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vibhutipaad 1-18

yog darshan vibhutipaad 1-18

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

yog darshan vibhutipaad 1-18

विभूतिपाद-३

सम्बन्ध- दूसरे पादमें योगाङ्गोंके वर्णनका आरम्भ करके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार–इन पाँच बहिरङ्ग-साधनोंका फलसहित वर्णन किया गया; शेष धारणा, ध्यान और समाधि-इन तीन अन्तरङ्ग-साधनोंका वर्णन इस पादमें किया जाता है; क्योंकि ये तीनों जब किसी एक ध्येयमें पूर्णतया किये जाते हैं, तब इनका नाम संयम हो जाता है। योगकी विभूतियाँ प्राप्त करनेके लिये संयमकी आवश्यकता है, अतः इन अन्तरङ्ग-साधनोंका वर्णन साधनपाद में न करके इस विभूतिपादमें करते हुए पहले धारणाका स्वरूप बतलाते हैं

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१॥

व्याख्या- नाभिचक्र, हृदय-कमल आदि शरीरके भीतरी देश हैं और आकाश या सूर्य-चन्द्रमा आदि देवता या कोई भी मूर्ति तथा कोई भी पदार्थ बाहरके देश हैं, उनमेंसे किसी एक देशमें चित्तकी वृत्तिको लगानेका नाम ‘धारणा’ है।॥१॥

सम्बन्ध- ध्यानका स्वरूप बतलाते हैं

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥२॥

व्याख्या- जिस ध्येय वस्तुमें चित्तको लगाया जाय, उसीमें चित्तका एकाग्र हो जाना अर्थात् केवल ध्येयमात्रकी एक ही तरहकी वृत्तिका प्रवाह चलना, उसके बीचमें किसी भी दूसरी वृत्तिका न उठना ‘ध्यान’ है ॥२॥

सम्बन्ध-समाधिका स्वरूप बतलाते हैं

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तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥३॥

व्याख्या- ध्यान करते-करते जब चित्त ध्येयाकारमें परिणत हो जाता है, उसके अपने स्वरूपका अभाव-सा हो जाता है, उसको ध्येयसे भिन्न उपलब्धि नहीं होती, उस समय उस ध्यानका ही नाम ‘समाधि’ हो जाता है। यह लक्षण निर्वितर्क समापत्तिके नामसे पहले पादमें किया गया है (योग० १ । ४३) ॥ ३॥

सम्बन्ध- उक्त तीनों साधनोंका सांकेतिक नाम बतलाते हैं

त्रयमेकत्र संयमः ॥४॥

व्याख्या- किसी एक ध्येय पदार्थमें धारणा, ध्यान और समाधि-ये तीनों होनेसे संयम कहलाता है। अतः इस ग्रन्थमें जहाँ-तहाँ किसी विषयमें संयम करनेको कहा जाय या संयमका फल बतलाया जाय तो संयमके नामसे किसी एक ध्येयमें तीनोंका होना समझ लेना चाहिये ॥ ४ ॥

सम्बन्ध- संयमकी सिद्धिका फल बतलाते हैं

तज्जयात्प्रज्ञालोकः ॥५॥

व्याख्या- साधन करते-करते जब योगी संयमपर विजय प्राप्त कर लेता है, अर्थात् चित्तमें ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेता है कि जिस विषयमें वह संयम करना चाहे, उसीमें तत्काल संयम हो जाता है, उस समय योगीको बुद्धिका प्रकाश प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसकी बुद्धिमें अलौकिक ज्ञानशक्ति आ जाती है। इसीको प्रथम पादमें अध्यात्मप्रसादके और ऋतम्भरा प्रज्ञाके नामसे कहा है (योग० १ । ४७-४८) ॥ ५॥

सम्बन्ध- संयमके प्रयोगकी विधिका वर्णन करते हैं

तस्य भूमिषु विनियोगः ॥६॥

व्याख्या- संयमका प्रयोग क्रमसे करना चाहिये अर्थात् पहले स्थूल विषयमें संयम करना चाहिये। वह स्थिर हो जानेपर सूक्ष्म विषयोंमें क्रमसे संयम करना चाहिये। इसी प्रकार जिस-जिस स्थलमें संयम स्थिर होता जाय, उस-उससे आगे बढ़ते रहना चाहिये ॥६॥

सम्बन्ध- उक्त तीनों साधनोंकी विशेषता बतलाते हैं

त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥७॥

व्याख्या- इसके पहले अर्थात् दूसरे पादमें जो योगके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार-ये पाँच अङ्ग बतलाये गये हैं, उनकी अपेक्षा उपर्युक्त धारणा, ध्यान और समाधि-ये तीनों साधन अन्तरङ्ग हैं; क्योंकि इन तीनोंका योग-सिद्धिके साथ निकटतम सम्बन्ध है ॥७॥

सम्बन्ध- निर्बीज समाधिकी विशेषताका वर्णन करते हैं

तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ॥८॥

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व्याख्या- पर-वैराग्यकी दृढ़तासे जब समाधिप्रज्ञाके संस्कारोंका भी निरोध हो जाता है, तब निर्बीज समाधि सिद्ध होती है (योग० १ । ५१) । अतः धारणा, ध्यान और समाधि भी उसके अन्तरङ्ग साधन नहीं हो सकते; क्योंकि उसमें सब प्रकारकी वृत्तियोंका अभाव किया जाता है (योग० १ । १८); किसी भी ध्येयमें चित्तको स्थिर करनेका अभ्यास नहीं किया जाता ॥८॥

सम्बन्ध- गुणोंका स्वभाव चञ्चल है, उनमें प्रतिक्षण परिणाम होता रहता है। चित्त गुणोंका ही कार्य है, अतः वह भी कभी एक अवस्थामें नहीं रह सकता। अतः निरोध समाधिके समय उसका कैसा परिणाम होता है, यह बतलानेके लिये कहते हैं

व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षण चित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥९॥

व्याख्या- निरोधसमाधिमें चित्तकी सम्पूर्ण वृत्तियोंका अभाव हो जानेपर भी उनके संस्कारोंका नाश नहीं होता । उस कालमें केवल संस्कार ही शेष रहते हैं, यह बात पहले पादमें कही है (योग० १ । १८) । अतः निरोधकालमें चित्त व्युत्थान और निरोध दोनों ही प्रकारके संस्कारमें व्याप्त रहता है, क्योंकि चित्त धर्मी है और संस्कार उसके धर्म हैं; धर्मी अपने धर्ममें सदैव व्याप्त रहता है यह नियम है (योग० ३ । १४) । उस निरोधकालमें जो व्युत्थानके संस्कारोंका दब जाना और निरोधसंस्कारोंका प्रकट हो जाना है तथा चित्तका निरोध संस्कारोंसे सम्बन्धित हो जाना है, यह व्युत्थानधर्मसे निरोधधर्ममें परिणत होनारूप निरोध-परिणाम है। निरोध-समाधिकी अपेक्षा सम्प्रज्ञात-समाधि
यहाँ समाधि-परिणाम और एकाग्रता-परिणामके लक्षण पहले न करके पहले निरोध-परिणामका स्वरूप बतलाया है।

इसका यह कारण मालूम होता है कि आठवें सूत्रमें निरोधसमाधिका वर्णन आ गया। इसलिये पहले निरोध-परिणामका लक्षण बतलाना आवश्यक हो गया; क्योंकि पहले (योग० १।५१ में) निरोध-समाधिका लक्षण करते हुए सब वृत्तियोंके निरोधसे निर्बीज-समाधिका होना बतलाया है। अतः उसमें परिणाम न होनेकी धारणा स्वाभाविक हो जाती है। परन्तु जबतक चित्तकी गुणोंसे भिन्न सत्ता रहती है, भी व्युत्थान-अवस्था ही है (योग० ३ । ८) । अतः उसके संस्कारोंको यहाँ व्युत्थान-संस्कारोंके ही अन्तर्गत समझना चाहिये ॥९॥

सम्बन्ध- इसके बाद क्या होता है, सो बतलाते हैं

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तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥ १०॥

व्याख्या- पहले सूत्रके कथनानुसार जब व्युत्थानके संस्कार सर्वथा दब जाते हैं और निरोधके संस्कार बढ़कर भरपूर हो जाते हैं, उस समय उस संस्कारमात्र शेष चित्तमें निरोध-संस्कारोंकी अधिकतासे केवल निर्मल. निरोध-संस्कारधारा चलती रहती है अर्थात् केवल निरोध-संस्कारोंका ही प्रवाह चलता रहता है। यह निरुद्ध चित्तका अवस्था-परिणाम है ॥ १० ॥

सम्बन्ध- अब सम्प्रज्ञात-समाधिमें चित्तका जैसा परिणाम होता है, उसका वर्णन करते हैं

सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥११॥

व्याख्या- निरोध-समाधिके पहले जब योगीका सम्प्रज्ञात योग सिद्ध होता है, उस समय चित्तकी विक्षिप्तावस्थाका क्षय होकर एकाग्र-अवस्थाका उदय हो जाता है। निर्वितर्क और निर्विचार सम्प्रज्ञात-समाधिमें केवल ध्येयमात्रका ही ज्ञान रहता है, चित्तके निज स्वरूपतकका भान नहीं रहता
वह अपने कारणमें विलीन नहीं हो जाता, तबतक उसमें परिणामी होना अनिवार्य है। इसलिये निरोध-परिणाम किस प्रकार होता है, यह जाननेकी इच्छा स्वाभाविक हो जाती है। (योग० १।४३); वह चित्तका विक्षिप्तावस्थासे एकाग्र-अवस्थामें परिणत हो जानारूप समाधि-परिणाम है ॥ ११ ॥

सम्बन्ध- उसके बादकी स्थितिका वर्णन करते हैं।

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ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रता परिणामः ॥ १२ ॥

व्याख्या- जब चित्त विक्षिप्त-अवस्थासे एकाग्र-अवस्थामें प्रवेश करता है, उस समय चित्तका जो परिणाम होता है उसका नाम समाधि-परिणाम है। जब चित्त भलीभाँति समाहित हो चुकता है, उसके बाद जो चित्तमें परिणाम होता रहता है, उसे एकाग्रता-परिणाम कहते हैं। उसमें शान्त होनेवाली वृत्ति
और उदय होनेवाली वृत्ति एक-सी ही होती है।

महाभारत तथा ज्योतिष विज्ञान

पहले कहे हुए समाधि-परिणाममें तो शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली वृत्तिमें भेद होता है, किन्तु इसमें शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली वृत्तिमें भेद नहीं होता, यही समाधि-परिणाममें और एकाग्रता-परिणाममें अन्तर है । सम्प्रज्ञात-समाधिकी प्रथम अवस्थामें समाधि परिणाम होता है और उसकी परिपक्व-अवस्थामें एकाग्रता-परिणाम होता है। इस एकाग्रता-परिणामके समय होनेवाली स्थितिको ही पहले पादमें निर्विचार-समाधिकी निर्मलताके नामसे कहा है (योग० १।४७) ॥ १२ ॥

सम्बन्ध- उपर्युक्त परिणामोंके नाम बतलाते हुए उनके उदाहरणसे अन्य समस्त वस्तुओंमें होनेवाले परिणामोंकी व्याख्या करते हैं

एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥ १३ ॥

व्याख्या- पहले नवें और दसवें सूत्रमें तो निरोध-समाधिके समय होनेवाले चित्तके धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणामका वर्णन किया गया है तथा ग्यारहवें और बारहवें सूत्रमें सम्प्रज्ञात-समाधिके समय होनेवाले चित्तके धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था परिणामका वर्णन किया गया है। इसी तरह संसारकी समस्त वस्तुओंमें ये परिणाम बराबर होते रहते हैं, क्योंकि तीनों ही गुण परिणामी हैं, अतः उनके कार्योंमें परिवर्तन होते रहना अनिवार्य है। इसलिये इस सूत्रमें यह बात कही गयी है कि ऊपरके वर्णनसे ही पाँचों भूतोंमें और समस्त इन्द्रियोंमें होनेवाले धर्म, लक्षण और अवस्था-परिणामोंको समझ लेना चाहिये। इनका भेद उदाहरणसहित समझाया जाता है।

यह ध्यानमें रखना चाहिये कि सांख्य और योगके सिद्धान्तमें कोई भी पदार्थ बिना हुए उत्पन्न नहीं होता। जो कुछ वस्तु उत्पन्न होती है, वह उत्पन्न होनेसे पहले भी अपने कारणमें विद्यमान थी और लुप्त होनेके बाद भी विद्यमान है (योग०.४ । १२)।।

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(१) धर्म-परिणाम- जब किसी धर्मीमें एक धर्मका लय होकर दूसरे धर्मका उदय होता है, उसे ‘धर्म-परिणाम’ कहते हैं। जैसे नवें सूत्र में चित्तरूप धर्मीके व्युत्थानसंस्काररूप धर्मका दब जाना और निरोधसंस्काररूप धर्मका प्रकट होना बतलाया गया है । यही धर्मों में विद्यमान रहनेवाले चित्तरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है। इसी प्रकार ग्यारहवें सूत्रमें जो सर्वार्थतारूप धर्मका क्षय और एकाग्रतारूप धर्मका उदय बतलाया गया है, यह भी चित्तरूप धर्मीका धर्म परिणाम है। इसी तरह मिट्टीमें पिण्डरूप धर्मका क्षय और घटरूप धर्मका उदय होना, फिर घटरूप धर्मका क्षय और ठीकरी. (फूटे हुए घटके टुकड़े) रूप धर्मका उदय होना-सब प्रकारके धर्मों में विद्यमान रहनेवाले मिट्टीरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है। इसी तरह अन्य समस्त वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये।

(२) लक्षण-परिणाम- यह परिणाम भी धर्म-परिणामके साथ-साथ हो जाता है। यह लक्षण-परिणाम धर्ममें होता है (योग० ४ । १२) । वर्तमान धर्मका लुप्त हो जाना उसका अतीत लक्षण-परिणाम है, अनागत धर्मका प्रकट होना उसका वर्तमान लक्षण-परिणाम है और प्रकट होनेसे पहले वह अनागत लक्षणवाला रहता है। इन तीनोंको धर्मका ‘लक्षण-परिणाम’ कहते हैं। ग्यारहवें सूत्रमें जो चित्तके सर्वार्थता-धर्मका क्षय होना बतलाया गया है, वह उसका अतीत लक्षण-परिणाम है और जो एकाग्रतारूप धर्मका उदय होना बतलाया है, वह उसका वर्तमान लक्षण-परिणाम है। उदय होनेसे पहले वह अनागत लक्षण-परिणाममें था। इसी प्रकार दूसरी वस्तुओंके परिणामोंके विषयमें भी समझ लेना चाहिये।

(३) अवस्था-परिणाम- जो वर्तमान लक्षणयुक्त धर्ममें नयापनसे पुरानापन आता-जाता हैं, वह प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है और वर्तमान लक्षणको छोड़कर अतीत लक्षणमें चला जाता है, यह लक्षणका ‘अवस्था परिणाम’ है। एकादश सूत्रके वर्णनानुसार जब चित्तरूप धर्मीका वर्तमान । लक्षणवाला सर्वार्थतारूप धर्म दबकर अतीत लक्षणको प्राप्त होता है, उस । वर्तमान कालमें जो उसके दबनेका क्रम है वह उसका अवस्था-परिणाम है
और जो एकाग्रतारूप धर्म अनागत लक्षणसे वर्तमान लक्षणमें आता है तब उसका जो उदय होनेका क्रम हैं, वह भी अवस्था-परिणाम है। दसवें सूत्रमें निरुद्ध चित्तके अवस्था-परिणामका और बारहवेंमें एकाग्रचित्तके अवस्था परिणामका वर्णन है। इस प्रकार यह एक अवस्थाको छोड़कर दूसरी अवस्थामें परिवर्तन होते जाना ही अवस्था-परिणाम है । यह अवस्था परिणाम

प्रतिक्षण होता रहता है। कोई भी त्रिगुणमय वस्तु क्षणभर भी एक अवस्थामें नहीं रहती। यही बात दसवें और बारहवें सूत्रोंमें निरोधधर्मके और एकाग्रधर्मके वर्तमान लक्षण-परिणाममें एक प्रकारके संस्कार और वृत्तियोंका क्षय और उदय बतलाकर दिखलायी गयी है। हम बालकसे जवान और जवानसें बूढ़े किसी एक दिनमें या एक घड़ीमें नहीं हुए, हमारा यह अवस्था परिणाम अर्थात् अवस्थाका परिवर्तन प्रतिक्षणमें होता हुआ ही यहाँतक पहुँचा है। इसीको अवस्था-परिणाम कहते हैं। यह परिणाम विचारद्वारा समझमें आता है, सहसा प्रतीत नहीं होता। आगे कहेंगे भी कि क्रमका ज्ञान परिणामके अवसानमें होता है (योग० ४।३३)।

धर्मपरिणाममें तो धर्मीके धर्मका परिवर्तन होता है, लक्षण-परिणाममें पहले धर्मका अतीत हो जाना और नये धर्मका वर्तमान हो जाना—इस प्रकार धर्मका लक्षण बदलता है और अवस्था-परिणाममें धर्मके वर्तमान लक्षणसे युक्त रहते हुए ही उसकी अवस्था बदलती रहती है। पहले परिणामकी अपेक्षा दूसरा सूक्ष्म है और दूसरेकी अपेक्षा तीसरा सूक्ष्म है ॥ १३॥

सम्बन्ध- धर्म और धर्मीका विवेचन करनेके लिये धर्मीका स्वरूप बतलाते हैं

शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥ १४ ॥

व्याख्या- द्रव्यमें सदा विद्यमान रहनेवाली अनेकों शक्तियोंका नाम धर्म है और उसके आधारभूत द्रव्यका नाम धर्मी है । भाव यह है कि जिस कारणरूप पदार्थसे जो कुछ बन चुका है, जो बना हुआ है और जो बन सकता है; वे सब उसके धर्म हैं, वे एक धर्मीमें अनेक रहते हैं तथा अपने-अपने निमित्तोंके मिलनेपर प्रकट और शान्त होते रहते हैं। उनके तीन भेद इस प्रकार हैं

(१) अव्यपदेश्य- जो धर्म धर्मीमें शक्तिरूपसे विद्यमान रहते हैं, व्यवहारमें आने लायक न होनेके कारण जिनका निर्देश नहीं किया जा सकता, वे ‘अव्यपदेश्य’ कहलाते हैं। इन्हींको अनागत या आनेवाले भी कहते हैं। जैसे जलमें बर्फ और मिट्टीमें बर्तन अपना व्यापार करनेके लिये प्रकट होनेसे पहले शक्तिरूपमें छिपे रहते हैं।

(२) उदित— जो धर्म पहले शक्तिरूपसे धर्मीमें छिपे हुए थे, वे जब अपना कार्य करनेके लिये प्रकट हो जाते हैं, तब ‘उदित’ कहलाते हैं। इन्हींको ‘वर्तमान’ भी कहते हैं। जैसे जलमें शक्तिरूपसे विद्यमान बर्फका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना, मिट्टीमें शक्तिरूपसे विद्यमान बर्तनोंका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना।

(३) जो धर्म अपना व्यापार पूरा करके धर्मीमें विलीन हो जाते हैं, वे ‘शान्त’ कहलाते हैं, इन्हींको ‘अतीत’ भी कहते हैं। जैसे बर्फका गलकर जलमें विलीन हो जाना और घड़ेका फूटकर मिट्टीमें विलीन हो जाना। म धर्मोकी शान्त, उदित और अव्यपदेश्य-इन तीनों स्थितियोंमें ही धर्मी सदा ही अनुगत रहता है। किसी कालमें धर्मीके बिना धर्म नहीं रहते ॥ १४ ॥

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सम्बन्ध- एक ही धर्मीके भिन्न-भिन्न अनेक धर्म-परिणाम कैसे होते हैं, यह बतलाते हैं

क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥ १५ ॥

व्याख्या- एक ही द्रव्यका किसी एक क्रमसे जो परिणाम होता है, दूसरे क्रमसे उससे भिन्न दूसरा ही परिणाम होता है। अन्य प्रकारके क्रमसे तीसरा ही परिणाम होता है। जैसे हमें रूईस वस्त्र बनाना है तो पहले रूईको धुनकर उसकी पूनी बनाकर चरखेपर कातकर उसका सूत बनाना पड़ेगा, फिर उस सूतका लम्बा ताना करेंगे, फिर उसे तानेमेंसे पार करके रोलपर चढ़ायेंगे, फिर ‘वै’ मेंसे पार करके उसके आधे तन्तुओंको ऊपर उठायेंगे, आधोंको नीचे ले जायँगे और बीचमें भरनीका सूत फेंककर उस धागेको यथास्थान बैठायेंगे, फिर ऊपरवाले धागोंको नीचे लायेंगे और नीचेवालोंको ऊपर ले जायँगे, इस तरह क्रमसे करते रहनेपर अन्तमें वस्त्ररूपमें रूईका परिणाम होगा।

