समाधिसे क्लेशोंका सर्वथा अभाव अपने-आप हो जायगा ॥११॥

सम्बन्ध-उपर्युक्त क्लेश किस प्रकार जीवके महान् दुःखोंके कारण हैं; इस बातको । स्पष्ट करनेके लिये अलग प्रकरण आरम्भ किया जाता है

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥ १२॥

व्याख्या- कर्लोक संस्कारोंकी जड़ उपर्युक्त पाँचों क्लेश ही हैं। अविद्यादि क्लेशोंके न रहनेपर किये हुए कर्मोंसे कर्माशय नहीं बनता, बल्कि वैसे राग-द्वेषरहित निष्काम कर्म तो पूर्वसंचित कर्माशयका भी नाश करनेवाले होते हैं (गीता ४ । २३) । यही क्लेशमूलक कर्माशय जिस प्रकार इस जन्ममें
दुःख देता है, उस प्रकार भविष्यमें होनेवाले जन्मोंमें भी दुःखदायक है। अतः साधकको इसकी जड़ काट डालनी चाहिये अर्थात् पूर्वोक्त क्लेशोंका सर्वथा नाश कर देना चाहिये ॥ १२॥

सम्बन्ध-उस कर्माशयका फल कबतक मिलता रहता है और वह क्या है, इसको स्पष्ट करते हैं

सति मूले तद्विपाको जात्यायु गाः॥१३॥

व्याख्या- जबतक क्लेशरूप जड़ विद्यमान रहती है, तबतक इस कर्मोके संस्कार-समुदायरूप कर्माशयका विपाक यानी परिणाम-बार-बार अच्छी बुरी योनियोंमें जन्म होना, वहाँपर निश्चित आयुतक जीते रहकर फिर मरण-दुःखको भोगना और जीवनावस्थामें जो विवेकदृष्टि से सभी दुःखरूप हैं, ऐसे भोगोंका सम्बन्ध होना-ऐसे तीन प्रकारका होता रहता है ॥ १३ ॥

सम्बन्ध-वे जाति, आयु और भोगरूप परिणाम किस प्रकारके होते हैं, यह बतलाते हैं

ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥ १४॥

समाधिपाद-१

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व्याख्या- जो जन्म पुण्यकर्मका परिणाम है, वह सुखदायक होता है और जो पापकर्मका परिणाम है, वह दुःखदायक होता है। इसी प्रकार आयुका जितना समय शुभकर्मका परिणाम है, उतना समय सुखदायक होता है और जितना पापकर्मका परिणाम है, उतना दुःखदायक होता है। वैसे ही जो-जो भोग अर्थात् सांसारिक मनुष्योंके, अन्य प्राणियोंके पदार्थोके और क्रिया एवं परिस्थिति आदिके संयोग-वियोग पुण्यकर्मके परिणाम होते हैं, वे हर्षप्रद होते हैं और जो पापकर्मके परिणाम होते हैं, वे शोकप्रद होते हैं ॥ १४ ॥

सम्बन्ध–यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि यदि यही बात है तब तो जिसका परिणाम केवल दुःखप्रद फल (जन्म, आयु और भोग) हैं ऐसे कर्माशयका ही उसके मूलसहित नाश करना उचित है। उसके साथ सुखप्रद कर्माशयका नाश करनेकी बात क्यों कही? इसपर कहते हैं

परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ॥१५॥

व्याख्या-(१) परिणामदुःख– जो ‘कर्मविपाक’ भोगकालमें स्थूल दृष्टिसे सुखप्रद प्रतीत होता है, उसका भी परिणाम (नतीजा) दुःख ही है। जैसे स्त्रीप्रसङ्गके समय मनुष्यको सुख भासता है; परंतु उसका परिणाम बल, वीर्य, तेज, स्मृति आदिका ह्रास प्रत्यक्ष देखने में आता है, ऐसे ही दूसरे भोगोंमें
भी समझ लेना चाहिये । व भोगोंको भोगते-भोगते मनुष्य थक जाता है, उन्हें भोगनेकी शक्ति उसमें नहीं रहती, परंतु तृष्णा बनी रहती है, इससे वह भोगरूप सुख भी दुःख ही है। गीतामें भी कहा है

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥

(१८ । ३८) ‘जो सुख विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होता है, वह यद्यपि भोगकालमें अमृतके सदृश भासता है; परंतु परिणाममें विषके सदृश है, इसलिये वह सुख राजस कहा गया है।’ यह भोगके अन्तमें अनुभव होनेवाला दुःख भी परिणाम-दुःखकी ही गणनामें है।

इन्द्रियों और पदार्थोंके सम्बन्धसे जब मनुष्यको किसी भी प्रकारके भोगमें सुखकी प्रतीति होती है, तब उसमें राग-आसक्ति अवश्य हो जाती है। इसलिये वह सुख रागरूप क्लेशसे मिला हुआ है। आसक्तिवश मनुष्य उस भोगकी प्राप्तिके साधनरूप अच्छे-बुरे कर्मोंका आरम्भ भी करेगा ही। भोग्यवस्तुओंकी प्राप्तिमें असमर्थ

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होनेसे या विघ्न आनेपर द्वेष होना भी अवश्यम्भावी है। इसके सिवा, प्राणियोंकी हिंसाके बिना भोगकी सिद्धि भी नहीं होती। अतः राग, द्वेष और हिंसादिका परिणाम अवश्य ही दुःख है। यह भी परिणाम-दुःखता है।

(२) तापदुःख-सभी प्रकारके भोगरूप सुख विनाशशील हैं; उनसे वियोग होना निश्चित है, अतः भोगकालमें उनके विनाशकी सम्भावनासे भयके कारण तापदुःख बना रहता है। इसी तरह मनुष्यको जो सुखकारक भोग प्राप्त होते हैं वे सातिशय ही होते हैं, अर्थात् उसे जो कुछ प्राप्त है, उससे बढ़कर दूसरोंको भी प्राप्त है यह देखकर वह ईर्ष्यासे जलता रहता है। यह भी तापदुःख है। तथा भोगकी अपूर्णतासे भी भोगकालमें संताप बना रहता है, यह भी तापदुःख है।

(३) संस्कारदुःख- जिन-जिन भोगोंमें मनुष्यको सुखका अनुभव होता है, उस अनुभवके संस्कार उसके हृदयमें जम जाते हैं। जब उन भोग सामग्रियोंसे उसका वियोग हो जाता है, तब वे संस्कार पहलेके सुखभोगकी स्मृतिद्वारा महान् दुःखके हेतु हो जाते हैं। देखनेमें भी आता है कि जब किसी मनुष्यकी स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदि भोगसामग्री नष्ट हो जाती है, तब वह उनको याद कर-करके रोता रहता है कि मेरी स्त्री मुझे अमुक-अमुक प्रकारसे । सुख देती थी, मेरे पास इतना धन था, मैं अपने धनसे स्वयं सुख भोगता था और लोगोंको सुख पहुँचाता था, आज मेरी यह दशा है कि मैं भिखारी होकर लोगोंसे सहायता माँगता फिरता हूँ-इत्यादि । इसके सिवा, वे भोग-संस्कार, भोगासक्तिकी वृद्धिमें कारण होनेसे जन्मान्तरमें भी दुःखके हेतु हैं।

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(४) गुणवृत्तिविरोध– गुणोंके कार्यका नाम गुणवृत्ति है, गुणोंके कार्यमें परस्पर अत्यन्त विरोध है। जैसे सत्त्वगुणका कार्य प्रकाश, ज्ञान और सुख है, तो तमोगुणका कार्य अन्धकार, अज्ञान और दुःख है। इस प्रकार इनके कार्योंमें विरोध होनेके कारण दुविधा बनी रहती है; सुख-भोगकालमें भी शान्ति नहीं मिलती; क्योंकि तीनों गुण एक साथ रहनेवाले हैं। सुखके अनुभवकालमें सत्त्वगुणकी प्रधानता रहते हुए भी रजोगुण और तमोगुणका अभाव नहीं हो जाता, अतः उस समय भी दुःख और शोक विद्यमान रहते हैं; इसलिये भी वह दुःख ही है। जैसे ध्यानकालमें और सत्सङ्ग करते समय सत्त्वगुणकी प्रधानता रहती है, अतः सात्त्विक सुख होता है, परंतु वहाँ भी सांसारिक स्फुरणा और तन्द्रा उस सुखमें विघ्न कर देते हैं ऐसे ही अन्य कामोंमें भी समझ लेना चाहिये।

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उपर्युक्त परिणामदुःख, तापदुःख और संस्कारदुःख तथा गुणवृत्तियोंके विरोधसे होनेवाले दुःखको विचारद्वारा विवेकी पुरुष समझता है। इस कारण उसकी दृष्टिमें सभी ‘कर्मविपाक’ दुःखरूप ही हैं अर्थात् साधारण मनुष्य समुदाय जिन भोगोंको सुखरूप समझता है, विवेकीके लिये वे भी दुःख ही हैं॥ १५॥

सम्बन्ध-उपर्युक्त वर्णनसे यह सिद्ध हो गया है कि जन्म, आयु और भोगरूप यह बात गीताके पाँचवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें इस प्रकार कही गयी है

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ ।

अर्थात् इन्द्रिय और विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले जितने भी भोग हैं, वे सब-के-सब दुःखोंके ही कारण हैं तथा सभी आदि और अन्तवाले हैं, अतः विवेकी मनुष्य उनमें नहीं रमता।

सभी कर्म-विपाक दुःखरूप हैं; इसलिये उनका मूलसहित उच्छेद करना मनुष्यका कर्तव्य है। अतः अब उनको त्याज्य (नाश करनेयोग्य) बतलाकर उनसे मुक्ति पानेका उपाय बतलाते हुए अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं

हेयं दुःखमनागतम् ॥ १६ ॥

व्याख्या- वर्तमान जन्मके पहले जो अनेक योनियोंमें दुःख भोगे जा चुके, वे तो अपने-आप समाप्त हो गये, उनके विषयमें कोई विचार नहीं करना है। तथा जो वर्तमान हैं वे भी भोग देकर दूसरे क्षणमें अपने-आप लुप्त हो जायँगे, उनके लिये भी उपायकी आवश्यकता नहीं है। परन्तु जो दुःख अभीतक प्राप्त नहीं हुए हैं, भविष्यमें होनेवाले हैं, उनका नाश उपायद्वारा अवश्य-कर्तव्य है; इसलिये उन्हींको ‘हेय’ बतलाया गया है ॥ १६॥

सम्बन्ध- जिसका नाश करना हो, उसके मूल कारणको जाननेकी आवश्यकता है; क्योंकि मूल कारणके नाशसे ही उसका पूर्णतया नाश हो सकता है; नहीं तो वह पुनः उत्पन्न हो सकता हैअतः उक्त ‘हेय’का हेतु (कारण) बतलाते हैं।

द्रष्टदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥ १७ ॥

व्याख्या- ऊपर जो नाश करनेयोग्य आनेवाले दुःख बतलाये गये हैं, उनका मूल कारण द्रष्टा और दृश्यका अर्थात् पुरुष और प्रकृतिका संयोग यानी’ जड-चेतनकी ग्रन्थि है। अतः इस संयोगका नाश कर
देनेसे मनुष्य सर्वथा . दुःखोंसे निवृत्त हो सकता है ॥ १७ ॥

सम्बन्ध- पूर्व सूत्रमें द्रष्टा, दृश्य और उनका संयोग-इन तीनके नाम आये हैं, उनमेंसे पहले दृश्यका स्वभाव, स्वरूप और प्रयोजन बतलाते हैं

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥१८॥

व्याख्या- सत्त्व, रज और तम-ये तीनों गुण और इनका कार्य जो कुछ भी देखने, सुनने और समझनेमें आता है, वह सब-का-सब दृश्यके अन्तर्गत है। सत्त्वगुणका मुख्य धर्म प्रकाश है, रजोगुणका मुख्य धर्म क्रिया (हलचल) है और तमोगुणका मुख्य धर्म स्थिति अर्थात् जडता और सुषुप्ति आदि है ।
इन तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाको ही प्रधान या प्रकृति कहते हैं। यह सांख्यका मत है। अतः सब अवस्थाओंमें अनुगत तीनों गुणोंका जो प्रकाश, क्रिया और स्थितिरूप स्वभाव है, वही दृश्यका स्वभाव है। पाँच स्थूल भूत, पाँच तन्मात्रा, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन, बुद्धि और अहंकार-ये सब (तेईस तत्त्व) प्रकृतिके कार्य होनेसे उसके स्वरूप हैं।

भोगासक्त पुरुषको अपना स्वरूप दिखलाकर भोग प्रदान करना और मुक्ति चाहनेवाले योगीको द्रष्टाका स्वरूप दिखलाकर मुक्ति प्रदान करना दृश्यका प्रयोजन है। द्रष्टाको उसका निज स्वरूप दिखा देनेके बाद इसका कोई प्रयोजन नहीं रहता, उस पुरुषके लिये यह अस्त (लुप्त) हो जाता है (२ । २२) ॥ १८॥

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॥अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2॥

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श्रीपरमात्मने नमः

वेदान्त-दर्शन
(ब्रह्मसूत्र) (साधारण भाषा-टीकासहित)
पहला अध्याय
पहला पाद

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १।१ । १॥
अथ अब; अतः यहॉसे ब्रह्मजिज्ञासा ब्रह्मविषयक विचार ( आरम्भ किया जाता है)।

व्याख्या- इस सूत्रमे ब्रह्मविषयक विचार आरम्भ करनेकी बात कहकर यह सूचित किया गया है कि ब्रह्म कौन है ?

