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vedant darshan 1-2 sutra 16-32

vedant darshan adhyay 1 paad 2 sutra 16,32

सम्बन्धयदि इस प्रकरणमें नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाले प्रतिविम्ब, नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा- इनमेंसे किसी एकको नेत्रान्तर्वती पुरुष मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं—

अनवस्थितेरसंभवाच्च नेतरः ।।१२।१७ ॥

अनवस्थिते: अन्य किसीकी नेत्रमें निरन्तर स्थिति न होनेके कारण; च= तथा; असंभवात् ( श्रुतिमें बताये हुए अमृतत्व आदि गुग ) दूसरे किसीमे सम्भव न होनेसे; इतर:-ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भी; न नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं है।

व्याख्या- छाया-पुरुष या प्रतिविम्ब नेत्रेन्द्रियमें सदा नहीं रहता; जब कोई पुरुष सामने आता है, तब उसका प्रतिविम्ब नेत्रमे दिखायी देता है और उसके हटते ही अदृश्य हो जाता है । इन्द्रियानुग्राहक देवताकी स्थिति भी नेत्रमे सदा नहीं रहती, जिस समय वह इन्द्रिय अपने विषयको ग्रहण करती है, उसी समय वह उसके सहायक रूपसे उसमें स्थित माना जाता है ।

इसी प्रकार जीवात्मा भी मनके द्वारा एक समय किसी एक इन्द्रियके विषयको ग्रहण करता है तो दूसरे समय दूसरी ही इन्द्रियके विषयको; और सुषुप्तिमे तो किसीके भी विषयको नहीं ग्रहण करता । अतः निरन्तर एक-सी स्थिति आँखमे न रहनेके कारण इन तीनोमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष
नहीं कहा जा सकता । इसके सिवा, नेत्रमे दिखायी देनेवाले पुरुषके जो अमृतत्व और निर्भयता आदि गुण श्रुतिन बताये है, वे ब्रह्मके अतिरिक्त और किसीमे’ सम्भव नहीं है। इस कारण भी उपर्युक्त तीनोंमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं माना जा सकता ।

इसलिये परब्रह्म परमेश्वरको ही यहाँ नेत्रमे दिखायी देनेवाला पुरुष कहा
गया है; यही मानना ठीक है।

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽस्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते। एतदुबै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मास पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः।

किन्तु जो तपस्याके साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक और श्रद्धासे युक्त होकर अध्यात्मविद्याके द्वारा परमात्माकी खोज करके जीवन सार्थक कर लेते हैं,
वे उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकको जीत लेते (प्राप्त कर लेते) हैं। यही प्राणोका केन्द्र है । यह अमृत और निर्मय पद है। यह परम गति है। इससे पुनः लौटकर नहीं आते । इस प्रकार यह निरोध– पुनरावृत्ति-निवारक है।

सम्बन्ध- पूर्वप्रकरणमें यह वात बतायी गयी है कि श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मके लिये भिन्न-भिन्न स्थान आदिका निर्देश किया गया है । अव पुन: अधिदैव, अधिभूत आदिमें उस ब्रह्मकी व्याप्ति वतलाकर उसी बातका समर्थन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

अन्तर्याम्यधिदेवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १। २ । १८॥

अधिदेवादिषु-आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि समस्त वस्तुओंमे; अन्तर्यामी जिसे अन्तर्यामी वतलाया गया है ( वह परब्रह्म ही है ); तद्धर्म व्यपदेशात्-क्योंकि वहाँ उसीके धोका वर्णन है।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (३ । ७ ) में यह प्रसङ्ग आया है। वहाँ उद्दालक ऋषिन याज्ञवल्क्य मुनिसे पहले तो सूत्रात्माके विपयमे प्रश्न किया है। फिर उस अन्तर्यामीके सम्बन्धमे पूछा है, जो इस लोक और परलोकको तथा समस्त भूत-प्राणियोंको उनके भीतर रहकर नियन्त्रणमे रखता है । इसके उत्तरमे याज्ञवल्क्यने सूत्रात्मा तो वायुको वताया है और अन्तर्यामीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उसे जड़-चेतनात्मक समस्त भूतो, सब इन्द्रियो और सपूर्ण जीवोंका नियन्ता बताकर अन्तमे इस प्रकार कहा है,

यह अन्तर्यामी देखनमे न आने वाला किन्तु स्वयं सवको देखनेवाला है, सुननमें न आनेवाला किन्तु स्वयं सत्र कुछ सुननेवाला है और मनन करनेमे न
आनेवाला किन्तु खयं सबका मनन करनेवाला है । वह विशेषरूपसे किसीके जाननमे नहीं आता, किन्तु स्वयं सबको विशेषरूपसे भलीभाँति जानता है । ऐसा यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इससे भिन्न सब कुछ विनाशशील है ।’ इस वर्णनमे आये हुए महत्त्वसूचक विशेषण परब्रह्ममे ही सङ्गत हो सकते हैं । जीवात्माका अन्तर्यामी आत्मा ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई नहीं हो सकता । अतः इस प्रसङ्गमे ब्रह्मको ही अन्तर्यामी बताया गया है..–यही मानना ठीक है ।

सम्बन्ध- पूर्वसूत्रमें विधि-मुखसे यह बात सिद्ध की गयी कि अन्तर्यामी ब्रह्म ही है । अव निषेधमुखसे यह सिद्ध करते हैं कि अव्यक्त जड प्रकृति अन्तर्यामी नहीं हो सकती

न च स्मार्तमतधर्मामिलापात् ॥ १।२ । १६ ॥

सातम्-सांख्यस्मृतिद्वारा प्रतिपादित प्रधान ( जड प्रकृति); च-भी; न= अन्तर्यामी नहीं है; अतद्धर्मामिलापात-क्योकि इस प्रकरणमे बताये हुए द्रष्टापन आदि धर्म प्रकृतिके नहीं है ।

व्याख्या- सांख्य-स्मृतिद्वारा प्रतिपादित जड प्रकृतिके धर्मोका वर्णन वहाँ अन्तर्यामीके लिये नहीं हुआ है। अपितु चेतन परब्रह्मके धर्मोका ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । इस कारण वहाँ कहा हुआ अन्तर्यामी प्रकृति नहीं हो सकती । अतः यही सिद्ध होता है कि इस प्रकरणमे ‘अन्तर्यामी’ के नामसे पर ब्रह्म परमात्माका ही
वर्णन हुआ है।

सम्बन्ध- यह ठीक है कि जड होनेके कारण प्रकृतिको अन्तर्यामी नहीं कहा जा सकता। परन्तु जीवात्मा तो चेतन है तथा वह शरीर और इन्द्रियोंके भीतर रहनेवाला और उनका नियमन करनेवाला भी प्रत्यक्ष है । अतः उसीको अन्तर्यामी मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते है

शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॥ १। २ । २० ॥

शारीरः शरीरमे रहनेवाला जीवात्मा; च-भी; (न= ) अन्तर्यामी नहीं है; हि-क्योकि; उभयेऽपि-माध्यन्दिनी तथा काण्व दोनो ही शाखावाले; एनम्-इस जीवात्माको; भेदेन अन्तर्यामीसे भिन्न समझते हुए; अधीयते अध्ययन करते है।

व्याख्या- माध्यन्दिनी और काण्व-दोनो शाखाओवाले विद्वान् अन्तर्यामीको पृथिवी आदिकी भॉति जीवात्माके भी भीतर रहकर उसका नियमन करनेवाला मानते है । वहाँ जीवात्माको नियम्य और अन्तर्यामीको नियन्ता बताया गया है। इस प्रकार दोनोका पृथक्-पृथक् वर्णन होनेके कारण वहाँ ‘अन्तर्यामी’ पद परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, जीवात्माका नहीं ।

य आत्मनि तिष्ठनात्सनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्थात्मा शरीरं य आत्मान मन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः।
(शतपथबा. १४ । ५ । ३०)

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

यो विज्ञाने तिष्ठन् विनानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञान र शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्पमृतः। (वृ० उ० ३ । ७ 1 २२ )

जो जीवात्मामे रहनेवाला, जीवात्माके भीतर है, जिसे जीवात्मा नही जानता: जीवात्मा जिसका शरीर है और जो उसके भीतर रहकर जीवात्माका नियमन करता है। वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।

सम्बन्ध- उन्नीसवें सूत्रमै यह बात कही गयी है कि द्रष्टापन आदि चंतनके धर्म जड प्रकृनिमें नहीं घट सकते, इसलिये वह अन्तर्यामी नहीं हो सकती । इसपर यह जिज्ञासा होती है कि मुण्डकोपनिपदमें जिसको अझ्यता, अग्राह्यता आदि धर्मोस युक्त वतलाकर अन्तमे भूतोंका कारण बताया गया है, वह तो प्रकृति हो सकती है। क्योंकि उस जगह बताये हुए सभी धर्म प्रकृतिमें पाये जाते है । इसपर कहते है

अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः॥ १।२।२१॥

अदृश्यत्यादिगुणक: अदृश्यता आदि गुणोवाला परब्रह्म परमेश्वर ही है; धर्मोक्तेः क्योंकि उस जगह उसीके सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है।

व्याख्या- मुण्डकोपनिपढ़े यह प्रसङ्ग आया है कि महर्षि शौनक विधि पूर्वक अगिरा ऋपिकी शरणमे गये । वहाँ जाकर उन्होंने पूछा भगवन् ! किसको जान लेनेपर यह सब कुछ जाना हुआ हो जाता है । इसपर अगिराने कहा- ‘जानने योग्य विद्याएँ दो है, एक अपरा, दूसरी परा । उनमेसे अपरा विद्या तो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष है और परा वह है, जिससे उस अक्षर ब्रह्मको जाना जाता है ।’ यह कहकर उस अक्षरको समझानेके लिये अगिराने उसके गुण और धोका वर्णन करते हुए ( मु० १ । १ । ६ मे ) कहा

यत्तदन्द्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्गमचक्षु.श्रोत्रं तपाणिपादम् । नित्यं त्रिभुं सर्वगनं लुसूक्ष्मं तदव्ययं तद्भूतयोनि परिपश्यन्ति धीराः ।।

अर्थात् ‘जो इन्द्रियोद्वारा अगोचर है, पकड़नेमे आनेवाला नहीं है, जिसका कोई गोत्र नहीं है, वर्ग नहीं है, जो आँख, कान तथा हाथ-पैरसे रहित है, नित्य, व्यापक, सर्वत्र परिपूर्ण, अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वथा अविनाशी है । उसको धीर पुरुष देखते हैं, वह समस्त भूतोका परम कारग है ।

फिर नवम मन्त्रम कहा है– ‘यः मर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥’जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, ज्ञान ही जिसका तप है, उसीसे यह विराटप समस्त जगत तथा नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते है । vedant darshan 1-2 sutra 16-32

यहाँ जिन सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है, वे परब्रह्म परमेश्वरके ही हैं। तथा एक ब्रह्मको जान लेनेपर ही सब कुछ जाना हुआ हो सकता है, अन्य किसीके जाननेसे नहीं । इसलिये उस प्रकरणमें जिसे अदृश्यता आदि गुणोंवाला बताया गया है, वह परब्रह्म परमात्मा ही है, जीवात्मा या प्रकृति नहीं।

सम्बन्ध-इसी बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति देते हैं –

विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ॥ १ । २ । २२ ॥

विशेषणभेदव्यपदेशाभ्याम्=परमेश्वरसूचक विशेषणोंका कथन होनेसे तथा प्रकृति और जीवात्मासे उसको भिन्न बताये जानेके कारण च-भी; इतरौ-जीवात्मा और प्रकृति; न-अदृश्यता आदि गुणोंवाला जगत्कारण नहीं हो सकते ।

व्याख्या इस प्रकरणमे जिसको अदृश्यता आदिगुणोसे युक्त और सब भूतोंका कारण बताया गया है, उसके लिये ‘सर्वज्ञ’ आदि विशेषण दिये गये है, जो न तो प्रधान ( जड प्रकृति ) के लिये उपयुक्त हो सकते है और न अल्पज्ञ जीवात्माके लिये ही। इसके सिवा, उन दोनोको ब्रह्मसे भिन्न कहा मया है। मुण्डकोपनिषद् (३ । १ । ७) मे उल्लेख है कि

पश्यस्विहैव निहितं गुहायाम् ।’ अर्थात् वह देखनेवालोके शरीरके भीतर यहीं हृदय-गुफामे छिपा हुआ है।’ इसके अनुसार जीवात्मासे परमात्माकी भिन्नता खतः स्पष्ट हो जाती है। इसके सिवा, मुण्डक० ३ । १ । २ मे भी कहा है कि

समान वृक्षे पुरुषो निमानोऽनीशया शोचति मुह्यमान । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

शरीररूप वृक्षपर रहनेवाला यह जीवात्मा शरीरमे आसक्त होकर डूब रहा है। अपनेको असमर्थ समझकर मोहित हो शोक करता रहता है। परन्तु वह जब वहीं स्थित तथा भक्तजनोद्वारा सेवित अपनेसे भिन्न परमेश्वरको देख लेता है और उसकी महिमाको समझ लेता है, तब सर्वथा शोकरहित हो जाता है । इस प्रकार इस मन्त्रमे स्पष्ट शब्दोद्वारा परमेश्वरको जीवात्मासे तथा शरीररूपी वृक्षसे भी भिन्न बताया गया है । अतः यहाँ जीव और प्रकृति दोनों से कोई भी अदृश्यता आदि गुणोंसे युक्त जगत्-कारण नहीं हो सकता।

सम्बन्ध- इस प्रकरणमें जिसे समस्त भूतोंका कारण बताया गया है, वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, इसकी पुष्टिके लिये दूसरा प्रमाण उपस्थित करते हैं

रूपोपन्यासाच्च ॥ १।२ । २३ ॥

रूपोपन्यासात्-श्रुतिमे उसीके निखिल लोकमय विराट् खरूपका वर्णन किया गया है, इससे; चम्भी (वह परमेश्वर ही समस्त भूतोका कारण सिद्ध होता है)।

व्याख्या- मुण्डकोपनिषद् (२ । १ । ४ ) में परब्रह्म परमेश्वरके सर्वलोकमय विराटखरूपका वर्णन इस प्रकार किया गया है ‘अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यों दिश: श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥’

अग्नि इस परमेश्वरका मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र है, सब दिशाएँ दोनो कान हैं और प्रकट हुए वेद उसकी वाणी हैं । वायु इसका प्राण और संपूर्ण विश्व हृदय है । इसके पैरोंसे पृथिवी उत्पन्न हुई है। यही समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा है । इस प्रकार परमात्माके विराट् स्वरूपका उल्लेख करके उसे सबका अन्तरात्मा बताया गया है। इसलिये उक्त प्रकरणमे भूतयोनि के नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है, यह निश्चय होता है।

सम्बन्ध- यहॉ यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद् (५।१८।२) में ‘वैश्वानर’ के स्वरूपका वर्णन करते हुए ‘धुलोक’ को उसका मस्तक बताया है। ‘वैश्वानर’ शब्द जठराग्निका वाचक है । अतः वह वर्णन जटरानलके विषयमें है या अन्य किसीके ? इस शङ्काका निवारण करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है

वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॥ १ । २ । २४ ॥

वैश्वानरः= ( वहाँ) वैश्वानर’ नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है; साधारणशब्दविशेपात्=क्योकि उस वर्णनमे ‘वैश्वानर’ और ‘आत्मा’ इन साधारण शब्दोकी अपेक्षा ( परब्रह्मके बोधक ) विशेष शब्दोका प्रयोग हुआ है।