पर यदि हमें उसी रूईसे दीपककी बत्ती बनानी है तो उसे कुछ फैलाकर थोड़ा बट दे देनेसे तुरंत बन जायगी और यदि कुएँ मेंसे जल निकालनेकी रस्सी बनानी है तो पहले सूत बनाकर उन धागोंको तीन या चार भागोंमें लम्बा करके बट लगानेसे रस्सी बन जायगी। इनमें भी जैसा वस्त्र या जैसी बत्ती या जिस प्रकारकी रस्सी बनानी है वैसे ही उनमें क्रमका भेद करना पड़ेगा। इसी तरह दूसरी वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये।

इससे यह सिद्ध हो गया कि क्रममें परिवर्तन करनेसे एक ही धर्मी भिन्न-भिन्न नाम-रूपवाले धर्मीसे युक्त हो जाता है, उसके परिणामकी भिन्नताका कारण क्रमकी भिन्नता ही है, दूसरा कुछ नहीं। क्रमकी भिन्नता सहकारी कारणोंके सम्बन्धसे होती है। जैसे ठंडके सम्बन्धसे जलमें बर्फरूप धर्मके प्रकट होनेका क्रम चलता और गर्मीके संयोगसे स्टीम (भाप) बननेका क्रम आरम्भ हो जाता है ॥ १५॥ बार

सम्बन्ध- उक्त संयम किस ध्येय-वस्तुमें सिद्ध कर लेनेपर उससे क्या फल मिलता है, इसका वर्णन यहाँसे इस पादकी समाप्तिपर्यन्त किया गया है। इनको ही योगकी विभूति अर्थात् भिन्न-भिन्न प्रकारका महत्त्व कहते हैं।
ऊपर तीन प्रकारके परिणामोंका वर्णन किया गया, अतः पहले इनमें संयम करनेका फल बतलाते हैं

परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ॥ १६ ॥

व्याख्या- धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणाम इस प्रकार जिन तीन परिणामोंका पहले वर्णन किया गया है, उन तीनों परिणामोंमें संयम अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि कर लेनेसे योगीको उनका साक्षात्कार होकर भूत और भविष्यका ज्ञान हो जाता है। अभिप्राय यह है कि जिस वर्तमान वस्तुके विषयमें योगी यह जानना चाहे कि इसका मूल कारण क्या है और यह किस ढंगसे बदलती हुई कितने कालमें वर्तमान रूपमें आयी है और भविष्यमें किस प्रकार बदलती हुई कितने कालमें किस प्रकार अपने कारणमें विलीन होगी? तो ये सब बातें उक्त तीनों परिणामोंमें संयम करनेसे जान सकता है ॥ १६॥

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सम्बन्ध- इसी प्रकार अब दूसरी विभूतियोंका वर्णन करते हैं

शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभाग संयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥ १७॥

व्याख्या- वस्तुके नाम, रूप और ज्ञान-यह तीनों यद्यपि परस्पर भिन्न हैं, जैसे घट यह शब्द मिट्टीसे बने हुए जिस पदार्थका संकेत करता है, उस पदार्थसे सर्वथा भिन्न वस्तु है। इसी प्रकार उस घटरूप पदार्थकी जो प्रतीति होती है, वह चित्तकी वृत्तिविशेष है। अतः वह भी घटरूप पदार्थसे सर्वथा भिन्न वस्तु है, क्योंकि शब्द वाणीका धर्म है, घटरूप पदार्थ मिट्टीका धर्म है और वृत्ति चित्तका धर्म है तथापि तीनोंका परस्पर अभ्यासके कारण मिश्रण हुआ रहता है। अतः जब योगी विचारद्वारा इनके विभागको समझकर उस विभागमें संयम कर लेता है, तब उसको समस्त प्राणियोंकी वाणीके अर्थका ज्ञान हो जाता है ॥ १७॥

संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् ॥ १८॥

व्याख्या- प्राणी जो कुछ कर्म करता है एवं अपने इन्द्रियों और मन-बुद्धिद्वारा जो कुछ अनुभव करता है, वे सब उसके अन्तःकरणमें संस्काररूपमें संचित रहते हैं। उक्त संस्कार दो प्रकारके होते हैं-एक वासनारूप, जो कि स्मृतिके कारण हैं. दूसरे धर्माधर्मरूप जो कि जाति, आयु
और भोगके कारण हैं, ये दोनों ही प्रकारके संस्कार अनेक जन्म-जन्मान्तरोंसे संगृहीत होते आ रहे हैं (योग० २ । १२, ४।८ से ११)। उन संस्कारोंमें संयम करके उनको प्रत्यक्ष कर लेनेसे योगीको पूर्वजन्मका ज्ञान हो जाता है। जैसे अपने पूर्व संस्कारोंके साक्षात्कारसे अपने पूर्वजन्मका ज्ञान होता है,
उसी प्रकार दूसरेके संस्कारोंमें संयम करनेसे उसके पूर्वजन्मका भी ज्ञान हो सकता है ॥ १८॥

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yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

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yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥ ३६॥

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

वाल्मीकीय रामायणवनकाण्डमें अगस्त्याश्रमके वर्णनमें आता है
यदाप्रभृति चाक्रान्ता दिगियं पुण्यकर्मणा। तदाप्रभृति निर्वैराः – प्रशान्ता रजनीचराः॥ अयं दीर्घायुषस्तस्य लोके विश्रुतकर्मणः।
अगस्त्यस्याश्रमः श्रीमान् विनीतमृगसेवितः ॥ नात्र जीवन्मृषावादी क्रूरो वा यदि वा शठः। नृशंसः पापवृत्तो वा मुनिरेष तथाविधः ।।
(सर्ग ११ । ८३, ८६, ९०) तुलसीकृत रामायणके अयोध्याकाण्डमें भी आया है खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।
(वाल्मीकि-आश्रमवर्णन) तथा बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा ॥ (चित्रकूटवर्णन) सत्यप्रतिष्ठायाम्-सत्यकी दृढ़स्थिति हो जानेपर (योगीमें); क्रिया फलाश्रयत्वम्-क्रियाफलके आश्रयका भाव (आ जाता है)।

व्याख्या- जब योगी सत्यका पालन करनेमें पूर्णतया परिपक्व हो जाता है, उसमें किसी प्रकारकी कमी नहीं रहती, उस समय वह योग कर्तव्यपालन रूप क्रियाओंके फलका आश्रय बन जाता है। जो कर्म किसीने नहीं किया है, उसका भी फल उसे प्रदान कर देनेकी शक्ति उस योगीमें आ जाती है, अर्थात् जिसको जो वरदान, शाप या आशीर्वाद देता है, वह सत्य हो जाता है ॥ ३६॥

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥३७॥

व्याख्या- जब साधकमें चोरीका अभाव पूर्णतया प्रतिष्ठित हो जाता है, तब पृथ्वीमें जहाँ कहीं भी गुप्त स्थानमें पड़े हुए समस्त रत्न उसके सामने
प्रकट हो जाते हैं अर्थात् उसकी जानकारीमें आ जाते हैं ॥३७॥

ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥३८॥

व्याख्या- जब साधकमें ब्रह्मचर्यकी पूर्णतया दृढ़ स्थिति हो जाती है, तब उसके मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरमें अपूर्व शक्तिका प्रादुर्भाव हो जाता है, साधारण मनुष्य किसी काममें भी उसकी बराबरी
नहीं कर सकते ॥ ३८॥

अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः ॥ ३९॥

व्याख्या- जब योगीमें अपरिग्रहका भाव पूर्णतया स्थिर हो जाता है, तब उसे अपने पूर्वजन्मोंकी और वर्तमान जन्मकी सब बातें मालूम हो जाती हैं अर्थात् मैं पहले किस योनिमें हुआ था, मैंने उस समय क्या-क्या काम किये, किस प्रकार रहा ये सब स्मरण हो जाते हैं और इस जन्मकी भी बीती हुई सब बातें स्मरण हो जाती हैं। यह ज्ञान भी संसारमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाला और जन्म-मरणसे छुटकारा पानेके लिये योगसाधनमें प्रवृत्त करनेवाला है। जीत
यहाँतक यमोंकी सिद्धिका जो फल बतलाया गया है, उसके सिवा निष्कामभावसे यमोंका सेवन करनेसे कैवल्यकी प्राप्तिमें भी सहायता मिलती
है ॥ ३९॥

सम्बन्ध- अब नियमोंके पालनका फल बतलाते हैं; परंतु इन सूत्रोंमें पूर्णप्रतिष्ठाकी शर्त नहीं रखी गयी है। इससे यह मालूम होता है कि साधक इनका जितना पालन करता है, उतना ही उसे लाभ मिलता चला जाता है। सबसे पहले अगले सूत्रमें बाह्य शौचका फल बतलाते हैं

शौचात्स्वाङजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥

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व्याख्या- बाह्य शुद्धिके पालनसे साधककी अपने शरीरमें अपवित्र बद्धि होकर उसमें वैराग्य हो जाता है अर्थात् उसमें आसक्ति नहीं रहती और दूसरे सांसारिक मनुष्योंके साथ संसर्ग करनेकी इच्छा नहीं रहती अर्थात उनके सङ्गमें भी प्रवृत्ति या आसक्ति नहीं रहती ॥ ४० ॥

सम्बन्ध- भीतरकी शुद्धिका फल बतलाते हैं

सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ॥४१॥

व्याख्या- मैत्री आदिकी भावनाके द्वारा अथवा जप, तप आदि अन्य किसी साधनद्वारा आन्तरिक शौचके लिये अभ्यास करनेसे. राग-द्वेष, ईर्ष्या आदि मलोंका अभाव होकर मनुष्यका अन्तःकरण निर्मल और स्वच्छ हो जाता है। मनकी व्याकुलताका नाश होकर उसमें सदैव प्रसन्नता बनी रहती है; विक्षेप-दोषका नाश होकर एकाग्रता आ जाती है और सब इन्द्रियाँ मनके वशमें हो जाती हैं, अतः उसमें आत्मदर्शनकी योग्यता आ जाती है।
इस प्रकार इसके ऊपरवाले सूत्रमें तो बाह्य शौचका फल बतलाया गया है और इसमें भीतरकी शुद्धिका फल बतलाया गया है ॥४१॥

संतोषादनुत्तमसुखलाभः ॥४२॥

व्याख्या- संतोषसे अर्थात् चाहरहित होनेपर जो अनन्त सुख मिलता है, उसकी बराबरी दूसरा कोई सांसारिक सुख नहीं कर सकता। वह ही ‘ सर्वोत्तम सुख है ॥ ४२ ॥

कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥४३॥
yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

व्याख्या- स्वधर्म-पालनके लिये व्रत-उपवास आदि करने या अन्य सब प्रकारके कष्ट सहन करनेका नाम ‘तप’ है (योग० २।१ की टीका) । इसके अभ्याससे शरीर और इन्द्रियोंके मलका नाश हो जाता है, तब योगीका शरीर स्वस्थ, स्वच्छ और हलका हो जाता है तथा तीसरे पादके पैंतालीसवें और छियालीसवें सूत्रमें बतलायी हुई काय-सम्पद्प शरीर-सम्बन्धी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं एवं सूक्ष्म, दूर देशमें और व्यवधानयुक्त स्थानमें स्थित विषयोंको देखना, सुनना आदि इन्द्रियसम्बन्धी सिद्धि भी प्राप्त हो जाती है ॥४३॥

स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥४४॥

व्याख्या- शास्त्राभ्यास, मन्त्रजप और अपने जीवनका अध्ययनरूप स्वाध्यायके प्रभावसे योगी जिस इष्टदेवका दर्शन करना चाहता है, उसीका दर्शन हो जाता है ।। ४४ ॥

समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥ ४५ ॥

महाभारत तथा पर्यावरण विज्ञान

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

व्याख्या- ईश्वरकी शरणागतिसे योगसाधनमें आनेवाले विघ्नोंका नाश होकर शीघ्र ही समाधि निष्पन्न हो जाती है (योग० १ । २३), क्योंकि ईश्वरपर निर्भर रहनेवाला साधक तो केवल तत्परतासे साधन करता रहता है, उसे साधनके परिणामकी चिन्ता नहीं रहती। उसके साधनमें आनेवाले विघ्नोंको दूर करनेका और साधनकी सिद्धिका भार ईश्वरके जिम्मे पड़ जाता है, अतः साधनका अनायास और शीघ्र पूर्ण होना स्वाभाविक ही है ॥ ४५ ॥

सम्बन्ध- यहाँतक यम और नियमोंका फलसहित वर्णन किया गया; अब आसनके लक्षण, उपाय और उसका फल क्रमसे बतलाते हैं

स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥

व्याख्या- हठयोगमें आसनोंके बहुत भेद बतलाये गये हैं, परंतु यहाँ सूत्रकारने उनका वर्णन नहीं करके बैठनेका तरीका साधककी इच्छापर ही छोड़ दिया है। भाव यह है कि जो साधक अपनी योग्यताके अनुसार जिस रीतिसे बिना हिले-डुले स्थिरभावसे सुखपूर्वक बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके बहुत समयतक बैठ सके वही आसन उसके लिये उपयुक्त है। इसके सिवा,
जिसपर बैठकर साधन किया जाता है, उसका नाम भी आसन है; अतः वह .
भी स्थिर और सुखपूर्वक बैठनेलायक होना चाहिये ॥ ४६॥

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

व्याख्या- शरीरको सीधा और स्थिर करके सुखपूर्वक बैठ जानेके बाद शरीर-सम्बन्धी सब प्रकारकी चेष्टाओंका त्याग कर देना ही प्रयत्नकी शिथिलता . है, इससे और परमात्मामें मन लगानेसे-इन दो उपायोंसे आसनकी सिद्धि होती है।

यहाँ बहुत-से टीकाकारोंने अनन्तका अर्थ शेषनाग और समापत्तिका अर्थ समाधि किया है। भोजराजने अनन्तका अर्थ आकाशादि किया है और समापत्तिका अर्थ चित्तका तद्रूप हो जाना किया है; किंतु योगके अङ्गोंमें समाधि अन्तिम अङ्ग है, उसीके लिये आसन आदि अङ्गोंका अनुष्ठान है।
आसनको समाधिका बहिरंग साधन भी बतलाया गया है। अतः किसी प्रकारकी भी समाधिको आसनकी स्थिरताका उपाय बतलाना युक्तिसंगत नहीं होता। सज्जन विद्वान् अनुभवी महानुभाव इसपर विचार करें ॥४७॥

ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥

व्याख्या- आसन-सिद्धि हो जानेसे शरीरपर सर्दी, गर्मी आदि द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता, शरीरमें उन सबको बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके सहन करनेकी शक्ति आ जाती है। अतः वे द्वन्द्व चित्तको चञ्चल बनाकर साधनमें विघ्न नहीं डाल सकते ॥४८॥

सम्बन्ध- अब प्राणायामका सामान्य लक्षण बतलाते हैं

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥

व्याख्या- प्राणवायुका शरीरमें प्रविष्ट होना श्वास है और बाहर निकलना प्रश्वास है। इन दोनोंकी गतिका रुक जाना अर्थात् प्राणवायुकी गमनागमनरूप क्रियाका बंद हो जाना ही प्राणायामका सामान्य लक्षण है।
यहाँ आसनकी सिद्धिके बाद प्राणायामका सम्पन्न होना बतलाया है। इसमें यह प्रतीत होता है कि आसनकी स्थिरताका अभ्यास किये बिना ही जो प्राणायाम करते हैं, वे गलत रास्तेंपर हैं। प्राणायामका अभ्यास करते समय
आसनकी स्थिरता परम आवश्यक है ॥४९॥

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सम्बन्ध- उक्त प्राणायामके भेदोंको समझानेके लिये तीन प्रकारके प्राणायामोंका वर्णन करते हैं

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥५०॥

व्याख्या- अगले सूत्रमें जिस प्राणायामके लक्षण किये गये हैं उसे
चौथा प्राणायाम बतलाया है। इससे यह सिद्ध होता है कि इस सूत्रमें तीन प्रकारके प्राणायामोंका वर्णन है और उन तीनों प्रकारके ही प्राणायामोंको साधक देश, काल और संख्याद्वारा देखता रहता है कि वे किस अवस्थातक पहुँच चुके हैं। इस प्रकार परीक्षा करते-करते वे प्राणायाम जैसे-जैसे उन्नत होते जाते हैं वैसे-ही-वैसे उनमें लम्बाई और हलकापन बढ़ता चला जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्तम्भवृत्तिरूप तृतीय प्राणायाममें भी देशका सम्बन्ध रहता है, अन्यथा वह देश, काल और संख्याद्वारा परिदृष्ट कैसे होगा? प्राणायामके तीन भेदोंको इस प्रकार समझना चाहिये।

(१) बाह्यवृत्ति- प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालकर बाहर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रहना और साथ-ही-साथ इस बातकी भी परीक्षा करते रहना कि वह बाहर आकर कहाँ ठहरा है, कितने समयतक ठहरा है और उतने समयमें स्वाभाविक प्राणकी गतिकी कितनी संख्या होती है। यह ‘बाह्यवृत्ति’ प्राणायाम है, इसे रेचक’ भी कहते हैं; क्योंकि इसमें रेचनपूर्वक प्राणको रोका जाता है । अभ्यास करते-करते यह दीर्घ (लम्बा) अर्थात् बहुत कालतक रुके रहनेवाला और सूक्ष्म अर्थात् हलका अनायास साध्य हो,जाता है।

(२) आभ्यन्तरवृत्ति- प्राणवायुको भीतर ले जाकर भीतर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रहना और साथ-ही-साथ यह देखते रहना कि आभ्यन्तर देशमें कहाँतक जाकर प्राण रुकता है; वहाँ कितने कालतक सुखपूर्वक ठहरता है और उतने समयमें प्राणकी स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है। यह ! आभ्यन्तर’ प्राणायाम है; इसे ‘पूरक’ प्राणायाम भी कहते हैं; क्योंकि इसमें शरीरके अंदर ले जाकर प्राणको रोका जाता है। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता जाता है।

(३) स्तम्भवृत्ति- शरीरके भीतर जाने और बाहर निकलनेवाली जो प्राणोंकी स्वाभाविक गति है, उसे प्रयत्नपूर्वक बाहर या भीतर निकलने या ले
जानेका अभ्यास न करके प्राणवायु स्वभावसे बाहर निकला हो या भीतर गया हो, जहाँ हो, वहीं उसकी गतिको स्तम्भित कर देना (रोक देना) और यह देखते रहना कि प्राण किस देशमें रुके हैं, कितने समयतक सुखपूर्वक रुके रहते हैं, इस समयमें स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है, यह ‘स्तम्भवृत्ति’ . प्राणायाम है; इसे ‘कुम्भक’ प्राणायाम भी कहते हैं। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता है। कोई-कोई टीकाकार इसे केवल ‘कुम्भक’ कहते हैं और कोई-कोई चौथे प्राणायामको केवल कुम्भक कहते हैं । इस तीसरे और अगले सूत्रमें बतलाये हुए चौथे प्राणायामके भेदका निर्णय करनेमें बहुत मतभेद है।
– साधक किसी भी प्राणायामका अभ्यास करें, उसके साथ मन्त्र अवश्य रहना चाहिये ॥ ५० ॥

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सम्बन्ध- चौथे प्राणायामका वर्णन करते हैं

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥ ५१ ॥

व्याख्या- बाहर और भीतरके विषयोंके चिन्तनका त्याग कर देनेसे अर्थात इस समय प्राण बाहर निकल रहे हैं या भीतर जा रहे हैं अथवा चल रहे हैं कि ठहरे हुए हैं, इस जानकारीका त्याग करके मनको इष्टचिन्तनमें लगा देनेसे देश, काल और संख्याके ज्ञानके बिना ही अपने-आप जो प्राणोंकी गति जिस-किसी देशमें रुक जाती है; वह चौथा प्राणायाम है । यह पहले बतलाये हुए तीन प्रकारके प्राणायामोंसे सर्वथा भिन्न है, यह बात दिखलानेके लिये

