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mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

महाभारत तथा मानव शरीर विज्ञान

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

मानव शरीर विज्ञान, विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इसके अन्तर्गत मनुष्य के शारीरिक अङ्गों की रचना तथा उनकी क्रिया विधि का अध्ययन किया जाता है। यह विज्ञान चिकित्सा की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आधुनिक समय में मनुष्य की दीर्घ आयु के लिए और उसके रोग रोग के कारण तथा उसके निवारण के उपाय के लिए मानव शरीर विज्ञान की सहायता ली जाती है।

मानव शरीर विज्ञान -सामान्य परिचय

मानव शरीर नाना प्रकार के जीवित अङ्गों से युक्त एक जीवित मशीन अर्थात् यंत्र के समान है। जिसमें समस्त शारीरिक अङ्ग नियमित रूप से कार्य करते रहते हैं। शरीर के कुछ अवयव बाहर से प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं, किन्तु कुछ अङ्ग जो शरीर
के भीतर होते हैं, वे दिखाई नहीं देते हैं।

मनुष्य के शरीर के वाह्य तथा आन्तरिक अङ्गों की क्रियाविधि तथा प्रजनन की समस्त प्रक्रिया का वैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषण और गूढ़ अध्ययन इस विज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है। मानव शरीर विज्ञान को शारीरिक अङ्गों की रचना तथा उनकी क्रियाओं के आधार पर सामान्यतः दो प्रमुख क्षेत्रों में बांटा जा सकता है –

1- शरीर विज्ञान – इसमें मानव शरीर की रचना, तथा क्रियाविधि आदि का
अध्ययन किया जाता है।

2- प्रजनन विज्ञान – इसमें गर्भ धारण से लेकर शिशु के जन्म तक की समस्त
प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है।

मानव शरीर विज्ञान प्राचीन काल से ही प्रचलित हैं। वेदों में मानव शरीर के अङ्गों की क्रिया विधि, संरचना आदि का उल्लेख प्राप्त होता है। इस सन्दर्भ में

ऋग्वेद के तृतीय मण्डल में हृदय की क्रियाविधि का उल्लेख’, चरक संहिता में अस्थियों की संख्या का उल्लेख मिलता है। अतः इससे मानव शरीर विज्ञान की महत्ता स्पष्ट हो जाती है।

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

प्राचीन वैदिक काल से ही मानव शरीर की वाह्य तथा आन्तरिक रचना और उनकी क्रियाविधि का निरन्तर अध्ययन किया जा रहा है। रामायण काल में मानव शरीर रचना का वृहत् ज्ञान चिकित्सकों को था।

इस सन्दर्भ में रामायण के युद्ध काण्ड में लक्ष्मण के मूर्छित होने के प्रसंग में वैद्य सुषेण द्वारा लक्ष्मण के हृदय गति का उल्लेख किया गया है। जिससे यह प्रतीत होता है कि मानव अङ्गों की रचना तथा संचालन का समस्त ज्ञान रामायण काल में प्रचलित था।

महाभारत काल में भी मानव शरीर विज्ञान अत्यन्त विकसित स्थिति में था। महर्षि व्यास ने महाभारत में मानव शरीर के बाह्य तथा आन्तरिक रचना और उनकी क्रिया विधि जैसे – श्वसन क्रिया, पाचन क्रिया, उत्सर्जन क्रिया आदि का उल्लेख किया है। महर्षि व्यास द्वारा प्रजनन विज्ञान का भी विस्तृत वर्णन महाभारत में किया गया है।

महाभारत तथा शरीर रचना विज्ञान

मानव शरीर की उत्पत्ति पञ्च भौतिक तत्त्वों से मानी जाती है अर्थात् यह मानव शरीर आकाश, वायु, जल, अग्नि तथा पृथ्वी से मिलकर बना है। ये सभी पञ्च तत्त्व अपने-अपने कार्य को करते हुए मानव शरीर का संचालन करते हैं।

इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास द्वारा शान्ति पर्व में अपने पुत्र शकदेव से शरीर में उपस्थित पञ्चभूतों के विषय में कथन है कि आकाश, वायु, जल आदि पञ्चभूत, भाव पदार्थ

‘तुम्येदिन्द्र स्व ओक्येइ सोमे चोदामि पीतये। एष रोरन्तु ते हृदि ।
-ऋ. वे. 3.42.8 2 त्रीणि षष्टीनि शतान्यस्थनां दन्तालूखलनखेनं। – च. सं. 7.6 ३ विषादं माकृथा वीर सप्राणोऽयमरिंदम।
आख्याति तु प्रसुप्तस्य प्रस्तगात्रस्य भूतले ।। सोच्छ्वासं हृदयं वीर कम्पमानंमुहुर्मुहुः ।
वा. रा. (युद्ध का.) 101-28

(गुण, कर्म, सामान्य आदि), अभाव और काल (दिक् आत्मा तथा मन) ये सभी पाञ्चभौतिक शरीरधारी प्राणियों में स्थित हैं।’ महर्षि व्यास द्वारा शरीर की उत्पत्ति का कारण बताने के पश्चात् पञ्चभौतिक तत्त्वों के गुणों का विस्तृत वर्णन किया गया है, जिसके अनुसार शब्द आकाश का गुण है और श्रवणेन्द्रिय आकाशमय है। चलना-फिरना वायु का धर्म है।