व्याख्या- छान्दोग्योपनिषद्म पाँचवे अध्यायके ग्यारहवे खण्डसे जो प्रसङ्ग आरम्भ हुआ है, वह इस प्रकार है.—‘प्राचीनशाल, सत्ययज्ञ, इन्द्रद्युम्न, जन तथा बुडिल ये पाँचो ऋषि श्रेष्ठ गृहस्थ और महान् वेदवेत्ता थे। इन्होने एकत्र होकर परस्पर विचार किया कि ‘हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्मका क्या स्वरूप है ११ जब वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सके तो यह निश्चय किया कि इस समय महर्षि उद्दालक वैश्वानर आत्माके ज्ञाता है, हमलोग उन्हींके पास चले ।’ इम निश्चयके अनुसार वे पॉचो ऋषि उद्दालक मुनिके यहाँ गये । उन्हे देखते ही मुनिने अनुमान कर लिया कि ये लोग मुझसे कुछ पूछो, किन्तु मै इन्हे पूर्णतया उत्तर नहीं दे सकूँगा।

अतः अच्छा हो कि मै इन्हे पहलेसे ही दूसरा उपदेष्टा बतला दूं ।’ यह सोचकर उद्दालकने उनसे कहा ‘आदरणीय महर्षियो ! इस समय केवल राजा अश्वपति ही वैश्वानर आत्माके ज्ञाता है। आइये, हम सब लोग उनके पास चले ।’ यो कहकर उन सबके साथ उद्दालक मुनि वहाँ गये । राजाने उन सबका यथोचित सत्कार किया और दूसरे दिन उनसे यज्ञमे सम्मिलित होनेके लिये प्रार्थना करते हुए उन्हे पर्याप्त धन देनकी बात कही। इसपर उन महर्षियोने कहा—‘हमे धन नहीं चाहिये, हम जिस प्रयोजनसे आपके पास आये हैं, वही दीजिये । हमे पता लगा है, आप वैश्वानर आत्माको जानते है, उसीका हमारे लिये उपदेश करे । vedant darshan 1-2 sutra 16-32

राजाने दूसरे दिन उन्हे अपने पास बुलाया और एक-एकसे क्रमशः पूछा, ‘इस विषयमे आपलोग क्या जानते हैं ?’ उनमेसे उपमन्युपुत्र प्राचीनशालने उत्तर दिया– मैं ‘धुलोक’को आत्मा समझकर उसकी उपासना करता हूँ।’ फिर सत्ययज्ञ बोले-‘मै सूर्यकी उपासना करता हूँ। इन्द्रद्युम्नने कहा-‘मै वायुकी उपासना करता हूँ।’ जनने अपनेको आकाशका और बुडिलने जलका उपासक बताया। इन सबकी बात सुनकर राजाने कहा- आपलोग उस विश्वके आत्मा वैश्वानरकी उपासना तो करते है।

परन्तु उसके एक-एक अङ्गकी ही उपासना आपके द्वारा होती है; अतः यह सर्वाङ्गपूर्ण नहीं है,

क्योकि-‘तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्वैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथावात्मा संदेहोबहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हि दयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ।

अर्थात्उ- स इस विश्वके आत्मा वैश्वानरका धुलोक मस्तक है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, आकाश शरीरका मध्यभाग है, जल वस्ति-स्थान है, पृथिवी दोनो चरण है, वेही वक्षःस्थल है, दर्भ लोम है, गार्हपत्य अग्नि हृदय है
अन्वाहार्यपचन अग्नि मन है और आहवनीय अग्नि मुख है । इस वर्णनसे मालूम होता है कि यहॉ विश्वके आत्मारूप विराट् पुरुपको ही वैश्वानर कहा गया है। क्योकि इस प्रकरणमे जठराग्नि आदिके वाचक साधारण शब्दोकी अपेक्षा, परब्रह्मके वाचक विशेष शब्दोका जगह-जगह प्रयोग हुआ है।

सम्बन्ध- इसी वातको दृढ करनेके लिये दूसरा कारण प्रस्तुत करते हैं–

स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ॥ १।२ । २५॥

सर्यमाणम्- स्मृतिमे जो विराटस्वरूपका वर्णन है, वह, अनुमानम् मूलभूत श्रुतिके वचनका अनुमान कराता हुआ वैश्वानरके ‘परमेश्वर’ होनेका निश्चय करनेवाला है; इति स्यात् इसलिये इस प्रकरणमे वैश्वानर परमात्मा ही है ।

व्याख्या- महाभारत, शान्तिपर्व (१७ । ७० ) मे कहा है, प्यस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः । सूर्यश्चक्षु. दिशः श्रोत्रं तस्मै लोकात्मने नमः ॥’ ‘अग्नि जिसका मुख, धुलोक मस्तक, आकाश नाभि, पृथिवी दोनो चरण, सूर्य नेत्र तथा दिशाएँ कान है, उस सर्वलोकवरूप परमात्माको नमस्कार है।’ इस प्रकार इस स्मृतिमे परमेश्वरका अखिल विश्वके रूपमें वर्णन आया है। स्मृति के वचनसे उसकी मूलभूत किसी श्रुतिका होना सिद्ध होता है। उपर्युक्त छान्दोग्य-श्रुतिम जो वैश्वानरके स्वरूपका वर्णन है, वही पूर्वोक्त स्मृतिवचनका मूल आधार है । अतः यहाँ उस परब्रह्मके विराटरूपको ही वैश्वानर कहा गया है, यह बात स्मृतिसे भी सिद्ध होती है । vedant darshan 1-2 sutra 16-32

अतएव जहाँ-जहाँ आत्मा या परमात्माके वर्णनमे ‘वैश्वानर’ शब्दका प्रयोग आवे, वहाँ उसे परब्रह्मके विराट्खरूपका ही वाचक मानना चाहिये, जठरानल या जीवात्माका नहीं। माण्डूक्योपनिपने ब्रह्मके चार पाटोका वर्णन करते समय ब्रह्मका पहला पाद वैश्वानरको बताया है । वहाँ भी बह परमेश्वरके विराट्वरूपका हीवाचक है; जठराग्नि या जीवात्माका नहीं।

सम्बन्ध- उपर्युक्त वातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उपस्थित करके उसका समाधान करते है

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शब्दादिभ्योऽन्तःप्रतिष्ठानाच्च नेति चेन्न तथा दृष्टयुपदेशादसंभवात्पुरुषमपि चैनमधीयते ॥ ।। २ । २६ ॥

चेत् यदि कहो; शब्दादिभ्यः शब्दादि हेतुओंसे अर्थात् अन्य श्रुतिमे वैश्वानर शब्द अग्निके अर्थमे विशेषरूपमें प्रयुक्त हुआ है और इस मन्त्रमे गार्हपत्य आदि अग्नियोंको वैश्वानरका अङ्ग बताया गया है, इसलिये; च-तथा; अन्त: प्रतिष्ठानात्-श्रुतिमें वैश्वानरको शरीरके भीतर प्रतिष्ठित कहा गया है। इसलिये भी; न-(यहाँ वैश्वानर शब्द परब्रह्म परमात्माका वाचक) नहीं है; इति न तो यह कहना ठीक नहीं है। तथा दृष्टयुपदेशात्-क्योंकि वहाँ वैश्वानरमें ब्रह्मदृष्टि ‘करनेका उपदेश है; असंभवात् इसके सिवा, केवल जठरानलका विराट्रपमें वर्णन होना संभव नहीं है, इसलिये; च-तथा; एनम् इस वैश्वानरको; पुरुषम् ‘पुरुष’ नाम देकर; अपि-भी; अधीयते-पढ़ते है
( इसलिये उक्त प्रकरणमे वैश्वानर शब्द परब्रह्मका ही वाचक है)।

व्याख्या यदि कहो कि अन्य श्रुतिमे ‘स यो हैतमेवमग्नि वैश्वानरं पुरुषविध पुरुषेन्तःप्रतिष्ठितं वेद । (शतपथब्रा० १०। ६ । १ । ११ ) अर्थात् ‘जो इस वैश्वानर अग्निको पुरुषके आकारका तथा पुरुषके भीतर प्रतिष्ठित जानता है । इस प्रकार वैश्वानर शब्द अग्निके विशेषणरूपसे प्रयुक्त हुआ है, तथा जिस श्रुतिपर विचार चल रहा है, इसमे भी गार्हपत्य आदि तीनो अग्नियोको वैश्वानरका अङ्ग बताया गया है । इसी प्रकार भगवद्गीतामें भी कहा है कि मैं ही वैश्वानररूपसे प्राणियोंके शरीरमे स्थित हो चार प्रकारके अन्नका पाचन करता हूँ।’ (१५।१४) इन सब कारणोसे यहॉ वैश्वानरके नामसे जठराग्निका ही वर्णन है, परमात्माका नहीं, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि
शतपथब्राह्मणकी श्रुतिमें जो वैश्वानर अग्निको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्म दृष्टि करानेके उद्देश्यसे ही है ।

यदि ऐसा न होता तो उसको पुरुष नहीं कहा जाता । तथा श्रीमद्भगवद्गीतामे भी जो वैश्वानर अग्निको सब प्राणियोंके शरीरमें स्थित बताया है, वहाँ भी उसमे परमात्मबुद्धि करानेके लिये भगवान्ने अपनी विभूतिके रूपमे ही कहा है। इसके सिवा, जिसपर विचार चल रहा है, उस श्रुतिमे समस्त ब्रह्माण्डको ‘वैश्वानर’ का शरीर बताया है,

सिरसे लेकर पैरोतक उसके अङ्गोमे समस्त लोकोंकी कल्पना की गयी है। यह जठराग्निके लिये असम्भव भी है । एवं शतपथब्राह्मणमें तथा यहाँ भी इस वैश्वानरको पुरुषके आकारवाला और पुरुष कहा गया है, जो कि जठराग्निके उपयुक्त नहीं है। इन सब कारणोंसे इस प्रकरणमे कहा हुआ वैश्वानर परब्रह्म परमेश्वर ही है। जठराग्नि या अन्य कोई नहीं। vedant darshan 1-2 sutra 16-32

सम्बन्ध- इस प्रसङ्गमें पृथक्-पृथक् उपास्यरूपसे आये हुए ‘दिव’, ‘आदित्य’, ‘वायु,’ ‘आकाश’, ‘जल’ तथा ‘पृथिवी’ भी वैश्वानर नहीं है। यह सिद्ध करनेके लिये कहते हैं

अत एव न देवता भूतं च ॥ १ । २ । २७ ॥

अतः उपर्युक्त कारणोंसे; एच-ही ( यह भी सिद्ध होता है कि); देवता-चौ, सूर्य आदि लोकोंके अधिष्ठाता देवगण; च और; भूतम्-आकाश आदि भूतसमुदाय ( भी ); न वैश्वानर नहीं है ।

व्याख्या- उक्त प्रकरणमे ‘यौ’ ‘सूर्य’ आदि लोकोकी तथा आकाश, वायु आदि भूतसमुदायकी अपने आत्माके रूपमे उपासना करनेका प्रसङ्ग आया है। इसलिये सूत्रकार स्पट कर देते है कि पूर्वसूत्रमे बताये हुए कारणोसे यह भी समझ लेना चाहिये कि उन-उन लोकोके अभिमानी देवताओ तथा आकाश आदि भूतोंका भी वैश्वानर’ शब्दसे ग्रहण नहीं है क्योकि समस्त ब्रह्माण्डको वैश्वानरका शरीर बताया गया है ।

यह कथन न तो देवताओके लिये सम्भव हो सकता है और न भूतोके लिये ही । इसलिये यही मानना चाहिये कि जो विश्वरूप भी है और नर (पुरुप ) भी, वह वैश्वानर है ।’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार परब्रह्म परमेश्वरको ही वैश्वानर कहा गया है ।

सम्बन्ध- पहले २६वे सूत्र में यह बात बतायीं गयी है कि शतपथब्राह्मणके मन्त्रमे जो वैश्वानर अमिको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्मदृष्टि करानके उद्देश्यसे है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शालग्राम-शिलामें विष्णुकी उपासनाके सदृश यहाँ ‘वैश्वानर’ नामक जठराग्निमें परमेश्वरकी प्रतीकोपासना बतलानेके लिये वैश्वानर’ नामसे उस परब्रह्मका वर्णन है। अतः इसपर सूत्रकार आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं—

साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॥ १ । २ । २८॥

साक्षात=”वैश्वानर’ शब्दको साक्षात् परब्रह्मका वाचक माननेमे; अपि-भी; अविरोधम् कोई विरोध नहीं है, ऐसा; जैमिनिः (आह ) आचार्य जैमिनि कहते हैं।

व्याख्या- आचार्य जैमिनिका कथन है कि वैश्वानर शब्दको साक्षात् विश्वरूप परमात्माका वाचक माननेमे कोई विरोध नहीं है । अतः यहाँ जठराग्निको प्रतीक मानकर उसके रूपमे परमात्माकी उपासना माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है।

सम्बन्ध- उपर्युक्त सूत्रोंद्वारा यह बात सिद्ध की गयी कि ‘वैश्वानर’ नामसे इस प्रकरणमें परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन किया गया है। परन्तु निर्विकार निराकार अव्यक्त परब्रह्म परमात्माको इस प्रकार साकार विराट्पमें देशविशेषसे सम्बद्ध बतलाना किस अभिप्रायसे है ? निर्गुण निराकारको सगुण साकार बताना विरुद्ध-सा प्रतीत होता है । इसपर २९ वें सूत्रसे ३१ वें तक विभिन्न आचार्यो का मत बताते हुए अन्तमें ३२ वें सूत्रमें अपना सिद्धान्त कहकर सूत्रकार इस दूसरे पादको समाप्त करते है–

अभिव्यक्तरित्याश्मरथ्यः ॥ १ । २ । २९ ॥

अभिव्यक्ते:-( भक्तोपर अनुग्रह करनेके लिये ) देश-विशेषमे ब्रह्मका प्राकट्य होता है, इसलिये ( अविरोधा)कोई विरोध नहीं है; इति-ऐसा; आश्मरथ्या-आश्मरथ्य आचार्य मानते है।

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

व्याख्या- आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि भक्तजनोपर अनुग्रह करके उन्हें दर्शन देनेके लिये भगवान् समय-समयपर उनकी श्रद्धाके अनुसार नाना रूपोमे प्रकट होते है; तथा अपने भक्तोको दर्शन, स्पर्श और प्रेमालाप आदिके द्वारा सुख पहुँचाने, उनका उद्धार करने और जगत्मे अपनी कीर्ति फैलाकर उसके कथन-मननद्वारा साधकोको परम लाभ पहुँचानेके लिये भगवान् मनष्य आदिके रूपमे भी समय-समयपर प्रकट होते है। यह बात उपनिषद् (केन० ३।२), गीता (४।६-९) और अन्यान्य सद्ग्रन्थोसे भी प्रमाणित है । इस कारण विराटरूपमे उस परब्रह्म परमात्माको सगुण-साकार तथा देश-विशेषसे सम्बद्ध माननेमे कोई विरोध नहीं है,

क्योकि वह सर्वसमर्थ भगवान देश-कालातीत और देशकालसे सम्बन्ध रखनेवाला भी है। वह जिस प्रकार निर्गुण-निराकार है, उसी प्रकार सगुण-साकार भी है । यह बात माण्डूक्यो पनिपमें परब्रह्म परमात्माके चार पादोका वर्णन करके भलीभॉति समझायी गयी है।

सम्बन्ध-अब इस विषयमे वादरि आचार्यका मत उपस्थित करते है

अनुस्मृतेर्बादरिः ॥ १ । २ । ३० ॥

अनुस्मृतेः-विराटपमें परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करनेके लिये; उसको देश-विशेषसे सम्बद्ध बतानेमे ( अविरोधा= ) कोई विरोध नहीं है; (इति) ऐसा; वादरिस वाटरि नामक आचार्य मानते है ।

व्याख्या- परब्रह्म परमेश्वर यद्यपि देशकालातीत है, तो भी उनका निरन्तर भजन, ध्यान, स्मरण करनेके लिये उन्हे देश-विशेपमे स्थित मानने, कहने और समझनेमें कोई विरोध नहीं है; क्योकि भगवान् सर्वसमर्थ है । उनके भक्त उनका जिस-जिस रूपमे चिन्तन करते है, उनपर कृपा करनेके लिये वे उसी उसी रूपमे उनको मिलते है ।

सम्बन्ध-इसी विषयमे आचार्य जैमिनिका मत बताते है

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सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॥ १ । २ । ३१ ॥

सम्पत्तेः-परब्रह्म परमेश्वर अनन्त ऐश्वर्यसे सम्पन्न है, इसलिय ( उसे देश-विशेषमे सम्बन्ध रखनेवाला माननेने कोई विरोध नहीं है ); इति=ऐसा; जैमिनि: जैमिनि आचार्य मानते हैं। हि-क्योकि तथा ऐसा ही भाव; दर्शयति दूसरी श्रुनि भी प्रकट करती है।

व्याख्या- आचार्य जैमिनिका यह कथन है कि परब्रह्म परमेश्वर अनन्त श्वर्यमे सम्पन्न है. अत: उस निर्विकार, निराकार, देशकालातीत परमात्माको सगुण. साकार और किसी देश-विशेषसे सम्बन्ध रखनेवाला माननेमे कोई विरोध नहीं है: क्योकि दूसरी श्रुति भी ऐसा ही भाव प्रकट करती है। (मु० ३०२।१।४)

सम्बन्ध- अब मुत्रकार अपने मतका वर्णन करते हुए इस पादका उपसंहार करते है..