उसका खरूप क्या है ? वेदान्तमे उसका वर्णन किस प्रकार हुआ है, इत्यादि सभी ब्रह्मविषयक बातोंका इस ग्रन्थ मे विवेचन किया जाता है।

सम्बन्ध- पूर्व सूत्र में जिस ब्रह्मके विषय में विचार करनेकी प्रतिज्ञा की गयी है, उसका लक्षण बतलाते हैं,

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जन्माद्यस्य यतः ॥ १।१ । २॥

व्याख्या- यह जो जड़-चेतनात्मक जगत् सर्वसाधारणके देखने, सुनने और अनुभवमें आ रहा है, जिसकी अद्भुत रचनाके किसी एक अंशपर भी विचार

करनेसे बड़े-बड़े वैज्ञानिकोको आश्चर्यचकित होना पड़ता है,
इस विचित्र विश्वके जन्म आदि जिससे होते है अर्थात् जो सर्वशक्तिमान् परात्पर

परमेश्वर अपनी अलौकिक शक्तिसे इस सम्पूर्ण जगत्की रचना करता है, इसका धारण, पोषण तथा नियमितरूपसे सञ्चालन करता है। फिर प्रलयकाल आनेपर

जो इस समस्त विश्वको अपनेमें विलीन कर लेता है, वह परमात्मा ही ब्रह्म है।
भाव यह है कि देवता, दैत्य, दानव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि अनेक जीवो से

परिपूर्ण, सूर्य, चन्द्रमा, तारा तथा नाना लोक-लोकान्तरोसे सम्पन्न इस अनन्त ब्रह्माण्डका कर्ता-हर्ता कोई अवश्य है, यह हरेक मनुष्यकी समझमे आ सकता है;

वही ब्रह्म है। उसीको परमेश्वर, परमात्मा और भगवान् आदि विविध नामोसे कहते हैं,क्योकि वह सबका आदि, सबसे बड़ा, सर्वाधार, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वव्यापी और सर्वरूप है ।

यह दृश्यमान जगत् उसकी अपार शक्तिके किसी एक अंशका दिग्दर्शनमात्र है।

शङ्का- उपनिषदोमे तो ब्रमका वर्णन करते हुए उसे अकर्ता, अभोक्ता, असङ्ग, अव्यक्त, अगोचर, अचिन्त्य, निर्गुण, निरञ्जन तथा निर्विशेष बताया गया है और

इस सूत्रमें उसे जगतकी उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलयका कर्ता बताया गया है । यह विपरीत बात कैसे ?

समाधान- उपनिषदोमे वर्णित परब्रह्म परमेश्वर इस सम्पूर्ण जगत्का कर्ता होते हुए भी अकर्ता है (गीता ४ । १३) । अतः उसका कर्तापन साधारण जीवोकी भाँति

नहीं है। सर्वथा अलौकिक है । वह सर्वशक्तिमान्*एवं सर्वरूप होनेमे समर्थ होकर भी सबसे सर्वथा अतीत और असङ्ग है ।

सर्वगुणसम्पन्न होते हुए भी निर्गुण है। तथा समस्त विशेषणोसे युक्त होकर भी निर्विशेष है । इस परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च । (

श्वेता० ६ । ८) इस परमेश्वरकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक दिव्य शक्ति नाना प्रकार की ही सुनी जाती है। एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी

सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षःसर्वभूताधिवासः साक्षी नेता केवलो निर्गुणश्च ॥ (श्वेता० ६.११) ‘वह एक देव ही सब प्राणियोमे छिपा हुआ, सर्वव्यापी और समस्त

प्राणियोंका अन्तर्यामी परमात्मा है। वही सबके कर्मोंका अधिष्ठाता, सम्पूर्ण भूतोका निवास स्थान, सबका साक्षी, चेतनस्वरूप, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत

है।’ एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्॥ ( मा० उ० ६) “यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह सबका अन्तर्यामी है, यह

सम्पूर्ण जगत्का कारण है, क्योकि समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति स्थिति और प्रलयका स्थान यही है। नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं

नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्य प्रकार उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरमे विपरीत भावोका समावेश स्वाभाविक होनेके कारण यहाँ शङ्काके लिये स्थान नहीं है।

सम्बन्ध- कपिन और भोक्तापनसे रहित, नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्मको इस जगत्का कारण कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते है

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शास्त्रयोनित्वात् ॥ १।१।३ ॥

शास्त्रयोनित्वात् शास्त्र (वेढ.)मे उस ब्रह्मको जगत्का कारण बताया गया है, इसलिये ( उसको जगतका कारण मानना उचित है)।

व्याख्या- वेदमे जिस प्रकार ब्रह्मके सत्य, ज्ञान और अनन्त (तै० उ० . २११) आदि लभग बताये गये हैं, उसी प्रकार उसको जगत्का कारण भी बताया गया है। *

इसलिये पूर्वसूत्रके कथनानुसार परब्रह्म परमेश्वरको जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण मानना सर्वथा उचित ही है।

सम्बन्ध- मृत्तिका आदि उपादानोंसे घट आदि वस्तुओंकी रचना करने वाले कुम्भकार आदिकी मॉति ब्रह्मको जगतका निमित्त कारण

बतलाना तो युक्तिसङ्गत है परन्तु उसे उपादान कारण कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं

तत्तु समन्वयात् ॥ १।१ । ४ ॥

बहार्यमग्राहामलक्षणमचिन्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैत चतुर्थ मन्यन्ते स आन्मा स विज्ञेयः ॥ (मा० उ० ७) जो न भीतरकी और

प्रजावाला है, न बाहरकी ओर प्रजाचाला है। न दोनो ओर प्रनावाला है, न प्रजानधन है, न जाननेवाला है, न नही जाननेवाला है, जो देखा नहीं गया है, जो

व्यवहारम नहीं लाया जा मकता, जो पकड़नेमे नहीं आ सकता जिसका कोई लक्षण नहीं है, जो चिन्तन करने नहीं आ सकता जो बतलानेमे नही आ सकता,

एकपात्र आत्माकी प्रतीति ही जिमका सार है, जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है, ऐसा सर्वथा शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्व परब्रह्म परमात्माका नतुर्थ पाट है,

इस प्रकार ब्रह्मनानी मानते हैं। वह परमात्मा है, यह जाननेयोग्य है। एप योनिः सर्वस्या (मा० उ०६) यह परमात्मा सम्पूर्ण जगत्का कारण हैं। यतो वा इमानि

भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तहिजिज्ञासस्व । तोति । (त० उ०३।१) ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले प्राणी जिमसे

उत्पन्न होते है, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते है तथा
अन्तमे प्रयाण करते हुए जिममे प्रवेश करते है, उमको जाननेकी इच्छा कर, वही

ब्रह्म है। तु-तथा; तत्-वह ब्रह्म; समन्वयात्-समस्त जगत्में पूर्णरूपसे अनुगत ( व्याप्त ) होनेके कारण ( उपादान भी है)।

व्याख्या- जिस प्रकार अनुमान और शास्त्र-प्रमाणसे यह सिद्ध होता है कि इस विचित्र जगतका निमित्त कारण परब्रह्म परमेश्वर है, उसी प्रकार यह भी सिद्ध है

कि वही इसका उपादान कारण भी है; क्योकि वह इस जगतमे पूर्णतया अनुगत ( व्याप्त ) है, इसका अणुमात्र भी परमेश्वरसे शून्य नहीं है।

श्रीमद्भगवद्गीतामे भी भगवान्ने कहा है कि ‘चर या अचर, जड या चेतन, ऐसा कोई भी प्राणी या भूतसमुदाय नहीं है, जो मुझसे रहित हो।’ (१० । ३९) “यह

सम्पूर्ण जगत् मुझसे च्याप्त है।’ (गीता ९ । ४) उपनिषदोंमें भी स्थान-स्थानपर यह बात दुहरायी गयी है कि ‘उस परब्रह्म परमेश्वरसे यह समस्त जगत् व्याप्त है ।

सम्बन्ध- सांख्यमतके अनुसार त्रिगुणात्मिका प्रति भी समस्त जगत्में व्याप्त है, फिर व्याप्तिरूप हेतुसे जगत्का

उपादान कारण ब्रह्मको ही क्यों मानना चाहिये, प्रकृतिको क्यों नहीं ? इसपर कहते हैं

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ईक्षते शब्दम् ॥ १।१। ५॥

ईक्षतेः श्रुतिमे ईक्ष’ धातुका प्रयोग होनेके कारण; अशब्दम-शब्द प्रमाण-शून्य प्रधान -( त्रिगुणात्मिका जड प्रकृति); न-जगतका कारण नहीं है ।

व्याख्या- उपनिषदोमे जहाँ सृष्टिका प्रसङ्ग आया है, वहाँ ईक्ष’ धातुकी क्रियाका प्रयोग हुआ है,जैसे

सदेव सोम्येदमन आसीदेकमेवाद्वितीयम्’ (छा० उ० ६ । २ । १ )

इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके ‘तदक्षत बहु स्यां प्रजा येय’ (छा० उ०६।२। ३) अर्थात् उस सत्ने ईक्षण सङ्कल्प किया कि मै बहुत हो जाऊँ, अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ ।

ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार दूसरी जगह भी आत्मा वा इदमेकमेवान आसीत्’ इस प्रकार आरम्भ करके ‘स ईक्षत लोकान्नु सृजै’ (ऐ० उ०१ । १ । १) अर्थात् उसने

ईक्षण विचार किया कि निश्चय ही मै लोकोकी रचना करूँ । ऐसा कहा है। परन्तु त्रिगुणात्मिका प्रकृति जड है, उसमे ईक्षण या सङ्कल्प नहीं ईशावास्यमिदय सर्व

यत्किञ्च जगत्यां जगत् । (ईशा० १) बन सकता, क्योकि वह चेतनका धर्म है; अतः शब्दप्रमाणरहित प्रधान (जड प्रकृति ) को जगत्का उपादान कारण नहीं माना जा सकता।

सम्बन्ध- ईक्षण या सङ्कल्प चेननका धर्म होनेपर भी गौणीवृत्तिसे अचेतन के लिये प्रयोगमें लाया जा सकता है, जैसे लोकमें कहते है ‘अमुक मकान अब गिरना ही \

चाहता है। इसी प्रकार यहाँ भी ईक्षण-क्रियाका सम्बन्ध गौणरूपसे त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिकेसाथ मान लिया जाय तो क्या हानि है । इसपर कहते हैं

गौणश्वेन्नात्मशब्दात् ॥ १।१।६॥
चेत् यदि कहो गौणः ईक्षणका प्रयोग गौगवृत्तिसे (प्रकृतिके लिये) हुआ है; ननो यह ठीक नहीं है; आत्मशब्दात्=क्योकि वहाँ ‘आत्म’शब्दका प्रयोग है।

व्यास्या- ऊपर उद्धृत की हुई ऐतरेयकी श्रुतिमे ईक्षणका कर्ता आत्माको बताया गया है। अतः गौण-वृत्तिसे भी उसका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ नहीं हो सकता । इसलिये प्रकृतिको जगत्का कारण मानना वेदके अनुकूल नहीं है।

सम्बन्ध- आत्म’ शब्दका प्रयोग तो मन, इन्द्रिय और शरीरके लिये भी आता है; अतः उक्त श्रुतिमें ‘आत्मा’ को गीणरूपसे प्रकृतिका वाचक मानकर उसे

जगतका कारण मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं

तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ॥ १।१।७॥

व्याख्या- तैत्तिरीयोपनिषद्की दूसरी बल्लीके सातवे अनुवाकमे जो सृटिका . प्रकरण आया है, वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि ‘तदात्मान खयमकुरुत उस ब्रह्मने

खयं ही अपने आपको इस जड-चेतनात्मक जगत्के रूपमे प्रकट किया ।
साथ ही यह भी बताया गया है कि यह जीवात्मा जब उस आनन्दमय परमात्मामे

निष्टा करता-स्थित होता है, तब यह अभय पदको पा लेता है । इसी प्रकार छान्दोग्योपनिपभ भी श्वेतकेतुके प्रति उसके पिताने उस परम कारणमे स्थित

हानेका फल मोक्ष बताया है। किन्तु प्रकृतिमे स्थित होनेसे मोक्ष होना कदापि सम्भव नहीं है, अतः उपर्युक्त श्रुतियोंमे

‘आत्मा’ शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं है। इसीलिये प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता ।

सम्बन्ध- उक्त श्रुतियों में आया हुआ ‘आत्मा’ शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता, इसमें दूसरा कारण बतलाते हैं,

हेयत्वावचनाच ॥ १।१।८॥

व्याख्या- यदि आत्मा शब्द वहाँ गौणवृत्तिसे प्रकृतिका वाचक होता तो आगे चलकर उसे त्यागनेके लिये कहा जाता और मुख्य आत्मामें निष्ठा करनेका

उपदेश दिया जाता; किन्तु ऐसा कोई वचन उपलब्ध नहीं होता है। जिसको जगतका कारण बताया गया है, उसीमें निष्ठा करनेका उपदेश किया गया है।

अतः परब्रह्म परमात्मा ही आत्म’शब्दका वाच्य है और वहीं इस जगतका निमित्त एवं उपादान कारण है।

सम्बन्ध- आत्मा’ की ही भॉति इस प्रसङ्गमें ‘सत्’ शब्द भी प्रकृतिका वाचक नहीं है। यह सिद्ध करने के लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं

स्वाप्ययात् ॥ १।१। ९॥

व्याख्या- छान्दोग्योपनिषद् (६ । ८।१ ) मे कहा है कि ‘यत्रैतत् पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनर खपितीत्याचक्षते’

अर्थात् ‘हे सोम्य ! जिस अवस्थामे यह पुरुष ( जीवात्मा ) सोता है, उस समय यह सत् ( अपने कारण ) से सम्पन्न ( संयुक्त ) होता है; स्व अपनेमें अपीत-विलीन

होता है, इसलिये इसे ‘स्वपिति’ कहते हैं। यहाँ स्व (अपने) में विलीन होना कहा गया है। अतः यह सन्देह हो सकता है कि ‘स्व’ शब्द जीवात्माका ही वाचक है,

इसलिये वही जगत्का कारण है, परन्तु ऐसा समझना ठीक नहीं है, क्योकि पहले जीवात्माका सत् ( जगत्के कारण) से संयुक्त होना बताकर उसी सत्को पुनः ‘ख’

नामसे कहा गया है और उसीमे जीवात्माके विलीनइस प्रसङ्गमे जिस सत्को समस्त जगतका कारण बताया है, उसीमे जीवात्माका विलीन होना कहा गया है

और उस सत्को उसका खखरूप बताया गया है । अत. यहाँ ‘सत्’ नामसे कहा हुआ जगत्का कारण जडतत्त्व नहीं हो सकता।

सम्बन्ध- यही बात प्रकारान्तरसे पुनः सिद्ध करते है

गतिसामान्यात् ॥ १।१।१०॥

व्याख्या- तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: संभूतः’ (तै० उ० २११) ‘निश्चय ही सर्वत्र प्रसिद्ध इस परमात्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ‘