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प्राण और अपान भी वायु स्वरूप ही है। अतः स्पर्शेन्द्रिय (त्वचा) तथा स्पर्श नामक गुण को भी वायुमय ही समझना चाहिए। ताप, पाक, प्रकाश और नेत्रेन्द्रिय – ये सभी अग्नि तत्त्व के कार्य हैं। अतः श्याम, गौर और ताम्र आदि वर्ण वाले रूप को उसका गुण समझना चाहिए।

क्लेदन (किसी वस्तु को सड़ा-गला देना), क्षुद्रता (सूक्ष्मता) तथा स्निग्धता – ये जल के धर्म हैं। रक्त, मज्जा तथा जो कुछ स्निग्ध पदार्थ है, वे सभी जलमय हैं। अतः रसनेन्द्रिय, जिला और रस ये सब जल के गुण हैं।

शरीर में जो सङ्गत या कड़ापन है वह पृथ्वी का कार्य है, अतः हड्डी, दांत, नख आदि को पृथ्वी का अंश समझना चाहिए। इसी प्रकार दाढ़ी, मूंछ, शरीर के रोएं, केश, नाड़ी, स्नायु और चर्म – इन सबकी उत्पत्ति भी पृथ्वी से ही हुई है।

नासिका नामक ध्राणेन्द्रिय पृथ्वी का ही अंश है। अतः गंध नामक विषय को भी पार्थिव गुण ही जानना चाहिए। उत्तरोत्तर सभी भूतों में पूर्ववर्ती भूतों के गुण विद्यमान हैं। इस वर्णन में महर्षि व्यास ने स्पष्ट रूप से कहा है कि

आकाशं मारूतो ज्योतिरापः पृथ्वी च पञ्चमी। भावाभावौ च कालश्च सर्वभूतेषु पञ्चसु ।। महा. भा. शान्ति पर्व, 252.2 2

अन्तरात्मकमाकाशं तन्मयं श्रोत्रमिन्द्रियम् ।
तस्य शब्दं गुणं विद्यान्मूर्तिशास्त्र विधानवित् ।। चरणं मारूतात्मेति प्राणापानौ च तन्मयौ। स्पर्शनं चेन्द्रियं विद्यात् तथा स्पर्श च तन्मयम् ।। ताप: पाक: प्रकाशश्च ज्योतिश्चक्षुश्च पञ्चमम् । तस्य रूपं गुणं विद्यात् ताम्रगौरासितात्मकम् । प्रक्लेदः क्षुद्रता स्नेह इत्यपामुदिश्यते। अमृङनज्जा च यच्चान्यत् स्निग्धं विद्यात् तदात्मकम् ।। रसनं चेन्द्रियं जिला रसश्चायाँ गुणो मतः । संधातः पार्थिवो धातुरस्थिदन्तनखानि च ।। श्मश्रु रोम च केशाश्च शिरा स्नायु च चर्म च । इन्द्रियं ध्राणसंज्ञातं नासिकेत्यभिसंज्ञिता।। गन्धश्चेवेन्द्रियोर्थोऽयं विज्ञेयः पृथिवीमयः। उत्तरेषु गुणाः सन्ति सर्वसत्वेषु चोत्तराः ।।

महा. भा. शान्ति. पर्व. 252.3-9
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आकाश में शब्द मात्र गुण हैं, वायु में शब्द और स्पर्श दो गुण हैं, तेज में शब्द, स्पर्श और रूप तीन गुण हैं, जल में शब्द, स्पर्श, रूप और रस चार गुण हैं तथा पृथ्वी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध पञ्च गुण व्याप्त हैं।

जिससे यह प्रतीत होता है कि शरीर की रचना का मूलाधार पाञ्चभौतिक तत्त्व हैं। अतः ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में शरीर-विज्ञान के गूढ़ रहस्यों का ज्ञान सर्वत्र प्रचलित था।

महाभारत की नीलकंठ टीका में शरीर के पञ्च महाभूतों के कार्यों का उल्लेख करते हुए वर्णन मिलता है –

भूतेषु जरायुजादिषु पञ्चसुपंचात्मकेषु ऐतन भावाभाव कालनामपि भौतिकत्वमुक्तं। ननु पंचभ्यो भूतेभ्योऽधिकानिकालदिगात्ममनांसि चत्वारि द्रव्याणि गुणाश्च चतुर्विशतिः कर्मसामान्य विशेष समवायाश्चभाव पदार्थाः सप्तमोऽभाव पदार्थश्चेति काणादामन्यतेतत्कथं सर्वस्य पंचात्मकत्वं उत्तरेषु भूतेषु पूर्वभूतगुणाः संतितेन शब्द एवाकाशे शब्द स्पर्शो परकारणतामेति भावनाज्ञानकर्मभिः।

महाभारत में मानव अङ्गों की उत्पत्ति, पञ्चभूतों के सन्दर्भ में विस्तृत रूप से मिलती है। महाभारत के शान्ति पर्व के दौ सौ उनतालीसवें अध्याय में महर्षि वेद-व्यास का शुकदेव से मानव शरीर के गूढ़ रहस्यों का वर्णन करते हुए कथन है –

सम्पूर्ण महाभूत विधाता की पहली सृष्टि है। वे समस्त प्राणी समुदाय में तथा सभी देहधारियों के शरीरों में अधिक से अधिक भरे हुए हैं। देहधारियों की देह का निर्माण पृथ्वी से हुआ है चिकनाहट और पसीने आदि जल से प्रकट होते हैं,

