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महाभारत तथा पर्यावरण विज्ञान – 2 mahabharat mai paryavaran

महाभारतकार ने वृक्षों के महत्व को जानकर महाभारत में देवों, यक्षों तथा मानवों की सभाओं के वर्णन के प्रसङ्ग में नाना प्रकार के वृक्षों, लताओं आदि के लगाए जाने का उल्लेख किया है।

इस सन्दर्भ में यमराज की सभा’ वरूण की सभा’ तथा कुबेर (यक्ष) की सभा’ का उल्लेख सभा पर्व में मिलता है। महाभारतकार ने पर्यावरण की स्वच्छता तथा स्वास्थ्य वर्धन क्षमता को बनाये रखने के लिए गरों, महलों आदि के समीप वृक्ष, लता, कमलयुक्त पुष्करिणी के बनाये जाने का उल्लेख महाभारत में अनेक स्थानों पर किया है।

इस सन्दर्भ में मयासुर द्वारा सभा निर्माण के प्रसङ्ग में वैशम्पायन द्वारा जनमेजय के प्रति चर्चा की गयी है कि उस भवन के चारों ओर अनेक प्रकार के बड़े-बड़े वृक्ष लहलहा रहे थे, सदा फूलों से युक्त तथा शीतल छाया वाले थे। साथ ही भवन के चारों ओर वन, उपवन और बावलियां भी थीं। इससे प्रतीत होता है कि महाभारतकार ने पर्यावरण संरक्षण के सन्दर्भ में ही वृक्षारोपण करने की बात कही है।’

महाभारत तथा जल संरक्षण

तत्त्ववेत्ताओं के अनुसार मानव शरीर पञ्च तत्त्वों से मिलकर बना है – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश । मानव शरीर का 2/3 भाग और उसके समस्त भार का 4/5 भाग जल ही होता है। इसी प्रकार सभी वृक्षों जीव-जन्तुओं के शरीर में

पुण्यगन्धाः स्रजस्तक्य नित्यं कामफला द्रुमाः ।। महा. भा. सभा पर्व. 8.6

नीलपीतासितश्यामैः सितैर्लोहितकैरपि। अवतानैस्तथा गुल्मैर्मजरीजारिभिः।। महा. भा. सभा पर्व. 9.3

नलिन्याश्चालकाख्याया नन्दनस्य वनस्य च । शीतो हृदयसंद्धादी वायुस्तमुपसेवते ।।
महा. भा. सभा पर्व. 10.8

तां सभामभितौ नित्य पुष्पवन्तो महाद्रुमाः।
आसन् नानविधा लोलाः शीतच्छायां मनोरमाः ।। काननानि सुगन्धीनि पुष्करिण्यश्च सर्वशः। हंसकारण्डवो पेताश्चक्रवाकोपशोभितः ।। महा. भा. सभा पर्व. 3.34-35
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भी जल रहता है। अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि जल, प्राणियों के लिए अत्यावश्यक है।
प्राचीनकाल में वैदिक ऋषियों, शास्त्रकारों और विद्वानों ने पर्यावरण की शुद्धि बनाये रखने के लिये जल के महत्व का उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में किया है। संस्कृत वाङ्मय में जल को जीवन का पर्याय माना गया है। ऋग्वेद के मंत्रानुसार शुद्ध जल में अमृत तथा औषधि का निवास होता है।

यथा – अप्स्वन्तरममृत अप्सु भेषजम्।’