आमनन्ति चैनमस्मिन् ॥ १ । २ । ३२॥

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अस्मिन्-इस वेदान्त-शास्त्रमे, एनम् इस परमेश्वरको; ( एवम् ) ऐसा; च= ही; आमनन्ति प्रतिपादन करते है । श्रीमद्भागवत भी ऐमा ही कहा गया है—- यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय । (३।९।१२) ‘महान् यतास्वी परमेश्वर! आपके भक्तजन अपने हृदयमे आपको जिस-जिस रूपमें चिन्तन करते है। आप उन संत-महात्माओपर अनुग्रह करनेके लिये वहीं-वही शरीर धारण कर लेते हैं।

व्याख्या- इस वेदान्तशास्त्रमे सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सबके निवास स्थान, सर्वसमर्थ परब्रह्म परमेश्वरका ज्ञानीजन ऐसा ही प्रतिपादन करते है* इस विषयमे शास्त्र ही प्रमाण है । युक्ति-प्रमाण यहाँ नहीं चल सकता क्योंकि परमात्मा तर्कका विषय नहीं है । वह सगुण, निर्गुण, साकार निराकार, सविशेष-निर्विशेष आदि सब कुछ है ।

यह विश्वास करके साधकको उसके स्मरण और चिन्तनमे लग जाना चाहिये । वह व्यापक भगवान् सभी देशोंमे सर्वदा विद्यमान है । अतः उसको किसी भी देश-विशेषसे संयुक्त मानना विरुद्ध नहीं है तथा वह सब देशोंसे सदा ही निर्लिस है ! इस कारण उसको देश-कालातीत मानना भी उचित ही है । अतः सभी आचार्योंकी मान्यता ठीक है।

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दूसरा पाद सम्पूर्ण ।

॥अद्वयतारकोपनिषद्॥

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दूसरा पाद

सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् .॥ १ । २ । १॥

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सर्वत्र सम्पूर्ण वेदान्त-वाक्योमे; प्रसिद्धोपदेशात्=( जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके कारणरूपपे ) प्रसिद्ध परब्रह्मका ही उपास्यदेवके रूपमें उपदेश हुआ है, इसलिये ( छान्दोग्यश्रुति ३ । १४ में बताया हुआ उपास्यदेव ब्रह्म ही है)।

ब्याख्या छान्दोग्योपनिषद् अध्याय ३ के चौदहवे खण्डके आरम्भमें सबसे पहले यह मन्त्र आया है, सर्व खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत । अथ खलु क्रतुमयः पुरुयो यथानुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेत. प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत । अर्थात् ‘यह सम्पूर्ण चराचर जगत् निश्चय ब्रह्म ही है; क्योकि यह उसीसे उत्पन्न हुआ है,

स्थितिके समय उसीमे चेष्टा करता हैं और अन्तमें उसीमें लीन हो जाता है । साधकको राग-द्वेषरहित शान्तचित्त होकर इस प्रकार उपासना करनी चाहिये

अर्थात् ऐसा ही निश्चयात्मक भाव धारण करना चाहिये क्योकि यह मनुष्य संकल्पमय है। इस लोकमे यह जैसे संकल्पसे युक्त होता है, यहाँसे चले जानेपर परलोकमे यह वैसा ही बन जाता है । अतः उसे उपर्युक्त निश्चय करना चाहिये ।’ इस मन्त्रवाक्यमे उसी परब्रह्मकी उपासना करनेके लिये कहा गया है, जिससे इस जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते है तथा जो समस्त वेदान्तवाक्योमें जगत्के महाकारणरूपसे प्रसिद्ध है । अतः इस प्रकरणमे बताया हुआ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा नहीं।

सम्बन्ध- यहाँ यह प्रश्न उठता है कि छा ० उ० (३।१४१२)में उपास्यदेवको मनोमय और प्राणरूप शरीरवाला कहा गया है। ये विशेषण जीवात्माके हैं। अतः उसको ब्रह्म मान लेनेसे उस वर्णनकी सङ्गति कैसे लगेगी ? इसपर कहते है–

विवक्षितगुणोपपत्तेश्च ॥ १।२।२॥

च-तथा; विवक्षितगुणोपपत्तेः श्रुतिद्वारा वर्णित गुणोकी सङ्गति उस परब्रह्ममें ही होती है. इसलिये ( इस प्रकरणमे कथित उपास्यदेव ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- छा०३० (३।१४।२)मे उपास्यदेवका वर्णन इस प्रकार उपलब्ध होता है. मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः । अर्थात् ‘वह उपान्यदेव मनोमय, प्राणरूप शरीरवाला, प्रकाशस्वरूप, सत्य-संकल्प, आकाशके सदृश व्यापक, सम्पूर्ण जगत्का कर्ता, पूर्णकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस समस्त जगत्को सब ओरसे व्याप्त करनेवाला, वाणीरहित तथा सभ्रमशून्य है।’ इस वर्णनमे उपास्यटेवके जो उपादेय गुण बताये गये है, वे सब ब्रह्ममे ही सद्भत होते है । ब्रह्मको ‘मनोमय’ तथा ‘प्रागरूप शरीरवाला’ कहना भी अनुचित नहीं है; क्योंकि वह सबका अन्तर्यामी आत्मा है। केनोपनिपझे उसको मनका भी मन तथा प्राणका भी प्राण बताया है। इसलिये इस प्रकरणमे बतलाया हुआ उपाम्यदेव परब्रह्म परमेश्वर ही है।

सम्बन्ध- उपर्युक्त सूत्रमें श्रुतिवर्णित गुणोंकी उपपत्ति ( सङ्गति ) ब्रह्ममें श्रोत्रस्य श्रोनं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचर स उ प्राणस्य प्राणः । (के० उ०१। २) बतायी गयी: अब जीवात्मामें उन गुणोंकी अनुपति बनाकर पोत सिद्धान्ती पुष्टि की जाती है–

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अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥ १। २ । ३ ॥

तु-परन्तु अनुपपत्तेः-जीवात्मामें श्रुतिवर्णित गुगोंकी सङ्गति न होनेके कारगः शारीरा-जीवानाः न= इस प्रकरणनें कहा हुआ उपास्यदेव) नहीं है।

व्याल्या- उपासनाके लिये श्रुतिमें जो सत्य-संकल्पना, सर्वव्यापकता. सर्वात्मकता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुण बनाये गये हैं. वे जीवात्मानें नहीं पाये जाते; इस कारण इस प्रसङ्गने बताया हुआ उपास्यदेव जीवाला नहीं है. ऐसा मानना ही ठीक है।

सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे उसी वानको सिद्ध किया जाता है

कर्मकर्तृव्यपदेशाच ॥ १ ॥ २ ॥ ४ ॥

कर्मकर्तव्यपदेशात्-उक्त प्रकरणने उपान्यदेवको प्राप्तिक्रियाका कर्म अर्थात् प्राप्त होने योग्य कहा है और जीवात्माको प्रातिक्रियाका कर्ता अर्थात् उस ब्रह्मको प्राप्त करनेवाला बताया है, इसलिये; च-भी (जीवात्मा उपास्य नहीं हो सकता)।

व्याल्या- उ० (३ । १४ । ४) में कहा गया है कि ‘सर्वकर्मा आदि विशेषगोंसे युक्त ब्रह्म हो मेरे हृदय में रहनेवाल मेरा आत्मा है। मरने के बाद यहाँसे जाकर परलोकमें मैं इसीको प्राप्त होऊँगा !* इस प्रकार यहाँ पूर्वोक्त उपास्यदेवको प्राप्त होने योग्य तथा जीवात्माको उसे पानवाल कहा गया है। अतः यहाँ उपास्य देव परब्रह्म परमात्मा है और उपासक जीवात्मा । यही मानना उचित है।

सम्बन्ध प्रकारान्तरले पुनः उक्त चातकी ही पुष्टि करते हैं,
एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान् बोहर्वा याद्वा सर्षपाद् वा श्यानाकाद् वा श्यामाकतण्डुलाद् वैष म आन्नान्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरि क्षाज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥ (छ.० उ० ३।१४।३)
सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरतः सर्वमिदसम्यात्तोऽवाक्यनादर एपस आत्मान्तहृदय एतद् ब्रौतमिनः प्रेत्याभिसंसवितालि। (छ.उ.३।१४।४)

शब्दविशेषात् ॥ १।२। ५॥

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शब्दविशेषात् ( उपास्य और उपासकके लिये ) शब्दका भेद होनेके कारण भी ( यह सिद्ध होता है कि यहाँ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है )।

व्याख्या- छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रमे कहा गया है* कि यह मेरे हृदयके अंदर रहनेवाला अन्तर्यामी आत्मा है । यह ब्रह्म है । इस कथनमें ‘एप.’ ( यह ) ‘आत्मा’ तथा ‘ब्रह्म’ ये प्रथमान्त शब्द उपास्यदेवके लिये प्रयुक्त हुए है और ‘मे’ अर्थात् ‘मेरा’ यह पष्ठयन्त पद भिन्नरूपसे उपासक जीवात्माके लिये प्रयुक्त हुआ है । इस प्रकार दोनोके लिये प्रयुक्त हुए शब्दोंमे भेद होनेके कारण उपास्यदेव जीवात्मासे भिन्न सिद्ध होता है । अतः जीवात्माको उपास्यदेव नहीं माना जा सकता ।

सम्बन्ध- इसके सिवा

स्मृतेः स्मृति-प्रमाणसे, ॥ १। २ । ६॥

च=भी ( उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है)।

व्याख्या- श्रीमद्भगवद्गीता आदि स्मृति-ग्रन्थसे भी उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है । जैसे- मय्येव मन आधख मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्व न संशयः ॥ ( गीता १२ । ८) ‘मुझमें ही मनको लगा और मुझमे ही बुद्धिको लगा, इसके पश्चात् तू मुझमे ही निवास करेगा अर्थात् मुझे ही प्राप्त करेगा; इसमे कुछ भी संशय नहीं है।’

अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् । यः प्रयानि स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥ (गीता ८ । ५) ‘और जो पुरुष अन्तकालमे मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्यागकर । जाता है, वह मेरे खरूपको प्राप्त होता है; इसमे कुछ भी संशय नहीं है।’

अतः इस प्रसङ्गके वर्णनमे उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, आत्मा या अन्य कोई नहीं । यही मानना ठीक है । ये दोनों मन्त्र चौबीसवें पृष्ठकी टिप्पणी में देखे ।

सम्बन्ध- छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रोंमें उपास्यदेवको हृदयमें स्थित एकदेशीय बतलाया है तथा तीसरे मन्त्रमें उसे सरसों और सावॉसे भी छोटा बताया है। इस अवस्थामें उसे परब्रह्म कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं

अर्भकौकस्त्वात्तव्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्य
त्वादेवं व्योमवच्च ॥ १।२ । ७॥

चेत यदि कहो अर्भकौकस्त्वात उपास्यदेव हृदयरूप छोटे स्थानवाला है, इसलिये; च तथा तद्वयपदेशात्-उसे अत्यन्त छोटा बताया गया है, इस कारण; न-वह ब्रह्म नहीं हो सकता इति न तो यह कहना ठीक नहीं है। निचाय्यत्वात्-क्योंकि ( वह ) हृदयदेशमें द्रष्टव्य है, इसलिये; एवम् उसके विषयमे ऐसा कहा गया है;
च-तथा; व्योमवत्-वह आकाशकी भाँति सर्वत्र व्यापक है ( इस दृष्टिसे भी ऐसा कहना उचित है)।

व्याख्या-यदि कोई यह शङ्का करे कि छा० उ० ३ । १४ के तीसरे और चौथे मन्त्रोमे उपास्यदेवका स्थान हृदय बताया गया है, जो बहुत छोटा है तथा तीसरे मन्त्रमे उसे वान, जौ, सरसों तथा सावाँसे भी अत्यन्त छोटा कहा गया है। इस प्रकार एकदेशीय और अत्यन्त लघु बताया जानेके कारण यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म नहीं हो सकता; क्योकि परब्रह्म परमात्माको सबसे बड़ा, सर्वव्यापी तथा सर्वशक्तिमान् बताया गया है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योकि

उक्त मन्त्र मे जो परब्रह्म परमात्माको हृदयमे स्थित बताया गया है, वह उसके उपलब्धि स्थानकी अपेक्षासे है । भाव यह है कि परब्रह्म परमात्माका स्वरूप आकाशकी भाँति सूक्ष्म और व्यापक है । अतः वह सर्वत्र है। प्रत्येक प्राणीके हृदयमे भी है और उसके बाहर भी * ( ईशा० ५)। (गीता १३ । १५)। अतएव छ तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः । (ईशा० ५) + बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ (गीता १३ । १५)

वह परमात्मा चराचर सब भूतोके बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचररूप भी वही है तथा वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है और अत्यन्त समीप एवं दूरमे भी स्थित वहीं है। उसे हृदयस्थ बता देनेमात्रसे उसका एकदेशीय होना सिद्ध नहीं होता तथा जो उसे धान, जौ, सरसो और सावॉसे भी छोटा बताया गया है, इससे श्रुतिका उद्देश उसे छोटे आकारवाला बताना नहीं है, अपितु अत्यन्त सूक्ष्म और इन्द्रियोद्वारा अग्राह्य ( ग्रहण करनेमे न आनेवाला) बतलाना है । इसीलिये उसी मन्त्रमे यह भी कहा गया है कि वह पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक और समस्त लोकोसे भी बड़ा है। भाव यह है कि वह इतना सूक्ष्म होते
हुए भी समस्त लोकोंके बाहर-भीतर व्याप्त और उनसे परे भी है। सर्वत्र वही है । इसलिये यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं ।

सम्बन्ध- परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमे स्थित होकर भी उनके सुख-दुःख से अभिभूत नहीं होता, उसकी इस विशेषताको वतानेके लिये कहते हैं-

