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महाभारत तथा ज्योतिष विज्ञान

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भारतीय ज्योतिष विश्व का अत्यन्त प्राचीन विज्ञान है। वैज्ञानिकों के मतानुसार, पृथ्वी सूर्य का अंश है तथा सूर्य की गतिविधि का प्रभाव पृथ्वी पर स्थित प्राणियों पर पड़ता है। अतः प्राचीन काल से ही मनष्य, सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहों के रहस्यों के समाधान ढूंढ रहा है। ज्योतिष का साक्षात् सूर्य की रश्मियों से सम्बन्ध होने के कारण यह अति प्राचीन क्रमबद्ध तथा लोकोपयोगी विज्ञान है। यह विज्ञन के समान अपने समस्त तथ्यों को प्रमाणित रूप में व्यक्त करता है साथ ही विज्ञान का विशेष गुण प्रत्यक्ष प्रमाण का होना भी ज्योतिष शास्त्र को ज्योतिष विज्ञान बना देता है। चन्द्रशेखरन ने ज्योतिष को प्रत्यक्ष शास्त्र माना है।

ज्योतिष विज्ञान सामान्य परिचय

ज्योतिष एक महान शास्त्र है, जिसमें ग्रह नक्षत्र आदि की गति और स्थिति का अध्ययन किया जाता है। आकाश में स्थित ज्योतिपिण्डों के संचार और उनसे बनाने वाले गणितगत पारस्परिक सम्बन्धों के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करने वाली विद्या का नाम ‘ज्योतिषशास्त्र’ है।

अप्रत्यक्षाणि शास्त्राणि विवादस्तेषुकेवलम् । प्रत्यक्षं ज्योतिष शास्त्रं चन्द्राकौयस्य साक्षिणौ।। जात. सार. पृ. 5
कि नभोमण्डल में स्थित विविध ज्योतिषियों से सम्बन्धित विद्या को ज्योतिर्विद्या कहते
प्राचीन ऋषियों तथा विद्वानों के मतानुसार ज्योतिष शास्त्र षड्वेदाङ्गों में से एक है, यथा –

शिक्षा,

कल्प,

व्याकरण,

ज्योतिष,

निरूक्त,

छन्द

चूंकि वेद अपौरूषेय है अतः वेदाङ्ग भी अपौरूषेय माने गये हैं। वेदों में अनेक स्थानों पर ज्योतिष विज्ञान का वर्णन मिलता है। यथा – ऋग्वेद में बारह राशियों का वर्णन’, यजुर्वेद में नक्षत्रदश (ज्योतिषी) का वर्णन’, छान्दोग्य उपनिषद में नक्षत्र विद्या का वर्णन आदि। षड्वेदाङ्गों में ज्योतिष शास्त्र को नेत्रस्थानीय माना गया है। इस सन्दर्भ में श्रीमद् भास्कराचार्य का कथन है –
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शब्द शास्त्रं मुखं ज्योतिषं चक्षुषी, श्रोत्रमुक्तं निरूक्तं कल्पः करौ। या तु शिक्षास्य वेदस्य सा नासिका, पादपद्मयछन्द आद्यैर्बुधैः ।।
ज्योतिष शास्त्र के प्रमुख रूप से दो भाग हैं –

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काल ज्योतिष 2. फलित ज्योतिष।

काल ज्योतिष को ‘गणित ज्योतिष’ भी कहा जाता है। इसमें सिद्धान्त, करण तथा तंत्र तीन शाखाएं हैं। इसके अनुसार सृष्टि के आरम्भ से अब तक बीते गये वर्ष, मास, दिन, वर्ष अयन, ऋतु, ग्रहों की गति, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, नक्षत्र, योग-करण आदि का अध्ययन किया जाता है। हजारों वर्ष पूर्व ज्योतिष विज्ञान की इस शाखा में भारतीय आचार्यों ने सिद्धता प्राप्त कर अनेक सिद्धान्त ग्रन्थों की रचना की थी। यह खगोल ज्ञान है जिसे आधुनिक विज्ञान में Astronomy कहते हैं। फलित ज्योतिष के दो स्कन्ध माने गये हैं –

