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महाभारत तथा ज्योतिष विज्ञान

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भारतीय ज्योतिष विश्व का अत्यन्त प्राचीन विज्ञान है। वैज्ञानिकों के मतानुसार, पृथ्वी सूर्य का अंश है तथा सूर्य की गतिविधि का प्रभाव पृथ्वी पर स्थित प्राणियों पर पड़ता है। अतः प्राचीन काल से ही मनष्य, सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहों के रहस्यों के समाधान ढूंढ रहा है। ज्योतिष का साक्षात् सूर्य की रश्मियों से सम्बन्ध होने के कारण यह अति प्राचीन क्रमबद्ध तथा लोकोपयोगी विज्ञान है। यह विज्ञन के समान अपने समस्त तथ्यों को प्रमाणित रूप में व्यक्त करता है साथ ही विज्ञान का विशेष गुण प्रत्यक्ष प्रमाण का होना भी ज्योतिष शास्त्र को ज्योतिष विज्ञान बना देता है। चन्द्रशेखरन ने ज्योतिष को प्रत्यक्ष शास्त्र माना है।

ज्योतिष विज्ञान सामान्य परिचय

ज्योतिष एक महान शास्त्र है, जिसमें ग्रह नक्षत्र आदि की गति और स्थिति का अध्ययन किया जाता है। आकाश में स्थित ज्योतिपिण्डों के संचार और उनसे बनाने वाले गणितगत पारस्परिक सम्बन्धों के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करने वाली विद्या का नाम ‘ज्योतिषशास्त्र’ है।

अप्रत्यक्षाणि शास्त्राणि विवादस्तेषुकेवलम् । प्रत्यक्षं ज्योतिष शास्त्रं चन्द्राकौयस्य साक्षिणौ।। जात. सार. पृ. 5
कि नभोमण्डल में स्थित विविध ज्योतिषियों से सम्बन्धित विद्या को ज्योतिर्विद्या कहते
प्राचीन ऋषियों तथा विद्वानों के मतानुसार ज्योतिष शास्त्र षड्वेदाङ्गों में से एक है, यथा –

शिक्षा,

कल्प,

व्याकरण,

ज्योतिष,

निरूक्त,

छन्द

चूंकि वेद अपौरूषेय है अतः वेदाङ्ग भी अपौरूषेय माने गये हैं। वेदों में अनेक स्थानों पर ज्योतिष विज्ञान का वर्णन मिलता है। यथा – ऋग्वेद में बारह राशियों का वर्णन’, यजुर्वेद में नक्षत्रदश (ज्योतिषी) का वर्णन’, छान्दोग्य उपनिषद में नक्षत्र विद्या का वर्णन आदि। षड्वेदाङ्गों में ज्योतिष शास्त्र को नेत्रस्थानीय माना गया है। इस सन्दर्भ में श्रीमद् भास्कराचार्य का कथन है –
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शब्द शास्त्रं मुखं ज्योतिषं चक्षुषी, श्रोत्रमुक्तं निरूक्तं कल्पः करौ। या तु शिक्षास्य वेदस्य सा नासिका, पादपद्मयछन्द आद्यैर्बुधैः ।।
ज्योतिष शास्त्र के प्रमुख रूप से दो भाग हैं –

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काल ज्योतिष 2. फलित ज्योतिष।

काल ज्योतिष को ‘गणित ज्योतिष’ भी कहा जाता है। इसमें सिद्धान्त, करण तथा तंत्र तीन शाखाएं हैं। इसके अनुसार सृष्टि के आरम्भ से अब तक बीते गये वर्ष, मास, दिन, वर्ष अयन, ऋतु, ग्रहों की गति, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, नक्षत्र, योग-करण आदि का अध्ययन किया जाता है। हजारों वर्ष पूर्व ज्योतिष विज्ञान की इस शाखा में भारतीय आचार्यों ने सिद्धता प्राप्त कर अनेक सिद्धान्त ग्रन्थों की रचना की थी। यह खगोल ज्ञान है जिसे आधुनिक विज्ञान में Astronomy कहते हैं। फलित ज्योतिष के दो स्कन्ध माने गये हैं –

होरा तथा संहिता।

होरा शास्त्र के अनुसार मनुष्य के जन्म से मृत्युपर्यन्त जीवन की घटनाओं की फलित के अनुभूत सिद्धान्तों के अनुसार व्याख्या की जाती है। इसका दार्शनिक आधार पुनर्जन्म और कर्मवाद है। संहिता शास्त्र में वर्षा, भूकम्प, ग्रहण प्रभाव, ग्रह निर्माण का ज्ञान, यज्ञ के मूहूर्त, शकुन-अपशकुन, रत्न परीक्षण, अङ्ग लक्षण आदि का अध्ययन किया जाता है।’

महाभारत तथा ज्योतिष विज्ञान
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वैदिक युग में यज्ञादि धार्मिक कार्यों को सही समय पर करने के लिए ज्योतिष का विकास हुआ। वेदाङ्ग ज्योतिष में यज्ञों के सन्दर्भ में ज्योतिष की महत्ता को निम्नलिखित रूप व्यक्त किया गया है

वेदा हि यज्ञार्थमभि प्रवृत्ताः कालनुपूर्व्या विहिताश्च यज्ञाः ।
तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिष वेद सवेदयज्ञम् ।।’ ज्योतिष के महत्व का वर्णन पुनः वेदाङ्ग ज्योतिष में मिलता है, यथा –
यथा शिक्षा मयूराणां नागानां मणयो यथा। तद्वद् वेदाङ्गशास्त्राणां ज्योतिषं मूर्धानि स्थितम्।।’

रामायण काल में ज्योतिष विज्ञान अत्यन्त विकसित था। उस काल में ज्योतिषी को ‘लाक्षणिक’, ‘लक्षणी’, ‘कार्तान्तिक’, ‘गणक’ या ‘दैवज्ञ’ कहा जाता था। इस सन्दर्भ में अयोध्या काण्ड में सीता के वनवास की पूर्व-घोषणा ज्योतिषियों द्वारा उनके पितृ गृह में किये जाने का उल्लेख मिलता है। महाभारत के रचनाकार महर्षि वेदव्यास ने ज्योतिष के महत्व को स्पष्ट करते हुए अनुशासन पर्व में शिवसहस्रनामस्तोत्र में भगवान शिव का एक नाम ‘नक्षत्र विग्रह मतिः’ बताया है

ज्यो. पीयू. 2 सं. विज्ञा. पृ. 69 ३ वेदाङ् ज्यो. 4, नारदी. ज्यो. पृ. 2
पुरा पितृगृहे सत्यं वस्तव्यं किल में वने ।। लक्षणिभ्यो द्विजातिभ्यः श्रुत्वाहं वचनं गृहे। वा. रा. (अयो. का.) 29.8-9

जिसका अर्थ है – नक्षत्र, ग्रह, तारा आदि की गति को जानने वाले।’ महर्षि व्यास ने महाभारत में काल गणना का प्रारम्भ, विभिन्न मापें यथा – चतुर्युग, कल्प, मन्वन्तर आदि, आकाशीय गणना यंत्र, तिथि गणना का वैज्ञानिक विश्लेषण, ग्रहों के प्रभाव, फलित ज्योतिष यथा – मूहूर्त नक्षत्र, स्वप्न, व्रतोपवास, श्राद्ध आदि का विस्तृत उल्लेख किया है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में ज्योतिष विज्ञान अत्यन्त विकसित था।

महाभारत तथा काल ज्योतिष
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भारतीय ज्योतिष का प्राचीनतम इतिहास सुदूर भूतकाल के गर्भ में छिपा हुआ है। अतः प्राचीन वैदिक ग्रन्थों में तथा महाकाव्यों (रामायण तथा महाभारत) में इस विज्ञान का पर्याप्त उल्लेख मिलता है, जिससे उस काल में प्रचलित ज्योतिष विज्ञान की विकसित दशा का बोध होता है। आधुनिक समय में ज्योतिष के रूप में केवल फलित ज्योतिष को महत्व दिया जाता है जबकि प्राचीनकाल में काल ज्योतिष (गणित ज्योतिष) ही प्रधान माना जाता था।

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ज्योतिष की सबसे प्राचीन पुस्तक ‘वेदाङ्ग ज्योतिष’ में ‘ज्योतिष’ शब्द स्पष्टतः ‘गणित ज्योतिष’ (Astronomy) का सूचक है। आज विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि काल की गणना गति से तथा गति की गणना काल से होती है तथा ये दोनों अन्योन्याश्रित है। इस वैज्ञानिक सिद्धान्त का उल्लेख ऋग्वेद में प्राप्त होता है।

महाभारत में ज्योतिष विषयक तथ्यों का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। महर्षि व्यास ने महाभारत के शान्तिपर्व में काल की प्रबलता तथा महत्व का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में व्यास द्वारा युधिष्ठिर को समझाते हुए कथन है कि

नक्षत्र विग्रहमतिर्गुणबुद्धिर्लयोऽगमः।
महा. भा. अनु. पर्व. 17.59 2
याजुष’-वेदाङ्ग ज्यो.

में ‘ज्योतिष’ के स्थान पर ‘गणित’ पाठ है। अर्थात् – ‘ज्योतिष और ‘गणित’ शब्द एक दूसरे के परिपूरक हैं
द्वादशारं नहि तज्जराक्ष वर्वति चक्रं परिद्यामृतस्य । आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानि विंशतिश्वं तस्युः ।। ऋ.वे. 1.184.11

विधि के विधान से प्रेरित हो सभी क्षत्रिय काल के गाल में चले गये हैं। काल समस्त प्रजा वर्ग के कर्म का साक्षी है। वही मनुष्य के कर्मों का फल समयानुसार प्रदान करता है। अतः इस वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में

‘काल’ अर्थात् ‘समय’ के महत्व से सभी भली-भांति परिचित थे।

श्रीमद्भागवत में लिखित एक प्रसङ्गानुसार, राजा परीक्षित द्वारा महामुनि शुकदेव के प्रति यह प्रश्न किया गया कि काल क्या है ? उसका सूक्ष्मतम और महत्तम रूप क्या है ? इसका उत्तर देते हुए शुकदेव का कथन है कि “विषयों का रूपान्तर (बदलना) ही काल का आकार है। उसी को निमित्त बना वह काल तत्त्व अपने को अभिव्यक्त करता है। वह अव्यक्त से व्यक्त होता है। इस कथन के अनुसार काल अमूर्त तत्त्व है तथा घटने वाली घटनाओं से ही इसे ज्ञात किया जा सकता है।

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आज भी विज्ञान इस तथ्य को स्वीकार करता है।
महर्षि वेदव्यास ने शान्ति पर्व में भीष्म पितामह और युधिष्ठिर के संवाद में काल का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में भीष्म द्वारा दूरदर्शी, तत्कालज्ञ और दीर्घसूत्री-इन तीन मत्स्यों का दृष्टान्त देते हुए काल को परिभाषित किया गया है, जिसके अनुसार काष्ठा, कला, मूहूर्त, दिन, रात, लव, मास, पक्ष, छः ऋतुएं, संवत्सर

और कल्प इन्हें ‘काल’ कहा जाता है तथा पृथ्वी को देश कहा जाता है। इनमें से पृथ्वी का तो दर्शन होता है किन्तु काल दिखायी नहीं देता है। अतः अभीष्ट मनोरथ की सिद्धि के लिए जिस देश और काल को उपयोगी मानकर उसका विचार किया जाता है, उसको ठीक-ठीक ग्रहण करना चाहिए। मनुष्यों में काल को ही कार्य-सिद्ध हेतु देश और काल को प्रधान माना गया है तथा धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और मोक्षशास्त्र में भी इन देश और काल को कार्य सिद्धि का प्रधान उपाय माना
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काङ्क्षमाणाः श्रियं कृत्स्नां पृथिव्यां च महद् यशः । कृतान्तविधिसंयुक्ताः कालेन निधनं गताः ।। कर्मसूत्रात्मकं विद्धि साक्षिणं शुभपापयोः । सुख दुःखगुणोदकं कालं कालफलप्रदम् ।।
महा. भा. शान्ति पर्व 33.15-19 2 भा. विज्ञा. उज्ज्व. परं पृ. 83

गया है। अतः जो मनुष्य सोच-विचार कर तथा सतत् सावधान होकर, अपने अभीष्ट देश और काल का ठीक-ठीक उपयोग करता है, वह उनके सहयोग से इच्छित फल प्राप्त कर लेता है। इस वर्णन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में काल के महत्व और उसके उचित उपयोग से सभी भली-भांति परिचित थे।

महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के शान्ति पर्व में काल गणना हेतु सूक्ष्म माप का वर्णन किया है। इस पर्व में महर्षि व्यास द्वारा अपने पुत्र शुकदेव को काल के विभाग को समझाते हुए कथन हैं –

काष्ठा निमेषा दशपञ्च चैव
त्रिंशत्रु काष्ठा गणयेत् कलांताम्। त्रिंशत्कालश्चापि भवेन्मूहूर्ता
भागः कलाया दशमश्चयः स्यात्।। त्रिंशन्मूहूर्त तु भवेदहश्च
रात्रिश्च संख्या मुनिभिः प्रणीता। मासः स्मृतोरात्र्यहनीच त्रिंशत्
संवत्सरो द्वादशमास उक्तः ।।

अर्थात् पंद्रह निमेष की एक काष्ठा और तीस काष्ठा की एक कला गिननी चाहिए। तीस कला का एक मूहूर्त होता है। उसके साथ कला का दसवां भाग और सम्मिलित होता है अर्थात् तीस कला और तीन काष्ठा का एक मूहूर्त होता है।

तीस
काष्ठाः कला मूहूर्ताश्च दिवा रात्रिस्तथा लवाः । मासाः पक्षाः षड्ऋतृवः कल्पः संवत्सरास्तथा।। परीक्ष्यकारी युक्तश्च स सम्यगुपपादयेत् । देशकालवीभप्रेतौ ताभ्यां फलमवाप्नुयात् ।।
महा. भा. शान्ति. पर्व. 137.21-24 2 महा. भा. शान्ति पर्व. 231.12-13
,

मूहूर्त का एक दिन-रात होता है। महर्षियों ने दिन और रात्रि के मूहूर्तों की संख्या उतनी ही बतायी है। तीस रात-दिन का एक मास और बारह मासों का एक संवत्सर बताया गया है। इस वर्णन के अनुसार व्यास ऋषि ने गणना करते हुए कहा है –
1 काष्ठा

15 निमेष 30 काष्ठा 303 कला 30 मूहूर्त 30 दिन

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1 कला 1 मूहूर्त 1 दिन
1 मास 1 संवत्सर (वर्ष)

12 मास

यहां महाभारतकार ने काल की सामान्य इकाई (माप) बतायी है।
इस काल का सूक्ष्मतम अंश परमाणु तथा महत्तम अंश ब्रह्म आयु माना गया है। इसे विस्तृत रूप में बताते हुए शुकमुनि उसके विभिन्न मापों का उल्लेख करते हैं यथा –

2 परमाणु 3 अणु 3 त्रसरेणु 100 त्रुटि 3 वेध
1 अणु – 1 त्रसरेणु – 1 त्रुटि – 1 वेध – 1 लव – 1 निमेष – 1क्षण – 1 काष्ठा – 1 लघु
15 लघु –
2 नाड़िका 30 मूहूर्त 7 दिन रात – 2 सप्ताह
1 नाड़िका 1 मूहूर्त 1 दिन रात 1 सप्ताह
1 पक्ष
2 पक्ष
1 मास
2 मास
1 ऋतु
3 लव 3 निमेष 5 क्षण 15 काष्ठा

ऋतु

1 अयन
2 अयन
1 वर्ष
शुकमुनि की उपर्युक्त गणना के अनुसार एक दिन रात में 3280500000 परमाणु काल होता है तथा एक दिन रात में 86400 सेकेण्ड होते हैं। इसका अर्थ है सूक्ष्मतम माप अर्थात् –

1 परमाणु काल = 1 सेकेण्ड का 37968वां हिस्सा।’
प्राचीन भारत में काल विभाजन अत्यन्त सूक्ष्मता के साथ किया गया था। ई. स. 1564-1642 में ‘गैलिलियो द्वारा पहली बार समय का विभाजन ‘सेकेण्ड’ के रूप में किया गया ऐसा पाश्चात्य विद्वानों का अभिप्राय है, किन्तु महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में सेकण्ड का भी विभाजन कर व्यक्त किया है।

प्राचीन काल में अमरकोष, विष्णुपुराण, मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में भी समय की गणना दिखाई देती है। यथा – नीचे निम्नवत् तालिका है –
1/4 निमेष = 1 त्रुटि 2 त्रुटि = 1 लव 2 लव = 1 निमेष 5 निमेष = 1 काष्ठा 10 काष्ठा = 1 कला 40 कला = 1 नाडिका
2 नाडिका = 1 मूहूर्त 15 मूहूर्त = 1 अहोरात्र 7 अहोरात्र = 1 सप्ताह 15 अहोरात्र = 1 पक्ष
2 पक्ष
= 1 मास
12 मास
= 1 वर्ष

प्राचीनकाल में दिनों और मासों का नाम निश्चित करने के लिए भी चन्द्रमा की कलाओं ग्रहों और नक्षत्रों की गति पर आधारित पूर्णतया वैज्ञानिक पद्धति विकसित की गई थी। अतः यह जानकर आश्चर्य होता है कि काल का यह अतिसूक्ष्म ज्ञान कैसे सम्भव हो सका होगा ? वेदाङ्ग ज्योतिष तथा ज्योतिष के तत्कालीन अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों के अतिरिक्त इसका उल्लेख कल्प सूत्र, निरूक्त, व्याकरण ग्रन्थों मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति तथा महाभारत में भी मिलता है।’

भा. विज्ञा. उज्ज्व. परं. पृ. 84 2 सं. विज्ञा. पृ. 80
काल ज्योतिष के विद्वानों के अनुसार, काल को मापने हेतु बड़ी इकाईयों (जैसे – युग, चतुर्युग, कल्प, मन्वन्तर तथा छोटी इकाईयों (जैसे – लव, निमेष, मूहूर्त आदि) की आवश्यकता होती है।

महाभारत युग में काल गणना हेतु बड़ी इकाईयों का प्रयोग प्रचलित था। प्राचीन ज्योतिषविदों के अनुसार, विश्व के जीवनकाल को चार युगों में बांटा गया है, यथा – कृत, त्रेता, द्वापर और कलियुग। आधुनिक समय में कलियुग चल रहा है। मनुस्मृति, पुराण और महाभारत के कथनानुसार यह माना जाता है कि कलियुग के अन्त में प्रलय होगा और तब नयी सृष्टि होगी। अतः प्रत्येक युग के आरम्भ में संध्या है और अन्त में सन्ध्यांश है। इस सन्दर्भ में वर्षों की संख्या निम्नलिखित हैं –
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कृत
2000
युग वर्ष
युग
वर्ष संध्या 400
संध्या 200 (सतयुग)
मुख्य भाग 4000 द्वापर
मुख्य भाग संध्यांश400
संध्यांश200 त्रेता ( संध्या 300
संध्या 100 __ मुख्य भाग 3000 कलि
मुख्य भाग संध्यांश 300
संध्यांश100 चारों युग मिलकर = 1 दैवयुग = 12,000 वर्ष

1000 दैवयुग = ब्रह्मा का 1 दिन 1000 इस वर्णन में जिन वर्षों की संख्या दी गयी है वे मानव वर्ष नहीं हैं अपितु दैव वर्ष है तथा प्रत्येक दैव वर्ष 360 मानव वर्षों के बराबर होता है।

महाभारत के शान्ति पर्व में महर्षि व्यास तथा शुकदेव के मध्य चारों युगों के वर्ष आदि की काल गणना का विस्तृत उल्लेख किया गया है। इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास का कथन है कि देवताओं के चार हजार वर्षों का एक कृत युग (सत्य युग) होता है। इस युग में चार सौ दिव्य वर्षों की संध्या तथा उतने ही वर्षों का एक संध्यांश भी होता है। संध्या और संध्यांशों सहित अन्य तीन युगों में यह संख्या क्रमशः एक-एक चौथाई घटती जाती है।’ इस कथन को गणित के नियमानुसार निम्नलिखित रूप से स्पष्ट किया जा सकता है –

देवताओं का सत्ययुग = 4000 वर्ष
400 दिव्य वर्ष (संध्या)
400 दिव्यवर्ष (संध्यांश) कुल सत्ययुग = 4800 वर्ष तथा क्रमानुसार प्रत्येक युग 1/4 वर्ष कम होता जाता है।
त्रेता युग = 4800 – 4800 x 1/4
4800 – 1200
3600 वर्ष द्वापर युग 3600-4800 x 1/4
3600 – 12000
2400 वर्ष कलियुग
2400 – 4800 x 1/4
2400 – 1200 = 1200 वर्ष

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इस तरह, संध्या तथा संध्यांशों सहित सत्य युग 4800 वर्षों का, त्रेतायुग 3600 वर्षों का, द्वापर युग 2400 वर्षों का और कलियुग 1200 वर्षों का होता है तथा कुल मिलाकर चारों युग 12000 वर्षों का होता है।

महर्षि वेदव्यास द्वारा पुनः शुकदेव के प्रति ब्रह्मा के दिन की काल गणना करते हुए कथन है कि देवताओं के बारह हजार वर्षों का एक चतुर्यग होता है, यह विद्वानों की मान्यता है। एक सहस्र चतुर्युग को ब्रह्मा का एक दिन बताया जाता है। इतने ही युगों की उनकी एक रात्रि भी होती है। भगवान ब्रह्मा अपने दिन के

ये ते रात्र्यहनी पूर्व कीर्तिते जीवलौकिके। तयोः संख्याय वर्षाग्रं ब्राह्मे वक्ष्याम्यहःक्षपे।।
इतरेषु ससंध्येषु संध्यांशेषु ततस्त्रिषु । एकपादेन हीयन्ते सहस्राणि शतानि च।।महा. भा. शान्ति पर्व 231.18-21

आरम्भ में संसार की सृष्टि करते हैं और रात में जब प्रलय का समय होता है, तब सबको अपने में लीन करके योगनिद्रा का आश्रय ले सो जाते हैं, फिर प्रलय का अन्त होने अर्थात् रात बीतने पर वे जाग उठते हैं। एक हजार चतुर्युग का जो ब्रह्मा का एक दिन बताया गया है और उतनी ही बड़ी जो उनकी रात्रि कही गयी है, उसको जो लोग ठीक-ठीक जानते हैं वे ही दिन और रात अर्थात् काल तत्त्व को जानने वाले हैं।’ इस वर्णन के अनुसार, व्यास ऋषि का कथन है कि
12000 वर्ष 1000 चतुर्युग 1000 चतुर्युग

1 चतुर्युग 1 दिन (ब्रह्मा का) 1 रात्रि (ब्रह्मा की)
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यहां भी वर्ष का तात्पर्य मानव वर्ष नहीं अपितु दैव वर्ष है। अतः इस कथन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में काल ज्योतिष का गूढ़ ज्ञान प्रचलित था। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के आदि पर्व में पांच वर्षों के एक युग का उल्लेख किया है।

इस सन्दर्भ में पाण्डवों के जन्म के प्रसङ्ग में ऋषि वैशम्पायन द्वारा जनमेजय के प्रति कथन है कि एक-एक वर्ष के अन्तर से उत्पन्न हुए कुरूओं में श्रेष्ठ पाण्डु के वे पांचों पुत्र (युग के) पांच वर्षों के समान लगते थे।’ इस वर्णन में पांचों पाण्डवों से पञ्च संवत्सरों की उपमा दी गयी है। इन पांचों वर्षों के युग की अपेक्षा बड़े युग की कल्पना महाभारत काल में पूर्ण हो गयी थी, इसमें संशय नहीं है।
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एतां द्वादशसाहस्री युगाख्यां कषयो विदु: सहस्रपरिवर्तं तद् ब्राह्म दिवसमुच्यते।।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदोजनाः ।। महा. भा. शान्ति पर्व 231.29-31

अनुसंवत्सरं जाता अपि ये कुरुसत्तमाः ।। पाण्डुपुत्रा व्यराजन्त पञ्च संवत्सरा इव।। महा. भा. आदि पर्व. 123.22 3 भा. ज्यो. इति. पृ. 71

महाभारतकार ने महाभारत में कहीं-कहीं चतुर्युग को सिर्फ युग कहा है। इस सन्दर्भ में महाभारत के वन पर्व में महर्षि मार्कण्डेय द्वारा चारों युगों की वर्ष–संख्या का वर्णन करते हुए युधिष्ठिर के प्रति कथन है कि बारह हजार दिव्य वर्षों का चतुर्युग होता है। यहां बारह सहस्रों की संज्ञा ‘युग’ है।

मनुस्मृति तथा अन्य ज्योतिष ग्रन्थों में भी यही गणना स्वीकार की गयी है। उनमें इतना और कह दिया गया है कि चतुर्युगों के बारह हजार वर्ष मानवी वर्ष नहीं है बल्कि देवताओं के वर्ष हैं। अर्थात्
मानवी एक वर्ष = देवताओं का एक दिन मानवी 360 वर्ष = देवताओं का एक वर्ष
इस सन्दर्भ में भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में भी ‘चतुर्युग’ की गणना का उल्लेख किया है।

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महाभारत तथा मानव शरीर विज्ञान

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mahabharat krishi – 2

इसी प्रकार श्रीकृष्ण द्वारा कर्ण के प्रति पाण्डव पक्ष की विजय के वर्णन में यह उल्लेख मिलता है कि “इस सय मार्गशीर्ष का मास चल रहा है जिससे सर्वत्र

औषधियां, फल-फूल तथा धान के खेतों में समृद्धि बढ़ी हुई है। इससे स्पष्ट होता है कि मार्गशीर्ष के महीने में कृषि समृद्ध हो जाती थी। अतः इस समस्त विवरण से स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में कृषि विज्ञान अत्यन्त विकसित था। इस सन्दर्भ में कौटिल्य का अर्थशास्त्र में बीज वपन काल का उल्लेख मिलता है। कृषि पराशर में उचित काल में बीज वपन करने का निर्देश दिया गया है। mahabharat krishi – 2

वपन विधि और क्रम

कृषि विज्ञान के अनुसार बीज वपन की प्रमुख रूप से दो विधियां होती हैं –

(1.) बीज वपन
(2.) रोपण।

प्रायः औषधि आदि के बीज बोये जाते हैं और उनके लिये यथा प्रकृति स्थल, उपाय, भूमि तथा बोने हेतु बीज अनिवार्य है। यह क्रिया तीन प्रकार की होती है, यथा सीता श्रेणी में बीज बोना, बीज को फेंककर (प्रकीर्णन द्वारा) बोना और भूमि को गहराई तक खोदकर उसमें बीज बोना। इसी प्रकार बीज वपन की दूसरी विधि रोपण है जिसमें बीज के छोटे-छोटे पौधे रोपे जाते हैं। जैसे – धान के पौधे रोपना |

महाभारत काल में भी इन विधियों तथा क्रमों का प्रयोग कृषि हेतु किया जाता था। इस सन्दर्भ में संजय द्वारा धृतराष्ट्र के समक्ष शल्य के ध्वज की चर्चा की गयी है जिसमें प्रकारान्तर से ध्वज में स्थित शुभ लक्षणों से युक्त एक सीता (हल

सौम्योऽतं वर्तते मासः सुप्रापयवसेन्धनः । सर्वौषधिवन स्फीत: फलवानल्पमक्षिकः।।
निष्पको रसपत्तोयो नात्युषण शिशिरः सुखा।। महा. भा. उद्यो. पर्व. 142.16-17

ततः प्रभूतोदकमल्पोदकं वा सस्यवापयेत् ।
शालि-व्रीहि-कोद्रव-तिल-प्रियङ्गु-दारक-वरकाः पूर्ववायाः ।। मुदग्-माष-शैम्ब्याः मध्यवापाः । कुसुम्भ-मसूर-कुलत्थ-यव-गोधूम-कलायातसी-सर्षपाः पश्चाद्वायाः ।।
कौ अर्थशा. 2.24

वैशाखे वपनं श्रेष्ठं ज्येष्ठे तु मध्यमं स्मृतम् ।
आषाढ़े चाधमं प्रोक्तं श्रावणे चाधमाधमम्।। रोपणार्थं तु बीजानां शुचौ वपनमुत्तमम् । श्रावणे चाधमं प्रोक्तं भाद्रे चैवाधमाधमम् ।।
कृषि, परा० श्लोक. 168-169

द्वारा भूमि पर खींची गयी रेखा) का उल्लेख मिलता है तथा सभी बीजों के अङ्कुरित होने पर व्याप्त सीता की शोभा की तुलना शल्य के ध्वज से की गयी है। इस वर्णन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस काल में हल द्वारा रेखा खींचकर बीज वपन किया जाता था।

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महाभारत काल में बीज प्रकीर्णन विधि द्वारा कृषि की जाती थी। इस सन्दर्भ में धृतराष्ट्र द्वारा दुर्योधन के प्रति कथन है कि जिस प्रकार किसान खेतों में बीज बोता है उसी प्रकार समर भूमि में बाण बिखेरते हुए सात्यकि आदि द्वारा बाण फेंके जाएंगे। इससे प्रतीत होता है कि उस काल में बीज प्रकीर्णन विधि भी प्रचलित थी।

महाभारत के अनुशासन पर्व में श्री महेश्वर द्वारा उमा के प्रति मनुष्य के कर्मों के वर्णन में कृषि कर्म का उल्लेख किया गया है जिसमें रोपण विधि की बात कही गयी है। इससे प्रतीत होता है कि महाभारत काल में कृषि हेतु बीज की रोपण विधि प्रचलित थी।

प्राचीन ग्रन्थों में बीज वपन की विधि का उल्लेख मिलता है यथा यजुर्वेद में हलादि उपकरणों द्वारा भूमि खोदकर सीता श्रेणी में बीज वपन करने का उल्लेख मिलना है। अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में वपन विधि तथा वपन क्रम का प्रयोग आधुनिक कृषि विज्ञान के अनुसार किया जाता था।

मद्रराजस्य शल्यस्य ध्वजाग्रेऽग्नि शिखामिव ।।
सौवर्णी प्रतिपश्याम् सीतामप्रतिमां शुभाम्
सर्वबीज विरूदेव यथा सीता श्रिया वृता।
महा. भा. द्रोण पर्व. 105.18-19

सम्पूर्ण पूरयन् भूयो धनं पार्थस्य माधवः ।
शैनेयः समरे स्थाता बीजवत् प्रवप-शरान् ।।
महा. भा. उद्यो. पर्व. 58.22

रोपणं चैव लवनं यच्चान्यत् पौरूषं स्मृतम्।।
महा. भा. अनु. पर्व. 145 पृ. 5979

कृते योनौ वपते हबीजम् । नेदीय इत्सृण्य पक्वमेयात् ।।
यजु. वे. 12.68

अनुपयुक्त बीज –
mahabharat krishi – 2

कृषि वैज्ञानिकों के मतानुसार, उत्तम बीज ही कृषि करने के लिये उपयुक्त होते हैं। इस सन्दर्भ में महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के प्रति गुरू-शिष्य संवाद में यह वर्णन मिलता है कि जिस प्रकार आग में भूने हुए बीज नहीं उगते उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि से दग्ध जीव संसार में जन्म नहीं लेता है।’ इस वर्णन के अनुसार भुने हुए बीज कृषि की दृष्टि से अनुपयुक्त माने जाते हैं। अतः यह प्रतीत होता है कि महाभारतकार कृषि के सन्दर्भ में उपयुक्त तथा अनुपयुक्त बीज से भली-भांति परिचित थे।

इस समस्त विवरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकाल में कृषि विज्ञान अत्यन्त विकसित था तथा उस काल में लोग कृषि के सन्दर्भ में वपन की समस्त तकनीकियों से परिचित थे।

महाभारत तथा सिंचाई के साधन

कृषि तंत्र में कृषि विज्ञान ने निरन्तर उन्नति की है। भारतीय कृषि में कृषि की उन्नति के लिए सिंचाई के साधनों का बड़ा महत्व है। सिंचाई के साधनों में जल स्रोतों को रखा गया है, इनमें वर्षा का जल, नदी, तालाब, कुएं, वापी, झरनों आदि द्वारा खेती की जाती है।

वृहत्संहिता में कृषि के सन्दर्भ में जल संसाधनों को दो भागों में बांटा गया है, यथा mahabharat krishi – 2

कृत – इसमें मानव निर्मित जल के स्रोत आते हैं जैसे – कुआं, वापी, तालाब
आदि।
अकृत – इसमें प्राकृतिक जल के स्रोत आते हैं, जैसे – वर्षा, नदी, झरना
आदि।

बीजन्यग्नयुपदग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः | ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मा सम्पद्यते पुनः ।।
महा. भा. शान्ति पर्व 211.17 2 वृहत् सं. 56.3

महाभारत में सिंचाई के साधनों का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। महाभारत काल में कृषि के लिए वर्षा का जल सर्वोत्तम साधन माना जाता था। इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास द्वारा शुकदेव के प्रति सृष्टि की उत्पत्ति के क्रम के वर्णन में वर्षा के महत्व का उल्लेख मिलता है जिसके अनुसार वर्षा द्वारा स्थावर तथा जङ्गम पदार्थ वृद्धि को प्राप्त करते हैं तथा वर्षा बीतने पर उनका हास भी होता है।

इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस काल में वर्षा पर कृषि प्रक्रिया निर्भर थी। इस सन्दर्भ में भीष्म द्वारा राजा के मित्र तथा अमित्र के वर्णन में प्रकारान्तर से यह उल्लेख मिलता है कि वर्षा का जल जिसके खेत से होकर दूसरे के खेत में जाता है, उसकी इच्छा के बिना उसके खेत की आड़ या मेड़ को नहीं तोड़ना चाहिए। इस वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि कृषि में वर्षा का जल विशेष महत्वपूर्ण माना जाता था तथा कृषि हेतु खेतों में मेड़ बनाकर जल तथा मृदा का संरक्षण भी किया जाता था।

महाभारत काल में कृषि विज्ञान अत्यन्त विकसित था। अतः सिंचाई के लिए कुएं, तालाब, पोखर आदि भी प्रयोग किये जाते थे। इस सन्दर्भ में अनुशासन पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर से प्रजा की रक्षा हेतु दिये गये उपदेश में यह उल्लेख मिलता है कि पानी न बरसने पर जब प्रजा कुआं खोदकर किसी तरह सिंचाई करके कुछ अन्न पैदा करे और उसी से जीविका चलाये तो राजा को वह धन नहीं लेना चाहिए। इस वर्णन में स्पष्ट रूप से कुएं द्वारा सिंचाई करने की बात कही गयी है। कृषि हेतु सिंचाई करने के साधन में जलाशय तथा पोखर आदि भी महत्वपूर्ण माने

mahabharat krishi – 2

यथा विश्ववानि भूतानि वृष्टया भूयांसि प्रावृषि।
सृज्यन्ते जङ्गमस्थानि तथा धर्मा युगे युगे।।
महा. भा. शान्ति पर्व. 232.39

यस्य क्षेत्रादप्युदकं क्षेत्रमन्यस्य गच्छति ।
यमेवलक्षणं विधात् तममित्रं विनिर्दिशेत् ।।
महा. भा. शान्ति पर्व 80.14-15 ३

वृद्ध बालधनं रक्ष्यमन्धस्य कृपणस्य च। न खातपूर्वं कुर्वीत न रूदन्ती धनं हरेत् ।।
महा. भा. अनु. पर्व. 62.25

गये हैं। इस सन्दर्भ में अनुशासन पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के प्रति जलाशय तथा पोखर आदि बनवाने के लाभों की विस्तृत विवेचन किया गया है। इससे यह प्रतीत होता है कि उस काल में जलाशय, पोखर आदि द्वारा कृषि की जाती थी।

महाभारत तथा कृषि उपयोगी यंत्र

प्राचीन वैदिक काल से भी पहले कृषि के लिए हल आदि उपकरण प्रयोग किये जाते थे। वेदों में कृषि उपयोगी यंत्रों का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। यथा
अथर्ववेद में हल तथा जुओं में लगे बैलों का वर्णन किया गया है और इसी में आगे हल को उत्तम फाल से युक्त, सुगमता से चलने वाला तथा जुताई हेतु उपयोगी उपकरण बताया गया है।

यहां ‘हल’ को कृषि उपयोगी यंत्र के रूप में उल्लेख किया गया है। ‘हल’ शब्द का अर्थ है – विलेखन करने वाला उपकरण। हल को लाङ्गल कहा जाता था। इसके अन्य उपकरण सीता (फाल इति), सीर, शुन – ईषा–युग-वरत्र-अष्ट्रा आदि होते हैं। इस सन्दर्भ में ऋग्वेद में कृषि कार्य हेतु सीर, लाङ्गल, सीता (युग्म), वस्त्रा (रज्जु), अष्ट्रा (फाल) आदि का उल्लेख मिलता है।

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १।१ । १॥

वर्षाकाले तडागे तुसलिलं यस्य तिष्ठति ।
अग्निहोत्रफलं तस्य फलमाहुर्मनीषिणः।।
तडागे यस्य गावस्तु पिबन्ति तृषिता जलम् | मृगपक्षिमनुष्याश्च सोऽश्वमेधफलं लभेत्।।
महा. भा. अनु. पर्व. 58.10-17

सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वि तुन्वते पृथक् । धीरा देवेषुम्नयौ।। लाङ्गलं पवीरवत् सुशीमं सोमसत्सरू । उद्दिवपतु गावविं प्रस्थावद् रथवाहनं पीबरी च प्रफळम् ।।
अथर्व. वे. 3.17.1-3

हल् विलेखने धातोः घञर्थे करणेक प्रत्ययाद हलम्।।
आप्टे. को. पृ. 1167

शुनं वाहाः शुनं नरः शुनं कृषतु लाङ्गलम् ।
शुनं पर्जन्यो मधुना पयोभिः शुनासीरा शुनमस्मासु धत्तम् ।।
ऋ. वे. 4.57.4-9

महाभारत काल में भी कृषि का प्रमुख यंत्र हल (लाङ्गल) प्रचलित था। इस सन्दर्भ में महाभारत के शान्ति पर्व में जाजलि तथा तुलाधार के संवाद में हल द्वारा खेती करने का उल्लेख मिलता है। जिसके अनुसार कुछ लोग खेती को अच्छा मानते है परन्तु यह वृत्ति अत्यन्त कठोर है। वह हल, जिसके मुख पर फाल जुड़ा हुआ है, पृथ्वी को पीड़ा देता है और इससे पृथ्वी के भीतर रहने वाले जीवों का भी वध हो जाता है तथा उसमें जुते बैल भी दुर्दशा को प्राप्त होते हैं।’ यहां महाभारतकार ने स्पष्ट रूप से हल तथा अन्य उपकरणों का उल्लेख किया है।

अतः इस विवरण से अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में कृषि व्यवस्था अत्यन्त विकसित थी तथा हल, फाल आदि उपकरणों द्वारा कृषि की जाती थी जो उस काल के कृषि विज्ञान की विकसित दशा का परिचायक प्रतीत होता है।

महाभारत तथा कृषि संरक्षण

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कृषि की उन्नति और समृद्धि के लिए कृषि संरक्षण बहुत ही आवश्यक है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार कृषि संरक्षण से ही कृषि की फसलों में वृद्धि सम्भव है। किसी भी राष्ट्र के लिए कृषि का संरक्षण प्रथम कर्तव्य है। ऐसा वर्णन कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र में मिलता है। मूलतः कृषि संरक्षण का कार्य प्रशासन के अन्तर्गत माना जाता है। कृषि संरक्षण की दृष्टि से कृषि विज्ञान द्वारा इसे निम्न भागों में विभक्त किया जा सकता है –

मृदा–संरक्षण – कृषि संरक्षण हेतु सर्वप्रथम मृदा (मिट्टी) का संरक्षण आवश्यक है। मिट्टी के संरक्षण के मुख्यतः तीन कारण होते हैं –

(1.) अनावृष्टि
(2.) अतिवृष्टि,
(3.) तीव्र वायु और प्रवाह ।
भूमि के ऊपर उर्वरक शक्ति से युक्त, उपजाऊ परत होती है जो अतिवृष्टि (अधिक वर्षा), तीव्र वायु आदि द्वारा बहाकर ले जायी जाती है

कृषि साध्विति मन्यन्ते सा च वृत्तिः सुदारूणा।।
तथैवानडुहो युक्तान् समवेक्षस्व जाजले
महा. भा. शान्ति पर्व 262.45-46

जिससे भूमि की उपजाऊ शक्ति खत्म हो जाती है। अतः सामान्यतः देखा गया है कि अधिक वर्षा से नलिका अपरदन होता है। ऐसा उल्लेख ऋतुसंहार में भी मिलता है।’ इस सन्दर्भ में अग्निपुराण में अधिक वर्षा से कृषि को बहुत हानि होती है, ऐसा उल्लेख मिलता है।

महाभारत के सभा पर्व में अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि से उत्पन्न भयानक उपद्रव का उल्लेख मिलता है। जिससे प्रतीत होता है कि अतिवृष्टि होने से कृषि पर बुरा प्रभाव पड़ता है जिस कारण कृषि द्वारा फसल उत्पन्न नहीं होती है और जनता त्राहि-त्राहि करती है।

इस वर्णन में साङ्केतिक रूप में मृदा अपरदन का उल्लेख किया गया है। महाभारत काल में कृषक कृषि के संरक्षण की सभी विधियों से परिचित थे। वे भली-भांति जानते थे कि खेतों में उपजाऊ मिट्टी को बहने से रोकने के लिए मेड़ बनाना आवश्यक होता है तथा इससे मृदा संरक्षण सम्भव होता है।

इस सन्दर्भ में आदि पर्व में उपाध्याय की आज्ञानुसार खेत की टूटी क्यारियों में मेड़ बांधने का उल्लेख मिलता है। मृदा संरक्षण के लिए सर्वोत्तम उपाय वृक्षारोपण भी स्वीकार करते हैं।

इसी कारण अनुशासन पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के प्रति वृक्षारोपण के महत्व का विस्तृत वर्णन किया गया है। जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकार यह भलीभांति जानते थे कि वृक्ष अपनी जड़ों द्वारा मिट्टी को जकड़े रहते हैं जिससे उपजाऊ मिट्टी का अपरदन नहीं होता और भूमि उपजाऊ

दण्डविष्टिकराबाधैः रक्षेदुपहतां कृषिम्। स्तेनव्यालविषग्राहैर्व्याधिभिश्च पशुव्रजान् ।।
अर्थ. शा. 2.1.18 2

अग्नि. पुरा. 163.19 3 अवर्ष चातिवर्ष च व्याधिपावकमूर्छनम् ।
सवमेतत् तदा नासीद् धर्मनित्ये युधिष्ठिरे।।।
महा. भा. सभा. पर्व. 33.5

स तत्र संविवेश केदारखण्डे शयाने च तथा तस्मिंस्तदुदकं तस्थौ।।
महा. भा. आदि. पर्व. 3.24

स्थावराणां च भूतानां जातयः षट् प्रकीर्तिताः ।
तरयेद् वृक्षरोपी च तस्माद वृक्षांश्च रोपयेत् ।।
महा. भा. अनु. पर्व. 58.23-27

बनी रहती है। मनुस्मृति में भी वृक्षारोपण को मृदासंरक्षण के लिए अनिवार्य बताया गया है।
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इस विवरण से स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में कृषि संरक्षण हेतु मृदा संरक्षण को महत्वपूर्ण माना जाता था तथा उस काल के लोग वृक्षारोपण के महत्व से भली-भाँति परिचित थे।

क्षेत्र संरक्षण – कृषि विज्ञान के अनुसार उत्तम कृषि के लिए खेत का संरक्षण किया जाना आवश्यक है। यहां क्षेत्र संरक्षण से तात्पर्य – खेत की पशुओं-पक्षियों
आदि से सुरक्षा, प्रदूषण से सुरक्षा तथा चोरी आदि सुरक्षा से है।

ने महाभारत में अनेक स्थानों पर क्षेत्र संरक्षण का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में भीष्म द्वारा आयु की वृद्धि तथा क्षय करने वाले कर्मों का उल्लेख युधिष्ठिर के प्रति किया गया है जिसमें प्रकारान्तर से खेत के संरक्षण का उल्लेख मिलता है इस वर्णन में भीष्म का कथन है कि बोये हुये खेत में मल-मूत्र नहीं करना चाहिए तथा बढ़ी हुई खेती में भी मल-मूत्र त्याग नहीं करना चाहिए।’

इस कथन से खेत को प्रदूषण से बचाने का साङ्केतिक रूप से उल्लेख मिलता है। इस सन्दर्भ में महाभारत के सभा पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के प्रति हैहयराज अर्जुन के शासन प्रबन्ध के वर्णन में यह उल्लेख मिलता है कि वे (अर्जुन) बकरियों, गौओं आदि पशुओं तथा खेतों का संरक्षक थे। इससे प्रतीत होता है कि महाभारत

सीमावृक्षांश्च कुर्वीत न्यग्रोधाश्वत्थकिं शुकान् । शरान्कुब्जकगुल्मांश्च तथा सीमा न नश्यति ।।
मनु. स्मृ. 8.246-247

नोत्सृजेत पुरीषं च क्षेत्रे ग्रामस्य चान्तिक द्विचारामेद् यथान्यायं हृदगतं तु पिबन्नपः ।।
महा. भा. अनु. पर्व. 104.54

स एव राष्ट्रपालोऽभूत् स्त्रीपालोऽभवदुर्जनः। इदं तु कार्तवीर्यस्य बभूवासदृशं जनैः।।
महा. भा. सभा. पर्व. 38 पृ. 792

काल में कृषि से जुड़े पशुओं तथा खेतों की सुरक्षा अत्यधिक आवश्यक मानी जाती थी।

इस सन्दर्भ में कृषि पराशर का कथन है कि देखभाल की गयी खेती सोना उत्पन्न करती है तथा बिना देखभाल की वही कृषि दैन्य (निर्धनता) देने वाली होती है।’ इस समस्त विवरण से यह प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास क्षेत्र संरक्षण के विविध उपायों से परिचित थे।

बीज संरक्षण – समस्त फसलों का मूलभूत उपादान कारण बीज है। अतः कृषि शास्त्रों तथा कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार बीज संग्रह तथा बीज संरक्षण अत्यावश्यक है। बीज से बीज की उत्पत्ति होती है अतः इसका संरक्षण आवश्यक है ऐसा उल्लेख महाभारत के शान्ति पर्व के तीन सौ पांचवें अध्याय में मिलता है।

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गो संरक्षण – प्राचीन वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक भारतीय कृषि पद्धति गौ पर आश्रित है। गोपालन, गोसंरक्षण विषयक नियम तथा नीति आदि का उल्लेख प्राचीन धर्मग्रन्थों में मिलता है।

महाभारत में गोरक्षा, गोशाला निर्माण, गो-चिकित्सा आदि का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। महाभारतकार ने सभा पर्व में अर्जुन को गौओं का पालक’ कहा है। इसी प्रकार जाजलि तथा तुलाधार संवाद में कृषि तथा पशुओं को वैश्य धर्म वाले लोगों के जीवन का आधार बताया गया है। इसी प्रकार भीष्म पर्व में भी वैश्यों के स्वाभाविक कर्मों में भी गोपालन का उल्लेख हुआ है। इससे प्रतीत होता

फलत्यवेक्षिता स्वर्ण दैन्यं सैवानवेक्षिता। कृषिः कृषि पुराणज्ञ इत्युवाच पराशरः ।।
कृषि परा. (कृषि खण्ड) 1 पृ. 36 2 महा. भा. शान्तिपर्व 305.21 3 महा. भा. सभा पर्व 38 पृ. 792

कृष्या ह्यन्नं प्रभवति ततस्त्वमपि जीवसि। पशुभिश्चौषधीभिश्च मा जीवन्ति वणिज ।।
महा. भा. शान्ति पर्व. 263.2 5
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
महा. भा. भीष्म. पर्व. 42-44

है कि कृषि के सन्दर्भ में गो संरक्षण अनिवार्य है। इस तथ्य से महर्षि व्यास भली-भांति परिचित थे।

प्रशासन द्वारा संरक्षण – कृषि साधनों, फसलों आदि का संरक्षण शासकीय संरक्षण से ही सफल होते हैं। फलतः कृषि के प्रति प्रशासन की संरक्षणशील नीति राष्ट्रीय कृषि संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्राचीनकाल से ही राजा का कर्तव्य कृषि की समृद्धि, विकास तथा सुरक्षा माना गया है।

महाभारतकार ने भी अनेक स्थानों पर प्रशासन को कृषि संरक्षण हेतु जिम्मेदार माना है। इस सन्दर्भ में राजा के होने से लाभों का उल्लेख शान्ति पर्व में बृहस्पति द्वारा वसुमना के प्रति किया गया है जिसमें राजा द्वारा कृषि संरक्षण करने की बात कही गयी है। इसी प्रकार शान्ति पर्व में भीष्म द्वारा राजा के कर्तव्यों के वर्णन में प्रशासन संरक्षण की झलक मिलती है।

इस वर्णन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकाल में कृषिसंरक्षण हेतु नाना प्रकार के उपायों का प्रयोग किया जाता था जिससे उस काल में कृषि व्यवस्था उन्नत दशा में पहुंच गयी थी।

महाभारत तथा कृषि में ज्योतिषीय प्रभाव

कृषि विज्ञान के अनुसार कृषि कर्म का मूल वृष्टि है। वृष्टि द्वारा ही कृषि योग्य भूमि शस्य उत्पादन में सफल होती है। कृषि पर वर्षा के साथ-साथ आकाशीय पिण्डों, ग्रह-नक्षत्रों, सूर्य, चन्द्रमा आदि का भी प्रभाव पड़ता है। कृषि वैज्ञानिक तथा ज्योतिष के ज्ञाता भी नक्षत्र राशि आदि को कृषि के लिये प्रभावशाली बताते हैं। प्राचीन ग्रन्थों में कृषि पर ज्योतिषीय प्रभाव का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है, यथा – वृहत्संहिता के अनुसार, कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा के बाद वर्षागर्भ

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वार्तामूले ह्ययं लोकस्रय्या वैधार्यते सदा। तत् सर्व वर्तते सम्यग् यदा रक्षति भूमिपः ।।
महा. भा. शान्ति पर्व. 68.35

कच्चित् कृषिकरा राष्ट्रं न जहत्यति पीडिताः |
ये वहन्ति धुरं राज्ञां ते भरन्तीततरानपि।।
महा. भा. शान्ति पर्व 89.24

काल में परीक्षण करना चाहिए क्योंकि सम्यक् गर्भ के सम्भव होने से फसल उत्पन्न होती है।’ महाभारत में भी अनेक स्थानों पर ज्योतिष से प्रभावित कृषि का उल्लेख मिलता है। इस सन्दर्भ में चन्द्रमा के द्वारा कृषि पर पड़ने वाले प्रभाव का वर्णन वैशम्पायन द्वारा जनमेजय के प्रति किया गया है। जिसके अनुसार चन्द्रमा के क्षय होने पर औषधियां, लता, भांति-भांति के बीज आदि भी क्षीण होने लगे थे।

महाभारत काल में कृषि पर ज्योतिषीय प्रभाव को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता था। इस सन्दर्भ में व्यास ऋषि द्वारा संजय से अमङ्गल सूचक, उत्पातों तथा विजयसूचक लक्षणों का वर्णन किया गया है जिसके अनुसार, मङ्गल ग्रह मघानक्षत्र में स्थित है तथा बार-बार वक्र होकर ब्रह्मराशि (बृहस्पति से युक्त) श्रवण नक्षत्र को पूर्ण रूप से आवृत करके स्थित है जिसका प्रभाव कृषि पर अनुकूल पड़ा है जिससे पृथ्वी पर सब प्रकार के अनाज पौधे बढ़ गये हैं, शस्य की मालाओं से अलंकृत है,

जौ में पांच-पांच तथा जड़हन धान में सौ-सौ बालियां लग गयी हैं। इस वर्णन से स्पष्ट होता है कि कृषि पर ज्योतिष का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। अतः यह कहा जा सकता है कि महाभारतकाल में कृषि, काल तथा ग्रह-नक्षत्रों पर आधारित थी। जिसे आधुनिक वैज्ञानिक तथा ज्योतिषी भी स्वीकार करते हैं। अतः इस समस्त विवरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में कृषि व्यवस्था अत्यन्त विकसित थी तथा वैज्ञानिक तकनीकियों से सुव्यवस्थित भी थी।

शुक्ल पक्षमतिक्रम्य कार्तिकस्य विचारयेत् । गभोणा सम्भवं सम्यक् सस्यसम्पत्ति कारकम् ।।
वहत् सं. (गर्भलक्षणाध्याय) 6

क्षीयमाणे ततः सोमे ओषध्यो न प्रजज्ञिरे।।
वीरूदोषधयश्चैव बीजानि विविधानि च ।।
महा. भा. शल्य. पर्व. 35.64-71

वक्रानुवकं कृत्वा च श्रवणं पावकप्रभः । ब्रह्मराशिं समावृत्य लोहिताङ्गे व्यवस्थितः ।। सर्वसस्यपरिच्छन्ना पृथिवी सस्यमालिनी। पञ्चशीर्षा यवाश्चापि शतशीर्षाश्चशालयः ।। महा. भा. भीष्म पर्व. 3.18-19

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महाभारत तथा कृषि विज्ञान

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महाभारत तथा कृषि विज्ञान

पृथ्वी पर जीवन धारण करने के लिये जिस प्रकार वायु, जल आदि आवश्यक हैं। उसी प्रकार भूख शान्त करने के लिए भोजन आवश्यक है और यह भोजन मुख्य रूप से धान्य, कन्द, मूल, फल आदि कृषि द्वारा प्राप्त होते हैं, इस प्रकार कृषि अधिकृत प्रवर्तित विज्ञान ‘कृषि विज्ञान’ कहलाता है।

कृषि विज्ञान-सामान्य परिचय
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कृषि शब्द की व्युत्पत्ति कृष् धातु में विलेखन प्रत्यय के योग से हुई है, जिसका अर्थ है – विलेखन क्रिया। विलेखन को उत्कीर्ण, कर्षण, अपकर्षण भी कहा जाता है। अतः भूमि पर कर्षण द्वारा फसलों को उगाना, उनकी कटाई और पशुपालन आदि कृषि-विज्ञान के अन्तर्गत आते हैं। कृषि शब्द की व्युत्पत्ति के
आधार पर निम्नलिखित अर्थ स्पष्ट होते हैं

कृष्यते इति कृषिः, कृष्यतेऽनेनेति कृषिः कर्मसामान्यं कृषिः कर्षण क्रियायाः फलं कृषिः

शतपथ ब्राह्मण में कृषि को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया गया है –
अथैनं विकृषति, अन्नं वै कृषिः। तथा आदि पुराण के अनुसार,
कृषिभूकर्षणे प्रोक्ता।
. सं. वाङ् कृषि. विज्ञा. परिच्छेद पृ. 20 १ शत. ब्रा. 7.2.2.6
आदि. पु. 16.181

इस प्रकार कृषि का प्रारम्भ अनादि काल से माना गया है। इस क्षेत्र में निरन्तर विज्ञान के आधार पर विकास होते रहे हैं। यह विज्ञान वैदिक काल से लेकर उत्तर काल तथा आधुनिक काल तक निरन्तर विकास करता आया है।

महाभारत तथा कृषि विज्ञान
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महाभारत काल में कृषि विज्ञान अत्यन्त विकसित स्थिति में था। कृषि के महत्व से सभी परिचित थे तथा इस क्षेत्र में विकास हेतु अनेक कार्य महाभारत काल में किये गये। महर्षि व्यास ने कृषि को इस जगत् के जीवन का मूल माना है तथा राजा द्वारा उचित शासन व्यवस्था से इसका पालन-पोषण सम्भव बताया है।

इस सन्दर्भ में राजा के न होने पर प्रजा की हानि का उल्लेख करते हुए वसुमना तथा बृहस्पति के संवाद में वर्णन मिलता है। इसी प्रकार कृषि के प्रयोजन को अन्न की उत्पत्ति का आधार बताते हुए बृहस्पति द्वारा अन्न के महत्व का उल्लेख युधिष्ठिर के प्रति किया गया है। इस वर्णन से महाभारत में कृषि के महत्व का बोध होता है।

महाभारत में श्रीकृष्ण द्वारा गीता में कृषि के स्वरूप का उल्लेख किया गया है जिसमें अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव, ये पांच कर्म कृषि विज्ञान की दृष्टि
से अत्यन्त महत्वपूर्ण बताये गये हैं। यथा –

अधिष्ठान – कृषि की अधिष्ठात्री देवी ‘पृथ्वी’ हैं, जो सभी बीजों की प्रसवयित्री
और भूतधात्री हैं। इस सन्दर्भ में अथर्ववेद में भी वर्णन मिलता है।
वार्तामूलो ह्ययं लोकसय्या वैधार्यते सदा।
तत् सर्वं वर्तते सम्यग् यदा रक्षति भूमियः ।। महा. भा. शान्ति. पर्व. 68.35

प्राणा ह्यन्नं मनुष्याणां तस्माज्जन्तुश्च जायते।
अन्ने प्रतिष्ठितो लोकस्तस्मादन्नं प्रशस्यते।। सतां पन्थानमावृत्य सर्वपापैः प्रमुच्यते।। महा. भा. अनु. पर्व 112.11-23

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथकचेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ।। गीता. 18.14

यस्यामन्नं कृष्टयः सम्बभूव, यस्यामिदं जिन्वन्ति प्राणदेजत् सा नो भूमि: अथर्व. वे. 12.1.3
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कर्ता – कृषि कर्म का कर्ता बुद्धि कौशलयुक्त तथा कृषि तंत्र का जानकार होता है। धान्य उत्पादन के कारण ‘धान्यकृत’, कर्षण व्यापार से ‘कृषक तथा कृषि रूप वृत्ति से ‘कृषीवल और हल के मुख से भूमिगत कीट आदि जीवों का नाश करने से ‘कीनाश” कहलाता है।

करण – कृषि कर्म के साधन यथा – जल, बीज, हल आदि करण कहलाते

चेष्टा – क्षेत्रकर्षण, बीजवपन, फसल सींचना, धान्य निस्तृणीकरण धान्य लवन, मर्दन आदि कर्म चेष्टा कहलाते हैं।

दैव – कृषि की सिद्धि पर दैव प्रभाव निश्चित रूप से पड़ता है। यथा – इन्द्र, सूर्य, वायु, पर्जन्य, प्रजापति, पृथ्वी आदि दिव्य शक्तियां ग्रह नक्षत्र तथा काल आदि कृषि को प्रभावित करते हैं। ऋग्वेद के क्षेत्रपति सूक्त में दिव्य शक्तियों की स्तुति का उल्लेख मिलता है।

इस विवरण से स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में कृषि के सभी तत्त्वों का ज्ञान प्रचलित था। इसके अतिरिक्त महर्षि व्यास ने महाभारत में अनेक स्थानों पर कृषि विज्ञान से सम्बन्धित तथ्यों का उल्लेख किया है, जैसे – कृषि कर्माधिकारी, भूमि, कृषि-प्रक्रिया, सिंचाई के साधन, कृषि उपयोगी यंत्र, वपन क्रिया, कृषि संरक्षण, कृषि पर ज्योतिषीय प्रभाव आदि ।

महाभारत तथा कृषि कर्माधिकार
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भारतीय जीवन दर्शन का मूल आधार कर्म है। कर्म प्राणियों का स्वभाव है। महाभारत में गीता में कहा गया है कि जीव का प्रतिपल किया गया कर्म ही ठहरता

वपन्तो बीजमिव धान्यकृतः । ऋ. वे. 10.94.13 – कृषि पराशर 1.1 3 ऋ. वे. 8.6.4 * इरायै कीनाशम् – शुक्ल. यजु. वे. 30.11 5 ऋ. वे. 4.57
है।

इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का ज्ञान दिया है।’ महर्षि व्यास द्वारा में कृषि कर्म के अधिकारी को दो भागों में विभक्त किया गया है, यथा –

वर्णधर्म के अनुसार कृषि कर्म का अधिकार – महर्षि व्यास ने मनुस्मृति के नियम के आधार पर वर्णों को चार भागों में विभक्त किया है, यथा – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और इनमें वैश्य धर्म वालों को ही कृषि का अधिकारी माना है। इस सन्दर्भ में महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म द्वारा वैश्यों के कर्म का उल्लेख युधिष्ठिर के प्रति किया गया है,

जिसके अनुसार वैश्य का कार्य कृषि, गोरक्षा तथा व्यापार करना है। इसी प्रकार शान्ति पर्व में महर्षि भृगु ने भरद्वाज ऋषि के समक्ष यह वर्णन किया है कि कुछ ब्राह्मणों ने कृषि कर्म को अपनी जीविका चलाने की वृत्ति मान लिया था जिससे उनका रङ्ग पीला पड़ गया था,

अतः वे ब्राह्मण वैश्यभाव को प्राप्त हुए। इससे स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में वैश्य धर्म वाले ही कृषि कर्म के अधिकारी थे। इस सन्दर्भ में अर्थशास्त्र में वैश्यों को कृषि कर्म का अधिकारी बताया है। महर्षि वाल्मीकि ने भी रामायण के अयोध्याकाण्ड में वैश्य वर्ण को कृषि कर्म का अधिकारी माना है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संङोस्त्वकर्मणि।।
गीता. 2.47

वैश्यस्तु कृत संस्कारः कृत्वा दारपारिग्रहम् । वार्तायां नित्ययुक्तः स्यात्पशूनां चैवरक्षणे।। मनु. स्मृ. 6.326 3

करोति कर्म यद् वैश्यस्तद् गत्वा ह्युपजीवति ।
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यमकुत्सा वैश्यकर्मणि।। महा. भा. अनु. पर्व. 1359

गोभ्यो वृत्ति समास्थाय पीताः कृष्युपजीविनः। स्वधर्मान् नानुतिष्ठन्ति ते द्विजा वैश्यगतां गताः ।। महा. भा. शान्ति. पर्व. 188.12

कृषि पशुपाल्ये वाणिज्या च वार्ता। अर्थ. शा. 1.4.1
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कच्चित् ते दयिताः सर्वे कृषिगोरक्षजीविनः । वार्तायां संश्रितस्तात लोकोऽयं सुखमेधते।। वा. रा. अयोध्याकाण्ड 100.47

कृषि कर्म राजा का अधिकार – प्राचीन काल में प्रजा की रक्षा तथा पालन-पोषण करना राजा का कर्तव्य माना जाता था। अतः इस दृष्टि से उसे अपने
राज्य की कृषि व्यवस्था को भी उत्तम बनाने का प्रयास करना पड़ता था।
महाभारतकार ने अनेक स्थानों पर राजा के कर्तव्यों में कृषि की रक्षा, पोषण आदि का उल्लेख किया है।

इस सन्दर्भ में सभा पर्व में नारद मुनि द्वारा प्रश्नोत्तर शैली में युधिष्ठिर के समक्ष शासनोपदेश दिया गया है। जिसमें नारद मुनि ने राजा द्वारा कृषि व्यवस्था को संचालित करने वाले महत्वपूर्ण तत्त्वों का उल्लेख किया है।’ इस वर्णन से स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में कृषि व्यवस्था राजा के अधीन होती थी।

महाभारत तथा भूमि
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कृषि के सन्दर्भ में भूमि का विशेष महत्व है। यदि भूमि उपजाऊ होती है तभी उत्तम फसल होती है और यदि भूमि उपजाऊ न हो तो वह बंजर कहलाती है और इस पर फसल नहीं उत्पन्न होती है। यहां उपजाऊ भूमि से तात्पर्य ‘उर्वरा युक्त भूमि’ से है।

महाभारत के अनुशासन पर्व भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर के प्रति कृषि योग्य भूमि को श्रेष्ठ बताया गया है। इसके अनुसार प्रबल मिट्टी से युक्त अन्न उपजाने वाली तथा धातुओं से विभूषित भूमि उत्तम मानी गयी है। कृषि योग्य भूमि, जिसमें कुआं हो, बीज सहित फल लगे हों तथा जिसे हल से जोता गया हो, वह दान करने योग्य होती है। ऐसा दान करने वाला व्यक्ति जगत् में शुभ सम्पत्ति प्राप्त

कच्चिन्न चौरैर्लुब्धैर्वा कुमारैः स्त्रीवलेन वा। त्वया वा पीडयते राष्ट्र कच्चित् तुष्टाः कृषीवलाः।। वार्तायां संश्रितस्तात लोकोऽयं सुखमेधते।। महा. भा. सभा. पर्व. 5.77-81

सुप्रदर्शा बलवती चित्रा धातुविभूषिता। उपेता सर्वभूतैश्च श्रेष्ठा भूमिरियेच्यते ।। महा. भा. अनु. पर्व. 58.2

हलकृष्टां महीं दद्याद् यत्सबीजफलान्विताम् । सुकूपशरणां वापि सा भवेत् सर्वकामदा।। महा. भा. अनु. पर्व 145. पृ. 5998
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करता है, परन्तु ऊसर अथवा जली हुई भूमि दान नहीं करनी चाहिए। ऐसा उल्लेख ब्रह्मदेव द्वारा भूमि के महात्म्य के वर्णन में देवों के प्रति दिया गया है।’ महाभारत के शान्ति पर्व में भूमि की विशेषता के सन्दर्भ में मनु द्वारा बृहस्पति के प्रति कथन है कि जिस प्रकार भूमि में एक ही रस होता है तो भी उसमें जैसा बीज बोया जाता है उसी के अनुसार वह उसमें रस उत्पन्न करती है,

उसी तरह अन्तरात्मा से ही प्रकाशित बुद्धि पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार ही एक शरीर से दूसरे शरीर को प्राप्त होती है। यहां मनु द्वारा स्पष्ट कहा गया है कि भूमि में एक ही रस विद्यमान होत है फिर भी इससे भिन्न-भिन्न रसों से युक्त फसल उत्पन्न होती है। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास भूमि के महत्त्व तथा उसकी विशेषताओं से भली-भाँति परिचित थे।

महाभारत तथा कृषि प्रक्रिया
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शिव-शक्ति और शिवलिंग क्या है

प्राचीन काल से कृषि कर्म को श्रेष्ठ माना गया है। सम्पूर्ण कृषि प्रक्रिया का आधार वैज्ञानिक तकनीक है। कृषि प्रक्रिया के अन्तर्गत सर्वप्रथम भूमि को जोता जाता है फिर बीजारोपण होता है इसके बाद सिंचाई, निराई, कटाई आदि कार्य किये जाते हैं।

इस सन्दर्भ में महाभारत शल्य पर्व में ऋषियों द्वारा बलराम के समक्ष कुरूक्षेत्र के नामकरण का कारण बताते हुए कथन है कि पूर्व समय में अमित तेजस्वी राजर्षि प्रवर महात्मा कुरू ने इस क्षेत्र को बहुत वर्षों तक जोता था, इसी कारण इसका नाम ‘कुरूक्षेत्र’ पड़ा। यहां कृषि कर्म जोताई का उल्लेख किया गया

क्षेत्रभूमिं ददल्लोके शुभां श्रियमवाप्युयात् | रत्नभूमिं प्रदद्यात् तु कुलवंशं प्रवर्धयेत् ।। न चोषरा न निर्दग्धां महीं दद्यात् कथंचन । न श्मशान परीतां च न च पापनिषेविताम् ।। शल्य पर्व 66.31.32

यथा ह्येकरसा भूमिरोषध्यर्थानुसारिणी। तथा कर्मानुगा बुद्धिरन्तरात्मानुदर्शिनी।। महा. भा. शान्ति. पर्व. 206.5

पुरा च राजर्षिवरेण धीमता बहूनि वर्षाण्यामितेन तेजसा। प्रकृष्टमेतत् कुरूणा महात्मना ततः कुरूक्षेत्रमितीहपप्रथे।। महा. भा. शान्ति. पर्व 53.2

है। महर्षि व्यास ने श्रीमहेश्वर तथा उमा देवी के संवाद में कृषि की समस्त प्रक्रिया का विस्तृत विवेचन किया है इसके अनुसार श्री महेश्वर द्वारा जैव तथा मनुष्य दोनों से सम्पादित होने वाले कार्यों के सन्दर्भ में कथन है कि कृषि में जो जुताई, बोवाई, रोपनी, कटनी तथा ऐसे ही और भी जो कार्य देखे जाते हैं, वे सब मानुष कहे गये हैं।

दैव से उस कर्म में सफलता और असफलता होती है। इसमें बीज का रोपना और काटना आदि मनुष्य का काम है, परन्तु समय पर वर्षा होना, बुवाई का सुन्दर परिणाम निकलना, बीज में अङ्कुर उत्पन्न होना और शस्य का श्रेणीबद्ध होकर प्रकट होना इत्यादि कार्य देवसम्बन्धी बताये गये हैं। दैव की अनुकूलता से ही इन कार्यों का सम्पादन होता है। यहां व्यास द्वारा कृषि की सम्पूर्ण प्रक्रिया का विवेचन किया गया है।

कृषि प्रक्रिया में निराई विधि अत्यन्त महत्वपूर्ण मानी जाती है। इससे खेती की उपज काफी बढ़ जाती है। इस विधि में किसान खेत में व्यर्थ निकले घास तथा जङ्गली पौधे आदि को काटकर साफ कर देता है। इस विधि का उल्लेख भीष्म, युधिष्ठिर के समक्ष क्षत्रियों के कर्तव्य के वर्णन में प्रकारान्तर से किया गया है। कृषि पराशर में भी निराई विधि को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। यथा
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निष्पन्नमपि यद्धान्यं न कृतं तृणविजतम्। न सम्यक् फलमाप्नोति तृणक्षीणा कृषिर्भवेत् ।। कुलीरभाद्रयोर्मध्ये यद्धान्यं निस्तृण भवेत। तृणैरपि तु सम्पूर्ण तद्धान्यं द्विगुणं भवेत्।।
लौकिकं तु प्रवक्ष्यामि दैवमानुषनिर्मितम् । कृषौ व दृश्यते कर्म कर्षणं वपनं तथा।।
एवमादि तु यच्चान्यत् तद् दैवतमिति स्मृतम् ।। महा. मा. अनु. पर्व. 145 पृ.