‘आत्मत एवेदः, सर्वम्’ (छा० उ०७ | २६ । १)-‘परमात्मासे ही यह सब कुछ उत्पन्न हुआ है।’

‘आत्मन एप प्राणी जायते’ (प्र० उ० ३ । ३)-परमात्मासे यह प्राग उत्पन्न होता है ।

‘एतस्माजायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वार्कोतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी । (मु० उ० २।१ । ३)-इस परमेश्वरने प्राण उत्पन्न होना है;

तथा मन ( अन्तःकरण ), समस्त इन्द्रियाँ, आकाश, वायु. तेज, जल और सम्पूर्ण प्राणियोको

धारण करनेवाली पृथिवी-ये सब उत्पन्न होते है। इस प्रकार सभी उपनिषद्-

वाक्योमे समानरूपसे चेतन परमात्माको ही जगत्का कारण बताया गया है। इसलिये जड प्रकृतिको जगतका कारण नहीं माना जा सकता ।

सम्बन्ध- पुनः श्रुति-प्रमाणसे इसी बातको दृढ करते हुए इस प्रकरणको समाप्त करते हैं—

श्रुतत्वाच ॥ १।१।११।।

व्याख्या- स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिजनिता न चाधिपः ।। ( श्वेता० उ०६।९)-‘वह परमात्मा सबका परम कारण तथा समस्त करणोंके

अधिष्ठाताओंका भी अधिपति है । कोई भी न तो इसका जनक है और न खामी ही

है ।’ ‘स विश्वकृत’ (श्वेता० ६ । १६ )—‘वह परमात्मा समस्त विश्वका स्रष्टा है । अतः

समुद्रा गिरयश्च सर्वे (मु० उ० २ । १ । ९) ‘इस परमेश्वरसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं। इत्यादिरूपसे उपनिषदोमे स्थान-स्थानपर यही बात कही गयी है

कि सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ, परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का कारण हैअतः श्रुति-

प्रमाणसे यही सिद्ध होता है कि सर्वाधार परमात्मा ही सम्पूर्ण जगत्का अभिन्न निमित्तोपादान कारण है; जड प्रकृति नहीं।

vedant darshan adhyay 1 paad 1

सम्बन्ध- स्वाप्ययात्।। सूत्र में जीवात्माके स्व ( परमात्मा ) मे विलीन होनेकी बात

कहकर यह सिद्ध किया गया कि जड प्रकृति जगत्का कारण नहीं है । किन्तु ‘स्व’

शब्द प्रत्यक्चेतन (जीवात्मा ) के अर्थमें भी प्रसिद्ध है। अतः यह सिद्ध करनेके

लिये कि प्रत्यक्चेतन भी जगतका कारण नहीं है, आगेका प्रकरण आरम्भ किया

जाता है । तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्ली में सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन करते हुए सर्वात्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरसे ही आकाश आदिके क्रमसे सृष्टि बतायी

गयी है। (अनु० १, ६, ७)। उसी प्रसङ्गमें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय

और आनन्दमय इन पॉचोका वर्णन आया है। वहाँ क्रमशः अन्नमयका प्राणमय

को, प्राणमयका मनोमयको मनोमयका विज्ञानमयको और विज्ञानमयका आनन्दमय को अन्तरात्मा बताया गया है। आनन्दमयका अन्तरात्मा दूसरे

किसीको नहीं बताया गया है। अपि तु उसीसे जगत्की उत्पत्ति बताकर आनन्दकी

महिमाका वर्गन करते हुए सर्वात्मा आनन्दमयको जाननेका फल उसीकी प्राप्ति

बताया गया और वहीं ब्रह्मानन्दवल्लीको समाप्त कर दिया गया है।
यहाँ यह प्रश्न उठता है कि इस प्रकरणमे आनन्दमय

नामसे किसका वर्णन हुआ है, परमेश्वरका ? या जीवात्माका ? अथवा अन्य किसीका ? इसपर कहते है

आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥ १।१ । १२ ॥

व्याख्या- किसी बातको दृढ करनेके लिये वारंबार दुहरानेको ‘अभ्यास’ कहते हैं ।

तैत्तिरीय तथा बृहदारण्यक आदि अनेक उपनिषदोमे आनन्द’ शब्द का ब्रह्मके

अर्थमे वारंवार प्रयोग हुआ है; जैसे-तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मवल्लीके छठे अनुवाकमे आनन्दमय’ का वर्णन आरम्भ करके सातवे अनुवाकमे उसके लिये

‘रसो वै सः । रस ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति । को ह्येवान्यात् कः

प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् । एष ह्येवानन्दयाति’ (२ । ७) अर्थात् ‘वह आनन्दमय ही

रसस्वरूप है, यह जीवात्मा इस रसस्वरूप परमात्माको पाकर आनन्द

युक्त हो जाता है । यदि वह आकाशकी भॉति परिपूर्ण आनन्दस्वरूप परमात्मा नहीं होता

तो कौन जीवित रह सकता, कौन प्राणोंकी क्रिया कर सकता ! सचमुच यह परमात्मा ही सबको आनन्द प्रदान करता है। ऐसा कहा गया है। तथा

‘सैषाऽऽनन्दस्य मीमा५सा भवति,’ ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति । (ते. उ०२ । ८) ‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चना’ (तै० उ०२।९) ‘आनन्दो ब्रह्मेति

व्यजानात्’ (ते० उ० ३ । ६) विज्ञानमानन्द ब्रह्म’ (बृह. उ०३।९।२८) इत्यादि प्रकारसे श्रुतियोमें जगह-जगह परब्रह्मके अर्थमें आनन्द’ एवं ‘आनन्दमय’ शब्दका

प्रयोग हुआ है । इसलिये आनन्दमय’ नामसे यहाँ उस सर्वशक्तिमान् , समस्त जगतके परम कारण,

सर्वनियन्ता, सर्वव्यापी, सबके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं ।

सम्बन्ध- यहाँ यह शङ्का होती है कि ‘आनन्दमय’ शब्दमे जो ‘मयट्’ प्रत्यय है,

वह विकार अर्थका बोधक हे और परब्रह्म परमात्मा निर्विकार है। अतः जिस प्रकार

अन्नमय आदि शब्द ब्रह्मके वाचक नहीं हैं, वैसे ही, उन्ही के साथ आया हुआ

यह ‘आनन्दमय शब्द भी परब्रह्मका वाचक नहीं होना चाहिये । इसपर कहते हैं

विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ॥ १।१।१३ ॥

चेत् यदि कहो विकारशब्दात्-मयट् प्रत्यय विकारका बोधक होनेसे; न-आनन्दमय शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता, इति-तो यह कथन न ठीक नहीं

है। प्राचुर्यात्-क्योंकि ‘मयट’ प्रत्यय यहाँ प्रचुरताका बोधक है ( विकारको नहीं )।

व्याख्या- ‘तत्प्रकृतवचने मयट’ (पा० सू० ५।४ । २१ ) इस पाणिनि सूत्रके अनुसार प्रचुरताके अर्थमें भी ‘मयट्’ प्रत्यय होता है; अतः यहाँ ‘आनन्द मय’ शब्दमे जो

‘मयट’ प्रत्यय है, वह विकारका नहीं, प्रचुरता-अर्थका ही बोधक है

अर्थात् वह ब्रह्म आनन्दघन है, इसीका घोतक है। इसलिये यह कहना ठीक नहीं है कि

आनन्दमय शब्द
ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता । परब्रह्म परमेश्वर आनन्दधनस्वरूप है, इसलिये उसे ‘आनन्दमय’ कहना सर्वथा उचित है ।

सम्बन्ध- यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जब

‘मयट्’ प्रत्यय विकारका बोधक भी होता है, तब यहाँ उसे प्रचुरताका ही बोधक क्यों माना जाय ? विकारबोधक क्यों

न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं,

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तहेतुव्यपदेशाच्च ॥ १।१।१४ ॥

तद्धेतुव्यपदेशात् ( उपनिषदोंमे ब्रह्मको ) उस आनन्दका हेतु बताया गया है, इसलिये; च=भी (यहाँ मयट् प्रत्यय विकार-अर्थका बोधक नहीं है)।

व्याख्या- पूर्वोक्त प्रकरणमे आनन्दमयको आनन्द प्रदान करनेवाला बताया गया

है (ते० उ० २ । ७)। जो सबको आनन्द प्रदान करता है, वह स्वयं आनन्दधन है,

इसमें तो कहना ही क्या है, क्योंकि जो अखण्ड आनन्दका भण्डार होगा, वही

सदा सबका आनन्द प्रदान कर सकेगा। इसलिये यहाँ मयट् प्रत्ययको विकारका

बोधक न मानकर प्रचुरताका बोधक मानना ही ठीक है ।

सम्बन्ध- केवल मयट प्रत्यय प्रचुरताका बोधक होनेसे ही यहाँ ‘आनन्द मय’ शब्द ब्रह्मका वाचक है, इतना ही नहीं किन्तु

मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॥ १।१।१५॥

व्याख्या- तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीके आरम्भमे जो यह मन्त्र आया है

कि सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान्

कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ।’ अर्थात् ‘ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप सूत्र १४-१७] और

अनन्त है । वह ब्रह्म विशुद्ध आकाशस्वरूप परम धाममे रहते हुए ही सब के

हृदयरूप गुफामे छिपा हुआ है । जो उसको जानता है, वह सबको भली भोति

जाननेवाले ब्रह्मके साथ समस्त भोगोका अनुभव करता है । इस मन्त्रद्वारा वर्णित

ब्रह्मको यहाँ मान्त्रत्रर्णिक’ कहा गया है । जिस प्रकार उक्त मन्त्रमे उस परब्रह्मको

सबका अन्तरात्मा बताया गया है, उसी प्रकार ब्राह्मण-ग्रन्थमे ‘आनन्द मय’को

सबका अन्तरात्मा कहा है, इस प्रकार दोनो स्थलोकी एकताके लिये यही मानना

उचित है कि ‘आनन्दमय’ शब्द यहाँ ब्रह्मका ही वाचक है, अन्य किसी का नहीं।

सम्बन्ध यदि आनन्दमय’ शब्दको जीवात्माका वाचक मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं

नेतरोऽनुपपत्तेः ॥ १।१।१६ ॥

व्याख्या- नैतिशेयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्ली में आनन्दमयका वर्णन करनेके

अनन्तर यह बात कही गयी है कि ‘उस आनन्दमय परमात्माने यह इच्छा की कि

मैं बहुत होऊँ फिर उसने तप ( सङ्कल्प ) किया । तप करके इस समस्त जगतकी

रचना की। (नै० उ०२।६) यह कथन जीवात्माके लिये उपयुक्त नहीं है। क्योकि

जीवात्मा अल्पन्न और परिमित शक्तिवाला है; जगत्की रचना आदि कार्य करने

की उसमे सामर्थ्य नहीं है । अत: आनन्दमय’ शब्द जीवात्मा का बाचक नहीं हो सकता।

सम्बन्ध- यही बात सिद्द करनेके लिये दूसरा कारण वतलात हैं

भेदव्यपदेशाच्च ।। १।१।१७ ॥

व्याख्या-उक्त वल्लीम आगे चलकर (सातवे अनुवाकमे) कहा है कि यह जो

ऊपरके वर्णनमे ‘सुकृत’नामसे कहा गया है, वही रसस्वरूप है । यह जीवात्मा

इस रसस्वरूप परमात्माको पाकर आनन्दयुक्त हो जाता है।’ इस प्रकार यहाँ परमात्माको आनन्ददाता और जीवात्माको उसे पाकर आनन्दयुक्त होनेवाला

बताया गया है । इससे दोनोंका भेद सिद्ध होता है । इसलिये भी ‘आनन्दमय’ शब्द जीवात्माका वाचक नहीं है।

सम्बन्ध- आनन्दका हेतु जो सत्त्वगुण है, वह त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिमें भी विद्यमान है ही,

अत: आनन्दमय’ शब्दको प्रकृतिका ही वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर

कामाच्च नानुमानापेक्षा ॥ १।१।१८ ॥

व्याख्या- उपनिषद्मे जहाँ ‘आनन्दमय’का प्रसङ्ग आया है,

वहाँ ‘सोऽकाम यत’ इस वाक्यके द्वारा आनन्दमयमे सृष्टिविषयक कामनाका होना बताया गया है, जो कि

जड प्रकृतिके लिये असम्भव है । अतः उस प्रकरणमें वर्णित

आनन्द मय’ शब्दसे जड प्रकृतिको नहीं ग्रहण किया जा सकता ।

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patanjali, yog darshan sadhanpaad. समाधिपाद-१

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योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः

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योग-दर्शन का बीज सूक्त। महर्षि पतञ्जलि-महर्षि पतञ्जलि कृत

पतञ्जलि योग-दर्शन’ आत्म-भू-योग दर्शन है। यह अनन्य, अनूठा और अनुपमेय योग-दर्शन, जो अपने लिए आप ही प्रमाण है।
इस अपूर्व और अद्भुत ग्रंथ के समान अन्य कोई यौगिक ग्रंथ है ही नहीं। एक

तरह से इसे प्रकृति की अद्भुत और चमत्कृत घटना कह सकते हैं।
पतञ्जलि योग-दर्शन प्रामाणिक व अद्वितीय योग-दर्शन ग्रंथ है।

यद्यपि ‘गीता’ में (2-39, 5-2) योग के संदर्भ में सांख्य-दर्शन की पुष्टि है,


जिसके प्रणेता ऋषि कपिल थे। सांख्य-दर्शन का मूल वैदिक दर्शन है और योग-दर्शन सांख्य पर आधारित है।

ऋषि पतञ्जलि शुद्ध, बुद्ध, प्रबुद्ध मानसिकता के प्रखर आध्यात्मिक दार्शनिक हैं,

जो काव्य सौंदर्य की भाषा में नहीं, वरन् गणितीय भाषा में बात करते हैं।

योग-दर्शन के सूत्रात्मक संकेत गणितीय भाषा में अध्यात्म के पथ पर क्रमशः चलाते हुए ब्रह्म-रंध्र तक ले जाते हैं।