होरा तथा संहिता।

होरा शास्त्र के अनुसार मनुष्य के जन्म से मृत्युपर्यन्त जीवन की घटनाओं की फलित के अनुभूत सिद्धान्तों के अनुसार व्याख्या की जाती है। इसका दार्शनिक आधार पुनर्जन्म और कर्मवाद है। संहिता शास्त्र में वर्षा, भूकम्प, ग्रहण प्रभाव, ग्रह निर्माण का ज्ञान, यज्ञ के मूहूर्त, शकुन-अपशकुन, रत्न परीक्षण, अङ्ग लक्षण आदि का अध्ययन किया जाता है।’

महाभारत तथा ज्योतिष विज्ञान
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वैदिक युग में यज्ञादि धार्मिक कार्यों को सही समय पर करने के लिए ज्योतिष का विकास हुआ। वेदाङ्ग ज्योतिष में यज्ञों के सन्दर्भ में ज्योतिष की महत्ता को निम्नलिखित रूप व्यक्त किया गया है

वेदा हि यज्ञार्थमभि प्रवृत्ताः कालनुपूर्व्या विहिताश्च यज्ञाः ।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिष वेद सवेदयज्ञम् ।।’ ज्योतिष के महत्व का वर्णन पुनः वेदाङ्ग ज्योतिष में मिलता है, यथा –
यथा शिक्षा मयूराणां नागानां मणयो यथा। तद्वद् वेदाङ्गशास्त्राणां ज्योतिषं मूर्धानि स्थितम्।।’

रामायण काल में ज्योतिष विज्ञान अत्यन्त विकसित था। उस काल में ज्योतिषी को ‘लाक्षणिक’, ‘लक्षणी’, ‘कार्तान्तिक’, ‘गणक’ या ‘दैवज्ञ’ कहा जाता था। इस सन्दर्भ में अयोध्या काण्ड में सीता के वनवास की पूर्व-घोषणा ज्योतिषियों द्वारा उनके पितृ गृह में किये जाने का उल्लेख मिलता है। महाभारत के रचनाकार महर्षि वेदव्यास ने ज्योतिष के महत्व को स्पष्ट करते हुए अनुशासन पर्व में शिवसहस्रनामस्तोत्र में भगवान शिव का एक नाम ‘नक्षत्र विग्रह मतिः’ बताया है

ज्यो. पीयू. 2 सं. विज्ञा. पृ. 69 ३ वेदाङ् ज्यो. 4, नारदी. ज्यो. पृ. 2
पुरा पितृगृहे सत्यं वस्तव्यं किल में वने ।। लक्षणिभ्यो द्विजातिभ्यः श्रुत्वाहं वचनं गृहे। वा. रा. (अयो. का.) 29.8-9

जिसका अर्थ है – नक्षत्र, ग्रह, तारा आदि की गति को जानने वाले।’ महर्षि व्यास ने महाभारत में काल गणना का प्रारम्भ, विभिन्न मापें यथा – चतुर्युग, कल्प, मन्वन्तर आदि, आकाशीय गणना यंत्र, तिथि गणना का वैज्ञानिक विश्लेषण, ग्रहों के प्रभाव, फलित ज्योतिष यथा – मूहूर्त नक्षत्र, स्वप्न, व्रतोपवास, श्राद्ध आदि का विस्तृत उल्लेख किया है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में ज्योतिष विज्ञान अत्यन्त विकसित था।

महाभारत तथा काल ज्योतिष
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भारतीय ज्योतिष का प्राचीनतम इतिहास सुदूर भूतकाल के गर्भ में छिपा हुआ है। अतः प्राचीन वैदिक ग्रन्थों में तथा महाकाव्यों (रामायण तथा महाभारत) में इस विज्ञान का पर्याप्त उल्लेख मिलता है, जिससे उस काल में प्रचलित ज्योतिष विज्ञान की विकसित दशा का बोध होता है। आधुनिक समय में ज्योतिष के रूप में केवल फलित ज्योतिष को महत्व दिया जाता है जबकि प्राचीनकाल में काल ज्योतिष (गणित ज्योतिष) ही प्रधान माना जाता था।

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mahabharat krishi – 2

ज्योतिष की सबसे प्राचीन पुस्तक ‘वेदाङ्ग ज्योतिष’ में ‘ज्योतिष’ शब्द स्पष्टतः ‘गणित ज्योतिष’ (Astronomy) का सूचक है। आज विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि काल की गणना गति से तथा गति की गणना काल से होती है तथा ये दोनों अन्योन्याश्रित है। इस वैज्ञानिक सिद्धान्त का उल्लेख ऋग्वेद में प्राप्त होता है।

महाभारत में ज्योतिष विषयक तथ्यों का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। महर्षि व्यास ने महाभारत के शान्तिपर्व में काल की प्रबलता तथा महत्व का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में व्यास द्वारा युधिष्ठिर को समझाते हुए कथन है कि

नक्षत्र विग्रहमतिर्गुणबुद्धिर्लयोऽगमः।
महा. भा. अनु. पर्व. 17.59 2
याजुष’-वेदाङ्ग ज्यो.