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संभोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेप्यात् ॥ १ । २ । ८ ॥

चेत् यदि कहो; संभोगप्राप्तिः=( सबके हृदयमे स्थित होनेसे चेतन होनेके कारण उसको ) सुख-दुःखोंका भोग भी प्राप्त होता होगा; इति न-तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; चशेष्यात्-क्योकि जीवात्माकी अपेक्षा उस परब्रह्ममे विशेषता है।

व्याख्या- यदि कोई यह शङ्का करे कि आकाशकी भॉति सर्वव्यापक परमात्मा समस्त प्राणियोंके हृदयमे स्थित होनेके कारण उन जीवोंके सुख-दुःखों का भोग भी करता ही होगा; क्योकि वह आकाशकी भॉति जड नहीं, चेतन है और चेतनमे सुख-दुःखकी अनुभूति स्वाभाविक है। तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि परमात्मामे कर्तापनका अभिमान और भोक्तापन नहीं है। वह सबके हृदयमे रहता हुआ भी उनके गुण-दोपोसे सर्वथा असङ्ग है। यही जीवोकी अपेक्षा उसमे विशेषता है ।

जीवात्मा तो अज्ञानके कारण कर्ता और भोक्ता है; किन्तु परमात्मा सर्वथा निर्विकार है । वह केवलमात्र साक्षी है, भोक्ता नहीं (मु० उ० ३।१।१)* इसलिये जीवोंके कर्मफलरूप सुख-दुःखादिसे उसका सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है।

सम्बन्ध- उपर कहे हुए प्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि सबके हृदयमें निवास करते हुए भी परब्रह्म भोक्ता नहीं है। परन्तु वेदान्तमें कहीं-कहीं परमात्मा को भोक्ता भी बताया गया है (क० उ०१।२।२५) । फिर वह वचन तयोरन्यःपिप्पलं स्वाहस्यनननन्यो अभिचाकशीति॥ (मु०३० ३।११), किसी अन्यके विषयमें है या उसका कोई दूसरा ही अर्थ है ? यह निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं

अत्ता चराचरग्रहणात् ॥ १ । २ । ९॥

चराचरग्रहणात-चर और अचर सबको ग्रहण करनेके कारण यहाँ, अत्ता भोजन करनेवाला अर्थात् प्रलयकालमे सबको अपनेमे विलीन करनेवाला ( परब्रह्म परमेश्वर ही है)।

व्याख्या- कठोपनिषद् (१ । २ । २५) मे कहा गया है कि ‘यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ।।’ अर्थात् (संहारकालमे) जिस परमेश्वरके ब्राह्मण और क्षत्रिय अर्थात् समस्त स्थावर जगम प्राणीमात्र भोजन बन जाते हैं तथा सबका संहार करनेवाला मृत्यु उपसेचन (व्यञ्जन-शाक आदि ) बन जाता है,

वह परमेश्वर जहाँ और जैसा है, यह कौन जान सकता है ।’ इस श्रुतिमे जिस भोक्ताका वर्णन है, वह कर्मफलरूप सुख-दुःख आदिका भोगनेवाला नहीं है। अपितु संहारकालमें मृत्युसहित समस्त चराचर जगत्को अपनेमें विलीन कर लेना ही यहाँ उसका भोक्तापन है । इसलिये परब्रह्म परमात्माको ही यहाँ अत्ता या भोक्ता कहा गया है, अन्य किसीको नहीं।

सम्बन्ध-इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं।

प्रकरणाच्च ॥ १।२ । १०॥

प्रकरणात् प्रकरणसे; च=भी ( यही बात सिद्ध होती है)।

व्याख्या- उपर्युक्त मन्त्रके पूर्व बीसवेसे चौबीसवेतक परब्रह्म परमेश्वरका ही प्रकरण है । उसीके स्वरूपका वर्गन करके उसे जाननेका महत्त्व तथा उसकी कृपाको ही उसे जाननेका उपाय बताया गया है । उक्त मन्त्रमे भी उस परमेश्वर को जानना अत्यन्त दुर्लभ बतलाया गया है, जो कि पहलेसे चले आते हुए प्रकरण के अनुरूप है ।

अतः पूर्वापरके प्रसङ्गको देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही अत्ता ( भोजन करनेवाला ) कहा गया है ।

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सम्बन्ध-अब यहॉ यह जिज्ञासा होती है कि इसके बादवाली श्रुति (१।३।१ ) में ( कर्मफलरूप) ‘ऋत’को पीनेवाले छाया और धूपके सहश दो भोक्ताओंका वर्णन है । यदि परमात्मा कर्मफलका भोक्ता नहीं है तो उक्त दो भोक्ता कौन-कौन-से है ? इसपर कहते है,

गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तदर्शनात् ॥ १।२।११॥

गुहाम्-हृदयरूप गुहामे; प्रविष्टौ प्रविष्ट हुए दोनो; आत्मानौ जीवात्मा और परमात्मा हि-ही हैं; तदर्शनात क्योकि ( दूसरी श्रुतिमें भी ) ऐसा ही देखा जाता है।

व्याख्या- कठोपनिषद् (१ । ३ । १ ) मे कहा है ‘ऋत पिबन्ती सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः।। अर्थात् ‘शुभ कर्मोके फलखरूप मनुष्य-शरीरके भीतर परब्रह्मके उत्तम निवास स्थान (हृदयाकाश ) मे बुद्रिरूप गुहामे छिपे हुए तथा ‘सत्य’ का पान करनेवाले दो है,

वे दोनों छाया और धूपकी भॉति परस्पर विरुद्ध खभाववाले है। यह बात ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी कहते है । तथा जो तीन वार नाचिकेत अग्निका चयन करनेवाले पञ्चाग्नि-सम्पन्न गृहस्थ है, वे भी कहते है ।’ इस मन्त्रमे कहे हुए दोनो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही है। उन्हींका वर्णन छाया और धूपके रूपमें हुआ है ।

परमात्मा सर्वज्ञ, पूर्ण ज्ञानस्वरूप एवं स्वप्रकाश है, अतः उसका धूपके नामसे बर्गन किया गया है । और जीवात्मा अल्पज्ञ है । उसमे जो कुछ स्वन्य ज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है । जैसे छायामे जो थोड़ा प्रकाश होता है, वह धूपका ही अंग होता है। इसलिये जीवात्माको छायाके नाम से कहा गया है। दूसरी श्रुतिमे भी जीवात्मा और परमात्माका एक साथ मनुष्य-शरीर में प्रविट होना इस प्रकार कहा है–सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि’ (छा० उ० ६ । ३ । २) अर्थात् ‘उस देवता ( परमात्मा ) ने ईक्षण (सकल्प) किया कि मै इस जीवात्माके सहित इन तेज आदि तीनों देवताओमे अर्थात् इनके कार्यरूप
शरीरमे प्रविष्ट होकर नाम और रूपको प्रकट करूँ।’

इससे भी यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त कठोपनिपके मन्त्रमे कहे हुए छाया और धूप सदृश दो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही है । यहाँ जो जीवात्माके साथ-साथ परमात्माको सत्य अर्थात श्रेष्ठ कोंके फलका भोगनेवाला बताया गया है, उसका यह भाव है कि परब्रह्म परमेश्वर ही समस्त देवता आदिके रूपमे प्रकारान्तरसे समस्त यज्ञ और तपरूप शुभ कर्मोंके भोक्ता हैं । परन्तु उनका भोक्तापन सर्वथा निर्दोष है, इसलिये वे भोगते हुए भी अभोक्ता ही हैं।

सम्बन्ध-उपर्युक्त कथनकी सिद्धिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं

विशेषणाच ॥ १। २ । १२ ॥

विशेषणात=( आगेके मन्त्रोंमे ) दोनोके लिये अलग-अलग विशेषण दिये गये हैं, इसलिये; च=भी ( उपर्युक्त दोनो भोक्ताओंको जीवात्मा और परमात्मा मानना ही ठीक है)।

व्याख्या- इसी अध्यायके दूसरे मन्त्रमे उस परम अक्षर ब्रह्मको संसारसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये ‘अभय पद’ बताया गया है । तथा उसके बाद रथके दृष्टान्तमें जीवात्माको रथी और उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्तव्य परमधामके नामसे कहा गया है । इस प्रकार उन दोनोके लिये पृथक्-पृथक् विशेषग होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ जिनको गुहामें प्रविष्ट बताया गया है, वे जीवात्मा और परमात्मा ही है।

सम्बन्ध- यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि परमात्माकी उपलब्धि हृदयमे होती है, इसलिये उसे हृदयमै स्थित वताना तो ठीक है, परन्तु छान्दोग्योपनिपद् (४।१५।१) में ऐसा कहा है कि ‘यह जो नेत्रमै पुरुप दीखता है, यह आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय और ब्रह्म है । अतः यहाँ नेत्र में स्थित पुरुष कौन है ? इसका निर्णय करनेके लिये
अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है.—-

अन्तर उपपत्तेः ॥ १।२।१३ ॥

अन्तरे-जो नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाला कहा गया है, वह ब्रह्म ही है। उपपत्तेः-क्योंकि ऐसा माननेसे ही पूर्वापर-प्रसङ्गकी सङ्गति बैठती है ।

व्याख्या- यह प्रसङ्ग छान्दोग्योपनिषद्मे चौथे अध्यायके दशम खण्डसे आरम्भ हुआ है और पन्द्रहवे खण्डमें समाप्त । प्रसङ्ग यह है कि उपकोशल नामका

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरस् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ (गीता ५ । ३९) अहं हि सर्वयज्ञानां भोत्ता च प्रभुरेव च। (गीता ९ । २३ ) + सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असतं सर्वभूच्चैव निर्गुणं गुणभोक्त च ।। (गीता १३ । १४)

ब्रह्मचारी सत्यकाम नामक ऋपिके आश्रममें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करता हुआ गुरुकी और अग्नियोंकी सेवा करता था । सेवा करते-करते उसे बारह वर्ष व्यतीत हो गये; परन्तु गुरुने उसे न तो उपदेश दिया और न स्नातक ही बनाया । इसके विपरीत उसीके साथ आश्रममे प्रविष्ट होनेवाले दूसरे शिष्योको स्नातक बनाकर घर भेज दिया।

तब आचार्यसे उनकी पत्नीने कहा, ‘भगवन् ! इस ब्रह्मचारीने अग्नियोकी अच्छी प्रकार सेवा की है । तपस्या भी इसने की ही है। अब इसे उपदेश देनको कृपा करे ।’ परन्तु अपनी भार्याकी बातको अनसुनी करके सत्यकाम ऋपि उपकोगलको उपदेश दिये बिना ही बाहर चले गये । तब मनमे दुखी होकर उपकोशलने अनशन व्रत करनेका निश्चय कर लिया। यह देख आचार्य-पत्नीने पूछा—‘ब्रह्मचारी ! तू भोजन क्यो नहीं करता है।

उसने कहा, ‘मनुष्यके मनमे बहुत-सी कामनाएँ रहती है । मेरे मनमे बड़ा दुःख है, इसलिये में भोजन नहीं करूंगा। तब अग्नियोने एकत्र होकर विचार किया कि इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है, अत. उचित है कि हम इसे
उपदेश करे ऐमा विचार करके अग्नियोने कहा ‘प्राण ब्रह्म है, क ब्रह्म है, ख ब्रह्म है ।’ उपकांशल बोला—‘यह बात तो मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है।

परन्तु ‘क’ और ‘ख’ को नहीं जानता।’ अग्नियोने कहा निस्सन्देह जो ‘क’ है, वही ‘ख’ है और जो ‘ख’ है, वही ‘क’ है तथा प्राण भी वही है । इस प्रकार उन्होने ब्रह्मको ‘क’ सुख-स्वरूप और ‘ख’ आकाशकी भॉति सूक्ष्म एव व्यापक बताया तथा वही प्राणरूपसे सबको सत्ता-स्कृति देनेवाला है। इस प्रकार सकेतसे ब्रह्मका परिचय कराया। उसके बाद गार्हपत्य अग्निने प्रकट होकर कहा-‘सूर्यमे जो यह पुरुष दीखता है, वह मै हूँ, जो उपासक इस प्रकार जानकर उपासना करता है, वह पाणेका नाश करके अच्छे लोकोका अधिकारी होता है तथा पूर्ण आयुष्मान् और उज्ज्वल जीवनसे युक्त होता है। उसका वश कभी नष्ट नहीं होता ।

इसके बाद ‘अन्वाहार्यपचन’ अग्निने प्रकट होकर कहा, ‘चन्द्रमामे जो यह पुरुष दिखायी देता है, वह मैं हूँ । जो मनुष्य इस रहस्यको समझकर उपासना करता है, वह अच्छे लोकोका अधिकारी होता है ।’ इत्यादि तत्पश्चात आहवनीय अग्निने प्रकट होकर कहा, ‘विजलीमे जो यह पुरुष दीखता है, वह मैं हूँ।’ इसको जानकर उपासना करनेका फल भी उन्होने दूसरी अन्नियोकी भाँति ही बतलाया । तदनन्तर सब अग्नियोंन एक साथ कहा. ‘हे उपकोशल ! हमने तुमको हमारी विद्या ( अग्नि-विद्या ) और आत्म-विद्या दोनों ही बतलायी है ।

आचार्य तुमको इनका मार्ग दिखलावेंगे।’ इतनमें ही उसके गुरु सत्यकाम आ गये। आचार्यने पूछा, ‘सौम्य । तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताकी भाँति चमकता है, तुझे किसने उपदेश दिया है ? उपकाशलने अग्नियोंकी ओर संकेत किया । आचार्यन पूछा. ‘इन्होंने तुझे क्या बतलाया है ? तत्र उपकोशलने अग्नियोंसे सनी नई सब बातें बता दी।

तत्पश्चात आचार्यन कहा. हे सौग्य ! इन्होंने तुझे केवल उत्तम लोकत्राप्तिके साधनका उपदेश दिया है, अब मैं तुझे वह उपदेश देता हूँ, जिसको जान लेनेवालेको पाप उसी प्रकार स्पर्श नहीं कर सकते, जैसे कमलके पत्तेको जल उपकोशलने कहा, ‘भगवन् ! बतलानेकी कृपा कीजिये । इसके उत्तरमें आचार्यने कहा, ‘जो नेत्रमे यह पुरुष दिखलायी देता है, यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय और ब्रह्म है । उसके बाद उसीको संयद्दामा धाननी’ और ‘भामनी’ बतलाकर अन्तमें इन विद्याओका फल अर्चिमार्गले ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है।

इस प्रकरणको देखने से मालूम होता है कि आँखके भीतर दीखनेवाला पुरुष परब्रह्म ही है. जीवात्मा या प्रतिविम्बके लिये यह कथन नहीं है, क्योकि ब्रह्मविद्या के प्रसङ्गमे उसका वर्णन करके उसे आत्मा, अमृत, अभय और ब्रह्म कहा है। इन विशेषणोंकी उपपत्ति ब्रह्ममे ही लग सकती है. अन्य किसीमे नहीं ।

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सम्बन्ध-अब यह जिज्ञासा होती है कि यहाँ ब्रह्मको ऑसमें दीखनेवाला युरुप क्यों कहा गया ? वह किसी न्शनविशेषमें रहनेवाला थोड़े ही है ? इसपर कहते हैं