यथैव क्षेत्रनिर्याता निर्यात क्षेत्रमेव च। हिनस्ति धान्यं कक्षं च न च धान्यं विनश्यति ।।
एवं शस्त्राणि मुञ्चन्तो ध्नन्ति वध्याननेकधा। तस्यैषां निष्कृतिः कृत्स्ना भूतानां भावनं पुनः ।।
महा. भा. शान्ति पर्व 97.6-7

कृषि प्रक्रिया में वर्षा का अत्यधिक महत्व है क्योंकि वर्षा का जल नदी, तालाब, कुओं आदि के साथ-साथ भूमि को गहराई तक सींच देता है। इसी कारण प्राचीन काल में वैदिक ऋषि, मुनि आदि उत्तम वर्षा के लिए निरन्तर यज्ञ, हवन आदि का कार्य करते रहते थे।

महाभारत काल में भी कृषि के लिए वर्षा का जल अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता था। इस सन्दर्भ में शान्ति पर्व में पूजनी चिड़िया द्वारा ब्रह्मदत्त के प्रति कथन है कि जो किसान वर्षा के समय का विचार न करके खेत जोतता है उसका पुरूषार्थ व्यर्थ जाता है और उस जुताई से उसको अनाज नहीं मिल पाता।’

इस वर्णन के अनुसार किसान को उचित समय में (वर्षा को ध्यान में रखते हुए) कृषि करनी चाहिए। महाभारत के शान्ति पर्व में जाजलि तथा तुलाधार के मध्य वर्षा के महत्व तथा जल चक्र के विषय में संवाद मिलता है जिसमें तुलाधार का कथन है कि सूर्य से जल की वृष्टि होती है, वृष्टि से अन्न उपजता है और अन्न से सम्पूर्ण प्रजा जन्म और जीवन धारण करती है तथा यज्ञ भी अत्यन्त शुभदायी है।

इसी प्रकार कृषि पराशर द्वारा भी कृषि के सन्दर्भ में वर्षा का ज्ञान होना आवश्यक बताया गया है। सूर्य की किरणें वर्षा का सृजन करने वाली है इस सन्दर्भ में मत्स्य पुराण में वर्णन मिलता है। इस समस्त विवरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में कृषि प्रक्रिया अत्यन्त विकसित थी।
कृषि प्रक्रिया में उत्पन्न धान्य प्राणियों का आहार योग्य अन्न कहलाता है। मनुष्य अपने दैनिक आहार के लिये धान्य पर ही आश्रित है। कृषकों को धान्य की

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यस्तु वर्षमविज्ञाय क्षेत्रं कर्षति कर्षकः । हीनः पुरूषकारेण सस्यं नैवाश्नुते ततः ।। महा. भा. शान्ति पर्व 139.79

यज्ञात् प्रजा प्रभवति नभसोऽम्भ इवामलम् अग्नौ प्रास्ताहुतिर्तद्भन्नादित्यमुपगच्छति।। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः | तस्मात् सुनिष्ठिताः पूर्वे सर्वान् कामांश्च लेभिरे।। अकृष्टपच्या पृथिवी आशीर्भिर्नीरूधोऽभवन । महा. भा. शान्ति पर्व 263.11-12

वृष्टिमूलाकृषिः सर्वा वृष्टिमूलं च जीवनम् । तस्मादादौ प्रत्यत्नेन वृष्टिज्ञानं समाचरेत् ।। कृषि. परा. 10

अमृता जीवना सर्वा रश्मयो वृष्टि सर्जनाः। मत्स्य. पु. 128.20

पूर्वावस्था, फसल के प्रकार भूमि के अनुसार और धान्य के गुण तथा भेदों का सम्यक ज्ञान होना आवश्यक है। इस सन्दर्भ में महाभारत के अनुशासन पर्व में ब्रह्मदेव द्वारा वसिष्ठ के समक्ष बीज के विकास के क्रम का विस्तृत उल्लेख किया गया है।

महाभारतकार ने महाभारत में नाना प्रकार के धान्यों का उल्लेख अनेक स्थानों पर किया है। इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास द्वारा शुकदेव के प्रति वानप्रस्थ आश्रम की महिमा के वर्णन के प्रसङ्ग में धान, जौ, नीवार आदि अन्न का उल्लेख किया गया है।

इस सन्दर्भ में अनुशासन पर्व में राजा कुशिक तथा उनकी पत्नी द्वारा महर्षि च्यवन की सेवा में नाना प्रकार के अन्नों, फलों आदि द्वारा निर्मित व्यंजन लाये जाने का उल्लेख मिलता है जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस काल में कृषि द्वारा नाना प्रकार के धान्य होते थे।

इसी सन्दर्भ में शान्ति पर्व में अहिंसा की प्रशंसा करते हुए नारद मुनि द्वारा सांवा चावल, सूर्यपर्णी (जङ्गली उड़द) तथा शाक (सुवर्जला) आदि का उल्लेख किया गया है।
इस समस्त विवरण से ऐसा प्रतीत होता है कि महाभारत काल में कृषि प्रक्रिया अत्यन्त विकसित थी तथा इससे नाना प्रकार के धान्य प्राप्त किये जाते थे।
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बीजतो ह्यङ्करोत्पत्तिरङ्गकुरात् पर्णसम्भवः । पर्णान्नालाः प्रसूयन्ते नालात् स्कन्धः प्रवर्तते।। क्षेत्रबीजसमायोगात् ततः सस्यं समृद्धयते।। महा. भा. अनु. पर्व. 6.4-8

अफालकृष्टं ब्रीहियवं नीवारं विघसानि च। हवीषिं सम्प्रयच्छेत मखेष्वत्रापि पञ्चसु ।। महा. भा. शान्ति पर्व 244.7

मांसप्रकारान् विविधा शाकानि विविधानि च। वेसवारविकारांश्च पानकानि लघूनि च।।
सर्वमाहारयामास राजा शापभयात् ततः । महा. भा. अनु. पर्व 53.17-20

श्यामाकमशनं तत्र सूर्यपर्णी सुवर्चला। तिक्तं च विरसं शाकं तपसा स्वादुतां ग्राम ।। महा. भा. शान्ति पर्व 272.4

महाभारत तथा वपन
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बीज वपन कृषि विज्ञान का मेरूदण्ड कहलाता है। जिस प्रकार भारतीय संस्कृति में गर्भाधान संस्कार का विशेष महत्व है उसी प्रकार कृषि विज्ञान में बीज वपन का महत्व है। उत्तम कृषि का प्रथम संस्कार कर्षण तथा द्वितीय कर्म, वपन होता है। मनुस्मृति में कृषि करने वाले कृषक का प्रथम गुण ‘बीजनामुप्तिविद’ कहलाता है। ऋग्वेद में बीज की उत्पत्ति के लिये ‘वपन’ शब्द आया है। कृषि पराशर के अनुसार, भूमि में बीज वपन की दो विधियां हैं – (1.) वपन (2.) रोपण
संस्कृत वाङ्मय में अनेक ग्रन्थों में बीज के वपन के लिये निम्नलिखित बिन्दुओं का वर्णन मिलता है

वपन बीज संग्रह

बीजवपन काल

वपन विधि

अनुपयुक्त बीज

वपन बीज संग्रह – कृषि कर्म में बीज का संग्रह करना बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। कृषि विज्ञान के अनुसार वपन के लिये बीजों का संग्रह यथासमय कर लेना चाहिए। सामान्यतः फसल से प्राप्त अन्न को बाजार तथा घर में उपयोग हेतु निकालने के बाद थोड़ा अन्न के बीजों का संग्रह कर बचा लिया जाता है।

यही बीज बोकर नयी फसल उत्पन्न होती है। अतः बीज संग्रह अत्यन्त अनिवार्य है। इस सन्दर्भ में बीज के संग्रह को महत्वपूर्ण बताते हुए ब्रह्मदेव द्वारा नारायण के प्रति कथन है कि आप ही जगत् के सभी बीजों के संग्रहकर्ता हैं।
मनु. स्मृ. (मनवथमुक्तावली) 9.330 ऋ. वे. 10.64.13

धान्यबीजानां वपनं भवति काण्डबीजानां रोपणञ्च ।कृषि परा. 3.103 * देवानामपि देवस्त्वं सर्वविद्यापरायणः।। जगद्वीज समाहार जगतः परमो ह्यसि ।। महा. भा. अनु. पर्व. 13. पृ. 5488

महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के प्रति आपत्ति के समय राजा के धर्म का उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार धर्मज्ञ पुरूषों का कथन है कि मनुष्य को अपने भोजन के लिये संचित अन्न में से भी बीज बचाकर रखना चाहिए।’ इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास द्वारा यह भी कथन मिलता है कि बीज से बीज की उत्पत्ति होती है। कृषि पराशर में भी बीज संग्रह का उल्लेख मिलता है, यथा

माघे वा फाल्गुने मासि सर्वबीजानि संहरेत् । शोषयेदातपे सम्यक् नेवाधो विनिधापयेत्।।१७५।।
(Krishi-paraashara) कृषिपराशर

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बीज वपन काल – कृषि विज्ञान के अनुसार वपन के लिये उपयुक्त काल वह है जिसमें उप्त बीज को वायु, जल, अग्नि द्वारा पोषण प्राप्त कर पृथ्वी गर्भ में धारण करती है। अतः सभी औषधियों का वपन काल और कृषिकाल ज्योतिष चक्र के अधीन होता है। कृषि वैज्ञानिक भी वपन काल के महत्व को स्वीकार करते हैं। इस

बीजं भक्तेन सम्पाद्यमिति धर्मविदोविदुः । अत्रैतच्छम्बरस्याहुमहामायस्य दर्शनम् ।। महा. भा. शान्ति पर्व 130.33

बीजाद् बीजं तथैव च ।। महा. भा. शान्ति पर्व 305.21

सन्दर्भ में महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के समक्ष पृथ्वी के दस गुणों का उल्लेख किया गया है, जिसमें से पृथ्वी का एक गुण बीज को अङ्कुरित करने की शक्ति है।

महाभारतकार ने महाभारत में अनेक स्थानों पर कथानक को स्पष्ट करने हेतु प्रकारान्तर से बीज वपन काल का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में द्रोण पर्व के कर्ण द्वारा कृपाचार्य के प्रति कथन है कि “शूरवीर वर्षाकाल के मेघों की तरह सदा गरजते हैं और ठीक ऋतु में बोये हुए बीज के समान शीघ्र ही फल भी देते हैं।

यहां महाभारतकार ने साङ्केतिक रूप में बीज वपन हेतु उचित काल का उल्लेख किया है। इसी प्रकार कर्ण पर्व में युधिष्ठिर द्वारा अर्जुन के प्रति क्रोधपूर्ण वचन है कि जिस प्रकार बोया हुआ बीज समय पर मेघ द्वारा की हुई वर्षा की प्रतीक्षा में जीवित रहता है, उसी प्रकार हम सभी ने तेरह वर्षों तक सदा तुम पर ही आशा लगाकर जीवन धारण किया है।

इस वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में कृषि कर्म में बीज वपन काल को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता था। महाभारतकार ने कथानक के प्रवाह में अनायास ही कृषि सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख कर डाला है।

इस सन्दर्भ में उद्योग पर्व में श्रीकृष्ण की यात्रा का उल्लेख वैशम्पायन द्वारा जनमेजय के प्रति किया गया है जिसमें अगहनी धान के मनोहर खेतों के लहलहाने का वर्णन मिलता है। जिससे यह प्रतीत होता है कि महाभारत काल में धान की फसल अगहन के मास में लगभग तैयार हो जाती थी।
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भूमेः स्थैर्य गुरूत्वं च काठिन्यं प्रसवार्यता। गन्धो गुरूत्वं शक्तिश्च संघातः स्थापना धृतिः ।। महा. भा. शान्ति पर्व. 255.3 2

शूरा गर्जन्ति सततं प्रावृषीव बलाहकाः ।। फलं चाशु प्रयच्छन्ति बीजमुप्तमृताविव। महा. भा. द्रोण, पर्व. 158.25

ॐ त्रयोदेशेमा हि समाः सदा वयं त्वामन्वजीविष्म धनंजयाशया।
काले वर्ष देवमिवोप्तबीजं तन्नः सर्वान् नरके त्वं न्यमज्जः।। महा. भा. कर्ण पर्व. 68.9

स शालिभवनं रम्यं सर्वसस्यसमाचितम् ।
सुखं परमधर्मिष्ठमभ्यगाद् भरतर्षभ।।। महा. भा. उद्यो. पर्व. 84.15

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महाभारत तथा पर्यावरण विज्ञान

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महाभारत तथा पर्यावरण विज्ञान – 2 mahabharat mai paryavaran

महाभारतकार ने वृक्षों के महत्व को जानकर महाभारत में देवों, यक्षों तथा मानवों की सभाओं के वर्णन के प्रसङ्ग में नाना प्रकार के वृक्षों, लताओं आदि के लगाए जाने का उल्लेख किया है।

इस सन्दर्भ में यमराज की सभा’ वरूण की सभा’ तथा कुबेर (यक्ष) की सभा’ का उल्लेख सभा पर्व में मिलता है। महाभारतकार ने पर्यावरण की स्वच्छता तथा स्वास्थ्य वर्धन क्षमता को बनाये रखने के लिए गरों, महलों आदि के समीप वृक्ष, लता, कमलयुक्त पुष्करिणी के बनाये जाने का उल्लेख महाभारत में अनेक स्थानों पर किया है।

इस सन्दर्भ में मयासुर द्वारा सभा निर्माण के प्रसङ्ग में वैशम्पायन द्वारा जनमेजय के प्रति चर्चा की गयी है कि उस भवन के चारों ओर अनेक प्रकार के बड़े-बड़े वृक्ष लहलहा रहे थे, सदा फूलों से युक्त तथा शीतल छाया वाले थे। साथ ही भवन के चारों ओर वन, उपवन और बावलियां भी थीं। इससे प्रतीत होता है कि महाभारतकार ने पर्यावरण संरक्षण के सन्दर्भ में ही वृक्षारोपण करने की बात कही है।’

महाभारत तथा जल संरक्षण

तत्त्ववेत्ताओं के अनुसार मानव शरीर पञ्च तत्त्वों से मिलकर बना है – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश । मानव शरीर का 2/3 भाग और उसके समस्त भार का 4/5 भाग जल ही होता है। इसी प्रकार सभी वृक्षों जीव-जन्तुओं के शरीर में

पुण्यगन्धाः स्रजस्तक्य नित्यं कामफला द्रुमाः ।। महा. भा. सभा पर्व. 8.6

नीलपीतासितश्यामैः सितैर्लोहितकैरपि। अवतानैस्तथा गुल्मैर्मजरीजारिभिः।। महा. भा. सभा पर्व. 9.3

नलिन्याश्चालकाख्याया नन्दनस्य वनस्य च । शीतो हृदयसंद्धादी वायुस्तमुपसेवते ।।
महा. भा. सभा पर्व. 10.8

तां सभामभितौ नित्य पुष्पवन्तो महाद्रुमाः।
आसन् नानविधा लोलाः शीतच्छायां मनोरमाः ।। काननानि सुगन्धीनि पुष्करिण्यश्च सर्वशः। हंसकारण्डवो पेताश्चक्रवाकोपशोभितः ।। महा. भा. सभा पर्व. 3.34-35
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भी जल रहता है। अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि जल, प्राणियों के लिए अत्यावश्यक है।
प्राचीनकाल में वैदिक ऋषियों, शास्त्रकारों और विद्वानों ने पर्यावरण की शुद्धि बनाये रखने के लिये जल के महत्व का उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में किया है। संस्कृत वाङ्मय में जल को जीवन का पर्याय माना गया है। ऋग्वेद के मंत्रानुसार शुद्ध जल में अमृत तथा औषधि का निवास होता है।

यथा – अप्स्वन्तरममृत अप्सु भेषजम्।’

महाभारत काल में जल को नारायण का स्वरूप माना जाता था। इस सन्दर्भ में वन पर्व में भगवान बाल मुकुन्द ने अपने स्वरूप की चर्चा में मार्कण्डेय के समक्ष इसका उल्लेख किया है। महाभारत के शान्तिपर्व में तुलाधार तथा जाजलि संवाद में यह चर्चा की गयी है कि सभी नदियां सरस्वती देवी का रूप है। गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं को श्री भागीरथी गङ्गा के नाम से अभिव्यक्त किया है। अतः इस विवरण से प्रतीत होता है कि महाभारत काल में जल को देवता रूप में माना जाता था। इसी कारण धार्मिक भाव के आवरण में लोग जल की स्वच्छता, पवित्रता, संरक्षण आदि को विशेष महत्व देते थे। महाभारत काल में देवनदी गङ्गा का विशेष महत्व दिया जाता था। इसका कारण यह प्रतीत होता है कि गङ्गा नदी के जल में कीटाणु नहीं पड़ते हैं। आधुनिक वैज्ञानिकों ने अनुसंधान के फलस्वरूप यह स्वीकार किया है कि गङ्गा जल में बैक्टीरियोफेज नामक विषाणु होते हैं जो जीवाणुओं तथा अन्य हानिकारक सूक्ष्म जीवों को जीवित नहीं रहने देते हैं। अतः इस नदी के जल में प्राणवायु (ऑक्सीजन) की मात्रा को बनाये रखने की असाधारण क्षमता होती है। अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में गङ्गा के इस

ऋ. वे. 1.30.19 2 तेन नारायणोऽप्युक्तो मम तत् त्वयनं सदा।

महा. भा. वन पर्व 189.3 ३ सर्वा नद्यः सरस्वत्यः सर्वे पुण्याः शिलोच्चयाः ।

महा. भा. शान्ति पर्व 263.42 झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जान्हवी ।।

गीता. 10.31

विशेष गुण से सभी भली-भांति परिचित थे। इसी कारण उसे देवनदी कहा जाता था। इस सन्दर्भ में गरूड़ पुराण में गङ्गा की विशेषता का उल्लेख मिलता है।’

महाभारतकार ने पर्यावरण की सुरक्षा के सन्दर्भ में जल के महत्व का उल्लेख महाभारत में अनेक स्थानों पर किया है। महाभारत के शान्ति पर्व में विश्वामित्र मुनि तथा चाण्डाल के संवाद में बिना जल से उत्पन्न सङ्कट का उल्लेख मिलता है।

इसके अनुसार, त्रेतायुग के समाप्त होने तथा द्वापर युग के प्रारम्भ होने के समय प्रजा के बहुत बढ़ जाने पर उस समय इन्द्र द्वारा वर्षा बन्द कर दी गयी। जिससे नदियां सरोवर, कुएं, छोटे-छोटे जलाशय सूख गये।

जलाभाव के कारण पौसल बन्द हो गये। खेत, गौशालाएं, बाजार-हाट, यज्ञ-उत्सव आदि नष्ट हो गये। नगर उजाड़ हो गये सर्वत्र उपद्रव उपस्थित होकर पृथ्वी का बहुत बड़ा भाग निर्जन हो गया। भूख-प्यास से व्याकुल जीव-जन्तु प्रायः समाप्त हो गये और बचे हुए प्राणी एक दूसरे पर आघात करने लगे। इस कथन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बिना जल से जीवन नष्ट हो जाता है। ऐसी शिक्षा देने के उद्देश्य से मानवों में पर्यावरण सन्तुलन बनाए रखने के लिए जल के महत्व को दर्शाया गया है।

महर्षि व्यास ने जल के महत्व के साथ-साथ जल संरक्षण अर्थात् जल संचय का भी उल्लेख महाभारत में किया है। इस सन्दर्भ में भीष्म तथा युधिष्ठिर के संवाद में जलाशय निर्माण की चर्चा की गयी है। जिसके अनुसार वर्षा के जल का संचय करना अत्यन्त पवित्र तथा पुण्यप्रद कार्य माना गया है। अतः भीष्म द्वारा यह कहा गया है कि वर्षा जल के संचय करने हेतु अधिक से अधिक जलाशय खुदवाने

यस्तु सूर्यांशुसन्तप्तं यो गङ्गम् सलिलं पिबेत् । स सर्वयोनिनिर्मुक्तः प्रयाति सदनं हरेः ।। ग. पु. 9.26 ‘

प्रजानामतिवृद्धानां युगान्ते समुपस्थिते ।
त्रेताविमोक्षसमये द्वापर प्रतिपादने।।
गतदैवतसंस्थाना वृद्धबालविनाकृता। गोजाविमहिषीहीना परस्परपराहता।महा. भा. शान्ति. पर्व 141.14-22

चाहिए साथ ही जितने समय तक तालाब में पानी भरा रहता है उतना ही अधिक पुण्य जलाशय बनवाने वाले को मिलता है। यदि कुछ महीनों तक ही पानी भरा रहे अर्थात् जलाशय कम गहरा हो, तो थोड़ा पुण्य और यदि अधिक गहरा जलाशय होने के कारण सदैव जल भरा रहे तो अत्यधिक पुण्य प्राप्त होता है।’

इस कथन से यह प्रतीत होता है कि महाभारतकार ने भूमिगत जल का स्तर नीचे न हो तथा जल सङ्कट न उत्पन्न हो इसी कारण ऐसा वर्णन किया है। साथ ही यहाँ महाभारतकार ने वर्षा के जल के संचय से बाढ़ आदि की समस्या न उत्पन्न हो ऐसा विचार करके ही यह सरल समाधान सुझाया है कि जलाशय बनवाओ। अतः जल संचय का यह उपाय वैज्ञानिक दृष्टि से उत्तम प्रतीत होता है। mahabharat mai paryavaran

जल की स्वच्छता को ध्यान में रखते हुए महाभारतकार ने शान्तिपर्व में वृत्तासुर के वध से उत्पन्न ब्रह्महत्या के दोष में इसकी चर्चा की है। इस सन्दर्भ में व्यास ने ब्रह्मदेव द्वारा यह कथन प्रस्तुत किया है कि जो भी मनुष्य अपनी बुद्धि की मन्दता के कारण जल में थूक, खंखार या मलमूत्र डालेगा उसे ब्रह्महत्या का पाप लगेगा।

अतः इस कथन से प्रतीत होता है कि महाभारतकार ने धर्म के आवरण में जल को स्वच्छ बनाये रखने की शिक्षा प्राणियों को दी है। जल की स्वच्छता के सन्दर्भ में अनुशासन पर्व में आयु की वृद्धि और क्षय करने वाले कर्मों की चर्चा भीष्म तथा युधिष्ठिर के मध्य की गयी है,

जिसमें प्रकारान्तर से यह कहा गया है कि दीर्घायु की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को बोये हुए खेत में, गांव के आस-पास पानी में, देव मन्दिर में, गौओं के समुदाय में, देव सम्बन्धी वृक्ष तथा विश्राम स्थान के

वर्षाकाले तडागे तु सलिलं यस्य तिष्ठति ।
अग्निहोत्रफलं तस्य फलमाहुर्मनीषिणः।।
सर्वदानैर्गुरूतरं सर्वदानैर्विशिष्यते। पानीयं नरशार्दूल तस्माद् दातव्यमेव हि।। – महा. भा. अनु. पर्व 58.10-21

अल्पा इति मतिं कृत्वा यो नरो बुद्धिमोहिता।। श्लेष्म मूत्र पुरीषाणि युष्मासु प्रतिमोक्ष्यति ।। तमियं यास्यति क्षिप्रं तत्रैव च निवत्स्यति। तथा वो भविता मोक्ष इति सत्यं ब्रवीमि वः | महा. भा. शान्ति पर्व 282.54-55

निकट तथा बढ़ी हुई खेती में, कभी मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए।’ इस कथन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महर्षि व्यास ने पर्यावरण संरक्षण के सन्दर्भ में ही इसका उल्लेख किया है क्योंकि इस तथ्य से वे सर्वथा परिचित थे कि सार्वजनिक स्थानों पर मलमूत्र, थूक आदि डालने पर इन स्थानों की पवित्रता तथा स्वास्थ्यवर्धक पर्यावरण की क्षति होती है।

इसके कारण रोगाणुओं को पनपने का अवसर मिलता है और नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। आधुनिक चिकित्सकों तथा विद्वानों के अनुसार ऐसी स्थिति में पीलिया, टाइफाइड, हैजा आदि रोग फैलते हैं। अतः यहाँ धर्म के आवरण में महाभारतकार ने भीष्म के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का उल्लेख किया है।

प्राचीन ग्रन्थों जैसे – वेद, पुराण, शास्त्र आदि में जल की शुद्धि के अनेक निर्देश प्राप्त होते हैं। इस सन्दर्भ में वृहत्संहिता में प्रदूषित जल के शोधन की विधि का वर्णन मिलता है। ब्रह्मपुराण में गङ्गा को स्वच्छ रखने के निर्देश दिये गये हैं।’

महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में श्रीकृष्ण द्वारा उतङ्ग मुनि को मरू प्रदेश में
जल प्राप्त होने का वरदान दिये जाने का उल्लेख मिलता है। इस कथानक के अनुसार श्रीकृष्ण ने महर्षि उतङ्ग से वर मांगने को कहा, इस पर महर्षि उतङ्ग ने अपने लिये कुछ न मांगकर भगवान् श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि इस मरूभूमि में जल

नोत्सृजेत पुरीषं च क्षेत्रे ग्रामस्य चान्तिके। उभे मूत्रपुरीषे तु नाप्सु कुर्यात् कदाचन् । देवालयेऽथ गोवृन्दे चैत्ये सत्येषु विश्रमे। महा. भा. अनु. पर्व. 104.54 2

अंजनमुस्तरोशीरैः शराजकोशातकामलकचूर्णैः।।
कतकफलससमायुक्तैर्योगः कूपे प्रदातव्यः ।।। कलुष कटुकं लवणं विरसं, सलिलं यदि वाशुमगन्धि भवेत् । तदनेन भवत्यमलं सुरसं, सु-सुगन्धिगुणैरपरैश्च युतम् ।। बृहत. सं. 58.121-22

न दन्तधावनं कुर्यात् गङ्गागर्भे विचक्षणः । परिधायाम्बराम्बूनि गङ्गा स्रोतसि न त्यजेत् ।। सं. वाङ् विज्ञा. पृ. 19

अत्यन्त दुर्लभ है। अतः इस मरूभूमि में कोई प्यासा न रहे ऐसा वर दें।’ आधुनिक समय में भी श्रीकृष्ण के इस वरदान का प्रभाव थार मरूभूमि में जैसलमेर के निकट देखने को मिलता है।

आज भी कम वर्षा तपती रेत और प्रतिकूल परिस्थितियों के अतिरिक्त वहां के लोगों में जल की एक-एक बूंद को संग्रह करने की अद्भुत प्रतिभा है। यहाँ वास्तविकता में जल देवस्वरूप है तथा जलस्रोत तीर्थ है।

थार क्षेत्र में जल की प्रत्येक बूंद का बहुत ही व्यवस्थित उपयोग करने की आस्थाएं विकसित हैं। जल संरक्षण के प्रति इतनी चेतना भगवान् श्रीकृष्ण के वरदान का ही प्रतिफल प्रतीत होती है।

महाभारत तथा यज्ञ

प्राचीन वैदिक युग से ही पर्यावरण की स्वच्छता के प्रति ऋषि, मुनि, शास्त्रकार आदि चिन्तनशील तथा प्रयत्नशील थे। उस काल में पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त बनाये रखने के लिए अनेक उपाय अपनाये जाते थे जैसे – वृक्ष लगाना, यज्ञ करना, वन्य जीवों की रक्षा करना आदि।

प्राचीन काल में यज्ञ को पर्यावरण शुद्धि का प्रमुख उपाय माना जाता था। यह परम्परा वैदिक काल, रामायण काल तथा महाभारतकाल तक निरन्तर चलती रही है। वेदों, संहिताओं, उपनिषदों आदि

प्राचीन ग्रन्थों में यज्ञ के महत्व की विस्तृत चर्चा मिलती है।
यज्ञ द्वारा न केवल फसल प्रचुर तथा सुस्वादु होती है, वरन् प्रकृति में वानस्पतिक अनुपात बना रहता है।

इसके कारण वृक्ष, वनस्पति आदि फलते-फूलते हैं तथा इससे नाना प्रकार के अप्रत्यक्ष लाभ भी होते हैं। जैसे – वर्षा का होना, रेगिस्तान का विस्तार न होना, वातावरण में ऑक्सीजन (O2) की प्रचुरता बने रहना
आदि। इस सन्दर्भ में यजुर्वेद में निम्नलिखित वर्णन मिलता है यथा –

अवश्यं करणीयं च यद्येतन्मन्यसे विभो। तोयमिच्छामि यत्रेष्टं मरूष्वेतद्धि दुर्लभम् ।। ततः संहृत् तत् तेजः प्रोवाचोत्तङ्कमीश्वरः । एष्टव्ये सति चिन्त्योऽहमित्युक्तवा द्वारकां यथौ। महा. भा. आश्व. पर्व 55.13-14 mahabharat mai paryavaran

सं. वाङ् पर्या, पृ. 15
ऊर्जा वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिस्रुतम् । स्वधा स्थतर्पयत मे पितृन्।’

ऋग्वेद का प्रथम मंत्र भी यज्ञ प्रक्रिया का ही बोध कराता है, यथा –
अग्निमीडे पुरोहितम् यज्ञस्य देवम् ऋत्विजं । होतारं रत्नधातमम् ।।

इसमें वर्णमाला के सब अक्षर प्रयुक्त हुए हैं। इसमें अग्नि को यज्ञ के दूत के रूप में व्यक्त किया गया है। यज्ञ आर्यों की अपनी विशिष्ट पद्धति है। आर्य यज्ञ कुण्ड के चारों ओर पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करते थे और पदार्थों से प्राप्त नाना प्रकार की गैसों का उपयोग प्रदूषण हटाने हेतु, खाद प्राप्त करने हेतु, रोगों की चिकित्सा और वर्षा कराने हेतु करते थे।

महाभारत काल में भी यज्ञ का अत्यधिक महत्व था। महर्षि व्यास ने महाभारत में अनेक स्थानों पर ‘यज्ञ’ का उल्लेख किया है। यज्ञ के महत्व को स्पष्ट करने के लिए महर्षि व्यास ने भगवान श्रीकृष्ण के वचनों में उन्हें यज्ञ का स्वरूप ही व्यक्त किया है।

जिसमें श्रीकृष्ण ने स्वयं को यज्ञों में ‘जपयज्ञ, तथा ‘यज्ञपुरूष’ के नाम से अभिव्यक्त किया है। इससे स्पष्ट होता है कि श्रीकृष्ण ने स्वयं को यज्ञ के समस्त अङ्ग – मंत्र, घृत, अग्नि, औषधि, हविष्यान्न तथा स्वधा बताया है। अतः यह कहा जा सकता है कि भगवान नारायण ही सम्पूर्ण साङ्गोपाङ्ग यज्ञ हैं तथा भगवान के चौबीस अवतारों में यज्ञ पुरूष का अवतार प्रमुख है।

यजु. वे. 2.34 2 ऋ.वे. ३ भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् | सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मा शान्तिमृच्छति ।।

गीता. 5.29 अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाऽस्महमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ।।

गीता. 9.16

सम्पूर्ण देव-समुदाय भगवान् नारायण का ही अंश है। अतः यज्ञ चाहे इन्द्र का हो, चाहे रूद्र का हो, चाहे चण्डी देवी का हो अन्ततः उस यज्ञ में समर्थन भगवान नारायण का ही होता है। ऐसा गीता में श्रीकृष्ण ने मुनि के प्रति कहा है।’

महाभारत काल में यज्ञ के वैज्ञानिक महत्व से लगभग सभी भली-भांति परिचित थे। महाभारतकार ने यज्ञ की वैज्ञानिकता स्पष्ट करते हुए गीता में श्रीकृष्ण के द्वारा कहलाया है कि समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है,

वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है।’ यहाँ स्पष्ट हो जाता है कि यज्ञ के धुएं से उत्पन्न मेघ, वृष्टि करने की क्षमता रखते हैं या यह भी कहा जा सकता है कि यज्ञ के धुएं से बादल बनते हैं, जिसके कारण वर्षा होती है,

इस वर्षा से खेतों की सिंचाई स्वतः हो जाती है और इससे अन्न उत्पन्न होता है। “पर्यावरण की सुरक्षा के लिए न केवल पंच महाभूतों की पवित्रता कायम रखने के निर्देश हैं बल्कि धरती के पर्यावरण की” mahabharat mai paryavaran

यज्ञ एक विज्ञान है, बाह्य दृष्टि रखने वालों के लिए इसका धार्मिक महत्व भले ही नगण्य हो, परन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से यज्ञ एक स्वतंत्र विज्ञान है। इसके प्रत्येक क्रिया-कलाप का अपना महत्व है तथा इसका पूर्ण निर्वाह और समस्त फल इन विधानों के उचित अनुष्ठान पर ही आश्रित होता है।

यज्ञ में औषधि युक्त हविद्रव्य से जो वातावरण निर्मित होता है वह पर्यावरण के लिए उपयोगी होता है। इस प्रकार के वातावरण से अनेक प्रकार के रोग, कृमि

और विषैली गैसों का शमन होता है। यज्ञ ही प्रकृति के स्थूल तत्त्वों में शक्ति और सुगन्ध भरता है। जिस प्रकार वृक्ष मानव द्वारा निष्कासित कार्बन डाई ऑक्साइड

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ।। गीता. 9.23

अन्नाद्भावति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म समुद्भवः ।।
गीता3.14

सूर्यः सोमो महीपुत्रः सोमपुत्रो बृहस्पतिः ।
शुक्रः शनैश्चरो राहू: केतुश्चेति ग्रहाः स्मृताः।। याज्ञव. स्मृ. 1.226

(CO2) को ग्रहण करता है तथा वातावरण शुद्ध करता है उसी प्रकार यज्ञ में आहूत करने वाले तत्त्वों (घी, अन्न, विभिन्न औषधियों) से उत्पन्न धुआं भी वायुमण्डल को दोषमुक्त करता है। इसके फलस्वरूप मनुष्य की प्राणशक्ति बल तथा ऊर्जा से सम्पन्न हो जाती है और आरोग्य तथा आयु की वृद्धि करती है।

यज्ञ द्वारा शुद्ध वायु श्वास द्वारा फेफड़ों में पहुंचती है तो मनुष्य के शारीरिक दोष दूर होते हैं और यदि वृक्षों को दूषित वायु प्राप्त हो तो वे भी निश्चित रूप से दूषित ऑक्सीजन प्रदान करेंगे। आधुनिक समय में दूषित वायु से नाना प्रकार के रोग जैसे – दमा, कास, खांसी आदि फैल रहे हैं।

अतः संस्कृत ग्रन्थों में यह उल्लेख मिलता है कि यज्ञ से उत्तम तथा विविध गुणों से युक्त वृष्टि जल निर्माण होने से वह जल कृषि उत्पादन में गुणात्मक (Qualitative) तथा संख्यात्मक (Quantitative) दोनों प्रकार की वृद्धि करता है।

यद्यपि कल-कारखानों द्वारा निर्मित खाद तो जहां डाली जाती है वहीं फल देती है तथापि यज्ञ की कार्य प्रणाली का प्रभाव विशालक्षेत्र में फैल जाता है।

यज्ञ की वैज्ञानिकता इस बात से और भी पुष्ट हो जाती है कि इसके द्वारा नाना प्रकार के रोगों की चिकित्सा हो जाती है।

यथा – वात रोग चिकिसा के लए अपनाये गये यज्ञोपचार से प्रसिद्ध यज्ञ वैज्ञानिक श्री पं. वीरसेन वेदश्रमी ने दिसम्बर 1979 में दो वात रोगियों (श्री पं. केदारनाथ तथा वेदमित्र) को स्वस्थ किया। इस सन्दर्भ में मासिक पत्रिका ‘जनज्ञान’ के जनवरी 80 अङ्क में पृष्ठ 48-49 पर छपा है।

अथर्ववेद में रोगी के जीवन की रक्षा हेतु ज्ञात तथा अज्ञात रोगों और राज्यक्ष्मा आदि की चिकित्सा के सन्दर्भ में यज्ञ किये जाने का उल्लेख मिलता है।

प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित यज्ञ के वैज्ञानिक महत्व का विस्तृत विवेचन महाभारत में मिलता है। इस सन्दर्भ में गीता में श्रीकृष्ण ने ब्रह्मदेव के वचनों की चर्चा करते वै. वाङ् विज्ञा. पृ. 135 2 मुंचाभित्वा हविषा जीवनाय कमज्ञात यक्ष्मदुत राजयक्ष्मात् । अथर्व. वे. 3.11

हुए कहा है कि कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर ब्रह्मदेव को उनके प्रति कथन है कि तुम सभी इस यज्ञ द्वारा ही वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ ही तुम सभी को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो।

तुम सभी यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम्हें उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम सभी परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे। mahabharat mai paryavaran

यज्ञ के द्वारा बढ़ाये हुए देवता तुम सभी को बिना मांगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरूष उनको दिये बिना स्वयं भोगता है,

वह चोरी ही कहलाता है।’ इस वर्णन में परस्पर पोषण और समभागीदारी का सिद्धान्त प्रतिपादित हुआ है। इसे यज्ञ कहा गया है। यज्ञ साधना का प्रयोजन प्रकृति के चक्र को बनाये रखना है।

अतः हितकारी तथा उपयोगी वस्तुओं का आदान-प्रदान अनिवार्य हो जाता है। जो इस सिद्धान्त का उल्लंघन करता है वह चोर कहलाता है। अर्थात् जिस प्रकार किसी व्यक्ति को कोई वस्तु दी जाये और वह उसे न लौटा पाये तो वह चोर कहलाता है।

उसी प्रकार प्रकृति हमें शुद्ध हवा पानी अन्न आदि प्रदान करती है। अतः हमारा परम कर्तव्य है कि हम वायु-जल आदि को प्रदूषित न करें। अन्यथा प्राकृतिक सन्तुलन बिगड़ जाएगा और सभी के समक्ष जीवन संकट उपस्थित हो सकता है। इस सन्दर्भ में गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है।

महाभारतकार ने यज्ञ की महत्ता को जानकर महाभारत में अनेक स्थानों पर यज्ञों का उल्लेख किया है यथा – सभापर्व में युधिष्ठिर द्वारा राजसूय यज्ञ’, ‘ सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्ट काम धुक् ।। तैर्दत्तान प्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ।। – महा. भा. भीष्म पर्व. 27.10-12 (गीता 3. 10-12)

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ।। गीता. 3.16 3 महा. भा. आश्वमे. पर्व. 85. 4-42

आश्वमेधिक पर्व में प्रजा का कल्याण करने हेतु महर्षि अगस्त्य द्वारा बारह वर्षों तक यज्ञ’ किये जाने का उल्लेख आदि। mahabharat mai paryavaran

इस प्रकार समस्त विवरण से स्पष्ट होता है कि यज्ञ, धर्म, संस्कृति और चिन्तन का आधार स्तम्भ है। भारतीय यज्ञ की प्रक्रिया की सृष्टि की उत्पत्ति और स्थिति का आधार है। यज्ञ वह विधि है जिससे प्रकृति और प्राकृतिक जगत् में आवश्यक सन्तुलन बना रहता है।

यज्ञ विश्व में प्रतिक्षण चलता रहता है। अतएव यजुर्वेद में, अथर्ववेद में तथा ऋग्वेद में यज्ञ को सृष्टि-चक्र या विश्व की नाभि कहा गया है। इस प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए ऋग्वेद में कहा गया है कि यज्ञ के द्वारा धुलोक को प्रसन्न किया जाता है और धुलोक वर्षा के द्वारा पृथ्वी को तृप्त करता है। यज्ञ से मेघ बनते हैं, और मेघ से वर्षा होती है।’

अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में यज्ञ के द्वारा पर्यावरण शुद्धि की वैज्ञानिक चेतना का ज्ञान वैदिक काल से चला आ रहा
था। महा. भा. आश्वमे. पर्व 92.5-38

अयं यज्ञ भुवनस्य नाभि । – ऋ. वे. 1.164.35; यजु.वे. 23.62
अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः | – अथर्व, वे. 8.10.14 ३ भूमिं पर्जन्या जिन्वन्तिदिवं जिन्वन्त्यग्नयः। – ऋ. वे. 1.164.51 mahabharat mai paryavaran

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महाभारत तथा पर्यावरण विज्ञान

वर्तमान समय में जनसंख्या वृद्धि के कारण पर्यावरण प्रदूषण की आशंका बढ़ गयी है। सम्प्रति न केवल यह वसुन्धरा ही प्रदूषण से आक्रान्त है अपितु जल, वायु, आकाश, तेजराशि युक्त आदित्य मण्डल भी प्रदूषण से आच्छादित है। आधुनिक वैज्ञानिकों के मतानुसार पृथ्वी मण्डल के रक्षा कवच ‘ओजोन परत’ में भी छिद्र हो गया है।

पर्यावरण प्रदूषण का परिणाम उत्तरोत्तर बढ़ ही रहा है। स्वार्थ साधन में संलग्न मानवों द्वारा गङ्गा, यमुना आदि नदियों का जल प्रदूषित हो रहा है, वनों को काटा जा रहा है, वन्य जीवों की हिंसा आदि की जा रही है। जिसके कारण वायुमण्डल में कार्बनडाई ऑक्साइड गैस (Co2) की मात्रा में वृद्धि हो रही है