महाभारत काल में जल को नारायण का स्वरूप माना जाता था। इस सन्दर्भ में वन पर्व में भगवान बाल मुकुन्द ने अपने स्वरूप की चर्चा में मार्कण्डेय के समक्ष इसका उल्लेख किया है। महाभारत के शान्तिपर्व में तुलाधार तथा जाजलि संवाद में यह चर्चा की गयी है कि सभी नदियां सरस्वती देवी का रूप है। गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं को श्री भागीरथी गङ्गा के नाम से अभिव्यक्त किया है। अतः इस विवरण से प्रतीत होता है कि महाभारत काल में जल को देवता रूप में माना जाता था। इसी कारण धार्मिक भाव के आवरण में लोग जल की स्वच्छता, पवित्रता, संरक्षण आदि को विशेष महत्व देते थे। महाभारत काल में देवनदी गङ्गा का विशेष महत्व दिया जाता था। इसका कारण यह प्रतीत होता है कि गङ्गा नदी के जल में कीटाणु नहीं पड़ते हैं। आधुनिक वैज्ञानिकों ने अनुसंधान के फलस्वरूप यह स्वीकार किया है कि गङ्गा जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं जो जीवाणुओं तथा अन्य हानिकारक सूक्ष्म जीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। अतः इस नदी के जल में प्राणवायु (ऑक्सीजन) की मात्रा को बनाये रखने की असाधारण क्षमता होती है। अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में गङ्गा के इस

ऋ. वे. 1.30.19 2 तेन नारायणोऽप्युक्तो मम तत् त्वयनं सदा।

महा. भा. वन पर्व 189.3 ३ सर्वा नद्यः सरस्वत्यः सर्वे पुण्याः शिलोच्चयाः ।

महा. भा. शान्ति पर्व 263.42 झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जान्हवी ।।

गीता. 10.31

विशेष गुण से सभी भली-भांति परिचित थे। इसी कारण उसे देवनदी कहा जाता था। इस सन्दर्भ में गरूड़ पुराण में गङ्गा की विशेषता का उल्लेख मिलता है।’

महाभारतकार ने पर्यावरण की सुरक्षा के सन्दर्भ में जल के महत्व का उल्लेख महाभारत में अनेक स्थानों पर किया है। महाभारत के शान्ति पर्व में विश्वामित्र मुनि तथा चाण्डाल के संवाद में बिना जल से उत्पन्न सङ्कट का उल्लेख मिलता है।

इसके अनुसार, त्रेतायुग के समाप्त होने तथा द्वापर युग के प्रारम्भ होने के समय प्रजा के बहुत बढ़ जाने पर उस समय इन्द्र द्वारा वर्षा बन्द कर दी गयी। जिससे नदियां सरोवर, कुएं, छोटे-छोटे जलाशय सूख गये।

जलाभाव के कारण पौसल बन्द हो गये। खेत, गौशालाएं, बाजार-हाट, यज्ञ-उत्सव आदि नष्ट हो गये। नगर उजाड़ हो गये सर्वत्र उपद्रव उपस्थित होकर पृथ्वी का बहुत बड़ा भाग निर्जन हो गया। भूख-प्यास से व्याकुल जीव-जन्तु प्रायः समाप्त हो गये और बचे हुए प्राणी एक दूसरे पर आघात करने लगे। इस कथन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बिना जल से जीवन नष्ट हो जाता है। ऐसी शिक्षा देने के उद्देश्य से मानवों में पर्यावरण सन्तुलन बनाए रखने के लिए जल के महत्व को दर्शाया गया है।

महर्षि व्यास ने जल के महत्व के साथ-साथ जल संरक्षण अर्थात् जल संचय का भी उल्लेख महाभारत में किया है। इस सन्दर्भ में भीष्म तथा युधिष्ठिर के संवाद में जलाशय निर्माण की चर्चा की गयी है। जिसके अनुसार वर्षा के जल का संचय करना अत्यन्त पवित्र तथा पुण्यप्रद कार्य माना गया है। अतः भीष्म द्वारा यह कहा गया है कि वर्षा जल के संचय करने हेतु अधिक से अधिक जलाशय खुदवाने

यस्तु सूर्यांशुसन्तप्तं यो गङ्गम् सलिलं पिबेत् । स सर्वयोनिनिर्मुक्तः प्रयाति सदनं हरेः ।। ग. पु. 9.26 ‘

प्रजानामतिवृद्धानां युगान्ते समुपस्थिते ।
त्रेताविमोक्षसमये द्वापर प्रतिपादने।।
गतदैवतसंस्थाना वृद्धबालविनाकृता। गोजाविमहिषीहीना परस्परपराहता।महा. भा. शान्ति. पर्व 141.14-22