अग्नि से नेत्र तथा वायु से प्राण और अपान का प्रादुर्भाव हुआ है। नाक, कान आदि के छिद्रों में आकाश तत्त्व स्थित है।’
महा. भा. शान्ति पर्व 252.2–9,

महाभूतानि सर्वाणि पूर्वसृष्टि: स्वयम्भुवः । भूयिष्ठं प्राणभृगामे निविष्टानि शरीरिषु ।। महा. भा. शान्ति पर्व 239.6 ३

भूमेर्दैहो जलात् स्नेहोज्योतिषश्चक्षुषी स्मृते। प्राणापानाश्रयो वायुः खेष्वाकाशं शरीरिणाम् ।। क्रान्ते विष्णुर्बले शक्र: कोष्ठेऽग्निर्भोक्तमिच्छति। कर्णयोः प्रदिशः श्रोत्रं जिह्वायां वाक् सरस्वती।। महा. भा. शान्ति पर्व 239.6-8

चरणों की गति में विष्णु और बाहुबल में इन्द्र स्थित है। उदर में अग्नि देवता स्थित है। जो भोज चाहते और पचाते हैं। कानों में श्रवण शक्ति और दिशाएं हैं तथा जिला में वाणी और सरस्वती देवी का निवास है।

इस वर्णन में महर्षि व्यास ने मानव अङ्गों की उत्पत्ति का विस्तृत उल्लेख किया है जिससे यह प्रतीत होता है कि मानव शरीर की रचना आदि का गूढ़ ज्ञान महाभारत काल में विकसित हो चुका था।

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महाभारत के टीकाकार ने महर्षि व्यास के वचनों को स्पष्ट करते हुए वर्णन किया है –

स्वयंभ्रुव ईश्वस्य महाभूतानि पूर्व सृष्टिः। तानिचप्राण भृद्गामेजीव संघे शरीरिषुशरीराभिमानिषुमूढ जीवेषुभूयिष्ठं निविष्टानितैरात्मवेन गृहीतानीत्यर्थः प्रथक् सृष्टिरितिपाठेभौतिक सृष्टेः पृथगेव भूतसृष्टिस्ततः प्राचीनत्वादितिसएवार्थः । खेषुनासादिरं धेषु। योगमते आत्माभोक्तैवनतुकर्ता साख्यमतेतुन भोक्तानापि कर्तेति तंत्राचंदूषयत्युत्तरस्यैव सिद्धांतत्वं ज्ञापयितुम क्रांते इति। क्रांते पादेद्रियबले पाणीद्रिये च विष्णु जिह्वा स्थानं वागिन्द्रियं सरस्वतीदेवता एतच्चान्येषामपिस्थानादीनामुपलक्षणं।”

मानव शरीर में पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं जैसे – आंख, नाक, कान, जीभ, त्वचा। इन ज्ञानेन्द्रियों का उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में भी मिलता है। महाभारत के शान्ति पर्व में महर्षि व्यास द्वारा पञ्च ज्ञानेन्द्रियों तथा उनके विषयानुभवों का उल्लेख शुकदेव के समक्ष किया गया है। इस वर्णन में देहधारियों द्वारा इन्द्रियों को वश में रखने पर बल दिया गया है तथा देहधारियों के शरीर में विद्यमान समस्त तत्त्वों का भी उल्लेख किया गया है। इसी प्रकार महाभारतकार ने महाभारत में अनेक स्थानों पर पञ्चभूतों द्वारा शरीर की उत्पत्ति के विषय में उल्लेख किया है। महा. भा. शान्ति पर्व 239, 6-8

को त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी। दर्शनीयेन्द्रियोक्तानि द्वाराण्याहारसिद्धये ।। शब्द: स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः | इन्द्रियार्थान् पृथग् विद्यादिन्द्रियेभ्यस्तु नित्यदा।। इन्द्रियाणि मनो युङ्क्ते वश्यान् यन्तेव् वाजिनः । मनश्चापि सदा युङ्क्ते भूतात्मा हृदयाश्रितः ।। इन्द्रियान्द्रियार्थाश्च स्वभावश्चेतना मनः। प्राणापानौ च जीवश्च नित्यं देहेषु देहिनाम् ।। महा. भा. शान्ति. पर्व 239.9-13

इसी सन्दर्भ में शान्तिपर्व में महर्षि भृगु द्वारा महर्षि भरद्वाज के समक्ष विस्तृत उल्लेख मिलता है जिसमें मानव शरीर के समस्त अङ्गों की उत्पत्ति का मूल रहस्य समाहित है।’

महर्षि भृगु द्वारा देहधारियों की समस्त ज्ञानेन्द्रियों की विशेषताओं का उल्लेख महर्षि भरद्वाज के प्रति किया गया है जिसके अनुसार गन्ध, स्पर्श, रस, रूप और शब्द – ये पृथ्वी के गुण माने गए हैं।

शब्द, स्पर्श, रूप और रस – ये जल के गुण माने गए हैं। शब्द, स्पर्श और रूप – ये अग्नि के तीन गुण माने गये हैं। तथा आकाश का एकमात्र गुण शब्द ही माना गया है। इस तरह महाभारत काल में ऋषि, विद्वान आदि सभी मानव शरीर रचना से भलीभांति परिचित थे।

मनुष्य की समस्त क्रियाएं इन्द्रियों पर आधारित होती हैं। ये सभी इन्द्रियाँ बुद्धि के विकारों का ही रूप है। इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास द्वारा शुकदेव के समक्ष