तथा पृथ्वी की उर्वराशक्ति भी कम हो रही है। अतः सभी देशों के प्रबुद्ध वर्ग के चिन्तक पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रयत्नशील हैं। इस दृष्टि से समस्त लोगों के लिए पर्यावरण विज्ञान के ज्ञान का होना अनिवार्य है।

पर्यावरण विज्ञान-सामान्य परिचय
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समस्त विश्व प्राकृतिक पर्यावरण से घिरा हुआ है। इसे भौगोलिक पर्यावरण भी कहते हैं। इसके अन्तर्गत जलवायु ऋतु में तापक्रम, भूमि की उत्पादकता, जङ्गल, पर्वत, समुद्र, आकाश, सूर्य, चन्द्र, पशु-पक्षी आदि आते हैं।

‘पर्यावरण’ शब्द, दो शब्दों से मिलकर बना है ‘परि+आवरण’, ‘परि’ अर्थात् चारों ओर, आवरण अर्थात् ढके हुए। कोई भी वस्तु पदार्थ जो ढका हुआ हो या घिरा हुआ है, वह उसका आवरण है। उसी प्रकार जिन पदार्थों से, जिन क्रियाकलापों से हम घिरे हुए हैं, वही हमारा “पर्यावरण” है।
इस प्रकार वे सभी दशायें जो एक प्राणी के अस्तित्व के लिए आवश्यक है तथा उसे चारों ओर से घेरे हुये हैं, वह “पर्यावरण” कहलाती है।

मैकाइवर तथा पेज के अनुसार, “भौगोलिक पर्यावरण उन सभी दशाओं से मिलकर बना है जो प्रकृति ने मनुष्य को प्रदान की है। भौगोलिक पर्यावरण का सम्बन्ध ऐसी प्राकृतिक दशाओं से है जो मनुष्य से प्रभावित हुए बिना अपना कार्य करती है

तथा जो मनुष्य के अस्तित्व तथा कार्यों से स्वतन्त्र रहते हुए स्वयं परिवर्तित रहती है। वायु, जल, भूमि, पेड़-पौधे, वनस्पति और जीव-जन्तु सभी मिलकर वातावरण का निर्माण करते हैं,
इसे वैज्ञानिक भाषा में “पर्यावरण” (Environment) कहते हैं।

महाभारत तथा पर्यावरण विज्ञान

स्वस्थ पर्यावरण ही मानव तथा कृषि की आधारशिला होती है। इससे ही चतुर्दिक विकास सम्भव है। अतः पर्यावरण एक ऐसी व्यापक दशा है जो सभी प्राणियों के कार्यों, विचारों तथा व्यावहारों को प्रभावित करती है तथा विभिन्न प्रकार से लाभकारी सिद्ध होती है।

इसका विस्तृत उल्लेख वेदों, उपनिषदों, पुराणों रामायण-महाभारत आदि महाकाव्यों में मिलता है जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि प्राचीनकाल में ऋषि, मुनि, तपस्वी आदि विद्वान पर्यावरण विज्ञान के प्रति अत्यन्त चिन्तनशील थे।

इस सन्दर्भ में ऋग्वेद के दशम मण्डल का एक सौ छियालीसवां सूक्त “अरण्यानी सूक्तम्” नाम से प्राप्त होता है, जिसमें ‘अरण्यानी’ को सभी जीवों की माता के रूप में व्यक्त किया गया है। यजुर्वेद में वृक्षों को पूज्य मानकर प्रमाणित किया गया है।
आदि.गृह.विज्ञा. पृ. 107 ‘

आश्चनगन्धिं सुरभिं बह्वन्नामकृषीवलाम् । प्राहं मृगाणां मातरं अरण्यामनिमशंसितम्।।।
ऋ.वे. 10.146.6 ‘

नमो वृक्षेभ्यः।
यजु. वे. 16.17

ओषधीनां पतये नमः |16.19

अरण्यानां पतये नमः | 16.20

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ऋग्वेद में जल को प्राणियों का हितैषी बन्धु कहा गया है।’ महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में पर्यावरण विज्ञान से सम्बद्ध वैज्ञानिक चेतना का उल्लेख किया है। महाभारतकार ने पर्यावरण शुद्धि का सम्बन्ध धर्म से जोड़कर अभिव्यक्त किया है तथा प्रकृति को देवतामय माना है।

महर्षि व्यास ने नदी, पर्वत, समुद्र, वृक्षों की जड़, गोशाला, दुर्गम मार्ग, वन, चौराहे, सड़क, चबूतरे, किनारे गजशाला, अश्वशाला, रथशाला, जीर्ण उपवन, जीर्ण गृह पञ्चभूत, दिशा, विदिशा, चन्द्रमा, सूर्य उनकी किरणें, रसातल तथा अन्यान्य स्थानों में उनके अधिष्ठाता देवता को श्रद्धासहित प्रणाम किया है।

इन समस्त स्थानों में रूद्र देवता का वास होना स्वीकार किया है। महर्षि व्यास ने महाभारत के शान्तिपर्व में जाजलि और तुलाधार के आत्मयज्ञ विषयक धर्मोपदेश में समस्त नदियों को सरस्वती के रूप में व्यक्त किया है तथा पर्वतों को पूजनीय बताया है। यहाँ इस विवरण से ऐसा प्रतीत होता है

कि व्यास द्वारा प्रकृति को धार्मिक भाव से जोड़ने का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के सन्दर्भ में ही है क्योंकि धार्मिक भाव रखने पर मानव स्वतः ही ऐसे स्थलों को प्रदूषित नहीं करेगा तथा इससे पर्यावरण प्रदूषण की समस्या का समाधान स्वतः हो सकेगा। महाभारतकार ने गीता में भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से कहे गये वचनों में मानसिक पर्यावरण के संरक्षण का उल्लेख किया है।

यथा –
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।’
अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम् । पृञ्चतीमधुना पयः ।।
ऋ. वे. 1.23.16 2

ये नदीषु समुद्रेषु पर्वतेषु गुहासु च। वृक्षमूलेषु गोष्ठेषु कान्तारे गहनेषु च।।
रसतलगता ये च ये च तस्मै परं गताः । नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्योऽस्तुनित्यशः ।।
महा. भा. शान्ति पर्व 284.172-175 3

सर्वा नद्यः सरस्वत्यः सर्वेपुण्याः शिलोच्चया
वही 263.42 4 गीता. 7.4

इस वर्णन में भूमि से अहङ्कार पर्यन्त सभी को पर्यावरण कहा गया है। ऐसा संस्कृत वाङ्मय में वर्णित है। काम, क्रोध, लोभ आदि मानसिक पर्यावरण को दूषित करते हैं। विवेक ज्ञान से ऐसा आवृत होता है। अतः गीता के अध्याय तीन में भगवान श्रीकृष्ण का कथन है –

इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमच्यते। एतैर्विमोध्यत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ।।


जब विवेक ज्ञान का तिरोधान होता है तब ज्ञान-विज्ञान का नाश होता है। जिससे सर्वत्र हिंसा, आतङ्कवाद, अपहरण आदि उत्पन्न होता है। गीता में कहा गया है कि

आधिभौतिक पदार्थ स्थूल और आधिदैविक पदार्थ सूक्ष्म है, यथा –
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु पराबुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ।।

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इन्द्रियां, मन, बुद्धि और आत्म ये सूक्ष्म जगत के पदार्थ हैं। ये सभी काम, क्रोध आदि भावों से आवृत्त होते हैं जिससे मानसिक तथा रासायनिक पर्यावरण प्रदूषित होता है। अतः इस आधार पर पर्यावरण के तीन भेद किये जा सकते हैं ,

भौतिक पर्यावरण – इसमें वृक्ष, वनस्पति, नदी, पर्वत, खगोल आदि से मानव जीवन पर प्रभाव पड़ता है,

सामाजिक पर्यावरण – इसमें आचार, भाव, विचार आदि का मानव जीवन पर प्रभाव पड़ता है,

मानसिक पर्यावरण – इसमें काम, क्रोध आदि मनोवेग द्वारा संयम, शिव सङ्कल्प से शान्ति लाभ प्राप्त होता है।

महाभारत तथा जीवों की रक्षा

प्राचीन वैदिक युग से ही ऋषियों और विद्वानों ने वन्य जीवों की रक्षा को महत्वपूर्ण बताया है। प्राचीन ग्रन्थों में इससे सम्बन्धित अनेक तथ्यों का उल्लेख मिलता है। महर्षि व्यास ने गीता में श्रीकृष्ण के वचनों में प्रकारान्तर से यह उल्लेख
गीता. 3.40 2 वही 3.42

किया है कि प्रकृति के पञ्चमहाभूतों से निर्मित सभी प्राणी, वनस्पति, पशु आदि देवताओं का ही रूप है तथा प्रत्येक प्राणी के हृदय में परमपिता परमात्मा का निवास है।’ महाभारतकार ने जीव तथा उसके परिवेश में परस्पर मैत्री तथा प्रेम भाव का होना अनिवार्य बताया है।

अतः उन्होंने जन्तुओं के प्रति हो रहे अत्याचार जैसे – बैलों को बधिया करना, उनसे भारी बोझ उठवाना, दमन करके काम में लगाना आदि को घृणित कार्य बताया है।

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साथ ही पशुओं का क्रय-विक्रय भी अनुचित बताया है। इस विषय में कारण का उल्लेख भी किया है कि पांच इन्द्रियों वाले समस्त प्राणियों में सूर्य,

चन्द्रमा, वायु, ब्रह्मा, यज्ञ और यमराज-इन सभी देवताओं का वास रहता है। जो इन्हें बेचकर आजीविकार्जन करते हैं,

वे पाप के भागी होते हैं। अतः महाभारतकार ने धर्म के आवरण में तुलाधार द्वारा धर्म विषयक चर्चा में जाजलि के प्रति प्रकारान्तर में यह कहा है कि

बकरा अग्नि का, भेड़ वरूण का, घोड़ा सूर्य का और बछड़ा चन्द्रमा का स्वरूप है। अतः इस कथन से यह प्रतीत होता है कि महाभारतकाल में जीव की रक्षा के प्रति समाज चेतनाशील था।

महाभारत काल में जन्तुओं की हिंसा करना तथा मांसाहार करना पाप माना जाता था, परन्तु कहीं-कहीं अपवाद रूप मांसाहार का उल्लेख भी महाभारत में मिलता है।

महाभारत के वन पर्व में धर्म-व्याध तथा कौशिक के संवाद में हिंसा और अहिंसा का विवेचन किया गया है

जिसके अनुसार प्रकारान्तर से यह कथन मिलता है कि प्राणियों का वध करने वाला मनुष्य तो निमित्त मात्र है अतिथियों तथा पोष्य वर्ग के भोजन में और पितरों की पूजा में मांस का उपयोग होने से धर्म होता है।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
महा. भा. भीष्म पर्व, 42.61 (गीता 18.81)

ये चच्छिन्दन्ति वृषणान् ये च भिन्दन्ति नस्तकान्। वहन्ति महतो भारान् वध्नन्ति दमयन्ति च ।। अजोऽग्निर्वरूणो मेषः सूर्योऽश्वः पृथिवी विराट ।। धेनुर्वत्मश्च सोमो वै विक्रीयैतन्न सिध्यति।
262.37-41

निमित्तभूता हि वयं कर्मणोऽस्य द्विजोत्तम | येषां हतानां मांसानि विक्रीणामीह वैद्विज ।। तेषामपि भवेद् धर्म उपयोगे च भक्षणे। देवतातिथिभृत्यानां पितॄणां चापि पूजनम् ।।
महा. भा. वन पर्व. 208.4-5

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वहीं दूसरी ओर शान्तिपर्व में राजा विचख्नु के द्वारा अहिंसा धर्म की प्रशंसा की गयी है जिसमें स्पष्ट रूप से यह कहा गया है कि जो यह सोचते हैं कि

यज्ञ में वृक्ष, अन्न, पशु आदि की आहूति से प्राप्त मांसाहार करना उचित है तो यह ठीक नहीं है अपितु कोई भी ऐसे धर्म की प्रशंसा नहीं करता है।

सुरा, आसव, मधु, मांस और मछली तथा तिल और चावल की खिचड़ी, इन सब वस्तुओं को धूर्तो ने यज्ञ में प्रचलित कर दिया है।

वेदों में इनके उपयोग का विधान नहीं है। अतः इस कथन से यह प्रतीत होता है कि महाभारत काल में यज्ञजनित पशु-पक्षियों की हिंसा को अनुचित माना जाता था।

साथ ही अहिंसा को परम धर्म भी माना जाता था। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अहिंसा को परम धर्म स्वीकार किया है।

इस सन्दर्भ में महाभारत के उद्योग पर्व में सप्तर्षियों तथा नहुष के मध्य यज्ञ-बलि के सन्दर्भ में चर्चा की गयी है जिसमें ऋषियों के मतानुसार वेद में प्रयुक्त गवालम्भ इस बात का प्रमाण है

कि पशु हिंसा यज्ञ के सन्दर्भ में धर्म ही कहलाती है। इस कथन पर नहुष ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वह प्रमाण नहीं है।

नहुष ने किस आधार पर यह उत्तर दिया उल्लेख नहीं मिलता है किन्तु टीकाकार के मतानुसार नहुष का कथन है कि ब्राह्मण ग्रन्थों में हवन के मंत्र हैं

तथा यज्ञ की हवि अर्थात्, दूध, घी, कण्डे आदि गौओं में हैं। इसी कारण गौ और ब्राह्मण दोनों ही पवित्र और अवध्य हैं। अतः यह

यदि यज्ञांश्च वृक्षांश्च यूपांश्चोद्दिश्य मानवाः । वृथा मांस न खादन्ति नैष धर्मः प्रशस्यते।। सुरा मत्स्या मधु मांस मासवं कृसरौदनम् । धूर्तेः प्रर्वाततं ह्येतन्नैद् वेदेषु कल्पितम् ।।
महा. भा. शान्तिपर्व 2658-9

प्राणिनामवधस्तात सर्वज्यायान्मतो मम | अनृतं वा वेदद्वाचं नच हिंस्यात्कथंचन।।
महा. भा. कर्ण पर्व. 23.69

य इमे ब्राह्मणा प्रोक्तामंत्रा वै प्रोक्षणे गवाम् । एते प्रमाणं भवत उताहो नेति वारूप।। नहुषो नेति तानाह तमसा मूढ़ चेतनः।
महा.भा.उद्यो. पर्व 17.9-10

ब्राह्मणांश्चैव गावश्च कुलमेकं द्विधाकृतम् । एकत्र मन्त्रास्तिष्ठन्ति हविरेकत्र तिष्ठति।।

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प्रतीत होता है कि यज्ञ में गो बलि का निषेध तभी (नहुष के समय) से ही है। यहाँ महाभारतकार ने प्रकारान्तर में जीवों की हिंसा करना अनुचित बताया है।

महर्षि व्यास ने महाभारत में अनेक स्थानों पर गोवंश का रक्षण, पालन तथा संवर्धन का उल्लेख किया है।

इस सन्दर्भ में महाभारत के अनुशासन पर्व के सत्तहत्तरवें अध्याय में कपिला गौओं की उत्पत्ति तथा महिमा का वर्णन,

इसी पर्व के अठहत्तरवें अध्याय में वसिष्ठ द्वारा सौ दास के प्रति गोदान की विधि तथा महिमा का वर्णन किया गया है।

इसी पर्व में आगे लक्ष्मी और गौओं के संवाद की चर्चा की गयी है जिसमें गौओं के द्वारा गोबर तथा गोमूत्र में लक्ष्मी के निवास का उल्लेख मिलता है।

इससे यह प्रतीत होता है कि धार्मिक सन्दर्भ में गौओं का विशेष महत्व है। अतः यह कथन महाभारतकालीन जीव संरक्षण की ओर सङ्केत देता है।

ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में यह वर्णन मिलता है कि जो मनुष्य गौ, बैल आदि पशुओं, धनी, वणिजनों और खेती करने वालों की भलीभांति रक्षा करता है, वह मनुष्यों में शिरोमणि है।

अथर्ववेद में गौओं को पूजनीय बताय गया है। इस सन्दर्भ में अथर्ववेद के चतुर्थ काण्ड में सभी दिशाओं को गौओं के समान तथा चन्द्रमा को उनके बछड़ों के समान बताया गया है।

वाल्मीकि रामायण में भगवान राम के पूर्वज महाराज दिलीप द्वारा नन्दिनी गाय की पूजा करने का उल्लेख मिलता है। यही नहीं महाभारत काल में उत्पन्न हुए

दिष्टया प्रसादो युष्माभिः कृतो मेऽनुग्रहात्मकः | एवं भवतु भद्रं वः पूजितास्मि सुखप्रदाः ।।
महा. भा. अनु. पर्व 82.85

पूर्वामनु प्रयंतिमा ददे वस्त्रीन् युक्तां अष्टावरिधांयसो गाः ।
सुबर्धवो ये विश्योइव वा अनस्वन्तुः श्रव ऐषन्त पज्राः ।।
ऋ. वे 1.26.5

दिशो धेनवस्तासां चन्द्रो वत्सः ।
अथर्व वे. 4.39.8

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भगवान् श्रीकृष्ण का एक सर्वप्रिय नाम ‘गोपाल’ है। अतः इस समस्त विवरण से प्रतीत होता है कि प्राचीन वैदिक युग से ही जीवों की सुरक्षा का विशेष महत्व था।

महाभारत तथा वृक्षारोपण

मानव जीवन में वृक्षों का विशेष महत्व है। वृक्ष पर्यावरण को स्वच्छ, सन्तुलित बनाये रखने में सर्वाधिक योगदान देते हैं। ये मिट्टी के कटाव (Soil Erosion) को रोककर मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं जिससे उत्तम फसल प्राप्त होती है। इनके द्वारा कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) के अवशोषित करने तथा ऑक्सीजन (O2) प्रदान करने के कारण ही वातावरण की वायु शुद्ध होती है,

अतः इतने महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कारणों के कारण वृक्ष ‘जीवनदाता’ कहलाते हैं। प्राचीन काल में ऋषि, मुनि, तपस्वी आदि वृक्षों की उपयोगिताओं से भली-भांति परिचित थे।

इस सन्दर्भ में प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों जैसे – वेदों, पुराणों, उपनिषदों, महाकाव्यों आदि में उल्लेख मिलता है। यथा – ऋग्वेद के दशम मण्डल में लिखित मंत्रानुसार, ‘विश्व भेषज’ नामक संबोधन द्वारा आरोग्यकर (औषधीकृत) भेषज वायु प्रवाहित होने का सङ्केत मिलता है।’

यजुर्वेद में वनस्पति, वृक्ष आदि को औषधि के अर्थ में व्यक्त किया गया है।’ ऋग्वेद के दशम मण्डल का एक सम्पूर्ण सूक्त वन देवता के लिए वर्णित है यथा – अरण्यानी सूक्त।

महाभारत में वृक्षारोपण से सम्बन्धित विस्तृत विवेचन मिलता है। इस सन्दर्भ में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के प्रति बगीचे लगाने से प्राप्त फल की चर्चा की गयी है जिसके अनुसार, वृक्षारोपण करने वाला पुरूष अपने मरे हुए पूर्वजों और भविष्य में आने वाली सन्तानों का तथा पितृकुल का ही उद्धार कर देता है, जो वृक्ष लगाता है

आ वात वाहि भेषजं विवातं वाहि यद्रपः । त्वं हि विश्वभेषजो देवानां दूत ईयसे ।।
ऋ. वे. 10.137.7 2

ओषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिः ।
यजु. वे. 36.17

माध्वीनः सन्त्वोषधीः 13.27 3 ऋ. वे. 10.146वां सूक्त

उसके लिये ये वृक्ष पुत्ररूप होते हैं, इसमें संशय नहीं है। फूले–फले वृक्ष इस जगत में मनुष्यों को तृप्त करते है, जो वृक्ष का दान करता है, उसको वे वृक्ष पुत्र की भांति परलोक में तार देते हैं।’ महर्षि व्यास द्वारा वर्णित इस कथन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामान्यतः लोग सचेत थे।

वे वृक्षारोपण के महत्व से भली-भांति परिचित थे।
महाभारतकार ने सभा पर्व में श्रीकृष्ण द्वारा स्वयं वृक्षारोपण किये जाने का उल्लेख किया है। जिससे यह प्रतीत होता है कि भगवान द्वारा इस कर्म के किये जाने से इस कर्म (वृक्षारोपण) का महत्व और भी बढ़ गया।

अतः महाभारतकार ने सामान्य जनता में पर्यावरण के प्रति वैज्ञानिक चेतना को जाग्रत करने के उद्देश्य से ही श्रीकृष्ण द्वारा वृक्षारोपण का उल्लेख किया है।
पर्यावरण संरक्षण हेतु वृक्षों के महत्व से महाभारतकालीन लोग भलीभांति परिचित थे। महाभारतकार ने वृक्षारोपण कर्म को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना है।

उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के माध्यम से भी अनेक स्थानों पर वृक्षों के महत्व तथा विशेषताओं का उल्लेख महाभारत में किया है।

गीता के पन्द्रहवें अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा संसारवृक्ष का उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार आदिपुरूष परमेश्वर संसार रूपी वृक्ष की जड़ (मूल) है, ब्रह्मा उस वृक्ष की शाखायें, वेद उसके पत्ते हैं। इस तरह भगवान ने स्वयं वृक्षों के महत्व को

अतीतानागते चोभे पितृवंशं च भारत | तारयेद् वृक्षरोपी च तस्माद् वृक्षांश्च रोपयेत् ।। तस्य पुत्रा भवन्त्येते पादपानात्र संशयः। परलोकगतः स्वर्ग लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् ।। पुष्पिताः फलवन्तश्वतर्पयन्तीह मानवान् । वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र तु।।
महा. भा. अनु. पर्व 58.26, 27.30 2

ये च हैमवता वृक्षा ये च नन्दनजास्तथा । आहृत्य यदुसिंहेन तेऽपि तत्र निवेशिताः ।।
महा. भा. सभा. पर्व. 38

ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुख्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ।।
गीता 15.1

सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना है। पुराणों में भी वृक्षों को देवत्व रूप में स्वीकार किया गया है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने शोध के आधार पर यह बताया है कि पीपल के वृक्ष से सर्वाधिक ऑक्सीजन (O2) मुक्त होती है।

अतः पर्यावरण की शुद्धि के लिए यह वृक्ष अत्यन्त आवश्यक है। महर्षि व्यास ने भी महाभारत में पीपल के वृक्ष को विशेष रूप से लाभकारी बताया है। गीता के दशम अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं को ‘पीपल का वृक्ष’ कहकर सम्बोधित किया है।

इसी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्होंने पीपल की विशेषता को प्रकट करने तथा पर्यावरण को शुद्ध बनाने के उद्देश्य से ही स्वयं को पीपल का वृक्ष कहा होगा। इस सन्दर्भ में यजुर्वेद में कहा गया है कि पीपल के नीचे बैठना चाहिए और पलाश के वृक्षों के समीप बस्ती बनानी चाहिए।

ऋग्वेद में वायु प्रदूषण से बचने के लिये निर्देश दिया गया है कि वन में वनस्पतियां उगाओ।’ अथवा ‘वृक्षारोपण करो’ ‘वन महोत्सव’ मनाओ। यदि मानव स्वार्थवश वृक्षों, वनों आदि को काटता ही रहेगा और नये वृक्ष नहीं लगाएगा तो पृथ्वी पर कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ जाएगी,

पर्वतों पर जमी बर्फ पिघलने लगेगी, जिससे जल प्लावन की समस्या उत्पन्न हो जाएगी।

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इस सन्दर्भ में यजुर्वेद में मानवता की रक्षा हेतु यह वर्णन मिलता है कि “हे वनस्पति ! इस तेज कुल्हाड़े ने महान् सौभाग्य के लिए तुझे काटा है, तेरा उपयोग हम सहस्राङ्कुर होते हुए करेंगे।

इससे प्रतीत होता है कि वृक्ष को ऐसा काटने के बाद में उस स्थान पर अनेक अङ्कर उत्पन्न हो सके और इसके वायु प्रदूषण का निवारण हो सके।

मूले ब्रह्मा त्वचे विष्णु शाखायांच महेश्वरः ।
सं. वाइ विज्ञा. पृ. 212 2
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गीता. 10.26
अश्अश्वत्थ वो निषदनं पणे वो वसतिष्कृता।
यजु. वे. 12.79 4
“वनस्पतिं वन आस्थापयध्वम्”
ऋ.वे. 10.101.11 5

अयं हि वा स्वधितिस्तेतिजानः प्रणिनाय महते सौभाग्याय ।
अतस्त्वं देव वनस्पते शान्तवल्शो विरोह, सहस्रवल्शा विषयं रूहेम |
यजु. वे. 5.43

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‘ यथा हि पुरूषः पश्येदादर्श मुखमत्मनः । एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले।।महा. भा. भीष्म पर्व 5.16 2 mahabharat physics – bhaag 2

यथाम्भसि प्रसन्ने तु रूपं पश्यति चक्षुष । तद्वत्प्रसन्नेन्द्रियत्वाज्ज्ञेयं ज्ञानेन पश्यति।।
तथेन्द्रियाकुलीभावे ज्ञेयं ज्ञाने न पश्यति ।।
महा. भा. शान्ति पर्व. 204 2-3

बहुप्रसादः सुस्वप्नो दर्पणोऽथ त्वमित्रजित् । वेदकारो मन्त्रकारो विद्वान् समरमर्दनः ।।’

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महाभारत के शान्ति पर्व में दर्पण, चश्मे, दूरबीन का उल्लेख मिलता है। इस सन्दर्भ में प्रजापति मनु, द्वारा महर्षि बृहस्पति के प्रति आत्मा के साक्षात्कार को स्पष्ट करते हुए कथन है कि जिस प्रकार शीघ्रगामी नौका पर बैठे हुए पुरूष की दृष्टि में पार्श्ववर्ती वृक्ष पीछे की ओर वेग से भागते हुए दिखाई देते हैं,

उसी प्रकार कूटस्थ निर्विकारी आत्मा बुद्धि के विकार से विकारवान सा प्रतीत होता है तथा जिस प्रकार “उपनेत्र” या “दूरबीन” से महीन अक्षर मोटा दीखता है और छोटी आकृति बहुत बड़ी दिखाई देती है, उसी प्रकार सूक्ष्म आत्मतत्त्व भी बुद्धि, विवेक समूह शरीर से संयुक्त होने के कारण शरीर के रूप में प्रतीत होने लगता है तथा जिस प्रकार स्वच्छ दर्पण में अपने मुख का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, उसी प्रकार शुद्ध बुद्धि में आत्मा के स्वरूप की झांकी उपलब्ध हो जाती है।

इस वर्णन में दर्पण के साथ-साथ उपनेत्र तथा दूरबीन का भी साङ्केतिक रूप में उल्लेख किया गया है। इस सन्दर्भ में नीलकण्ठ टीका में भी उपनेत्र तथा दर्पण का उल्लेख मिलता है। इस वर्णन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकार को भौतिक विज्ञान का गूढ़ ज्ञान था।

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उन्होंने सूक्ष्म तथा दूर स्थित वस्तुओं को देखने के सन्दर्भ में आधुनिक युग में प्रयुक्त होने वाले उपनेत्र (चश्मा) तथा दूर भी जैसे ही किसी यंत्र का उल्लेख साङ्केतिक रूप में यहाँ प्रस्तुत किया है। महा. भा. अनु. पर्व. 17.81 2

चलं यथा दृष्टिपथं परति सूक्ष्म महद् रूपमिवाभिभाति । स्वरूपमालोचयते च रूपं परं तथा बुद्धिपथं परैति।। – महा. भा. शान्ति पर्व 202.23 3

नन्वेवमपरिहार्यतवाद्वासनासंततेरलंमोक्षाशये…..सीलप्रपंच त्मना भाति । एवं यथारूपंस्व मुखप्रतिबिम्बस्वरूपस्व…… तत्र यथा उपनेत्रदर्पणयोरपायेऽक्षरस्थौल्यंमुखस्य दृश्यत्वं चापैत्येवंधी निग्रहेचितः सीलत्वं दृश्यत्वंचापैति । तदैव….. यायात्मज्ञानेयतितव्यमितिभावः ।। – महा. भा. शान्ति पर्व 202.23

लेंस (Lens)
लेंस कांच या किसी पारदर्शक पदार्थ से काटा गया एक ऐसा टुकड़ा होता है, जिसकी कम से कम एक सतह बहुत बड़े गोले (sphere) का हिस्सा होती है। अतः दो गोलीय पृष्ठों से घिरा पारदर्शी माध्यम लेंस (Lens) कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है –

1. उत्तल लेंस (Convex Lens)

2. अवतल लेंस (Concave Lens)

लेंसों का उपयोग प्रकाश को अपसारित करने (फैलाने) के लिए (Diverge) या अभिसारित (एकत्रित) (Converge) करने के लिए होता है। लेंसों में यह क्रिया अपवर्तन के प्रक्रम द्वारा होती है।

उत्तल लेंस (Convex Lens) – यह लेंस बीच में मोटा और किनारों पर पतला होता है। यह प्रकाशीय किरण को अभिसरित (Converge) करता है, इसलिए इसे अभिसारी लेंस (Converging Lens) भी कहते हैं।

उत्तल लेंस पर समानान्तर रूप से पड़ने वाली किरणें एक बिन्दु पर केन्द्रित हो जाती हैं, जिसे ‘फोकस’ कहते हैं। उत्तल लेंस एक अच्छे आवर्धी कांच (Magnifying glass) का काम करता है। इसके द्वारा सूर्य के प्रकाश को किसी कागज या घास-फूस पर केन्द्रित किया जाए तो अत्यधिक ऊष्मा के कारण उसमें अग्नि उत्पन्न हो जाती है।

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लेंस की अद्भुत शक्ति का ज्ञान प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में वर्णित है। महर्षि वेदव्यास ने शान्ति पर्व में उत्तल लेंस के गुणों से युक्त सूर्यकान्त मणि का उल्लेख किया है। जिस प्रकार उत्तल लेंस सूर्य की किरणों को अभिसारित करके एक ही बिन्दु पर केन्द्रित कर देता है।

उसी प्रकार सूर्यकान्त मणि भी सूर्य की किरणों को एक ही बिन्दु पर केन्द्रित कर देती है। अतः प्रयोगात्मक रूप में उत्तल लेंस सूर्य के प्रकाश को किसी कागज के तल पर एक ही बिन्दु पर केन्द्रित कर आग उत्पन्न कर देता है उसी प्रकार सूर्यकान्त मणि भी सूर्य के प्रकाश को केन्द्रित कर अग्नि उत्पन्न कर देता है।

महाभारत के शान्ति पर्व में राजा जनक तथा सुलभा का संवाद वर्णित है जिसमें राजा जनक उस पर दोषारोपण करते हैं तथा सुलभा युक्तियों द्वारा निराकरण करते हुए राजा जनक को अज्ञानी बताती है। इसी वार्तालाप में सुलभा ने राज जनक से उदाहरण देते हुए कहा –

“जैसे सूर्य की किरणों का सम्पर्क पाकर सूर्यकान्त मणि से आग प्रकट हो जाती है, परस्पर रगड़ जाने पर काठ से अग्नि का प्रादुर्भाव हो जाता है, इसी प्रकार पूर्वोक्त कलाओं के समुदाय से जीव जन्म ग्रहण करते हैं।’

इस वर्णन में सूर्यकान्तमणि को उत्तल लेंस के समान गुणों वाला बताया गया है अर्थात् जैसे उत्तल लेंस सूर्य की किरणों को केन्द्रित करके अग्नि उत्पन्न कर देता है उसी प्रकार सूर्यकान्त मणि भी आग प्रकट करता है। अतः ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में उत्तल लेंस (Convex Lens)
को सूर्यकान्तमणि के नाम से जाना जाता था।

महाभारत के शान्ति पर्व के दौ सौ सत्तासीवें अध्याय में सूर्यकान्तमणि के विषय में वर्णन मिलता है। इस सन्दर्भ में नारद मुनि द्वारा गालव मुनि के प्रति कथन है कि घमण्डी मूखों की कही हुई असार बातें उनके दूषित अन्तःकरण का ही प्रदर्शन कराती हैं, ठीक उसी तरह जैसे सूर्य सूर्यकान्तमणि के योग से अपने दाहक अग्निरूप को ही प्रकट करता है।

यहाँ नारदमुनि द्वारा सूर्य तथा सूर्यकान्तमणि दोनों के संयोग से ही अग्नि उत्पन्न होने का वर्णन किया गया है। महाभारत के शान्तिपर्व में महर्षि पञ्चशिख द्वारा महाराज जनक को उपदेश दिए जाने का वर्णन मिलता है जिसमें महर्षि पञ्चशिख ने नास्तिक मतों के निराकरणपूर्वक शरीर से भिन्न आत्मा की नित्य सत्ता का प्रतिपादन किया है।

इसी सन्दर्भ में सूर्यकान्त मणि की विशेषता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए महर्षि पञ्चशिख का कथन है कि जिस प्रकार वटवृक्ष के बीज में पत्र, पुष्प, फल, मूल

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‘ यथाऽऽदित्यान्मणेश्चापि वीरूद्भयश्चैव पावकः ।
जायन्त्येवं समुदयात् कलानामिव जन्तवः ।।महा. भा. शान्ति पर्व 320.126 – मूढानामवलिप्तानामसारं भाषितं बहु। दर्शयत्यन्तरात्मानमग्निरूपमिवांशुमान् ।।महा. भा. शान्ति पर्व 287.33

तथा त्वचा आदि छिपे होते हैं, जैसे गाय के द्वारा खायी हुई घास में से घी, दूध आदि प्रकट होते हैं तथा जिस प्रकार अनेक औषध द्रव्यों के पाक तथा अधिवासन करने से उसमें नशा पैदा करने वाली शक्ति आ जाती है,

उसी प्रकार वीर्य से ही शरीर आदि के साथ चेतनता भी प्रकट होती है। इसके अतिरिक्त जाति स्मृति, अयस्कान्तमणि, सूर्यकान्तमणि और बड़वानल के द्वारा समुद्र के जल का पान आदि दृष्टान्तों से भी देहातिरिक्त चैतन्य की सिद्धि नहीं होती।’

इस वर्णन में सूर्यकान्तमणि के सन्दर्भ में कहा गया है कि जैसे (कान्तमणि शीतल होकर भी सूर्य की किरणों के संयोग से आग प्रकट करने लगती है, उसी प्रकार वीर्य शीतल होकर भी रस और रक्त के संयोग से जठरानल का आविष्कार करता है।

यहाँ महर्षि पंचशिख ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सूर्य के संयोग से ही सूर्यकान्तमणि अग्नि प्रकट करता है। अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है महाभारत काल में उत्तल लेंस को सूर्यकान्त मणि के रूप में जाना जाता था। इस सन्दर्भ में न्यायदर्शन में भी उल्लेख मिलता है, यथा

अप्राप्यग्रहणं काचाभ्रपटलस्फटिकान्तरितोपलब्धेः ।।
न्यायदर्शनम् अ. ३.४६

रेतो वटकणीकायां घृतपाकाधिवासनम् । जातिः स्मृतिरयस्कान्तः सूर्यकान्तोऽम्बुभक्षणम् ।।
-महा भा. शान्ति पर्व 218.29

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सूर्यकान्तमणि द्वारा अग्नि उत्पन्न होने के सन्दर्भ में यास्काचार्य ने ‘निरूक्त’ में निम्नलिखित रूप में कहा है –

अथादित्यात्-प्रदीचिप्रथम समावृत्ते आदि कंसं वा मणि वा परिमृज्य प्रतिस्वरेयत्र गोभयमसंस्पर्शयन् धारयति, तत् प्रदीप्तते, सोऽयमेव सम्पचते।’

अर्थात् जब सूर्य ऊपर की ओर पहले लौटता है, तब यदि हम कंस या मणि (लेंस) को साफ करके उसके सामने प्रतिताप (फोकस) में उसे पकड़ रखें जहाँ सूखा गोबर उस कंस या मणि से बिना छुआये दूर पड़ा है, तब वह गोबर जल पड़ता है। इस वर्णन में सूर्यकान्त मणि को लेंस रूप में व्यक्त किया गया है।

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महाभारत तथा चुम्बकत्व (Magnetism)

एशिया माइनर के ‘मैगनीशिया’ नामक स्थान में लगभग छ: सौ ई.पू. कुछ ऐसे पत्थर पाये गए, जिनमें लोहे के छोटे-छोटे टुकड़ों को अपनी ओर आकर्षित करने के गुण विद्यमान थे। ये पत्थर लोहे के एक ऑक्साइड मैगनेटाइट (FesOA) के थे। चूंकि ये पत्थर मैगनीशिया नामक स्थान पर पाए गए, इसलिए इन्हें “मैगनेट” (Magnet) कहा जाने लगा।

मैगनेट का हिन्दी रूपान्तर शब्द “चुम्बक” कहलाता है। अतः कोई भी पदार्थ जिसमें लोहे को आकर्षित करने का गुण होता है चुम्बक (Magnet) कहलाता है और इस गुण को चुम्बकत्व (Magnetism) कहते हैं।

चुम्बक के गुणों का उल्लेख महाभारत में मिलता है। महर्षि व्यास ने महाभारत में चुम्बकत्व के गुणों का वर्णन अयस्कान्तमणि क रूप में किया है। महाभारत के शान्ति पर्व में गुरू-शिष्य के संवाद का उल्लेख करते हुए संसार चक्र
और जीवात्मा की स्थिति का वर्णन किया गया है,