चाहिए साथ ही जितने समय तक तालाब में पानी भरा रहता है उतना ही अधिक पुण्य जलाशय बनवाने वाले को मिलता है। यदि कुछ महीनों तक ही पानी भरा रहे अर्थात् जलाशय कम गहरा हो, तो थोड़ा पुण्य और यदि अधिक गहरा जलाशय होने के कारण सदैव जल भरा रहे तो अत्यधिक पुण्य प्राप्त होता है।’

इस कथन से यह प्रतीत होता है कि महाभारतकार ने भूमिगत जल का स्तर नीचे न हो तथा जल सङ्कट न उत्पन्न हो इसी कारण ऐसा वर्णन किया है। साथ ही यहाँ महाभारतकार ने वर्षा के जल के संचय से बाढ़ आदि की समस्या न उत्पन्न हो ऐसा विचार करके ही यह सरल समाधान सुझाया है कि जलाशय बनवाओ। अतः जल संचय का यह उपाय वैज्ञानिक दृष्टि से उत्तम प्रतीत होता है। mahabharat mai paryavaran

जल की स्वच्छता को ध्यान में रखते हुए महाभारतकार ने शान्तिपर्व में वृत्तासुर के वध से उत्पन्न ब्रह्महत्या के दोष में इसकी चर्चा की है। इस सन्दर्भ में व्यास ने ब्रह्मदेव द्वारा यह कथन प्रस्तुत किया है कि जो भी मनुष्य अपनी बुद्धि की मन्दता के कारण जल में थूक, खंखार या मलमूत्र डालेगा उसे ब्रह्महत्या का पाप लगेगा।

अतः इस कथन से प्रतीत होता है कि महाभारतकार ने धर्म के आवरण में जल को स्वच्छ बनाये रखने की शिक्षा प्राणियों को दी है। जल की स्वच्छता के सन्दर्भ में अनुशासन पर्व में आयु की वृद्धि और क्षय करने वाले कर्मों की चर्चा भीष्म तथा युधिष्ठिर के मध्य की गयी है,

जिसमें प्रकारान्तर से यह कहा गया है कि दीर्घायु की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को बोये हुए खेत में, गांव के आस-पास पानी में, देव मन्दिर में, गौओं के समुदाय में, देव सम्बन्धी वृक्ष तथा विश्राम स्थान के

वर्षाकाले तडागे तु सलिलं यस्य तिष्ठति ।
अग्निहोत्रफलं तस्य फलमाहुर्मनीषिणः।।
सर्वदानैर्गुरूतरं सर्वदानैर्विशिष्यते। पानीयं नरशार्दूल तस्माद् दातव्यमेव हि।। – महा. भा. अनु. पर्व 58.10-21

अल्पा इति मतिं कृत्वा यो नरो बुद्धिमोहिता।। श्लेष्म मूत्र पुरीषाणि युष्मासु प्रतिमोक्ष्यति ।। तमियं यास्यति क्षिप्रं तत्रैव च निवत्स्यति। तथा वो भविता मोक्ष इति सत्यं ब्रवीमि वः | महा. भा. शान्ति पर्व 282.54-55

निकट तथा बढ़ी हुई खेती में, कभी मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए।’ इस कथन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महर्षि व्यास ने पर्यावरण संरक्षण के सन्दर्भ में ही इसका उल्लेख किया है क्योंकि इस तथ्य से वे सर्वथा परिचित थे कि सार्वजनिक स्थानों पर मलमूत्र, थूक आदि डालने पर इन स्थानों की पवित्रता तथा स्वास्थ्यवर्धक पर्यावरण की क्षति होती है।

इसके कारण रोगाणुओं को पनपने का अवसर मिलता है और नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। आधुनिक चिकित्सकों तथा विद्वानों के अनुसार ऐसी स्थिति में पीलिया, टाइफाइड, हैजा आदि रोग फैलते हैं। अतः यहाँ धर्म के आवरण में महाभारतकार ने भीष्म के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का उल्लेख किया है।