जङ्मानां च सर्वेषां शरीरे पञ्च धातवः । प्रत्येकशः प्रभिद्यन्ते यैः शरीरं विचेष्टते ।। त्वक् च माँसं तथा स्थीनि मज्जा स्नायुश्च पञ्चमम् । इत्येतदिह संधातं शरीरे पृथिवीमयम् ।। तेजो हग्निस्तथा क्रोधश्चक्षुरूष्मा तथैव च । अग्निर्जरयते यश्च पञ्चाग्नेयाः शरीरिणः ।। श्रोत्रं ध्राणं तथाऽऽस्यं च हृदयं कोष्ठमेव च । आकाशात् प्रणिनामेते शरीरे पञ्च धावतः ।। श्लेष्मा पित्तमथ स्वेदो वसा शोणितमेव च। इत्यापः पञ्चधा देहे भवन्ति प्राणिनां सदा।। महा. भा. शान्ति पर्व 184.19-23 2

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भूमेर्गन्धगुणान् वेत्ति रसं चादभ्यः शरीरवान्। ज्योतिषा चक्षुषा रूपं स्पर्श वेत्ति च वाहिना ।। गन्धः स्पर्शो रसो रूपं शब्दश्चात्र गुणाः स्मृताः । तस्य गन्धस्य वक्ष्यामि विस्तराभिहितान् गुणान् ।। ज्योतिः पश्यति चतुभ्या॑ स्पर्श वेत्ति च वायुना। शब्द स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापि गुणाः स्मृताः ।। शब्द: स्पर्शश्च रूपं च त्रिगुणं ज्योतिरूच्यते। ज्योतिः पश्यति रूपाणि, रूपं च बहुधा स्मृतम् ।। शब्द स्पर्शी च विज्ञेयौ द्विगुणो वायुरित्युत।। वायत्यस्तु गुणः स्पर्शः स्पर्शश्च बहुधा स्मृतः । तत्तैक गुणमाकाशं शब्द इत्येव तत्स्मृतम् । महा. भा. शान्तिपर्व 184.26-35

विस्तृत उल्लेख किया गया है।’ महाभारत की नीलकण्ठी टीका में भी टीकाकार ने इन्द्रियों के परिभाषित किया है, यथा –

पृथग्भावात् पृथग्विषयत्वात् विक्रियतेविकारं प्राप्नोति तानेवविकारानाह शृण्वतीति। तानिबुद्धेर्विकारान् अदृश्यश्चिदात्मा भावेषु सात्विकादिषु।

वैदिक ग्रन्थों में शरीर रचना Anatomy और शरीर क्रिया से सम्बद्ध तथ्य पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। इसमें आयुर्वेद में तर्कसंगत तथा क्रमबद्ध वर्णन किया गया है। इस वेद की प्रमुख संहिताएं (चरक संहिता तथा सुश्रुत संहिता) में मानव शरीर रचना का विस्तृत उल्लेख मिलता है, जिसमें चरक संहिता के अनुसार, मनुष्य के जीवन को शरीर, इन्द्रिय, सत्व और आत्मा धारण करते हैं –

शरीरेन्द्रिय सत्वात्मसंयोगो धारि जीवितम्।’

अतः इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव शरीर का निर्माण पञ्चभूतों तथा पञ्च इन्द्रियों द्वारा हुआ है। मानव शरीर की रचना माँस, नस-नाड़ियों, हड्डी, रक्त, मज्जा आदि से हुई है। इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास ने महाभारत के शान्तिपर्व में नारद मुनि द्वारा शुकदेव के प्रति उल्लेख किया है –

यह शरीर पञ्चभूतों का घर है। इसमें हड्डियों के खंभे लगे हैं। यह नस-नाड़ियों से बंधा हुआ, रक्त माँस से लिपा हुआ और चमड़े से मढ़ा है। इसमें मल-मूत्र भरा है जिससे दुर्गन्ध आती रहती है। यह बुढ़ापा और शोके से व्याप्त, रोगों का घर, दुःखरूप, रजोगुणरूपी धूल से ढंका हुआ और अनित्य है, अतः तुम्हें इसकी आसक्ति को त्याग देना चाहिए। इस

इन्द्रियाणां पृथग्भावाद् बुद्धिर्वि क्रियते ह्यतः । श्रृण्वती भवती श्रोत्रं स्पशती स्पर्श उच्यते।। पश्यती भवते दृष्टी रसती रसनं भवेत् । जिघ्रती भवति घ्राणं बुद्धिर्विक्रियते पृथक् ।। इन्द्रियाणि तु तान्याहुस्तेष्व दृश्योऽधितिष्ठति। महा. भा. शान्ति पर्व 248.4-6 2, महा. भा. शान्ति. पर्व. 248, 4-6 , च. सं. सूत्र. स्था. 1.42

अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं माँसशोणितलेपनम् । चावनद्धं दुर्गन्धि पूर्ण मूत्र पुरीषयोः ।। जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम् रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यज।।महा. भा. शान्ति. पर्व. 329.42-43

वर्णन में नारद मुनि द्वारा मानव-शरीर के समस्त अङ्गों का विस्तृत तथा गूढ़ उल्लेख किया गया है जिससे महाभारत कालीन मानव शरीर विज्ञान की विकसित दशा का होता है।