सूत्रमें ‘चतुर्थः’ पदका प्रयोग किया गया है। कि
यह अनायास होनेवाला राजयोगका प्राणायाम है। इसमें मनकी चञ्चलता शान्त होनेके कारण अपने-आप प्राणोंकी गति रुकती है और पहले बतलाये हुए प्राणायामोंमें प्रयत्नद्वारा प्राणोंकी गतिको रोकनेका अभ्यास करते करते प्राणोंकी गतिका निरोध होता है, यही इसकी विशेषता है ॥ ५१ ॥

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥ ५२ ॥

व्याख्या- जैसे-जैसे मनुष्य प्राणायामका अभ्यास करता है, वैसे-ही वैसे उसके संचित कर्म-संस्कार और अविद्यादि क्लेश दुर्बल होते चले जाते हैं। ये कर्म, संस्कार और अविद्यादि क्लेश ही ज्ञानका आवरण (परदा) है। इस परदेके कारण ही मनुष्यका ज्ञान ढका रहता है, अतः वह मोहित हुआ रहता है। जब यह परदा दुर्बल होते-होते सर्वथा क्षीण हो जाता है, तब साधकका ज्ञान सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो जाता है (गीता ५। १६)। इसलिये साधकको प्राणायामका अभ्यास अवश्य करना चाहिये ।। ५२ ॥

सम्बन्ध- प्राणायामका दूसरा फल बतलाते हैं

धारणासु च योग्यता मनसः ॥ ५३॥

व्याख्या- प्राणायामके अभ्याससे मनमें धारणाकी योग्यता भी आ जाती है, यानी उसे चाहे जिस जगह अनायास ही स्थिर किया जा सकता है ।। ५३॥

सम्बन्ध-अब प्रत्याहारके लक्षण बतलाते हैं

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स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां
प्रत्याहारः ॥ ५४॥

व्याख्या- उक्त प्रकारसे प्राणायामका अभ्यास करते-करते मन और इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाते हैं, उसके बाद इन्द्रियोंकी बाह्यवृत्तिको सब ओरसे समेटकर मनमें विलीन करनेके अभ्यासका नाम ‘प्रत्याहार’ है। जब साधनकालमें साधक इन्द्रियोंके विषयोंका त्याग करके चित्तको अपने ध्येयमें लगाता है, उस समय जो इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर न जाकर चित्तमें विलीन-सा हो जाना है, यह प्रत्याहार सिद्ध होनेकी पहचान है। यदि उस समय भी इन्द्रियाँ पहलेके अभ्याससे इसके सामने बाह्य विषयोंका चित्र उपस्थित करती रहें तो समझना चाहिये कि प्रत्याहार नहीं हुआ। उपनिषदोंमें भी ‘वाक्’ शब्दसे उपलक्षित इन्द्रियोंको मनमें निरुद्ध करनेकी बात कहकर यही भाव दिखलाया है॥ ५४॥

सम्बन्ध- अब प्रत्याहारका फल बतलाकर इस द्वितीय पादकी समाप्ति करते हैं

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ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥ ५५ ॥

व्याख्या- प्रत्याहार सिद्ध हो जानेपर योगीकी इन्द्रियाँ उसके सर्वथा वशमें हो जाती हैं, उनकी स्वतन्त्रताका सर्वथा अभाव हो जाता है। प्रत्याहारकी सिद्धि हो जानेके बाद इन्द्रिय-विजयके लिये अन्य साधनकी आवश्यकता नहीं रहती ॥ ५५ ॥

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः। (कठ० १।३।१३) . ‘बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह वाक आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनमें विलीन कर दे अर्थात् इनकी ऐसी स्थिति कर दे कि इनकी कोई भी क्रिया न हो मनमें विषयोंकी स्फुरणा न रहे।

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yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

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yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध-उक्त दृश्यके भेदोंका वर्णन अपने ग्रन्थकी परिभाषामें करते हैं

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विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥ १९॥

व्याख्या- (१) विशेष-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश-ये पाँच स्थूल भूत तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मनः—इस प्रकार सब मिलकर सोलहोंका नाम ‘विशेष’ है। गुणोंके विशेष धर्मोकी अभिव्यक्ति (प्रकटता) इन्हींसे होती है, इसलिये इनको विशेष कहते हैं। सांख्यकारिकामें इनका नाम विकार रखा है (सां. का० ३).

(२) अविशेष-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-ये पाँच तन्मात्राएँ हैं, इन्हींको सूक्ष्म महाभूत भी कहते हैं, क्योंकि ये स्थूल पञ्च महाभूतोंके कारण हैं तथा छठा अहंकार जो कि मन और इन्द्रियोंका कारण है, इन छहोंका नाम ‘अविशेष’ है। इनका स्वरूप इन्द्रियगोचर नहीं है, इसलिये इनको ‘अविशेष’ कहते हैं।

(३) लिङ्गमात्र- उपर्युक्त बाईस तत्त्वोंका कारणभूत जो महत्तत्त्व है, जिसका वर्णन उपनिषदोंमें और गीतामें बुद्धिके नामसे किया गया है, (कठ० १।३ । १०; गीता १३ । ५) उसका नाम ‘लिङ्गमात्र’ है। इसकी उपलब्धि केवल सत्तामात्रसे ही होती है, इस कारण इसको ‘लिङ्गमात्र’ कहते हैं। ..

(४) अलिङ्ग- मूल प्रकृति, (सां० का?). जो, कि तीनों गुणोंकी साम्यावस्था मानी गयी है, महत्तत्त्व जिसका पहला परिणाम (कार्य) है, उपनिषद्
और गीतामें जिसका वर्णन अव्यक्त नामसे किया गया है (कठ० १।३ । ११; गीता १३ । ५) उसका नाम ‘अलिङ्ग’ है । साम्यावस्थाको प्राप्त गुणोंके स्वरूपकी अभिव्यक्ति नहीं होती, इसलिये प्रकृतिको चिह्नरहित (अव्यक्त) कहते हैं।

इस प्रकार चार अवस्थाओंमें विद्यमान रहनेवाले ये सत्त्वादि गुण ही दृश्य नामसे कहे गये हैं ॥ १९ ॥

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सम्बन्ध-अब द्रष्टाके स्वरूपका वर्णन करते हैं

द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥२०॥

व्याख्या- केवल चेतनमात्र ही जिसका स्वरूप है, ऐसा आत्मतत्त्व स्वरूपसे सर्वथा शुद्ध, निर्विकार है तो भी बुद्धिके सम्बन्धसे बुद्धिवृत्तिके अनुरूप देखनेवाला होनेसे ‘द्रष्टा’ कहलाता है।

वास्तवमें द्रष्टा पुरुष (आत्मतत्त्व) सर्वथा शुद्ध, निर्विकार, कूटस्थ, असङ्ग है तथापि इसका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ अनादिसिद्ध अविद्यासे माना जाता है। जबतक उस अविद्याके नाशद्वारा यह प्रकृतिसे अलग होकर अपने असली स्वरूपमें स्थित नहीं हो जाता तबतक बुद्धिके साथ एकताको प्राप्त हुआ-सा बुद्धिकी वृत्तियोंको देखता रहता है और जबतक उनको देखता है, तभीतक इसकी ‘द्रष्टा’ संज्ञा है। दृश्यका सम्बन्ध न रहनेपर द्रष्टा किसका? फिर तो यह केवल चेतनमात्र, सर्वथा शुद्ध और निर्विकार है ही ॥ २० ॥

सम्बन्ध-दृश्य और द्रष्टाके स्वरूपका वर्णन करनेके बाद अब दृश्यके स्वरूपकी सार्थकताका प्रतिपादन करते हैं

तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥ २१॥

व्याख्या- उक्त द्रष्टाको अपने दर्शनद्वारा भोग प्रदान करनेके लिये और द्रष्टाके निज स्वरूपका दर्शन कराकर अपवर्ग (मुक्ति) प्रदान करनेके लिये इस प्रकार पुरुषका प्रयोजन सिद्ध करनेके लिये ही दृश्य है। इसी में उसके होनेकी सार्थकता है। अठारहवें सूत्रमें दृश्यके लक्षणोंका वर्णन करते समय भी यही बात कही गयी है ।। २१ ।

सम्बन्ध-पुरुषको अपवर्ग प्रदान कर देनेके बाद प्रकृतिका कोई कार्य शेष नहीं रहता, फिर उसका बना रहना निरर्थक है; अतः उसका अभाव हो जाना चाहिये इसपर कहते हैं

कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ॥ २२ ॥

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व्याख्या- प्रकृतिका प्रयोजन किसी एक ही पुरुषके लिये भोग और अपवर्ग प्रदान करना नहीं है, वह तो सभी पुरुषोंके लिये समान है। अतः जिसका कार्य वह कर चुकी, उस कृतार्थ-मुक्त पुरुषके लिये उसकी आवश्यकता न रहनेके कारण यद्यपि वह उसके लिये नष्ट हो जाती है, तो भी दूसरे सब जीवोंको भोग और अपवर्ग प्रदान करना तो शेष है ही। इसलिये उसका सर्वथा नाश नहीं होता, वह विद्यमान रहती है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि प्रकृति परिणामी होनेपर भी अनादि और नित्य है। यहाँ जो मुक्त पुरुषके लिये उसका नष्ट होना बतलाया गया है, वह भी अदृश्य होना ही .. बतलाया गया है; क्योंकि योगके सिद्धान्तमें किसी भी वस्तुका सर्वथा अभाव नहीं माना गया है ।। २२ ॥

सम्बन्ध-अब संयोगके स्वरूपका वर्णन करते हैं

स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥२३॥

व्याख्या- दृश्यका स्वरूप द्रष्टाके ही लिये है, यह बात पहले कह आये हैं, इसी भावको लेकर इस सूत्रमें पुरुषको प्रकृतिका स्वामी बतलाया है
और प्रकृतिको पुरुषका ‘स्व’ अर्थात् अपना यानी अधिकृत पदार्थ कहा है। उस प्रकृतिके साथ पुरुषका सम्बन्ध उन दोनोंके स्वरूपको जाननेके लिये ही है, अतः उस दर्शन (ज्ञान) शक्तिसे जबतक मनुष्य इस प्रकृतिके नाना रूपोंको देखता रहता है, तबतक तो भोगोंको भोगता रहता है। जब इनके : दर्शनसे विरक्त होकर अपने स्वरूप-दर्शनकी ओर झाँकता है, तब स्वरूपका दर्शन हो जाता. है (योग० ३ । ३५) । फिर संयोगकी कोई आवश्यकता न रहनेसे उसका अभाव हो जाता है । यही पुरुषकी कैवल्य’ अवस्था है (योग०३ । ३४) ॥ २३ ।।

सम्बन्ध-अब उक्त संयोगका कारण बतलाते हैं

तस्य हेतुरविद्या ॥ २४ ॥

व्याख्या- सर्वथा निर्विकार असङ्ग चेतन पुरुषका जो यह जड प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है यह अनादिसिद्ध अविद्यासे ही है, वास्तवमें नहीं है।
यहाँ अविद्या विपर्ययवृत्तिका नाम नहीं है, किंतु अपने स्वरूपके अनादिसिद्ध अज्ञानका नाम अविद्या है। इसीलिये अपने स्वरूपके ज्ञानसे इसका नाश हो जाता है और उसके बाद प्रयोजन न रहनेपर वह ज्ञान भी शान्त हो जाता है। यही पुरुषका ‘कैवल्य’ है ।। २४ ॥

सम्बन्ध-अब कारणसहित संयोगके अभावसे सिद्ध होनेवाले सर्वथा दुःखनाशरूप ‘हान’का वर्णन करते हैं

तदभावात्संयोगाभावो हानं तदृशेः कैवल्यम् ॥ २५ ॥

व्याख्या- जब आत्मदर्शनरूप ज्ञानसे अविद्याका यानी अज्ञानका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब अज्ञानजनित संयोगका भी अपने-आप अभाव हो जाता है, फिर पुरुषका प्रकृतिसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता और उसके जन्म-मरण आदि सम्पूर्ण दुःखोंका सदाके लिये अत्यन्त अभाव हो जाता है तथा पुरुष अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है—यही उसका कैवल्य अर्थात् सर्वथा अकेलापन है ॥२५॥

सम्बन्ध-अब उक्त दुःखोंके अत्यन्त अभावरूप ‘हान’का उपाय बतलाते हैं

विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२६॥
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अथ योगानुशासनम्॥१॥

व्याख्या- प्रकृति तथा उसके कार्य-बुद्धि, अहंकार, इन्द्रियाँ और शरीर-इन सबके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेसे तथा आत्मा इनसे सर्वथा भिन्न और असङ्ग है, आत्माका इनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, इस प्रकार पुरुषके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे जो प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका अलग-अलग यथार्थ ज्ञान होता है,

इसीका नाम ‘विवेकज्ञान’ है (योग ३। ५४) । उस समय चित्त विवेकज्ञानमें निमग्न और कैवल्यके अभिमुख रहता है। यह ज्ञान जब समाधिकी निर्मलता-स्वच्छता होनेपर पूर्ण और निश्चल हो जाता है, उसमें किसी प्रकारका भी मल नहीं रहता (योग) ४ । ३१), तब वह अविप्लव विवेकज्ञान कहलाता है। ऐसा विवेकज्ञान ही समस्त दुःखोंके अत्यन्त अभावरूप मुक्तिका उपाय है। इससे संसारके बीज अविद्यादि क्लेशोंका और समस्त कर्मोंका सर्वथा अभाव हो जाता है (योग ४। ३०)।

उसके बाद चित्त अपने आश्रयरूप-महत्तत्त्व आदिके सहित अपने कारणमें विलीन हो जाता है तथा प्रकृतिका जो स्वाभाविक परिणाम-क्रम है, वह उसके लिये बंद हो जाता है
(योग० ४।३२) ॥२६॥

सम्बन्ध-उक्त विवेकज्ञानके समय साधककी बुद्धि किस प्रकारकी होती है, यह बतलाते हैं

तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥ २७॥

व्याख्या- जब निर्मल और अचल विवेकख्यातिके द्वारा योगीके चित्तका आवरण और मल सर्वथा नष्ट हो जाता है (योग० ४।३१) उस समय उस चित्तमें दूसरे सांसारिक ज्ञानोंका उदय नहीं होता। अतः सात प्रकारकी उत्कर्ष अवस्थावाली प्रज्ञा (बुद्धि) उत्पन्न होती है । उनमें पहली चार प्रकारकी तो कार्यविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस कारण वे ‘कार्यविमुक्तिप्रज्ञा’ कहलाती हैं और अन्तकी तीन चित्तविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस कारण उनका नाम ‘चित्तविमुक्तिप्रज्ञा’ है। कार्यविमुक्तिप्रज्ञा यानी कर्तव्यशून्य अवस्थाके चार भेद इस प्रकार हैं

(१) ज्ञेयशून्य अवस्था- जो कुछ जानना था जान लिया; अब कुछ भी जानना शेष नहीं रहा अर्थात् जितना गुणमय दृश्य है (योग० २ । १८, १९), वह सब अनित्य और परिणामी है यह पूर्णतया जान लिया।

(२) हेयशून्य अवस्था- जिसका अभाव करना था, उसका अभाव कर दिया; अर्थात् द्रष्टा और दृश्यके संयोगका, जो कि हेयका हेतु है, अभाव कर दिया, अब कुछ भी अभाव करनेयोग्य शेष नहीं रहा।

(३) प्राप्यप्राप्त अवस्था— जो कुछ प्राप्त करना था, प्राप्त कर लिया अर्थात् समाधिद्वारा केवल अवस्थाकी प्राप्ति हो चुकी; अतः अब कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहा।

(४) चिकीर्षाशून्य अवस्था- जो कुछ करना था, कर लिया अर्जत हानका उपाय जो निर्मल और अचल विवेकज्ञान है, उसे सिद्ध कर लिया
अब और कुछ करना शेष नहीं रहा।

चित्तविमुक्तिप्रज्ञाके तीन भेद इस प्रकार हैं

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

(१) चित्तकी कृतार्थता- चित्तने अपना अधिकार ‘भोग और अपने देना पूरा कर दिया, अब उसका कोई प्रयोजन शेष नहीं रहा।

(२) गुणलीनता- चित्त अपने कारणरूप गुणोंमें लीन हो रहा है. क्योंकि अब उसका कोई कार्य शेष नहीं रहा।

(३) आत्मस्थिति- पुरुष सर्वथा गुणोंसे अतीत होकर अपने स्वरूपमें अचल भावसे स्थित हो गया।

इस सात प्रकारकी प्रान्तभूमिप्रज्ञाको अनुभव करनेवाला योगी कुशल . (जीवन्मुक्त) कहलाता है और चित्त जब अपने कारणमें लीन हो जाता है,
तब भी कुशल (विदेहमुक्त) कहलाता है ॥ २७॥

सम्बन्ध-अब उक्त निर्मल विवेकज्ञानकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं

योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥ २८॥

व्याख्या- आगे बतलाये जानेवाले योगके आठ अङ्गोंका अनुष्ठान करनेसे अर्थात् उनको आचरणमें लानेसे चित्तके मलका अभाव होकर वह सर्वथा निर्मल हो जाता है, उस समय योगीके ज्ञानका प्रकाश विवेकख्यातितक हो जाता है अर्थात् उसे आत्माका स्वरूप, बुद्धि, अहंकार और इन्द्रियोंसे सर्वथा भिन्न प्रत्यक्ष दिखलायी देता है ॥ २८॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध- उक्त योगाङ्गोंके नाम और उनकी संख्या बतलाते हैं

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयो ऽष्टावङ्गानि ॥ २९॥

व्याख्या- इन आठोंके लक्षण और फलोंका वर्णन अगले सूत्रोंमें स्वयं सूत्रकारने ही किया है, अतः यहाँ विस्तारकी आवश्यकता नहीं है ॥ २९॥

सम्बन्ध- पहले यमोंका वर्णन करते हैं

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥३०॥

व्याख्या- (१) अहिंसा-मन, वाणी और शरीरसे किसी प्राणीको कभी किसी प्रकार किंचिन्मात्र भी दुःख न देना ‘अहिंसा’ है, परदोष-दर्शनका सर्वथा त्याग भी इसीके अन्तर्गत है।

(२) सत्य-इन्द्रिय और मनसे प्रत्यक्ष देखकर, सुनकर या अनुमान करके जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा-का-वैसा ही भाव प्रकट करनेके लिये प्रिय और हितकर तथा दूसरेको उद्वेग उत्पन्न न करनेवाले जो वचन बोले जाते हैं, उनका नाम ‘सत्य’ है। इसी प्रकार कपट और छलरहित व्यवहारका नाम सत्यव्यवहार समझना चाहिये।

(३) अस्तेय- दूसरेके स्वत्वका अपहरण करना, छलसे या अन्य , किसी उपायसे अन्यायपूर्वक अपना बना लेना ‘स्तेय’ (चोरी) है, इसमें सरकारकी टैक्सकी चोरी और घूसखोरी भी सम्मिलित है; इन सब प्रकारकी चोरियोंके अभावका नाम ‘अस्तेय’ है।

(४) ब्रह्मचर्य- मन, वाणी और शरीरसे होनेवाले सब प्रकारके मैथुनोंका सब अवस्थाओंमें सदा त्याग करके सब प्रकारसे वीर्यकी रक्षा करना ‘ब्रह्मचर्य’ है।

अतः साधकको चाहिये कि न तो कामदीपन करनेवाले पदार्थोंका सेवन करे, न ऐसे दृश्योंको देखे, न ऐसी बातोंको सुने, न ऐसे साहित्यको पढ़े और न ऐसे विचारोंको ही मनमें लावे तथा स्त्रियोंका और स्त्री आसक्त पुरुषोंका संग भी ब्रह्मचर्यमें बाधक है, अतः ऐसे संगसे सदा सावधानीके साथ अलग रहे।

(५) अपरिग्रह- अपने स्वार्थके लिये ममतापूर्वक धन, सम्पत्ति
कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा। सर्वत्र मैथुनत्यागी ब्रह्मचर्य प्रचक्षते ॥
(गरुड० पूर्व आचार० २३८ । ६) और भोग-सामग्रीका संचय करना ‘परिग्रह’ है, इसके अभावका नाम ‘अपरिग्रह’ है ॥ ३०॥