प्राचीन ग्रन्थों जैसे – वेद, पुराण, शास्त्र आदि में जल की शुद्धि के अनेक निर्देश प्राप्त होते हैं। इस सन्दर्भ में वृहत्संहिता में प्रदूषित जल के शोधन की विधि का वर्णन मिलता है। ब्रह्मपुराण में गङ्गा को स्वच्छ रखने के निर्देश दिये गये हैं।’

महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में श्रीकृष्ण द्वारा उतङ्ग मुनि को मरू प्रदेश में
जल प्राप्त होने का वरदान दिये जाने का उल्लेख मिलता है। इस कथानक के अनुसार श्रीकृष्ण ने महर्षि उतङ्ग से वर मांगने को कहा, इस पर महर्षि उतङ्ग ने अपने लिये कुछ न मांगकर भगवान् श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि इस मरूभूमि में जल

नोत्सृजेत पुरीषं च क्षेत्रे ग्रामस्य चान्तिके। उभे मूत्रपुरीषे तु नाप्सु कुर्यात् कदाचन् । देवालयेऽथ गोवृन्दे चैत्ये सत्येषु विश्रमे। महा. भा. अनु. पर्व. 104.54 2

अंजनमुस्तरोशीरैः शराजकोशातकामलकचूर्णैः।।
कतकफलससमायुक्तैर्योगः कूपे प्रदातव्यः ।।। कलुष कटुकं लवणं विरसं, सलिलं यदि वाशुमगन्धि भवेत् । तदनेन भवत्यमलं सुरसं, सु-सुगन्धिगुणैरपरैश्च युतम् ।। बृहत. सं. 58.121-22

न दन्तधावनं कुर्यात् गङ्गागर्भे विचक्षणः । परिधायाम्बराम्बूनि गङ्गा स्रोतसि न त्यजेत् ।। सं. वाङ् विज्ञा. पृ. 19

अत्यन्त दुर्लभ है। अतः इस मरूभूमि में कोई प्यासा न रहे ऐसा वर दें।’ आधुनिक समय में भी श्रीकृष्ण के इस वरदान का प्रभाव थार मरूभूमि में जैसलमेर के निकट देखने को मिलता है।

आज भी कम वर्षा तपती रेत और प्रतिकूल परिस्थितियों के अतिरिक्त वहां के लोगों में जल की एक-एक बूंद को संग्रह करने की अद्भुत प्रतिभा है। यहाँ वास्तविकता में जल देवस्वरूप है तथा जलस्रोत तीर्थ है।

थार क्षेत्र में जल की प्रत्येक बूंद का बहुत ही व्यवस्थित उपयोग करने की आस्थाएं विकसित हैं। जल संरक्षण के प्रति इतनी चेतना भगवान् श्रीकृष्ण के वरदान का ही प्रतिफल प्रतीत होती है।

महाभारत तथा यज्ञ

प्राचीन वैदिक युग से ही पर्यावरण की स्वच्छता के प्रति ऋषि, मुनि, शास्त्रकार आदि चिन्तनशील तथा प्रयत्नशील थे। उस काल में पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त बनाये रखने के लिए अनेक उपाय अपनाये जाते थे जैसे – वृक्ष लगाना, यज्ञ करना, वन्य जीवों की रक्षा करना आदि।

प्राचीन काल में यज्ञ को पर्यावरण शुद्धि का प्रमुख उपाय माना जाता था। यह परम्परा वैदिक काल, रामायण काल तथा महाभारतकाल तक निरन्तर चलती रही है। वेदों, संहिताओं, उपनिषदों आदि

प्राचीन ग्रन्थों में यज्ञ के महत्व की विस्तृत चर्चा मिलती है।
यज्ञ द्वारा न केवल फसल प्रचुर तथा सुस्वादु होती है, वरन् प्रकृति में वानस्पतिक अनुपात बना रहता है।

इसके कारण वृक्ष, वनस्पति आदि फलते-फूलते हैं तथा इससे नाना प्रकार के अप्रत्यक्ष लाभ भी होते हैं। जैसे – वर्षा का होना, रेगिस्तान का विस्तार न होना, वातावरण में ऑक्सीजन (O2) की प्रचुरता बने रहना
आदि। इस सन्दर्भ में यजुर्वेद में निम्नलिखित वर्णन मिलता है यथा –