(क.) आन्तरिक अङ्गों की क्रियाविधि

संक्षिप्त शिवपुराण

मानव शरीर के भीतर नाना प्रकार के अङ्ग होते हैं जो निरन्तर कार्य करते रहते हैं तभी यह शरीर यंत्र के समान कार्य करता रहता है। महाभारत के गीता के उपदेश में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने शरीर को यंत्र कहा है,

यथा –
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।’

यन्त्रस्वरूप मानव शरीर के अनेक आन्तरिक अङ्ग जैसे – श्वसन, पाचन, उत्सर्जन, प्रजनन आदि महत्वपूर्ण क्रियाएं करते रहते हैं। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत में मानव शरीर के आन्तरिक अङ्गों की क्रियाविधि का विस्तृत उल्लेख किया है जोकि तत्कालीन मानव शरीर विज्ञान का सशक्त प्रमाण प्रतीत होता है।

  • श्वसन क्रिया (Respiration) – श्वसन उन सभी भौतिक तथा रासायनिक क्रियाओं को कहते हैं जिनमें वायुमण्डलीय ऑक्सीजन शरीर कोशिकाओं में पहुंचकर भोजन का ऑक्सीकरण (Oxidation) पा जारण (Combustion) करती है, फलतः ऊर्जा की मुक्ति होती है, तथा इस प्रकार बनी कार्बन-डाई-ऑक्साइड को शरीर से बाहर पहुंचाया जाता है। श्वसन एक अपचयी क्रिया (Catabolic Process) है, इससे शरीर के भार में भी कमी होती है।
  • श्वसन प्रक्रिया का वर्णन प्राचीन वैदिक काल में स्पष्ट रूप से मिलता है। इस सन्दर्भ में अथर्ववेद में निम्नलिखित वर्णन मिलता है कि –
  • गीता – 18.61

को अस्मिन प्राणमवयत्को अपानं व्यानम् । समानमस्मिन् को देवोऽधि शिश्राम पुरूषे।’

अर्थात् इस शरीर में किस देव ने प्राण, अपान, व्यान समान और उदान वायु को बुन सा दिया है अर्थात् वायु शरीर में जाकर पाञ्च रूपों में विभक्त होकर शरीर में पाञ्च विविध प्रयोजनों के परिणामस्वरूप शरीर के ढांचे को बनाए रखती है। इससे स्पष्ट है कि शरीर के स्वास्थ्य में वायु का अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान है। वायु फेफड़ों में पहुंचकर उसके छोटे-छोटे कोष्ठों को फुला देती है।

धमनियों में बहता हुआ रक्त, हवा में स्थित ऑक्सीजन का शोषण कर लेता है और नाइट्रोजन बच जाता है। ऑक्सीजन रक्त के साथ मिलकर सभी भागों में पहुंच जाती है। यह ऑक्सीजन मानव शरीर के भीतर कार्बन तथा मृत रगों से मिलकर कार्बन डाई ऑक्साइड बन जाती है और पानी को वाष्प में बदल देती है।

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

रक्त के साथ ये ये यौगिक फेफड़ों में पहुंच जाते हैं और सांस के साथ बाहर निकल आते हैं। इस क्रिया से शरीर को गर्मी तथा बुद्धि को प्रेरणा मिलती है तथा इससे शरीर का तापमान 98.4 डिग्री फॉरेनहाइट बना रहता है। वैज्ञानिकों के मतानुसार एक स्वस्थ मनुष्य चौबीस घंटे में चार हजार घन इंच ऑक्सीजन ग्रहण करता है तथा उतना ही कार्बन डाई ऑक्साइड गैस निकालता है।

महर्षि वेद व्यास ने महाभारत में कथानक के प्रवाह में श्वसन क्रिया का विस्तृत वर्णन किया है। इस सन्दर्भ में महाभारत के शान्तिपर्व में भरद्वाज ऋषि तथा भृगु ऋषि क संवाद प्रश्नोत्तर शैली में वर्णित है जिसमें ऋषि भरद्वाज का कथन है कि शरीर के भीतर रहने वाली अग्नि पार्थिव धातु (पाञ्चभौतिक देह) का आश्रय लेकर कैसे रहती है और वायु भी उसी पार्थिव धातु का आश्रय लेकर अवकाश विशेष के द्वारा देह को कैसे चेष्टाशील बनाती है।

इसी सन्दर्भ में आगे भृगु ऋषि द्वारा प्राणियों के शरीर में वायु की गति का विस्तृत वर्णन किया गया है जिसके
अर्थ. वे. – 10.2.13 2 पार्थिवं धातुमासाद्य शरीरोऽग्निः कथं प्रभो।
अवकाशविशेषेण कथं वर्तयतेऽनिलः ।। – महा. भा. शान्ति. पर्व. 185.1

अनुसार, आत्मा मस्तक के रन्ध्र स्थान में स्थित होकर सम्पूर्ण शरीर की रक्षा करता है और प्राण मस्तक तथा अग्नि दोनों में स्थित होकर शरीर को चेष्टाशील बनाता है। वह प्राणों से संयुक्त आत्मा ही जीव है, वही समस्त भूतों का आत्मा सनातन पुरुष है।

वही मन, बुद्धि, अहंकार, पञ्च भूत और विषय रूप हो रहा है। इस प्रकार प्राण के द्वारा शरीर के भीतर समस्त विभाग तथा इन्द्रिय आदि सारे वाह्य अङ्ग परिचालित होते हैं। तत्पश्चात् समानवायु के रूप में परिणत हो प्राण ही अपनी अपनी गति के आश्रित शरीर का संचालक होता है।’

महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में मानव शरीर में व्याप्त वायु के पञ्च भेद बताये हैं। इस सन्दर्भ में महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में ब्राह्मण द्वारा उसकी पत्नी को ज्ञानोपदेश देते हुए कथन है -प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान – ये पांचो प्राण पञ्च होते हैं।

विज्ञान पुरुष इन्हें सबसे श्रेष्ठ मानते हैं। इस तरह महाभारतकार ने मानवशरीर के अन्तर्गत बहने वाली वायु का उल्लेख किया है। महर्षि व्यास ने इन वायुओं से भिन्न-भिन्न कार्यों का वर्णन शान्तिपर्व में किया है इस सन्दर्भ में भृगुऋषि द्वारा भरद्वाज के प्रति कथन है –

प्राण से प्राणी चलने-फिरने का काम करता है, व्यान से व्यायाम (बल साध्य उद्यम) करता है, अपान वायु ऊपर से नीचे की ओर जाती है, समान वायु हृदय में स्थित होती है, उदान से पुरुष उच्छवास लेता है और कण्ठ, तालु आदि स्थानों के भेद से शब्दों तथा अक्षरों का उच्चारण करता है।

इस प्रकार ये पाञ्च वायु के
वायोर्गतिमहं ब्रह्मन् कथयिष्यामि तेऽन घ। प्राणिनामनिलो देहान् यथा चेष्टयते बली ।। क्षितो मूर्धानमात्मा तु शरीरं परिमालयन् । प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते।। स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः | मनो बुद्धिरहङ्कारो भूतानि विषयश्च सः ।। एवं त्विह स सर्वत्र पाणेन परिचाल्यते।। पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ।।

महा. भा. शान्ति पर्व 185. 2-5 –

प्राणापानावुदानश्च समानो व्यान एव च। पञ्चहोतूंस्तथैतान् वै परं भावं विदुर्बुधाः ।।महा. भा. आश्व. पर्व. 23.2

परिणाम हैं, जो शरीर को चेष्टाशील बनाते हैं।’ इस प्रकार समस्त पाञ्चों वायु मानव शरीर में भिन्न-भिन्न रूप में कार्य करते हैं।
नासा गुहा नासिका
श्वर यंत्र
श्वसनिक

शार्ङ्गधर संहिता में भी मानवशरीर के अन्दर व्याप्त वायु के पाञ्च भाग किए गए हैं,

यथा – अपान, समान, प्राण, उदान तथा व्यान। शार्ङ्गधर संहिता में शरीर में प्रविष्ट इन पाञ्चों वायु के कार्यों का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसके अनुसार प्राणवायु को उच्छ्वास और निःश्वास के साथ-साथ फुस्फुसों में आने-जाने वाले – श्वसनी वायु के रूप में व्यक्त किया गया है।

साथ ही उनके ‘नाभिस्थः पवनः प्राणः’ वचन से ऐसा प्रतीत होता है कि गर्भ में शिशु को जो प्राणवायु (ऑक्सीजन) माता के रक्त द्वारा प्राप्त होती है, वह गर्भस्थ शिशु के शरीर में नाभि नाल के द्वारा ही पहुंचता है। अतः शार्ङ्गधर का उपर्युक्त कथन महर्षि वेदव्यास के वचनों का समर्थन करता हुआ युक्ति-युक्त प्रतीत होता है।

मनुष्य का श्वसन अङ्ग

प्राणात् प्रतीयते प्राणी त्यानाद् व्यायच्छते तथा। गच्छत्यपानोत्ध्मश्चैव समानो हृद्यवस्थितः ।। उदानादुच्छवसिति च प्रतिभेदाच्च भाषते। इत्येते वायवः पञ्च चेष्टयन्तीह देहिनम् ।। महा. भा. शान्ति पर्व. – 184. 24-25

वायुः पञ्च प्रकारतः | अपानः स्यात् समानश्च, प्राणोदानौ तथैव च । व्यानश्चेति शरीरस्य नामान्युक्तान्यनुक्रमात् ।। शा सं. 5. 27-28

नाभिस्थः पवनः प्राणः स्पृष्ट्वा हृत्कमलान्तरम् । कण्ठाद् बहिर्विनिर्भाति पातुं विष्णुपदामृतम् ।। पीत्वा चाम्बरपीयूषं पुनरायाति वेगतः । प्रीणमन् देहमखिलं जीवयन् जठरानलम् ।। शार्ङ्ग. सं. 5. 51

मनुष्य द्वारा ली गई प्राणवायु के प्रवेश मार्ग के नासिका, मुख कंठ आदि अवयव हैं। इनके द्वारा ही वायु फुफ्फुसों में गहराई तक जा पहुँचता है। उच्छ्वास – निःश्वास की प्रक्रिया द्वारा प्राणवायु के गति करने के समय वक्ष तथा उदर की माँसपेशियाँ भी गति करती हैं और नाभि तक का प्रदेश प्रभावित होता है।

यह वायु हृदय के आस-पास चारों ओर अर्थात् फुफ्फुस में भर जाता है। फुफ्फुसों से रक्त में मिलकर यह हृदय में पहुँचता है। हृदय के भीतर अमृतमय प्राणद्रव्य से मिश्रित रक्त सदा बना रहता है,