जिसमें गुरू द्वारा शिष्य के प्रति कथन है कि जिस प्रकार लोहा अचेतन होने पर भी चुम्बक की ओर खिंच जाता है, उसी प्रकार ही शरीर के उत्पन्न होने पर प्राणी के स्वाभाविक संस्कार तथा अविद्या, काम, कर्म आदि दूसरे गुण उसकी ओर खिंच जाते हैं। इस वर्णन में चुम्बक के
निरूक्त अ.-7, पाद-6, mahabharat physics science bhaag2

अभिद्रवत्ययस्कान्तमयो निश्चेतनं यथा। स्वभावहेतुजा भावा यद्वदन्यदपीदृशम् ।।महा भा. शान्तिपर्व 211.3

चुम्बकत्व गुण का उल्लेख किया गया है। अतः इससे यह प्रतीत होता है कि महाभारत काल में लोगों को चुम्बक के गुणों का ज्ञान था। महर्षि व्यास ने चुम्बक को ‘अयस्कान्तमणि’ के नाम से सम्बोधित किया है।

ऐसा इसलिए कहा जा सकता है कि अयस्कान्तमणि तथा चुम्बक के गुण समान हैं। इस सन्दर्भ में महाभारत के शान्ति पर्व में महर्षि पञ्चशिख द्वारा महाराज जनक को उपदेश दिए जाने का वर्णन मिलता है जिसमें महर्षि पञ्चशिख ने नास्तिक मतों के निराकरण पूर्वक शरीर से भिन्न आत्मा की नित्य सत्ता का प्रतिपादन किया है।

महर्षि पञ्चशिख ने अयस्कान्तमणि का उदाहरण देते हुए राजा जनक से कहा है

रेतो वट कणीकायां घृतपाकाधिवासनम् । जातिः स्मृतिश्यस्कान्तः सूर्यकान्तोऽम्बुभक्षणम्।।’
mahabharat physics – bhaag 2

इस श्लोक के अनुसार शरीर से भिन्न आत्मा की सत्ता मानने की कोई आवश्यकता नहीं है इसके लिए अयस्कान्त मणि (चुम्बक) का उदाहरण दिया गया है कि जैसे अयस्कान्तमणि जड़ होकर भी लोहे को खींच लेती है,

उसी प्रकार जड़ शरीर भी इन्द्रियों का संचालन और नियंत्रण कर लेता है, अतः आत्मा उससे भिन्न नहीं है। इस श्लोक से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में चुम्बक (अयस्कान्तमणि) के गुणों से विद्वान्, मनीषी आदि भली-भाँति परिचित थे।

वैशेषिक दर्शन में चुम्बक (अयस्कान्त) क उल्लेख मिलता है। इस दर्शन की व्याख्या रूप में प्रस्तुत ‘वैशेषिक सूत्रोपस्कारः’ नामक पुस्तक के 5वें अध्याय में कहा गया है –

मणिगमनं सूच्यभिसर्पणमदृष्टकारणकम् ।।

अर्थात् चोर के पास अभिमंत्रितमणि, कांसे का कटोरा इत्यादिकों का पहुंचना तथा लोह चुम्बक के पास सुई इत्यादि को लोहा का पहुंचना यह सब क्रिया अदृष्ट
महा भा. शान्ति पर्व 218.29 2

से होती है। इस सन्दर्भ में ‘रस वर्णव’ नामक ग्रन्थ में चुम्बक का उल्लेख निम्नवत् प्राप्त होता है, यथा-

Varieties Of Magnets

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मामकं चुम्बकं चैव कर्षकं दावकं तथा। एवं चतुर्विधं कान्तं रोमकान्तं च पञ्चमम्।। एकद्धित्रिचतुः पञ्चसर्वतोमुखमेचतत। पीतं कृष्णं तथा रतं त्रिवर्ण स्यात् पृथक् पृथका

इस समस्त विवरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकार द्वारा जिस अयस्कान्तमणि का उल्लेख किया गया है वह चुम्बक का ही रूप है। यद्यपि उपर्युक्त कुछ प्राचीन विद्वानों ने अयस्कान्तमणि का अक्षरशः नामोल्लेख तो नहीं किया है किन्तु साङ्केतिक रूप से अवश्य स्पष्ट किया है।

महाभारत तथा गति (Motion)

सामान्यतः मनुष्य अपने चारों ओर वस्तुओं में समय के साथ-साथ परिवर्तन देखता है तथा कुछ को अपने स्थान पर ही स्थित देखता है। जैसे – जाती हुई गाड़ी, रेलगाड़ी आदि तथा मेज पर रखी पुस्तक आदि।

इससे स्पष्ट होता है कि वस्तुएं या तो स्थिर होती हैं या गतिमान। प्रत्येक गतिमान वस्तु में चाल होती है आधुनिक भौतिक विज्ञान के अनुसार, किसी गतिमान वस्तु के स्थिति परिवर्तन की दर अर्थात् 1 सेकेण्ड में चली गई दूरी को उस वस्तु की ‘चाल’ होती हैं।

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चाल = दूरी समय

यह एक अदिश राशि है। इसका मात्रक मीटर/सेकेण्ड है।
महाभारत में महर्षि व्यास ने अनेक स्थानों पर चाल का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में अर्जुन, युधिष्ठिर से अपने तथ निवातकवचों के मध्य युद्ध का वर्णन सुनाते हुए अपने अश्वों की चाल के विषय में कथन है कि सारथि से प्रेरित होकर

वे अश्व नाना प्रकार की चालें दिखाते हुए वायु के समान वेग से चलने लगे।’
इस वर्णन में चाल और वेग दोनों का उल्लेख है। यहा वेग से तात्पर्य है – गतिशील वस्तु के 1 सेकेण्ड में विस्थापन को उसका वेग कहते हैं,

वेग = विस्थापन/समय

यह एक सदिश राशि है। इसका मात्रक मीटर/सेकेण्ड है।
महाभारत के अनुशासन पर्व में भी चाल का वर्णन मिलता है। इस सन्दर्भ में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के समक्ष विपुल द्वारा गुरू की आज्ञा से दिव्य पुष्प लाने की कथा का वर्णन किया है।

इस वर्णन के अनुसार विपुल पुष्प लाने उस निर्जन वन में जाते हैं और वहां एक स्त्री-पुरूष के जोड़े को देखते हैं जो कुम्हार के चाक के समान एक दूसरे का हाथ पकड़कर घूम रहे थे। इस पर पुनः भीष्म का कथन है –

राजन् ! उनमें से एक ने अपनी चाल तेज कर दी और दूसरे ने वैसा नहीं किया। इस पर दोनों आपस में झगड़ने लगे। यहाँ भीष्म द्वारा चाल का उल्लेख किया गया

महाभारत के उद्योग पर्व में गति और वेग का वर्णन मिलता है। इस सन्दर्भ में भीम के बल तथा पराक्रम का वर्णन करते हुए धृतराष्ट्र द्वारा शोकमग्न हो संजय के प्रति कथन है कि “उसका आक्रमण दुःरूह है। उसकी गति को कोई रोक नहीं

मार्गान् बहुविधांस्तत्र विचेरूर्वातरंहसः।
सुसंयता मातलिना प्रमथ्नन्तदितेः सुतान् ।।
महा. भा. वन पर्व. 170.8

तत्रैकस्तूर्णमगनत् तत्पदे च विवर्तयन्
एकस्तु न तदा राजश्चक्रुतुः कलहं ततः।। – महा. भा. अनु. पर्व. 42.18

सकता। उसका वेग और पराक्रम तीव्र है।’ इसी प्रकार धृतराष्ट्र द्वारा अर्जुन के पराक्रम का वर्णन करते हुए कथन है कि जो एक वेग से पांच सौ बाण चलाता है तथा जे बाहुबल में कार्तवीर्य अर्जुन के समान है,

इन्द्र और विष्णु के समान पराक्रमी उस महाधनुर्धर पाण्डु नन्दन अर्जुन को मैं इस महासमर में शत्रु सेनाओं का संहार करता हुआ सा देख रहा हूँ। यहाँ महाभारतकार ने धृतराष्ट्र के वचनों में गति तथा वेग का उल्लेख किया है।

महर्षि व्यास वेग को भली-भाँति समझते थे अतः उन्होंने इसके बढ़ने की विधि का भी उल्लेख महाभारत में शल्य पर्व में किया है। संजय द्वारा धृतराष्ट्र से युधिष्ठिर द्वारा किए युद्ध के विषय में कथन है कि बल और प्रयत्न के द्वारा उसका वेग बहुत बढ़ गया था,

युधिष्ठिर ने उस समय मद्रराज का वध करने के लिए उसे घोर मंत्रों से अभिमंत्रित करके उत्तम मार्ग के द्वारा प्रयत्नपूर्वक छोड़ा था। इस वर्णन में वेग के बढ़ने की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है।

वेग, बल तथा प्रयत्न के द्वारा बढ़ता है जैसे – किसी गतिमान वस्तु पर और भी बल लगाया जाए तो उसकी गति में वेग परिवर्तन होगा और वह अधिक वेग से आगे बढ़ेगी। अतः यह भौतिक विज्ञान की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।

इससे स्पष्ट होता है कि महर्षि व्यास को भौतिक विज्ञान का वृहत् ज्ञान था।
महर्षि कणाद ने वैशेषिक दर्शन में गति (Motion) का स्पष्ट उल्लेख किया
है,

अविषह्यमनावार्य तीव्रवेगपराक्रमम् । पश्यामीवातिताम्राक्षमापतन्तं वृकोदरम्। – महा. भा. उद्यो. पर्व. 15 43 पृ.

क्षिपत्येकेन वेगेन पंच वाजश तानि यः । सदृशं बाहुलीर्येण कार्तवीर्यस्य पाण्डवम् । तमअर्जुनं महेष्वासं महेन्द्रोपेन्द्रविक्रमम् निहन्तमिव पश्यामि विमर्देऽस्मिन् महाहवे। महा. भा. उद्यो. पर्व 60 19-20

बलप्रयत्नादधिरूढ़वेगां मन्त्रैश्च घोरैरभिमंत्र्य यत्नात्। ससर्ज मार्गेण च तां परेण वधाय मद्राधिपतेस्तदानीम् ।। महा. भा. शल्य. पर्व.

संयोग-विभाग-वेगानां कर्म समानम्।
(वैशेषिकदर्शनम् -१.१.२०)

गुरुत्व-प्रयत्न-संयोगानाम् उत्क्षेपणम्
(वैशेषिकदर्शनम् -१.१.२१)

मणिगमनं सूच्याभिसर्पणम् अदृष्टकरणम्
(वैशेषिकदर्शनम् -५.१.२५)

इस समस्त विवरण से ऐसा प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास, महर्षि कणाद आदि प्राचीन विद्वान् महान वैज्ञानिक थे।

महाभारत तथा ध्वनि (Sound)

ध्वनि एक प्रकार की ऊर्जा है जिसका प्रभाव कानों पर पड़ता है। ध्वनि सदैव कम्पनों के कारण उत्पन्न होती है। ध्वनि के संचारण के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है। यह ठोस, द्रव तथा गैस सभी माध्यमों में चल सकती है। ध्वनि तरङ्गों द्वारा चलती है। यह तरङ्गे दो प्रकार की होती हैं –

अनुप्रस्थ तरङ्ग – वह तरङ्ग जिसमें माध्यम के कण तरङ्ग के चलने की दिश के लम्बवत् दिशा में कम्पन करते हैं, अनुप्रस्थ तरङ्ग कहलाती है। उदाहरण – वायलिन तथा सितार आदि की तनी हुई डोरियों में उत्पन्न तरङ्गे, जल की सतह पर चलने वाली तरङ्गे।

अनुदैर्ध्य तरङ्ग – वह तरङ्ग जिसमें माध्यम के कण तरङ्ग के चलने की दिशा के समान्तर कम्पन करते हैं अनुदैर्ध्य तरङ्ग कहलाती है। उदाहरण – वायु में चलने वाली ध्वनि तरङ्गे, स्प्रिंग में उत्पन्न तरङ्गे आदि। ये तरङ्गं ठोस, द्रव तथा गैस तीनों में उत्पन्न की जा सकती है।

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प्राचीन काल में विद्वान, ऋषि आदि ध्वनि के गुणों तथा प्रकारों से भली-भाँति परिचित थे। महर्षि व्यास ने भी महाभारत में अनेक स्थानों पर ध्वनि-विज्ञान का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में महाभारत के आदि पर्व में उग्रश्रवा ऋषि द्वारा गरूड़ चरित विषयक वृत्तान्त में समुद्र विस्तार का वर्णन करते हुए कथन है कि समुद्र तट पर तीव्र वेग से चलने वाली वायु झूले के समान समुद्र को चंचल कर रही थी जिससे क्षोभ और उद्वेग के कारण जल की लहरें बहुत ऊँची उठती थी

तथा मानो समुद्र सब ओर चंचल तरङ्गरूपी हाथों को हिला हिलाकर नृत्य सा कर रहा था। उसमें चन्द्रमा की वृद्धि तथा क्षय के कारण लहरें ऊँची उठती तथा उतरती थी जिसके कारण वह उत्ताल-तरङ्गों से व्याप्त जान पड़ता था।’ यहाँ महर्षि ने समुद्र में उत्पन्न होने वाली उत्ताल तरङ्गों का उल्लेख किया है

जिसे हम आधुनिक समय में ‘अनुप्रस्थ-तरङ्ग के नाम से सम्बोधित करते हैं। महर्षि व्यास ने समुद्र में उत्पन्न इन तरङ्गों का उल्लेख उद्योग पर्व में विदुर द्वारा धृतराष्ट्र के समझाने हेतु संवाद में तथा शान्ति पर्व में बुद्धि की श्रेष्ठता के विवेचन के सन्दर्भ में और द्रोण पर्व में संजय द्वारा युद्ध क्षेत्र के वर्णन के सन्दर्भ में किया है।’ अतः

वेलादोलानिलचलं क्षोभोद्वेगसमुच्छ्रितम् । वीचीहस्तैः प्रचलितैनृत्यन्तामिव सर्वतः । चन्द्रवृद्धि क्षयवशादुद्वर्तोर्मिसमाकुलम् । पांचजन्यस्य जननं रत्नाकरमनुत्तमम् ।।

महाभा. आदि पर्व 21.10-11 2 लेखाशशिनि भाः सूर्ये महोर्मिरिव सागरे। धर्मस्त्वयि तथा राजनितिव्यवसिताः पजाः ।।

महा. भा. उद्यो. पर्व. 87.3 3 सेयं भवात्मिका भावांस्त्रीनेतानतिवर्तते।
सरितां सागरो भर्ता महावेलामिवोर्मिमान् ।।

महा. भा. शान्ति पर्व 248.8

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इस उल्लेख से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में ध्वनि के गूढ़ रहस्यों का ज्ञान सर्वत्र स्वाभाविक रूप में फैला हुआ था।

दोलन गति (oscillatory Motion)

ध्वनि में दोलन गति (Oscillatory Motion) पायी जाता है। यदि कोई पिण्ड एक ही पथ पर किसी निश्चित बिन्दु के इधर-उधर आवर्ती गति करता है तो उसकी गति को “दोलन गति” कहते हैं।

उदाहरण – सरल लोलक की गति, दीवार घड़ी के लोलक की गति, झूले की गति आदि।
Polnit of suspension

इस सन्दर्भ में महाभारत में दोलन गति का उल्लेख मिलता है। महाभारत के
वन पर्व में वृहदश्व मुनि द्वारा युधिष्ठिर से नल के हृदय की दशा का वर्णन करते हुए कथन है कि “उस समय दुःखी राजा नल का हृदय मानो दुविधा में पड़ गया था। जैसे झूला बार-बार नीचे ऊपर आता जाता रहता है,

उसी प्रकार उनका हृदय कभी बाहर जाता, कभी सभा भवन में लौट आता था।” इस वर्णन में झूले की ऊपर-नीचे की गति का वर्णन किया गया है। इस गति के दोलन गति कहते हैं। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि इस श्लोक में वर्णित “दोलेव” शब्द का अर्थ ‘दोलन’ है

जिसे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महर्षि व्यास दोलन गति से भली-भाँति परिचित थे।

‘महारथशतवर्ती भूमिरेणूमिमालिनीम् । महावीर्यवतां संख्ये सुतरा भीरूदुस्तराम् ।। महा. भा. द्रो. पर्व. 14.17 2

द्विधेव हृदयं तस्य दुःखितस्याभवत् तदा। दोलेव मुहुरायाति याति चैव सभां प्रति।। महा. भा. वन पर्व 62.27

प्रतिध्वनि (Echo)

जब ध्वनि तरङ्गे दूर स्थित किसी दृढ़ वस्तु से टकराकर परावर्तित होती हैं तो इस परावर्तित ध्वनि को प्रतिध्वनि (Echo) कहते हैं। प्रतिध्वनि का दैनिक जीवन में बहुत उपयोग है। इसके द्वारा समुद्र की गहराई, कुओं की गहराई, वायुयान की ऊँचाई, स्वयं से पहाड़ आदि की दूरी ज्ञात की जाती है।

प्रतिध्वनि सुनने के लिए आधुनिक भौतिक विज्ञान के अनुसार श्रोता व परावर्तक तल के बीच की दूरी कम से कम सत्रह मीटर होनी चाहिए।

महाभारत में महर्षि व्यास ने अनेक स्थानों पर प्रतिध्वनित’ शब्द का प्रयोग किया है। इस सन्दर्भ में वन पर्व में वृहदश्व मुनि, द्वारा युधिष्ठिर से ऋतुपर्वा के रथ का वर्णन करते हुए कथन है कि –

“भीम के अनुरोध से राजा ऋतुपर्ण ने अपने स्थ की घर्घराहट द्वारा सम्पूर्ण दिशा-विदिशाओं को प्रतिध्वनित करते हुए कुण्डिनपुर में प्रवेश किया।” इस वर्णन में राजा ऋतुपर्ण ने अपने स्थ की घर्घराहट से सम्पूर्ण दिशा-विदिशाओं को प्रतिध्वनित किया अर्थात् रथ से निकलने वाली ध्वनि दिशा-प्रतिदिशाओं से परावर्तित होकर सर्वत्र गुञ्जायमान हो रही थी।

अतः ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकार प्रतिध्वनि के नियम से भली-भाँति परिचित थे। इस सन्दर्भ में महाभारत के आदि पर्व में वैशम्पायन ऋषि द्वारा राजा जनमेजय से भरत (दुष्यन्त पुत्र) के चक्र का वर्णन करते हुए कथन है कि महात्मा राजा भरत का विख्यात चक्र सब ओर घूमने लगा। वह अत्यन्त प्रकाशमान दिव्य और अजेय था।

वह महान चक्र अपनी भारी आवाज से सम्पूर्ण जगत् को प्रतिध्वनित करता चलता था। इस वर्णन से स्पष्ट हो रहा है कि राजा भरत का चक्र भारी आवाज (ध्वनि) उत्पन्न करता था जोकि समस्त जगत् को प्रतिध्वनित करता चलता

स भीमवचनाद् राजा कुण्डिनं प्राविशत् पुरम् । नादयन् रथघोषेण सर्वाः स विदिशो दिशः।। महा. भा. वन पर्व. 73.2

तस्य तत् प्रथितं चक्रं प्रावर्तत महात्मनः | भास्वरं दिव्यमजितं लोकसंनादनं महत।। महा. भा. आ. पर्व 74.127

था अर्थात् उस चक्र की ध्वनि उसके आस-पास की वस्तुओं से टकराकर परावर्तित हो जाती थी। जिसके कारण वह प्रतिध्वनित करता हुआ आगे चलता था। अतः यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस काल में ध्वनि के विज्ञान से विद्वान तथा सामान्य सभी लोग भली-भाँति परिचित थे।

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महाभारत तथा ऊष्मा (Heat)

ऊष्मा वह भौतिक कारण है जिसके द्वारा गर्मी अथवा ठण्डक का आभास होता है। वास्तव में ऊष्मा एक प्रकार की ऊर्जा है, अर्थात् इसमें कोई भार अथवा द्रव्य नहीं होता है। किसी वस्तु में ऊष्मा विद्यमान होने पर वह वस्तु गर्म प्रतीत होती है तथा ऊष्मा निकल जाने पर ठंडी प्रतीत होती है।

प्राचीन काल में ही मनुष्य इस बात को स्पष्ट रूप से समझ गया था कि दो वस्तुओं को रगड़ने से ऊष्मा उत्पन्न होती है। पाषाण काल में आदिमानव ने दो पत्थरों को रगड़कर ऊष्मा उत्पन्न की जिससे उसे आग, (गर्म) का ज्ञान हुआ। दैनिक जीवन में यह प्रायः देखा जाता है कि “यांत्रिक कार्य करने में ऊष्मा उत्पन्न होती है।” जैसे – हथौड़े से कील ठोंकने पर कील का गर्म होना आदि।

ऊष्मीय ऊर्जा को निम्नलिखित रूप से स्पष्ट किया जा सकता है – किसी गर्म वस्तु को किसी ठण्डी वस्तु के सम्पर्क में लाने पर उनमें तापान्तर के कारण ऊष्मीय-ऊर्जा गर्म वस्तु से ठण्डी वस्तु की ओर प्रवाहित होने लगती है।

महर्षि व्यास ने महाभारत में ऊष्मीय ऊर्जा को स्पष्ट रूप से समझाने का प्रयास किया है। इस सन्दर्भ में वन पर्व में शौनक ब्राह्मण ने राजा जनक के द्वारा पूर्वकाल में कहे हुए वचनों को युधिष्ठिर के समक्ष पुनः दोहराते हुए कहा कि –

मन में दुःख होने पर शरीर भी संतप्त होने लगता है, ठीक वैसे ही, जैसे तपाया हुआ लोहे का गोला डाल देने पर घड़े में रखा हुआ शीतल जल भी गरम हो जाता है।’

मानसेन हि दुःखेन शरीरमुपतप्यते।
अयः पिण्डेन तप्तेन कुम्भसंस्थमिवोदकम् । महा. भा. वन पर्व 2.25

इस वर्णन के अनुसार तपाया हुआ लाहे का गोला घड़े के शीतल जल में डाल दिये जाने पर उसे गर्म कर देता है। यहाँ ऊष्मा गर्म वस्तु से ठंडे जल में जा रही है जिससे ऊष्मीय ऊर्जा का स्थानान्तरण हो रहा है।

अतः ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि ऊष्मीय ऊर्जा के स्थानान्तरण के प्रक्रिया का ज्ञान महाभारतकार को भली-भाँति था। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि महाभारत काल में भौतिक विज्ञान अपने उत्कर्ष पर था।

महाभारत तथा विद्युत् (Electricity)
भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में विद्युत् (Electricity) की खोज तथा निर्माण सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी गई है। दैनिक जीवन में यह बहुत उपयोगी सिद्ध होती है। रात्रि-काल में जब सूर्य का प्रकाश नहीं होता तो इस विद्युत् के द्वारा ही
समस्त वस्तुएं प्रकाशित होकर स्पष्ट दिखाई देती हैं।

विद्युत् का ज्ञान आधुनिक युग में ही नहीं वरन् प्राचीन वैदिक काल से विद्वानों को भलीभाँति रहा है। जिस तरह वर्तमान समय में लोग विद्युत् के प्रकाश से रात्रि में सर्वत्र प्रकाश फैलाते हैं तथा सजावट आदि के लिए भी प्रयोग करते हैं

उसी तरह प्राचीन वैदिक काल में भी लोग विद्युत् का प्रयोग करते थे। इसका उल्लेख धर्मग्रन्थों में कई स्थानों पर मिलता है। प्राकृतिक रूप से वायुमण्डल में भी विद्युत् पायी जाती है जो वर्षाकाल में मेघों द्वारा उत्पन्न होती है। विद्युत् का प्रयोग ‘महाभारत’ काल में भी किया जाता था।

वायुमण्डलीय विद्युत् (Atmospheric Electricity)

महाभारत के वन पर्व में महर्षि व्यास ने वायुमण्डलीय विद्युत् के उत्पन्न होने के वैज्ञानिक रहस्य का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में अष्टावक्रीयोपाख्यान महाभारत में मिलता है जिसमें राजा जनक तथा अष्टावक्र के मध्य शास्त्रार्थ हुआ है।

इस शास्त्रार्थ में राजा जनक ने अष्टावक्र से प्रश्न किया – “जो दो घोड़ियों की भाँति संयुक्त रहती हैं तथा जो बाज पक्षी की भाँति हठात् गिरने वाली हैं, उन दोनों के गर्भ को देवताओं में से कौन धारण करता है तथा वे दोनों किस गर्भ को उत्पन्न
करती हैं ? mahabharat physics science bhaag2

अष्टावक्र ने उत्तर दिया – राजन् ! वे दोनों तुम्हारे शत्रुओं के घर पर भी कभी न गिरे। वायु जिसका सारथि है, वह मेघरूप देव ही इन दोनों के गर्भ को धारण करने वाला है और ये दोनों उस मेघ रूप गर्भ को उत्पन्न करने वाले हैं।
इस वर्णन के अनुसार भाव यह है कि दो तत्त्व, जिनको वैदिक भाषा में रयि और प्राण के नाम से जाना जाता है।

इन्हें अंग्रेजी भाषा में (Positive) धनात्मक तथा (Negative) ऋणात्मक कहते हैं, ये स्वभाव से संयुक्त रहने वाले हैं। इनका ही व्यक्त रूप ‘विद्युत् शक्ति’ कहलाता है। उसे मेघ गर्भ के रूप में धारण करते हैं। परस्पर मेघों के संघर्ष के कारण विद्युत् प्रकट होती है और आकर्षण होने पर बाज की भाँति गिरती है।

जहाँ यह बिजली (विद्युत्) गिरती है वहां सब कुछ भस्म कर देती है, इसलिये यहाँ कहा गया है कि वह कभी आपके शत्रुओं के घर पर भी न पड़े। इन दो तत्त्वों की संयुक्त शक्ति से ही मेघ की उत्पत्ति होती है इसलिए यह कहा गया है कि उस मेघरूप गर्भ को ये (विद्युत्) उत्पन्न करते हैं।
यहाँ वायुमण्डलीय विद्युत् (Atmospheric Electricity) का उल्लेख किया गया है।

अतः ऐसा प्रतीत होता है कि अष्टावक्र को मेघ द्वारा उत्पन्न विद्युत् की वैज्ञानिक प्रक्रिया का पूर्ण ज्ञान था तभी उन्होंने धनात्मक (+) तथा ऋणात्मक (-) आवेश से संयुक्त होने तथा इनसे विद्युत् उत्पन्न होने की वैज्ञानिक घटना का स्पष्ट वर्णन किया है।

आधुनिक युग में भी वैज्ञानिक वायुमण्डलीय विद्युत् के रहस्यों आदि का पता लगाने में लगे हुए हैं। सन् 1708 ई. में ब्रिटेन के विलियम वॉल (William Wal) नामक वैज्ञानिक ने यह बताया कि बादलों में बिजली का चमकना उच्च पैमाने पर एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके अनुसार यदि एक विद्युत आवेशित वस्तु को एक चालक के पास लाकर निरावेशित (Discharge) किया जाए तो दोनों के बीच एक

वऽवे इव संयुक्ते श्येनपाते दिवौकसाम् । कस्तयोर्गर्भमाधत्ते गर्भ सुषुवतुश्च कम् ।। मा स्म ते ते गृहे राजच्छात्रवाणामपि ध्रुवम् । वातसारथिरागन्ता गर्ने सुषुवतुश्च तम् ।। महा. भा. वन पर्व 133.26-27

चिंगारी पैदा होती है। इसके पचास वर्ष बाद बेंजामिन फ्रेंकलिन (Benjamin Franklin) नामक अमरीकन आविष्कारक ने बादलों में बिजली चमकने की क्रिया को एक प्रयोग द्वारा सिद्ध किया।’

अतः इस वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि वैज्ञानिक फ्रैंकलिन (Benjamin Franklin) ने वायुमण्डलीय विद्युत् के लिए जो सिद्धान्त बताया, उसका उल्लेख महाभारत में बहुत पहले ही किया जा चुका है। अतः यह कहा जा सकता है कि

महाभारत काल में भौतिक विज्ञान उन्नत स्थिति में था।
विद्युत् शक्ति का ज्ञान वैदिक काल में भी प्रचलित था। इसका उल्लेख वेदों में स्पष्ट रूप से मिलता है। ऋग्वेद में कहा गया है कि – इस संसार में तीन प्रकार का प्रकाश है –

एक सूर्य का, दूसरा बिजली का, तीसरा पृथ्वी में वर्तमान अग्नि का, उन तीनों को जो क्षत्रिय आदि जानें वे अक्षयराज करने को समर्थ होवें।’
इस विवरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वैदिक काल में विद्युत् शक्ति का पूर्ण ज्ञान ऋषियों को था। महर्षि अगस्त ने विद्युत् निर्माण की प्रक्रिया का उल्लेख अगस्त संहिता में किया है यथा –

संस्थाप्य मृण्मये पात्रे ताम्रपत्तं सुसंस्कृतम्। छादयेच्छिखिग्रीवेन चार्द्राभिः काष्ठपांसुभिः ।। दस्तालोष्टो निधातव्यः पारदाच्छादितस्ततः संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरूणसंज्ञितम्।।’

अर्थात् एक मिट्टी का पात्र (Earthen pot) लें, उसमें ताम्र पट्टिका (Copper Sheet) डालें तथा ‘शिखिग्रीवा’ डालें, फिर बी में गीली काष्ठ पांसुत्री रोचना वरूण त्रीरूत धून्त्रीणि मित्र धारयथो रजांसि | वावृधानावमंति क्षत्रियस्यानु व्रतं रक्षमाणावजुर्यम् ।।

ऋ. वे. 5.69.1 3
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लगाए, ऊपर पारा (Mercury) तथा दस्त लोष्ठ (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाने पर उससे मित्रावरूण शक्ति का उदय होगा।

इस श्लोक के आधार पर श्री होले तथा उनके मित्र ने प्रयोग किया, जिसके लिए ‘शिखिग्रीवा’ का अर्थ एक आयुर्वेदाचार्य के कथनानुसार मोर की गरदन के रङ्ग जैसा पदार्थ कापर सल्फेट (Cusos) का प्रयोग किया।

और उन्होंने इस आधार पर एक सेल बनाया और डिजिटल मल्टीमीटर द्वारा उसको नापा। उसका Open Curcuit Voltage था, 1.38 Volts और Short Circuit Current था 23 Milli amperes इस प्रयोग के सफल होने पर इस सेल का प्रदर्शन 7 अगस्त 1990 को स्वदेशी विज्ञान संशोधन संस्था नागपुर के चौथे वार्षिक सर्वसाधारण सभा में अन्य विद्वानों के सामने हुआ। जिसमें इस सेल के इलेक्ट्रिक सेल कहा गया।’

भारतीय वैज्ञानिक राव साहब वझे ने अगस्त संहिता तथा अन्य ग्रन्थों के आधार पर विद्युत् के विभिन्न प्रकार से उत्पत्ति के विषय में अलग-अलग नाम रखे हैं, यथा –

तड़ित – रेशमी वस्त्रों के घर्षण से उत्पन्न ।

सौदामिनी – रत्नों के घर्षण से उत्पन्न ।

विद्युत् – बादलों के द्वारा उत्पन्न ।

शतकुंभी – सौ सेलों या कुंभों से उत्पन्न ।

हृदनि – हृद या स्टोर की हुई बिजली।

अशनि – चुम्बकीय दण्ड से उत्पन्न ।’
इस वर्णन के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि प्राचीन काल से ही विद्युत् आदि शक्तियों का वृहत् ज्ञान प्राचीन ऋषियों, मुनियों को भली-भाँति था।

अतः महाभारत में महर्षि व्यास द्वारा वायुमण्डलीय विद्युत् का उल्लेख निराधार नहीं प्रतीत होता है क्योंकि वेदों में इसका उल्लेख अनेक स्थानों परा आया है।
महर्षि वेद व्यास ने महाभारत के अनेक पर्यों में वायुमण्डलीय विद्युत् का वर्णन किया है।

महाभारत के आदि पर्व में समुद्र मन्थन का उल्लेख मिलता है जिसमें उग्रश्रवा मुनि द्वारा भृगुनन्दन से मन्दराचल पर्वत द्वारा मथे गए समुद्र का वर्णन करते हुए कथन है कि उनकी आपस की रगड़ से बार-बार आग प्रकट होकर ज्वालाओं के साथ प्रज्जवलित हो उठी और जैसे बिजली नीले मेघ को ढंक ले, उसी प्रकार उसने मन्दराचल को आच्छादित कर लिया।’

इस वर्णन में महर्षि व्यास ने नीले मेघों में विद्युत् के उत्पन्न होने का उल्लेख किया है जिससे यह प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास को विद्युत् उत्पत्ति का पूर्ण
ज्ञान था।

इस सन्दर्भ में महाभारत के द्रोणपर्व में व्यास ऋषि ने अर्जुन द्वारा शिव भगवान की महिमा का वर्णन किया है, जिसमें शिव भगवान का एक नाम ‘विद्युत् बताया गया है।

महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म द्वारा परमात्मा की प्राप्ति के साधनों का वर्णन किया गया है, जिसमें भीष्म का युधिष्ठिर के प्रति कथन है कि कोई तो योग धारणा के द्वारा सगुण ब्रह्म की उपासना करते हैं और कोई उस परम देव का चिन्तन करते हैं,

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जो विद्युत् के समान ज्योतिर्मय और अविनाशी कहा गया है। इस वर्णन में विद्युत् के समान ज्योतिर्मय ईश्वर का स्वरूप बताया गया है। अतः इससे यह प्रतीत होता है कि महाभारत काल में लोग विद्युत् से भली-भाँति परिचित थे। विद्युत् के प्रकाश से ही सर्वत्र वस्तुएं स्पष्ट दिखाई देती है। अतः

विद्युत् ज्योतिर्मय तेषां संघर्षजश्चाग्निरर्चिभिः प्रज्वलन् मुहुः । विद्युद्भिरिव नीलाभ्रमावृणोन्मन्दरं गिरिम् ।। महा. भा. आदि पर्व

स वैरूद्रः स च शिवः सोऽग्निः सर्वश्चसर्ववित् । स चेन्द्रश्चैव वायुश्च सोऽश्विनौ च स विद्युत्ःः ।।
महा. भा. द्रोण पर्व 202.102 3

युक्तं धारणया सम्यक् सतः केचिदुपासते। अभ्यस्यन्ति परं देवं विद्युत्संशब्दिताक्षरम् ।। महा. भा. शान्ति पर्व 217.28

है। यहाँ विद्युत् के साथ ‘ज्योतिर्मय’ शब्द का प्रयोग प्रकाश के लिए ही किया गया इस समस्त विवरण से यह प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास को वायुमण्डलीय विद्युत की उत्पत्ति का वैज्ञानिक रहस्य ज्ञात था।

विद्युत् (Electric)
आधुनिक युग में विद्युत् बल्ब का प्रयोग विश्व के समस्त भागों में किया जा रहा है। यह विज्ञान की सर्वोत्तम उपलब्धि मानी जाती है क्योंकि इसके प्रकाश से
रात्रि का अन्धकार दूर हो जाता है।

विद्युत् बल्ब का सिद्धान्त – विद्युत् बल्ब वैद्युत धारा के ऊष्मीय प्रभाव पर आधारित है। किसी तार में विद्युत् धारा प्रवाहित करने पर उसमें ऊष्मा उत्पन्न होती है, जिसमें तार का ताप बढ़ जाता है तथा ताप बढ़ने पर वह श्वेत-तप्त होकर चमकने लगता है अर्थात् प्रकाश उत्पन्न होता है।
बल्ब में निर्वात या निष्क्रिय गैस भरने का कारण – विद्युत् बल्ब में निर्वात या निष्क्रिय गैस भरने के दो कारण हैं –

पीतल की टोपी
-सुचालक तार
निर्वात या
आर्गन गैस
-फिलामेन्ट

यदि बल्ब में वायु भरी हो तो बल्ब का तंतु गर्म होकर वायु की ऑक्सीजन से संयोग करके जल जाएगा। लेकिन बल्ब में वायु के स्थान पर नाइट्रोजन तथा आर्गन भरी होने से तंतु गर्म होकर जल नहीं पाता है क्योंकि ये अक्रिय गैस हैं।
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बल्ब में निर्वात रखने पर तन्तु का पदार्थ गर्म होकर वाष्पित हो जाता है और शीघ्र ही पतला होकर जल जाता है।

लेकिन आर्गन तथा नाइट्रोजन भर देने से तंतु के पदार्थ की वाष्पन की दर बहुत कम हो जाती है तथा बल्ब की आयु बढ़ जाती

इस वर्णन में विद्युत् बल्ब में विशेष रूप से निर्वात अक्रिय गैस के प्रयोग का उल्लेख किया गया है।

इससे निर्वात का विद्युत् बल्ब में विशेष महत्व परिलक्षित होता है, बिना निर्वात या अक्रिय गैस के विद्युत् बल्ब नहीं जल सकता।