स्थानादिव्यपदेशाच ॥ १ । २ । १४ ॥

स्थानादिव्यपदेशात् श्रुतिमे अनेक स्थलोंपर ब्रह्मके लिये स्थान आदिका निर्देश किया गया है. इसलियेः च- भी ( नेत्रान्तर्वी पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)।
गया है । इसी प्रकार अन्य श्रुतियोमे भी वर्गन आया है | अतः यहाँ ब्रह्मको नेत्रमे दीखनेवाला कहना अयुक्त नहीं है। क्योकि ब्रह्म निर्लिप्त है और ऑखमे दीखनेवाला पुरुष भी ऑखके दोपोसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है । इस समानताको लेकर ब्रह्मका तत्व समझानेके लिये ऐसा कहना उचित ही है । इसीलिये वहाँ यह भी कहा है कि ‘ ऑखमे घी या पानी आदि जो भी वस्तु डाली जाती है, वह ऑखकी पलकोंमे ही रहती है, द्रष्टा पुरुपका स्पर्श नहीं कर सकती ।’

सम्बन्ध-उक्त सिद्धान्तको दृढ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं

सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॥ १ । २ । १५॥

च-नया: सुखविशिष्टाभिधानात नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको आनन्दयुक्त बताया गया है, इसलिये एव-भी ( यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- उक्त प्रसङ्गमे यह कहा गया है कि यह नेत्रमे दीखनेवाला पुरुष ही अमृत, अभय और ब्रह्म है।’ इस कथनमे निर्भयता और अमृतत्व-ये दोनो ही सुखके सूचक है । तथा जब अग्नियोने एकत्र होकर पहले-पहल उपदेश दिया है, वहाँ कहा गया है कि जो ‘क’ अर्थात् सुख है, वही ‘ख’ अर्थात् ‘आकाश’ है। भाव यह है कि वह ब्रह्म आकाशकी भॉति अत्यन्त सूक्ष्म, सर्वव्यापी और आनन्दस्वरूप है । इस प्रकार उसे आनन्दयुक्त बतलाया जानेके कारण वह ब्रह्म ही है।

सम्बन्ध-इसके सिवा,

श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ॥ १। २ । १६ ॥

श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानात-उपनिषद् अर्थात् रहस्य-विज्ञानका श्रवण कर लेनेवाले ब्रह्मवेत्ताकी जो गति बतायी है, वही गति इस पुरुपको जाननेवालेकी भी कही गयी है, इससे; च-भी ( यही ज्ञात होता है कि नेत्रमे दीखनवाला पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- इस प्रमङ्गके अन्तमे इस नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको जाननेवालेकी वही पुनरावृत्तिरहित गति अर्थात देवयानमार्गसे जाकर ब्रह्मलोकमे ब्रह्मको प्राप्त होने और वहॉसे पुन. इस संसारमे न लौटनकी बात बतायी गयी है। जो अन्यत्र ब्रह्मवेत्ताके लिये कही गयी है (प्र० उ०१।१०) * । इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ नेत्रमें दीखनेवाला पुरुष ब्रह्म ही है।

सम्बन्ध यदि इस प्रकरणमें नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाले प्रतिविम्ब, नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा- इनमेंसे किसी एकको नेत्रान्तर्वती पुरुष मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं—

अनवस्थितेरसंभवाच्च नेतरः ।।१२।१७ ॥

अनवस्थिते: अन्य किसीकी नेत्रमें निरन्तर स्थिति न होनेके कारण; च= तथा; असंभवात् ( श्रुतिमें बताये हुए अमृतत्व आदि गुग ) दूसरे किसीमे सम्भव न होनेसे; इतर:-ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भी; न नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं है।

व्याख्या- छाया-पुरुष या प्रतिविम्ब नेत्रेन्द्रियमें सदा नहीं रहता; जब कोई पुरुष सामने आता है, तब उसका प्रतिविम्ब नेत्रमे दिखायी देता है और उसके हटते ही अदृश्य हो जाता है । इन्द्रियानुग्राहक देवताकी स्थिति भी नेत्रमे सदा नहीं रहती, जिस समय वह इन्द्रिय अपने विषयको ग्रहण करती है, उसी समय वह उसके सहायक रूपसे उसमें स्थित माना जाता है ।

इसी प्रकार जीवात्मा भी मनके द्वारा एक समय किसी एक इन्द्रियके विषयको ग्रहण करता है तो दूसरे समय दूसरी ही इन्द्रियके विषयको; और सुषुप्तिमे तो किसीके भी विषयको नहीं ग्रहण करता । अतः निरन्तर एक-सी स्थिति आँखमे न रहनेके कारण इन तीनोमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष
नहीं कहा जा सकता । इसके सिवा, नेत्रमे दिखायी देनेवाले पुरुषके जो अमृतत्व और निर्भयता आदि गुण श्रुतिन बताये है, वे ब्रह्मके अतिरिक्त और किसीमे’ सम्भव नहीं है।

इस कारण भी उपर्युक्त तीनोंमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं माना जा सकता । इसलिये परब्रह्म परमेश्वरको ही यहाँ नेत्रमे दिखायी देनेवाला पुरुष कहा गया है; यही मानना ठीक है। अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽस्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते। एतदुबै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मास पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः। किन्तु जो तपस्याके साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक और श्रद्धासे युक्त होकर अध्यात्मविद्याके द्वारा परमात्माकी खोज करके जीवन सार्थक कर लेते हैं,
वे उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकको जीत लेते (प्राप्त कर लेते) हैं। यही प्राणोका केन्द्र है । यह अमृत और निर्मय पद है। यह परम गति है। इससे पुनः लौटकर नहीं आते । इस प्रकार यह निरोध– पुनरावृत्ति-निवारक है।’

सम्बन्ध- पूर्वप्रकरणमें यह वात बतायी गयी है कि श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मके लिये भिन्न-भिन्न स्थान आदिका निर्देश किया गया है । अव पुन: अधिदैव, अधिभूत आदिमें उस ब्रह्मकी व्याप्ति वतलाकर उसी बातका समर्थन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है

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अन्तर्याम्यधिदेवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १। २ । १८॥

अधिदेवादिषु-आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि समस्त वस्तुओंमे; अन्तर्यामी जिसे अन्तर्यामी वतलाया गया है ( वह परब्रह्म ही है ); तद्धर्म व्यपदेशात्-क्योंकि वहाँ उसीके धोका वर्णन है।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (३ । ७ ) में यह प्रसङ्ग आया है। वहाँ उद्दालक ऋषिन याज्ञवल्क्य मुनिसे पहले तो सूत्रात्माके विपयमे प्रश्न किया है। फिर उस अन्तर्यामीके सम्बन्धमे पूछा है, जो इस लोक और परलोकको तथा समस्त भूत-प्राणियोंको उनके भीतर रहकर नियन्त्रणमे रखता है । इसके उत्तरमे याज्ञवल्क्यने सूत्रात्मा तो वायुको वताया है और अन्तर्यामीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उसे जड़-चेतनात्मक समस्त भूतो, सब इन्द्रियो और सपूर्ण जीवोंका नियन्ता बताकर अन्तमे इस प्रकार कहा है

यह अन्तर्यामी देखनमे न आने वाला किन्तु स्वयं सवको देखनेवाला है, सुननमें न आनेवाला किन्तु स्वयं सत्र कुछ सुननेवाला है और मनन करनेमे न
आनेवाला किन्तु खयं सबका मनन करनेवाला है । वह विशेषरूपसे किसीके जाननमे नहीं आता, किन्तु स्वयं सबको विशेषरूपसे भलीभाँति जानता है । ऐसा यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इससे भिन्न सब कुछ विनाशशील है ।’ इस वर्णनमे आये हुए महत्त्वसूचक विशेषण परब्रह्ममे ही सङ्गत हो सकते हैं । जीवात्माका अन्तर्यामी आत्मा ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई नहीं हो सकता । अतः इस प्रसङ्गमे ब्रह्मको ही अन्तर्यामी बताया गया है..–यही मानना ठीक है ।

सम्बन्ध- पूर्वसूत्रमें विधि-मुखसे यह बात सिद्ध की गयी कि अन्तर्यामी ब्रह्म ही है । अव निषेधमुखसे यह सिद्ध करते हैं कि अव्यक्त जड प्रकृति,अन्तर्यामी नहीं हो सकती

न च स्मार्तमतधर्मामिलापात् ॥ १।२ । १६ ॥

सातम्-सांख्यस्मृतिद्वारा प्रतिपादित प्रधान ( जड प्रकृति); च-भी; न= अन्तर्यामी नहीं है; अतद्धर्मामिलापात-क्योकि इस प्रकरणमे बताये हुए द्रष्टापन आदि धर्म प्रकृतिके नहीं है ।

व्याख्या- सांख्य-स्मृतिद्वारा प्रतिपादित जड प्रकृतिके धर्मोका वर्णन वहाँ अन्तर्यामीके लिये नहीं हुआ है। अपितु चेतन परब्रह्मके धर्मोका ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । इस कारण वहाँ कहा हुआ अन्तर्यामी प्रकृति नहीं हो सकती । अतः यही सिद्ध होता है कि इस प्रकरणमे ‘अन्तर्यामी’ के नामसे पर ब्रह्म परमात्माका ही
वर्णन हुआ है।

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अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १।१९॥

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sutra 19-30

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

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सम्बन्ध-परब्रह्म परमात्माके सिवा, प्रकृति या जीवात्मा कोई भी ‘आनन्द मय’ शब्दसे गृहीत नहीं हो सकता; इस बातको दृढ़ करते हुए प्रकरणका उपसंहार करते हैं

अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १।१९॥

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व्याख्या- तै० उ० (२८)मे श्रुति कहती है कि इस आनन्दमय परमात्माके तत्वको इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् अन्नमयादि समस्त शरीरोके आत्मस्वरूप आनन्दमय ब्रमको प्राप्त हो जाता है ।’ बृहदारण्यको थी श्रुतिका कथन है कि (ब्रह्मको जाननेवाला पुरुष ) ब्रह्मरूप होकर ही ब्रह्ममे लीन होता है। (बृह० उ० ४ । ४ । ६) श्रुतिके इन वचनोसे यह खत सिद्ध हो जाता है कि जड प्रकृति या जीवात्माको ‘आनन्दमय’ नहीं माना जा सकता, क्योकि चेतन जीवात्मा का जड प्रकृतिमे अथवा अपने ही-जैसे परतन्त्र दूसरे किसी जीवमे लय होना नहीं बन सकता । इसलिये एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही ‘आनन्दमय’ शब्दका वाच्यार्थ है और वही सम्पूर्ण जगत्का कारण है,
दूसरा कोई नहीं ।

सम्बन्ध- तैत्तिरीय श्रुतिमें जहाँ आनन्दमयका प्रकरण आया है, वह ‘विज्ञानमय’ शब्दसे जीवात्माको ग्रहण किया गया है, किन्तु बृहदारण्यक (४।४।२२ ) में ‘विज्ञानमय’ को हृदयाकाशमें शयन करनेवाला अन्तरात्मा बताया गया है। अतः जिज्ञासा होती है कि वहाँ विज्ञानमय’ शब्द जीवात्मा का वाचक है अथवा ब्रहाका ?

इसी प्रकार छान्दोग्य (१।६।६ ) में जो सूर्यमण्डलानर्वती हिरण्मय पुरुषका वर्णन आया है, वहाँ भी यह शङ्का हो सकती है कि इस मन्त्रमें सूर्य के अधिष्ठाता देवताका वर्णन हुआ है या ब्रह्मका ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है,

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अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ १।१।२० ॥

अन्तः हृदयके भीतर शयन करनेवाला विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलके भीतर स्थित हिरण्मय पुरुष ब्रह्म है; तद्धर्मोपदेशात्= क्योकि (उसमे ) उस ब्रह्मके धर्मोका उपदेश किया गया है।

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व्याख्या- उपर्युक्त बृहदारण्यक-श्रुतिमे वर्णित विज्ञानमय पुरुपके लिये इस प्रकार विशेषण आये है–सर्वस्य वशी सर्वस्येशान. सर्वस्याधिपतिः एष सर्वेश्वर एप भूतपालः’ इत्यादि । तथा छान्दोग्यवर्णित सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती पुरुषके लिये सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदिनः ( सब पापोसे ऊपर उठा हुआ ) यह विशेषण दिया गया है। ये विशेषण परब्रह्म परमेश्वरम ही सम्भव हो सकते है। किसी भी स्थिति को प्राप्त देव, मनुष्य आदि यानियोंमें रहनेवाले जीवात्माके ये धर्म नहीं हो सकते। इसलिये वहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष ममझना चाहिये; अन्य किसीको नहीं ।

सम्बन्ध-इसी बानको सिद्ध करनेके लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं

भेदव्यपदेशाच्चान्यः ॥ १।१।२१ ॥

च-तथा; भेदव्यपदेशात् भेदका कयन होनेसे; अन्याः सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भिन्न है।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद्के अन्तर्यामिब्राह्मणमें कहा है कि-‘य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद यस्यादित्यः शरीरं य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः । अर्थात् जो सूर्यमें रहनेवाला सूर्यका अन्तर्वर्ती है, जिसे सूर्य नहीं जानता, सूर्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर सूर्यका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इस प्रकार वहाँ सूर्यान्तर्वर्ती पुरुषका सूर्यके अधिष्ठाता देवतासे भेद बताया गया है। इसलिये वह हिरण्मय पुरुष सूर्यके अधिष्ठातासे भिन्न परब्रह्म परमात्मा ही है ।

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सम्बन्ध- यहॉतकके विवेचनसे यह सिद्ध किया गया कि जगत्की उत्पत्ति स्थिति और प्रलयका निमित्त और उपादान कारण परब्रह्म परमेश्वर ही है। जीवात्मा या जड़ प्रकृति नही । इसपर यह जिज्ञासा होती है कि श्रुति (छा०३० १।९।१ ) में जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण आकाशको भी बताया गया है, फिर ब्रह्मका लक्षण निश्चित करते हुए यह कैसे कहा गया कि जिससे जगत्के जन्म आदि होते हैं, वह ब्रह्म है । इसपर कहते हैं–

आकाशस्तल्लिंडात् ॥ १।१।२२॥

आकाशः=(वहाँ ) ‘आकाश’ शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है; तल्लिङ्गात्-क्योकि ( उस मन्त्रमे ) जो लक्षण बताये गये हैं, वे उस ब्रह्मके ही हैं।
व्याख्या- छान्दोग्य (१ । ९ । १ ) में इस प्रकार वर्णन आया है ‘सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशम्प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो होवेभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् । अर्थात् ‘ये समस्त भूत (पञ्चतत्त्व और समस्त प्राणी) निःसन्देह आकाशसे ही उत्पन्न होते है और आकाशमे ही विलीन होते हैं । आकाश ही इन सबसे श्रेष्ठ और बड़ा है। वही इन सबका परम आधार है।’ इसमे आकाशके लिये जो विशेषण आये है, वे भूताकाशमे सम्भव नहीं हैं। क्योंकि भूताकाश तो स्वयं भूतोंके समुदायमे आ जाता है । अतः उससे भूतसमुदायकी या प्राणियोंकी उत्पत्ति बतलाना सुसङ्गत नहीं है। उक्त लक्षण एकमात्र परब्रह्म परमात्मामे ही सङ्गत हो सकते है । वही
सर्वश्रेष्ठ, सबसे बड़ा और सर्वाधार है; अन्य कोई नहीं । इसलिये यही सिद्ध होता है कि उस श्रुतिमे ‘आकाश’ नामसे परब्रह्म परमेश्वरको ही जगतका कारण बताया गया है।

सम्बन्ध-अब प्रश्न उठता है कि श्रुति (छा० उ०१।११।५) मे आकाशकी ही भॉति प्राणको भी जगत्का कारण बतलाया गया है। वहाँ ‘प्राण’ शब्द किसका वाचक है ? इसपर कहते है,