अवश्यं करणीयं च यद्येतन्मन्यसे विभो। तोयमिच्छामि यत्रेष्टं मरूष्वेतद्धि दुर्लभम् ।। ततः संहृत् तत् तेजः प्रोवाचोत्तङ्कमीश्वरः । एष्टव्ये सति चिन्त्योऽहमित्युक्तवा द्वारकां यथौ। महा. भा. आश्व. पर्व 55.13-14 mahabharat mai paryavaran

सं. वाङ् पर्या, पृ. 15
ऊर्जा वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिस्रुतम् । स्वधा स्थतर्पयत मे पितृन्।’

ऋग्वेद का प्रथम मंत्र भी यज्ञ प्रक्रिया का ही बोध कराता है, यथा –
अग्निमीडे पुरोहितम् यज्ञस्य देवम् ऋत्विजं । होतारं रत्नधातमम् ।।

इसमें वर्णमाला के सब अक्षर प्रयुक्त हुए हैं। इसमें अग्नि को यज्ञ के दूत के रूप में व्यक्त किया गया है। यज्ञ आर्यों की अपनी विशिष्ट पद्धति है। आर्य यज्ञ कुण्ड के चारों ओर पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करते थे और पदार्थों से प्राप्त नाना प्रकार की गैसों का उपयोग प्रदूषण हटाने हेतु, खाद प्राप्त करने हेतु, रोगों की चिकित्सा और वर्षा कराने हेतु करते थे।

महाभारत काल में भी यज्ञ का अत्यधिक महत्व था। महर्षि व्यास ने महाभारत में अनेक स्थानों पर ‘यज्ञ’ का उल्लेख किया है। यज्ञ के महत्व को स्पष्ट करने के लिए महर्षि व्यास ने भगवान श्रीकृष्ण के वचनों में उन्हें यज्ञ का स्वरूप ही व्यक्त किया है।

जिसमें श्रीकृष्ण ने स्वयं को यज्ञों में ‘जपयज्ञ, तथा ‘यज्ञपुरूष’ के नाम से अभिव्यक्त किया है। इससे स्पष्ट होता है कि श्रीकृष्ण ने स्वयं को यज्ञ के समस्त अङ्ग – मंत्र, घृत, अग्नि, औषधि, हविष्यान्न तथा स्वधा बताया है। अतः यह कहा जा सकता है कि भगवान नारायण ही सम्पूर्ण साङ्गोपाङ्ग यज्ञ हैं तथा भगवान के चौबीस अवतारों में यज्ञ पुरूष का अवतार प्रमुख है।

यजु. वे. 2.34 2 ऋ.वे. ३ भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् | सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मा शान्तिमृच्छति ।।

गीता. 5.29 अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽस्महमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ।।

गीता. 9.16

सम्पूर्ण देव-समुदाय भगवान् नारायण का ही अंश है। अतः यज्ञ चाहे इन्द्र का हो, चाहे रूद्र का हो, चाहे चण्डी देवी का हो अन्ततः उस यज्ञ में समर्थन भगवान नारायण का ही होता है। ऐसा गीता में श्रीकृष्ण ने मुनि के प्रति कहा है।’

महाभारत काल में यज्ञ के वैज्ञानिक महत्व से लगभग सभी भली-भांति परिचित थे। महाभारतकार ने यज्ञ की वैज्ञानिकता स्पष्ट करते हुए गीता में श्रीकृष्ण के द्वारा कहलाया है कि समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है,

वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है।’ यहाँ स्पष्ट हो जाता है कि यज्ञ के धुएं से उत्पन्न मेघ, वृष्टि करने की क्षमता रखते हैं या यह भी कहा जा सकता है कि यज्ञ के धुएं से बादल बनते हैं, जिसके कारण वर्षा होती है,

इस वर्षा से खेतों की सिंचाई स्वतः हो जाती है और इससे अन्न उत्पन्न होता है। “पर्यावरण की सुरक्षा के लिए न केवल पंच महाभूतों की पवित्रता कायम रखने के निर्देश हैं बल्कि धरती के पर्यावरण की” mahabharat mai paryavaran