यह वैज्ञानिक भाषा में लिखा गया अध्यात्म है। अष्टांग योग के प्रथम पाँच चरणों में

मानव देह के सुप्त बिंदुओं को जाग्रत् कर तन को प्राणायाम से शुद्ध, स्वस्थ और नीरोगी करना है।

धारणा, ध्यान, समाधि-यह अंतर्मन की चित्तवृत्तियों का दर्शन और निर्मलीकरण है।

कल्पों पूर्व अभूतपूर्व प्रज्ञा दृष्टि से ऋषियों की अंतश्चेतना में अनुभूत शाश्वत सत्य कितने सार्थक और सटीक हैं।

कदाचित् आज से अधिक इनकी उपादेयता कभी न रही होगी। यह सर्वथा

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कालातीत और कालजयी ग्रंथ त्रिकालदर्शी तत्त्वों का समीकरण है,

जबकि हम केवल तत्कालदर्शी हैं। ऋषि पतञ्जलि कृत ‘पतञ्जलि योग-दर्शन’ के

यौगिक ग्रंथ में जो देह, मन, चित्त के गुण, स्वभाव और विकारों का विवेचन करते

हुए चित्तवृत्तियों के पूर्ण संयम, निरोध, साधना और अंत में अपने कारण में विलीन

को ही योग मानते हैं। योग प्रभाव और अव्यय (उत्पत्ति और लय) का स्थान है।

यह एक आश्चर्यजनक सत्य है कि महर्षि पतञ्जलि तन और मन दोनों के अध्येता
योग-दर्शन के साथ आयुर्वेद के चिकित्सा-शास्त्र के भी प्रणेता हैं। पाणिनि के

व्याकरण का भाषा-भाष्य भी ऋषि पतञ्जलि का महा अद्भुत भाष्य है। अतः वे

सृष्टि के चरमोत्कर्ष योगाचार्य, आयुर्वेदाचार्य और व्याकरणाचार्य हैं।

प्राणायाम के द्वारा स्वस्थ तन के जो अकाट्य सूत्र दिए हैं,

उन पर विज्ञान भी आज नतमस्तक हो गया है। स्वस्थ तन में ही

स्वस्थ मन और स्वस्थ मन में ही स्वस्थ विचार-शुभ, शांत और

प्राणायाम के द्वारा स्वस्थ तन के जो अकाट्य सूत्र दिए हैं,

उन पर विज्ञान भी आज नतमस्तक हो गया है। स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन और स्वस्थ मन में ही स्वस्थ

विचार-शुभ, शांत और सात्त्विक जीवन-शैली का यही सार योग-दर्शन का ज्ञान है। एक बृहत्तम, एक महत्तम, एक अनन्यतम, प्राण विज्ञान,

जो प्राण वायु से प्राणाधार तक ही पूरा होता है।
इसका प्रथम सूक्त ‘अथ योगानुशासनम्’ एक औपचारिक आरंभिक विषय-परक उद्बोधन तो है,

किंतु इसका दूसरा सूक्त’योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥2॥
और तीसरा सूक्त ‘तदा द्रष्टुः स्वरूपेवस्थानम् ॥3॥

ही मूल केंद्र सूक्त है, जिसकी परिधि में संपूर्ण योग-दर्शन परिक्रमायित है।

योग-दर्शन वस्तुतः ही मूल केंद्र सूक्त है, जिसकी परिधि में संपूर्ण योग-दर्शन

परिक्रमायित है। योग-दर्शन वस्तुतः इन्हीं दो सूक्तों का विस्तार है।

यही वे केंद्र सूक्त हैं, जिनके चारों ओर साधक की-जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, संचित, प्रारब्ध, patanjali darshan

क्रियमाण भूत, वर्तमान, भविष्य, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार की मनोदशाएँ,
भावित भावनाओं की संचेतना परिक्रमा करती हैं, जो योग-दर्शन के अंतिम मंत्र

प्रति प्रसवः कैवल्यं स्वरूप प्रतिष्ठा वाचितिशक्तेरिति-कैवल्यपाद 34 तक जाकर अपने कारण में विलीन हो जाती हैं।

अर्थात् इंद्रियों, मन, चित्त शक्ति का अपने कारण में विलीन होने तक

की यात्रा ही योग-दर्शन का कथ्य और तथ्य विषय हैं।

यही कैवल्य है, यही मोक्ष है, यही निर्वाण है, यही मुक्ति है। कारण में विलीन,

अर्थात् चित्तवृत्ति का मूल उद्गम में लीन होना, अर्थात् अपने निज स्वरूप में स्थित होना है।

वस्तु सब अपनी-अपनी हो जाएँ तो कौन किसका स्वामी और कौन किसका दास है? चित्तवृत्तियों के संयम और निरोध के बाद ही द्रष्टा अपने निज सत्य स्वरूप में अवस्थित हो पाता है।

कर्ता, कर्म, कारण -द्रष्टा, दृश्य, दृग-ग्राह्य, ग्रहण, गृहीता-सभी से निबंध हुआ अपने कारण में विलीन यही बंधन-मुक्त अवस्था है।

योग-दर्शन’ का मंतव्य, गंतव्य और प्रतिपाद्य विषय अपने सत्य स्वरूप कारण में लीन होकर निबंध होना है।

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patanjali yog darshan samadhipaad

समाधिपाद-१

अथ योगानुशासनम्॥१॥

अथ अब; योगानुशासनम् परम्परागत योगविषयक शास्त्र (आरम्भ करते हैं)।

व्याख्या- इस सूत्रमें महर्षि पतञ्जलिने योगके साथ अनुशासन पदका प्रयोग करके योगशिक्षाकी अनादिता सूचित की है,

और अथ शब्दसे उसके आरम्भ करनेकी प्रतिज्ञा करके योगसाधनाकी कर्तव्यता सूचित की है॥१॥

सम्बन्ध- इस प्रकारके योगशास्त्रके वर्णनकी प्रतिज्ञा करके अब योगके सामान्य लक्षण बतलाते हैं

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥२॥
व्याख्या- इस ग्रन्थमें प्रधानतासे चित्तकी वृत्तियोंके निरोधको ही ‘योग’ नामसे कहा गया है ॥२॥

सम्बन्ध-योग शब्दकी परिभाषा करके अब उसका सर्वोपरि फल बतलाते हैं

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥३॥
व्याख्या- जब चित्तकी वृत्तियोंका निरोध हो जाता है, उस समय द्रष्टा (आत्मा) की अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है, अर्थात् वह कैवल्यअवस्थाको प्राप्त हो जाता है (योग• ४ । ३४) ॥३॥ .

सम्बन्ध- क्या चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेके पहले द्रष्टा अपने स्वरूपमें स्थित नहीं रहता इसपर कहते हैं

वत्तिसारूप्यमितरत्र ॥४॥
व्याख्या- जबतक योग-साधनोंके द्वारा चित्तकी वृत्तियोंका निरोध नहीं हो जाता,

तबतक द्रष्टा अपने चित्तकी वृत्तिके ही अनुरूप अपना स्वरूप समझता रहता है, उसे अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान नहीं होता।
अतः चित्तवृत्तिनिरोधरूप योग अवश्य कर्तव्य है ॥४॥

सम्बन्ध- चित्तकी वृत्तियाँ असंख्य होती हैं, अतः उनको पाँच श्रेणियों में बाँटकर सूत्रकार उनका स्वरूप बतलाते हैं

वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥५॥
व्याख्या- ये चित्तकी वृत्तियाँ आगे वर्णन किये जानेवाले लक्षणोंक अनुसार पाँच प्रकारकी होती हैं तथा हर प्रकारकी वृत्तिके दो भेद होते हैं। एक तो क्लिष्ट यानी

अविद्यादि क्लेशोंको पुष्ट करनेवाली और योगसाधनमें विघ्नरूप होती हैं तथा
दूसरी अक्लिष्ट यानी क्लेशोंको क्षय करनेवाली और योगसाधनमें सहायक होती

हैं। साधकको चाहिये कि इस रहस्यको भलीभाँति समझकर पहले अक्लिष्ट वृत्तियोंसे क्लिष्ट वृत्तियोंको हटावे,

फिर उन अक्लिष्ट वृत्तियोंका भी निरोध करके योग सिद्ध करे ॥५॥

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सम्बन्ध- उक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंके लक्षणोंका वर्णन करनेके लिये पहले उनके नाम बतलाते है

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥६॥
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः

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(१) प्रमाण, (२) विपर्यय, | (३) विकल्प, (४) निद्रा, (५) स्मृति-ये पाँच हैं।

व्याख्या- इन पाँचोंके स्वरूपका वर्णन स्वयं सूत्रकारने अगले सूत्रोंमें किया है,

अतः यहाँ उनकी व्याख्या नहीं की गयी है ।। ६॥

सम्बन्ध- उपर्युक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंमेंसे प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाये जाते हैं-

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥ ७ ॥

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम-(ये तीन), प्रमाणानि-प्रमाण हैं।
व्याख्या-प्रमाणवृत्ति तीन प्रकारकी होती है; उसको इस प्रकार समझना चाहिये

(१) प्रत्यक्ष-प्रमाण बुद्धि, मन और इन्द्रियोंके जानने में आनेवाले

जितने भी पदार्थ हैं, उनका अन्तःकरण और इन्द्रियोंके साथ बिना किसी व्यवधानके सम्बन्ध होनेसे जो भ्रान्ति तथा संशयरहित ज्ञान होता है, वह प्रत्यक्ष

अनुभवसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिन प्रत्यक्ष दर्शनोंसे संसारके पदार्थोकी क्षणभङ्गरताका निश्चय होकर या सब प्रकारसे उनमें दुःखकी प्रतीति

होकर (योग० २ । १५) मनुष्यका सांसारिक पदार्थोंमें वैराग्य हो जाता है, जो | चित्तकी वृत्तियोंको रोकने में सहायक हैं,

जिनसे मनुष्यकी योगसाधनमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ते हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति तो अक्लिष्ट है तथा जिन प्रत्यक्ष दर्शनोंसे मनुष्यको सांसारिक पदार्थ

नित्य और सुखरूप होते हैं, भोगोंमें आसक्ति हो जाती है, जो वैराग्यके विरोधी
भावोंको बढ़ानेवाले हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति क्लिष्ट है।

(२) अनुमान-प्रमाण-किसी प्रत्यक्ष दर्शनके सहारे युक्तियोंद्वारा जो अप्रत्यक्ष पदार्थके स्वरूपका ज्ञान होता है, वह अनुमानसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है।

जैसे धूमको देखकर अग्निकी विद्यमानताका ज्ञान होना, नदीमें बाढ़ आया देखकर दूर-देशमें वृष्टि होनेका ज्ञान होना-इत्यादि । इनमें भी जिन अनुमानोंसे मनुष्यको

संसारके पदार्थोंकी अनित्यता, दुःखरूपता आदि दोषोंका ज्ञान होकर उनमें वैराग्य होता है और योगके साधनोंमें श्रद्धा बढ़ती है, जो आत्मज्ञानमें सहायक हैं,

वे सब वत्तियाँ तो अक्लिष्ट हैं और उनके विपरीत वृत्तियाँ क्लिष्ट हैं।
(३) आगम-प्रमाण-वेद, शास्त्र और आप्त (यथार्थ वक्ता) परुषोंके वचनको

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आगम’ कहते हैं। जो पदार्थ मनुष्यके अन्तःकरण और इन्द्रियोंके प्रत्यक्ष नहीं है एवं जहाँ अनुमानकी भी पहुँच नहीं है, उसके स्वरूपका ज्ञान वेद, शास्त्र और

महापुरुषोंके वचनोंसे होता है, वह आगमसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिस आगम-प्रमाणसे मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है (गीता ५।२२) और

योगसाधनोंमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ते हैं, वह तो अक्लिष्ट है और जिस आगम-प्रमाणसे भोगोंमें प्रवृत्ति और योग-साधनों में अरुचि हो, जैसे स्वर्गलोकके भोगोंकी बड़ाई

सुनकर उनमें और उनके साधनरूप सकाम कर्मोंमें आसक्ति और प्रवृत्ति होती है, वह क्लिष्ट है ॥७॥

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सम्बन्ध- प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाकर अब विपर्ययवृत्तिके लक्षण बतलाते हैं

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥८॥
व्याख्या- किसी भी वस्तुके असली स्वरूपको न समझकर उसे दूसरी ही वस्तु समझ लेना-यह विपरीत ज्ञान ही विपर्ययवृत्ति है-जैसे सीपमें चाँदीकी प्रतीति। यह

वृत्ति भी यदि भोगोंमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली और योगमार्गमें श्रद्धा-उत्साह
बढ़ानेवाली हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है।

जिस दुल्टिस आदिके द्वारा वस्तुओका यथार्थ ज्ञान होता है, उन्हींसे जान भा होता है। यह मिथ्या ज्ञान भी कभी-कभी भोगोंमें वैराग्य करनेवाला हो जाता है। जैसे

भोग्य पदार्थोंकी क्षणभङ्गरताको देखकर, अनुमान करके या
सुनकर उनको सर्वथा मिथ्या मान लेना योग-सिद्धान्तके अनुसार विपरीतवृत्ति है; क्योंकि वे परिवर्तनशील होनेपर भी मिथ्या नहीं हैं तथापि यह मान्यता भोगीमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली होनेसे अक्लिष्ट है।

कुछ महानुभावोंके मतानुसार विपर्ययवृत्ति और अविद्या-दोनों एक ही हैं, परंतु यह युक्तिसङ्गत नहीं मालूम होता; क्योंकि अविद्याका नाश तो केवल

असम्प्रज्ञातयोगसे ही होता है (योग०४।२९-३०) जहाँ प्रमाणवृत्ति भी नहीं रहती। किंतु विपर्ययवृत्तिका नाश तो प्रमाणवृत्तिसे ही हो जाता है। इसके सिवा

योगशास्त्रके मतानुसार विपर्यय ज्ञान चित्तकी वृत्ति है, किंतु अविद्या चित्तवृत्ति नहीं मानी गयी है, क्योंकि वह द्रष्टा और दुश्यके स्वरूपकी उपलब्धिमें हेतुभूत

संयोगकी भी कारण है (योग० २।२३-२४) तथा अस्मिता और राग आदि क्लेशोंकी भी कारण है (योग० २।४), इसके अतिरिक्त प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्ति नहीं है,