सम्बन्ध-उक्त यमोंकी सबसे ऊँची अवस्था बतलाते हैं

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥३१॥

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व्याख्या- उक्त अहिंसादिका अनुष्ठान जब सार्वभौम अर्थात् सबके साथ, सब जगह और सब समय समानभावसे किया जाता है, तब ये महाव्रत हो जाते हैं। जैसे किसीने नियम लिया कि मछलीके सिवा अन्य जीवोंकी हिंसा नहीं करूँगा तो यह जाति-अवछिन्न अहिंसा है, इसी तरह कोई नियम ले कि मैं तीर्थों में हिंसा नहीं करूँगा तो यह देश-अवछिन्न अहिंसा है। कोई यह नियम करे कि मैं एकादशी, अमावास्या और पूर्णिमाको हिंसा नहीं करूँगा तो यह कालावच्छिन्न अहिंसा है।

कोई नियम करे कि मैं विवाहके अवसरके सिवा अन्य किसी निमित्तसे हिंसा नहीं करूँगा तो यह समयावच्छिन्न (निमित्तसे सम्बन्धित) अहिंसा है। इसी प्रकार सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहके भी भेद समझ लेने चाहिये। ऐसे यम व्रत तो हैं, परंतु सार्वभौम न होनेके कारण महाव्रत नहीं हैं। उपर्युक्त प्रकारका प्रतिबन्ध न लगाकर जब सभी प्राणियोंके साथ सब देशोंमें सदा-सर्वदा इनका पालन किया जाय, किसी भी निमित्तसे इनमें शिथिलता आनेका अवकाश न दिया जाय, तब ये सार्वभौम होनेपर ‘महाव्रत’ कहलाते हैं ॥ ३१ ॥

सम्बन्ध- यमोंका वर्णन करके अब नियमोंका वर्णन करते हैं
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥३२॥

व्याख्या- (१) शौच-जल, मृत्तिकादिके द्वारा शरीर, वस्त्र और मकान आदिके मलको दूर करना बाहरकी शुद्धि है, इसके सिवा अपने वर्णाश्रम और योग्यताके अनुसार न्यायपूर्वक धनको और शरीरनिर्वाहके लिये आवश्यक अन्न आदि पवित्र वस्तुओंको प्राप्त करके उनके द्वारा शास्त्रानुकूल शुद्ध भोजनादि करना तथा सबके साथ यथायोग्य पवित्र बर्ताव करना—यह भी बाहरी शुद्धिके ही अन्तर्गत है। जप, तप और शुद्ध विचारोंके द्वारा एवं मैत्री आदिकी भावनासे अन्तःकरणके राग-द्वेषादि मलोंका नाश करना भीतरकी पवित्रता है।

(२) संतोष- कर्तव्यकर्मका पालन करते हुए उसका जो कुछ परिणाम हो तथा प्रारब्धके अनुसार अपने-आप जो कुछ भी प्राप्त हो एवं जिस अवस्था
और परिस्थितिमें रहनेका संयोग प्राप्त हो जाय, उसीमें संतुष्ट रहना और किसी प्रकारकी भी कामना या तृष्णा न करना ‘संतोष’ है।

(३) तप, (४) स्वाध्याय और (५) ईश्वर-प्रणिधान-इन तीनोंकी व्याख्या क्रियायोगके वर्णनमें कर चुके हैं (देखिये योग० २ । १ की व्याख्या) उसी प्रकार यहाँ भी समझ लेना चाहिये ॥ ३२ ॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध- यम-नियमोंके अनुष्ठानमें विघ्न उपस्थित होनेपर उन विघ्नोंको हटानेका उपाय बतलाते हैं

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥ ३३ ॥

व्याख्या- जब कभी संगदोषसे या अन्यायपूर्वक किसीके द्वारा सताये नारपर बदला लेनेके लिये या अन्य किसी भी कारणसे मनमें अहिंसादिके विरोधी भाव बाधा पहुँचावें अर्थात् हिंसा, झूठ, चोरी आदिमें प्रवृत्त होकर यम-नियमादिका त्याग कर देनेकी परिस्थिति उत्पन्न कर दें तो उस समय उन विरोधी विचारोंका नाश करनेके लिये उन विचारोंमें दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षकी भावना करनी चाहिये ।। ३३ ।।

सम्बन्ध- इस दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षभावनाका ही अगले सूत्रोंमें वर्णन करते हैं

वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोध मोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥ ३४ ॥

व्याख्या- स्वयं किये हुए, दूसरोंसे करवाये हुए, दूसरोंको करते . देखकर अनुमोदन किये हुए—इस तरह तीन प्रकारसे होनेवाले हिंसा, झूठ, चोरी और व्यभिचार आदि अवगुण, जो कि यम-नियमोंके विरोधी हैं, उनका नाम ‘वितर्क’ है।

ये दोष कभी लोभसे, कभी क्रोधसे और कभी मोहसे एवं कभी छोटे रूपमें, कभी मध्यम और कभी भयंकररूपमें साधकके सामने उपस्थित होकर उसे सताते हैं। उस समय साधकको सावधान होकर विचार करना चाहिये कि ये हिंसादि दोष महान् हानिकारक और नरकमें ले जानेवाले हैं, इनका परिणाम अनन्तकालतक बारम्बार दुःख भोगना और अज्ञानके वशमें होकर शूकर-कूकर आदि मूढ़ योनियोंमें पड़ना है, अतः इनसे सर्वथा दूर रहकर दृढ़तापूर्वक यम-नियमोंका पालन करते रहना चाहिये । इस प्रकारके विचारोंको बारम्बार करते रहना ही ‘प्रतिपक्षकी भावना’ है ॥ ३४॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध- इस प्रकार यम-नियमोंके विरोधी हिंसादिको हटानेका उपाय उसमें दोष देखना बतलाकर अब यम-नियमोंमें प्रीति उत्पन्न करनेके लिये उनके पालनका भिन्न-भिन्न फल बतलाते हैं

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥ ३५॥

व्याख्या- जब योगीका अहिंसाभाव पूर्णतया दृढ़ स्थिर हो जाता है तब उसके निकटवर्ती हिंसक जीव भी वैरभावसे रहित हो जाते हैं। इतिहास ग्रन्थोंमें जहाँ मुनियोंके आश्रमोंकी शोभाका वर्णन आता है, वहाँ वनचर जीवोंमें स्वाभाविक वैरका अभाव दिखलाया गया है, यह उन ऋषियोंके अहिंसाभावकी प्रतिष्ठाका द्योतक है॥ ३५ ॥

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

साधनपाद-२

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साधनपाद-२

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सम्बन्ध- पहले पादमें योगका स्वरूप, उसके भेद और उसके फलका संक्षेपमें वर्णन किया गया। साथ ही उसके उपायभूत अभ्यास और वैराग्यका तथा ईश्वरप्रणिधान आदि दूसरे साधनोंका भी वर्णन किया गया, किंतु उसमें बतलायी हुई रीतिसे निर्बीज समाधि वही साधक प्राप्त कर सकता है, जिसका अन्तःकरण स्वभाव से ही शुद्ध है एवं जो योगसाधनामें तत्पर है। अतः अब साधारण साधकोंके लिये क्रमशः अन्तःकरणकी शुद्धिपूर्वक निर्बीज-समाधि प्राप्त करनेका उपाय बतलानेके लिये साधनपाद नामक दूसरे पादका आरम्भ किया जाता है

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥१॥ –

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि-तप-स्वाध्याय और. ईश्वर-शरणागति ये तीनों; क्रियायोगः क्रियायोग हैं।

व्याख्या- (१) तप- अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति और योग्यताके अनुसार स्वधर्मका पालन करना और उसके पालनमें जो शारीरिक या मानसिक अधिक-से-अधिक कष्ट प्राप्त हो, उसे सहर्ष सहन करना-इसका नाम ‘तप’ है। व्रत, उपवास आदि भी इसीमें आ जाते हैं। निष्कामभावसे इस तपका पालन करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण अनायास ही शुद्ध हो जाता है, यह गीतोक्त कर्मयोगका ही अङ्ग है।

(२) स्वाध्याय- जिनसे अपने कर्तव्य-अकर्तव्यका बोध हो सके, ऐसे वेद, शास्त्र, महापुरुषोंके लेख आदिका पठन-पाठन और भगवान्के ॐ कार आदि किसी नामका या गायत्रीका और किसी भी इष्टदेवताके मन्त्रका जप करना ‘स्वाध्याय’ है। इसके सिवा अपने जीवनके अध्ययनका नाम भी स्वाध्याय है। अतः साधकको प्राप्त विवेकके द्वारा अपने दोषोंको खोजकर निकालते रहना चाहिये।

(३) ईश्वर- प्रणिधान– ईश्वरके शरणापन्न हो जानेका नाम ‘ईश्वर प्रणिधान’ है। उसके नाम, रूप, लीला, धाम, गुण और प्रभाव आदिका श्रवण, कीर्तन और मनन करना, समस्त कर्मोको भगवान्के समर्पण कर देना, अपनेको भगवान्के हाथका यन्त्र बनाकर जिस प्रकार वह नचावे, वैसे ही नाचना, उसकी आज्ञाका पालन करना, उसीमें अनन्य प्रेम करना-ये सभी ईश्वर-प्रणिधानके अङ्ग हैं। यद्यपि तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान-ये तीनों ही यम, नियम आदि योगके अङ्गोंमें नियमोंके अन्तर्गत आ जाते हैं तथापि इन तीनों साधनोंका विशेष महत्त्व और इनकी सुगमता दिखलानेके लिये पहले क्रियायोगके नामसे इनका अलग वर्णन किया गया है ॥ १ ॥

सम्बन्ध-उपर्युक्त क्रियायोगका फल बतलाते हैं

समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ॥ २ ॥

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व्याख्या-उपर्युक्त क्रियायोग अविद्यादि दोषोंको क्षीण करनेवाला और समाधिकी सिद्धि करनेवाला है अर्थात् इसके साधनसे साधकके अविद्यादि क्लेशोंका क्षय होकर उसको कैवल्य-अवस्थातक समाधिकी प्राप्ति हो सकती है ॥२॥

सम्बन्ध- दूसरे सूत्रमें क्रियायोगका फल समाधिसिद्धि और क्लेशोंका क्षय बतलाया गया, उनमें से समाधिके लक्षण और फलका वर्णन तो पहले पादमें हो चुका है, परंतु क्लेश कितने हैं, उनके नाम क्या हैं, वे किस-किस अवस्थामें रहते हैं, उनका क्षय कैसे होता है और उनका नाश क्यों करना चाहिये-इन सब बातोंका वर्णन नहीं हुआ। अतः प्रसङ्गानुसार इस प्रकरणका आरम्भ करते हैं

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः ॥३॥

व्याख्या- ये अविद्यादि पाँचों ही जीवमात्रको संसारचक्रमें घुमानेवाले महादुःखदायक हैं। इस कारण सूत्रकारने इनका नाम ‘क्लेश’ रखा है।
कितने ही टीकाकारोंका तो कहना है कि ये पाँचों क्लेश ही पाँच प्रकारका विपर्ययज्ञान है। कुछ इनमेंसे केवल अविद्या और विपर्ययवृत्तिकी ही एकता ..
करते हैं; किंतु ये दोनों ही बातें युक्तिसंगत नहीं मालूम होती; क्योंकि प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्तिका अभाव है, पर अविद्यादि पाँचों क्लेश वहाँ भी विद्यमान रहते हैं । ऋतम्भरा प्रज्ञामें विपर्ययका लेश भी नहीं स्वीकार किया जा सकता, परंतु जिस अविद्यारूप क्लेशको द्रष्टा और दृश्यके संयोगका हेतु माना गया है, वह तो वहाँ भी रहता ही है, अन्यथा संयोगके अभावसे हेयका नाश होकर साधकको उसी क्षण कैवल्य-अवस्थाकी प्राप्ति हो जानी चाहिये थी। इसके सिवा एक बात और भी है। इस ग्रन्थमें कैवल्य-स्थितिको प्राप्त सिद्ध योगीके कर्म अशुक्ल और अकृष्ण अर्थात् पुण्य-पापके संस्कारोंसे रहित माने गये हैं (योग० ४ । ७), इससे यह सिद्ध होता है कि जीवन्मुक्त योगीद्वारा भी कर्म अवश्य किये जाते हैं। तब यह भी मानना पड़ेगा कि व्युत्थान-अवस्थामें जब वह कर्म करता है तो विपर्यय-वृत्तिका प्रादुर्भाव भी स्वाभाविक होता है;

क्योंकि पाँचों ही वृत्तियाँ चित्तका धर्म हैं और व्युत्थान-अवस्थामें चित्त . विद्यमान रहता है, यह स्वीकार करना ही पड़ेगा। किंतु जीवन्मुक्त योगीमें
अविद्या भी रहती है, यह नहीं माना जा सकता, क्योंकि यदि अविद्या वर्तमान है तो वह जीवन्मुक्त ही कैसा; इसी तरह और भी बहुत-से कारण हैं (देखिये योग० १।८ की टीका),जिनसे विपर्यय और अविद्याकी एकता माननेमें सिद्धान्तकी हानि होती है। अतः विद्वान् सज्जनोंको इसपर विचार करना
चाहिये ॥३॥

सम्बन्ध- अब क्लेशोंकी अवस्थाके भेद बतलाते हुए यह बात कहते हैं कि इन सबका मूल कारण अविद्यारूप क्लेश है

अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ॥४॥

व्याख्या- (१) प्रसुप्त – चित्तमें विद्यमान रहते हुए भी जिस समय जो क्लेश अपना कार्य नहीं करता, उस समय उसे प्रसुप्त कहा जाता है। प्रलयकाल
और सुषुप्तिमें चारों ही क्लेशोंकी प्रसुप्त-अवस्था रहती है।

(२) तनु- क्लेशोंमें जो कार्य करनेकी शक्ति है, उसका जब योगके साधनोंद्वारा ह्रास कर दिया जाता है; तब वे हीन शक्तिवाले क्लेश ‘तनु’ कहलाते हैं। देखने में भी आता है कि ये राग-द्वेषादि क्लेश साधारण मनुष्योंकी भाँति साधकोंपर अपना आधिपत्य नहीं जमा सकते अर्थात् साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा साधकोंपर उनका प्रभाव बहुत कम पड़ता है।

(३) विच्छिन्न- जब कोई क्लेश उदार होता है, उस समय दूसरा क्लेश दब जाता है, वह उसकी ‘विच्छिन्नावस्था’ है, जैसे रागकी उदार-अवस्थाके क्षणमें द्वेष दब जाता है और द्वेषकी उदार-अवस्थाके क्षणमें राग दबा रहता है।

(४) उदार- जिस समय जो क्लेश अपना कार्य पूर्णतया कर रहा हो उस समय वही ‘उदार’ कहलाता है। … उपर्युक्त पाँच क्लेशोंमेंसे अस्मितादि चार क्लेशोंके ही प्रसुप्तादि चार अवस्थाभेद बतलाये गये हैं, अविद्याके नहीं; क्योंकि वह अन्य चारोंका कारण है, उसके नाशसे सबका सदाके लिये समूल नाश हो जाता है ॥४॥

सम्बन्धः-अब अविद्याका स्वरूप बतलाते है

अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ॥५॥

व्याख्या- इस लोक और परलोकके समस्त भोग और भोगोंका आयतन यह मनुष्य शरीर भी अनित्य है, इस बातको प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा समझकर भी जिसके प्रभावसे मनुष्य उनमें नित्यत्वबुद्धि करके राग-द्वेषादि कर लेता है, यह अनित्यमें नित्यकी अनुभूतिरूप अविद्या है। शिश। का इसी प्रकार
हाड़, मांस, मज्जा आदि अपवित्र धातुओंके समुदायरूप अपने और स्त्री आदिके शरीरोंको प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा अपवित्र समझते हुए भी जिसके कारण मनुष्य अपने शरीरमें पवित्रताका अभिमान करता है और स्त्री-पुत्र आदिके शरीरोंसे प्यार करता है, यह अपवित्रमें पवित्रकी अनुभूतिरूप
अविद्या है। वैसे ही प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा विचार करनेपर सभी भोग दुःखरूप हैं यह बात विचारशील साधककी समझमें आ जाती है (योग० २ । १५) । इसपर भी मनुष्य उन भोगोंको सुखदायक समझकर उनके भोगनेमें प्रवृत्त हुआ रहता है, यही दुःखमें सुखकी अनुभूतिरूप अविद्या है।
यद्यपि यह बात थोड़ा-सा विचार करते ही समझमें आ जाती है कि जड शरीर आत्मा नहीं है तथापि मनुष्य इसीको अपना स्वरूप माने रहता है,आत्मा इससे सर्वथा असङ्ग और चेतन है इस बातका अनुभव नहीं कर सकता, इसका नाम अनात्मामें आत्मभावका अनुभूतिरूप अविद्या है।
प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम-प्रमाणसे वस्तुस्थितिका सामान्य ज्ञान हो जानेपर विपर्ययवृत्ति नहीं रहती, तो भी अविद्याका नाश नहीं होता; इससे यह सिद्ध होता है कि चित्तकी विपर्ययवृत्तिका नाम अविद्या नहीं है ॥५॥

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सम्बन्ध-अब अस्मिताका स्वरूप बतलाते हैं

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥६॥

व्याख्या- दृक्-शक्ति अर्थात् द्रष्टा-पुरुष और दर्शन-शक्ति अर्थात् बुद्धि-ये दोनों सर्वथा भिन्न और विलक्षण हैं। द्रष्टा चेतन है और बुद्धि जड है। इनकी एकता हो ही नहीं सकती। तथापि अविद्याके कारण दोनोंकी एकता-सी हो रही हैं (योग० २ । २४) । इसीको द्रष्टा और दृश्यका संयोग कहते हैं। यही प्रकृति और पुरुषके स्वरूपकी उपलब्धिका हेतु माना गया है (योग० २ । २३) । इस संयोगके रहते हुए भी पुरुष और बुद्धिका भिन्न-भिन्न स्वरूप विचारके द्वारा और सम्प्रज्ञात-समाधिके द्वारा समझमें तो आता है; परंतु जबतक निर्बीज-समाधिद्वारा अविद्याका सर्वथा नाश नहीं कर दिया जाता, तबतक संयोगका अभाव नहीं होता है। इस कारण इनके शुद्ध स्वरूपका अनुभव नहीं होता (योग० ३ । ३५) । अतः साधकको चाहिये कि तत्परतासे उत्साहपूर्वक योगसाधनमें लगकर शीघ्र ही अविद्याके नाशद्वारा संयोगरूप अस्मिता नामक क्लेशका नाश कर दे और कैवल्य-स्थितिको प्राप्त कर ले॥६॥

सम्बन्ध-अब राग नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं
सुखानुशयी रागः ॥७॥
सुखानुशयी-सुखकी. प्रतीतिके पीछे रहनेवाला क्लेश; रागः=’राग’ है।
व्याख्या-प्रकृतिस्थ जीवको जब कभी जिस किसी अनुकूल पदार्थमें सुखकी प्रतीति हुई है या होती है, उसमें और उसके निमित्तोंमें उसकी आसक्ति (प्रीति) हो जाती है, उसीको ‘राग’ कहते हैं। अतः इस राग नामक क्लेशको सुखकी प्रतीतिके साथ-साथ रहनेवाला कहा गया है ॥७॥

सम्बन्ध-अब द्वेष नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं

दुःखानुशयी द्वेषः ॥८॥

दुःखानुशयी-दुःखकी प्रतीतिके पीछे रहनेवाला क्लेश; द्वेषः=’द्वेष’ है।
व्याख्या-मनुष्यको जब कभी जिस किसी प्रतिकूल पदार्थमें दुःखकी प्रतीति हुई है या होती है, उसमें और उसके निमित्तोंमें उसका द्वेष हो जाता है; अतः यह द्वेषरूप क्लेश दुःखकी प्रतीतिके पीछे यानी साथ-साथ रहनेवाला है॥८॥

सम्बन्ध- अब अभिनिवेश नामक क्लेशका स्वरूप बतलाते हैं

स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः ॥९॥

व्याख्या- यह मरणभयरूप क्लेश सभी प्राणियोंमें अनादि कालसे . स्वाभाविक है; अतः कोई भी जीव यह नहीं चाहता कि मैं न रहूँ, सभी अपनी । विद्यमानता चाहते हैं। एक छोटे-से-छोटा कीट भी मरणसे डरकर अपनी रक्षाका उपाय करता है। (इससे पूर्वजन्मकी सिद्धि होती है,
क्योंकि यदि मरण-दुःख पहले अनुभव किया हुआ नहीं होता तो उसका भय कैसे होता?) यह मरणभय जीवोंके अन्तःकरणमें इतना गहरा बैठा हुआ है कि मूर्खके जैसा ही विवेकशीलपर भी इसका प्रभाव पड़ता है, इसीलिये इसका नाम ‘अभिनिवेश’ अर्थात् ‘अत्यन्त गहराई में प्रविष्ट’ रखा गया है॥९॥ . .