महाभारत में वैज्ञानिक तत्त्व

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अत एव प्राणः ॥ १।१ । २३॥

अत एव-इसीलिये अर्थात् श्रुतिमे कहे हुए लक्षण ब्रह्ममे ही सम्भव है, इस कारण वहाँ; प्राणः प्राण (भी ब्रह्म ही है)।

व्याख्या- छान्दोग्य (१ । ११ । ५) मे कहा है कि सर्वाणि हवा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते । अर्थात् निश्चय ही ये सब भूत प्राणने ही विलीन होते हैं और प्राणसे ही उत्पन्न होते है। ये लक्षण प्राणवायुमे नहीं घट सकते क्योकि समस्त प्राणियोकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का कारण प्राणवायु नहीं हो सकता । अत. यहाँ ‘प्राण’ नामसे ब्रह्मका ही वर्णन हुआ है, ऐसा मानना चाहिये ।

पूर्व प्रकरणमें तो ब्रह्मसूचक लक्षण होनेसे आकाश तथा प्राणको ब्रह्मका वाचक मानना उचित है। किन्तु छान्दोग्योपनिषद (३।१३।७) में जिस ज्योति (तेज )को समस्त विश्वसे उपर सर्वश्रेष्ठ परमधाममें प्रकाशित बताया है तथा जिसकी शरीरान्तर्वी पुरुषमें स्थित ज्योतिके साथ एकता बतायो गयी है, उसके लिये वहाँ कोई ऐसा लक्षण नहीं बताया गया है, जिससे उसको ब्रह्मका वाचक माना जाय ।

इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त ज्योतिः’ शब्द किसका वाचक हे ? इसपर कहते हैं—

ज्योतिश्चरणाभिधानात् ॥ १।१।२४ ॥

चरणाभिधानात्=( उस प्रसङ्गमे ) उक्त ज्योतिके चार पादोका कथन होने से; ज्योति: ज्योति’ शब्द वहाँ ब्रह्मका वाचक है ।

व्याख्या – छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायमे ज्योति.’का वर्णन इस प्रकार हुआ है, अथ यदत. परो दिवो ज्योतिदीप्यते विश्चत. पृष्ठेषु सर्वत पृष्ठेष्वनुत्तमे वृत्तमेधुलोकेश्विदं वाव तयदिदमस्मिन्नन्त पुरुष ज्योति । (३।१३१७) अर्थात् जो इस वर्गलोकसे ऊपर परम ज्योति प्रकाशित हो रही है, वह समस्त विश्वके पृष्ठपर (सबके ऊपर ) जिससे उत्तम दूसरा कोई लोक नहीं है, उस सर्वोत्तम परमधाममे प्रकाशित हो रही है, वह निस्सन्देह यही है जो कि इस पुरुषमें आन्तरिक ज्योति है । इस प्रसङ्गमें आया हुआ ‘ज्योतिः’ शब्द जड प्रकाशका वाचक नहीं है, यह बात तो इसमे वर्णित लक्षणोंसे ही स्पष्ट हो जाती है । तथापि यह ‘ज्योति शब्द किसका वाचक है ?

ज्ञानका या जीवात्माका अथवा ब्रह्मका ? इसका निर्णय नहीं होता अतः सूत्रकार कहते हैं कि यहाँ जो ज्योति शब्द आया है, वह ब्रह्म का ही वाचक है; क्योंकि इसके पूर्व बारहवें खण्डमे इस ज्योतिर्मय ब्रह्मके चार पादोंका कथन है और समस्त भूतसमुदायको उसका एक पाद बताकर शेष तीन पादोंको अमृतखरूप तथा परमधाममें स्थित बताया है । इसलिये इस प्रसङ्गमे आया हुआ ज्योतिः’ शब्द ब्रह्मके सिवा अन्य किसीका वाचक नहीं हो सकता । माण्डूक्योपनिषद्मे आत्माके चार पादोंका वर्णन करते हुए उसके दूसरे पादको तैजस कहा है । यह ‘तेजस’ भी ज्योतिः’का पर्याय ही है । अतः ‘ज्योतिः’की भाँति ‘तेजस’ शब्द भी ब्रह्मका ही वाचक है,
जीवात्मा या अन्य किसी प्रकाशका नहीं। इस बातका निर्णय भी इसी प्रसङ्गके अनुसार समझ लेना चाहिये।

सम्बन्ध- यहाँ यह शङ्का होती है कि छान्दोग्योपनिषद्के तीमरे अध्याय के बारहवें खण्डमें ‘गायत्री के नामसे प्रकरणका आरम्भ हुआ है। गायत्री एक छन्दका नाम है । अत: उस प्रसङ्गमें ब्रह्मका वर्णन है, यह कैसे माना जाय ? इसपर कहते हैं,

छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगदात
तथा हि दर्शनम् ॥ १।१।२५॥

चेत् यदि कहो ( उस प्रकरणमे ); छन्दोऽभिधानात् गायत्री छन्दका कथन होनेके कारण ( उसीके चार पादोंका वर्णन है) न-ब्रह्मके चार पादोंका वर्णन नहीं है; इति न-तो यह ठीक नहीं ( क्योंकि); तथा उस प्रकारके वर्णनद्वारा वह मन्त्र इस प्रकार है,

तावानस्य महिमा ततो ज्यायारच पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्या मृनं दिवि ।। (छा० उ. ३ । १२ । ६)

चेतोऽर्पणनिगदात् ब्रह्ममे चित्तका समर्पण बताया गया है; तथा हि दर्शनम् = वैसा ही वर्णन दूसरी जगह भी देखा जाता है ।

व्याख्या पूर्व प्रकरणमे गायत्री ही यह सब कुछ है। (छा० उ०३ । १२ । १) इस प्रकार गायत्रीछन्दका वर्णन होनेसे उसीके चार पादोका वहाँ वर्णन है, ब्रह्मका नहीं; ऐसी धारणा बना लेना ठीक नहीं है। क्योकि गायत्रीनामक छन्दके लिये यह कहना नहीं बन सकता कि यह जड़-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् गायत्री ही है ।

इसलिये यहाँ ऐसा समझना चाहिये कि सबके परम कारण सर्वात्मक परब्रह्म परमेश्वरमे चित्तका समाधान करानके लिये उस ब्रह्मका ही वहाँ इस प्रकार गायत्री-नामसे वर्णन किया गया है । इसी तरह अन्यत्र भी उद्गीथ, प्रणव आदि नामोके द्वारा ब्रह्मका वर्णन देखा जाता है । सूक्ष्म तत्वमे बुद्धिका प्रवेश करानके लिये, किसी प्रकारको समानताको लेकर स्थूल वस्तुके नामसे उम्मका वर्णन करना उचित ही है।

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

सम्बन्ध- इस प्रकरणमै ‘गायत्री’ शब्द ब्रह्मका ही वाचक है, इस बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति प्रस्तुत करते हैं—

भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् ॥ १।१।२६ ॥

भृतादिपादव्यपदेशोपपत्तेः-( यहाँ ब्रह्मको ही गायत्रीके नामसे कहा गया है, यह माननेमे ही ) भूत आदिको पाद बतलाना युक्तिसंगत हो सकता है, इमलिये; च-भी; एवम् ऐसा ही है ।

व्याख्या- छान्दोग्य (३ । १२) के प्रकरणमे गायत्रीको भूत, पृथिवी, शरीर और हृदयरूप चार पाटोमे युक्त बताया गया है। फिर उसकी महिमाका वर्णन करते हुए ‘पुरुष’ नामसे प्रतिपादित परब्रह्म परमात्माके साथ उसकी एकता करके समस्त भूतोको ( अर्थात् प्राणि-समुदायको ) उसका एक पाद बतलाया गया है और अमृतस्वरूप तीन पादोको परमधाममे स्थित कहा गया है । ( छा० उ० ३ । १२।६) । इस वर्णनकी सगति तभी लग सकती है, जब कि गायत्री शब्दको गायत्री छन्दका वाचक न मानकर परब्रह्म परमात्माका वाचक माना जाय । इमलिये यही मानना ठीक है।

सम्बन्ध-उक्त सिद्धान्तकी पुष्टि के लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उपस्थित करके उसका समाधान करते हैं–

उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् ॥ १।१।२७ ॥

चेत् यदि कहो; उपदेशभेदात्-उपदेशमें भिन्नता होनेसे न-गायत्रीशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं है, इति न तो यह कथन ठीक नहीं है। उभयलिन् अपि क्योकि दो प्रकारका वर्णन होनेपर भी; अविरोधात् ( वास्तवमें ) कोई विरोध नहीं है ।

व्याख्या यदि कहा जाय कि पूर्वमन्त्र ( ३ । १२ । ६ ) मे तो तीन पाद दिव्य लोकमे हैं। यह कहकर दिव्य लोकको ब्रह्मके तीन पादोका आधार बताया गया है और बादमे आये हुए मन्त्र (३ । १३ । ७ ) मे ‘ज्योतिः’ नामसे वर्णित ब्रह्मको उस दिव्य लोकसे परे बताया है । इस प्रकार पूर्वापरके वर्णन मे भेद होनेके कारण गायत्रीको ब्रह्मका वाचक बताना सङ्गत नहीं है, तो यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि दोनो जगह के वर्णनको शैलीमे किञ्चित् भेद होनेपर भी वास्तवमे कोई विरोध नहीं है । दोनो स्थलोमे श्रुतिका उद्देश्य गायत्रीशब्द वाच्य तथा ज्योतिःशब्दवाच्य ब्रह्मको सर्वोपरि परम धाममे स्थित बतलाना ही है ।

advaita vedanta adhyay 1 paad 1-19-30

सम्बन्ध- अत एव प्राण (१।११२३) इस सूत्रमें यह सिद्ध किया गया है कि श्रुतिमें ‘प्राण’ नामसे ब्रह्मका ही वर्णन है। किन्तु कौपीतकि-उपनिषद (३ । २) में प्रतर्दनके प्रति इन्द्रने कहा है कि ‘मैं ज्ञानस्वरूप प्राण हूँ; तू आयु तथा अमृतरूपसे मेरी उपासना कर । इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि इस प्रकरणमें आया हुआ ‘प्राण’ शब्द किसका वाचक है ? इन्द्रका ? प्राणवायुका ? जीवात्माका ? अथवा ब्रह्मका इसपर कहते हैं—

प्राणस्तथानुगमात् ॥ १।१।२८ ॥

प्राणः प्राणशब्द ( यहॉ ब्रह्मका ही वाचक है); तथानुगमात-क्योकि पूर्वापरके प्रसङ्गपर विचार करनेसे ऐसा ही ज्ञात होता है।

व्याख्या– इस प्रकरणमे पूर्वापर प्रसङ्गपर भलीभाँति विचार करनेसे ‘प्राण’ शब्द ब्रह्मका ही वाचक सिद्ध होता है, अन्य किसीका नहीं; क्योंकि आरम्भमे प्रतर्दनने परम पुरुषार्थरूप वर माँगा है । उसके लिये परम हितपूर्ण इन्द्रके उपदेशमें कहा हुआ ‘प्राण’ ‘ब्रह्म’ ही होना चाहिये । ब्रह्मज्ञानसे बढ़कर दूसरा कोई हितपूर्ण उपदेश नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त उक्त प्राणको वहाँ प्रज्ञान खरूप बतलाया गया है, जो कि ब्रह्मके ही अनुरूप है तथा अन्तमे उसीको आनन्दस्वरूप अजर एवं अमर कहा गया है। फिर उसीको समस्त लोकोंका पालक, अधिपति एवं सर्वेश्वर बताया गया है । ये सब बाते ब्रह्मके ही उपयुक्त है । प्रसिद्ध प्राणवायु, इन्द्र अथवा जीवात्माके लिये ऐसा कहना उपयुक्त नहीं हो सकता । इसलिये यही समझना चाहिये कि यहाँ ‘प्राण’शब्द ब्रह्मका ही वाचकहै।

सम्बन्ध-उक्त प्रकरणमें इन्द्रने स्पष्ट शब्दोंमे स्वय अपनेको ही प्राण कहा है । इन्द्र एक प्रभावशाली देवता तथा अजर, अमर है ही; फिर वहाँ ‘प्राण’ गन्द्रको इन्द्रका हो वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं

न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्ध
भूमा ह्यस्मिन् ॥ १।१।२९॥

चेत् यदि कही; वक्त: वक्ता (इन्द्र ) का ( उद्देश्य ); आत्मोपदेशान् अपनको ही प्राग’ नाम से बतलाना है, इसलिये न-प्रागशब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकताः इति= नो ) यह कयनः (न)-ठीक नहीं है; हि-क्योंकि; असिन् इस प्रकरणम; अध्यात्मसम्बन्धभृमा अध्यात्मसम्बन्धी उपदेशकी बदलता है।

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व्याख्या- यदि कहा कि इस प्रकरणमे इन्द्रने स्पटरूपसे अपने आपको ही प्राण बतलाया है, ऐसी परिस्थितिमे प्राण गडको इन्द्रका वाचक न मानकर ब्रह्मका वाचक मानना ठीक नहीं है, तो ऐसा कहना उचित नहीं है, क्योकि इस प्रकरणमे अध्यान्मसम्बन्धी वर्णनकी बहुलता है । यहो आधिदैविक वर्णन नहीं है, अत उपास्यरूपये बतलाया हुआ तत्त्व इन्द्र नहीं हो सकता । इसलिये यहाँ ‘प्राण’ शब्दको ब्रह्मका ही वाचक समझना चाहिये ।

कौषीतकि-उपनिषद्म या प्रसङ्ग इस प्रकार है म होवाच प्रतर्दनस्वमेव वृणीव यं त्वं मनुप्याय हिततमं मन्यस इति…। (को० उ० ३ । १) स होवाच प्राणोऽसि प्रजात्मा ।।(को० उ० ३।२) ‘एप प्राण एवं प्रज्ञात्माss नन्दोऽजरोऽमृतः…..एप लोकपाल एप लोकाधिपतिरेष सर्वेश्वरः ।(को० उ०३।९) इस प्रसङ्गमें अध्यात्ममम्बन्धी वर्णनकी बहुलता किस प्रकार है, यह पूर्वसूत्रकी टिप्पणीम देखें।

यहाँ यह प्रश्न उठता है कि यदि ‘प्राण’ शब्द इन्द्रका वाचक नहीं है तो इन्द्रने जो यह कहा कि ‘मै ही प्रज्ञानस्वरूप प्राण हूँ, तू मेरी उपासना कर ।’ इस कथनकी क्या गति होगी ? इसपर कहते हैं

शास्त्रदृष्टया तूपदेशो वामदेववत् ॥ १ । १ । ३० ॥

उपदेश: ( यहाँ) इन्द्रका अपनेको प्राण बतलाना; तु-तो; वामदेववत् वामदेवकी भाँति; शास्त्रदृष्टया ( केवल ) शास्त्र-दृष्टि से है ।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (१।४।१०) मे यह वर्णन आया है कि तद् यो यो देवानां प्रत्यबुद्धयत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धत त्पश्यनृषिर्वामठेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभव सूर्यश्चेति । अर्थात् ‘उस ब्रह्मको देवताओंमे जिसने जाना, वही ब्रह्मरूप हो गया । इसी प्रकार ऋषियो और मनुष्योमें भी जिसने उसे जाना,

वह तद्रूप हो गया। उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना कि मै मनु हुआ और मै ही सूर्य हुआ।’ इससे यह बात सिद्ध होती है कि जो महापुरुष उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है, वह उसके साथ एकताका अनुभव करता हुआ ब्रह्मभावापन्न होकर ऐसा कह सकता है ।