विद्युत् बल्ब की इस वैज्ञानिक प्रक्रिया का उल्लेख महाभारत में मिलता है। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में अनेक स्थानों पर निर्वात में निरन्तर जलने वाली दीपक की लौ का उल्लेख किया है

जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि निर्वात् अर्थात् वायुरहित स्थान में निरन्तर दीपक की लौ जलना विद्युत् बल्ब के सिद्धान्त का ही एक रूप है।

इस विषय में महाभारत के शान्ति पर्व में युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण का संवाद मिलता है। जिसमें श्रीकृष्ण ध्यान मुद्रा में विराजमान है तभी युधिष्ठिर का श्रीकृष्ण की प्रशंसा करते हुए कथन है कि –

भगवन् ! देवदेव ! जैसे वायु शून्य स्थान में रखे हुए दीपक की लौ कांपती नहीं, निरन्तर एक सी जलती रहती है, उसी तरह आप भी स्थिर हैं, मानो पाषाण की मूर्ति हों।’

यहाँ स्पष्ट रूप से वायु रहित स्थान में दीपक की बिना कम्पन की बात कही गयी है। इसी प्रकार शान्ति पर्व के दो सौ छियालिसवें अध्याय में महर्षि व्यास ने परमात्मा की श्रेष्ठता तथा उसके दर्शन के उपाय आदि का उल्लेख अपने पुत्र शुकदेव के समक्ष किया है,

जिसमें उदाहरण रूप में विद्युत् बल्ब के सिद्धान्त के विषय में प्रकारान्तर से महर्षि व्यास का कथन है

कि – मनुष्य नींद के समय जैसे सुख से सोता है, सुषुप्ति के सुख का अनुभव करता है अथवा जैसे वायुरहित स्थान में जलता हुआ दीपक कम्पित नहीं होता, एक तार जला करता है, उसी प्रकार मन

यथा दीपो निवातस्थो निरिङ्गो ज्वलते पुनः । तथासि भगवन् देव पाषाण इव निश्चलः ।। महा. भा. शान्तिपर्व 48.6

कभी चञ्चल न हो, यही उसके प्रसाद का अर्थात् परम शुद्धि का लक्षण है।’ यहाँ निर्वात् में बिना कम्पित दीपक की बात कही गयी है।

इन वर्णनों के आधार पर यह प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास ने विद्युत् बल्ब के सिद्धान्त की ओर ही सङ्केत देते हुए यह बताया है कि निर्वात में प्रकाश की लौ निरन्तर जलती रहती है और इसी से प्रकाश निकलता है।

यहाँ यह बात स्पष्ट होती है कि जैसे विद्युत् बल्ब में निर्वात् या अक्रिय गैस होना आवश्यक है, तभी धारा प्रवाहित होने पर बल्ब का फिलामेण्ट तप्त होकर प्रकाशित होता है।

उसी प्रकार निर्वात् में दीप की लौ का जलना (विद्युत् बल्ब के सिद्धान्त पर) आधारित है।

वर्तमान समय में विद्युत् बल्बों का प्रयोग सर्वत्र दिखाई देता है। इसका आविष्कार अमेरिकी वैज्ञानिक थामस एल्वा एडिसन ने किया था।

उन्होंने मार्च 1878 ई. में विद्युत् बल्ब के निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया तथा लगभग 1200 प्रयोग के पश्चात् वह सफल हो पाया।

इस आविष्कार के लिए 1929 ई. में अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा एडीसन को सम्मानित भी किया गया।

महाभारत काल में भी विद्युत् बल्बों का प्रयोग प्रकाश हेतु किया जाता था। जैसे आधुनिक समय में त्यौहार या किसी कार्यक्रम आदि में घर की सजावट हेतु सर्वत्र बल्बों की कतारें लगाकर प्रकाशित किया जाता है

उसी प्रकार महाभारत काल में भी भवनों आदि की सजावट हेतु बल्बों को प्रकाशित किया जाता था।

इस सन्दर्भ में महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णन मिलता हैं। इस पर्व में वायुदेव ने कार्तवीर्य अर्जुन के समक्ष महर्षि उतथ्य की कथा का वर्णन किया है

जिसके अनुसार चन्द्रमा की पुत्री भद्रा के लिए महर्षि उतथ्य ही योग्यवर है ऐसा विचार कर चन्द्रमा ने उन्हें कन्यादान करने का निर्णय लिया तभी वायुदेव उनकी पुत्री भद्रा का अपहरण कर उसे वरूण लोक ले गए। जहाँ के रमणीय वातावरण के विषय में वायुदेव का कथन

लक्षणं तु प्रसादस्य यथा स्वप्ने सुखं स्वपेत् । निवाते वा यथा दीपो दीप्यमानो न कम्पते।। महा. भा. शान्ति पर्व 246.11

है कि जलेश्चर वरूण उस स्त्री को हरा कर अपने परम अद्भुत नगर में ले गए, जहाँ छः हजार बिजलियों का प्रकाश छा रहा था।’

इस वर्णन में वायुदेव ने छ: हजार बिजलियों के प्रकाश का उल्लेख किया है जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ये छ: हजार विद्युत् के बल्ब होंगे। कुछ लोग ‘षट्सहस्रशतहृदम्’ का अर्थ –

वहां छ: लाख तालाब शोभा पा रहे थे, ऐसा उल्लेख करते हैं, परन्तु ‘शतहृदा’ शब्द बिजली का वाचक है, अतः यहाँ विद्युत् के बल्ब को ही समझना उचित प्रतीत होता है।

अतः इससे यह प्रतीत होता है कि महाभारत काल में भी विद्युत् बल्बों द्वारा घर की शोभा बढ़ाई जाती थी। यह उस काल के भौतिक विज्ञान की उत्कृष्टता दर्शाता है।
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इस समस्त विवरण में महर्षि व्यास द्वारा भौतिक विज्ञान से सम्बन्धित सिद्धान्तों, नियमों तथा उनके पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग तत्कालीन भौतिक विज्ञान की उन्नत दशा का सशक्त प्रमाण प्रतीत होता है।

महर्षि व्यास द्वारा गुरूत्वाकर्षण बल, उत्क्षेप, मरीचिका, वर्ण-विक्षेपण, दर्पण, लेंस, चुम्बकत्व प्रतिध्वनि, विद्युत् आदि का उल्लेख किया गया है जोकि वैज्ञानिक दृष्टि से उचित तथा सैद्धान्तिक प्रतीत होते हैं।

अतः यह माना जा सकता है कि महाभारत काल में भौतिक विज्ञान का अत्यधिक विकास हो चुका था।

जलेश्वरस्तु हत्वा तामनयत् स्वं पुरं प्रति । परमाद्भुतसंकाशं षट्सहस्रशतहृदम्म हा. भा. अनु.

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महाभारत तथा भौतिक विज्ञान
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आधुनिक युग का मानव प्रगतिशील हैं वह दिन-प्रतिदिन विकास के नये-नये स्रोतों की ओर अग्रसर है। इन सभी विकास के आयामों में भौतिक विज्ञान (Physics) का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

इस विज्ञान के द्वारा अनेक जीवनोपयोगी वस्तुओं का निर्माण किया गया है, यथा-रेडियो (Radio), दूरदर्शन (Television), गणना करने का यन्त्र (Calculator), विद्युत् यन्त्र (Electric-Ingine) विमान (Aeroplane) आदि। इस विज्ञान के द्वारा चिकित्सा, दूरसंचार तथा युद्ध आदि के क्षेत्र में अनेक अविष्कार किए गए हैं,

यथा-लेसर किरणों द्वारा उपचार, सङ्गणक (Computer), परमाणु बम (Atom Bomb) आदि। इस प्रकार दैनिक जीवन में भौतिक विज्ञान का महत्त्व स्पष्ट हो जाता है।
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भौतिक विज्ञान सामान्य परिचय

भौतिक विज्ञान (Physics), विज्ञान (Science) की शाखा है जिसमें ऊर्जा की विभिन्न स्वरूपों तथा द्रव्य से उसकी अन्योन्य क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।” विज्ञान की इस शाखा के द्वारा विकास के नये आयाम खुले हैं। आज समस्त विश्व नये-नये अविष्कार करके अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहा है। भौतिक विज्ञान की परिभाषा देते हुए में वर्णन मिलता है-

भौतिक विज्ञान का विस्तृत अध्ययन करने के लिए इसे निम्नलिखित क्षेत्रों में विभक्त किया जा सकता है

  • पदार्थ (Matter)- इसमें पदार्थ की तीनों अवस्थाओं (ठोस, द्रव, गैस) से निर्मित वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है।
  • बल (Force) इसमें गुरूत्वाकर्षण बल, उत्प्लावन बल आदि का अध्ययन किया जाता है।
  • प्रकाश (Light)- इसमें प्रकाश से सम्बन्धित घटनाओं जैसे- मरीचिका विक्षेपणादि का अध्ययन किया जाता है।
  • चुम्बकत्त्व (Magnetism)- इसमें चुम्बककीय शक्ति का अध्ययन किया जाता है।
  • गति (Motion)- इसमें गति के नियमों का अध्ययन किया जाता है।
  • ऊष्मा (Heat)- इसमें विद्युत् ऊर्जा का अध्ययन किया जाता है।
  • विद्युत् (Electricity) – इसमें विद्युत् की उत्पत्ति तथा प्रयोग का अध्ययन किया जाता है।
  1. ध्वनि (Sound)- इसमें ध्वनि की उत्पत्ति, प्रकार आदि का अध्ययन किया जाता है।
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महाभारत तथा भौतिक विज्ञान

प्राचीन भारतीय साहित्य में अमूल्य रत्नों का भण्डार है। इनमें ज्ञान-विज्ञान के गूढ रहस्य छिपे हुए हैं। प्राचीन कालीन विद्वानों तथा मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने अपने प्रज्ञाचक्षुओं के द्वारा ज्ञान के अपरिमित भण्डार को अलोकित किया है। अतः प्राचीन ग्रन्थों में भौतिक, रसायन, वनस्पति, गणित, भूगर्भ आदि विज्ञानों से सम्बद्ध विविध विषयों का उल्लेख मिलता है।

यथा- अश्व -शक्ति का द्योतक है इस सन्दर्भ में ऋग्वेद में वर्णन मिलता है।’ पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण शक्ति के विषय में प्रश्नोपनिषद में वर्णन मिलता है। इसी प्रकार प्राचीन परम्परा का अनुसरण करते हुए महर्षि व्यास ने महाभारत कालीन विज्ञान के महनीय तत्त्वों का उल्लेख महाभारत में किया है।

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महाभारत तथा पदार्थ

  • प्रत्येक मनुष्य के आस-पास के वातावरण में विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ पायी जाती हैं। ये वस्तुएँ पदार्थों से मिलकर बनी होती हैं जैसे-बाल्टी, प्लास्टिक और लोहे से बनी होती है, कुदाल-हथौड़ी लोहे तथा लकड़ी से बनी होती हैं, पुस्तक कागज से बनी होती हैं आदि। अतः इससे स्पष्ट होता है कि कोई वस्तु एक ही पदार्थ से बनी हो अथवा एक ही वस्तु कई पदार्थों से बनी हो सकती है।
  • संसार में प्रत्येक वस्तु जिस सामग्री से बनी होती है, उसे ‘पदार्थ’ कहते हैं। हवा, पानी, रेत का एक कण भी पदार्थ के उदाहरण हैं। इन सभी पदार्थों का कुछ द्रव्यमान होता है और ये कुछ स्थान घेरते हैं। पदार्थ को ‘द्रव्य’ भी कहा जाता है। विश्व में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जो पदार्थ से न बनी हो यहाँ तक कि सूर्य, चन्द्रमा, हवा पानी आदि सभी पदार्थ के ही उदाहरण हैं।
  • अंग्रेज वैज्ञानिक डॉल्टन के अनुसार सभी पदार्थ छोटे-छोटे कणों से मिलकर बने हैं। इन सूक्ष्म कणों को परमाणु कहते हैं। परमाणु अविभाज्य है अर्थात इनको तोड़ा नहीं जा सकता। पदार्थ की तीन अवस्थाओं का स्वरूप बताते हुए डॉल्टन ने कहा है

‘आ द्वाभ्यां हरिभ्यामिन्द्र या हया चतुर्भिराषङिभर्खमानः | अष्टाभिर्दशाभिः सोमपेयमयं सुतः सुमख मा मृधस्कः ।। ऋ.वे. 2.10.4 2

आदित्यो ह वै ब्रह्म प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुष प्राणमनुरक्षनः । पृथिव्या या देवता सैषा पुरूषस्य अपानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुया॑नः । – प्रश्नोप. 3.8

(1) जब परमाणुओं के मध्य आकर्षण बल बहुत अधिक होता है तब ठोस की रचना होती है। अतः ठोस का आकार निश्चित होता है।

(2) जब परमाणुओं के मध्य आकर्षण बहुत अधिक नहीं होता तथा वे इधर-उधर गति कर सकते हैं। इस स्थिति में द्रव की रचना होती है।

(3) तब परमाणु स्वतंत्रतापूर्वक गति करते हैं तब इस स्थिति में गैस की रचना होती है।

  • ठोस को गर्म करने पर द्रव्य का रूप उपस्थित हो जाता है इसे पिघलना (Melting) कहते हैं। जैसे-बर्फ का पानी में बदलना। द्रव को गर्म करने पर गैस की अवस्था में आना वाष्पन (Evaporation) कहलाता है, जैसे-द्रव का उबल कर गैस बनना।
  • इस वर्णन से यह समझा जा सकता है कि पदार्थ की तीन अवस्थाएँ ठोस, द्रव तथा गैस हैं। ये सभी अवस्थाएँ सूक्ष्म कणों (परमाणुओं) के आकर्षण पर निर्भर करती हैं।
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  • प्राचीन वैदिक युग में ऋषि, मुनि, प्रकृति तथा प्राकृतिक घटनाओं का प्रेक्षण करते थे और ध्यान से समाधिस्थ अवस्था में मनन तथा चिंतन द्वारा समझने का प्रयास करते थे। यह उनका सैद्धान्तिक तरीका था। जिसके आधार पर वह नये प्रेक्षण करके नई जानकारी प्राप्त करते थे। इन महत्त्वपूर्ण जानकारियों का उल्लेख प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में मिलता है। वेद, वेदाङ्गों, पुराणों तथा षड्दर्शनों आदि में भौतिक विज्ञान पर प्रकाश डाला गया है जो कि जड़, चेतन तथा जगत् के विभिन्न पहलुओं से सम्बन्धित है।
  • महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में भी भौतिक विज्ञान के तत्त्वों का अनेक स्थानों पर वर्णन किया है। महाभारत के शान्ति पर्व में राजा जनक तथा महर्षि वसिष्ठ का संवाद मिलता है। इस संवाद में क्षर-अक्षर तथा प्रकृति-पुरूष के विषय में राजा जनक की शङ्का का समाधान महर्षि वसिष्ठ द्वारा किया गया है। इस सन्दर्भ में
  • महर्षि वसिष्ठ द्वारा द्रव्य का उदाहरण देते हुए कथन है कि – जिस प्रकार बीज से बीज की उत्पत्ति होती है उसी प्रकार द्रव्य से द्रव्य, इन्द्रिय से इन्द्रिय तथा देह से देह की प्राप्ति होती है।’ इस वर्णन में महर्षि वसिष्ठ ने यह बतलाया है कि द्रव्य से द्रव्य की उत्पत्ति होती है अर्थात् पदार्थ से ही पदार्थ की प्राप्ति होती है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में पदार्थ के गुणों का ज्ञान महर्षियो को भली-भाँति था। महाभारत की नीलकण्ठ टीका में इस विषय में कहा गया है

ऐद्रियकं धातु सप्तकं बीजद्वीजांतर मिवाजायते न्ह्येकं कार्य बीज द्वयोत्पत्तिकमिति दृष्टमस्तीव्याशयवानाह द्रव्यादिति।’

  • महाभारत के शल्य पर्व में वैशम्पायन ने राजा जनमेजय से मङ्कणक मुनि का का चरित्र बताया है जिसके अनुसार भगवान शिव ने ब्राह्मण रूप धारण करके महर्षि मङ्कणक के भ्रम को दूर किया जिसके फलस्वरूप महर्षि मङ्कणक ने भगवान शिव की स्तुति करते हुए कहा है कि सम्पूर्ण देवता भी आपको यथार्थ रूप से नही जान सकते, फिर मैं कैसे जान सकूगाँ? संसार में जो-जो पदार्थ स्थित हैं वे सब आप में देखे जाते हैं। इस वर्णन में यह कहा जा सकता है कि ईश्वर (भगवान शिव) संसार के सभी पदार्थों में विद्यमान हैं। इससे प्रतीत होता है कि ईश्वर सम्पूर्ण पदार्थों में स्थित है जोकि तीन रूपों में पाया जाता है जैसे-ठोस, द्रव तथा गैस । इस पृथ्वी पर पदार्थ के विषय में प्राचीन काल से ही वैज्ञानिकों ने बहुत सी विचारधाराएँ व्यक्त की हैं।
  • अतः महर्षि व्यास ने महर्षि वसिष्ठ के वचनों द्वारा भगवान शिव के संसार के सभी कणों में स्थित होने की बात कहकर अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण का ही उल्लेख

द्रव्याद् द्रव्यस्य निर्वृत्तिरिन्द्रियादिन्द्रियं तथा। देहाद् देहमवाप्नोति बीजाद् बीजं तथैव च || – महा. भा. शान्ति पर्व. 305.21 2 महा. भा. शान्ति पर्व. 305.21.

देवैरपि न शक्यत्त्व परिज्ञातुं कुतोमया। त्वयि सर्वेस्म दृश्यन्ते भावा ये जगति स्थिताः । – महा. भा. शल्य पर्व. 38.52

किया है इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि समस्त पदार्थों (ठोस, द्रव, गैस) में ईश्वर का वास होता है।

  • महाभारत के शान्तिपर्व में व्यासमुनि ने अपने पुत्र शुकदेव को वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान किया है। इसी सन्दर्भ में महर्षि व्यास ने शुकदेव से कहा है – “दिन सब पदार्थों को प्रकाशित करता है और रात्रि उन्हें छिपा लेती है। ये सर्वत्र व्याप्त है और सभी वस्तुओं का स्पर्श करते हैं, अतः तुम इनकी वेला में सर्वदा अपने धर्म का ही पालन करो।’ इस वर्णन में यह स्पष्ट कहा गया है कि दिन सभी पदार्थों को प्रकाशित करता है और रात्रि उन्हें छिपा लेती है।
  • अर्थात् दिन के प्रकाश में पृथ्वी पर उपस्थित सभी पदार्थ (ठोस-द्रव-गैस) दृष्टिगोचर होते हैं। तथा रात्रि में सभी पदार्थ प्रकाश की अनुपस्थिति में दिखाई नहीं देते हैं। अतः यह प्रतीत होता है कि महाभारत काल में पदार्थ से जुड़े रहस्यों का ज्ञान सर्वत्र प्रचलित था।
  • आधुनिक वैज्ञानिकों का यह मानना है कि समस्त पदार्थ सूर्य की रोशनी में भलीभाँति दिखाई देते हैं। इस तथ्य से महाभारत कालीन विद्वान् भी परिचित थे। अतः महर्षि व्यास ने उद्योगपर्व में सूर्य को पदार्थों का अधिपति तथा संरक्षक बताया है।
  • इस सन्दर्भ में उद्योगपर्व में दुर्योधन द्वारा सेनापति के पद पर भीष्म पितामह की नियुक्ति के विषय में कथन है कि “जिस प्रकार किरणों वाले तेजस्वी पदार्थों के सूर्य, वृक्ष और औषधियों के चन्द्रमा, यक्षों के कुबेर, देवताओं के इन्द्र, पर्वतों के मेरू, पक्षियों के गरूड़, समस्त देवयोनियों के कार्तिकेय और वस्तुओं के अग्निदेव अधिपति तथा संरक्षक हैं (उसी प्रकार आप आप हमारी समस्त सेनाओं के अधिनायक और संरक्षक हो)।

अहर्निशेषु सर्वतः स्पृशत्सु सर्वचारिषु । प्रकाशगूढ़वृत्तिषु स्वधर्ममेव पालय ।।महा.भा.शान्तिपर्व. 321.56 2

रश्मिवतामिवादित्यो वीरूधामिव चन्द्रमाः । कुबेर इव यक्षाणां देवानामिव वासवः ।। पर्वतानां यथा मेरूः सुपर्णः पक्षिणां यथा। कुमार इव देवानां वसूनामिव हव्यवाट् ।। – महा. भा. उद्यो. पर्व 156.12-13

इस वर्णन से प्रतीत होता है कि समस्त पदार्थों के संरक्षक सूर्य हैं। अर्थात् सम्पूर्ण संसार में जो-जो पदार्थ उपस्थित हैं उन सभी पदार्थों के अधिपति तथा संरक्षक सूर्य हैं क्योंकि समस्त पदार्थ सूर्य के प्रकाश में ही स्पष्ट दिखाई देते हैं।

विज्ञान के ज्ञाताओं के अनुसार पदार्थ को ‘द्रव्य’ भी कहा गया है। महर्षि व्यास ने महाभारत में भी पदार्थ को द्रव्य नाम से सम्बोधित किया है। महाभारत के आदि पर्व में ज्वलनशील द्रव्यों का वर्णन मिलता है।

इस सन्दर्भ में दुर्योधन द्वारा लाक्षागृह के निर्माण हेतु पुरोचन को आदेश देते हुए कथन है कि “सन तथा राल आदि, जो कोई भी आग भड़काने वाले द्रव्य संसार में हैं, उन सबको उस मकान की दीवारों में लगवाना।

इस वर्णन में दुर्योधन ने ज्वलनशील द्रव्यों के उपयोग करने का आदेश पुरोचन को दिया है इससे यह प्रतीत होता है कि दुर्योधन को पदार्थ के गुणों तथा अवस्थाओं का भली-भाँति ज्ञान था क्योंकि उसने पुरोचन को संसार में पाई जाने वाले समस्त ज्वलनशील पदार्थों (सन, राल, घी, तेल, चर्बी आदि) का प्रयोग करने का आदेश दिया था।

यहाँ महर्षि व्यास ने पदार्थ को ‘द्रव्य’ नाम से सम्बोधित किया है।
महाभारत में महर्षि व्यास ने अनेक स्थानों पर द्रव्यों (पदार्थों) का उल्लेख किया है। उस काल में राजभवनों, सभाओं आदि का निर्माण विभिन्न द्रव्यों से किया जाता था।

महाभारत के सभा पर्व में नारद मुनि से ब्रह्माजी की सभा के विषय में प्रश्न करते हुए युधिष्ठिर का कथन है कि “ब्रह्मन् उन सभाओं का निर्माण किस द्रव्य से हुआ है। उनकी लम्बाई-चौड़ाई कितनी है ? ब्रह्माजी की उस दिव्य सभा में कौन-कौन सभासद उन्हें चारों ओर से घेरकर बैठते हैं ?”2

इस वर्णन में विशेष द्रव्यों (पदार्थों) से निर्मित ब्रह्मा की सभा के विषय में युधिष्ठिर नारद मुनि से प्रश्न करते हैं। यहाँ ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि

शणसर्जरसादीनि यानि द्रव्याणि कानिचित् ।
आग्नेयान्युत सन्तीह तानि तत्र प्रदापय || – महा. भा. आदि पर्व 143.9 2

किंद्रव्यास्ताः सभाः ब्रह्मन् किं विस्ताराः किमायताः । पितामहं च के तस्यां सभायां पर्युपासते।।। – महा. भा. सभा पर्व 6.16
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उस सभा के निर्माण में अनेक पदार्थ जैसे – लोहा, लकड़ी, सोना आदि प्रयोग किए गए होंगे। आधुनिक वैज्ञानिकों ने पदार्थ को तीन भागों में बाँटा है – ठोस, द्रव, गैस । परन्तु महाभारत में पदार्थों के मात्र दो भाग बताए गए हैं – शीत और उष्ण । महाभारत के अनुशासन पर्व में श्री महेश्वर द्वारा उमा से पदार्थों के दो भागों का वर्णन करते हुए कथन है कि “जगत् के सारे पदार्थ दो भागों में विभक्त हैं –

शीत और उष्ण (अग्नि और सोम)। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि महाभारत काल में पदार्थ को भागों में बाँटा गया था – अग्नि और सोम परन्तु आधुनिक वैज्ञानिकों ने इसे तीन भागों में ही बाँटा है।

महाभारत में उपलब्ध पदार्थों का उल्लेख निराधार नहीं है वरन् वैदिक काल में भी पदार्थों के रहस्यों का गूढ़ ज्ञान महर्षियों, मुनियों आदि को था। इस सन्दर्भ में ऋग्वेद में पदार्थ विद्या का उल्लेख विस्तृत रूप में मिलता है।

यथा –
आपो भूयिष्ठा इत्येको अब्रवीग्निभूपिष्ठ इत्यन्यो अब्रवीत्। वधर्यन्ती बहुभ्यः प्रैको अब्रवीदृता वदन्तश्चमसां अपिंशत।।’
ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में पदार्थों के गुणों का उल्लेख किया गया है यथा

ये चिद्धि त्वामृषयः पूर्व ऊतये जुहूरेड वसे महि। सा नः स्तोमा अभि गृणीहि राधसोषः शुक्रेण शोचिषो।।’

इस मन्त्रानुसार उषा अपने प्रकाश से समस्त पदार्थों को प्रकाशित करती हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि दिन में समस्त पदार्थ (ठोस-द्रव-गैस) आदि दृष्टिगत होते हैं परन्तु रात्रि में प्रकाश के अभाव में इन्हें देखना असम्भव है। इसलिए ऐसा

‘तदहं कथयिष्यामि श्रृणु तत्वं समाहिता। द्विविधो लौकिको भावः शीतमुष्णमिति प्रिये ।। – महा. भा. अनु. पर्व , – ऋ.वे. 1.16.9 3 ऋ. वे. 1.48.14 102

प्रतीत होता है कि पदार्थों के इन गुणों से प्राचीन वैदिक ऋषि भी अवगत थे। महाभारत के रचनाकार ने भी वेदों को आधार मानकर ही सर्वत्र पदार्थों का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में ‘तैत्तिरीय उपनिषद में पदार्थ का वर्णन मिलता है, यथा- PHYSICS Origin Of Matter

तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाराः सम्भूतः । आकाशात् वायुः । वायोः अग्निः । अग्नेः आपः । अद्भ्यः पृथिवी।।

महाभारत तथा बल (Force) यह संसार परिवर्तनशील है। मनुष्य के आस-पास के वातावरण में परिवर्तन प्रायः होता रहता है। यह परिवर्तन अधिकांशतः बल के कारण होता है जैसे – किसी वस्तु को बल लगाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाना।

मनुष्य अपने दैनिक कार्यों में बल का प्रयोग करता रहता है। अतः ‘बल वह बाह्य कारण है जो किसी वस्तु पर लगाने पर वस्तु की गति में परिवर्तन करता है।” बल के महत्व को जानते हुए प्राचीन ऋषियों तथा मुनियों ने वेद, रामायण, महाभारत आदि में इसका उल्लेख किया है।

Science in Sanskrit, महाभारत के अनुशासन पर्व में बल को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है। इस सन्दर्भ में भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर से परम शुद्धिदायक तीर्थों का वर्णन करते हुए कथन है कि “जैसे क्रियाहीन बल अथवा बलरहित क्रिया इस जगत् में कार्य का साधन नहीं कर सकती।

बल और क्रिया दोनों के संयुक्त होने पर ही कार्य की सिद्धि होती है, इसी प्रकार शरीर-शुद्धि और तीर्थ शुद्धि से युक्त पुरूष ही पवित्र होकर परमात्म प्राप्ति रूप सिद्धि प्राप्त करता है। अतः दोनों प्रकार की शुद्धि ही उत्तम मानी गयी है।

इस वर्णन में महर्षि व्यास ने बल तथा क्रिया को स्पष्ट करते हुए कहा है कि दोनों के संयुक्त होने पर ही कार्य की सिद्धि होती है। बल के द्वारा दैनिक कार्यों की सिद्धि प्रायः होती है। बल और क्रिया के द्वारा मनुष्य चलता, दौड़ता, उठता, बैठता आदि कार्य करता है।

महाभारत में बल का प्रयोग अधिकांशतः युद्ध आदि के वर्णन में किया गया है। जैसे – बल, पराक्रम आदि के द्वारा युद्ध में शत्रु पर विजय पाना आदि । महाभारत के कर्ण पर्व में दुर्योधन शल्य को शिव के विचित्र रथ का विवरण सुनाता है जिसमें ब्रह्मदेव से प्राप्त वर का दुरूपयोग करके दानवों के उपद्रवों सेव्याकुल देवता, शिव भगवान के समीप जाते हैं तो शिवजी उनसे कहते हैं कि –

“देवताओं ! मेरा ऐसा विचार है कि तुम्हारे सभी शत्रुओं का वध किया जाय, परन्तु मैं अकेला ही उन सबको नहीं मार सकता, क्योंकि वे देशद्रोही दैत्य बड़े बलवान हैं। अतः तुम सब लोग एक साथ सङ्घ बनाकर मेरे आधे तेज से पुष्ट हो युद्ध में उन शत्रुओं को जीत लो क्योंकि जो संगठित होते हैं वे महान् बलशाली हो जाते हैं।

देवता बोले – प्रभो ! युद्ध में हम लोगों का जितना भी तेज और बल है, उससे
दूना उन दैत्यों का है, ऐसा हम मानते हैं क्योंकि उनके तेज और बल को हमने
यथा बलं क्रियाहीनं क्रिया वा बलवर्जिता। नेह साधयते कार्य समायुक्ता तु सिध्यति।। एवं शरीरशौचेन तीर्थशौचेन चान्वितः । शुचिः सिद्धिभवाप्नोति द्विविधं शौचमुक्तमम् ।। – महा. भा अनु. पर्व 108.20-21 देख लिया है।

इस वर्णन के अनुसार संगठित बल, एकाकी बल की अपेक्षा अधिक होता है। जैसे – यदि एक लकड़ी तोड़ी जाय तो कम बल लगता है और यदि लकड़ियों का संग्रह हो तो उसे तोड़ने में अधिक बल लगता है।

अतः इससे प्रतीत होता है कि महाभारत काल में बल (Force) के गुणों से लोग भली-भाँति परिचित थे। भौतिक विज्ञान के अन्तर्गत बल के दो अन्य प्रकार माने गए हैं – (क.) गुरूत्वाकर्षण (ख.) उत्क्षेप

ब्रह्माण्ड में किन्हीं दो पिण्डों के बीच कार्य करने वाले आकर्षण बल को ‘गुरूत्वाकर्षण बल कहते हैं तथा किसी वस्तु को जल में डुबोने पर जल के भीतर से उस वस्तु पर लगने वाले बल को ‘उत्क्षेप’ या ‘उत्प्लावन’ बल कहते हैं। यह बल वायु में भी लगता है।

(क.) गुरूत्वाकर्षण (Gravitation)
प्राचीन काल से ही ऋषियों, मनीषियों आदि विद्वानों ने प्रकृति के रहस्यों को समझने का प्रयास किया है। उनकी इस जिज्ञासु प्रवृत्ति ने ही उस काल की वैज्ञानिक पद्धति को श्रेष्ठ तथा अतुलनीय बना दिया है। प्राचीन वैदिक ग्रन्थों, धर्मशास्त्रों तथा महाकाव्यों आदि में उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उल्लेख मिलता है।

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महर्षि वेद व्यास ने पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण बल का उल्लेख, महाभारत के शान्ति पर्व में किया है। इस पर्व में पञ्चमहाभूतों के गुणों का विस्तृत वर्णन भीष्म

हन्तव्याः शत्रवः सर्वे युष्माकमिति मे मतिः । न त्वेक उत्सहे हन्तुं बलस्था हि सुरद्विषः ।। ते यूयं संहताः सर्वे मदीयेनार्धतेजसा । जयध्वं युधि ता शत्रून् संहताहि महाबलाः ।। अस्मतेजोबलं यावत् तावद्विगुणमाहवे। तेषामिति हिमन्यामो दृष्टतेजोबला हिते।। – महा. भा. कर्ण पर्व 34.6-8

द्वारा युधिष्ठिर के सम्मुख किया गया है, जिसमें पृथ्वी के दस गुणों का वर्णन मिलता है यथा
भूमेः स्थैर्य गुरूत्वं च काठिन्यं प्रसवार्थता। गन्धो गुरूत्वं शक्तिश्च संघातः स्थापना धृतिः।।’

अर्थात् स्थिरता, भारीपन, कठिनता (कड़ापन), बीज को अङ्कुरित करने की शक्ति, गंध विशालता, शक्ति (गुरूत्व), संघात, स्थापना और धारण शक्ति – ये दस पृथ्वी के गुण हैं। इस वर्णन में भीष्म ने पृथ्वी के दस गुणों में से एक गुण शक्ति अर्थात् गुरूत्व शक्ति (गुरूत्वाकर्षण बल) का उल्लेख किया है जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण बल से सभी भली-भाँति परिचित थे।

महाभारत के भीष्म पर्व में गीता के उपदेशों में पृथ्वी की धारिता शक्ति (गुरूत्वाकर्षण बल) का वर्णन मिलता है। इस सन्दर्भ में भगवान श्रीकृष्ण का अर्जुन के प्रति कथन है कि –

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।’

अर्थात् हे अर्जुन ! मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ। इस वर्णन से यह प्रतीत होता है कि भगवान श्रीकृष्ण ही पृथ्वी की गुरूत्व शक्ति के रूप में विद्यमान हो सभी भूतों को धारण करते हैं। यहाँ भगवान के कथन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पृथ्वी में धारिता शक्ति है। इस गुरूत्व शक्ति के बिना प्राणी टिक ही नहीं सकते हैं। यहाँ पृथ्वी का पर्यायवाची ‘गो’ शब्द प्रयुक्त हुआ है जिसका अर्थ है – ‘गमन करने वाली’ | अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकार पृथ्वी की परिक्रमण गति और गुरूत्वाकर्षण शक्ति को भली-भाँति जानते थे।
महा. भा. शान्ति पर्व 255.3 2 महा. भा. भीष्म पर्व 39.13 (गीता. अ-15)

इस गुरूत्वाकर्षण शक्ति का स्पष्ट उल्लेख प्रश्नोपनिषद में प्राप्त होता है। प्रश्नोपनिषद् के अनुसार, पृथिवी की शक्ति मनुष्य को खड़ा रहने में अपान वायु की सहायता करती है।’ इस पर भाष्य लिखते हुए आदि शंकराचार्य ने लिखा है –

“यदि पृथिवी देवी इस शरीर को अपान वायु के द्वारा सहायता न करे तो यह शरीर या तो इस ब्रह्माण्ड में तैरेगा या फिर नीचे गिर जायगा।”2 इस वर्णन से स्पष्ट होता है कि आदि शंकराचार्य गुरूत्वाकर्षण शक्ति को भली-भाँति जानते थे।

अन्यथा वे इतनी विशद व्याख्या केवल कल्पना के आधार पर नहीं कर सकते। यद्यपि शंकराचार्य का काल 7-9वीं सदी माना गया है तो भी इससे भी बहुत पहले महाभारत काल में गुरुत्वाकर्षण शक्ति का ज्ञान विद्वानों को हो चुका था। जबकि आधुनिक वैज्ञानिक गुरूत्वाकर्षण बल की खोज का श्रेय न्यूटन (Newton) को देते हैं।

न्यूटन ने “गुरूत्वाकर्षण का सिद्धान्त” प्रतिपादित किया है जिसके अनुसार गुरूत्वाकर्षण बल को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है
प्रत्येक वस्तु छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनी होती है। गुरूत्वाकर्षण के नियमानुसार पृथ्वी प्रत्येक कण को अपने केन्द्र की ओर आकर्षित करती है जिससे वस्तु पृथ्वी पर गिर पड़ती है।

इस आकर्षण शक्ति को ‘गुरूत्वाकर्षण बल’ कहते हैं। न्यूटन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘प्रिंसिपिया‘ (Principia – 1687) में गुरूत्वाकर्षण का नियम लिखा कि – “ब्रह्माण्ड में प्रत्येक पिण्ड दूसरे पिण्ड को अपनी ओर आकर्षित करता है।” न्यूटन के इस नियम का महत्व खगोल तथा भौतिक विज्ञान दोनों में है।

आदित्यो ह वै ब्राह्मः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्या या देवता सैषा पुरूषस्य अपानमवपृभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुव्यनिः | – प्रश्नो . 3/8 2

तथा पृथिव्यामभिमानिनी या देवता प्रसिद्धा सैषा पुरूषस्य अपानमपानवृत्तिमवष्टभ्याकृष्य वशीकृत्याध एवापकर्षणेनानुग्रहं कुर्वती वर्तत इत्यर्थः अन्यथा हि शरीरं गुरूत्वात् पतेत्सावकाशे वा उदगच्छेत।। सं. विज्ञा., पृ. 87

पाश्चात्य वैज्ञानिक न्यूटन (Newton) ने गुरूत्वाकर्षण का जो नियम बताया है, इसका ज्ञान भारत के प्राचीन ग्रन्थों में बहुत पहले लिखा जा चुका है। इस विषय में प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ तथा खगोलशास्त्री भास्कराचार्य द्वारा सिद्धान्त शिरोमणि में कथन है –

मरूच्चलो भूरचला स्वभावतो यतो विचित्रावतवस्तु शक्त्यः ।। आकृष्टिशक्तिश्च मही यथायत् खस्थं गुरू स्वाभिमुखं स्वशक्तया। आकृष्यते तत्पततीव भाति समेसमन्तात क्व पतत्वियं खे।।’

अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर आकर्षित करती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे ?

अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरूत्व शक्तियां सन्तुलन बनाए रखती है। अतः इससे यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन महर्षि भास्कराचार्य ने 550 वर्ष पूर्व (न्यूटन से) यह सिद्धान्त प्रतिपादित कर दिया था। पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के विषय में महाभाष्य व्याकरण में कहा गया है कि

लोष्ठः क्षिप्तो बाहुवेगं गत्वा नैव तिर्यग्गच्छति नोर्ध्वमारोहति पृथिवी विकारः
पृथिवीमेव गच्छति।

अर्थात् मिट्टी का ढेला ऊपर फेंका हुआ बाहुवेग को पूरा करके न ही टेढ़ा जाता है और न अधिक ऊपर चढ़ता है किन्तु पृथ्वी का विकार होने के पृथिवी पर ही आता है।

‘भास्कराचार्य – सिद्धा. शिरो. गोला. भुवनकोश, 5-6 ? Science in Vedic Literature – Pg. 178

वराहमिहिर की पंचसिद्धान्तिका में पृथिवी की स्थिति के सम्बन्ध में कहा गया
है
पञ्च महाभूतमय स्तारागण पंजरे महीगोलः | स्वेयस्कान्तान्तः स्थो लोह इवावस्थितो वृतः।।’

अर्थात् तारागण के पंजर में पञ्च महाभूतों से युक्त पृथिवी गोल आकाश में चुम्बकों के मध्य में लोहे के समान अवस्थित है। तारागण चुम्बक और पृथ्वी लोहे के समान है। इससे स्पष्ट है कि तारों में आकर्षण शक्ति है। उसी आकर्षण से आकृष्ट हो यह पृथ्वी स्थित है।

पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण शक्ति का उल्लेख वैदिक ग्रन्थों में भी मिलता है। अथर्ववेद के द्वादश काण्ड में पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण शक्ति तथा गति का उल्लेख मिलता है। इस वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण बल का ज्ञान वेदों के काल से चला आ रहा है। अतः इसकी खोज न्यूटन (Newton) से बहुत पहले ही हो चुकी थी। आदि शंकराचार्य भास्कराचार्य, प्रश्नोपनिषद तथा महाभारत में इस सिद्धान्त (गुरूत्वाकर्षण बल) का उल्लेख यह प्रमाणित करता है कि पृथ्वी की धारिता शक्ति से प्राचीन विद्वान् भली-भाँति परिचित थे।

उत्क्षेप (Upthrust)

आधुनिक भौतिक विज्ञान के अनुसार उत्क्षेप (upthrust) से तात्पर्य है कि – ‘यदि किसी पिण्ड को रस्सी से बांधकर जल में डुबोया जाय तो उस पर नीचे से एक बल लगता है तथा वह वस्तु वायु की अपेक्षा जल में कम भारी प्रतीत होती है। भार में यह कमी जल द्वारा वस्तु पर लगाए गए बल के कारण होती है। इस बल
को द्रव का ‘उत्क्षेप’ (upthrust) अथवा ‘उत्प्लावन बल’ कहते हैं।

मल्वं बिभ्रती गुरूभृद् भद्रपापस्य निधनं तितिक्षुः । वराहेण पृथिवी संविदानां सूकराय वि जिहीते मृगाय ।। अथर्व. वे. 12.1.48

द्रव की भाँति वायु भी वस्तुओं पर उत्क्षेप लगाती है। यदि किसी वस्तु को पहले निर्वात में तथा फिर वायु में तोला जाए तो दोनों भारों में कुछ अन्तर आता है, जोकि वस्तु द्वारा हटायी गयी वायु के भार के बराबर होता है अर्थात् वायु भी द्रव की तरह वस्तुओं पर उत्क्षेप (upthrust) लगाती है क्योंकि वायु का घनत्व बहुत

कम होता है अतः वायु का उत्क्षेप बहुत कम होता है।
महाभारत काल में विद्वान्, ऋषि आदि वायु के उत्क्षेप से सम्बन्धित गुणों से भली-भाँति परिचित थे। इस सन्दर्भ में महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर के प्रति वायु के गुणों का वर्णन करते हुए कथन है कि –

अनियत स्पर्श, वाइन्द्रिय की स्थिति, चलने-फिरने आदि की स्वतंत्रता, बल, शीघ्रगामिता, मलमूत्र आदि को शरीर से बाहर निकालना, उत्क्षेपण आदि कर्म क्रिया-शक्ति, प्राण

और जन्म मृत्यु ये सब वायु के गुण हैं।’ इस वर्णन में वायु का एक गुण उत्क्षेप बताया गया है जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकार

उत्क्षेपण के वैज्ञानिक रहस्य से भली-भाँति परिचित थे।
महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में वायु तथा जल दोनों के उत्क्षेप (Upthrust) को उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया है। जल के उत्क्षेप के सन्दर्भ में अनुशासन पर्व के प्रथम अध्याय में वर्णन मिलता है।

इस अध्याय में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को सांत्वना देने के लिए (गौतमी) ब्राह्मणी, व्याघ्र, सर्प, मृत्यु और काल के संवाद का उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार एक बूढ़ी ब्राह्मणी (गौतमी) का पुत्र सांप के काटने से मर जाता है तभी एक व्याघ्र उस सांप को पकड़कर गौतमी के पास लाता है तब ब्राह्मणी (गौतमी) द्वारा उस व्याध के प्रति कथन है कि संसार में धर्माचरण करके जो अपने को हल्के रखते हैं (अपने ऊपर पाप का भारी बोझ नहीं लादते हैं) वे पानी के ऊपर चलने वाली नौका के समान भवसागर से पार हो जाते हैं,

परन्तु जो पाप के बोझ से अपने को बोझिल बना लेते हैं, वे जल में फेंके गए हथियार की भाँति नरक

वायोरनियमस्पर्शी वादस्थानं स्वतंत्रता। बलं शैध्यं च मोक्षं च कर्म चेष्टाऽऽत्मता भवः ।। महा. भा. शान्ति पर्व 255.6

समुद्र में डूब जाते हैं।’ इस वर्णन में ब्राह्मणी द्वारा कहे गए वचनों की समानता प्लवन के सिद्धान्तों से की जा सकती है, यथा – पाप के बोझ से हीन व्यक्ति हल्का हो नाव के समान तैरता है,

प्लवन ने अपने सिद्धान्त में भी यही कहा है कि हल्की वस्तु पानी में तैरती है क्योंकि यदि वस्तु अपने वजन से अधिक पानी हटाती है तो वह तैरती है और पाप के बोझ से युक्त मनुष्य भारी हो हथियार के समान समुद्र में डूब जाता है क्योंकि यदि कोई हथियार समुद्र में फेंका जाए तो वह भारी होने के कारण तथा अपने वजन से कम पानी हटाने के कारण डूब जाता है।

इसी कारण बड़े-बड़े जहाज तैरते हैं और लोहे की कील डूब जाती है।
महाभारत के अनुशासन पर्व में जल उत्क्षेपण या उत्पलावन बल का उल्लेख किया गया है। इस पर्व में विश्वामित्र को ब्राह्मणत्व की प्राप्ति का वर्णन करते हुए भीष्म का युधिष्ठिर के प्रति कथन है कि- पूर्वकाल में विश्वामित्र के भय से अपने शरीर को रस्सी से बाँधकर श्रीमान् वसिष्ठ अपने आपको एक नदी के जल में डुबो रहे थे, परन्तु उस नदी के द्वारा पाशरहित (बन्धनमुक्त) हो पुनः ऊपर उठ आये।

महात्मा वसिष्ठ के उस महान कर्म से विख्यात हो वह पवित्र नदी उसी दिन से विपाशा कहलाने लगी। इस वर्णन से प्रतीत होता है कि नदी ने उत्पलावन बल उत्क्षेपण के कारण ही महर्षि वसिष्ठ को ऊपर उठा दिया। इसे इस रूप में भी समझा जा सकता है कि जब कोई वस्तु जल में गिर जाती है या डुबोयी जाती है तो उसपर नीचे (पानी) की ओर से एक बल कार्य करता है जिसे उत्पलावन बल उत्क्षेपण कहते हैं।

प्लवन्ते धर्मलाघवो लोकेऽम्भसि यथा प्लवाः। भज्जन्ति पापगुरवः शस्त्रं स्फन्नमिवोदेक।।- महा. भा. अनु. पर्व. 1.22. 2

तथैवस्यभयाद् वद्ध्वा वसिष्ठः सलिले पुरा।
आत्मानं मञ्ज प श्रीमान् विपाशाः पुनरूत्थितः ।। तदाप्रभृति पुण्या हि विपाशाभून्महानदी। विख्याता कर्मणा तेन वसिष्ठस्य महात्मनः ।।- महा. भा. अनु. पर्व. 3.12.13

आधुनिक भौतिक विज्ञान के अनुसार, सर्वप्रथम उत्लावन बल अर्थात् जल के उत्क्षेप का अध्ययन आर्कमिडीज नामक वैज्ञानिक ने किया था। इसके आधार पर उन्होंने एक सिद्धान्त निकाला जिसे “आर्किमिडीज का सिद्धान्त” कहते हैं। यथा – “जब कोई वस्तु किसी द्रव में पूरी अथवा आंशिक रूप से डुबोयी जाती है तो उसके भार में कमी का आभास होता है।

भार में यह आभासी कमी उस वस्तु के डूबे हुए भाग द्वारा हटाये गये द्रव के भार के बराबर होती है।

महर्षि वेद व्यास ने महाभारत में अनेक वैज्ञानिक तथ्यों का उल्लेख किया है। महाभारत के वन पर्व में कर्ण के जन्म की कथा भी वैज्ञानिक रहस्य से अनुस्यूत प्रतीत होती है। इस सन्दर्भ में महात्मा वैशम्पायन द्वारा राजा जनमेजय के प्रति कर्ण के जन्म की कथा का वर्णन किया गया है जिसके अनुसार दुर्वासा ऋषि की सेवा-शुश्रूषा के फलस्वरूप कुन्ती (पृथा) ने एक अद्भुत मंत्र प्राप्त किया। \

जिसकी सहायता से वह किसी भी देवता को बुला सकती थी तथा उसके द्वारा पुत्र प्राप्त कर सकती थी। अतः कौमार्यवस्था की चञ्चलता के कारण कुन्ती ने कौतूहलवश सूर्यदेव का आवाहन कर उस मंत्र की परीक्षा की।

जिसके कारण उसे सूर्यदेव से एक पुत्र प्राप्त हुआ परन्तु लोक लाज के भय से कुन्ती ने अपने पुत्र को त्यागना ही उचित समझा। उस बालक के उत्पन्न होते ही भामिनी कुन्ती ने धाय से सलाह लेकर एक पिटारी मंगवायी और उसमें सब ओर सुन्दर मुलायम बिछौने बिछा दिए।

इसके बाद उस पिटारी में चारों आर मोम लगा दिया, जिससे उसके भीतर जल न प्रवेश कर सके। जब वह (पिटारी) सब तरह से चिकनी और सुखद हो गयी तब उसके भीतर उस बालक को सुला दिया और उसका सुन्दर ढक्कन बंद कर दिया तथा रोते-रोते उस पिटारी को अश्वनदी में छोड़ दिया।’

इस वर्णन के अनुसार कुन्ती ने बालक को पिटारी में रखने से पूर्व पिटारी के चारों ओर मोम लगा दिया। इससे कुन्ती के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का बोध होता है क्योंकि कुन्ती को यह बात

जातमात्रं च तं गर्भ धात्र्या सम्मन्त्र्य भाविनी। मञ्जूषायां समाधाय स्वास्तीर्णायां समन्ततः ।।
मधूच्छिष्ट स्थितायां सा सुखायां रूदती तथा। श्लक्षणायां सुपिधानायामश्वनद्या मवा सृजत् ।।- महा. भा. वन पर्व 3086-7

भली-भाँति ज्ञात थी कि यदि पिटारी के चारों ओर मोम लगा दिया जाए तो नदी का जल उसमें प्रवेश नहीं करेगा। वैज्ञानिक दृष्टि से इस तथ्य को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है कि पिटारी के छिद्र, मोम के लगा देने से लगभग बन्द हो जाते हैं अथवा बहुत सूक्ष्म हो जाते हैं जिससे पानी के अणु उस छिद्र से बड़े होने के कारण पिटारी में प्रवेश नहीं कर पाते हैं।

साथ ही पिटारी की लकड़ी गीली होकर भारी नहीं हो पाती है। अतः इससे यह प्रतीत होता है कि कुन्ती को अणु-परमाणु तथा उत्प्लावन बल का भली-भाँति ज्ञान था, वह जानती थी कि पिटारी में शिशु को रखने पर तथा नदी में डालने पर वह नदी के जल में डूब सकता है।

इसी कारण उसने पिटारी के चारों ओर मोम लगवाया जिससे जल पिटारी में न जा सके और जल से न भीगकर लकड़ी हल्की बनी रहे और नदी में डाले जाने पर वह अपने वजन से अधिक जल हटाकर तैरती रहे।
अतः पिटारी के तैरने के सन्दर्भ में प्लवन के सिद्धान्त का सङ्केत मिलता है। अतः यह माना जा सकता है कि कुन्ती एक विदुषी महिला थी जिसे अणु परमाणु तथा प्लवन के सिद्धान्त का भली-भाँति ज्ञान था।

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महाभारत तथा प्रकाश (Light)

प्रकाश एक प्रकार की ऊर्जा है, जो दृष्टि को संवेदना देती है। अंधेरे में रखी वस्तुएं प्रकाश पड़ने पर ही दिखाई देती है। अतः इससे स्पष्ट होता है कि “प्रकाश वह कारक है जिससे वस्तुएं दिखाई देती हैं।”

प्रकाश से सम्बन्धित रहस्यों तथा विशेषताओं का ज्ञान प्राचीन काल के विद्वानों को भलीभाँति था। महर्षि व्यास ने महाभारत में अनेक स्थानों पर प्रकाश से जुड़े रहस्यों का उद्घाटन किया है।

महाभारत के वन पर्व में रेगिस्तान की मरीचिका का उल्लेख मिलता है। इस सन्दर्भ में वन पर्व में द्रौपदी द्वारा दुःख से मोहित हो युधिष्ठिर को उलाहना देते हुए कथन है कि तत्त्वदर्शी मुनियों ने वस्तुओं के स्वरूप कुछ और प्रकार से देखे हैं,

किन्तु अज्ञानियों के सामने किसी और ही रूप में भासित होते हैं। जैसे आकाशवाणी सूर्य की किरणें मरूभूमि में पड़कर जल के रूप में प्रतीत होने लगती हैं। इस वर्णन में द्रौपदी, युधिष्ठिर को रेगिस्तान की मरीचिका का उदाहरण देते हुए समझा रही है।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि रेगिस्तान की मरीचिका से तात्पर्य प्रकाश के पूर्ण आन्तरिक परावर्तन से है। यह एक वैज्ञानिक घटना है जिसमें सूर्य की किरणें मरूस्थल पर पड़ती हैं तो दूर से जल का आभास कराती हैं। इस घटना को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है।

रेगिस्तान की मरीचिका (Mirage) –

ग्रीष्म ऋतु का दोपहर में कभी-कभी रेगिस्तान में यात्रियों को दूर से पेड़ के साथ-साथ उसका उल्टा प्रतिबिम्ब भी दिखाई देता है और उन्हें ऐसा भ्रम हो जाता है कि वहां कोई जल का तालाब है जिसमें पेड़ का उल्टा प्रतिबिम्ब दिखाई दे रहा है जबकि वास्तव में वहां कोई जल का तालाब नहीं होता। इसे रेगिस्तान की मरीचिका कहते हैं।

to Sky Light ray from sky
दिन में सूर्य की गर्मी से रेगिस्तान की रेत गर्म हो जाती है तो रेत के
Inferior Mirage DIrect sight

सम्पर्क में आने वाली वायु गर्म तथा विरल हो जाती है। इसकी तुलना में इस
Cool Air Cool Air

पर्त के ऊपर की वायु की Har AirTS परत अपेक्षाकृत ठण्डी और सघन होती है। दूसरे शब्दों में इससे कुछ ऊपर तक वायु की विभिन्न परतें नीचे की परतों की अपेक्षा सघन तथा ऊपर से नीचे की ओर वायु की विभिन्न परतें नीचे की परतों की अपेक्षा सघन तथा ऊपर से नीचे की ओर वायु की विभिन्न परतें अपेक्षाकृत विरल होती हैं। जब किसी पेड़ की चोटी से आने

Hot Air pparent Image

अन्यथा परिदृष्टानि मुनिभिस्तत्वदर्शिभिः ।
अन्यथा परिवर्तन्ते वेगा इव नभस्वतः ।। महा. भा. वन पर्व. 30.33

वाली प्रकाश-किरणें पृथ्वी की ओर आती हैं तो उन्हें अधिकाधिक विरल परतों से होकर आना पड़ता है। प्रत्येक परत पर अपवर्तित किरणें अभिलम्ब से दूर हट जाती हैं। अतः प्रत्येक अगली परत पर आपतन कोण बढ़ता जाता है तथा किसी विशेष परत पर क्रान्तिक कोण से बड़ा हो जाता है।

इस परत पर किरणें पूर्ण परावर्तित होकर ऊपर की ओर चलने लगती हैं चूंकि ऊपर वाली परतें अधिकाधिक सघन हैं। अतः ऊपर उठती हुई किरणें अभिलम्ब की ओर झुकती जाती हैं। जब ये किरणें यात्री की आंख में प्रवेश करती हैं तो उसे ये पृथ्वी के नीचे से आती प्रतीत होती है तथा यात्री को पेड़ का उल्टा प्रतिबिम्ब (I) दिखाई देता है। जिससे वह समझता है कि प्रतिबिम्ब के बनने का कारण जल के द्वारा परावर्तन है तथा कुछ दूरी पर जल का तालाब है। इसे ही ‘रेगिस्तान की मरीचिका’ कहते हैं।

महाभारत के आदि पर्व में भी प्रकाश के पूर्ण आन्तरिक परावर्तन का एक और उदाहरण मिलता है। जिसके अनुसार दुर्योधन युधिष्ठिर के भवन को देखने आया। यह भवन मय नामक दानव ने बनाया था जिसमें अद्भुत वस्तुओं का निर्माण किया गया था।

उस भवन में जल की तरह दिखने वाले तालाब वास्तव में फर्श होते थे तथा फर्श दिखने वाले स्थान वास्तव में तालाब होते थे। अतः इस मायावी भवन को देखते-देखते दुर्योधन “जल में स्थल और स्थल में जल का भ्रम” करते हुए जल में गिर पड़ा और भीमसेन द्वारा अपमानित हुआ।

महाभारत के आदि पर्व में उग्रश्रवा ऋषि, अन्य ऋषियों से महाभारत के अधिकांश विषयों को संक्षिप्त रूप में वर्णन करते हुए कथन है कि उसी सभा भवन में जल सम्भ्रम (जल में स्थल और स्थल में जल का भ्रम) होने के कारण दुर्योधन के पांव फिसलने से लगे, तब भगवान श्रीकृष्ण के सामने ही भीमसेन ने उसे गंवार सा सिद्ध करते हुए उसकी हंसी उड़ायी थी।’ यहाँ साङ्केतिक रूप में मरिचिका की घटना का बोध होता है।

तत्रावहसितश्चासीत् प्रस्कन्दन्निव सम्भ्रमात् । प्रत्यक्षं वासुदेवस्य भीमेनानभिजातवत् ।। – महा. भा. आदि पर्व 1.136

इस सन्दर्भ में मयदानव द्वारा निर्मित उस अद्भुत सभा का वर्णन महाभारत के सभापर्व में विस्तृत रूप से मिलता है। वैशम्पायन ऋषि, द्वारा राजा जनमेजय से उस सभा का वर्णन करते हुए कथन है कि “मणियों तथा रत्नों से व्याप्त होने के कारण कुछ राजा उस पुष्करिणी के पास आकर और उसे देखकर भी उसकी यथार्थता पर विश्वास नहीं करते थे और भ्रम से उसे स्थल समझकर उसमें गिर पड़ते थे।

इस वर्णन में जल को स्थल रूप में तथा स्थल को जल रूप में समझना प्रकाश के पूर्ण आन्तरिक परावर्तन पर ही निर्भर करता है। उस पुष्करिणी के पास जड़ित मणि तथा रत्न उस पर पड़ने वाले प्रकाश को पूर्ण रूप से परावर्तित करते होंगे तभी देखने वाले मनुष्य की आंखों में जल का स्थल रूप में तथा स्थल का जल रूप में भ्रम उत्पन्न हो जाता था।

यह भी मरीचिका का ही उदाहरण प्रतीत होता है। अतः ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि वह मयदानव एक वैज्ञानिक सोच भी रखता था जो इस प्रकार की अद्भुत सभा का निर्माण करने में सफल हो सका। अतः ऐसा प्रतीत हो रहा है कि महाभारत काल में प्रकाश के गूढ़ रहस्यों का ज्ञान सर्वत्र प्रचलित था।

प्रकाश का वर्ण विक्षेपण (Spectrum of Light)

सूर्य की किरणों में अनेक रङ्ग की किरणें समाहित होती हैं। जब ये किरणें किसी प्रिज्म से होकर गुजरती हैं तो सात रङ्गों में विभाजित हो जाती हैं। इस घटना को “प्रकाश का वर्ण विक्षेपण” कहते हैं।

वर्षा ऋतु में इन्द्रधनुष इसी कारण दिखाई देता है। न्यूटन ने यह नियम सन् 1966 ई. में प्रतिपादित किया था। महाभारत में महर्षि व्यास ने सूर्य की किरणों के पृथक-पृथक होने की घटना का उल्लेख किया है।

महाभारत के शान्ति पर्व में व्यास ऋषि का जीवात्मा तथा परमात्मा के साक्षात्कार के विषय में कथन हैं कि जिस प्रकार सूर्य की किरणें परस्पर मिली हुई ही सर्वत्र विचरती हैं तथा स्थित हुई दृष्टिगोचर होती हैं, उसी

मणिरत्नचिंता तां तु केचिदभ्येत्य पार्थिवाः। दृष्ट्वापि नाभ्यजानन्त तेऽज्ञानात् प्रपतन्त्युत।। – महा. भा. सभा पर्व 3.33

प्रकार अलौकिक जीवात्मा स्थूल शरीर से ही निकलकर सम्पूर्ण लोकों में जाते हैं (यह ज्ञान दृष्टि से ही जानने में आ सकता है)। जैसे – विभिन्न जलाशयों के जल में सूर्य की किरणों का पृथक-पृथक् दर्शन होता है,

उसी प्रकार योगी पुरूष सभी सजीव शरीरों के भीतर सूक्ष्म रूप से स्थित पृथक्-पृथक् जीवों को देखता है।’ इस वर्णन के अनुसार सूर्य की किरणें परस्पर मिली हुई सब ओर विचरती हैं।

अतः ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि जलाशय का जल प्रिज्म के समान कार्य कर रहा है और वह सूर्य की किरणों को अलग-अलग विभक्त कर रहा है। यह क्रिया भौतिक विज्ञान की दृष्टि से प्रकाश का वर्ण-विक्षेपण कहलाती है। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार प्रकाश की वर्ण-विक्षेपण क्रिया को निम्नलिखित रूप से व्यक्त किया जा सकता है, यथा
Glass prism
White light

जब सूर्य के प्रकाश की कोई किरण किसी प्रिज्म में से गुजरती है तो यह प्रिज्म के आधार की ओर झुकने के साथ-साथ विभिन्न रङ्गों में विभाजित हो जाती है। इस प्रकार उत्पन्न विभिन्न रङ्गों के प्रकाश के समूह को वर्णक्रम (Spectrum) कहते हैं। इस वर्णक्रम को VIBGYOR कह सकते हैं। इससे ज्ञात होता है कि सूर्य का प्रकाश विभिन्न रङ्गों के प्रकाश से मिलकर बना है। प्रिज्म इन रङ्गों के प्रकाश को

यथा मरीच्यः सहिताश्चरन्ति सर्वत्र तिष्ठन्ति च दृश्यमानाः । देहैर्विमुक्तानि चरन्ति लोकांस्तथैव सत्वान्यतिमानुषाणि ।। प्रतिरूपं यथैवाप्सु तापः सूर्यस्य लक्ष्यते। सत्ववत्सु तथा सत्वं प्रतिरूपं स पश्यति।।
महा. भा. शान्ति पर्व. 253. 2-3

अलग-अलग कर देता है क्योंकि प्रिज्म का अपवर्तनांक भिन्न-भिन्न रङ्गों के प्रकाश के लिए अलग-अलग होता है। महाभारत के उपर्युक्त श्लोक के अनसार जलाशय का जल, प्रिज्म के समान कार्य कर रहा है तभी उस जल में पड़ने वाली सूर्य की किरण पृथक-पृथक प्रतीत हो रही है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास
को वर्ण-विक्षेपण की प्रक्रिया का अद्भुत ज्ञान था।
(ग.) इन्द्रधनुष (Rainbow) –

प्रकाश के वर्ण-विक्षेपण द्वारा ‘इन्द्रधनुष’ नभ में दिखाई देता है। महाभारत के वन पर्व में इन्द्रधनुष का वर्णन मिलता है। यह इन्द्रधनुष प्रकाश के वर्ण विक्षेपण द्वारा ही बनता है और लोगों को आकाश में दिखाई देता है। वर्तमान भौतिक वैज्ञानिक इन्द्रधनुष के बनने का यही कारण मानते हैं। यह वर्षा ऋतु में प्रायः देखा जाता है।

न्यूटन के अनुसार सामान्य जीवन में प्रतिदिन बहुत से स्पेक्ट्रम (Spectrum) के उदाहरण देखने को मिलते हैं, यथा – इन्द्रधनुष (Rainbow)। इन्द्रधनुष का निर्माण वर्षाकाल में बनी असंख्य जल-बूंदों पर सूर्य का प्रकाश पड़ने से होता है। वर्षा की किरणें लगभग गोलाकार होती हैं। सूर्य की किरणें इन बूंदों पर इस प्रकार पड़ती हैं कि उनसे अपवर्तित (Refract) होकर रङ्गों की एक चौड़ी पट्टी

बनाती हैं, इसे ही इन्द्रधनुष (Rainbow) कहते हैं।
महाभारत के वन पर्व में मार्कण्डेय ऋषि, द्वारा भगवान शिव तथा पार्वती के स्थ पर आरूढ़ होने की दशा का वर्णन करते हुए कथन है कि उस स्थ पर भगवती उमा के साथ बैठे हुए भगवान शिव इस प्रकार शोभित हो रहे थे,

मानो इन्द्रधनुषयुक्त मेघों की घटा में विद्युत् के साथ भगवान सूर्य प्रकाशित हो रहे हों।’ इस वर्णन में इन्द्रधनुष का उल्लेख किया गया है जोकि मेघों की छटा में विद्यमान

तस्मिन् रथे पशुपतिः स्थितो भात्युमया सह ।। विद्युत्ा सहितः सूर्यः सेन्द्रचपे घने यथा। – महा. भा. वन. पर्व. 231.31 पृ. 1611

है। यह निश्चित रूप से वर्षा ऋतु का ही वर्णन प्रतीत हो रहा है। भौतिक वैज्ञानिक भी यही मानते हैं कि वर्षा ऋतु में घने बादलों के मध्य जब कभी सूर्य की किरण नम वायुमण्डल पड़ती है तो प्रकाश की किरणों के लिए जल-बिन्दु प्रिज्म का कार्य करती है जिससे प्रकाश की किरणें सात रङ्गों में विभक्त हो जाती है और मनुष्यों की आंखों को ये सात रङ्ग इन्द्रधनुष के रूप में दिखाई देने लगते हैं।

अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में प्रकाश की विशेषताओं का ज्ञान महर्षियों को स्पष्ट रूप से था। वैदिक काल में ऋषियों को भली-भाँति यह ज्ञात था कि सूर्य का श्वेत प्रकाश सात रङ्गों से निर्मित होता है। इस प्रसङ्ग में निम्नलिखित ऋचाएं वेदों में वर्णित है’ –

mahabharat physics science

“अवधिवस्तारयन्ति सप्त सूर्यस्य रश्मयः।”
अर्थात् सूर्य की सात किरणें पानी को आकाश से नीचे गिरा रही है।

“यत्र गावा निहिता सप्त नाम”।
अर्थात् जहाँ एक सूर्य किरण ने अपने सात नाम रखे हैं।

“सप्त युंजन्ति स्थमेकचक्रमेको अश्वो वहति।”

अर्थात् सूर्य के एक चक्रीय रथ को सात नामों वाला एक ही घोड़ा चलाता है। (कोणार्क मन्दिर में निर्मित मूर्ति में भी सूर्य के रथ को सात घोड़े खींचते दिखाई देते हैं।)

यं सीमा कृण्वन् तमसे विप्रचे ध्रुवक्षे मा अनवस्यन्तो अर्थम् ।
तं सूर्य हरितः सप्त यहीः स्पाशं विश्वस्य जगतो वहन्ति।।

इस विवरण से यह प्रतीत होता है कि सूर्य के श्वेत किरणों में सात रङ्ग होने का ज्ञान प्राचीन वैदिक ऋषियों को भलीभाँति था।
Science in Vedic Literature, pg. 50

सर आइजक न्यूटन 17वीं सदी के महान वैज्ञानिक माने जाते थे। ऐसा माना जाता है कि वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने यह प्रदर्शित किया कि प्रकाश को विभिन्न रङ्गों में विभक्त किया जा सकता है,

परन्तु प्राचीन वैदिक ग्रन्थों, धर्मशास्त्रों तथा महाकाव्यों में बहुत पहले ही प्रकाश के वर्ण विक्षेपण की क्रिया का उल्लेख किया जा चुका है। इस सन्दर्भ वृहत् संहिता में इन्द्रधनुष के बनने के वैज्ञानिक कारण का उल्लेख मिलता है, यथा- Physics RAINBOW

सूर्यस्य विवधवर्णाः पवनेन बिघट्टिताः करा: साभ्रे । वियति धनुः संस्थानाः
ये दृश्यन्ते तदिन्द्रधनुः ।।

Bruhatsamhita-chapter 35

इस वर्णन से स्पष्ट होता है कि विक्रमादित्य के काल में वराह मिहिर द्वारा लिखित वृहत् संहिता के अनुसार आर्यों को सूर्य की किरणों से जुड़े रहस्यों का पूर्ण ज्ञान था, जैसे – सूर्य की किरणें कई रङ्गों की हैं, उनके मिलने से श्वेत धूप बनती है, वे वायुमण्डल के जल कणों में होकर निकलने से पृथक् पृथक् होकर अलग-अलग रङ्ग की दिखाई देती है।
Science in Sanskrit, Pg. 19

प्रकाश-प्रकीर्णन (Scattering)

जब प्रकाश किसी ऐसे माध्यम से गुजरता है जिसमें धूल तथा अन्य पदार्थों के अत्यन्त सूक्ष्म कण होते हैं तो इनके द्वारा प्रकाश सभी दिशाओं में प्रसारित हो जाता है। इस घटना को प्रकाश का प्रकीर्णन कहते हैं।

बैंगनी रङ्ग के प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे अधिक तथा लाल रङ्ग के प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे कम होता है।प्रकीर्णन के कारण ही सूर्योदय अथवा सूर्यास्त के समय सूर्य लाल दिखाई पड़ता है।

प्रकाश के प्रकीर्णन तथा अवशोषण के अध्ययन को स्पैक्ट्रोस्कोपी कहा जाता है। इसकी नींव डालने का श्रेय एण्डर्स जोनास एंगस्ट्रम (Anders Jonas Angstrom) (1817-1874) को दिया जाता है। इन्होंने प्रकाश के प्रकीर्णन को निम्नलिखित रूप में स्पष्ट किया है –

यदि प्रातः उगते तथा सायं डूबते सूर्य को देखा जाए तो यह लाल दिखाई देता है। इसका कारण यह है कि उगते अथवा डूबते सूर्य की किरणें वायुमण्डल में काफी अधिक दूरी तय करके मनुष्य की आँखों तक पहुँचती हैं।

इन किरणों का मार्ग में धूल के कणों तथा वायु के अणुओं द्वारा बहुत अधिक प्रकीर्णन होता है जिससे सूर्य के प्रकाश से नीली तथा बैंगनी किरणें निकल जाती हैं क्योंकि इन किरणों का प्रकीर्णन सबसे अधिक होता है।

अतः आँख में विशेष रूप से शेष लाल किरणें ही पहुँचती हैं जिसके कारण सूर्य लाल दिखाई देता है। दोपहर के समय जब सूर्य सिर पर होता है तब किरणें वायुमण्डल में अपेक्षाकृत बहुत कम दूरी तय करती हैं।

अतः प्रकीर्णन कम होता है और लगभग सभी रङ्गों की किरणें आँख तक पहुँच जाती हैं। अतः सूर्य श्वेत दिखाई देता है। इस घटना का वर्णन महाभारत में किया गया है। वन पर्व में सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय का वर्णन करते हुए मार्कण्डेय ऋषि द्वारा देवसेना तथा इन्द्र के मध्य हुए संवाद के विषय में कथन है कि

ऐश्वर्यशाली इन्द्र ने देखा, पूर्व संध्या
(प्रभात) का समय है, प्राची के आकाश में लाल रङ्ग के घने बादल घिर आये हैं और समुद्र का जल भी लाल ही दृष्टिगोचर हो रहा है। इस वर्णन में पूर्व संध्या (प्रभात) के अवसर पर आकाश में लाल रङ्ग के बादल तथा लाल रङ्ग के जल का उल्लेख किया गया है,

इससे यह घटना प्रकाश के प्रकीर्णन पर आधारित प्रतीत होती है क्योंकि सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य लाल दिखाई देता है जिसके कारण यहाँ लाल रङ्ग के सूर्य के प्रकाश में बादल तथा समुद्र का जल दोनों ही लाल दिखाई दे रहे हैं।

अतः ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रकाश के प्रकीर्णन की दशा का वर्णन कर महर्षि व्यास ने अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा का प्रदर्शन किया है।
प्रातःकाल तथा सायंकाल में आकाश का रङ्ग लोहित वर्ण (लाल रङ्ग) हो जाने के विषय में श्रीपत का निम्नलिखित श्लोक संस्कृत वाङ्मय में प्रचलित है –

भूम्युत्थितरजोधूमैदिर्गन्तव्योम्नि संस्थितैः । सूर्यस्य किरणौर्मित्रैश रूपेणायमेव भासते।। विरलाव्ययं वस्तुयद् दृष्टेर्व्यवधाय कम्। ते वाम्रमरूणोद्मतं दृश्यन्ते शक्रचापवत्।।

अर्थात् सम्पूर्ण वायुमण्डल में रजकण फैले हुए हैं और सूर्य की किरणें उनसे छनकर पृथ्वी पर पड़ती हैं। सूर्य का प्रकाश भिन्न-भिन्न रङ्गों की किरणों का समूह है।

लाल-किरणों की तरङ्ग-लम्बाई (Wave Lenght) अधिक होती है। उषा तथा गोधूली के समय सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं और नभ मण्डल का लोहित वर्ण (लाल रङ्ग) हो जाना इन्हीं किरणों पर निर्भर है।

लोहितैश्च घनैर्युक्तां पूर्व संध्यां शतक्रतुः । अपश्यल्लोहितोदं च भगवान् वरूणालयम् ।। – महा. भा. वन पर्व 224 13 2

दर्पण (Mirror)

आधुनिक समय में भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में बहुत से आविष्कार किए जा रहे हैं, जो दैनिक जीवन में बहुत उपयोगी हैं।

इनमें से एक आविष्कार दर्पण को कहा जा सकता है। दर्पण सामान्य रूप से मुख को देखने हेतु लोगों द्वारा प्रयोग किया जाता है।

दर्पण को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया जा सकता है -“

कोई चिकना तल जिसके एक पृष्ठ पर पॉलिश करके दूसरे पृष्ठ को परावर्तक बना दिया
जाए दर्पण कहलाता है। यह दो प्रकार के होते हैं –

1. समतल दर्पण,

2. गोलीय दर्पण।

महर्षि व्यास ने महाभारत में अनेक स्थानों पर कथानक को स्पष्ट करने के किलए दर्पण को उदाहरण के रूप में व्यक्त किया है।

इस सन्दर्भ में महाभारत के अनुशासन पर्व में विपुल द्वारा इन्द्र से गुरू पत्नी की रक्षा का वृत्तान्त सुनाते हुए भीष्म ने दर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया है,

जिसके अनुसार दर्पण मे प्रतिबिम्ब की भाँति विपुल अपने गुरू पत्नी के शरीर में परिलक्षित हो रहे थे।’ इस प्रकार महाभारतकार ने दर्पण को स्पष्ट करने हेतु

शाकुन्तलोपाख्यान में शकुन्तला द्वारा राजदरबार में दुष्यन्त के समक्ष यह कहलाया है कि पत्नी के गर्भ से उत्पन्न हुए पुत्र को पिता द्वारा उसी प्रकार देखा जाना चाहिए जिस प्रकार मनुष्य दर्पण में अपना मुँह देखता है।

महर्षि व्यास ने खगोल के रहस्य को उद्द्याटित करने के लिए सञ्जय द्वारा सुदर्शन द्वीप का वर्णन किया है जिसके

अनुसार जिस प्रकार पुरूष दर्पण में अपना मुँह देखता है उसी प्रकार सुदर्शन द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता

प्रतिबिम्बमिवादर्श गुरूपत्न्याः शरीरगम् । स तं धोरेण तपसा युक्तं दृष्टा पुरन्दरः ।। प्रावेपत सुरांत्रस्तः शापभीतस्तदा विभो ।- महा. भा. अनु. पर्व. 41.18 2

भार्यायां जनितं पुत्रमादर्शेष्विव चाननम् । हादते जनिता प्रेक्ष्य स्वर्गं प्राप्येव पुण्यकृत् ।।- महा. भा. आदि पर्व 74.49 है।

इस सन्दर्भ में शान्तिपर्व में प्रजापति मनु द्वारा आत्मा तथा परमात्मा के साक्षात्कार का विवेचन महर्षि बृहस्पति के समक्ष किया गया है, जिसके अनुसार जिस प्रकार

मनुष्य स्वच्छ और स्थिर जल के नेत्रों द्वारा अपना प्रतिबिम्ब देखता है उसी प्रकार मनसहित इन्द्रियों के शुद्ध तथा स्थिर हो जाने पर वह ज्ञान दृष्टि से ज्ञेय स्वरूप आत्मा का साक्षात्कार कर सकता है।

वही मनुष्य हिलते हुए जल में अपना रूप नहीं देख पाता है, उसी प्रकार मन सहित इन्द्रियों के चचल होने पर बुद्धि में ज्ञेय स्वरूप आत्मा का दर्शन नहीं कर

सकता।’ इस वर्णन में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि स्थिर जल में ही मनुष्य का प्रतिबिम्ब दिखता है परन्तु हिलते हुए जल में ऐसा सम्भव नहीं।

यहाँ स्वच्छ तथा स्थिर जल दर्पण के समान है। जब तक दर्पण स्थिर है तब तक प्रतिबिम्ब साफ-साफ दिखता है

परन्तु यदि दर्पण को हिलाते रहा जाय तो प्रतिबिम्ब साफ नहीं दिखता। अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि दर्पण की समस्त विशेषताओं का ज्ञान महाभारतकालीन लोगों को था।

प्रतिबिम्ब (Image) – वस्तु के किसी बिन्दु से दो या दो से अधिक प्रकाश की किरणें चलकर परावर्तन या अपवर्तन के पश्चात् जिस बिन्दु पर जाकर मिलती हैं

या मिलती हुई प्रतीत होती हैं, तो वह बिन्दु पहले बिन्दु का प्रतिबिम्ब कहलाता है।

किसी वस्तु के विभिन्न बिन्दुओं के प्रतिबिम्बों को मिलाने पर उस वस्तु का प्रतिबिम्ब’ बन जाता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में शिव के सहस्रनास्तोत्र में

से एक नाम ‘दर्पण’ बताया गया है। क्योंकि जिस तरह दर्पण स्वच्छ तथा उपयोगी है, उसी प्रकार शिव भी स्वच्छ तथा सभी लोगों के लिए हितकारी है, यथा –

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mahabharat mai vigyaan secience.