में ‘ज्योतिष’ के स्थान पर ‘गणित’ पाठ है। अर्थात् – ‘ज्योतिष और ‘गणित’ शब्द एक दूसरे के परिपूरक हैं
द्वादशारं नहि तज्जराक्ष वर्वति चक्रं परिद्यामृतस्य । आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानि विंशतिश्वं तस्युः ।। ऋ.वे. 1.184.11

विधि के विधान से प्रेरित हो सभी क्षत्रिय काल के गाल में चले गये हैं। काल समस्त प्रजा वर्ग के कर्म का साक्षी है। वही मनुष्य के कर्मों का फल समयानुसार प्रदान करता है। अतः इस वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में

‘काल’ अर्थात् ‘समय’ के महत्व से सभी भली-भांति परिचित थे।

श्रीमद्भागवत में लिखित एक प्रसङ्गानुसार, राजा परीक्षित द्वारा महामुनि शुकदेव के प्रति यह प्रश्न किया गया कि काल क्या है ? उसका सूक्ष्मतम और महत्तम रूप क्या है ? इसका उत्तर देते हुए शुकदेव का कथन है कि “विषयों का रूपान्तर (बदलना) ही काल का आकार है। उसी को निमित्त बना वह काल तत्त्व अपने को अभिव्यक्त करता है। वह अव्यक्त से व्यक्त होता है। इस कथन के अनुसार काल अमूर्त तत्त्व है तथा घटने वाली घटनाओं से ही इसे ज्ञात किया जा सकता है।

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आज भी विज्ञान इस तथ्य को स्वीकार करता है।
महर्षि वेदव्यास ने शान्ति पर्व में भीष्म पितामह और युधिष्ठिर के संवाद में काल का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में भीष्म द्वारा दूरदर्शी, तत्कालज्ञ और दीर्घसूत्री-इन तीन मत्स्यों का दृष्टान्त देते हुए काल को परिभाषित किया गया है, जिसके अनुसार काष्ठा, कला, मूहूर्त, दिन, रात, लव, मास, पक्ष, छः ऋतुएं, संवत्सर

और कल्प इन्हें ‘काल’ कहा जाता है तथा पृथ्वी को देश कहा जाता है। इनमें से पृथ्वी का तो दर्शन होता है किन्तु काल दिखायी नहीं देता है। अतः अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि के लिए जिस देश और काल को उपयोगी मानकर उसका विचार किया जाता है, उसको ठीक-ठीक ग्रहण करना चाहिए। मनुष्यों में काल को ही कार्य-सिद्ध हेतु देश और काल को प्रधान माना गया है तथा धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और मोक्षशास्त्र में भी इन देश और काल को कार्य सिद्धि का प्रधान उपाय माना
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काङ्क्षमाणाः श्रियं कृत्स्नां पृथिव्यां च महद् यशः । कृतान्तविधिसंयुक्ताः कालेन निधनं गताः ।। कर्मसूत्रात्मकं विद्धि साक्षिणं शुभपापयोः । सुख दुःखगुणोदकं कालं कालफलप्रदम् ।।
महा. भा. शान्ति पर्व 33.15-19 2 भा. विज्ञा. उज्ज्व. परं पृ. 83

गया है। अतः जो मनुष्य सोच-विचार कर तथा सतत् सावधान होकर, अपने अभीष्ट देश और काल का ठीक-ठीक उपयोग करता है, वह उनके सहयोग से इच्छित फल प्राप्त कर लेता है। इस वर्णन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में काल के महत्व और उसके उचित उपयोग से सभी भली-भांति परिचित थे।

महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के शान्ति पर्व में काल गणना हेतु सूक्ष्म माप का वर्णन किया है। इस पर्व में महर्षि व्यास द्वारा अपने पुत्र शुकदेव को काल के विभाग को समझाते हुए कथन हैं –