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

इसी कारण शार्ङ्गधर ने “हृदि प्राणः– अर्थात् प्राण का स्थान हृदय भी कहा है। इसके पश्चात् फुफ्फुसों द्वारा निकाला गया दूषित कार्बनडाइऑक्साइड युक्त वायु नासिका, मुख आदि द्वारा वेग से बाहर निकाला जाता है। यह प्राणवायु ही शरीर के समस्त भीतरी अङ्गों को पोषण देता है तथा विष रूपी कार्बनडाई-ऑक्साइड बाहर निकालता है।

इस अमृत रूपी (ऑक्सीजन युक्त) रक्त से जहाँ शरीर के सभी कोषों को जीवन तत्त्व मिलता है, वही यह जठराग्नि को भी प्रज्जवलित करता रहता है। महर्षि वेदव्यास द्वारा वर्णित प्राणवायु के महत्त्व का समर्थन न केवल प्राचीन विद्वान ही करते हैं, वरन् आधुनिक वैज्ञानिकों के मतानुसार ऑक्सीजन युक्त वायु ही प्राणवायु है।

इसे अमृतमय वायु द्वारा भी सम्बोधित किया गया है। छान्दोग्य उपनिषद में कहा गया है कि मनुष्य जो वायु अन्दर खींचता है, उसे प्राण कहते हैं। महर्षि चरक द्वारा प्राणवायु के स्थान शिर, छाती, कान, जीभ, मुख और नासिका बतलाए गये हैं तथा प्राणवायु के द्वारा थूकना, छींकना, डकार आना, सांस लेना और भोजन का निगलना आदि कर्म किये जाते हैं। सुश्रुत संहिता में भी प्राण वायु का उल्लेख मिलता है।

शाङ्ग. सं. 5. 27-28 2 “यद्वै प्राणिति स प्राणः, छान्दो. उप. 1.3.3 ३ स्थानं प्राणस्य शीर्षोर: कर्णजिह्वास्थनासिकाः | ष्ठीवनक्षवथूद्गारश्वासाहारादि कर्म च ।।च. सं. 28.5 + यो वायुर्वक्त्रसंचारी स प्राणो नाम देहधृक् । सोऽन्नं प्रवेशयत्यन्तः प्राणांश्चाप्यवलम्बते।। सु. सं. 1.13

पाचन क्रिया (Digestion)

जीवधारी को जैविक क्रियाओं के लिए ऊर्जा की तथा मरम्मत और वृद्धि के लिए पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है। जीवधारी जिस रूप में भोजन ग्रहण करता है वह उसी रूप में कोशिकाओं द्वारा प्रयुक्त नहीं होता। अतः अघुलनशील जटिल भोजन को सरल घुलनशील इकाइयों में बदलना आवश्यक होता है, जिससे रक्त, लसिका तथा ऊतक तरल (tissue fluid) के माध्यम से ये आवश्यक तत्त्व कोशिका में उपलब्ध हो सकें। इस तरह भोजन को शरीर में प्रयुक्त होने की योग्य दशा में बदलने की क्रिया पाचन (Digesition) कहलाती है।

  • ग्रसनी
  • मुख गुहा मुख अधोजभ और अधोजिह्वा ग्रंथियां
  • ग्रसिका
  • यकृत

मनुष्य के पाचन तन्त्र में निम्नलिखित पाँच अङ्ग सम्मिलित होते हैं –

(1.) आहारनाल,

(2.) ग्रासनाल,

(3.) आमाशय,

(4.) छोटी आंत,

(5.) बड़ी आंत।

मनुष्य के मुख से गुदा तक फैली 8-10 मीटर लम्बी, खोखली तथा कुण्डलित
नलिका को आहारनाल कहते हैं। मनुष्य कर्णपूर्व ग्रंथि द्वारा ग्रहण किया गया भोजन मुख से होकर मुखग्रासन गुहिका में जाता है,

इसके बाद ग्रासनाल तथा क्रमानुसार आमाशय में जाता है जहाँ भोजन लुग्दी जैसा बन जाता है तथा आ माशय की जठग्रन्थियों से जठर
रस स्रावित होता है। इसके बाद भोजन अग्र क्षुद्रांत्र छोटी आंत में जाता है जिसके तीन भाग होते हैं –

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1. पक्वाशय (Duodenum),

2. मध्यान्त्र (Jejiumum),

3. शेषात्रन्त्र (Ileum)

इन तीनों भागों से होता हुआ भोजन बड़ी आंत में जाता है। इसके भी तीन भागों 1. सीकम,

2. कोलन,

3. मलाशय से होता हुआ भोजन अपने अन्तिम चरण मलाशय तक पहुँचता है। इस प्रकार पाचक क्रिया पूर्ण हो जाती है।

पित्ताशय
आमाशय
अग्नाशय
ग्रहणी –
अनुप्रस्थ वृदन
अवरोही वृहदंत्र
आरोही वृदंत्र क्षुद्रांत अंधनाल –
कृमिरूप परिशेषिका
मलाशय NEPARAcational
गुदा
मानव पाचन तंत्र

मानव शरीर विज्ञान में पाचन क्रिया का विशेष महत्त्व है। इस क्रिया द्वारा मानव शरीर को ऊर्जा तथा पोषक तत्त्वों की प्राप्ति होती है। मनुष्य के पाचन तन्त्र की सम्पूर्ण प्रक्रिया का उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है।

महर्षि व्यास ने महाभारत में पाचन क्रिया का विस्तृत उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में महर्षि भृगु द्वारा महर्षि भरद्वाज के समक्ष पाचन क्रिया का उल्लेख किया गया है, यथा –