अतएव उस वामदेव ऋषिकी भाँति ही इन्द्रका ब्रह्मभावापन्न अवस्थामे शास्त्रदृष्टिसे यह कहना है कि मैं ही ज्ञानखरूप प्राण हूँ अर्थात् परब्रह्म परमात्मा हूँ। तू मुझ परमात्माकी उपासना कर ।’ अतः ‘प्राण’शब्दको ब्रह्मका वाचक माननेमे कोई आपत्ति नहीं रह जाती है।

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सम्बन्ध- प्रकारान्तरसे शङ्का उपस्थित करके उसके समाधानद्वारा प्राणको ब्रह्मका वाचक सिद्ध करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते है,

जीवमुख्यप्राणलिङ्गान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रित त्वादिह तद्योगात् ॥ १। १ । ३१॥

सब लक्षण ब्रह्मके आश्रित है ( तथा ) इह तद्योगात् इस प्रसङ्गमें ब्रह्मके लक्षणोका भी कथन है, इसलिये ( यहाँ ‘प्राण’शब्द ब्रह्मकाही वाचक है)।
व्याख्या- कौपीतकि-उपनिपद् (३८) के उक्त प्रसङ्गमे जीवके लक्षणों का इस प्रकार वर्णन हुआ है, न वाच विजिज्ञासीत । वक्तार विद्यात् ।। अर्थात् ‘वाणीको जाननेकी इच्छा न करे । वक्ताको जानना चाहिये ।’

यहाँ वाणी आदि कार्य और करणके अध्यक्ष जीवात्माको जाननेके लिये कहा है । इसी प्रकार प्रसिद्ध प्राणके लक्षणका भी वर्णन मिलता है-‘अथ खलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति । (३।३) अर्थात् निस्सन्देह प्रज्ञानात्मा प्राण ही इस गरीरको ग्रहण करके उठाता है । शरीरको धारण करना मुख्य प्राणका ही धर्म है, इस कथनको लेकर यदि यह कहो कि ‘प्राण’शब्द ब्रह्मवाचक नहीं होना चाहिये, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि ब्रह्मके
अतिरिक्त जीव और प्राणको भी उपास्य माननेसे त्रिविध उपासनाका प्रसङ्ग उपस्थित होगा, जो उचित नहीं है । इसके सिवा, जीव और प्राण आदिके धर्मोंका आश्रय भी ब्रह्म ही है, इसलिये ब्रह्मके वर्णनमे उनके धर्मोका आना अनुचित नहीं है । यहाँ ब्रह्मके लोकाधिपति, लोकपाल आदि लक्षणोंका भी स्पष्ट वर्णन मिलता है।

इन सब कारणोंसे यहाँ ‘प्राण’ शब्द ब्रह्मका ही वाचक है । इन्द्र, जीवात्मा अथवा प्रसिद्ध प्राणका नहीं यही मानना ठीक है।

पहला पाद सम्पूर्ण ।

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १।१ । १॥

सम्बन्ध- ध्यानका स्वरूप बतलाते हैं

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श्रीपरमात्मने नमः

वेदान्त-दर्शन
(ब्रह्मसूत्र) (साधारण भाषा-टीकासहित)
पहला अध्याय
पहला पाद

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १।१ । १॥
अथ अब; अतः यहॉसे ब्रह्मजिज्ञासा ब्रह्मविषयक विचार ( आरम्भ किया जाता है)।

व्याख्या- इस सूत्रमे ब्रह्मविषयक विचार आरम्भ करनेकी बात कहकर यह सूचित किया गया है कि ब्रह्म कौन है ?

उसका खरूप क्या है ? वेदान्तमे उसका वर्णन किस प्रकार हुआ है, इत्यादि सभी ब्रह्मविषयक बातोंका इस ग्रन्थ मे विवेचन किया जाता है।

सम्बन्ध- पूर्व सूत्र में जिस ब्रह्मके विषय में विचार करनेकी प्रतिज्ञा की गयी है, उसका लक्षण बतलाते हैं,

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जन्माद्यस्य यतः ॥ १।१ । २॥

व्याख्या- यह जो जड़-चेतनात्मक जगत् सर्वसाधारणके देखने, सुनने और अनुभवमें आ रहा है, जिसकी अद्भुत रचनाके किसी एक अंशपर भी विचार

करनेसे बड़े-बड़े वैज्ञानिकोको आश्चर्यचकित होना पड़ता है,
इस विचित्र विश्वके जन्म आदि जिससे होते है अर्थात् जो सर्वशक्तिमान् परात्पर

परमेश्वर अपनी अलौकिक शक्तिसे इस सम्पूर्ण जगत्की रचना करता है, इसका धारण, पोषण तथा नियमितरूपसे सञ्चालन करता है। फिर प्रलयकाल आनेपर

जो इस समस्त विश्वको अपनेमें विलीन कर लेता है, वह परमात्मा ही ब्रह्म है।
भाव यह है कि देवता, दैत्य, दानव, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि अनेक जीवो से

परिपूर्ण, सूर्य, चन्द्रमा, तारा तथा नाना लोक-लोकान्तरोसे सम्पन्न इस अनन्त ब्रह्माण्डका कर्ता-हर्ता कोई अवश्य है, यह हरेक मनुष्यकी समझमे आ सकता है;

वही ब्रह्म है। उसीको परमेश्वर, परमात्मा और भगवान् आदि विविध नामोसे कहते हैं,क्योकि वह सबका आदि, सबसे बड़ा, सर्वाधार, सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वव्यापी और सर्वरूप है ।

यह दृश्यमान जगत् उसकी अपार शक्तिके किसी एक अंशका दिग्दर्शनमात्र है।

शङ्का- उपनिषदोमे तो ब्रमका वर्णन करते हुए उसे अकर्ता, अभोक्ता, असङ्ग, अव्यक्त, अगोचर, अचिन्त्य, निर्गुण, निरञ्जन तथा निर्विशेष बताया गया है और

इस सूत्रमें उसे जगतकी उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलयका कर्ता बताया गया है । यह विपरीत बात कैसे ?

समाधान- उपनिषदोमे वर्णित परब्रह्म परमेश्वर इस सम्पूर्ण जगत्का कर्ता होते हुए भी अकर्ता है (गीता ४ । १३) । अतः उसका कर्तापन साधारण जीवोकी भाँति

नहीं है। सर्वथा अलौकिक है । वह सर्वशक्तिमान्*एवं सर्वरूप होनेमे समर्थ होकर भी सबसे सर्वथा अतीत और असङ्ग है ।

सर्वगुणसम्पन्न होते हुए भी निर्गुण है। तथा समस्त विशेषणोसे युक्त होकर भी निर्विशेष है । इस परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च । (

श्वेता० ६ । ८) इस परमेश्वरकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वाभाविक दिव्य शक्ति नाना प्रकार की ही सुनी जाती है। एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी

सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षःसर्वभूताधिवासः साक्षी नेता केवलो निर्गुणश्च ॥ (श्वेता० ६.११) ‘वह एक देव ही सब प्राणियोमे छिपा हुआ, सर्वव्यापी और समस्त

प्राणियोंका अन्तर्यामी परमात्मा है। वही सबके कर्मोंका अधिष्ठाता, सम्पूर्ण भूतोका निवास स्थान, सबका साक्षी, चेतनस्वरूप, सर्वथा विशुद्ध और गुणातीत

है।’ एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्॥ ( मा० उ० ६) “यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह सबका अन्तर्यामी है, यह

सम्पूर्ण जगत्का कारण है, क्योकि समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति स्थिति और प्रलयका स्थान यही है। नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं

नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्य प्रकार उस सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वरमे विपरीत भावोका समावेश स्वाभाविक होनेके कारण यहाँ शङ्काके लिये स्थान नहीं है।

सम्बन्ध- कपिन और भोक्तापनसे रहित, नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त ब्रह्मको इस जगत्का कारण कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते है

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शास्त्रयोनित्वात् ॥ १।१।३ ॥

शास्त्रयोनित्वात् शास्त्र (वेढ.)मे उस ब्रह्मको जगत्का कारण बताया गया है, इसलिये ( उसको जगतका कारण मानना उचित है)।

व्याख्या- वेदमे जिस प्रकार ब्रह्मके सत्य, ज्ञान और अनन्त (तै० उ० . २११) आदि लभग बताये गये हैं, उसी प्रकार उसको जगत्का कारण भी बताया गया है। *

इसलिये पूर्वसूत्रके कथनानुसार परब्रह्म परमेश्वरको जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयका कारण मानना सर्वथा उचित ही है।

सम्बन्ध- मृत्तिका आदि उपादानोंसे घट आदि वस्तुओंकी रचना करने वाले कुम्भकार आदिकी मॉति ब्रह्मको जगतका निमित्त कारण

बतलाना तो युक्तिसङ्गत है परन्तु उसे उपादान कारण कैसे माना जा सकता है ? इसपर कहते हैं

तत्तु समन्वयात् ॥ १।१ । ४ ॥

बहार्यमग्राहामलक्षणमचिन्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैत चतुर्थ मन्यन्ते स आन्मा स विज्ञेयः ॥ (मा० उ० ७) जो न भीतरकी और

प्रजावाला है, न बाहरकी ओर प्रजाचाला है। न दोनो ओर प्रनावाला है, न प्रजानधन है, न जाननेवाला है, न नही जाननेवाला है, जो देखा नहीं गया है, जो

व्यवहारम नहीं लाया जा मकता, जो पकड़नेमे नहीं आ सकता जिसका कोई लक्षण नहीं है, जो चिन्तन करने नहीं आ सकता जो बतलानेमे नही आ सकता,

एकपात्र आत्माकी प्रतीति ही जिमका सार है, जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है, ऐसा सर्वथा शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्व परब्रह्म परमात्माका नतुर्थ पाट है,

इस प्रकार ब्रह्मनानी मानते हैं। वह परमात्मा है, यह जाननेयोग्य है। एप योनिः सर्वस्या (मा० उ०६) यह परमात्मा सम्पूर्ण जगत्का कारण हैं। यतो वा इमानि

भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तहिजिज्ञासस्व । तोति । (त० उ०३।१) ये सब प्रत्यक्ष दीखनेवाले प्राणी जिमसे

उत्पन्न होते है, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते है तथा
अन्तमे प्रयाण करते हुए जिममे प्रवेश करते है, उमको जाननेकी इच्छा कर, वही

ब्रह्म है। तु-तथा; तत्-वह ब्रह्म; समन्वयात्-समस्त जगत्में पूर्णरूपसे अनुगत ( व्याप्त ) होनेके कारण ( उपादान भी है)।

व्याख्या- जिस प्रकार अनुमान और शास्त्र-प्रमाणसे यह सिद्ध होता है कि इस विचित्र जगतका निमित्त कारण परब्रह्म परमेश्वर है, उसी प्रकार यह भी सिद्ध है

कि वही इसका उपादान कारण भी है; क्योकि वह इस जगतमे पूर्णतया अनुगत ( व्याप्त ) है, इसका अणुमात्र भी परमेश्वरसे शून्य नहीं है।

श्रीमद्भगवद्गीतामे भी भगवान्ने कहा है कि ‘चर या अचर, जड या चेतन, ऐसा कोई भी प्राणी या भूतसमुदाय नहीं है, जो मुझसे रहित हो।’ (१० । ३९) “यह

सम्पूर्ण जगत् मुझसे च्याप्त है।’ (गीता ९ । ४) उपनिषदोंमें भी स्थान-स्थानपर यह बात दुहरायी गयी है कि ‘उस परब्रह्म परमेश्वरसे यह समस्त जगत् व्याप्त है ।

सम्बन्ध- सांख्यमतके अनुसार त्रिगुणात्मिका प्रति भी समस्त जगत्में व्याप्त है, फिर व्याप्तिरूप हेतुसे जगत्का

उपादान कारण ब्रह्मको ही क्यों मानना चाहिये, प्रकृतिको क्यों नहीं ? इसपर कहते हैं

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ईक्षते शब्दम् ॥ १।१। ५॥

ईक्षतेः श्रुतिमे ईक्ष’ धातुका प्रयोग होनेके कारण; अशब्दम-शब्द प्रमाण-शून्य प्रधान -( त्रिगुणात्मिका जड प्रकृति); न-जगतका कारण नहीं है ।

व्याख्या- उपनिषदोमे जहाँ सृष्टिका प्रसङ्ग आया है, वहाँ ईक्ष’ धातुकी क्रियाका प्रयोग हुआ है,जैसे

सदेव सोम्येदमन आसीदेकमेवाद्वितीयम्’ (छा० उ० ६ । २ । १ )

इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके ‘तदक्षत बहु स्यां प्रजा येय’ (छा० उ०६।२। ३) अर्थात् उस सत्ने ईक्षण सङ्कल्प किया कि मै बहुत हो जाऊँ, अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ ।

ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार दूसरी जगह भी आत्मा वा इदमेकमेवान आसीत्’ इस प्रकार आरम्भ करके ‘स ईक्षत लोकान्नु सृजै’ (ऐ० उ०१ । १ । १) अर्थात् उसने

ईक्षण विचार किया कि निश्चय ही मै लोकोकी रचना करूँ । ऐसा कहा है। परन्तु त्रिगुणात्मिका प्रकृति जड है, उसमे ईक्षण या सङ्कल्प नहीं ईशावास्यमिदय सर्व

यत्किञ्च जगत्यां जगत् । (ईशा० १) बन सकता, क्योकि वह चेतनका धर्म है; अतः शब्दप्रमाणरहित प्रधान (जड प्रकृति ) को जगत्का उपादान कारण नहीं माना जा सकता।

सम्बन्ध- ईक्षण या सङ्कल्प चेननका धर्म होनेपर भी गौणीवृत्तिसे अचेतन के लिये प्रयोगमें लाया जा सकता है, जैसे लोकमें कहते है ‘अमुक मकान अब गिरना ही \

चाहता है। इसी प्रकार यहाँ भी ईक्षण-क्रियाका सम्बन्ध गौणरूपसे त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिकेसाथ मान लिया जाय तो क्या हानि है । इसपर कहते हैं

गौणश्वेन्नात्मशब्दात् ॥ १।१।६॥
चेत् यदि कहो गौणः ईक्षणका प्रयोग गौगवृत्तिसे (प्रकृतिके लिये) हुआ है; ननो यह ठीक नहीं है; आत्मशब्दात्=क्योकि वहाँ ‘आत्म’शब्दका प्रयोग है।

व्यास्या- ऊपर उद्धृत की हुई ऐतरेयकी श्रुतिमे ईक्षणका कर्ता आत्माको बताया गया है। अतः गौण-वृत्तिसे भी उसका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ नहीं हो सकता । इसलिये प्रकृतिको जगत्का कारण मानना वेदके अनुकूल नहीं है।

सम्बन्ध- आत्म’ शब्दका प्रयोग तो मन, इन्द्रिय और शरीरके लिये भी आता है; अतः उक्त श्रुतिमें ‘आत्मा’ को गीणरूपसे प्रकृतिका वाचक मानकर उसे

जगतका कारण मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं

तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशात् ॥ १।१।७॥

व्याख्या- तैत्तिरीयोपनिषद्की दूसरी बल्लीके सातवे अनुवाकमे जो सृटिका . प्रकरण आया है, वहाँ स्पष्ट कहा गया है कि ‘तदात्मान खयमकुरुत उस ब्रह्मने

खयं ही अपने आपको इस जड-चेतनात्मक जगत्के रूपमे प्रकट किया ।
साथ ही यह भी बताया गया है कि यह जीवात्मा जब उस आनन्दमय परमात्मामे

निष्टा करता-स्थित होता है, तब यह अभय पदको पा लेता है । इसी प्रकार छान्दोग्योपनिपभ भी श्वेतकेतुके प्रति उसके पिताने उस परम कारणमे स्थित