काष्ठा निमेषा दशपञ्च चैव
त्रिंशत्रु काष्ठा गणयेत् कलांताम्। त्रिंशत्कालश्चापि भवेन्मूहूर्ता
भागः कलाया दशमश्चयः स्यात्।। त्रिंशन्मूहूर्त तु भवेदहश्च
रात्रिश्च संख्या मुनिभिः प्रणीता। मासः स्मृतोरात्र्यहनीच त्रिंशत्
संवत्सरो द्वादशमास उक्तः ।।

अर्थात् पंद्रह निमेष की एक काष्ठा और तीस काष्ठा की एक कला गिननी चाहिए। तीस कला का एक मूहूर्त होता है। उसके साथ कला का दसवां भाग और सम्मिलित होता है अर्थात् तीस कला और तीन काष्ठा का एक मूहूर्त होता है।

तीस
काष्ठाः कला मूहूर्ताश्च दिवा रात्रिस्तथा लवाः । मासाः पक्षाः षड्ऋतृवः कल्पः संवत्सरास्तथा।। परीक्ष्यकारी युक्तश्च स सम्यगुपपादयेत् । देशकालवीभप्रेतौ ताभ्यां फलमवाप्नुयात् ।।
महा. भा. शान्ति. पर्व. 137.21-24 2 महा. भा. शान्ति पर्व. 231.12-13
,

मूहूर्त का एक दिन-रात होता है। महर्षियों ने दिन और रात्रि के मूहूर्तों की संख्या उतनी ही बतायी है। तीस रात-दिन का एक मास और बारह मासों का एक संवत्सर बताया गया है। इस वर्णन के अनुसार व्यास ऋषि ने गणना करते हुए कहा है –
1 काष्ठा

15 निमेष 30 काष्ठा 303 कला 30 मूहूर्त 30 दिन

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1 कला 1 मूहूर्त 1 दिन
1 मास 1 संवत्सर (वर्ष)

12 मास

यहां महाभारतकार ने काल की सामान्य इकाई (माप) बतायी है।
इस काल का सूक्ष्मतम अंश परमाणु तथा महत्तम अंश ब्रह्म आयु माना गया है। इसे विस्तृत रूप में बताते हुए शुकमुनि उसके विभिन्न मापों का उल्लेख करते हैं यथा –

2 परमाणु 3 अणु 3 त्रसरेणु 100 त्रुटि 3 वेध
1 अणु – 1 त्रसरेणु – 1 त्रुटि – 1 वेध – 1 लव – 1 निमेष – 1क्षण – 1 काष्ठा – 1 लघु
15 लघु –
2 नाड़िका 30 मूहूर्त 7 दिन रात – 2 सप्ताह
1 नाड़िका 1 मूहूर्त 1 दिन रात 1 सप्ताह
1 पक्ष
2 पक्ष
1 मास
2 मास
1 ऋतु
3 लव 3 निमेष 5 क्षण 15 काष्ठा

ऋतु

1 अयन
2 अयन
1 वर्ष
शुकमुनि की उपर्युक्त गणना के अनुसार एक दिन रात में 3280500000 परमाणु काल होता है तथा एक दिन रात में 86400 सेकेण्ड होते हैं। इसका अर्थ है सूक्ष्मतम माप अर्थात् –

1 परमाणु काल = 1 सेकेण्ड का 37968वां हिस्सा।’
प्राचीन भारत में काल विभाजन अत्यन्त सूक्ष्मता के साथ किया गया था। ई. स. 1564-1642 में ‘गैलिलियो द्वारा पहली बार समय का विभाजन ‘सेकेण्ड’ के रूप में किया गया ऐसा पाश्चात्य विद्वानों का अभिप्राय है, किन्तु महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में सेकण्ड का भी विभाजन कर व्यक्त किया है।

प्राचीन काल में अमरकोष, विष्णुपुराण, मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में भी समय की गणना दिखाई देती है। यथा – नीचे निम्नवत् तालिका है –
1/4 निमेष = 1 त्रुटि 2 त्रुटि = 1 लव 2 लव = 1 निमेष 5 निमेष = 1 काष्ठा 10 काष्ठा = 1 कला 40 कला = 1 नाडिका
2 नाडिका = 1 मूहूर्त 15 मूहूर्त = 1 अहोरात्र 7 अहोरात्र = 1 सप्ताह 15 अहोरात्र = 1 पक्ष
2 पक्ष
= 1 मास
12 मास
= 1 वर्ष