परंतु राग-द्वेषादि क्लेशोंका वहाँ भी सद्भाव है, इसलिये भी विपर्ययवृत्ति और अविद्याकी एकता नहीं हो सकती; क्योंकि विपर्ययवृत्ति तो कभी होती है और

कभी नहीं होती, किंतु अविद्या तो कैवल्य-अवस्थाकी प्राप्तितक निरन्तर विद्यमान रहती है। उसका नाश होनेपर तो सभी वृत्तियोंका धर्मी स्वयं चित्त भी अपने

कारणमें विलीन हो जाता है (योग० ४ । ३२)। परंतु प्रमाणवृत्तिके समय विपर्ययवृत्तिका अभाव हो जानेपर भी न तो राग-द्वेषोंका नाश होता है तथा न द्रष्टा

और दृश्यके संयोगका ही। इसके सिवा प्रमाणवृत्ति क्लिष्ट भी होती है, परंतु जिस यथार्थ ज्ञानसे अविद्याका नाश होता है, वह क्लिष्ट नहीं होता। अतः यही मानना

ठीक है कि चित्तका धर्मरूप विपर्ययवृत्ति अन्य पदार्थ है,

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तथा पुरुष और प्रकृतिके संयोगकी कारणरूपा अविद्या उससे सर्वथा भिन्न है।॥ ८॥

सम्बन्ध- अब विकल्पवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥९॥
शब्दज्ञानानुपाती-जो ज्ञान शब्दजनित ज्ञानके साथ-साथ होनेवाला है,

बाढ़ आया देखकर दूर-देशमें वृष्टि होनेका ज्ञान होना-इत्यादि । इनमें भी जिन अनुमानोंसे मनुष्यको संसारके पदार्थोंकी अनित्यता, दुःखरूपता आदि दोषोंका

ज्ञान होकर उनमें वैराग्य होता है और योगके साधनोंमें श्रद्धा बढ़ती है, जो आत्मज्ञान में सहायक हैं, वे सब वृत्तियाँ तो अक्लिष्ट हैं और उनके विपरीत वृत्तियाँ

क्लिष्ट हैं। (३) आगम-प्रमाण-वेद, शास्त्र और आप्त (यथार्थ वक्ता) पुरुषोंके वचनको ‘आगम’ कहते हैं। जो पदार्थ मनुष्यके अन्तःकरण और इन्द्रियोंके प्रत्यक्ष

नहीं है एवं जहाँ अनुमानकी भी पहुँच नहीं है, उसके स्वरूपका ज्ञान वेद, शास्त्र और महापुरुषों के वचनोंसे होता है, वह आगमसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिस

आगम-प्रमाणसे मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है (गीता ५। २२) और योगसाधनोंमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ते हैं, वह तो अक्लिष्ट है और जिस आगम-प्रमाणसे

भोगोंमें प्रवृत्ति और योग साधनोंमें अरुचि हो, जैसे स्वर्गलोकके भोगोंकी बड़ाई सुनकर उनमें और उनके साधनरूप सकाम कर्मोंमें आसक्ति और प्रवृत्ति होती

है, वह क्लिष्ट है ॥७॥ patanjali yog darshan

सम्बन्ध- प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाकर अब विपर्ययवृत्तिके लक्षण बतलाते हैं,

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥ ८॥
व्याख्या-किसी भी वस्तुके असली स्वरूपको न समझकर उसे दूसरी ही वस्तु समझ लेना-यह विपरीत ज्ञान ही विपर्ययवृत्ति है-जैसे सीपमें चाँदीकी प्रतीति ।

यह वृत्ति भी यदि भोगोंमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली और योगमार्गमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ानेवाली हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है।

जिन इन्द्रिय आदिके द्वारा वस्तुओंका यथार्थ ज्ञान होता है, उन्हींसे विपरीत ज्ञान भी होता है। यह मिथ्या ज्ञान भी कभी-कभी भोगोंमें वैराग्य करनेवाला हो जाता

है। जैसे भोग्य पदार्थोंकी क्षणभङ्गरताको देखकर, अनुमान करके या सुनकर उनकोसर्वथा मिथ्या मान लेना योग-सिद्धान्तके अनुसार विपरीतवृत्ति है, क्योंकि

वे परिवर्तनशील होनेपर भी मिथ्या नहीं हैं । तथापि यह मान्यता भोगीमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली होनेसे अक्लिष्ट है। कुछ महानुभावोंके मतानुसार विपर्ययवृत्ति

और अविद्या-दोनों एक ही हैं, परंतु यह युक्तिसङ्गत नहीं मालूम होता क्योंकि अविद्याका नाश तो केवल असम्प्रज्ञातयोगसे ही होता है (योग० ४ । २९-३०) जहाँ

प्रमाणवृत्ति भी नहीं रहती। किंतु विपर्ययवृत्तिका नाश तो प्रमाणवृत्तिसे ही हो जाता है। इसके सिवा योगशास्त्रके मतानुसार विपर्यय ज्ञान चित्तकी वृत्ति है, किंतु

अविद्या चित्तवृत्ति नहीं मानी गयी है; क्योंकि वह द्रष्टा और दृश्यके स्वरूपकी उपलब्धिमें हेतुभूत संयोगकी भी कारण है (योग० २।२३-२४) तथा अस्मिता और

राग आदि क्लेशोंकी भी कारण है (योग० २।४), इसके अतिरिक्त प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्ति नहीं है, परंतु राग-द्वेषादि क्लेशोंका वहाँ भी सद्भाव है, इसलिये भी

विपर्ययवृत्ति और अविद्याकी एकता नहीं हो सकती; क्योंकि विपर्ययवृत्ति तो कभी होती है, और कभी नहीं होती, किंतु अविद्या तो कैवल्य-अवस्थाकी प्राप्तितक

निरन्तर विद्यमान रहती है। उसका नाश होनेपर तो सभी वत्तियोंका धर्मी स्वयं चित्त भी अपने कारणमें विलीन हो जाता है (योग० ४ । ३२)। परंतु प्रमाणवृत्तिके

समय विपर्ययवृत्तिका अभाव हो जानेपर भी न तो राग-द्वेषोंका नाश होता है तथा न द्रष्टा और दृश्यके संयोगका ही। इसके सिवा प्रमाणवृत्ति क्लिष्ट भी होती है;

परंतु जिस यथार्थ ज्ञानसे अविद्याका नाश होता है, वह क्लिष्ट नहीं होता। अतः यही मानना ठीक है कि चित्तका धर्मरूप विपर्ययवृत्ति अन्य पदार्थ है तथा पुरुष

और प्रकृतिके संयोगकी कारणरूपा अविद्या उससे सर्वथा भिन्न है॥८॥

सम्बन्ध- अब विकल्पवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं,

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥९॥

patanjali yog darshan

व्याख्या- केवल शब्दके आधारपर बिना हुए पदार्थकी कल्पना करनेवाली जो

चित्तकी वत्ति है, वह विकल्पवृत्ति है। यह भी यदि वैराग्यकी वृद्धिमें हेतु, योगसाधनों में श्रद्धा और उत्साह बढ़ानेवाली तथा आत्मज्ञानमें सहायक हो तो

अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है। आगम-प्रमाणजनित वृत्तिसे होनेवाले विशुद्ध संकल्पोंके सिवा सुनीसुनायी बातोंके आधारपर मनुष्य जो नाना प्रकारके व्यर्थ

संकल्प करता रहता है, उन सबको विकल्पवृत्तिके ही अन्तर्गत समझना चाहिये। विपर्ययवृत्तिमें तो विद्यमान वस्तुके स्वरूपका विपरीत ज्ञान होता है और

विकल्पवृत्तिमें अविद्यमान वस्तुकी शब्दज्ञानके आधारपर कल्पना होती है, यहीं विपर्यय और विकल्पका भेद है। जैसे कोई मनुष्य सुनी-सुनायी बातोंके आधारपर

अपनी मान्यताके अनुसार भगवान्के रूपकी कल्पना करके भगवान्का ध्यान करता है, पर जिस स्वरूपका वह ध्यान करता है उसे न तो उसने देखा है. न वेद-

शास्त्रसम्मत है और न वैसा कोई भगवान्का स्वरूप वास्तवमें है ही, केवल कल्पनामात्र ही है। यह विकल्पवृत्ति मनुष्यको भगवान्के चिन्तनमें लगानेवाली

होनेसे अक्लिष्ट है;

दूसरी जो भोगोंमें प्रवृत्त करनेवाली विकल्पवृत्तियाँ हैं,

वे क्लिष्ट हैं। इसी प्रकार सभी वृत्तियोंमें क्लिष्ट और अक्लिष्टका भेद समझ लेना चाहिये ॥९॥

सम्बन्ध- अब निद्रावृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं।

अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥१०॥
व्याख्या- जिस समय मनुष्यको किसी भी विषयका ज्ञान नहीं रहता केवलमात्र ज्ञानके अभावकी ही प्रतीति रहती है, वह ज्ञानके अभावका ज्ञान जिस चित्तवृत्तिके

आश्रित रहता है, वह निद्रावत्ति है।* निद्रा भी चित्तकी वृत्तिविशेष है, तभी तो मनुष्य गाढ़ निद्रासे उठकर कहता है कि मुझे आज ऐसी गाढ़ निद्रा आयी जिसमें

किसी बातकी कोई खबर नहीं रही। इस स्मृतिवृत्तिसे ही यह सिद्ध होता है कि निद्रा भी एक वृत्ति है, नहीं तो जगनेपर उसकी स्मृति कैसे होती।

निद्रा भी क्लिष्ट और अक्लिष्ट दो प्रकारकी होती है। जिस निद्रासे जगनेपर साधकके मन और इन्द्रियोंमें सात्त्विकभाव भर जाता है, आलस्यका नाम-निशान

नहीं रहता तथा जो योगसाधनमें उपयोगी और आवश्यक मानी गयी है। (गीता ६।१७) ,वह अक्लिष्ट है, दूसरे प्रकारकी निंद्रा उस अवस्थामें परिश्रमके अभावका

बोध कराकर विश्रामजनित सुखमें आसक्ति उत्पन्न करनेवाली होनेसे क्लिष्ट है ॥ १० ॥

सम्बन्ध- अब स्मृत्तिवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं,

अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः ॥ ११ ॥

व्याख्या- उपर्युक्त प्रमाण, विपर्यय, विकल्प और निद्रा-इन चार प्रकारकी वृत्तियोंद्वारा अनुभवमें आये हुए विषयोंके जो संस्कार चित्तमें पड़े हैं, उनका पुनः

किसी निमित्तको पाकर स्फुरित हो जाना ही स्मृति है। उपर्युक्त
चार प्रकारकी वृत्तियोंके सिवा इस स्मृतिवृत्तिसे जो संस्कार चित्तपर पड़ते हैं ।

उनमें भी पुनः स्मृतिवृत्ति उत्पन्न होती है। स्मृतिवृत्ति भी क्लिष्ट और अक्लिष्ट दोनों ही प्रकारकी होती है। जिस स्मरणसे मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है तथा जो

योगसाधनोंमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ानेवाला एवं आत्मज्ञानमें सहायक है, वह तो अक्लिष्ट है और जिससे भोगोंमें राग-द्वेष बढ़ता है, वह क्लिष्ट है।

स्वप्नको कोई-कोई स्मृतिवृत्ति मानते हैं, परंतु स्वप्नमें जाग्रत्की भाँति सभी वृत्तियोंका आविर्भाव देखा जाता है; अतः उसका किसी एक वृत्तिमें अन्तर्भाव मानना उचित प्रतीत नहीं होता ॥ ११ ॥

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सम्बन्ध- यहाँतक योगकी कर्तव्यता, योगके लक्षण और चित्तवृत्तियोंके लक्षण बतलाये गये; अब उन चित्तवृत्तियोंके निरोधका उपाय बतलाते है,

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १२ ॥

व्याख्या- चित्तकी वृत्तियोंका सर्वथा निरोध करनेके लिये अभ्यास और वैराग्य-ये दो उपाय हैं। चित्तवृत्तियोंका प्रवाह परम्परागत संस्कारोंके बलसे सांसारिक

भोगोंकी ओर चल रहा है। उस प्रवाहको रोकनेका उपाय वैराग्य है और उसे
कल्याणमार्गमें ले जानेका उपाय अभ्यास है * ॥ १२ ॥

सम्बन्ध- उक्त दोनों उपायोंमेंसे पहले अभ्यासका लक्षण बतलाते हैं,

तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ॥ १३॥
व्याख्या- जो स्वभावसे ही चञ्चल है ऐसे मनको किसी एक ध्येयमें स्थिर करनेके लिये बारम्बार चेष्टा करते रहनेका नाम ‘अभ्यास’ है। इसके प्रकार शास्त्रोंमें बहुत

बतलाये गये हैं; इसी पादके ३२ वें सूत्रसे ३९ वेंतक अभ्यासके कुछ भेदोंका वर्णन है; उनमेंसे जिस साधकके लिये जो सुगम हो,

जिसमें उसकी स्वाभाविक रुचि और श्रद्धा हो उसके लिये वही ठीक है ॥ १३ ॥

सम्बन्ध- अब अभ्यासके दृढ़ होनेका प्रकार बतलाते हैं,

स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः ॥१४॥

व्याख्या- अपने साधनके अभ्यासको दृढ़ बनानेके लिये साधकको चाहिये कि साधनमें कभी उकतावे नहीं। यह दृढ़ विश्वास रखे कि किया हुआ अभ्यास कभी

भी व्यर्थ नहीं हो सकता, अभ्यासके बलसे मनुष्य निःसंदेह अपने लक्ष्यकी प्राप्ति कर लेता है। यह समझकर अभ्यासके लिये कालकी अवधि न रखे, आजीवन

अभ्यास करता रहे, साथ ही यह भी ध्यान रखे कि अभ्यासमें व्यवधान (अन्तर) न पड़ने पावे, निरन्तर (लगातार) अभ्यास चलता रहे तथा अभ्यासमें तुच्छ बुद्धि न

करे, उसकी अवहेलना न करे, बल्कि अभ्यासको ही अपने जीवनका आधार बनाकर अत्यन्त आदर और प्रेमपूर्वक उसे साङ्गोपाङ्ग करता रहे। इस प्रकार