सम्बन्ध- इन पाँच प्रकारके क्लेशोंको तनु अर्थात् सूक्ष्म बना देनेका उपाय ‘क्रियायोग’ पहले बतला चुके । ‘क्रियायोग के द्वारा सूक्ष्म किये हुए क्लेशोंका नाश किस उपायसे करना चाहिये, यह बात अगले सूत्र में बतलाते हैं। yog darshan sadhanpaad

ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥१०॥

व्याख्या- क्रियायोग या ध्यानयोगद्वारा सूक्ष्म किये हुए क्लेशोंका नाश
निर्बीज समाधिके द्वारा चित्तको उसके कारणमें विलीन करके करना चाहिये; क्योंकि क्रियायोग या ध्यानद्वारा क्षीण कर दिये जानेपर भी जो लेशमात्र क्लेश शेष रह जाते हैं, उनका नाश द्रष्टा और दृश्यके संयोगका अभाव होनेपर ही होता है, उसके पहले क्लेशोंका सर्वथा नाश नहीं होता, यह भाव है ॥ १० ॥ .

सम्बन्ध-अब क्लेशोंको क्षीण करनेका क्रियायोगसे अतिरिक्त दूसरा साधन . . बतलाते हैं

ध्यानहेयास्तवृत्तयः ॥ ११॥

व्याख्या- उन क्लेशोंकी जो स्थूल वृत्तियाँ हैं, उनका यदि पूर्वोक्त क्रियायोगके द्वारा नाश करके उन क्लेशोंको सूक्ष्म नहीं बना दिया गया हो तो पहले ध्यानके द्वारा उनकी स्थूल वृत्तियोंका नाश करके उनको सूक्ष्म बना लेना चाहिये,
तभी निर्बीज-समाधिकी सिद्धि सुगमतासे हो सकेगी। उसके बाद निर्बीज-समाधिसे क्लेशोंका सर्वथा अभाव अपने-आप हो जायगा ॥११॥

सम्बन्ध-उपर्युक्त क्लेश किस प्रकार जीवके महान् दुःखोंके कारण हैं; इस बातको । स्पष्ट करनेके लिये अलग प्रकरण आरम्भ किया जाता है

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥ १२॥

व्याख्या- कर्लोक संस्कारोंकी जड़ उपर्युक्त पाँचों क्लेश ही हैं। अविद्यादि क्लेशोंके न रहनेपर किये हुए कर्मोंसे कर्माशय नहीं बनता, बल्कि वैसे राग-द्वेषरहित निष्काम कर्म तो पूर्वसंचित कर्माशयका भी नाश करनेवाले होते हैं (गीता ४ । २३) । यही क्लेशमूलक कर्माशय जिस प्रकार इस जन्ममें
दुःख देता है, उस प्रकार भविष्यमें होनेवाले जन्मोंमें भी दुःखदायक है। अतः साधकको इसकी जड़ काट डालनी चाहिये अर्थात् पूर्वोक्त क्लेशोंका सर्वथा नाश कर देना चाहिये ॥ १२॥

सम्बन्ध-उस कर्माशयका फल कबतक मिलता रहता है और वह क्या है, इसको स्पष्ट करते हैं

सति मूले तद्विपाको जात्यायु गाः॥१३॥

व्याख्या- जबतक क्लेशरूप जड़ विद्यमान रहती है, तबतक इस कर्मोके संस्कार-समुदायरूप कर्माशयका विपाक यानी परिणाम-बार-बार अच्छी बुरी योनियोंमें जन्म होना, वहाँपर निश्चित आयुतक जीते रहकर फिर मरण-दुःखको भोगना और जीवनावस्थामें जो विवेकदृष्टि से सभी दुःखरूप हैं, ऐसे भोगोंका सम्बन्ध होना-ऐसे तीन प्रकारका होता रहता है ॥ १३ ॥

सम्बन्ध-वे जाति, आयु और भोगरूप परिणाम किस प्रकारके होते हैं, यह बतलाते हैं

ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात् ॥ १४॥

समाधिपाद-१

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व्याख्या- जो जन्म पुण्यकर्मका परिणाम है, वह सुखदायक होता है और जो पापकर्मका परिणाम है, वह दुःखदायक होता है। इसी प्रकार आयुका जितना समय शुभकर्मका परिणाम है, उतना समय सुखदायक होता है और जितना पापकर्मका परिणाम है, उतना दुःखदायक होता है। वैसे ही जो-जो भोग अर्थात् सांसारिक मनुष्योंके, अन्य प्राणियोंके पदार्थोके और क्रिया एवं परिस्थिति आदिके संयोग-वियोग पुण्यकर्मके परिणाम होते हैं, वे हर्षप्रद होते हैं और जो पापकर्मके परिणाम होते हैं, वे शोकप्रद होते हैं ॥ १४ ॥

सम्बन्ध–यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि यदि यही बात है तब तो जिसका परिणाम केवल दुःखप्रद फल (जन्म, आयु और भोग) हैं ऐसे कर्माशयका ही उसके मूलसहित नाश करना उचित है। उसके साथ सुखप्रद कर्माशयका नाश करनेकी बात क्यों कही? इसपर कहते हैं

परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः ॥१५॥

व्याख्या-(१) परिणामदुःख– जो ‘कर्मविपाक’ भोगकालमें स्थूल दृष्टिसे सुखप्रद प्रतीत होता है, उसका भी परिणाम (नतीजा) दुःख ही है। जैसे स्त्रीप्रसङ्गके समय मनुष्यको सुख भासता है; परंतु उसका परिणाम बल, वीर्य, तेज, स्मृति आदिका ह्रास प्रत्यक्ष देखने में आता है, ऐसे ही दूसरे भोगोंमें
भी समझ लेना चाहिये । व भोगोंको भोगते-भोगते मनुष्य थक जाता है, उन्हें भोगनेकी शक्ति उसमें नहीं रहती, परंतु तृष्णा बनी रहती है, इससे वह भोगरूप सुख भी दुःख ही है। गीतामें भी कहा है

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥

(१८ । ३८) ‘जो सुख विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होता है, वह यद्यपि भोगकालमें अमृतके सदृश भासता है; परंतु परिणाममें विषके सदृश है, इसलिये वह सुख राजस कहा गया है।’ यह भोगके अन्तमें अनुभव होनेवाला दुःख भी परिणाम-दुःखकी ही गणनामें है।

इन्द्रियों और पदार्थोंके सम्बन्धसे जब मनुष्यको किसी भी प्रकारके भोगमें सुखकी प्रतीति होती है, तब उसमें राग-आसक्ति अवश्य हो जाती है। इसलिये वह सुख रागरूप क्लेशसे मिला हुआ है। आसक्तिवश मनुष्य उस भोगकी प्राप्तिके साधनरूप अच्छे-बुरे कर्मोंका आरम्भ भी करेगा ही। भोग्यवस्तुओंकी प्राप्तिमें असमर्थ

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होनेसे या विघ्न आनेपर द्वेष होना भी अवश्यम्भावी है। इसके सिवा, प्राणियोंकी हिंसाके बिना भोगकी सिद्धि भी नहीं होती। अतः राग, द्वेष और हिंसादिका परिणाम अवश्य ही दुःख है। यह भी परिणाम-दुःखता है।

(२) तापदुःख-सभी प्रकारके भोगरूप सुख विनाशशील हैं; उनसे वियोग होना निश्चित है, अतः भोगकालमें उनके विनाशकी सम्भावनासे भयके कारण तापदुःख बना रहता है। इसी तरह मनुष्यको जो सुखकारक भोग प्राप्त होते हैं वे सातिशय ही होते हैं, अर्थात् उसे जो कुछ प्राप्त है, उससे बढ़कर दूसरोंको भी प्राप्त है यह देखकर वह ईर्ष्यासे जलता रहता है। यह भी तापदुःख है। तथा भोगकी अपूर्णतासे भी भोगकालमें संताप बना रहता है, यह भी तापदुःख है।

(३) संस्कारदुःख- जिन-जिन भोगोंमें मनुष्यको सुखका अनुभव होता है, उस अनुभवके संस्कार उसके हृदयमें जम जाते हैं। जब उन भोग सामग्रियोंसे उसका वियोग हो जाता है, तब वे संस्कार पहलेके सुखभोगकी स्मृतिद्वारा महान् दुःखके हेतु हो जाते हैं। देखनेमें भी आता है कि जब किसी मनुष्यकी स्त्री, पुत्र, धन, मकान आदि भोगसामग्री नष्ट हो जाती है, तब वह उनको याद कर-करके रोता रहता है कि मेरी स्त्री मुझे अमुक-अमुक प्रकारसे । सुख देती थी, मेरे पास इतना धन था, मैं अपने धनसे स्वयं सुख भोगता था और लोगोंको सुख पहुँचाता था, आज मेरी यह दशा है कि मैं भिखारी होकर लोगोंसे सहायता माँगता फिरता हूँ-इत्यादि । इसके सिवा, वे भोग-संस्कार, भोगासक्तिकी वृद्धिमें कारण होनेसे जन्मान्तरमें भी दुःखके हेतु हैं।

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(४) गुणवृत्तिविरोध– गुणोंके कार्यका नाम गुणवृत्ति है, गुणोंके कार्यमें परस्पर अत्यन्त विरोध है। जैसे सत्त्वगुणका कार्य प्रकाश, ज्ञान और सुख है, तो तमोगुणका कार्य अन्धकार, अज्ञान और दुःख है। इस प्रकार इनके कार्योंमें विरोध होनेके कारण दुविधा बनी रहती है; सुख-भोगकालमें भी शान्ति नहीं मिलती; क्योंकि तीनों गुण एक साथ रहनेवाले हैं। सुखके अनुभवकालमें सत्त्वगुणकी प्रधानता रहते हुए भी रजोगुण और तमोगुणका अभाव नहीं हो जाता, अतः उस समय भी दुःख और शोक विद्यमान रहते हैं; इसलिये भी वह दुःख ही है। जैसे ध्यानकालमें और सत्सङ्ग करते समय सत्त्वगुणकी प्रधानता रहती है, अतः सात्त्विक सुख होता है, परंतु वहाँ भी सांसारिक स्फुरणा और तन्द्रा उस सुखमें विघ्न कर देते हैं ऐसे ही अन्य कामोंमें भी समझ लेना चाहिये।

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उपर्युक्त परिणामदुःख, तापदुःख और संस्कारदुःख तथा गुणवृत्तियोंके विरोधसे होनेवाले दुःखको विचारद्वारा विवेकी पुरुष समझता है। इस कारण उसकी दृष्टिमें सभी ‘कर्मविपाक’ दुःखरूप ही हैं अर्थात् साधारण मनुष्य समुदाय जिन भोगोंको सुखरूप समझता है, विवेकीके लिये वे भी दुःख ही हैं॥ १५॥

सम्बन्ध-उपर्युक्त वर्णनसे यह सिद्ध हो गया है कि जन्म, आयु और भोगरूप यह बात गीताके पाँचवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें इस प्रकार कही गयी है

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ ।

अर्थात् इन्द्रिय और विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले जितने भी भोग हैं, वे सब-के-सब दुःखोंके ही कारण हैं तथा सभी आदि और अन्तवाले हैं, अतः विवेकी मनुष्य उनमें नहीं रमता।

सभी कर्म-विपाक दुःखरूप हैं; इसलिये उनका मूलसहित उच्छेद करना मनुष्यका कर्तव्य है। अतः अब उनको त्याज्य (नाश करनेयोग्य) बतलाकर उनसे मुक्ति पानेका उपाय बतलाते हुए अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं

हेयं दुःखमनागतम् ॥ १६ ॥

व्याख्या- वर्तमान जन्मके पहले जो अनेक योनियोंमें दुःख भोगे जा चुके, वे तो अपने-आप समाप्त हो गये, उनके विषयमें कोई विचार नहीं करना है। तथा जो वर्तमान हैं वे भी भोग देकर दूसरे क्षणमें अपने-आप लुप्त हो जायँगे, उनके लिये भी उपायकी आवश्यकता नहीं है। परन्तु जो दुःख अभीतक प्राप्त नहीं हुए हैं, भविष्यमें होनेवाले हैं, उनका नाश उपायद्वारा अवश्य-कर्तव्य है; इसलिये उन्हींको ‘हेय’ बतलाया गया है ॥ १६॥

सम्बन्ध- जिसका नाश करना हो, उसके मूल कारणको जाननेकी आवश्यकता है; क्योंकि मूल कारणके नाशसे ही उसका पूर्णतया नाश हो सकता है; नहीं तो वह पुनः उत्पन्न हो सकता हैअतः उक्त ‘हेय’का हेतु (कारण) बतलाते हैं।

द्रष्टदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ॥ १७ ॥

व्याख्या- ऊपर जो नाश करनेयोग्य आनेवाले दुःख बतलाये गये हैं, उनका मूल कारण द्रष्टा और दृश्यका अर्थात् पुरुष और प्रकृतिका संयोग यानी’ जड-चेतनकी ग्रन्थि है। अतः इस संयोगका नाश कर
देनेसे मनुष्य सर्वथा . दुःखोंसे निवृत्त हो सकता है ॥ १७ ॥

सम्बन्ध- पूर्व सूत्रमें द्रष्टा, दृश्य और उनका संयोग-इन तीनके नाम आये हैं, उनमेंसे पहले दृश्यका स्वभाव, स्वरूप और प्रयोजन बतलाते हैं

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥१८॥

व्याख्या- सत्त्व, रज और तम-ये तीनों गुण और इनका कार्य जो कुछ भी देखने, सुनने और समझनेमें आता है, वह सब-का-सब दृश्यके अन्तर्गत है। सत्त्वगुणका मुख्य धर्म प्रकाश है, रजोगुणका मुख्य धर्म क्रिया (हलचल) है और तमोगुणका मुख्य धर्म स्थिति अर्थात् जडता और सुषुप्ति आदि है ।
इन तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाको ही प्रधान या प्रकृति कहते हैं। यह सांख्यका मत है। अतः सब अवस्थाओंमें अनुगत तीनों गुणोंका जो प्रकाश, क्रिया और स्थितिरूप स्वभाव है, वही दृश्यका स्वभाव है। पाँच स्थूल भूत, पाँच तन्मात्रा, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन, बुद्धि और अहंकार-ये सब (तेईस तत्त्व) प्रकृतिके कार्य होनेसे उसके स्वरूप हैं।

भोगासक्त पुरुषको अपना स्वरूप दिखलाकर भोग प्रदान करना और मुक्ति चाहनेवाले योगीको द्रष्टाका स्वरूप दिखलाकर मुक्ति प्रदान करना दृश्यका प्रयोजन है। द्रष्टाको उसका निज स्वरूप दिखा देनेके बाद इसका कोई प्रयोजन नहीं रहता, उस पुरुषके लिये यह अस्त (लुप्त) हो जाता है (२ । २२) ॥ १८॥

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॥अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2॥

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समाधिपाद-१

अथ योगानुशासनम्॥१॥

अथ अब; योगानुशासनम् परम्परागत योगविषयक शास्त्र (आरम्भ करते हैं)।

व्याख्या- इस सूत्रमें महर्षि पतञ्जलिने योगके साथ अनुशासन पदका प्रयोग करके योगशिक्षाकी अनादिता सूचित की है,

और अथ शब्दसे उसके आरम्भ करनेकी प्रतिज्ञा करके योगसाधनाकी कर्तव्यता सूचित की है॥१॥

सम्बन्ध- इस प्रकारके योगशास्त्रके वर्णनकी प्रतिज्ञा करके अब योगके सामान्य लक्षण बतलाते हैं

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥२॥
व्याख्या- इस ग्रन्थमें प्रधानतासे चित्तकी वृत्तियोंके निरोधको ही ‘योग’ नामसे कहा गया है ॥२॥

सम्बन्ध-योग शब्दकी परिभाषा करके अब उसका सर्वोपरि फल बतलाते हैं

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥३॥
व्याख्या- जब चित्तकी वृत्तियोंका निरोध हो जाता है, उस समय द्रष्टा (आत्मा) की अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है, अर्थात् वह कैवल्यअवस्थाको प्राप्त हो जाता है (योग• ४ । ३४) ॥३॥ .

सम्बन्ध- क्या चित्तवृत्तियोंका निरोध होनेके पहले द्रष्टा अपने स्वरूपमें स्थित नहीं रहता इसपर कहते हैं

वत्तिसारूप्यमितरत्र ॥४॥
व्याख्या- जबतक योग-साधनोंके द्वारा चित्तकी वृत्तियोंका निरोध नहीं हो जाता,

तबतक द्रष्टा अपने चित्तकी वृत्तिके ही अनुरूप अपना स्वरूप समझता रहता है, उसे अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान नहीं होता।
अतः चित्तवृत्तिनिरोधरूप योग अवश्य कर्तव्य है ॥४॥

सम्बन्ध- चित्तकी वृत्तियाँ असंख्य होती हैं, अतः उनको पाँच श्रेणियों में बाँटकर सूत्रकार उनका स्वरूप बतलाते हैं

वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः ॥५॥
व्याख्या- ये चित्तकी वृत्तियाँ आगे वर्णन किये जानेवाले लक्षणोंक अनुसार पाँच प्रकारकी होती हैं तथा हर प्रकारकी वृत्तिके दो भेद होते हैं। एक तो क्लिष्ट यानी

अविद्यादि क्लेशोंको पुष्ट करनेवाली और योगसाधनमें विघ्नरूप होती हैं तथा
दूसरी अक्लिष्ट यानी क्लेशोंको क्षय करनेवाली और योगसाधनमें सहायक होती

हैं। साधकको चाहिये कि इस रहस्यको भलीभाँति समझकर पहले अक्लिष्ट वृत्तियोंसे क्लिष्ट वृत्तियोंको हटावे,

फिर उन अक्लिष्ट वृत्तियोंका भी निरोध करके योग सिद्ध करे ॥५॥

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सम्बन्ध- उक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंके लक्षणोंका वर्णन करनेके लिये पहले उनके नाम बतलाते है

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः ॥६॥
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः

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(१) प्रमाण, (२) विपर्यय, | (३) विकल्प, (४) निद्रा, (५) स्मृति-ये पाँच हैं।

व्याख्या- इन पाँचोंके स्वरूपका वर्णन स्वयं सूत्रकारने अगले सूत्रोंमें किया है,

अतः यहाँ उनकी व्याख्या नहीं की गयी है ।। ६॥

सम्बन्ध- उपर्युक्त पाँच प्रकारकी वृत्तियोंमेंसे प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाये जाते हैं-

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि ॥ ७ ॥

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम-(ये तीन), प्रमाणानि-प्रमाण हैं।
व्याख्या-प्रमाणवृत्ति तीन प्रकारकी होती है; उसको इस प्रकार समझना चाहिये

(१) प्रत्यक्ष-प्रमाण बुद्धि, मन और इन्द्रियोंके जानने में आनेवाले

जितने भी पदार्थ हैं, उनका अन्तःकरण और इन्द्रियोंके साथ बिना किसी व्यवधानके सम्बन्ध होनेसे जो भ्रान्ति तथा संशयरहित ज्ञान होता है, वह प्रत्यक्ष

अनुभवसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिन प्रत्यक्ष दर्शनोंसे संसारके पदार्थोकी क्षणभङ्गरताका निश्चय होकर या सब प्रकारसे उनमें दुःखकी प्रतीति

होकर (योग० २ । १५) मनुष्यका सांसारिक पदार्थोंमें वैराग्य हो जाता है, जो | चित्तकी वृत्तियोंको रोकने में सहायक हैं,

जिनसे मनुष्यकी योगसाधनमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ते हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति तो अक्लिष्ट है तथा जिन प्रत्यक्ष दर्शनोंसे मनुष्यको सांसारिक पदार्थ

नित्य और सुखरूप होते हैं, भोगोंमें आसक्ति हो जाती है, जो वैराग्यके विरोधी
भावोंको बढ़ानेवाले हैं, उनसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति क्लिष्ट है।

(२) अनुमान-प्रमाण-किसी प्रत्यक्ष दर्शनके सहारे युक्तियोंद्वारा जो अप्रत्यक्ष पदार्थके स्वरूपका ज्ञान होता है, वह अनुमानसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है।