प्राचीनकाल में दिनों और मासों का नाम निश्चित करने के लिए भी चन्द्रमा की कलाओं ग्रहों और नक्षत्रों की गति पर आधारित पूर्णतया वैज्ञानिक पद्धति विकसित की गई थी। अतः यह जानकर आश्चर्य होता है कि काल का यह अतिसूक्ष्म ज्ञान कैसे सम्भव हो सका होगा ? वेदाङ्ग ज्योतिष तथा ज्योतिष के तत्कालीन अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों के अतिरिक्त इसका उल्लेख कल्प सूत्र, निरूक्त, व्याकरण ग्रन्थों मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति तथा महाभारत में भी मिलता है।’

भा. विज्ञा. उज्ज्व. परं. पृ. 84 2 सं. विज्ञा. पृ. 80
काल ज्योतिष के विद्वानों के अनुसार, काल को मापने हेतु बड़ी इकाईयों (जैसे – युग, चतुर्युग, कल्प, मन्वन्तर तथा छोटी इकाईयों (जैसे – लव, निमेष, मूहूर्त आदि) की आवश्यकता होती है।

महाभारत युग में काल गणना हेतु बड़ी इकाईयों का प्रयोग प्रचलित था। प्राचीन ज्योतिषविदों के अनुसार, विश्व के जीवनकाल को चार युगों में बांटा गया है, यथा – कृत, त्रेता, द्वापर और कलियुग। आधुनिक समय में कलियुग चल रहा है। मनुस्मृति, पुराण और महाभारत के कथनानुसार यह माना जाता है कि कलियुग के अन्त में प्रलय होगा और तब नयी सृष्टि होगी। अतः प्रत्येक युग के आरम्भ में संध्या है और अन्त में सन्ध्यांश है। इस सन्दर्भ में वर्षों की संख्या निम्नलिखित हैं –
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कृत
2000
युग वर्ष
युग
वर्ष संध्या 400
संध्या 200 (सतयुग)
मुख्य भाग 4000 द्वापर
मुख्य भाग संध्यांश400
संध्यांश200 त्रेता ( संध्या 300
संध्या 100 __ मुख्य भाग 3000 कलि
मुख्य भाग संध्यांश 300
संध्यांश100 चारों युग मिलकर = 1 दैवयुग = 12,000 वर्ष

1000 दैवयुग = ब्रह्मा का 1 दिन 1000 इस वर्णन में जिन वर्षों की संख्या दी गयी है वे मानव वर्ष नहीं हैं अपितु दैव वर्ष है तथा प्रत्येक दैव वर्ष 360 मानव वर्षों के बराबर होता है।

महाभारत के शान्ति पर्व में महर्षि व्यास तथा शुकदेव के मध्य चारों युगों के वर्ष आदि की काल गणना का विस्तृत उल्लेख किया गया है। इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास का कथन है कि देवताओं के चार हजार वर्षों का एक कृत युग (सत्य युग) होता है। इस युग में चार सौ दिव्य वर्षों की संध्या तथा उतने ही वर्षों का एक संध्यांश भी होता है। संध्या और संध्यांशों सहित अन्य तीन युगों में यह संख्या क्रमशः एक-एक चौथाई घटती जाती है।’ इस कथन को गणित के नियमानुसार निम्नलिखित रूप से स्पष्ट किया जा सकता है –

देवताओं का सत्ययुग = 4000 वर्ष
400 दिव्य वर्ष (संध्या)
400 दिव्यवर्ष (संध्यांश) कुल सत्ययुग = 4800 वर्ष तथा क्रमानुसार प्रत्येक युग 1/4 वर्ष कम होता जाता है।
त्रेता युग = 4800 – 4800 x 1/4
4800 – 1200
3600 वर्ष द्वापर युग 3600-4800 x 1/4
3600 – 12000
2400 वर्ष कलियुग
2400 – 4800 x 1/4
2400 – 1200 = 1200 वर्ष

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इस तरह, संध्या तथा संध्यांशों सहित सत्य युग 4800 वर्षों का, त्रेतायुग 3600 वर्षों का, द्वापर युग 2400 वर्षों का और कलियुग 1200 वर्षों का होता है तथा कुल मिलाकर चारों युग 12000 वर्षों का होता है।