अपानप्राणयोर्मध्ये प्राणापानसमाहितः। समन्वितस्त्वधिष्ठानं सम्यक्पचति पावकः ।। आस्यं हि पायुपर्यन्तमन्ते स्याद् गुदसंज्ञितम् । स्रोतस्तस्मात् प्रजायन्ते सर्वस्रोतांसि देहिनाम्।। प्राणानां संनिपाताच्च संनिपातः प्रजायते। ऊष्मा चाग्निरितिज्ञेयो योऽन्नं पचति देहिनाम् ।। अग्निवेगवहः प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते। स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम् ।। पक्वाशयस्त्वधो नाभ्यामूर्ध्वमामाशयः स्थितः । नाभिमध्ये शरीरस्य सर्वे प्राणाश्च संस्थिताः ।। प्रस्थिता हृदयात् सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा। वहन्यन्नरसान् नाऽयो दश प्राणप्रचोदिताः।।

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उपर्युक्त वर्णन में मुख से लेकर गुदा तक के समस्त शारीरिक अङ्गों की क्रिया विधि का उल्लेख किया गया है कि किस प्रकार प्राणवायु गति करता है ?
और अन्न का पाचन तथा उत्सर्जन प्रक्रिया में उसका क्या योगदान होता है आदि । साथ ही यहाँ प्राण वायु के दस भेदों का भी नामोल्लेख हुआ है,

यथा – 1. प्राण, 2. अपान, 3. व्यान, 4. उदान, 5. समान, 6. नाग, 7. कूर्म, 8. कृकल, 9. देवदत्त, 10. धनंजय ।

अतः इस विवरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकाल में मानव शरीर विज्ञान अत्यन्त विकसित था।
महा. भा. शान्ति. पर्व, 185. 10-15

संस्कृत वाङ्गमय में अपार ज्ञान-विज्ञान का भण्डार है। अतः प्राचीन ग्रन्थों में मानव शरीर विज्ञान का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। मानव शरीर में पाचन क्रिया का विस्तृत वर्णन करते हुए अनेक ऋषियों, चिकित्सकों ने अपने-अपने मत प्रस्तुत किये हैं, यथा- महर्षि सुश्रुत के मतानुसार जठराग्नि द्वारा अन्न के पाचन के सन्दर्भ में कहा गया है –

आमपक्वाशयचर समानो वृह्विसंगतः।
सोऽन्नं पचति तज्जांश्च विशेषाचिनक्ति हि।।’ महर्षि चरक के मतानुसार इस सन्दर्भ में कहा गया है

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स्वेददोषाम्बुवाहीनि स्रोतांसि समधिष्ठितः । अन्तराग्नेश्च पार्श्वस्थः समानोऽग्निबल प्रदः ।।
अष्टाङ्ग संग्रह की इन्दुटीका में इस सन्दर्भ में निम्नलिखित वर्णन मिलता है
अन्तः अग्ने स्थानं आमाशय-पक्वाशयोर्मध्यं नाभेः अर्धांगुलभात्रेणवामपार्यो।’
शार्ङ्गधर संहिता में पाचन क्रिया का विस्तृत वर्णन मिलता है, यथा –
मात्यामाशयमाहारः पूर्व प्राणानिलेरितः। माधुर्य केनभावं च षड्रसोऽपि लभेत सः।’
अथपाचक तित्तेन विदग्धश्चाम्लतां वृजे……..” ततः समानमरुता ग्रहणीमभिनीयते…….”
‘सु. सं. 1.16

च. सं. 28.7 3 अष्टा. सं. 20.2 (इन्दुटीका) * शार्ङ्ग. सं. 6.1 5 वही. 6.2
वही. 6.2

इस प्रकार उपर्युक्त वर्णन से यह प्रतीत होता है कि प्राचीन भारतीय साहित्य में विज्ञान का अपूर्व तथा गूढ उल्लेख हुआ है।
मनुष्य के शरीर में पाचन क्रिया मुख से लेकर गुदा तक चलती है। इस सम्पूर्ण प्रक्रम में जठराग्नि का विशेष महत्त्व होता है। इसी की सहायता से अन्न पचता है। इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास ने गीता के उपदेश में भगवान श्रीकृष्ण के वचनों के द्वारा शरीर की अग्नि के विषय में वर्णन किया है, यथा – श्रीकृष्ण का कथन है- जाठरो भगवानग्नि ईश्वरोऽनस्य पाचकः ।

अर्थात् मैं ही वैश्वानर (अग्नि) बन कर प्राणियों के शरीर में आश्रित हूँ, मैं ही खाद्य, पेय, लेह्य और चळ सब प्रकार के अन्न को पचाता हूँ। इसी अग्नि की चिकित्सा इस अङ्ग में की जाती है।

महर्षि व्यास के उपर्युक्त वचन की पुष्टि करते हुए अनेक विद्वानों ने अपने-अपने मत प्रस्तुत किए हैं। इस सन्दर्भ में वाग्भट्ट ने अपनी रचनाओं में विस्तृत वर्णन किया है जिसके अनुसार समान वायु अन्तः अग्नि के समीप पक्वाशय तथा आमाशय में रहता है और उसको सुलगाता है। पक्वाशय, आमाशय, दोष, मल, शुक्र, आर्तव तथा अम्बु (रस) के साथ विचरण करता है।

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महाभारत तथा पर्यावरण विज्ञान

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