जैसे धूमको देखकर अग्निकी विद्यमानताका ज्ञान होना, नदीमें बाढ़ आया देखकर दूर-देशमें वृष्टि होनेका ज्ञान होना-इत्यादि । इनमें भी जिन अनुमानोंसे मनुष्यको

संसारके पदार्थोंकी अनित्यता, दुःखरूपता आदि दोषोंका ज्ञान होकर उनमें वैराग्य होता है और योगके साधनोंमें श्रद्धा बढ़ती है, जो आत्मज्ञानमें सहायक हैं,

वे सब वत्तियाँ तो अक्लिष्ट हैं और उनके विपरीत वृत्तियाँ क्लिष्ट हैं।
(३) आगम-प्रमाण-वेद, शास्त्र और आप्त (यथार्थ वक्ता) परुषोंके वचनको

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आगम’ कहते हैं। जो पदार्थ मनुष्यके अन्तःकरण और इन्द्रियोंके प्रत्यक्ष नहीं है एवं जहाँ अनुमानकी भी पहुँच नहीं है, उसके स्वरूपका ज्ञान वेद, शास्त्र और

महापुरुषोंके वचनोंसे होता है, वह आगमसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिस आगम-प्रमाणसे मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है (गीता ५।२२) और

योगसाधनोंमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ते हैं, वह तो अक्लिष्ट है और जिस आगम-प्रमाणसे भोगोंमें प्रवृत्ति और योग-साधनों में अरुचि हो, जैसे स्वर्गलोकके भोगोंकी बड़ाई

सुनकर उनमें और उनके साधनरूप सकाम कर्मोंमें आसक्ति और प्रवृत्ति होती है, वह क्लिष्ट है ॥७॥

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सम्बन्ध- प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाकर अब विपर्ययवृत्तिके लक्षण बतलाते हैं

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥८॥
व्याख्या- किसी भी वस्तुके असली स्वरूपको न समझकर उसे दूसरी ही वस्तु समझ लेना-यह विपरीत ज्ञान ही विपर्ययवृत्ति है-जैसे सीपमें चाँदीकी प्रतीति। यह

वृत्ति भी यदि भोगोंमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली और योगमार्गमें श्रद्धा-उत्साह
बढ़ानेवाली हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है।

जिस दुल्टिस आदिके द्वारा वस्तुओका यथार्थ ज्ञान होता है, उन्हींसे जान भा होता है। यह मिथ्या ज्ञान भी कभी-कभी भोगोंमें वैराग्य करनेवाला हो जाता है। जैसे

भोग्य पदार्थोंकी क्षणभङ्गरताको देखकर, अनुमान करके या
सुनकर उनको सर्वथा मिथ्या मान लेना योग-सिद्धान्तके अनुसार विपरीतवृत्ति है; क्योंकि वे परिवर्तनशील होनेपर भी मिथ्या नहीं हैं तथापि यह मान्यता भोगीमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली होनेसे अक्लिष्ट है।

कुछ महानुभावोंके मतानुसार विपर्ययवृत्ति और अविद्या-दोनों एक ही हैं, परंतु यह युक्तिसङ्गत नहीं मालूम होता; क्योंकि अविद्याका नाश तो केवल

असम्प्रज्ञातयोगसे ही होता है (योग०४।२९-३०) जहाँ प्रमाणवृत्ति भी नहीं रहती। किंतु विपर्ययवृत्तिका नाश तो प्रमाणवृत्तिसे ही हो जाता है। इसके सिवा

योगशास्त्रके मतानुसार विपर्यय ज्ञान चित्तकी वृत्ति है, किंतु अविद्या चित्तवृत्ति नहीं मानी गयी है, क्योंकि वह द्रष्टा और दुश्यके स्वरूपकी उपलब्धिमें हेतुभूत

संयोगकी भी कारण है (योग० २।२३-२४) तथा अस्मिता और राग आदि क्लेशोंकी भी कारण है (योग० २।४), इसके अतिरिक्त प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्ति नहीं है,

परंतु राग-द्वेषादि क्लेशोंका वहाँ भी सद्भाव है, इसलिये भी विपर्ययवृत्ति और अविद्याकी एकता नहीं हो सकती; क्योंकि विपर्ययवृत्ति तो कभी होती है और

कभी नहीं होती, किंतु अविद्या तो कैवल्य-अवस्थाकी प्राप्तितक निरन्तर विद्यमान रहती है। उसका नाश होनेपर तो सभी वृत्तियोंका धर्मी स्वयं चित्त भी अपने

कारणमें विलीन हो जाता है (योग० ४ । ३२)। परंतु प्रमाणवृत्तिके समय विपर्ययवृत्तिका अभाव हो जानेपर भी न तो राग-द्वेषोंका नाश होता है तथा न द्रष्टा

और दृश्यके संयोगका ही। इसके सिवा प्रमाणवृत्ति क्लिष्ट भी होती है, परंतु जिस यथार्थ ज्ञानसे अविद्याका नाश होता है, वह क्लिष्ट नहीं होता। अतः यही मानना

ठीक है कि चित्तका धर्मरूप विपर्ययवृत्ति अन्य पदार्थ है,

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तथा पुरुष और प्रकृतिके संयोगकी कारणरूपा अविद्या उससे सर्वथा भिन्न है।॥ ८॥

सम्बन्ध- अब विकल्पवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥९॥
शब्दज्ञानानुपाती-जो ज्ञान शब्दजनित ज्ञानके साथ-साथ होनेवाला है,

बाढ़ आया देखकर दूर-देशमें वृष्टि होनेका ज्ञान होना-इत्यादि । इनमें भी जिन अनुमानोंसे मनुष्यको संसारके पदार्थोंकी अनित्यता, दुःखरूपता आदि दोषोंका

ज्ञान होकर उनमें वैराग्य होता है और योगके साधनोंमें श्रद्धा बढ़ती है, जो आत्मज्ञान में सहायक हैं, वे सब वृत्तियाँ तो अक्लिष्ट हैं और उनके विपरीत वृत्तियाँ

क्लिष्ट हैं। (३) आगम-प्रमाण-वेद, शास्त्र और आप्त (यथार्थ वक्ता) पुरुषोंके वचनको ‘आगम’ कहते हैं। जो पदार्थ मनुष्यके अन्तःकरण और इन्द्रियोंके प्रत्यक्ष

नहीं है एवं जहाँ अनुमानकी भी पहुँच नहीं है, उसके स्वरूपका ज्ञान वेद, शास्त्र और महापुरुषों के वचनोंसे होता है, वह आगमसे होनेवाली प्रमाणवृत्ति है। जिस

आगम-प्रमाणसे मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है (गीता ५। २२) और योगसाधनोंमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ते हैं, वह तो अक्लिष्ट है और जिस आगम-प्रमाणसे

भोगोंमें प्रवृत्ति और योग साधनोंमें अरुचि हो, जैसे स्वर्गलोकके भोगोंकी बड़ाई सुनकर उनमें और उनके साधनरूप सकाम कर्मोंमें आसक्ति और प्रवृत्ति होती

है, वह क्लिष्ट है ॥७॥ patanjali yog darshan

सम्बन्ध- प्रमाणवृत्तिके भेद बतलाकर अब विपर्ययवृत्तिके लक्षण बतलाते हैं,

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥ ८॥
व्याख्या-किसी भी वस्तुके असली स्वरूपको न समझकर उसे दूसरी ही वस्तु समझ लेना-यह विपरीत ज्ञान ही विपर्ययवृत्ति है-जैसे सीपमें चाँदीकी प्रतीति ।

यह वृत्ति भी यदि भोगोंमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली और योगमार्गमें श्रद्धा-उत्साह बढ़ानेवाली हो तो अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है।

जिन इन्द्रिय आदिके द्वारा वस्तुओंका यथार्थ ज्ञान होता है, उन्हींसे विपरीत ज्ञान भी होता है। यह मिथ्या ज्ञान भी कभी-कभी भोगोंमें वैराग्य करनेवाला हो जाता

है। जैसे भोग्य पदार्थोंकी क्षणभङ्गरताको देखकर, अनुमान करके या सुनकर उनकोसर्वथा मिथ्या मान लेना योग-सिद्धान्तके अनुसार विपरीतवृत्ति है, क्योंकि

वे परिवर्तनशील होनेपर भी मिथ्या नहीं हैं । तथापि यह मान्यता भोगीमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली होनेसे अक्लिष्ट है। कुछ महानुभावोंके मतानुसार विपर्ययवृत्ति

और अविद्या-दोनों एक ही हैं, परंतु यह युक्तिसङ्गत नहीं मालूम होता क्योंकि अविद्याका नाश तो केवल असम्प्रज्ञातयोगसे ही होता है (योग० ४ । २९-३०) जहाँ

प्रमाणवृत्ति भी नहीं रहती। किंतु विपर्ययवृत्तिका नाश तो प्रमाणवृत्तिसे ही हो जाता है। इसके सिवा योगशास्त्रके मतानुसार विपर्यय ज्ञान चित्तकी वृत्ति है, किंतु

अविद्या चित्तवृत्ति नहीं मानी गयी है; क्योंकि वह द्रष्टा और दृश्यके स्वरूपकी उपलब्धिमें हेतुभूत संयोगकी भी कारण है (योग० २।२३-२४) तथा अस्मिता और

राग आदि क्लेशोंकी भी कारण है (योग० २।४), इसके अतिरिक्त प्रमाणवृत्तिमें विपर्ययवृत्ति नहीं है, परंतु राग-द्वेषादि क्लेशोंका वहाँ भी सद्भाव है, इसलिये भी

विपर्ययवृत्ति और अविद्याकी एकता नहीं हो सकती; क्योंकि विपर्ययवृत्ति तो कभी होती है, और कभी नहीं होती, किंतु अविद्या तो कैवल्य-अवस्थाकी प्राप्तितक

निरन्तर विद्यमान रहती है। उसका नाश होनेपर तो सभी वत्तियोंका धर्मी स्वयं चित्त भी अपने कारणमें विलीन हो जाता है (योग० ४ । ३२)। परंतु प्रमाणवृत्तिके

समय विपर्ययवृत्तिका अभाव हो जानेपर भी न तो राग-द्वेषोंका नाश होता है तथा न द्रष्टा और दृश्यके संयोगका ही। इसके सिवा प्रमाणवृत्ति क्लिष्ट भी होती है;

परंतु जिस यथार्थ ज्ञानसे अविद्याका नाश होता है, वह क्लिष्ट नहीं होता। अतः यही मानना ठीक है कि चित्तका धर्मरूप विपर्ययवृत्ति अन्य पदार्थ है तथा पुरुष

और प्रकृतिके संयोगकी कारणरूपा अविद्या उससे सर्वथा भिन्न है॥८॥

सम्बन्ध- अब विकल्पवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं,

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः ॥९॥

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व्याख्या- केवल शब्दके आधारपर बिना हुए पदार्थकी कल्पना करनेवाली जो

चित्तकी वत्ति है, वह विकल्पवृत्ति है। यह भी यदि वैराग्यकी वृद्धिमें हेतु, योगसाधनों में श्रद्धा और उत्साह बढ़ानेवाली तथा आत्मज्ञानमें सहायक हो तो

अक्लिष्ट है, अन्यथा क्लिष्ट है। आगम-प्रमाणजनित वृत्तिसे होनेवाले विशुद्ध संकल्पोंके सिवा सुनीसुनायी बातोंके आधारपर मनुष्य जो नाना प्रकारके व्यर्थ

संकल्प करता रहता है, उन सबको विकल्पवृत्तिके ही अन्तर्गत समझना चाहिये। विपर्ययवृत्तिमें तो विद्यमान वस्तुके स्वरूपका विपरीत ज्ञान होता है और

विकल्पवृत्तिमें अविद्यमान वस्तुकी शब्दज्ञानके आधारपर कल्पना होती है, यहीं विपर्यय और विकल्पका भेद है। जैसे कोई मनुष्य सुनी-सुनायी बातोंके आधारपर

अपनी मान्यताके अनुसार भगवान्के रूपकी कल्पना करके भगवान्का ध्यान करता है, पर जिस स्वरूपका वह ध्यान करता है उसे न तो उसने देखा है. न वेद-

शास्त्रसम्मत है और न वैसा कोई भगवान्का स्वरूप वास्तवमें है ही, केवल कल्पनामात्र ही है। यह विकल्पवृत्ति मनुष्यको भगवान्के चिन्तनमें लगानेवाली

होनेसे अक्लिष्ट है;

दूसरी जो भोगोंमें प्रवृत्त करनेवाली विकल्पवृत्तियाँ हैं,

वे क्लिष्ट हैं। इसी प्रकार सभी वृत्तियोंमें क्लिष्ट और अक्लिष्टका भेद समझ लेना चाहिये ॥९॥

सम्बन्ध- अब निद्रावृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं।

अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ॥१०॥
व्याख्या- जिस समय मनुष्यको किसी भी विषयका ज्ञान नहीं रहता केवलमात्र ज्ञानके अभावकी ही प्रतीति रहती है, वह ज्ञानके अभावका ज्ञान जिस चित्तवृत्तिके

आश्रित रहता है, वह निद्रावत्ति है।* निद्रा भी चित्तकी वृत्तिविशेष है, तभी तो मनुष्य गाढ़ निद्रासे उठकर कहता है कि मुझे आज ऐसी गाढ़ निद्रा आयी जिसमें

किसी बातकी कोई खबर नहीं रही। इस स्मृतिवृत्तिसे ही यह सिद्ध होता है कि निद्रा भी एक वृत्ति है, नहीं तो जगनेपर उसकी स्मृति कैसे होती।

निद्रा भी क्लिष्ट और अक्लिष्ट दो प्रकारकी होती है। जिस निद्रासे जगनेपर साधकके मन और इन्द्रियोंमें सात्त्विकभाव भर जाता है, आलस्यका नाम-निशान

नहीं रहता तथा जो योगसाधनमें उपयोगी और आवश्यक मानी गयी है। (गीता ६।१७) ,वह अक्लिष्ट है, दूसरे प्रकारकी निंद्रा उस अवस्थामें परिश्रमके अभावका

बोध कराकर विश्रामजनित सुखमें आसक्ति उत्पन्न करनेवाली होनेसे क्लिष्ट है ॥ १० ॥

सम्बन्ध- अब स्मृत्तिवृत्तिके लक्षण बतलाये जाते हैं,

अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः ॥ ११ ॥

व्याख्या- उपर्युक्त प्रमाण, विपर्यय, विकल्प और निद्रा-इन चार प्रकारकी वृत्तियोंद्वारा अनुभवमें आये हुए विषयोंके जो संस्कार चित्तमें पड़े हैं, उनका पुनः

किसी निमित्तको पाकर स्फुरित हो जाना ही स्मृति है। उपर्युक्त
चार प्रकारकी वृत्तियोंके सिवा इस स्मृतिवृत्तिसे जो संस्कार चित्तपर पड़ते हैं ।

उनमें भी पुनः स्मृतिवृत्ति उत्पन्न होती है। स्मृतिवृत्ति भी क्लिष्ट और अक्लिष्ट दोनों ही प्रकारकी होती है। जिस स्मरणसे मनुष्यका भोगोंमें वैराग्य होता है तथा जो

योगसाधनोंमें श्रद्धा और उत्साह बढ़ानेवाला एवं आत्मज्ञानमें सहायक है, वह तो अक्लिष्ट है और जिससे भोगोंमें राग-द्वेष बढ़ता है, वह क्लिष्ट है।

स्वप्नको कोई-कोई स्मृतिवृत्ति मानते हैं, परंतु स्वप्नमें जाग्रत्की भाँति सभी वृत्तियोंका आविर्भाव देखा जाता है; अतः उसका किसी एक वृत्तिमें अन्तर्भाव मानना उचित प्रतीत नहीं होता ॥ ११ ॥

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सम्बन्ध- यहाँतक योगकी कर्तव्यता, योगके लक्षण और चित्तवृत्तियोंके लक्षण बतलाये गये; अब उन चित्तवृत्तियोंके निरोधका उपाय बतलाते है,

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥ १२ ॥

व्याख्या- चित्तकी वृत्तियोंका सर्वथा निरोध करनेके लिये अभ्यास और वैराग्य-ये दो उपाय हैं। चित्तवृत्तियोंका प्रवाह परम्परागत संस्कारोंके बलसे सांसारिक

भोगोंकी ओर चल रहा है। उस प्रवाहको रोकनेका उपाय वैराग्य है और उसे
कल्याणमार्गमें ले जानेका उपाय अभ्यास है * ॥ १२ ॥

सम्बन्ध- उक्त दोनों उपायोंमेंसे पहले अभ्यासका लक्षण बतलाते हैं,

तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ॥ १३॥
व्याख्या- जो स्वभावसे ही चञ्चल है ऐसे मनको किसी एक ध्येयमें स्थिर करनेके लिये बारम्बार चेष्टा करते रहनेका नाम ‘अभ्यास’ है। इसके प्रकार शास्त्रोंमें बहुत

बतलाये गये हैं; इसी पादके ३२ वें सूत्रसे ३९ वेंतक अभ्यासके कुछ भेदोंका वर्णन है; उनमेंसे जिस साधकके लिये जो सुगम हो,

जिसमें उसकी स्वाभाविक रुचि और श्रद्धा हो उसके लिये वही ठीक है ॥ १३ ॥

सम्बन्ध- अब अभ्यासके दृढ़ होनेका प्रकार बतलाते हैं,

स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः ॥१४॥

व्याख्या- अपने साधनके अभ्यासको दृढ़ बनानेके लिये साधकको चाहिये कि साधनमें कभी उकतावे नहीं। यह दृढ़ विश्वास रखे कि किया हुआ अभ्यास कभी

भी व्यर्थ नहीं हो सकता, अभ्यासके बलसे मनुष्य निःसंदेह अपने लक्ष्यकी प्राप्ति कर लेता है। यह समझकर अभ्यासके लिये कालकी अवधि न रखे, आजीवन

अभ्यास करता रहे, साथ ही यह भी ध्यान रखे कि अभ्यासमें व्यवधान (अन्तर) न पड़ने पावे, निरन्तर (लगातार) अभ्यास चलता रहे तथा अभ्यासमें तुच्छ बुद्धि न

करे, उसकी अवहेलना न करे, बल्कि अभ्यासको ही अपने जीवनका आधार बनाकर अत्यन्त आदर और प्रेमपूर्वक उसे साङ्गोपाङ्ग करता रहे। इस प्रकार

किया हुआ अभ्यास दृढ़ होता है * ॥१४॥

सम्बन्ध- अब वैराग्यके लक्षण आरम्भ करते हुए पहले अपर-वैराग्यके लक्षण बतलाते है
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् ॥१५॥

व्याख्या- अन्तःकरण और इन्द्रियोंके द्वारा प्रत्यक्ष अनुभवमें आनेवाले इस लोकके समस्त भोगोंका समाहार यहाँ ‘दष्ट’ शब्दमें किया गया है और जो प्रत्यक्ष

उपलब्ध नहीं हैं, जिनकी बड़ाई वेद, शास्त्र और भोगोंका अनुभव करनेवाले पुरुषोंसे सुनी गयी है, ऐसे भोग्य विषयोंका समाहार् ‘आनुश्रविक’ शब्दमें किया

गया है। उपर्युक्त दोनों प्रकारके भोगोंसे जब चित्त भलीभांति तृष्णारहित हो जाता है, जब उसको प्राप्त करनेकी इच्छाका सर्वथा नाश हो जाता है, ऐसे कामनारहित

चित्तकी जो वशीकार नामक अवस्थाविशेष है, वह ‘अपर-वैराग्य’ है॥१५॥

सम्बन्ध-अब पर-वैराग्यके लक्षण बतलाते है,

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ॥ १६ ॥

व्याख्या- पहले बतलाये हुए चित्तकी वशीकार-संज्ञारूप वैराग्यसे जब साधककी विषयकामनाका अभाव हो जाता है और उसके चित्तका प्रवाह समानभावसे

अपने ध्येयके अनुभवमें एकाग्र हो जाता है (योग० ३ । १२), उसके बाद समाधि
परिपक्व होनेपर प्रकृति और पुरुषविषयक विवेकज्ञान प्रकट

होता है (योग०३ । ३५), उसके होनेसे जब साधककी तीनों गुणोंमें और उनके कार्यमें किसी प्रकारकी किंचिन्मात्र भी तृष्णा नहीं रहती; (योग० ४ । २६),

जब वह सर्वथा आप्तकाम निष्काम हो जाता है (योग०२ । २७), ऐसी सर्वथा रागरहित अवस्थाको ‘पर-वैराग्य’ कहते हैं * ॥१६॥