किया हुआ अभ्यास दृढ़ होता है * ॥१४॥

सम्बन्ध- अब वैराग्यके लक्षण आरम्भ करते हुए पहले अपर-वैराग्यके लक्षण बतलाते है
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥१५॥

व्याख्या- अन्तःकरण और इन्द्रियोंके द्वारा प्रत्यक्ष अनुभवमें आनेवाले इस लोकके समस्त भोगोंका समाहार यहाँ ‘दष्ट’ शब्दमें किया गया है और जो प्रत्यक्ष

उपलब्ध नहीं हैं, जिनकी बड़ाई वेद, शास्त्र और भोगोंका अनुभव करनेवाले पुरुषोंसे सुनी गयी है, ऐसे भोग्य विषयोंका समाहार् ‘आनुश्रविक’ शब्दमें किया

गया है। उपर्युक्त दोनों प्रकारके भोगोंसे जब चित्त भलीभांति तृष्णारहित हो जाता है, जब उसको प्राप्त करनेकी इच्छाका सर्वथा नाश हो जाता है, ऐसे कामनारहित

चित्तकी जो वशीकार नामक अवस्थाविशेष है, वह ‘अपर-वैराग्य’ है॥१५॥

सम्बन्ध-अब पर-वैराग्यके लक्षण बतलाते है,

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥ १६ ॥

व्याख्या- पहले बतलाये हुए चित्तकी वशीकार-संज्ञारूप वैराग्यसे जब साधककी विषयकामनाका अभाव हो जाता है और उसके चित्तका प्रवाह समानभावसे

अपने ध्येयके अनुभवमें एकाग्र हो जाता है (योग० ३ । १२), उसके बाद समाधि
परिपक्व होनेपर प्रकृति और पुरुषविषयक विवेकज्ञान प्रकट

होता है (योग०३ । ३५), उसके होनेसे जब साधककी तीनों गुणोंमें और उनके कार्यमें किसी प्रकारकी किंचिन्मात्र भी तृष्णा नहीं रहती; (योग० ४ । २६),

जब वह सर्वथा आप्तकाम निष्काम हो जाता है (योग०२ । २७), ऐसी सर्वथा रागरहित अवस्थाको ‘पर-वैराग्य’ कहते हैं * ॥१६॥

सम्बन्ध- इस प्रकार चित्तवृत्ति-निरोधके उपायोंका वर्णन करके अब चित्तवृत्तिनिरोधरूप निर्बीज-योगका स्वरूप बतलानेके लिये पहले उसके पूर्वकी

अवस्थाका सम्प्रज्ञातयोगके नामसे अवान्तर भेदोंके सहित वर्णन करते हैं,

वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात्सम्प्रज्ञातः ॥ १७॥

व्याख्या- सम्प्रज्ञातयोगके ध्येय पदार्थ तीन माने गये हैं-(१) ग्राह्य (इन्द्रियोंके स्थूल और सूक्ष्म विषय), (२) ग्रहण (इन्द्रियाँ और अन्तःकरण) तथा (३) ग्रहीता (बुद्धिके

साथ एकरूप हुआ पुरुष) (योग० १४१)। जब ग्राह्य पदार्थोक स्थूलरूपमें
समाधि की जाती है, उस समय समाधिमें जबतक शब्द, अर्थ और ज्ञानका

विकल्प वर्तमान रहता है, तबतक तो वह सवितर्क समाधि है; और जब इनका विकल्प नहीं रहता, तब वही निर्वितर्क कही जाती है। इसी प्रकार जब ग्राह्य और

ग्रहणके सूक्ष्मरूपमें समाधि की जाती है उस समय समाधिमें जबतक शब्द, अर्थ और ज्ञानका विकल्प रहता है, तबतक वह सविचार और जब इनका विकल्प

नहीं रहता, तब वही निर्विचार कही जाती है। जब निर्विचार समाधिमें विचारका
सम्बन्ध तो नहीं रहता, परंतु आनन्दका अनुभव और अहङ्कारका सम्बन्ध रहता है,

तबतक वह आनन्दानगता समाधि है और जब उसमें आनन्दकी प्रतीति भी लप्त हो जाती है, तब वही केवल अस्मितानुगत समझी जाती है। यही निर्विचार

समाधिकी निर्मलता है, इनका विस्तृत विचार इसी पादके ४१ वें सूत्रसे ४९ वेंतक किया। गया है ॥ १७॥

सम्बन्ध- अब उस अन्तिम योगका स्वरूप बतलाते हैं, जिसके सिद्ध होनेपर द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है (योगः १।३); जो कि इस शास्त्रका मुख्य प्रतिपाद्य है जिसे कैवल्य-अवस्था भी कहते हैं,

विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ॥ १८॥

patanjali !! yog darshan

व्याख्या- साधकको जब पर-वैराग्यकी प्राप्ति हो जाती है, उस समय स्वभावसे ही चित्त संसारके पदार्थों की ओर नहीं जाता। वह उनसे अपने-आप उपरत हो जाता

है। उस उपरत-अवस्थाकी प्रतीतिका नाम ही यहाँ विराम-प्रत्यय है।
इस उपरतिकी प्रतीतिका अभ्यास-क्रम भी जब बंद हो जाता है, उस समय

चित्तकी वृत्तियोंका सर्वथा अभाव हो जाता है (योग० १।५१); केवलमात्र
अन्तिम उपरत-अवस्थाके संस्कारोंसे युक्त चित्त रहता है (योग०३।९-१०)। फिर

निरोध-संस्कारोंके क्रमकी समाप्ति होनेसे वह चित्त भी अपने कारणमें लीन हो जाता है (योग०४।३२-३४) अतः प्रकृतिके संयोगका अभाव हो जानेपर द्रष्टाकी

अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है। इसीको असम्प्रज्ञातयोग, निर्बीजसमाधि (योग० ११५१) और कैवल्य-अवस्था (योग० २।२५; ३ । ५५:४ । ३४) आदि नामोंसे कहा गया है ॥१८॥

सम्बन्ध- यहाँतक योग और उसके साधनोंका संक्षेपमें वर्णन किया गया,

अब किस प्रकारके साधकका उपर्युक्त योग शीघ्र-से-शीघ्र सिद्ध होता है, यह समझानेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है,

भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥ १९ ॥ patanjali yog darshan

व्याख्या- जो पूर्वजन्ममें योगका साधन करते-करते विदेहअवस्थातक पहुँच चुके थे; अर्थात् शरीरके बन्धनसे छूटकर शरीरके बाहर स्थिर होनेका जिनका अभ्यास

दृढ़ हो चुका था, जो ‘महाविदेह’ स्थितिको प्राप्त कर चुके थे (योग० ३।४३),
एवं जो साधन करते-करते ‘प्रकृतिलय’ (योग० १ । ४५; ३ । ४८) तककी स्थिति

प्राप्त कर चुके थे, किंतु कैवल्य-पदकी प्राप्ति होनेके पहले जिनकी मृत्यु हो गयी, उन दोनों प्रकारके योगियोंका जब पुनर्जन्म होता है, जब वे योगभ्रष्ट साधक पुनः

योगिकुलमें जन्म ग्रहण करते हैं; तब उनको पूर्वजन्मके योगाभ्यास-विषयक संस्कारोंके प्रभावसे अपनी स्थितिका तत्काल ज्ञान हो जाता है (गीता ६।४२-४३)

और वे साधनकी परम्पराके बिना ही निर्बीजसमाधिअवस्थाको प्राप्त कर लेते हैं।
उनकी निर्बीजसमाधि उपायजन्य नहीं है, अतः उसका नाम ‘भवप्रत्यय’ है अर्थात्

वह ऐसी समाधि है कि जिसके सिद्ध होनेमें पुनः मनुष्यजन्म प्राप्त होना ही कारण है, साधनसमुदाय नहीं ॥ १९॥

सम्बन्ध- दूसरे साधकोंका योग कैसे सिद्ध होता है? सो बतलाते हैं,

श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥ २०॥

व्याख्या- किसी भी साधनमें प्रवृत्त होनेका और अविचल भावसे उसमें लगे रहनेका मूल कारण श्रद्धा (भक्तिपूर्वक विश्वास) ही है। श्रद्धाकी कमीके कारण ही

साधकके साधनकी उन्नतिमें विलम्ब होता है, अन्यथा कल्याणके साधनमें विलम्बका कोई कारण नहीं है। साधनके लिये किसी अप्राप्त योग्यता और

परिस्थितिकी आवश्यकता नहीं है। इसीलिये सूत्रकारने श्रद्धाको पहला स्थान दिया है। श्रद्धाके साथ साधकमें वीर्य अर्थात् मन, इन्द्रिय और शरीरका सामर्थ्य

भी परम आवश्यक है; क्योंकि इसीसे साधकका उत्साह बढ़ता है। श्रद्धा और वीर्य-इन दोनोंका संयोग मिलनेपर साधककी स्मरणशक्ति बलवती हो जाती है

तथा उसमें योगसाधनके संस्कारोंका ही बारम्बार प्राकट्य होता रहता है; अतः उसका मन विषयोंसे विरक्त होकर समाहित हो जाता है। इसीको समाधि कहते

हैं (योग० १।४६; ३ । ३)। इससे अन्तःकरण स्वच्छ हो जानेपर साधककी बुद्धि ‘ऋतम्भरा’-सत्यको धारण करनेवाली हो जाती है (योग० १।४८)। इस बुद्धिका ही

नाम समाधिप्रज्ञा है। अतएव पर-वैराग्यकी प्राप्तिपूर्वक साधकका निर्बीजसमाधिरूप योग सिद्ध हो जाता है। गीतामें भी कहा है

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ (४।३९) जितेन्द्रिय साधनपरायण और श्रद्धावान्

मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होकर वह बिना विलम्बके-तत्काल ही परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ २०॥

सम्बन्ध- अब अभ्यास-वैराग्यकी अधिकताके कारण योगकी सिद्धि शीघ्र और अति शीघ्र होनेकी बात कहते हैं,

तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥ २१॥
तीव्रसंवेगानाम्-जिनके साधनकी गति तीव्र हैं, उनकी (निर्बीजसमाधि); आसन्नः-शीघ्र (सिद्ध) होती है।

व्याख्या- जिन पुरुषोंका साधन (अभ्यास और वैराग्य) तेजीसे चलता है, जो सब प्रकारकी विघ्न-बाधाओंको ठुकराकर

अपने साधनमें तत्परतासे लगे रहते हैं, उनका योग शीघ्र सिद्ध होता है ॥२१॥
सम्बन्ध-किंतु

मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः ॥ २२॥

व्याख्या- किसका साधन किस दर्जेका है; इसपर भी योग-सिद्धिकी शीघ्रताका विभाग निर्भर करता है; क्योंकि क्रियात्मक अभ्यास और वैराग्य तीव्र होनेपर भी

विवेक और भावकी न्यूनाधिकताके कारण समाधि सिद्ध होनेके कालमें भेद होना
स्वाभाविक है। जिस साधकमें श्रद्धा, विवेकशक्ति और भाव कुछ उन्नत हैं,

उसका साधन मध्यमात्रावाला है और जिस साधकमें श्रद्धा, विवेक और भाव अत्यन्त उन्नत हैं, उसका साधन अधिमात्रावाला है। साधनमें क्रियाकी अपेक्षा

भावका अधिक महत्त्व है। अभ्यास और वैराग्यका जो क्रियात्मक
बाह्य स्वरूप है, वह तो ऊपरवाले सूत्रमें ‘वेग’के नामसे कहा गया है;

और उनका जो भावात्मक आभ्यन्तर स्वरूप है, वह उनकी मात्रा यानी दर्जा है। व्यवहारमें भी देखा जाता है कि एक ही कामके लिये समानरूपसे परिश्रम किया

जानेपर भी जो उसकी सिद्धिमें अधिक विश्वास रखता है, जिस मनुष्यको उस कामके करनेकी युक्तिका अधिक ज्ञान है एवं जो उसे प्रेम और उत्साहपूर्वक

बिना उकताये करता रहता है; वह दूसरोंकी अपेक्षा उसे शीघ्र पूरा कर लेता है। वही बात समाधि की सिद्धिमें भी समझ लेनी चाहिये।

समाधिकी प्राप्तिके लिये साधन करनेवालोंमें जिसका साधन श्रद्धा, विवेकशक्ति और भाव आदिकी अधिकताके कारण जितने ऊँचे दर्जेका है और जिसकी

चालका क्रम जितना तेज है, उसीके अनुसार वह शीघ्र या अतिशीघ्र समाधिकी प्राप्ति कर सकेगा। यही बात समझानेके लिये सूत्रकारने उपर्युक्त दो सूत्रोंकी

रचना की है-ऐसा मालूम होता है। अतः साधकको चाहिये कि अपने साधनको

सर्वथा निर्दोष बतानेकी चेष्टा रखे, उसमें किसी प्रकारकी शिथिलता न आने दे॥२२॥

सम्बन्ध- अब पूर्वोक्त अभ्यास और वैराग्यकी अपेक्षा निर्बीज-समाधिका सुगम उपाय बतलाया जाता है, patanjali yog darshan

ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥ २३॥
व्याख्या- ईश्वरकी भक्ति यानी शरणागतिका नाम ‘ईश्वरप्रणिधान’ है (देखिये योग० २१ की व्याख्या): इससे भी निर्बीज-समाधि शीघ्र सिद्ध हो सकती है (योग०

२।४५), क्योंकि ईश्वर सर्वसमर्थ हैं, वे अपने शरणापन्न भक्तपर प्रसन्न होकर उसके भावानुसार सब कुछ प्रदान कर सकते हैं (गीता ४ । ११*) ॥ २३ ॥

सम्बन्ध- अब उक्त ईश्वरके लक्षण बतलाते हैं,

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ २४ ॥

व्याख्या-अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश-ये पाँच ‘
क्लेश’ हैं; इनका विस्तृत वर्णन दूसरे पादके तीसरे सूत्रसे नवेंतक है। ‘कर्म’ चार

प्रकारके हैं-पुण्य, पाप, पुण्य और पापमिश्रित तथा पुण्य-पापसे रहित (योग०४।७)। कर्मके फलका नाम ‘विपाक’ है (योग० २।१३) और कर्मसंस्कारोंके