यज्ञ एक विज्ञान है, बाह्य दृष्टि रखने वालों के लिए इसका धार्मिक महत्व भले ही नगण्य हो, परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से यज्ञ एक स्वतंत्र विज्ञान है। इसके प्रत्येक क्रिया-कलाप का अपना महत्व है तथा इसका पूर्ण निर्वाह और समस्त फल इन विधानों के उचित अनुष्ठान पर ही आश्रित होता है।

यज्ञ में औषधि युक्त हविद्रव्य से जो वातावरण निर्मित होता है वह पर्यावरण के लिए उपयोगी होता है। इस प्रकार के वातावरण से अनेक प्रकार के रोग, कृमि

और विषैली गैसों का शमन होता है। यज्ञ ही प्रकृति के स्थूल तत्त्वों में शक्ति और सुगन्ध भरता है। जिस प्रकार वृक्ष मानव द्वारा निष्कासित कार्बन डाई ऑक्साइड

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ।। गीता. 9.23

अन्नाद्भावति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म समुद्भवः ।।
गीता3.14

सूर्यः सोमो महीपुत्रः सोमपुत्रो बृहस्पतिः ।
शुक्रः शनैश्चरो राहू: केतुश्चेति ग्रहाः स्मृताः।। याज्ञव. स्मृ. 1.226

(CO2) को ग्रहण करता है तथा वातावरण शुद्ध करता है उसी प्रकार यज्ञ में आहूत करने वाले तत्त्वों (घी, अन्न, विभिन्न औषधियों) से उत्पन्न धुआं भी वायुमण्डल को दोषमुक्त करता है। इसके फलस्वरूप मनुष्य की प्राणशक्ति बल तथा ऊर्जा से सम्पन्न हो जाती है और आरोग्य तथा आयु की वृद्धि करती है।

यज्ञ द्वारा शुद्ध वायु श्वास द्वारा फेफड़ों में पहुंचती है तो मनुष्य के शारीरिक दोष दूर होते हैं और यदि वृक्षों को दूषित वायु प्राप्त हो तो वे भी निश्चित रूप से दूषित ऑक्सीजन प्रदान करेंगे। आधुनिक समय में दूषित वायु से नाना प्रकार के रोग जैसे – दमा, कास, खांसी आदि फैल रहे हैं।

अतः संस्कृत ग्रन्थों में यह उल्लेख मिलता है कि यज्ञ से उत्तम तथा विविध गुणों से युक्त वृष्टि जल निर्माण होने से वह जल कृषि उत्पादन में गुणात्मक (Qualitative) तथा संख्यात्मक (Quantitative) दोनों प्रकार की वृद्धि करता है।

यद्यपि कल-कारखानों द्वारा निर्मित खाद तो जहां डाली जाती है वहीं फल देती है तथापि यज्ञ की कार्य प्रणाली का प्रभाव विशालक्षेत्र में फैल जाता है।

यज्ञ की वैज्ञानिकता इस बात से और भी पुष्ट हो जाती है कि इसके द्वारा नाना प्रकार के रोगों की चिकित्सा हो जाती है।

यथा – वात रोग चिकिसा के लए अपनाये गये यज्ञोपचार से प्रसिद्ध यज्ञ वैज्ञानिक श्री पं. वीरसेन वेदश्रमी ने दिसम्बर 1979 में दो वात रोगियों (श्री पं. केदारनाथ तथा वेदमित्र) को स्वस्थ किया। इस सन्दर्भ में मासिक पत्रिका ‘जनज्ञान’ के जनवरी 80 अङ्क में पृष्ठ 48-49 पर छपा है।

अथर्ववेद में रोगी के जीवन की रक्षा हेतु ज्ञात तथा अज्ञात रोगों और राज्यक्ष्मा आदि की चिकित्सा के सन्दर्भ में यज्ञ किये जाने का उल्लेख मिलता है।