सम्बन्ध- इस प्रकार चित्तवृत्ति-निरोधके उपायोंका वर्णन करके अब चित्तवृत्तिनिरोधरूप निर्बीज-योगका स्वरूप बतलानेके लिये पहले उसके पूर्वकी

अवस्थाका सम्प्रज्ञातयोगके नामसे अवान्तर भेदोंके सहित वर्णन करते हैं,

वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात्सम्प्रज्ञातः ॥ १७॥

व्याख्या- सम्प्रज्ञातयोगके ध्येय पदार्थ तीन माने गये हैं-(१) ग्राह्य (इन्द्रियोंके स्थूल और सूक्ष्म विषय), (२) ग्रहण (इन्द्रियाँ और अन्तःकरण) तथा (३) ग्रहीता (बुद्धिके

साथ एकरूप हुआ पुरुष) (योग० १४१)। जब ग्राह्य पदार्थोक स्थूलरूपमें
समाधि की जाती है, उस समय समाधिमें जबतक शब्द, अर्थ और ज्ञानका

विकल्प वर्तमान रहता है, तबतक तो वह सवितर्क समाधि है; और जब इनका विकल्प नहीं रहता, तब वही निर्वितर्क कही जाती है। इसी प्रकार जब ग्राह्य और

ग्रहणके सूक्ष्मरूपमें समाधि की जाती है उस समय समाधिमें जबतक शब्द, अर्थ और ज्ञानका विकल्प रहता है, तबतक वह सविचार और जब इनका विकल्प

नहीं रहता, तब वही निर्विचार कही जाती है। जब निर्विचार समाधिमें विचारका
सम्बन्ध तो नहीं रहता, परंतु आनन्दका अनुभव और अहङ्कारका सम्बन्ध रहता है,

तबतक वह आनन्दानगता समाधि है और जब उसमें आनन्दकी प्रतीति भी लप्त हो जाती है, तब वही केवल अस्मितानुगत समझी जाती है। यही निर्विचार

समाधिकी निर्मलता है, इनका विस्तृत विचार इसी पादके ४१ वें सूत्रसे ४९ वेंतक किया। गया है ॥ १७॥

सम्बन्ध- अब उस अन्तिम योगका स्वरूप बतलाते हैं, जिसके सिद्ध होनेपर द्रष्टाकी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है (योगः १।३); जो कि इस शास्त्रका मुख्य प्रतिपाद्य है जिसे कैवल्य-अवस्था भी कहते हैं,

विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ॥ १८॥

patanjali !! yog darshan

व्याख्या- साधकको जब पर-वैराग्यकी प्राप्ति हो जाती है, उस समय स्वभावसे ही चित्त संसारके पदार्थों की ओर नहीं जाता। वह उनसे अपने-आप उपरत हो जाता

है। उस उपरत-अवस्थाकी प्रतीतिका नाम ही यहाँ विराम-प्रत्यय है।
इस उपरतिकी प्रतीतिका अभ्यास-क्रम भी जब बंद हो जाता है, उस समय

चित्तकी वृत्तियोंका सर्वथा अभाव हो जाता है (योग० १।५१); केवलमात्र
अन्तिम उपरत-अवस्थाके संस्कारोंसे युक्त चित्त रहता है (योग०३।९-१०)। फिर

निरोध-संस्कारोंके क्रमकी समाप्ति होनेसे वह चित्त भी अपने कारणमें लीन हो जाता है (योग०४।३२-३४) अतः प्रकृतिके संयोगका अभाव हो जानेपर द्रष्टाकी

अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है। इसीको असम्प्रज्ञातयोग, निर्बीजसमाधि (योग० ११५१) और कैवल्य-अवस्था (योग० २।२५; ३ । ५५:४ । ३४) आदि नामोंसे कहा गया है ॥१८॥

सम्बन्ध- यहाँतक योग और उसके साधनोंका संक्षेपमें वर्णन किया गया,

अब किस प्रकारके साधकका उपर्युक्त योग शीघ्र-से-शीघ्र सिद्ध होता है, यह समझानेके लिये प्रकरण आरम्भ किया जाता है,

भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् ॥ १९ ॥ patanjali yog darshan

व्याख्या- जो पूर्वजन्ममें योगका साधन करते-करते विदेहअवस्थातक पहुँच चुके थे; अर्थात् शरीरके बन्धनसे छूटकर शरीरके बाहर स्थिर होनेका जिनका अभ्यास

दृढ़ हो चुका था, जो ‘महाविदेह’ स्थितिको प्राप्त कर चुके थे (योग० ३।४३),
एवं जो साधन करते-करते ‘प्रकृतिलय’ (योग० १ । ४५; ३ । ४८) तककी स्थिति

प्राप्त कर चुके थे, किंतु कैवल्य-पदकी प्राप्ति होनेके पहले जिनकी मृत्यु हो गयी, उन दोनों प्रकारके योगियोंका जब पुनर्जन्म होता है, जब वे योगभ्रष्ट साधक पुनः

योगिकुलमें जन्म ग्रहण करते हैं; तब उनको पूर्वजन्मके योगाभ्यास-विषयक संस्कारोंके प्रभावसे अपनी स्थितिका तत्काल ज्ञान हो जाता है (गीता ६।४२-४३)

और वे साधनकी परम्पराके बिना ही निर्बीजसमाधिअवस्थाको प्राप्त कर लेते हैं।
उनकी निर्बीजसमाधि उपायजन्य नहीं है, अतः उसका नाम ‘भवप्रत्यय’ है अर्थात्

वह ऐसी समाधि है कि जिसके सिद्ध होनेमें पुनः मनुष्यजन्म प्राप्त होना ही कारण है, साधनसमुदाय नहीं ॥ १९॥

सम्बन्ध- दूसरे साधकोंका योग कैसे सिद्ध होता है? सो बतलाते हैं,

श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम् ॥ २०॥

व्याख्या- किसी भी साधनमें प्रवृत्त होनेका और अविचल भावसे उसमें लगे रहनेका मूल कारण श्रद्धा (भक्तिपूर्वक विश्वास) ही है। श्रद्धाकी कमीके कारण ही

साधकके साधनकी उन्नतिमें विलम्ब होता है, अन्यथा कल्याणके साधनमें विलम्बका कोई कारण नहीं है। साधनके लिये किसी अप्राप्त योग्यता और

परिस्थितिकी आवश्यकता नहीं है। इसीलिये सूत्रकारने श्रद्धाको पहला स्थान दिया है। श्रद्धाके साथ साधकमें वीर्य अर्थात् मन, इन्द्रिय और शरीरका सामर्थ्य

भी परम आवश्यक है; क्योंकि इसीसे साधकका उत्साह बढ़ता है। श्रद्धा और वीर्य-इन दोनोंका संयोग मिलनेपर साधककी स्मरणशक्ति बलवती हो जाती है

तथा उसमें योगसाधनके संस्कारोंका ही बारम्बार प्राकट्य होता रहता है; अतः उसका मन विषयोंसे विरक्त होकर समाहित हो जाता है। इसीको समाधि कहते

हैं (योग० १।४६; ३ । ३)। इससे अन्तःकरण स्वच्छ हो जानेपर साधककी बुद्धि ‘ऋतम्भरा’-सत्यको धारण करनेवाली हो जाती है (योग० १।४८)। इस बुद्धिका ही

नाम समाधिप्रज्ञा है। अतएव पर-वैराग्यकी प्राप्तिपूर्वक साधकका निर्बीजसमाधिरूप योग सिद्ध हो जाता है। गीतामें भी कहा है

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ (४।३९) जितेन्द्रिय साधनपरायण और श्रद्धावान्

मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होकर वह बिना विलम्बके-तत्काल ही परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ २०॥

सम्बन्ध- अब अभ्यास-वैराग्यकी अधिकताके कारण योगकी सिद्धि शीघ्र और अति शीघ्र होनेकी बात कहते हैं,

तीव्रसंवेगानामासन्नः ॥ २१॥
तीव्रसंवेगानाम्-जिनके साधनकी गति तीव्र हैं, उनकी (निर्बीजसमाधि); आसन्नः-शीघ्र (सिद्ध) होती है।

व्याख्या- जिन पुरुषोंका साधन (अभ्यास और वैराग्य) तेजीसे चलता है, जो सब प्रकारकी विघ्न-बाधाओंको ठुकराकर

अपने साधनमें तत्परतासे लगे रहते हैं, उनका योग शीघ्र सिद्ध होता है ॥२१॥
सम्बन्ध-किंतु

मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः ॥ २२॥

व्याख्या- किसका साधन किस दर्जेका है; इसपर भी योग-सिद्धिकी शीघ्रताका विभाग निर्भर करता है; क्योंकि क्रियात्मक अभ्यास और वैराग्य तीव्र होनेपर भी

विवेक और भावकी न्यूनाधिकताके कारण समाधि सिद्ध होनेके कालमें भेद होना
स्वाभाविक है। जिस साधकमें श्रद्धा, विवेकशक्ति और भाव कुछ उन्नत हैं,

उसका साधन मध्यमात्रावाला है और जिस साधकमें श्रद्धा, विवेक और भाव अत्यन्त उन्नत हैं, उसका साधन अधिमात्रावाला है। साधनमें क्रियाकी अपेक्षा

भावका अधिक महत्त्व है। अभ्यास और वैराग्यका जो क्रियात्मक
बाह्य स्वरूप है, वह तो ऊपरवाले सूत्रमें ‘वेग’के नामसे कहा गया है;

और उनका जो भावात्मक आभ्यन्तर स्वरूप है, वह उनकी मात्रा यानी दर्जा है। व्यवहारमें भी देखा जाता है कि एक ही कामके लिये समानरूपसे परिश्रम किया

जानेपर भी जो उसकी सिद्धिमें अधिक विश्वास रखता है, जिस मनुष्यको उस कामके करनेकी युक्तिका अधिक ज्ञान है एवं जो उसे प्रेम और उत्साहपूर्वक

बिना उकताये करता रहता है; वह दूसरोंकी अपेक्षा उसे शीघ्र पूरा कर लेता है। वही बात समाधि की सिद्धिमें भी समझ लेनी चाहिये।

समाधिकी प्राप्तिके लिये साधन करनेवालोंमें जिसका साधन श्रद्धा, विवेकशक्ति और भाव आदिकी अधिकताके कारण जितने ऊँचे दर्जेका है और जिसकी

चालका क्रम जितना तेज है, उसीके अनुसार वह शीघ्र या अतिशीघ्र समाधिकी प्राप्ति कर सकेगा। यही बात समझानेके लिये सूत्रकारने उपर्युक्त दो सूत्रोंकी

रचना की है-ऐसा मालूम होता है। अतः साधकको चाहिये कि अपने साधनको

सर्वथा निर्दोष बतानेकी चेष्टा रखे, उसमें किसी प्रकारकी शिथिलता न आने दे॥२२॥

सम्बन्ध- अब पूर्वोक्त अभ्यास और वैराग्यकी अपेक्षा निर्बीज-समाधिका सुगम उपाय बतलाया जाता है, patanjali yog darshan

ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥ २३॥
व्याख्या- ईश्वरकी भक्ति यानी शरणागतिका नाम ‘ईश्वरप्रणिधान’ है (देखिये योग० २१ की व्याख्या): इससे भी निर्बीज-समाधि शीघ्र सिद्ध हो सकती है (योग०

२।४५), क्योंकि ईश्वर सर्वसमर्थ हैं, वे अपने शरणापन्न भक्तपर प्रसन्न होकर उसके भावानुसार सब कुछ प्रदान कर सकते हैं (गीता ४ । ११*) ॥ २३ ॥

सम्बन्ध- अब उक्त ईश्वरके लक्षण बतलाते हैं,

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ॥ २४ ॥

व्याख्या-अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश-ये पाँच ‘
क्लेश’ हैं; इनका विस्तृत वर्णन दूसरे पादके तीसरे सूत्रसे नवेंतक है। ‘कर्म’ चार

प्रकारके हैं-पुण्य, पाप, पुण्य और पापमिश्रित तथा पुण्य-पापसे रहित (योग०४।७)। कर्मके फलका नाम ‘विपाक’ है (योग० २।१३) और कर्मसंस्कारोंके

समुदायका नाम ‘आशय’ है (योग० २।१२) । समस्त जीवोंका इन चारोंसे अनादि सम्बन्ध है।

यद्यपि मुक्त जीवोंका पीछे सम्बन्ध नहीं रहता तो भी पहले सम्बन्ध था ही; किंतु ईश्वरका तो कभी भी इनसे न सम्बन्ध था, न है और न होनेवाला है। इस कारण

उन मुक्त पुरुषोंसे भी ईश्वर विशेष है, यह बात प्रकट करनेके लिये ही सूत्रकारने ‘पुरुषविशेषः’ पदका प्रयोग किया है ।। २४ ।।

सम्बन्ध- ईश्वरकी विशेषताका पुनः प्रतिपादन करते हैं,

तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् ॥२५॥

व्याख्या- जिससे बढ़कर कोई दूसरी वस्तु हो, वह सातिशय है और जिससे बड़ा कोई न हो वह निरतिशय है। ईश्वर ज्ञानकी अवधि है, उसका ज्ञान सबसे बढ़कर

है; उसके ज्ञानसे बढ़कर किसीका भी ज्ञान नहीं है; इसलिये उसे निरतिशय कहा गया है। जिस प्रकार ईश्वरमें ज्ञानकी पराकाष्ठा है, उसी प्रकार धर्म, वैराग्य, यश

और ऐश्वर्य आदिकी पराकाष्ठाका आधार भी उसीको समझना चाहिये ॥२५॥

सम्बन्ध- और भी उसकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं,

पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥ २६ ॥

व्याख्या- सर्गके आदिमें उत्पन्न होनेके कारण सबका गुरु ब्रह्माको माना जाता है, परंतु उसका कालसे अवच्छेद है (गीता ८ । १७) । ईश्वर स्वयं अनादि और अन्य

सबका आदि है (गीता १०।२-३); वह कालकी सीमासे सर्वथा अतीत है, वहाँतक कालकी पहुँच नहीं है; क्योंकि वह कालका भी महाकाल है। इसलिये वह सम्पूर्ण

पूर्वजोंका भी गुरु यानी सबसे बड़ा, सबसे पुराना और सबको शिक्षा देनेवाला है (श्वेता०३।४।६।१८) ॥२६॥

सम्बन्ध- ईश्वरकी शरणागतिका प्रकार बतलानेके लिये उसके नामका वर्णन करते हैं,

तस्य वाचकः प्रणवः ॥ २७॥
तस्य-उस ईश्वरका; वाचकः-वाचक (नाम); प्रणवः-प्रणव (ॐ कार) है।
व्याख्या-नाम और नामीका सम्बन्ध अनादि और बड़ा ही घनिष्ठ है।। इसी कारण

शास्त्रोंमें नाम-जपकी बड़ी महिमा है (तुलसी० बाल० दोहा १८ से २७), गीतामें भी जपयज्ञको सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ बतलाया है (१० । २५), ‘ॐ’ उस परमेश्वरका वेदोक्त

नाम होनेसे मुख्य है (गीता १७ । २३; कठ० १।२।१५-१७); इस कारण यहाँ उसीका वर्णन किया गया है। इसी वर्णनसे श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि जितने भी

ईश्वरके नाम हैं, उनके जपका भी माहात्म्य समझ लेना चाहिये ।। २७॥

सम्बन्ध- ईश्वरका नाम बतलाकर अब उसके प्रयोगकी विधि बतलाते हैं,

तज्जपस्तदर्थभावनम् ॥ २८॥

व्याख्या- साधकको ईश्वरके नामका जप और उसके स्वरूपका स्मरण-चिन्तन करना चाहिये ।* इसीको पूर्वोक्त ईश्वरप्रणिधान अर्थात् ईश्वरकी भक्ति या

शरणागति कहते हैं। ईश्वरकी भक्तिके और भी बहत-से प्रकार हैं, परंतु जप और ध्यान सब साधनोंमें मुख्य होनेके कारण यहाँ सूत्रकारने केवल नाम और नामीके

स्मरणरूप एक ही प्रकारका वर्णन किया है । गीतामें भी इसी तरह वर्णन आया है (८ । १३) । इसे उपलक्षण मानकर भगवद्भक्तिके सभी । साधनोंको ईश्वरकी

प्रसन्नताके नाते निर्बीज समाधिकी सिद्धिमें हेतु समझना चाहिये’ अर्थात् ईश्वरकी भक्तिके सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंका ईश्वरप्रणिधानमें अन्तर्भाव समझना चाहिये ॥ २८॥

सम्बन्ध- अब ईश्वरके नाम-जप और स्वरूपचिन्तनके फलका वर्णन करते हैं,

तनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च ॥ २९ ॥
व्याख्या- अगले दो सूत्रोंमें जिन विघ्नोंका वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है, ईश्वरके भजन-स्मरणसे उनका अपने-आप नाश हो जाता है और अन्तरात्माके

(द्रष्टाके) स्वरूपका ज्ञान होकर कैवल्य-अवस्था भी उपलब्ध हो जाती है। अतः यह निर्बीज-समाधिकी प्राप्तिका बहुत ही सुगम उपाय है॥२९॥

सम्बन्ध- पूर्वसूत्रमें जिन अन्तरायोंका अभाव होनेकी बात कही गयी है, उनके नाम बतलाये जाते हैं,

व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ॥३०॥
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व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि-व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व

और अनवस्थितत्व-ये नौ; (जो कि) चित्तविक्षेपाःचित्तके विक्षेप हैं; ते वे ही; अन्तरायाः अन्तराय (विघ्न) हैं।

व्याख्या-योगसाधनमें लगे हुए साधकके चित्तमें विक्षेप उत्पन्न करके उसको साधनसे विचलित करनेवाले ये नौ योगमार्गके विघ्न माने गये हैं।

(१) शरीर, इन्द्रियसमुदाय और चित्तमें किसी प्रकारका रोग उत्पन्न हो | जाना ‘व्याधि’ है।

(२) अकर्मण्यता अर्थात् साधनोंमें प्रवृत्ति न होनेका स्वभाव ‘स्त्यान’ है।

(३) अपनी शक्तिमें या योगके फलमें संदेह हो जानेका नाम ‘संशय’ है।
(४) योगसाधनोंके अनुष्ठानकी अवहेलना (बे-परवाही) करते रहना ‘प्रमाद’ है।
(५) तमोगुणकी अधिकतासे चित्त और शरीरमें भारीपन हो जाना और उसके कारण साधनमें प्रवृत्तिका न होना ‘आलस्य’ है।
(६) विषयोंके साथ इन्द्रियोंका संयोग होनेसे उनमें आसक्ति हो

जानेके कारण जो चित्तमें वैराग्यका अभाव हो जाता है, उसे ‘अविरति’ कहते हैं।

(७) योगके साधनोंको किसी कारणसे विपरीत समझना अर्थात् यह साधन ठीक नहीं, ऐसा मिथ्या ज्ञान हो जाना ‘भ्रान्तिदर्शन’ है।

(८) साधन करनेपर भी योगकी भूमिकाओंका अर्थात् साधनकी स्थितिका प्राप्त न होना-यह ‘अलब्धभूमिकत्व’ है; इससे साधकका उत्साह कम हो जाता है।

(९) योगसाधनसे किसी भूमिमें चित्तकी स्थिति होनेपर भी उसका न ठहरना अनवस्थितत्व’ है।

इन नौ प्रकारके चित्तविक्षेपोंको ही अन्तराय, विघ्न और योगके प्रतिपक्षी आदि नामोंसे कहा जाता है ॥ ३०॥

सम्बन्ध- इनके साथ-साथ होनेवाले दूसरे विघ्नोंका वर्णन करते हैं,

दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः ॥ ३१॥

दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासाः दुःख, दौर्मनस्य, अङ्गमेजयत्व, श्वास और प्रश्वास-ये पाँच विघ्न, विक्षेपसहभुवः विक्षेपोंके साथ-साथ होनेवाले हैं।

व्याख्या- उपर्युक्त चित्तविक्षेपोंके साथ-साथ होनेवाले दूसरे पाँच विप्न इस प्रकार हैं
(१) दुःख-आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक-इस तरह दुःखके प्रधानतया तीन भेद माने गये हैं। काम-क्रोधादिके कारण व्याधि आदिके कारण

या इन्द्रियोंमें किसी प्रकारकी विकलता होनेके कारण जो मन, इन्द्रिय या शरीरमें ताप या पीड़ा होती है, उसको ‘आध्यात्मिक दुःख’ कहते हैं। मनुष्य, पशु, पक्षी,