महर्षि वेदव्यास द्वारा पुनः शुकदेव के प्रति ब्रह्मा के दिन की काल गणना करते हुए कथन है कि देवताओं के बारह हजार वर्षों का एक चतुर्यग होता है, यह विद्वानों की मान्यता है। एक सहस्र चतुर्युग को ब्रह्मा का एक दिन बताया जाता है। इतने ही युगों की उनकी एक रात्रि भी होती है। भगवान ब्रह्मा अपने दिन के

ये ते रात्र्यहनी पूर्व कीर्तिते जीवलौकिके। तयोः संख्याय वर्षाग्रं ब्राह्मे वक्ष्याम्यहःक्षपे।।
इतरेषु ससंध्येषु संध्यांशेषु ततस्त्रिषु । एकपादेन हीयन्ते सहस्राणि शतानि च।।महा. भा. शान्ति पर्व 231.18-21

आरम्भ में संसार की सृष्टि करते हैं और रात में जब प्रलय का समय होता है, तब सबको अपने में लीन करके योगनिद्रा का आश्रय ले सो जाते हैं, फिर प्रलय का अन्त होने अर्थात् रात बीतने पर वे जाग उठते हैं। एक हजार चतुर्युग का जो ब्रह्मा का एक दिन बताया गया है और उतनी ही बड़ी जो उनकी रात्रि कही गयी है, उसको जो लोग ठीक-ठीक जानते हैं वे ही दिन और रात अर्थात् काल तत्त्व को जानने वाले हैं।’ इस वर्णन के अनुसार, व्यास ऋषि का कथन है कि
12000 वर्ष 1000 चतुर्युग 1000 चतुर्युग

1 चतुर्युग 1 दिन (ब्रह्मा का) 1 रात्रि (ब्रह्मा की)
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यहां भी वर्ष का तात्पर्य मानव वर्ष नहीं अपितु दैव वर्ष है। अतः इस कथन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में काल ज्योतिष का गूढ़ ज्ञान प्रचलित था। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के आदि पर्व में पांच वर्षों के एक युग का उल्लेख किया है।

इस सन्दर्भ में पाण्डवों के जन्म के प्रसङ्ग में ऋषि वैशम्पायन द्वारा जनमेजय के प्रति कथन है कि एक-एक वर्ष के अन्तर से उत्पन्न हुए कुरूओं में श्रेष्ठ पाण्डु के वे पांचों पुत्र (युग के) पांच वर्षों के समान लगते थे।’ इस वर्णन में पांचों पाण्डवों से पञ्च संवत्सरों की उपमा दी गयी है। इन पांचों वर्षों के युग की अपेक्षा बड़े युग की कल्पना महाभारत काल में पूर्ण हो गयी थी, इसमें संशय नहीं है।
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एतां द्वादशसाहस्री युगाख्यां कषयो विदु: सहस्रपरिवर्तं तद् ब्राह्म दिवसमुच्यते।।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदोजनाः ।। महा. भा. शान्ति पर्व 231.29-31

अनुसंवत्सरं जाता अपि ये कुरुसत्तमाः ।। पाण्डुपुत्रा व्यराजन्त पञ्च संवत्सरा इव।। महा. भा. आदि पर्व. 123.22 3 भा. ज्यो. इति. पृ. 71

महाभारतकार ने महाभारत में कहीं-कहीं चतुर्युग को सिर्फ युग कहा है। इस सन्दर्भ में महाभारत के वन पर्व में महर्षि मार्कण्डेय द्वारा चारों युगों की वर्ष–संख्या का वर्णन करते हुए युधिष्ठिर के प्रति कथन है कि बारह हजार दिव्य वर्षों का चतुर्युग होता है। यहां बारह सहस्रों की संज्ञा ‘युग’ है।

मनुस्मृति तथा अन्य ज्योतिष ग्रन्थों में भी यही गणना स्वीकार की गयी है। उनमें इतना और कह दिया गया है कि चतुर्युगों के बारह हजार वर्ष मानवी वर्ष नहीं है बल्कि देवताओं के वर्ष हैं। अर्थात्
मानवी एक वर्ष = देवताओं का एक दिन मानवी 360 वर्ष = देवताओं का एक वर्ष
इस सन्दर्भ में भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में भी ‘चतुर्युग’ की गणना का उल्लेख किया है।

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महाभारत तथा मानव शरीर विज्ञान

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