प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित यज्ञ के वैज्ञानिक महत्व का विस्तृत विवेचन महाभारत में मिलता है। इस सन्दर्भ में गीता में श्रीकृष्ण ने ब्रह्मदेव के वचनों की चर्चा करते वै. वाङ् विज्ञा. पृ. 135 2 मुंचाभित्वा हविषा जीवनाय कमज्ञात यक्ष्मदुत राजयक्ष्मात् । अथर्व. वे. 3.11

हुए कहा है कि कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर ब्रह्मदेव को उनके प्रति कथन है कि तुम सभी इस यज्ञ द्वारा ही वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ ही तुम सभी को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो।

तुम सभी यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम्हें उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम सभी परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे। mahabharat mai paryavaran

यज्ञ के द्वारा बढ़ाये हुए देवता तुम सभी को बिना मांगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरूष उनको दिये बिना स्वयं भोगता है,

वह चोरी ही कहलाता है।’ इस वर्णन में परस्पर पोषण और समभागीदारी का सिद्धान्त प्रतिपादित हुआ है। इसे यज्ञ कहा गया है। यज्ञ साधना का प्रयोजन प्रकृति के चक्र को बनाये रखना है।

अतः हितकारी तथा उपयोगी वस्तुओं का आदान-प्रदान अनिवार्य हो जाता है। जो इस सिद्धान्त का उल्लंघन करता है वह चोर कहलाता है। अर्थात् जिस प्रकार किसी व्यक्ति को कोई वस्तु दी जाये और वह उसे न लौटा पाये तो वह चोर कहलाता है।

उसी प्रकार प्रकृति हमें शुद्ध हवा पानी अन्न आदि प्रदान करती है। अतः हमारा परम कर्तव्य है कि हम वायु-जल आदि को प्रदूषित न करें। अन्यथा प्राकृतिक सन्तुलन बिगड़ जाएगा और सभी के समक्ष जीवन संकट उपस्थित हो सकता है। इस सन्दर्भ में गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है।

महाभारतकार ने यज्ञ की महत्ता को जानकर महाभारत में अनेक स्थानों पर यज्ञों का उल्लेख किया है यथा – सभापर्व में युधिष्ठिर द्वारा राजसूय यज्ञ’, ‘ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्ट काम धुक् ।। तैर्दत्तान प्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ।। – महा. भा. भीष्म पर्व. 27.10-12 (गीता 3. 10-12)

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ।। गीता. 3.16 3 महा. भा. आश्वमे. पर्व. 85. 4-42

आश्वमेधिक पर्व में प्रजा का कल्याण करने हेतु महर्षि अगस्त्य द्वारा बारह वर्षों तक यज्ञ’ किये जाने का उल्लेख आदि। mahabharat mai paryavaran

इस प्रकार समस्त विवरण से स्पष्ट होता है कि यज्ञ, धर्म, संस्कृति और चिन्तन का आधार स्तम्भ है। भारतीय यज्ञ की प्रक्रिया की सृष्टि की उत्पत्ति और स्थिति का आधार है। यज्ञ वह विधि है जिससे प्रकृति और प्राकृतिक जगत् में आवश्यक सन्तुलन बना रहता है।

यज्ञ विश्व में प्रतिक्षण चलता रहता है। अतएव यजुर्वेद में, अथर्ववेद में तथा ऋग्वेद में यज्ञ को सृष्टि-चक्र या विश्व की नाभि कहा गया है। इस प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए ऋग्वेद में कहा गया है कि यज्ञ के द्वारा धुलोक को प्रसन्न किया जाता है और धुलोक वर्षा के द्वारा पृथ्वी को तृप्त करता है। यज्ञ से मेघ बनते हैं, और मेघ से वर्षा होती है।’

अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में यज्ञ के द्वारा पर्यावरण शुद्धि की वैज्ञानिक चेतना का ज्ञान वैदिक काल से चला आ रहा
था। महा. भा. आश्वमे. पर्व 92.5-38

अयं यज्ञ भुवनस्य नाभि । – ऋ. वे. 1.164.35; यजु.वे. 23.62
अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः | – अथर्व, वे. 8.10.14 ३ भूमिं पर्जन्या जिन्वन्तिदिवं जिन्वन्त्यग्नयः। – ऋ. वे. 1.164.51 mahabharat mai paryavaran

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