सिंह, व्याघ्र, मच्छर और अन्यान्य जीवोंके कारण होनेवाली पीड़ाका नाम ‘आधिभौतिक दुःख’ है तथा सर्दी, गर्मी, वर्षा, भूकम्प आदि दैवी घटनासे होनेवाली

पीड़ाका नाम ‘आधिदैविक दुःख’ है।

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(२) दौर्मनस्य-इच्छाकी पूर्ति न होनेपर जो मनमें क्षोभ होता है, उसे ‘दौर्मनस्य’ कहते हैं।

(३) अङ्गमेजयत्व-शरीरके अङ्गोंमें कम्प होना, ‘अङ्ग-मेजयत्व’ है।

(४) श्वास-बिना इच्छाके बाहरकी वायुका भीतर प्रवेश कर जाना अर्थात् बाहरी कुम्भकमें विघ्न हो जाना ‘श्वास’ है।

(५) प्रश्वास-बिना इच्छाके ही भीतरकी वायुका बाहर निकल जाना अर्थात् भीतरी कुम्भकमें विघ्न हो जाना ‘प्रश्वास’ है।

ये पाँचों विक्षिप्त चित्तमें ही होते हैं, समाहित चित्तमें नहीं; इसलिये इनको ‘विक्षेपसहभू’ कहते हैं ॥ ३१ ॥

सम्बन्ध- उक्त विनोंको दूर करनेका दूसरा उपाय बतलाते हैं,

तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः ॥ ३२ ॥

व्याख्या- उपर्युक्त दोनों प्रकारके विघ्नोंका नाश ईश्वर-प्रणिधानसे तो होता ही है, उसके सिवा यह दूसरा उपाय बतलाया गया है। भाव यह कि किसी एक वस्तुमें

चित्तको स्थित करनेका बार-बार प्रयत्न करनेसे भी एकाग्रता उत्पन्न होकर विनोंका नाश हो जाता है; अतः यह साधन भी किया जा सकता है ॥ ३२॥

सम्बन्ध- चित्तके अन्तरालमें राग-द्वेषादि मल रहनेके कारण मलिन चित्त स्थिर नहीं होता, अतः चित्तको निर्मल बनानेका सुगम उपाय बतलाते हैं,

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम् ॥ ३३ ॥

सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणाम्-सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा . और पापात्मा-ये चारों जिनके क्रमसे विषय हैं, ऐसी; मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणाम्-मित्रता, दया, प्रसन्नता

और उपेक्षाकी; भावनातः भावनासे; चित्तप्रसादनम्-चित्त स्वच्छ हो जाता है।

व्याख्या- सुखी मनुष्योंमें मित्रताकी भावना करनेसे, दुःखी मनुष्योंमें दयाकी भावना करनेसे, पुण्यात्मा पुरुषोंमें प्रसन्नताकी भावना करनेसे और पापियोंमें

उपेक्षाकी भावना करनेसे चित्तके राग, द्वेष, घृणा, ईर्ष्या और क्रोध आदि मलोंका

नाश होकर चित्त शुद्ध-निर्मल हो जाता है। अतः साधकको इसका अभ्यास करना चाहिये ॥ ३३ ॥

सम्बन्ध- चित्तशुद्धिका दूसरा उपाय बतलाते हैं,

प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य ।। ३४ ॥

व्याख्या- बारम्बार प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालनेका तथा यथाशक्ति बाहर

रोके रखनेका अभ्यास करनेसे मनमें निर्मलता आती है, इससे शरीरकी नाड़ियोंका भी मल नष्ट होता है ॥ ३४ ॥

सम्बन्ध- प्रसंगवश चित्तकी निर्मलताके उपाय बतलाकर, अब मनको स्थिर करनेवाला अन्य साधन बतलाते हैं,

विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी ॥ ३५॥

व्याख्या- अभ्यास करते-करते साधकको दिव्य विषयोंका साक्षात् हो जाता है, उन दिव्य विषयोंका अनुभव करनेवाली वृत्तिका नाम विषयवती प्रवृत्ति है (योग०

३ । ३६) । ऐसी प्रवृत्ति उत्पन्न होनेसे साधकका योगमार्गमें विश्वास और उत्साह बढ़ जाता है, इस कारण यह आत्मचिन्तनके अभ्यासमें भी मनको स्थिर करनेमें

हेतु बन जाती है ॥ ३५॥ ..

सम्बन्ध- इसी प्रकारका और भी उपाय बतलाते हैं,

विशोका वा ज्योतिष्मती ॥३६॥

व्याख्या- अभ्यास करते-करते साधकको यदि शोकरहित प्रकाशमय प्रवृत्तिका

अनुभव हो जाय तो वह भी मनको स्थिर करनेवाली होती है ॥ ३६॥

सम्बन्ध- अब चित्तकी स्थिरताका अन्य उपाय बतलाते हैं,

वीतरागविषयं वा चित्तम् ॥ ३७॥

व्याख्या- जिस पुरुषके राग-द्वेष सर्वथा नष्ट हो चुके हैं, ऐसे विरक्त पुरुषको ध्येय

बनाकर अभ्यास करनेवाला अर्थात् उसके विरक्त भावका मनन करनेवाला चित्त भी स्थिर हो जाता है ॥ ३७॥

सम्बन्ध- और भी अन्य उपाय बतलाते हैं
स्वप्रनिद्राज्ञानालम्बनं वा ॥३८॥

व्याख्या- स्वप्नमें कोई अलौकिक अनुभव हुआ हो, जैसे अपने इष्टदेवका दर्शन आदि, तो उसको स्मरण करके वैसा ही चिन्तन करनेसे मन स्थिर हो जाता है

तथा गाढ़ निद्रामें केवल चित्तकी वृत्तियोंके अभावका ही ज्ञान रहता है, किसी भी पदार्थकी प्रतीनि नहीं होती, उसी प्रकार समस्त उसीको लक्ष्य बनाकर अभ्यास

करनेसे भी अनायास ही चित्त स्थिर हो सकता है। जिस कालमें तमोगुणका आविर्भाव होता है; उस समय ‘यह अभ्यास नहीं करना चाहिये।’ जिस समय चित्त

और इन्द्रियोंमें सत्त्वगुण बढ़ा हुआ हो, उस
समय यह साधन अधिक लाभप्रद हो सकता है ॥ ३८॥

सम्बन्ध- मनुष्योंकी रुचि भिन्न-भिन्न होती है; अतः अब सर्वसाधारणके उपयोगी साधनका वर्णन करते हुए इस प्रकरणका उपसंहार करते हैं
यथाभिमतध्यानाद्वा ॥ ३९ ॥

व्याख्या- उपर्युक्त साधनोंमेंसे कोई साधन किसी साधकके अनुकूल नहीं पड़ता हो तो उसे अपनी रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करना चाहिये। अपनी

रुचिके अनुसार अपने इष्टका ध्यान करनेसे मन स्थिर हो जाता है॥३९॥ . ..

सम्बन्ध- चित्तकी स्थिरताके उपाय बतलाकर अब यह बतलाते हैं कि चित्तमें जब

स्थिर होनेकी योग्यता परिपक्क हो जाती है, तब उसकी कैसी स्थिति होती है,

परमाणुपरममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः ॥ ४० ॥

व्याख्या- अभ्यास करते-करते जब साधकका चित्त भलीभाँति स्थितिकी योग्यता प्राप्त कर लेता है; उस समय साधक अपने चित्तको सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पदार्थोंसे

लेकर बड़े-से-बड़े महान् पदार्थतक चाहे जहाँ, चाहे जब तत्काल स्थिर कर सकता है। उसका अपने चित्तपर पूर्ण अधिकार हो जाता है। चित्तमें स्थिर होनेकी

योग्यता परिपक्व हो जानेकी पहचान भी यही है (गीता ६।१९) ॥४०॥

सम्बन्ध- पहले बतलाये हुए उपायोंसे जब साधकका अपने चित्तपर अधिकार हो जाता है और चित्त अत्यन्त निर्मल होकर उसमें समाधिकी योग्यता आ जाती है,

इसके बाद किस प्रकार क्रमसे सम्प्रज्ञात निर्बीज-समाधि सिद्ध होती है, उसका वर्णन आरम्भ करते हैं,

क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः ॥४१॥

व्याख्या- पूर्वोक्त अभ्यास करते-करते जब साधकका चित्त स्वच्छ स्फटिकमणिकी भाँति अति निर्मल हो जाता है, जब उसकी ध्येयसे अतिरिक्त

बाह्य वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, उस समय साधक इन्द्रियोंके स्थूल या सूक्ष्म विषयोंको (योग० ३।४४), या अन्तःकरण और इन्द्रियोंको (योग० ३ । ४७)

अथवा बुद्धिस्थ पुरुषको (योग० ३।४९)-जिस किसी भी ध्येयको लक्ष्य बनाकर उसमें अपने चित्तको लगाता है तो वह चित्त उस ध्येय वस्तुमें स्थित होकर

तदाकार हो जाता है। इसीको सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं, क्योंकि इस समाधिमें साधकको ध्येय वस्तुके स्वरूपका भली प्रकार ज्ञान हो जाता है,

उसके विषयमें किसी प्रकारका संशय या भ्रम नहीं रहता है।

सम्बन्ध- सामान्यरूपसे सम्प्रज्ञातसमाधिका स्वरूप बतला दिया, अब इसके भेदोंका वर्णन करते हैं,

तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः ॥४२॥

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व्याख्या- ग्राह्य यानी मन और इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण करनेमें आनेवाले पदार्थ

दो प्रकारके होते हैं-(१) स्थूल, (२) सूक्ष्म । इनमेंसे किसी एक स्थूल पदार्थको लक्ष्य

बनाकर उसके स्वरूपको जाननेके लिये जब योगी अपने चित्तको उसमें लगाता है, तब पहले-पहल होनेवाले अनुभवमें उस वस्तुके .. नाम, रूप और ज्ञानके

विकल्पोंका मिश्रण रहता है। अर्थात् उसके स्वरूपके साथ-साथ उसके नाम और प्रतीतिकी भी चित्तमें स्फुरणा रहती है। अतः इस समाधिको सवितर्क समाधि

कहते हैं। इसीका दूसरा नाम सविकल्प योग भी है ॥४२॥

सम्बन्ध- इसके बाद,

स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितका ॥४३॥

व्याख्या- पहले बतलायी हुई स्थितिके बाद जब साधकके चित्तमें ध्येय वस्तुके नामकी स्मृति लुप्त हो जाती है और उसको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका भी

स्मरण नहीं रहता, तब अपने (चित्तके) स्वरूपका भी भान न रहनेके कारण उसके स्वरूपके अभावकी-सी स्थिति हो जाती है, उस समय सब प्रकारके

विकल्पोंका अभाव हो जानेके कारण केवल ध्येय पदार्थके साथ तदाकार हुआ चित्त ध्येयको प्रकाशित करता है, उस अवस्थाका नाम ‘निर्वितर्क’ समाधि है।

इसमें शब्द और प्रतीतिका कोई विकल्प नहीं रहता, अतः इसे ‘निर्विकल्प’ समाधि भी कहते हैं ॥ ४३ ।।

सम्बन्ध- इस प्रकार स्थूल-ध्येय पदार्थों में होनेवाली सम्प्रज्ञात समाधिका भेद बतलाकर अब सूक्ष्म ध्येयमें होनेवाली सम्प्रज्ञात समाधिके भेद बतलाते हैं,

एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥४४॥

व्याख्या- जिस प्रकार स्थूल-ध्येय पदार्थोंमें की जानेवाली समाधिके दो भेद हैं, उसी प्रकार सूक्ष्म-ध्येय पदार्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाली समाधिके भी दो भेद समझ

लेने चाहिये अर्थात् जब किसी सूक्ष्म-ध्येय पदार्थके स्वरूपका यथार्थ स्वरूप जाननेके लिये उसमें चित्तको स्थिर किया जाता है, तब पहले उसके नाम, रूप

और ज्ञानके विकल्पोंसे मिला हुआ अनुभव होता है, वह स्थिति सविचार समाधि है; और उसके बाद जब नामका और ज्ञानका अर्थात् चित्तके निज स्वरूपका भी

विस्मरण होकर केवल ध्येय पदार्थका ही अनुभव होता है, वह स्थिति निर्विचार समाधि है ॥ ४४ ॥

सम्बन्ध- अब सूक्ष्म पदार्थोंमें किन-किनकी गणना है, यह स्पष्ट करते हैं,

सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥ ४५ ॥

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व्याख्या- पृथ्वीका सूक्ष्म विषय गन्धतन्मात्रा, जलका रसतन्मात्रा, तेजका रूपतन्मात्रा, वायुका स्पर्शतन्मात्रा और आकाशका शब्दतन्मात्रा है एवं उन

सबका और मनसहित इन्द्रियोंका सूक्ष्म विषय अहंकार, अहंकारका महत्तत्त्व और महत्तत्त्वका सूक्ष्म विषय यानी कारण प्रकृति है।

उससे आगे कोई सूक्ष्म पदार्थ नहीं है; वही सूक्ष्मताकी अवधि है। अतः प्रकृतिपर्यन्त किसी भी सूक्ष्म पदार्थको लक्ष्य बनाकर उसमें की हुई समाधिको

सविचार और निर्विचार समाधिके अन्तर्गत समझ लेना चाहिये । यद्यपि पुरुष प्रकृतिसे भी सूक्ष्म है, पर वह दृश्य पदार्थों में नहीं है, अतः तद्विषयक समाधि

इसमें नहीं आनी चाहिये; तथापि ग्रहीतृविषयक समाधि बुद्धिमें प्रतिबिम्बित पुरुषमें की जाती है (योग० ३ । ३५) । अतः उसको निर्विचार समाधिके अन्तर्गत

मान लेने में कोई आपत्ति मालूम नहीं होती। क्योंकि कठोपनिषद् (१ । ३ । १०) में जीवात्मासे प्रकृतिको ‘पर’ कहा गया है। इस प्रकार यहाँ सूक्ष्म विषयकी सीमा

प्रकृतिपर्यन्त बतला देनेके कारण मन, इन्द्रियाँ तथा आनन्द और अस्मिताका उसमें अन्तर्भाव प्रतीत होता है; फिर सतरहवें सूत्रमें कहे हुए आनन्द और

अस्मिताको और इकतालीसवें सूत्रमें ग्रहण नामसे कहे हुए
मन और इन्द्रियोंको और ग्रहीता नामसे कहे हुए प्रकृतिस्थ पुरुषको टीकाकारोंने

विचार’ शब्दवाच्य सूक्ष्म विषयसे अलग कैसे कहा-और सूत्रकारोंने तद्विषयक समाधिके भेदोंका वर्णन क्यों नहीं किया, यह विचारणीय है॥४५॥

सम्बन्ध- इकतालीसवें सूत्रसे पैंतालीसवेंतक सम्प्रज्ञातसमाधिका भेद बतलाकर अब उन सब प्रकारकी समाधियोंका सहेतुक दूसरा नाम बतलाते हैं,

ता एव सबीजः समाधिः ॥४६॥

व्याख्या- निर्वितर्क और निर्विचार समाधियाँ निर्विकल्प होनेपर भी निर्बीज नहीं हैं, ये सब-की-सब सबीज समाधि ही हैं, क्योंकि इनमें बीजरूपसे किसी-न-किसी

ध्येय पदार्थको विषय करनेवाली चित्तवृत्तिका अस्तित्व-सा रहता है। अतः सम्पूर्ण वृत्तियोंका पूर्णतया निरोध न होनेके कारण इन समाधियोंमें पुरुषको

कैवल्य-अवस्थाका लाभ नहीं होता ॥ ४६॥

सम्बन्ध- उक्त चार प्रकारकी समाधियोंमेंसे निर्विचार समाधि ही सबसे श्रेष्ठ है,

यह प्रतिपादन करनेके लिये उसकी विशेष अवस्थाका फलसहित वर्णन करते हैं,

निर्विचारवैशारोऽध्यात्मप्रसादः ॥४७॥

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व्याख्या- निर्विचार समाधिके अभ्याससे जब योगीके चित्तकी स्थिति सर्वथा परिपक्क हो जाती है, उसकी समाधि-स्थितिमें किसी प्रकारका किंचिन्मात्र भी

दोष नहीं रहता (योग० १ । ४०) । उस समय योगीकी बुद्धि
अत्यन्त स्वच्छ-निर्मल हो जाती है (योग० ३ । ५) ॥ ४७ ।।

ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ॥४८॥

व्याख्या- उस अवस्थामें योगीकी बुद्धि वस्तुके सत्य (असली) स्वरूपको ग्रहण करनेवाली होती है; उसमें संशय और भ्रमका लेश भी नहीं रहता ॥४८॥

सम्बन्ध- उक्त ऋतम्भरा प्रज्ञाकी विशेषताका वर्णन करते हैं,

श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ॥ ४९ ॥

व्याख्या- वेद, शास्त्र और आप्त पुरुषके वचनोंसे वस्तुका सामान्य ज्ञान होता है, पूर्ण ज्ञान नहीं होता। इसी प्रकार अनुमानसे भी साधारण ज्ञान ही होता है। बहुत-

से सूक्ष्म पदार्थोंमें तो अनुमानकी पहुँच ही नहीं है। अतः वेद-शास्त्रोंमें किसी वस्तुके स्वरूपका वर्णन सुननेसे जो तद्विषयक निश्चय होता है, वह श्रुतबुद्धि है;

इसी प्रकार अनुमान (युक्ति) प्रमाणसे जो वस्तुके स्वरूपका निश्चय होता है, वह अनुमान बुद्धि है। ये दोनों प्रकारकी बुद्धि वृत्तियाँ वस्तुके स्वरूपको

सामान्यरूपसे ही विषय करती हैं, उसके अङ्ग प्रत्यङ्गोसहित उसका पूर्ण ज्ञान इनसे नहीं होता; किंतु ऋतम्भरा प्रज्ञासे वस्तुके स्वरूपका यथार्थ और पूर्ण

(अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसहित) ज्ञान हो जाता है। अतः यह उन दोनों प्रकारकी बुद्धियोंसे भिन्न और अत्यन्त श्रेष्ठ है॥४९॥

सम्बन्ध- इस ऋतम्भरा प्रज्ञाका और भी महत्त्व बतलाते हैं,

तजः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी ॥५०॥

patanjali yog darshan

व्याख्या- मनुष्य जिस किसी भी वस्तुका अनुभव करता है, जो कुछ भी क्रिया करता है, उन सबके संस्कार अन्तःकरणमें इकट्ठे हुए रहते हैं, इन्हींको

योगशास्त्रमें कर्माशय (योग० २ । १२) के नामसे कहा है। ये ही मनुष्यको संसारचक्रमें भटकानेवाले मुख्य कारण हैं (योग० २ । १३)

इनके नाशसे ही मनुष्य मुक्तिलाभ कर सकता है। अतः उक्त बुद्धिका महत्त्व प्रकट करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि इस बुद्धिके प्रकट होनेपर जब मनुष्यको

प्रकृतिके यथार्थ रूपका भान हो जाता है; तब उसका प्रकृतिमें और उसके कार्यों में स्वभावसे ही वैराग्य हो जाता है । उस वैराग्यके संस्कार पूर्व इकट्ठे हुए सब

प्रकारके रागद्वेषमय संस्कारोंका नाश कर डालते हैं

(योग० २ । २६,३ । ४९-५०), इससे योगी शीघ्र ही मुक्तावस्थाके समीप पहुँच जाता है ॥५०॥ .

सम्बन्ध- जब निर्बीज-समाधिरूप कैवल्य-अवस्थाका वर्णन करते हुए इस पादकी समाप्ति करते है,

तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः ॥ ५१॥

व्याख्या- जब ऋतम्भरा प्रज्ञाजनित संस्कारके प्रभावसे अन्य सब प्रकारके संस्कारोंका अभाव हो जाता है, उसके बाद उस ऋतम्भरा प्रज्ञासे उत्पन्न संस्कारों

में भी आसक्ति न रहनेके कारण उनका भी निरोध हो जाता है। उनका निरोध होते ही समस्त संस्कारोंका निरोध अपने-आप हो जाता है।

अतः संस्कारके बीजका सर्वथा अभाव हो जानेसे इस अवस्थाका नाम

निर्बीज समाधि है। इसीको कैवल्य-अवस्था भी कहते हैं (योग० ३ । ५०) ॥ ५१ ॥

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