समुदायका नाम ‘आशय’ है (योग० २।१२) । समस्त जीवोंका इन चारोंसे अनादि सम्बन्ध है।

यद्यपि मुक्त जीवोंका पीछे सम्बन्ध नहीं रहता तो भी पहले सम्बन्ध था ही; किंतु ईश्वरका तो कभी भी इनसे न सम्बन्ध था, न है और न होनेवाला है। इस कारण

उन मुक्त पुरुषोंसे भी ईश्वर विशेष है, यह बात प्रकट करनेके लिये ही सूत्रकारने ‘पुरुषविशेषः’ पदका प्रयोग किया है ।। २४ ।।

सम्बन्ध- ईश्वरकी विशेषताका पुनः प्रतिपादन करते हैं,

तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ॥२५॥

व्याख्या- जिससे बढ़कर कोई दूसरी वस्तु हो, वह सातिशय है और जिससे बड़ा कोई न हो वह निरतिशय है। ईश्वर ज्ञानकी अवधि है, उसका ज्ञान सबसे बढ़कर

है; उसके ज्ञानसे बढ़कर किसीका भी ज्ञान नहीं है; इसलिये उसे निरतिशय कहा गया है। जिस प्रकार ईश्वरमें ज्ञानकी पराकाष्ठा है, उसी प्रकार धर्म, वैराग्य, यश

और ऐश्वर्य आदिकी पराकाष्ठाका आधार भी उसीको समझना चाहिये ॥२५॥

सम्बन्ध- और भी उसकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं,

पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥ २६ ॥

व्याख्या- सर्गके आदिमें उत्पन्न होनेके कारण सबका गुरु ब्रह्माको माना जाता है, परंतु उसका कालसे अवच्छेद है (गीता ८ । १७) । ईश्वर स्वयं अनादि और अन्य

सबका आदि है (गीता १०।२-३); वह कालकी सीमासे सर्वथा अतीत है, वहाँतक कालकी पहुँच नहीं है; क्योंकि वह कालका भी महाकाल है। इसलिये वह सम्पूर्ण

पूर्वजोंका भी गुरु यानी सबसे बड़ा, सबसे पुराना और सबको शिक्षा देनेवाला है (श्वेता०३।४।६।१८) ॥२६॥

सम्बन्ध- ईश्वरकी शरणागतिका प्रकार बतलानेके लिये उसके नामका वर्णन करते हैं,

तस्य वाचकः प्रणवः ॥ २७॥
तस्य-उस ईश्वरका; वाचकः-वाचक (नाम); प्रणवः-प्रणव (ॐ कार) है।
व्याख्या-नाम और नामीका सम्बन्ध अनादि और बड़ा ही घनिष्ठ है।। इसी कारण

शास्त्रोंमें नाम-जपकी बड़ी महिमा है (तुलसी० बाल० दोहा १८ से २७), गीतामें भी जपयज्ञको सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ बतलाया है (१० । २५), ‘ॐ’ उस परमेश्वरका वेदोक्त

नाम होनेसे मुख्य है (गीता १७ । २३; कठ० १।२।१५-१७); इस कारण यहाँ उसीका वर्णन किया गया है। इसी वर्णनसे श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि जितने भी

ईश्वरके नाम हैं, उनके जपका भी माहात्म्य समझ लेना चाहिये ।। २७॥

सम्बन्ध- ईश्वरका नाम बतलाकर अब उसके प्रयोगकी विधि बतलाते हैं,

तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥ २८॥

व्याख्या- साधकको ईश्वरके नामका जप और उसके स्वरूपका स्मरण-चिन्तन करना चाहिये ।* इसीको पूर्वोक्त ईश्वरप्रणिधान अर्थात् ईश्वरकी भक्ति या

शरणागति कहते हैं। ईश्वरकी भक्तिके और भी बहत-से प्रकार हैं, परंतु जप और ध्यान सब साधनोंमें मुख्य होनेके कारण यहाँ सूत्रकारने केवल नाम और नामीके

स्मरणरूप एक ही प्रकारका वर्णन किया है । गीतामें भी इसी तरह वर्णन आया है (८ । १३) । इसे उपलक्षण मानकर भगवद्भक्तिके सभी । साधनोंको ईश्वरकी

प्रसन्नताके नाते निर्बीज समाधिकी सिद्धिमें हेतु समझना चाहिये’ अर्थात् ईश्वरकी भक्तिके सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंका ईश्वरप्रणिधानमें अन्तर्भाव समझना चाहिये ॥ २८॥

सम्बन्ध- अब ईश्वरके नाम-जप और स्वरूपचिन्तनके फलका वर्णन करते हैं,

तनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥ २९ ॥
व्याख्या- अगले दो सूत्रोंमें जिन विघ्नोंका वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है, ईश्वरके भजन-स्मरणसे उनका अपने-आप नाश हो जाता है और अन्तरात्माके

(द्रष्टाके) स्वरूपका ज्ञान होकर कैवल्य-अवस्था भी उपलब्ध हो जाती है। अतः यह निर्बीज-समाधिकी प्राप्तिका बहुत ही सुगम उपाय है॥२९॥

सम्बन्ध- पूर्वसूत्रमें जिन अन्तरायोंका अभाव होनेकी बात कही गयी है, उनके नाम बतलाये जाते हैं,

व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥३०॥
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व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि-व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व

और अनवस्थितत्व-ये नौ; (जो कि) चित्तविक्षेपाःचित्तके विक्षेप हैं; ते वे ही; अन्तरायाः अन्तराय (विघ्न) हैं।

व्याख्या-योगसाधनमें लगे हुए साधकके चित्तमें विक्षेप उत्पन्न करके उसको साधनसे विचलित करनेवाले ये नौ योगमार्गके विघ्न माने गये हैं।

(१) शरीर, इन्द्रियसमुदाय और चित्तमें किसी प्रकारका रोग उत्पन्न हो | जाना ‘व्याधि’ है।

(२) अकर्मण्यता अर्थात् साधनोंमें प्रवृत्ति न होनेका स्वभाव ‘स्त्यान’ है।

(३) अपनी शक्तिमें या योगके फलमें संदेह हो जानेका नाम ‘संशय’ है।
(४) योगसाधनोंके अनुष्ठानकी अवहेलना (बे-परवाही) करते रहना ‘प्रमाद’ है।
(५) तमोगुणकी अधिकतासे चित्त और शरीरमें भारीपन हो जाना और उसके कारण साधनमें प्रवृत्तिका न होना ‘आलस्य’ है।
(६) विषयोंके साथ इन्द्रियोंका संयोग होनेसे उनमें आसक्ति हो

जानेके कारण जो चित्तमें वैराग्यका अभाव हो जाता है, उसे ‘अविरति’ कहते हैं।

(७) योगके साधनोंको किसी कारणसे विपरीत समझना अर्थात् यह साधन ठीक नहीं, ऐसा मिथ्या ज्ञान हो जाना ‘भ्रान्तिदर्शन’ है।

(८) साधन करनेपर भी योगकी भूमिकाओंका अर्थात् साधनकी स्थितिका प्राप्त न होना-यह ‘अलब्धभूमिकत्व’ है; इससे साधकका उत्साह कम हो जाता है।

(९) योगसाधनसे किसी भूमिमें चित्तकी स्थिति होनेपर भी उसका न ठहरना अनवस्थितत्व’ है।

इन नौ प्रकारके चित्तविक्षेपोंको ही अन्तराय, विघ्न और योगके प्रतिपक्षी आदि नामोंसे कहा जाता है ॥ ३०॥

सम्बन्ध- इनके साथ-साथ होनेवाले दूसरे विघ्नोंका वर्णन करते हैं,

दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः ॥ ३१॥

दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासाः दुःख, दौर्मनस्य, अङ्गमेजयत्व, श्वास और प्रश्वास-ये पाँच विघ्न, विक्षेपसहभुवः विक्षेपोंके साथ-साथ होनेवाले हैं।

व्याख्या- उपर्युक्त चित्तविक्षेपोंके साथ-साथ होनेवाले दूसरे पाँच विप्न इस प्रकार हैं
(१) दुःख-आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक-इस तरह दुःखके प्रधानतया तीन भेद माने गये हैं। काम-क्रोधादिके कारण व्याधि आदिके कारण

या इन्द्रियोंमें किसी प्रकारकी विकलता होनेके कारण जो मन, इन्द्रिय या शरीरमें ताप या पीड़ा होती है, उसको ‘आध्यात्मिक दुःख’ कहते हैं। मनुष्य, पशु, पक्षी,

सिंह, व्याघ्र, मच्छर और अन्यान्य जीवोंके कारण होनेवाली पीड़ाका नाम ‘आधिभौतिक दुःख’ है तथा सर्दी, गर्मी, वर्षा, भूकम्प आदि दैवी घटनासे होनेवाली

पीड़ाका नाम ‘आधिदैविक दुःख’ है।

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(२) दौर्मनस्य-इच्छाकी पूर्ति न होनेपर जो मनमें क्षोभ होता है, उसे ‘दौर्मनस्य’ कहते हैं।

(३) अङ्गमेजयत्व-शरीरके अङ्गोंमें कम्प होना, ‘अङ्ग-मेजयत्व’ है।

(४) श्वास-बिना इच्छाके बाहरकी वायुका भीतर प्रवेश कर जाना अर्थात् बाहरी कुम्भकमें विघ्न हो जाना ‘श्वास’ है।

(५) प्रश्वास-बिना इच्छाके ही भीतरकी वायुका बाहर निकल जाना अर्थात् भीतरी कुम्भकमें विघ्न हो जाना ‘प्रश्वास’ है।

ये पाँचों विक्षिप्त चित्तमें ही होते हैं, समाहित चित्तमें नहीं; इसलिये इनको ‘विक्षेपसहभू’ कहते हैं ॥ ३१ ॥

सम्बन्ध- उक्त विनोंको दूर करनेका दूसरा उपाय बतलाते हैं,

तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥ ३२ ॥

व्याख्या- उपर्युक्त दोनों प्रकारके विघ्नोंका नाश ईश्वर-प्रणिधानसे तो होता ही है, उसके सिवा यह दूसरा उपाय बतलाया गया है। भाव यह कि किसी एक वस्तुमें

चित्तको स्थित करनेका बार-बार प्रयत्न करनेसे भी एकाग्रता उत्पन्न होकर विनोंका नाश हो जाता है; अतः यह साधन भी किया जा सकता है ॥ ३२॥

सम्बन्ध- चित्तके अन्तरालमें राग-द्वेषादि मल रहनेके कारण मलिन चित्त स्थिर नहीं होता, अतः चित्तको निर्मल बनानेका सुगम उपाय बतलाते हैं,

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥ ३३ ॥

सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणाम्-सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा . और पापात्मा-ये चारों जिनके क्रमसे विषय हैं, ऐसी; मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणाम्-मित्रता, दया, प्रसन्नता

और उपेक्षाकी; भावनातः भावनासे; चित्तप्रसादनम्-चित्त स्वच्छ हो जाता है।

व्याख्या- सुखी मनुष्योंमें मित्रताकी भावना करनेसे, दुःखी मनुष्योंमें दयाकी भावना करनेसे, पुण्यात्मा पुरुषोंमें प्रसन्नताकी भावना करनेसे और पापियोंमें

उपेक्षाकी भावना करनेसे चित्तके राग, द्वेष, घृणा, ईर्ष्या और क्रोध आदि मलोंका

नाश होकर चित्त शुद्ध-निर्मल हो जाता है। अतः साधकको इसका अभ्यास करना चाहिये ॥ ३३ ॥

सम्बन्ध- चित्तशुद्धिका दूसरा उपाय बतलाते हैं,

प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ।। ३४ ॥

व्याख्या- बारम्बार प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालनेका तथा यथाशक्ति बाहर

रोके रखनेका अभ्यास करनेसे मनमें निर्मलता आती है, इससे शरीरकी नाड़ियोंका भी मल नष्ट होता है ॥ ३४ ॥

सम्बन्ध- प्रसंगवश चित्तकी निर्मलताके उपाय बतलाकर, अब मनको स्थिर करनेवाला अन्य साधन बतलाते हैं,

विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी ॥ ३५॥

व्याख्या- अभ्यास करते-करते साधकको दिव्य विषयोंका साक्षात् हो जाता है, उन दिव्य विषयोंका अनुभव करनेवाली वृत्तिका नाम विषयवती प्रवृत्ति है (योग०

३ । ३६) । ऐसी प्रवृत्ति उत्पन्न होनेसे साधकका योगमार्गमें विश्वास और उत्साह बढ़ जाता है, इस कारण यह आत्मचिन्तनके अभ्यासमें भी मनको स्थिर करनेमें

हेतु बन जाती है ॥ ३५॥ ..

सम्बन्ध- इसी प्रकारका और भी उपाय बतलाते हैं,

विशोका वा ज्योतिष्मती ॥३६॥

व्याख्या- अभ्यास करते-करते साधकको यदि शोकरहित प्रकाशमय प्रवृत्तिका

अनुभव हो जाय तो वह भी मनको स्थिर करनेवाली होती है ॥ ३६॥

सम्बन्ध- अब चित्तकी स्थिरताका अन्य उपाय बतलाते हैं,

वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥ ३७॥

व्याख्या- जिस पुरुषके राग-द्वेष सर्वथा नष्ट हो चुके हैं, ऐसे विरक्त पुरुषको ध्येय

बनाकर अभ्यास करनेवाला अर्थात् उसके विरक्त भावका मनन करनेवाला चित्त भी स्थिर हो जाता है ॥ ३७॥

सम्बन्ध- और भी अन्य उपाय बतलाते हैं
स्वप्रनिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥३८॥

व्याख्या- स्वप्नमें कोई अलौकिक अनुभव हुआ हो, जैसे अपने इष्टदेवका दर्शन आदि, तो उसको स्मरण करके वैसा ही चिन्तन करनेसे मन स्थिर हो जाता है

तथा गाढ़ निद्रामें केवल चित्तकी वृत्तियोंके अभावका ही ज्ञान रहता है, किसी भी पदार्थकी प्रतीनि नहीं होती, उसी प्रकार समस्त उसीको लक्ष्य बनाकर अभ्यास

करनेसे भी अनायास ही चित्त स्थिर हो सकता है। जिस कालमें तमोगुणका आविर्भाव होता है; उस समय ‘यह अभ्यास नहीं करना चाहिये।’ जिस समय चित्त

और इन्द्रियोंमें सत्त्वगुण बढ़ा हुआ हो, उस
समय यह साधन अधिक लाभप्रद हो सकता है ॥ ३८॥

सम्बन्ध- मनुष्योंकी रुचि भिन्न-भिन्न होती है; अतः अब सर्वसाधारणके उपयोगी साधनका वर्णन करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं
यथाभिमतध्यानाद्वा ॥ ३९ ॥

व्याख्या- उपर्युक्त साधनोंमेंसे कोई साधन किसी साधकके अनुकूल नहीं पड़ता हो तो उसे अपनी रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करना चाहिये। अपनी

रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करनेसे मन स्थिर हो जाता है॥३९॥ . ..