हानेका फल मोक्ष बताया है। किन्तु प्रकृतिमे स्थित होनेसे मोक्ष होना कदापि सम्भव नहीं है, अतः उपर्युक्त श्रुतियोंमे

‘आत्मा’ शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं है। इसीलिये प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता ।

सम्बन्ध- उक्त श्रुतियों में आया हुआ ‘आत्मा’ शब्द प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता, इसमें दूसरा कारण बतलाते हैं,

हेयत्वावचनाच ॥ १।१।८॥

व्याख्या- यदि आत्मा शब्द वहाँ गौणवृत्तिसे प्रकृतिका वाचक होता तो आगे चलकर उसे त्यागनेके लिये कहा जाता और मुख्य आत्मामें निष्ठा करनेका

उपदेश दिया जाता; किन्तु ऐसा कोई वचन उपलब्ध नहीं होता है। जिसको जगतका कारण बताया गया है, उसीमें निष्ठा करनेका उपदेश किया गया है।

अतः परब्रह्म परमात्मा ही आत्म’शब्दका वाच्य है और वहीं इस जगतका निमित्त एवं उपादान कारण है।

सम्बन्ध- आत्मा’ की ही भॉति इस प्रसङ्गमें ‘सत्’ शब्द भी प्रकृतिका वाचक नहीं है। यह सिद्ध करने के लिये दूसरा हेतु प्रस्तुत करते हैं

स्वाप्ययात् ॥ १।१। ९॥

व्याख्या- छान्दोग्योपनिषद् (६ । ८।१ ) मे कहा है कि ‘यत्रैतत् पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनर खपितीत्याचक्षते’

अर्थात् ‘हे सोम्य ! जिस अवस्थामे यह पुरुष ( जीवात्मा ) सोता है, उस समय यह सत् ( अपने कारण ) से सम्पन्न ( संयुक्त ) होता है; स्व अपनेमें अपीत-विलीन

होता है, इसलिये इसे ‘स्वपिति’ कहते हैं। यहाँ स्व (अपने) में विलीन होना कहा गया है। अतः यह सन्देह हो सकता है कि ‘स्व’ शब्द जीवात्माका ही वाचक है,

इसलिये वही जगत्का कारण है, परन्तु ऐसा समझना ठीक नहीं है, क्योकि पहले जीवात्माका सत् ( जगत्के कारण) से संयुक्त होना बताकर उसी सत्को पुनः ‘ख’

नामसे कहा गया है और उसीमे जीवात्माके विलीनइस प्रसङ्गमे जिस सत्को समस्त जगतका कारण बताया है, उसीमे जीवात्माका विलीन होना कहा गया है

और उस सत्को उसका खखरूप बताया गया है । अत. यहाँ ‘सत्’ नामसे कहा हुआ जगत्का कारण जडतत्त्व नहीं हो सकता।

सम्बन्ध- यही बात प्रकारान्तरसे पुनः सिद्ध करते है

गतिसामान्यात् ॥ १।१।१०॥

व्याख्या- तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: संभूतः’ (तै० उ० २११) ‘निश्चय ही सर्वत्र प्रसिद्ध इस परमात्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ‘

‘आत्मत एवेदः, सर्वम्’ (छा० उ०७ | २६ । १)-‘परमात्मासे ही यह सब कुछ उत्पन्न हुआ है।’

‘आत्मन एप प्राणी जायते’ (प्र० उ० ३ । ३)-परमात्मासे यह प्राग उत्पन्न होता है ।

‘एतस्माजायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वार्कोतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी । (मु० उ० २।१ । ३)-इस परमेश्वरने प्राण उत्पन्न होना है;

तथा मन ( अन्तःकरण ), समस्त इन्द्रियाँ, आकाश, वायु. तेज, जल और सम्पूर्ण प्राणियोको

धारण करनेवाली पृथिवी-ये सब उत्पन्न होते है। इस प्रकार सभी उपनिषद्-

वाक्योमे समानरूपसे चेतन परमात्माको ही जगत्का कारण बताया गया है। इसलिये जड प्रकृतिको जगतका कारण नहीं माना जा सकता ।

सम्बन्ध- पुनः श्रुति-प्रमाणसे इसी बातको दृढ करते हुए इस प्रकरणको समाप्त करते हैं—

श्रुतत्वाच ॥ १।१।११।।

व्याख्या- स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिजनिता न चाधिपः ।। ( श्वेता० उ०६।९)-‘वह परमात्मा सबका परम कारण तथा समस्त करणोंके

अधिष्ठाताओंका भी अधिपति है । कोई भी न तो इसका जनक है और न खामी ही

है ।’ ‘स विश्वकृत’ (श्वेता० ६ । १६ )—‘वह परमात्मा समस्त विश्वका स्रष्टा है । अतः

समुद्रा गिरयश्च सर्वे (मु० उ० २ । १ । ९) ‘इस परमेश्वरसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं। इत्यादिरूपसे उपनिषदोमे स्थान-स्थानपर यही बात कही गयी है

कि सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ, परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का कारण हैअतः श्रुति-

प्रमाणसे यही सिद्ध होता है कि सर्वाधार परमात्मा ही सम्पूर्ण जगत्का अभिन्न निमित्तोपादान कारण है; जड प्रकृति नहीं।

vedant darshan adhyay 1 paad 1

सम्बन्ध- स्वाप्ययात्।। सूत्र में जीवात्माके स्व ( परमात्मा ) मे विलीन होनेकी बात

कहकर यह सिद्ध किया गया कि जड प्रकृति जगत्का कारण नहीं है । किन्तु ‘स्व’

शब्द प्रत्यक्चेतन (जीवात्मा ) के अर्थमें भी प्रसिद्ध है। अतः यह सिद्ध करनेके

लिये कि प्रत्यक्चेतन भी जगतका कारण नहीं है, आगेका प्रकरण आरम्भ किया

जाता है । तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्ली में सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन करते हुए सर्वात्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरसे ही आकाश आदिके क्रमसे सृष्टि बतायी

गयी है। (अनु० १, ६, ७)। उसी प्रसङ्गमें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय

और आनन्दमय इन पॉचोका वर्णन आया है। वहाँ क्रमशः अन्नमयका प्राणमय

को, प्राणमयका मनोमयको मनोमयका विज्ञानमयको और विज्ञानमयका आनन्दमय को अन्तरात्मा बताया गया है। आनन्दमयका अन्तरात्मा दूसरे

किसीको नहीं बताया गया है। अपि तु उसीसे जगत्की उत्पत्ति बताकर आनन्दकी

महिमाका वर्गन करते हुए सर्वात्मा आनन्दमयको जाननेका फल उसीकी प्राप्ति

बताया गया और वहीं ब्रह्मानन्दवल्लीको समाप्त कर दिया गया है।
यहाँ यह प्रश्न उठता है कि इस प्रकरणमे आनन्दमय

नामसे किसका वर्णन हुआ है, परमेश्वरका ? या जीवात्माका ? अथवा अन्य किसीका ? इसपर कहते है

आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥ १।१ । १२ ॥

व्याख्या- किसी बातको दृढ करनेके लिये वारंबार दुहरानेको ‘अभ्यास’ कहते हैं ।

तैत्तिरीय तथा बृहदारण्यक आदि अनेक उपनिषदोमे आनन्द’ शब्द का ब्रह्मके

अर्थमे वारंवार प्रयोग हुआ है; जैसे-तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मवल्लीके छठे अनुवाकमे आनन्दमय’ का वर्णन आरम्भ करके सातवे अनुवाकमे उसके लिये

‘रसो वै सः । रस ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति । को ह्येवान्यात् कः

प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् । एष ह्येवानन्दयाति’ (२ । ७) अर्थात् ‘वह आनन्दमय ही

रसस्वरूप है, यह जीवात्मा इस रसस्वरूप परमात्माको पाकर आनन्द

युक्त हो जाता है । यदि वह आकाशकी भॉति परिपूर्ण आनन्दस्वरूप परमात्मा नहीं होता

तो कौन जीवित रह सकता, कौन प्राणोंकी क्रिया कर सकता ! सचमुच यह परमात्मा ही सबको आनन्द प्रदान करता है। ऐसा कहा गया है। तथा

‘सैषाऽऽनन्दस्य मीमा५सा भवति,’ ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति । (ते. उ०२ । ८) ‘आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चना’ (तै० उ०२।९) ‘आनन्दो ब्रह्मेति

व्यजानात्’ (ते० उ० ३ । ६) विज्ञानमानन्द ब्रह्म’ (बृह. उ०३।९।२८) इत्यादि प्रकारसे श्रुतियोमें जगह-जगह परब्रह्मके अर्थमें आनन्द’ एवं ‘आनन्दमय’ शब्दका

प्रयोग हुआ है । इसलिये आनन्दमय’ नामसे यहाँ उस सर्वशक्तिमान् , समस्त जगतके परम कारण,

सर्वनियन्ता, सर्वव्यापी, सबके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं ।

सम्बन्ध- यहाँ यह शङ्का होती है कि ‘आनन्दमय’ शब्दमे जो ‘मयट्’ प्रत्यय है,

वह विकार अर्थका बोधक हे और परब्रह्म परमात्मा निर्विकार है। अतः जिस प्रकार

अन्नमय आदि शब्द ब्रह्मके वाचक नहीं हैं, वैसे ही, उन्ही के साथ आया हुआ

यह ‘आनन्दमय शब्द भी परब्रह्मका वाचक नहीं होना चाहिये । इसपर कहते हैं

विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ॥ १।१।१३ ॥

चेत् यदि कहो विकारशब्दात्-मयट् प्रत्यय विकारका बोधक होनेसे; न-आनन्दमय शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता, इति-तो यह कथन न ठीक नहीं

है। प्राचुर्यात्-क्योंकि ‘मयट’ प्रत्यय यहाँ प्रचुरताका बोधक है ( विकारको नहीं )।

व्याख्या- ‘तत्प्रकृतवचने मयट’ (पा० सू० ५।४ । २१ ) इस पाणिनि सूत्रके अनुसार प्रचुरताके अर्थमें भी ‘मयट्’ प्रत्यय होता है; अतः यहाँ ‘आनन्द मय’ शब्दमे जो

‘मयट’ प्रत्यय है, वह विकारका नहीं, प्रचुरता-अर्थका ही बोधक है

अर्थात् वह ब्रह्म आनन्दघन है, इसीका घोतक है। इसलिये यह कहना ठीक नहीं है कि

आनन्दमय शब्द
ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता । परब्रह्म परमेश्वर आनन्दधनस्वरूप है, इसलिये उसे ‘आनन्दमय’ कहना सर्वथा उचित है ।

सम्बन्ध- यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जब

‘मयट्’ प्रत्यय विकारका बोधक भी होता है, तब यहाँ उसे प्रचुरताका ही बोधक क्यों माना जाय ? विकारबोधक क्यों

न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं,

vedant darshan adhyay 1 paad 1

तहेतुव्यपदेशाच्च ॥ १।१।१४ ॥

तद्धेतुव्यपदेशात् ( उपनिषदोंमे ब्रह्मको ) उस आनन्दका हेतु बताया गया है, इसलिये; च=भी (यहाँ मयट् प्रत्यय विकार-अर्थका बोधक नहीं है)।

व्याख्या- पूर्वोक्त प्रकरणमे आनन्दमयको आनन्द प्रदान करनेवाला बताया गया

है (ते० उ० २ । ७)। जो सबको आनन्द प्रदान करता है, वह स्वयं आनन्दधन है,

इसमें तो कहना ही क्या है, क्योंकि जो अखण्ड आनन्दका भण्डार होगा, वही

सदा सबका आनन्द प्रदान कर सकेगा। इसलिये यहाँ मयट् प्रत्ययको विकारका

बोधक न मानकर प्रचुरताका बोधक मानना ही ठीक है ।

सम्बन्ध- केवल मयट प्रत्यय प्रचुरताका बोधक होनेसे ही यहाँ ‘आनन्द मय’ शब्द ब्रह्मका वाचक है, इतना ही नहीं किन्तु

मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॥ १।१।१५॥

व्याख्या- तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीके आरम्भमे जो यह मन्त्र आया है

कि सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान्

कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ।’ अर्थात् ‘ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप सूत्र १४-१७] और

अनन्त है । वह ब्रह्म विशुद्ध आकाशस्वरूप परम धाममे रहते हुए ही सब के

हृदयरूप गुफामे छिपा हुआ है । जो उसको जानता है, वह सबको भली भोति

जाननेवाले ब्रह्मके साथ समस्त भोगोका अनुभव करता है । इस मन्त्रद्वारा वर्णित

ब्रह्मको यहाँ मान्त्रत्रर्णिक’ कहा गया है । जिस प्रकार उक्त मन्त्रमे उस परब्रह्मको

सबका अन्तरात्मा बताया गया है, उसी प्रकार ब्राह्मण-ग्रन्थमे ‘आनन्द मय’को

सबका अन्तरात्मा कहा है, इस प्रकार दोनो स्थलोकी एकताके लिये यही मानना

उचित है कि ‘आनन्दमय’ शब्द यहाँ ब्रह्मका ही वाचक है, अन्य किसी का नहीं।

सम्बन्ध यदि आनन्दमय’ शब्दको जीवात्माका वाचक मान लिया जाय तो क्या हानि है ? इसपर कहते हैं

नेतरोऽनुपपत्तेः ॥ १।१।१६ ॥

व्याख्या- नैतिशेयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्ली में आनन्दमयका वर्णन करनेके

अनन्तर यह बात कही गयी है कि ‘उस आनन्दमय परमात्माने यह इच्छा की कि

मैं बहुत होऊँ फिर उसने तप ( सङ्कल्प ) किया । तप करके इस समस्त जगतकी

रचना की। (नै० उ०२।६) यह कथन जीवात्माके लिये उपयुक्त नहीं है। क्योकि

जीवात्मा अल्पन्न और परिमित शक्तिवाला है; जगत्की रचना आदि कार्य करने

की उसमे सामर्थ्य नहीं है । अत: आनन्दमय’ शब्द जीवात्मा का बाचक नहीं हो सकता।

सम्बन्ध- यही बात सिद्द करनेके लिये दूसरा कारण वतलात हैं

भेदव्यपदेशाच्च ।। १।१।१७ ॥

व्याख्या-उक्त वल्लीम आगे चलकर (सातवे अनुवाकमे) कहा है कि यह जो

ऊपरके वर्णनमे ‘सुकृत’नामसे कहा गया है, वही रसस्वरूप है । यह जीवात्मा

इस रसस्वरूप परमात्माको पाकर आनन्दयुक्त हो जाता है।’ इस प्रकार यहाँ परमात्माको आनन्ददाता और जीवात्माको उसे पाकर आनन्दयुक्त होनेवाला

बताया गया है । इससे दोनोंका भेद सिद्ध होता है । इसलिये भी ‘आनन्दमय’ शब्द जीवात्माका वाचक नहीं है।

सम्बन्ध- आनन्दका हेतु जो सत्त्वगुण है, वह त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिमें भी विद्यमान है ही,

अत: आनन्दमय’ शब्दको प्रकृतिका ही वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर

कामाच्च नानुमानापेक्षा ॥ १।१।१८ ॥

व्याख्या- उपनिषद्मे जहाँ ‘आनन्दमय’का प्रसङ्ग आया है,

वहाँ ‘सोऽकाम यत’ इस वाक्यके द्वारा आनन्दमयमे सृष्टिविषयक कामनाका होना बताया गया है, जो कि

जड प्रकृतिके लिये असम्भव है । अतः उस प्रकरणमें वर्णित

आनन्द मय’ शब्दसे जड प्रकृतिको नहीं ग्रहण किया जा सकता ।

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patanjali, yog darshan sadhanpaad. समाधिपाद-१