सम्बन्ध- चित्तकी स्थिरताके उपाय बतलाकर अब यह बतलाते हैं कि चित्तमें जब

स्थिर होनेकी योग्यता परिपक्क हो जाती है, तब उसकी कैसी स्थिति होती है,

परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥ ४० ॥

व्याख्या- अभ्यास करते-करते जब साधकका चित्त भलीभाँति स्थितिकी योग्यता प्राप्त कर लेता है; उस समय साधक अपने चित्तको सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पदार्थोंसे

लेकर बड़े-से-बड़े महान् पदार्थतक चाहे जहाँ, चाहे जब तत्काल स्थिर कर सकता है। उसका अपने चित्तपर पूर्ण अधिकार हो जाता है। चित्तमें स्थिर होनेकी

योग्यता परिपक्व हो जानेकी पहचान भी यही है (गीता ६।१९) ॥४०॥

सम्बन्ध- पहले बतलाये हुए उपायोंसे जब साधकका अपने चित्तपर अधिकार हो जाता है और चित्त अत्यन्त निर्मल होकर उसमें समाधिकी योग्यता आ जाती है,

इसके बाद किस प्रकार क्रमसे सम्प्रज्ञात निर्बीज-समाधि सिद्ध होती है, उसका वर्णन आरम्भ करते हैं,

क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः ॥४१॥

व्याख्या- पूर्वोक्त अभ्यास करते-करते जब साधकका चित्त स्वच्छ स्फटिकमणिकी भाँति अति निर्मल हो जाता है, जब उसकी ध्येयसे अतिरिक्त

बाह्य वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, उस समय साधक इन्द्रियोंके स्थूल या सूक्ष्म विषयोंको (योग० ३।४४), या अन्तःकरण और इन्द्रियोंको (योग० ३ । ४७)

अथवा बुद्धिस्थ पुरुषको (योग० ३।४९)-जिस किसी भी ध्येयको लक्ष्य बनाकर उसमें अपने चित्तको लगाता है तो वह चित्त उस ध्येय वस्तुमें स्थित होकर

तदाकार हो जाता है। इसीको सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं, क्योंकि इस समाधिमें साधकको ध्येय वस्तुके स्वरूपका भली प्रकार ज्ञान हो जाता है,

उसके विषयमें किसी प्रकारका संशय या भ्रम नहीं रहता है।

सम्बन्ध- सामान्यरूपसे सम्प्रज्ञातसमाधिका स्वरूप बतला दिया, अब इसके भेदोंका वर्णन करते हैं,

तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥४२॥

patanjali yog darshan

व्याख्या- ग्राह्य यानी मन और इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण करनेमें आनेवाले पदार्थ

दो प्रकारके होते हैं-(१) स्थूल, (२) सूक्ष्म । इनमेंसे किसी एक स्थूल पदार्थको लक्ष्य

बनाकर उसके स्वरूपको जाननेके लिये जब योगी अपने चित्तको उसमें लगाता है, तब पहले-पहल होनेवाले अनुभवमें उस वस्तुके .. नाम, रूप और ज्ञानके

विकल्पोंका मिश्रण रहता है। अर्थात् उसके स्वरूपके साथ-साथ उसके नाम और प्रतीतिकी भी चित्तमें स्फुरणा रहती है। अतः इस समाधिको सवितर्क समाधि

कहते हैं। इसीका दूसरा नाम सविकल्प योग भी है ॥४२॥

सम्बन्ध- इसके बाद,

स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितका ॥४३॥

व्याख्या- पहले बतलायी हुई स्थितिके बाद जब साधकके चित्तमें ध्येय वस्तुके नामकी स्मृति लुप्त हो जाती है और उसको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका भी

स्मरण नहीं रहता, तब अपने (चित्तके) स्वरूपका भी भान न रहनेके कारण उसके स्वरूपके अभावकी-सी स्थिति हो जाती है, उस समय सब प्रकारके

विकल्पोंका अभाव हो जानेके कारण केवल ध्येय पदार्थके साथ तदाकार हुआ चित्त ध्येयको प्रकाशित करता है, उस अवस्थाका नाम ‘निर्वितर्क’ समाधि है।

इसमें शब्द और प्रतीतिका कोई विकल्प नहीं रहता, अतः इसे ‘निर्विकल्प’ समाधि भी कहते हैं ॥ ४३ ।।

सम्बन्ध- इस प्रकार स्थूल-ध्येय पदार्थों में होनेवाली सम्प्रज्ञात समाधिका भेद बतलाकर अब सूक्ष्म ध्येयमें होनेवाली सम्प्रज्ञात समाधिके भेद बतलाते हैं,

एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥४४॥

व्याख्या- जिस प्रकार स्थूल-ध्येय पदार्थोंमें की जानेवाली समाधिके दो भेद हैं, उसी प्रकार सूक्ष्म-ध्येय पदार्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाली समाधिके भी दो भेद समझ

लेने चाहिये अर्थात् जब किसी सूक्ष्म-ध्येय पदार्थके स्वरूपका यथार्थ स्वरूप जाननेके लिये उसमें चित्तको स्थिर किया जाता है, तब पहले उसके नाम, रूप

और ज्ञानके विकल्पोंसे मिला हुआ अनुभव होता है, वह स्थिति सविचार समाधि है; और उसके बाद जब नामका और ज्ञानका अर्थात् चित्तके निज स्वरूपका भी

विस्मरण होकर केवल ध्येय पदार्थका ही अनुभव होता है, वह स्थिति निर्विचार समाधि है ॥ ४४ ॥

सम्बन्ध- अब सूक्ष्म पदार्थोंमें किन-किनकी गणना है, यह स्पष्ट करते हैं,

सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥ ४५ ॥

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व्याख्या- पृथ्वीका सूक्ष्म विषय गन्धतन्मात्रा, जलका रसतन्मात्रा, तेजका रूपतन्मात्रा, वायुका स्पर्शतन्मात्रा और आकाशका शब्दतन्मात्रा है एवं उन

सबका और मनसहित इन्द्रियोंका सूक्ष्म विषय अहंकार, अहंकारका महत्तत्त्व और महत्तत्त्वका सूक्ष्म विषय यानी कारण प्रकृति है।

उससे आगे कोई सूक्ष्म पदार्थ नहीं है; वही सूक्ष्मताकी अवधि है। अतः प्रकृतिपर्यन्त किसी भी सूक्ष्म पदार्थको लक्ष्य बनाकर उसमें की हुई समाधिको

सविचार और निर्विचार समाधिके अन्तर्गत समझ लेना चाहिये । यद्यपि पुरुष प्रकृतिसे भी सूक्ष्म है, पर वह दृश्य पदार्थों में नहीं है, अतः तद्विषयक समाधि

इसमें नहीं आनी चाहिये; तथापि ग्रहीतृविषयक समाधि बुद्धिमें प्रतिबिम्बित पुरुषमें की जाती है (योग० ३ । ३५) । अतः उसको निर्विचार समाधिके अन्तर्गत

मान लेने में कोई आपत्ति मालूम नहीं होती। क्योंकि कठोपनिषद् (१ । ३ । १०) में जीवात्मासे प्रकृतिको ‘पर’ कहा गया है। इस प्रकार यहाँ सूक्ष्म विषयकी सीमा

प्रकृतिपर्यन्त बतला देनेके कारण मन, इन्द्रियाँ तथा आनन्द और अस्मिताका उसमें अन्तर्भाव प्रतीत होता है; फिर सतरहवें सूत्रमें कहे हुए आनन्द और

अस्मिताको और इकतालीसवें सूत्रमें ग्रहण नामसे कहे हुए
मन और इन्द्रियोंको और ग्रहीता नामसे कहे हुए प्रकृतिस्थ पुरुषको टीकाकारोंने

विचार’ शब्दवाच्य सूक्ष्म विषयसे अलग कैसे कहा-और सूत्रकारोंने तद्विषयक समाधिके भेदोंका वर्णन क्यों नहीं किया, यह विचारणीय है॥४५॥

सम्बन्ध- इकतालीसवें सूत्रसे पैंतालीसवेंतक सम्प्रज्ञातसमाधिका भेद बतलाकर अब उन सब प्रकारकी समाधियोंका सहेतुक दूसरा नाम बतलाते हैं,

ता एव सबीजः समाधिः ॥४६॥

व्याख्या- निर्वितर्क और निर्विचार समाधियाँ निर्विकल्प होनेपर भी निर्बीज नहीं हैं, ये सब-की-सब सबीज समाधि ही हैं, क्योंकि इनमें बीजरूपसे किसी-न-किसी

ध्येय पदार्थको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका अस्तित्व-सा रहता है। अतः सम्पूर्ण वृत्तियोंका पूर्णतया निरोध न होनेके कारण इन समाधियोंमें पुरुषको

कैवल्य-अवस्थाका लाभ नहीं होता ॥ ४६॥

सम्बन्ध- उक्त चार प्रकारकी समाधियोंमेंसे निर्विचार समाधि ही सबसे श्रेष्ठ है,

यह प्रतिपादन करनेके लिये उसकी विशेष अवस्थाका फलसहित वर्णन करते हैं,

निर्विचारवैशारोऽध्यात्मप्रसादः ॥४७॥

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व्याख्या- निर्विचार समाधिके अभ्याससे जब योगीके चित्तकी स्थिति सर्वथा परिपक्क हो जाती है, उसकी समाधि-स्थितिमें किसी प्रकारका किंचिन्मात्र भी

दोष नहीं रहता (योग० १ । ४०) । उस समय योगीकी बुद्धि
अत्यन्त स्वच्छ-निर्मल हो जाती है (योग० ३ । ५) ॥ ४७ ।।

ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥४८॥

व्याख्या- उस अवस्थामें योगीकी बुद्धि वस्तुके सत्य (असली) स्वरूपको ग्रहण करनेवाली होती है; उसमें संशय और भ्रमका लेश भी नहीं रहता ॥४८॥

सम्बन्ध- उक्त ऋतम्भरा प्रज्ञाकी विशेषताका वर्णन करते हैं,

श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥ ४९ ॥

व्याख्या- वेद, शास्त्र और आप्त पुरुषके वचनोंसे वस्तुका सामान्य ज्ञान होता है, पूर्ण ज्ञान नहीं होता। इसी प्रकार अनुमानसे भी साधारण ज्ञान ही होता है। बहुत-

से सूक्ष्म पदार्थोंमें तो अनुमानकी पहुँच ही नहीं है। अतः वेद-शास्त्रोंमें किसी वस्तुके स्वरूपका वर्णन सुननेसे जो तद्विषयक निश्चय होता है, वह श्रुतबुद्धि है;

इसी प्रकार अनुमान (युक्ति) प्रमाणसे जो वस्तुके स्वरूपका निश्चय होता है, वह अनुमान बुद्धि है। ये दोनों प्रकारकी बुद्धि वृत्तियाँ वस्तुके स्वरूपको

सामान्यरूपसे ही विषय करती हैं, उसके अङ्ग प्रत्यङ्गोसहित उसका पूर्ण ज्ञान इनसे नहीं होता; किंतु ऋतम्भरा प्रज्ञासे वस्तुके स्वरूपका यथार्थ और पूर्ण

(अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसहित) ज्ञान हो जाता है। अतः यह उन दोनों प्रकारकी बुद्धियोंसे भिन्न और अत्यन्त श्रेष्ठ है॥४९॥

सम्बन्ध- इस ऋतम्भरा प्रज्ञाका और भी महत्त्व बतलाते हैं,

तजः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥५०॥

patanjali yog darshan

व्याख्या- मनुष्य जिस किसी भी वस्तुका अनुभव करता है, जो कुछ भी क्रिया करता है, उन सबके संस्कार अन्तःकरणमें इकट्ठे हुए रहते हैं, इन्हींको

योगशास्त्रमें कर्माशय (योग० २ । १२) के नामसे कहा है। ये ही मनुष्यको संसारचक्रमें भटकानेवाले मुख्य कारण हैं (योग० २ । १३)

इनके नाशसे ही मनुष्य मुक्तिलाभ कर सकता है। अतः उक्त बुद्धिका महत्त्व प्रकट करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि इस बुद्धिके प्रकट होनेपर जब मनुष्यको

प्रकृतिके यथार्थ रूपका भान हो जाता है; तब उसका प्रकृतिमें और उसके कार्यों में स्वभावसे ही वैराग्य हो जाता है । उस वैराग्यके संस्कार पूर्व इकट्ठे हुए सब

प्रकारके रागद्वेषमय संस्कारोंका नाश कर डालते हैं

(योग० २ । २६,३ । ४९-५०), इससे योगी शीघ्र ही मुक्तावस्थाके समीप पहुँच जाता है ॥५०॥ .

सम्बन्ध- जब निर्बीज-समाधिरूप कैवल्य-अवस्थाका वर्णन करते हुए इस पादकी समाप्ति करते है,

तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥ ५१॥

व्याख्या- जब ऋतम्भरा प्रज्ञाजनित संस्कारके प्रभावसे अन्य सब प्रकारके संस्कारोंका अभाव हो जाता है, उसके बाद उस ऋतम्भरा प्रज्ञासे उत्पन्न संस्कारों

में भी आसक्ति न रहनेके कारण उनका भी निरोध हो जाता है। उनका निरोध होते ही समस्त संस्कारोंका निरोध अपने-आप हो जाता है।

अतः संस्कारके बीजका सर्वथा अभाव हो जानेसे इस अवस्थाका नाम

निर्बीज समाधि है। इसीको कैवल्य-अवस्था भी कहते हैं (योग० ३ । ५०) ॥ ५१ ॥

patanjali yog darshan

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