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mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

महाभारत तथा मानव शरीर विज्ञान

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

मानव शरीर विज्ञान, विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इसके अन्तर्गत मनुष्य के शारीरिक अङ्गों की रचना तथा उनकी क्रिया विधि का अध्ययन किया जाता है। यह विज्ञान चिकित्सा की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आधुनिक समय में मनुष्य की दीर्घ आयु के लिए और उसके रोग रोग के कारण तथा उसके निवारण के उपाय के लिए मानव शरीर विज्ञान की सहायता ली जाती है।

मानव शरीर विज्ञान -सामान्य परिचय

मानव शरीर नाना प्रकार के जीवित अङ्गों से युक्त एक जीवित मशीन अर्थात् यंत्र के समान है। जिसमें समस्त शारीरिक अङ्ग नियमित रूप से कार्य करते रहते हैं। शरीर के कुछ अवयव बाहर से प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं, किन्तु कुछ अङ्ग जो शरीर
के भीतर होते हैं, वे दिखाई नहीं देते हैं।

मनुष्य के शरीर के वाह्य तथा आन्तरिक अङ्गों की क्रियाविधि तथा प्रजनन की समस्त प्रक्रिया का वैज्ञानिक दृष्टि से विश्लेषण और गूढ़ अध्ययन इस विज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है। मानव शरीर विज्ञान को शारीरिक अङ्गों की रचना तथा उनकी क्रियाओं के आधार पर सामान्यतः दो प्रमुख क्षेत्रों में बांटा जा सकता है –

1- शरीर विज्ञान – इसमें मानव शरीर की रचना, तथा क्रियाविधि आदि का
अध्ययन किया जाता है।

2- प्रजनन विज्ञान – इसमें गर्भ धारण से लेकर शिशु के जन्म तक की समस्त
प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है।

मानव शरीर विज्ञान प्राचीन काल से ही प्रचलित हैं। वेदों में मानव शरीर के अङ्गों की क्रिया विधि, संरचना आदि का उल्लेख प्राप्त होता है। इस सन्दर्भ में

ऋग्वेद के तृतीय मण्डल में हृदय की क्रियाविधि का उल्लेख’, चरक संहिता में अस्थियों की संख्या का उल्लेख मिलता है। अतः इससे मानव शरीर विज्ञान की महत्ता स्पष्ट हो जाती है।

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

प्राचीन वैदिक काल से ही मानव शरीर की वाह्य तथा आन्तरिक रचना और उनकी क्रियाविधि का निरन्तर अध्ययन किया जा रहा है। रामायण काल में मानव शरीर रचना का वृहत् ज्ञान चिकित्सकों को था।

इस सन्दर्भ में रामायण के युद्ध काण्ड में लक्ष्मण के मूर्छित होने के प्रसंग में वैद्य सुषेण द्वारा लक्ष्मण के हृदय गति का उल्लेख किया गया है। जिससे यह प्रतीत होता है कि मानव अङ्गों की रचना तथा संचालन का समस्त ज्ञान रामायण काल में प्रचलित था।

महाभारत काल में भी मानव शरीर विज्ञान अत्यन्त विकसित स्थिति में था। महर्षि व्यास ने महाभारत में मानव शरीर के बाह्य तथा आन्तरिक रचना और उनकी क्रिया विधि जैसे – श्वसन क्रिया, पाचन क्रिया, उत्सर्जन क्रिया आदि का उल्लेख किया है। महर्षि व्यास द्वारा प्रजनन विज्ञान का भी विस्तृत वर्णन महाभारत में किया गया है।

महाभारत तथा शरीर रचना विज्ञान

मानव शरीर की उत्पत्ति पञ्च भौतिक तत्त्वों से मानी जाती है अर्थात् यह मानव शरीर आकाश, वायु, जल, अग्नि तथा पृथ्वी से मिलकर बना है। ये सभी पञ्च तत्त्व अपने-अपने कार्य को करते हुए मानव शरीर का संचालन करते हैं।

इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास द्वारा शान्ति पर्व में अपने पुत्र शकदेव से शरीर में उपस्थित पञ्चभूतों के विषय में कथन है कि आकाश, वायु, जल आदि पञ्चभूत, भाव पदार्थ

‘तुम्येदिन्द्र स्व ओक्येइ सोमे चोदामि पीतये। एष रोरन्तु ते हृदि ।
-ऋ. वे. 3.42.8 2 त्रीणि षष्टीनि शतान्यस्थनां दन्तालूखलनखेनं। – च. सं. 7.6 ३ विषादं माकृथा वीर सप्राणोऽयमरिंदम।
आख्याति तु प्रसुप्तस्य प्रस्तगात्रस्य भूतले ।। सोच्छ्वासं हृदयं वीर कम्पमानंमुहुर्मुहुः ।
वा. रा. (युद्ध का.) 101-28

(गुण, कर्म, सामान्य आदि), अभाव और काल (दिक् आत्मा तथा मन) ये सभी पाञ्चभौतिक शरीरधारी प्राणियों में स्थित हैं।’ महर्षि व्यास द्वारा शरीर की उत्पत्ति का कारण बताने के पश्चात् पञ्चभौतिक तत्त्वों के गुणों का विस्तृत वर्णन किया गया है, जिसके अनुसार शब्द आकाश का गुण है और श्रवणेन्द्रिय आकाशमय है। चलना-फिरना वायु का धर्म है।

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

प्राण और अपान भी वायु स्वरूप ही है। अतः स्पर्शेन्द्रिय (त्वचा) तथा स्पर्श नामक गुण को भी वायुमय ही समझना चाहिए। ताप, पाक, प्रकाश और नेत्रेन्द्रिय – ये सभी अग्नि तत्त्व के कार्य हैं। अतः श्याम, गौर और ताम्र आदि वर्ण वाले रूप को उसका गुण समझना चाहिए।

क्लेदन (किसी वस्तु को सड़ा-गला देना), क्षुद्रता (सूक्ष्मता) तथा स्निग्धता – ये जल के धर्म हैं। रक्त, मज्जा तथा जो कुछ स्निग्ध पदार्थ है, वे सभी जलमय हैं। अतः रसनेन्द्रिय, जिला और रस ये सब जल के गुण हैं।

शरीर में जो सङ्गत या कड़ापन है वह पृथ्वी का कार्य है, अतः हड्डी, दांत, नख आदि को पृथ्वी का अंश समझना चाहिए। इसी प्रकार दाढ़ी, मूंछ, शरीर के रोएं, केश, नाड़ी, स्नायु और चर्म – इन सबकी उत्पत्ति भी पृथ्वी से ही हुई है।

नासिका नामक ध्राणेन्द्रिय पृथ्वी का ही अंश है। अतः गंध नामक विषय को भी पार्थिव गुण ही जानना चाहिए। उत्तरोत्तर सभी भूतों में पूर्ववर्ती भूतों के गुण विद्यमान हैं। इस वर्णन में महर्षि व्यास ने स्पष्ट रूप से कहा है कि

आकाशं मारूतो ज्योतिरापः पृथ्वी च पञ्चमी। भावाभावौ च कालश्च सर्वभूतेषु पञ्चसु ।। महा. भा. शान्ति पर्व, 252.2 2

अन्तरात्मकमाकाशं तन्मयं श्रोत्रमिन्द्रियम् ।
तस्य शब्दं गुणं विद्यान्मूर्तिशास्त्र विधानवित् ।। चरणं मारूतात्मेति प्राणापानौ च तन्मयौ। स्पर्शनं चेन्द्रियं विद्यात् तथा स्पर्श च तन्मयम् ।। ताप: पाक: प्रकाशश्च ज्योतिश्चक्षुश्च पञ्चमम् । तस्य रूपं गुणं विद्यात् ताम्रगौरासितात्मकम् । प्रक्लेदः क्षुद्रता स्नेह इत्यपामुदिश्यते। अमृङनज्जा च यच्चान्यत् स्निग्धं विद्यात् तदात्मकम् ।। रसनं चेन्द्रियं जिला रसश्चायाँ गुणो मतः । संधातः पार्थिवो धातुरस्थिदन्तनखानि च ।। श्मश्रु रोम च केशाश्च शिरा स्नायु च चर्म च । इन्द्रियं ध्राणसंज्ञातं नासिकेत्यभिसंज्ञिता।। गन्धश्चेवेन्द्रियोर्थोऽयं विज्ञेयः पृथिवीमयः। उत्तरेषु गुणाः सन्ति सर्वसत्वेषु चोत्तराः ।।

महा. भा. शान्ति. पर्व. 252.3-9
mahabharat – मानव शरीर विज्ञान


आकाश में शब्द मात्र गुण हैं, वायु में शब्द और स्पर्श दो गुण हैं, तेज में शब्द, स्पर्श और रूप तीन गुण हैं, जल में शब्द, स्पर्श, रूप और रस चार गुण हैं तथा पृथ्वी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध पञ्च गुण व्याप्त हैं।

जिससे यह प्रतीत होता है कि शरीर की रचना का मूलाधार पाञ्चभौतिक तत्त्व हैं। अतः ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में शरीर-विज्ञान के गूढ़ रहस्यों का ज्ञान सर्वत्र प्रचलित था।

महाभारत की नीलकंठ टीका में शरीर के पञ्च महाभूतों के कार्यों का उल्लेख करते हुए वर्णन मिलता है –

भूतेषु जरायुजादिषु पञ्चसुपंचात्मकेषु ऐतन भावाभाव कालनामपि भौतिकत्वमुक्तं। ननु पंचभ्यो भूतेभ्योऽधिकानिकालदिगात्ममनांसि चत्वारि द्रव्याणि गुणाश्च चतुर्विशतिः कर्मसामान्य विशेष समवायाश्चभाव पदार्थाः सप्तमोऽभाव पदार्थश्चेति काणादामन्यतेतत्कथं सर्वस्य पंचात्मकत्वं उत्तरेषु भूतेषु पूर्वभूतगुणाः संतितेन शब्द एवाकाशे शब्द स्पर्शो परकारणतामेति भावनाज्ञानकर्मभिः।

महाभारत में मानव अङ्गों की उत्पत्ति, पञ्चभूतों के सन्दर्भ में विस्तृत रूप से मिलती है। महाभारत के शान्ति पर्व के दौ सौ उनतालीसवें अध्याय में महर्षि वेद-व्यास का शुकदेव से मानव शरीर के गूढ़ रहस्यों का वर्णन करते हुए कथन है –

सम्पूर्ण महाभूत विधाता की पहली सृष्टि है। वे समस्त प्राणी समुदाय में तथा सभी देहधारियों के शरीरों में अधिक से अधिक भरे हुए हैं। देहधारियों की देह का निर्माण पृथ्वी से हुआ है चिकनाहट और पसीने आदि जल से प्रकट होते हैं,

अग्नि से नेत्र तथा वायु से प्राण और अपान का प्रादुर्भाव हुआ है। नाक, कान आदि के छिद्रों में आकाश तत्त्व स्थित है।’
महा. भा. शान्ति पर्व 252.2–9,

महाभूतानि सर्वाणि पूर्वसृष्टि: स्वयम्भुवः । भूयिष्ठं प्राणभृगामे निविष्टानि शरीरिषु ।। महा. भा. शान्ति पर्व 239.6 ३

भूमेर्दैहो जलात् स्नेहोज्योतिषश्चक्षुषी स्मृते। प्राणापानाश्रयो वायुः खेष्वाकाशं शरीरिणाम् ।। क्रान्ते विष्णुर्बले शक्र: कोष्ठेऽग्निर्भोक्तमिच्छति। कर्णयोः प्रदिशः श्रोत्रं जिह्वायां वाक् सरस्वती।। महा. भा. शान्ति पर्व 239.6-8

चरणों की गति में विष्णु और बाहुबल में इन्द्र स्थित है। उदर में अग्नि देवता स्थित है। जो भोज चाहते और पचाते हैं। कानों में श्रवण शक्ति और दिशाएं हैं तथा जिला में वाणी और सरस्वती देवी का निवास है।

इस वर्णन में महर्षि व्यास ने मानव अङ्गों की उत्पत्ति का विस्तृत उल्लेख किया है जिससे यह प्रतीत होता है कि मानव शरीर की रचना आदि का गूढ़ ज्ञान महाभारत काल में विकसित हो चुका था।

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

महाभारत के टीकाकार ने महर्षि व्यास के वचनों को स्पष्ट करते हुए वर्णन किया है –

स्वयंभ्रुव ईश्वस्य महाभूतानि पूर्व सृष्टिः। तानिचप्राण भृद्गामेजीव संघे शरीरिषुशरीराभिमानिषुमूढ जीवेषुभूयिष्ठं निविष्टानितैरात्मवेन गृहीतानीत्यर्थः प्रथक् सृष्टिरितिपाठेभौतिक सृष्टेः पृथगेव भूतसृष्टिस्ततः प्राचीनत्वादितिसएवार्थः । खेषुनासादिरं धेषु। योगमते आत्माभोक्तैवनतुकर्ता साख्यमतेतुन भोक्तानापि कर्तेति तंत्राचंदूषयत्युत्तरस्यैव सिद्धांतत्वं ज्ञापयितुम क्रांते इति। क्रांते पादेद्रियबले पाणीद्रिये च विष्णु जिह्वा स्थानं वागिन्द्रियं सरस्वतीदेवता एतच्चान्येषामपिस्थानादीनामुपलक्षणं।”

मानव शरीर में पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं जैसे – आंख, नाक, कान, जीभ, त्वचा। इन ज्ञानेन्द्रियों का उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में भी मिलता है। महाभारत के शान्ति पर्व में महर्षि व्यास द्वारा पञ्च ज्ञानेन्द्रियों तथा उनके विषयानुभवों का उल्लेख शुकदेव के समक्ष किया गया है। इस वर्णन में देहधारियों द्वारा इन्द्रियों को वश में रखने पर बल दिया गया है तथा देहधारियों के शरीर में विद्यमान समस्त तत्त्वों का भी उल्लेख किया गया है। इसी प्रकार महाभारतकार ने महाभारत में अनेक स्थानों पर पञ्चभूतों द्वारा शरीर की उत्पत्ति के विषय में उल्लेख किया है। महा. भा. शान्ति पर्व 239, 6-8

को त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी। दर्शनीयेन्द्रियोक्तानि द्वाराण्याहारसिद्धये ।। शब्द: स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः | इन्द्रियार्थान् पृथग् विद्यादिन्द्रियेभ्यस्तु नित्यदा।। इन्द्रियाणि मनो युङ्क्ते वश्यान् यन्तेव् वाजिनः । मनश्चापि सदा युङ्क्ते भूतात्मा हृदयाश्रितः ।। इन्द्रियान्द्रियार्थाश्च स्वभावश्चेतना मनः। प्राणापानौ च जीवश्च नित्यं देहेषु देहिनाम् ।। महा. भा. शान्ति. पर्व 239.9-13

इसी सन्दर्भ में शान्तिपर्व में महर्षि भृगु द्वारा महर्षि भरद्वाज के समक्ष विस्तृत उल्लेख मिलता है जिसमें मानव शरीर के समस्त अङ्गों की उत्पत्ति का मूल रहस्य समाहित है।’

महर्षि भृगु द्वारा देहधारियों की समस्त ज्ञानेन्द्रियों की विशेषताओं का उल्लेख महर्षि भरद्वाज के प्रति किया गया है जिसके अनुसार गन्ध, स्पर्श, रस, रूप और शब्द – ये पृथ्वी के गुण माने गए हैं।

शब्द, स्पर्श, रूप और रस – ये जल के गुण माने गए हैं। शब्द, स्पर्श और रूप – ये अग्नि के तीन गुण माने गये हैं। तथा आकाश का एकमात्र गुण शब्द ही माना गया है। इस तरह महाभारत काल में ऋषि, विद्वान आदि सभी मानव शरीर रचना से भलीभांति परिचित थे।

मनुष्य की समस्त क्रियाएं इन्द्रियों पर आधारित होती हैं। ये सभी इन्द्रियाँ बुद्धि के विकारों का ही रूप है। इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास द्वारा शुकदेव के समक्ष

जङ्मानां च सर्वेषां शरीरे पञ्च धातवः । प्रत्येकशः प्रभिद्यन्ते यैः शरीरं विचेष्टते ।। त्वक् च माँसं तथा स्थीनि मज्जा स्नायुश्च पञ्चमम् । इत्येतदिह संधातं शरीरे पृथिवीमयम् ।। तेजो हग्निस्तथा क्रोधश्चक्षुरूष्मा तथैव च । अग्निर्जरयते यश्च पञ्चाग्नेयाः शरीरिणः ।। श्रोत्रं ध्राणं तथाऽऽस्यं च हृदयं कोष्ठमेव च । आकाशात् प्रणिनामेते शरीरे पञ्च धावतः ।। श्लेष्मा पित्तमथ स्वेदो वसा शोणितमेव च। इत्यापः पञ्चधा देहे भवन्ति प्राणिनां सदा।। महा. भा. शान्ति पर्व 184.19-23 2

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

भूमेर्गन्धगुणान् वेत्ति रसं चादभ्यः शरीरवान्। ज्योतिषा चक्षुषा रूपं स्पर्श वेत्ति च वाहिना ।। गन्धः स्पर्शो रसो रूपं शब्दश्चात्र गुणाः स्मृताः । तस्य गन्धस्य वक्ष्यामि विस्तराभिहितान् गुणान् ।। ज्योतिः पश्यति चतुभ्या॑ स्पर्श वेत्ति च वायुना। शब्द स्पर्शश्च रूपं च रसश्चापि गुणाः स्मृताः ।। शब्द: स्पर्शश्च रूपं च त्रिगुणं ज्योतिरूच्यते। ज्योतिः पश्यति रूपाणि, रूपं च बहुधा स्मृतम् ।। शब्द स्पर्शी च विज्ञेयौ द्विगुणो वायुरित्युत।। वायत्यस्तु गुणः स्पर्शः स्पर्शश्च बहुधा स्मृतः । तत्तैक गुणमाकाशं शब्द इत्येव तत्स्मृतम् । महा. भा. शान्तिपर्व 184.26-35

विस्तृत उल्लेख किया गया है।’ महाभारत की नीलकण्ठी टीका में भी टीकाकार ने इन्द्रियों के परिभाषित किया है, यथा –

पृथग्भावात् पृथग्विषयत्वात् विक्रियतेविकारं प्राप्नोति तानेवविकारानाह शृण्वतीति। तानिबुद्धेर्विकारान् अदृश्यश्चिदात्मा भावेषु सात्विकादिषु।

वैदिक ग्रन्थों में शरीर रचना Anatomy और शरीर क्रिया से सम्बद्ध तथ्य पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। इसमें आयुर्वेद में तर्कसंगत तथा क्रमबद्ध वर्णन किया गया है। इस वेद की प्रमुख संहिताएं (चरक संहिता तथा सुश्रुत संहिता) में मानव शरीर रचना का विस्तृत उल्लेख मिलता है, जिसमें चरक संहिता के अनुसार, मनुष्य के जीवन को शरीर, इन्द्रिय, सत्व और आत्मा धारण करते हैं –

शरीरेन्द्रिय सत्वात्मसंयोगो धारि जीवितम्।’

अतः इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव शरीर का निर्माण पञ्चभूतों तथा पञ्च इन्द्रियों द्वारा हुआ है। मानव शरीर की रचना माँस, नस-नाड़ियों, हड्डी, रक्त, मज्जा आदि से हुई है। इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास ने महाभारत के शान्तिपर्व में नारद मुनि द्वारा शुकदेव के प्रति उल्लेख किया है –

यह शरीर पञ्चभूतों का घर है। इसमें हड्डियों के खंभे लगे हैं। यह नस-नाड़ियों से बंधा हुआ, रक्त माँस से लिपा हुआ और चमड़े से मढ़ा है। इसमें मल-मूत्र भरा है जिससे दुर्गन्ध आती रहती है। यह बुढ़ापा और शोके से व्याप्त, रोगों का घर, दुःखरूप, रजोगुणरूपी धूल से ढंका हुआ और अनित्य है, अतः तुम्हें इसकी आसक्ति को त्याग देना चाहिए। इस

इन्द्रियाणां पृथग्भावाद् बुद्धिर्वि क्रियते ह्यतः । श्रृण्वती भवती श्रोत्रं स्पशती स्पर्श उच्यते।। पश्यती भवते दृष्टी रसती रसनं भवेत् । जिघ्रती भवति घ्राणं बुद्धिर्विक्रियते पृथक् ।। इन्द्रियाणि तु तान्याहुस्तेष्व दृश्योऽधितिष्ठति। महा. भा. शान्ति पर्व 248.4-6 2, महा. भा. शान्ति. पर्व. 248, 4-6 , च. सं. सूत्र. स्था. 1.42

अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं माँसशोणितलेपनम् । चावनद्धं दुर्गन्धि पूर्ण मूत्र पुरीषयोः ।। जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम् रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यज।।महा. भा. शान्ति. पर्व. 329.42-43

वर्णन में नारद मुनि द्वारा मानव-शरीर के समस्त अङ्गों का विस्तृत तथा गूढ़ उल्लेख किया गया है जिससे महाभारत कालीन मानव शरीर विज्ञान की विकसित दशा का होता है।

(क.) आन्तरिक अङ्गों की क्रियाविधि

संक्षिप्त शिवपुराण

मानव शरीर के भीतर नाना प्रकार के अङ्ग होते हैं जो निरन्तर कार्य करते रहते हैं तभी यह शरीर यंत्र के समान कार्य करता रहता है। महाभारत के गीता के उपदेश में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने शरीर को यंत्र कहा है,

यथा –
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।’

यन्त्रस्वरूप मानव शरीर के अनेक आन्तरिक अङ्ग जैसे – श्वसन, पाचन, उत्सर्जन, प्रजनन आदि महत्वपूर्ण क्रियाएं करते रहते हैं। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत में मानव शरीर के आन्तरिक अङ्गों की क्रियाविधि का विस्तृत उल्लेख किया है जोकि तत्कालीन मानव शरीर विज्ञान का सशक्त प्रमाण प्रतीत होता है।

  • श्वसन क्रिया (Respiration) – श्वसन उन सभी भौतिक तथा रासायनिक क्रियाओं को कहते हैं जिनमें वायुमण्डलीय ऑक्सीजन शरीर कोशिकाओं में पहुंचकर भोजन का ऑक्सीकरण (Oxidation) पा जारण (Combustion) करती है, फलतः ऊर्जा की मुक्ति होती है, तथा इस प्रकार बनी कार्बन-डाई-ऑक्साइड को शरीर से बाहर पहुंचाया जाता है। श्वसन एक अपचयी क्रिया (Catabolic Process) है, इससे शरीर के भार में भी कमी होती है।
  • श्वसन प्रक्रिया का वर्णन प्राचीन वैदिक काल में स्पष्ट रूप से मिलता है। इस सन्दर्भ में अथर्ववेद में निम्नलिखित वर्णन मिलता है कि –
  • गीता – 18.61

को अस्मिन प्राणमवयत्को अपानं व्यानम् । समानमस्मिन् को देवोऽधि शिश्राम पुरूषे।’

अर्थात् इस शरीर में किस देव ने प्राण, अपान, व्यान समान और उदान वायु को बुन सा दिया है अर्थात् वायु शरीर में जाकर पाञ्च रूपों में विभक्त होकर शरीर में पाञ्च विविध प्रयोजनों के परिणामस्वरूप शरीर के ढांचे को बनाए रखती है। इससे स्पष्ट है कि शरीर के स्वास्थ्य में वायु का अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान है। वायु फेफड़ों में पहुंचकर उसके छोटे-छोटे कोष्ठों को फुला देती है।

धमनियों में बहता हुआ रक्त, हवा में स्थित ऑक्सीजन का शोषण कर लेता है और नाइट्रोजन बच जाता है। ऑक्सीजन रक्त के साथ मिलकर सभी भागों में पहुंच जाती है। यह ऑक्सीजन मानव शरीर के भीतर कार्बन तथा मृत रगों से मिलकर कार्बन डाई ऑक्साइड बन जाती है और पानी को वाष्प में बदल देती है।

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

रक्त के साथ ये ये यौगिक फेफड़ों में पहुंच जाते हैं और सांस के साथ बाहर निकल आते हैं। इस क्रिया से शरीर को गर्मी तथा बुद्धि को प्रेरणा मिलती है तथा इससे शरीर का तापमान 98.4 डिग्री फॉरेनहाइट बना रहता है। वैज्ञानिकों के मतानुसार एक स्वस्थ मनुष्य चौबीस घंटे में चार हजार घन इंच ऑक्सीजन ग्रहण करता है तथा उतना ही कार्बन डाई ऑक्साइड गैस निकालता है।

महर्षि वेद व्यास ने महाभारत में कथानक के प्रवाह में श्वसन क्रिया का विस्तृत वर्णन किया है। इस सन्दर्भ में महाभारत के शान्तिपर्व में भरद्वाज ऋषि तथा भृगु ऋषि क संवाद प्रश्नोत्तर शैली में वर्णित है जिसमें ऋषि भरद्वाज का कथन है कि शरीर के भीतर रहने वाली अग्नि पार्थिव धातु (पाञ्चभौतिक देह) का आश्रय लेकर कैसे रहती है और वायु भी उसी पार्थिव धातु का आश्रय लेकर अवकाश विशेष के द्वारा देह को कैसे चेष्टाशील बनाती है।

इसी सन्दर्भ में आगे भृगु ऋषि द्वारा प्राणियों के शरीर में वायु की गति का विस्तृत वर्णन किया गया है जिसके
अर्थ. वे. – 10.2.13 2 पार्थिवं धातुमासाद्य शरीरोऽग्निः कथं प्रभो।
अवकाशविशेषेण कथं वर्तयतेऽनिलः ।। – महा. भा. शान्ति. पर्व. 185.1

अनुसार, आत्मा मस्तक के रन्ध्र स्थान में स्थित होकर सम्पूर्ण शरीर की रक्षा करता है और प्राण मस्तक तथा अग्नि दोनों में स्थित होकर शरीर को चेष्टाशील बनाता है। वह प्राणों से संयुक्त आत्मा ही जीव है, वही समस्त भूतों का आत्मा सनातन पुरुष है।

वही मन, बुद्धि, अहंकार, पञ्च भूत और विषय रूप हो रहा है। इस प्रकार प्राण के द्वारा शरीर के भीतर समस्त विभाग तथा इन्द्रिय आदि सारे वाह्य अङ्ग परिचालित होते हैं। तत्पश्चात् समानवायु के रूप में परिणत हो प्राण ही अपनी अपनी गति के आश्रित शरीर का संचालक होता है।’

महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में मानव शरीर में व्याप्त वायु के पञ्च भेद बताये हैं। इस सन्दर्भ में महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में ब्राह्मण द्वारा उसकी पत्नी को ज्ञानोपदेश देते हुए कथन है -प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान – ये पांचो प्राण पञ्च होते हैं।

विज्ञान पुरुष इन्हें सबसे श्रेष्ठ मानते हैं। इस तरह महाभारतकार ने मानवशरीर के अन्तर्गत बहने वाली वायु का उल्लेख किया है। महर्षि व्यास ने इन वायुओं से भिन्न-भिन्न कार्यों का वर्णन शान्तिपर्व में किया है इस सन्दर्भ में भृगुऋषि द्वारा भरद्वाज के प्रति कथन है –

प्राण से प्राणी चलने-फिरने का काम करता है, व्यान से व्यायाम (बल साध्य उद्यम) करता है, अपान वायु ऊपर से नीचे की ओर जाती है, समान वायु हृदय में स्थित होती है, उदान से पुरुष उच्छवास लेता है और कण्ठ, तालु आदि स्थानों के भेद से शब्दों तथा अक्षरों का उच्चारण करता है।

इस प्रकार ये पाञ्च वायु के
वायोर्गतिमहं ब्रह्मन् कथयिष्यामि तेऽन घ। प्राणिनामनिलो देहान् यथा चेष्टयते बली ।। क्षितो मूर्धानमात्मा तु शरीरं परिमालयन् । प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते।। स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः | मनो बुद्धिरहङ्कारो भूतानि विषयश्च सः ।। एवं त्विह स सर्वत्र पाणेन परिचाल्यते।। पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ।।

महा. भा. शान्ति पर्व 185. 2-5 –

प्राणापानावुदानश्च समानो व्यान एव च। पञ्चहोतूंस्तथैतान् वै परं भावं विदुर्बुधाः ।।महा. भा. आश्व. पर्व. 23.2

परिणाम हैं, जो शरीर को चेष्टाशील बनाते हैं।’ इस प्रकार समस्त पाञ्चों वायु मानव शरीर में भिन्न-भिन्न रूप में कार्य करते हैं।
नासा गुहा नासिका
श्वर यंत्र
श्वसनिक

शार्ङ्गधर संहिता में भी मानवशरीर के अन्दर व्याप्त वायु के पाञ्च भाग किए गए हैं,

यथा – अपान, समान, प्राण, उदान तथा व्यान। शार्ङ्गधर संहिता में शरीर में प्रविष्ट इन पाञ्चों वायु के कार्यों का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसके अनुसार प्राणवायु को उच्छ्वास और निःश्वास के साथ-साथ फुस्फुसों में आने-जाने वाले – श्वसनी वायु के रूप में व्यक्त किया गया है।

साथ ही उनके ‘नाभिस्थः पवनः प्राणः’ वचन से ऐसा प्रतीत होता है कि गर्भ में शिशु को जो प्राणवायु (ऑक्सीजन) माता के रक्त द्वारा प्राप्त होती है, वह गर्भस्थ शिशु के शरीर में नाभि नाल के द्वारा ही पहुंचता है। अतः शार्ङ्गधर का उपर्युक्त कथन महर्षि वेदव्यास के वचनों का समर्थन करता हुआ युक्ति-युक्त प्रतीत होता है।

मनुष्य का श्वसन अङ्ग

प्राणात् प्रतीयते प्राणी त्यानाद् व्यायच्छते तथा। गच्छत्यपानोत्ध्मश्चैव समानो हृद्यवस्थितः ।। उदानादुच्छवसिति च प्रतिभेदाच्च भाषते। इत्येते वायवः पञ्च चेष्टयन्तीह देहिनम् ।। महा. भा. शान्ति पर्व. – 184. 24-25

वायुः पञ्च प्रकारतः | अपानः स्यात् समानश्च, प्राणोदानौ तथैव च । व्यानश्चेति शरीरस्य नामान्युक्तान्यनुक्रमात् ।। शा सं. 5. 27-28

नाभिस्थः पवनः प्राणः स्पृष्ट्वा हृत्कमलान्तरम् । कण्ठाद् बहिर्विनिर्भाति पातुं विष्णुपदामृतम् ।। पीत्वा चाम्बरपीयूषं पुनरायाति वेगतः । प्रीणमन् देहमखिलं जीवयन् जठरानलम् ।। शार्ङ्ग. सं. 5. 51

मनुष्य द्वारा ली गई प्राणवायु के प्रवेश मार्ग के नासिका, मुख कंठ आदि अवयव हैं। इनके द्वारा ही वायु फुफ्फुसों में गहराई तक जा पहुँचता है। उच्छ्वास – निःश्वास की प्रक्रिया द्वारा प्राणवायु के गति करने के समय वक्ष तथा उदर की माँसपेशियाँ भी गति करती हैं और नाभि तक का प्रदेश प्रभावित होता है।

यह वायु हृदय के आस-पास चारों ओर अर्थात् फुफ्फुस में भर जाता है। फुफ्फुसों से रक्त में मिलकर यह हृदय में पहुँचता है। हृदय के भीतर अमृतमय प्राणद्रव्य से मिश्रित रक्त सदा बना रहता है,

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

इसी कारण शार्ङ्गधर ने “हृदि प्राणः– अर्थात् प्राण का स्थान हृदय भी कहा है। इसके पश्चात् फुफ्फुसों द्वारा निकाला गया दूषित कार्बनडाइऑक्साइड युक्त वायु नासिका, मुख आदि द्वारा वेग से बाहर निकाला जाता है। यह प्राणवायु ही शरीर के समस्त भीतरी अङ्गों को पोषण देता है तथा विष रूपी कार्बनडाई-ऑक्साइड बाहर निकालता है।

इस अमृत रूपी (ऑक्सीजन युक्त) रक्त से जहाँ शरीर के सभी कोषों को जीवन तत्त्व मिलता है, वही यह जठराग्नि को भी प्रज्जवलित करता रहता है। महर्षि वेदव्यास द्वारा वर्णित प्राणवायु के महत्त्व का समर्थन न केवल प्राचीन विद्वान ही करते हैं, वरन् आधुनिक वैज्ञानिकों के मतानुसार ऑक्सीजन युक्त वायु ही प्राणवायु है।

इसे अमृतमय वायु द्वारा भी सम्बोधित किया गया है। छान्दोग्य उपनिषद में कहा गया है कि मनुष्य जो वायु अन्दर खींचता है, उसे प्राण कहते हैं। महर्षि चरक द्वारा प्राणवायु के स्थान शिर, छाती, कान, जीभ, मुख और नासिका बतलाए गये हैं तथा प्राणवायु के द्वारा थूकना, छींकना, डकार आना, सांस लेना और भोजन का निगलना आदि कर्म किये जाते हैं। सुश्रुत संहिता में भी प्राण वायु का उल्लेख मिलता है।

शाङ्ग. सं. 5. 27-28 2 “यद्वै प्राणिति स प्राणः, छान्दो. उप. 1.3.3 ३ स्थानं प्राणस्य शीर्षोर: कर्णजिह्वास्थनासिकाः | ष्ठीवनक्षवथूद्गारश्वासाहारादि कर्म च ।।च. सं. 28.5 + यो वायुर्वक्त्रसंचारी स प्राणो नाम देहधृक् । सोऽन्नं प्रवेशयत्यन्तः प्राणांश्चाप्यवलम्बते।। सु. सं. 1.13

पाचन क्रिया (Digestion)

जीवधारी को जैविक क्रियाओं के लिए ऊर्जा की तथा मरम्मत और वृद्धि के लिए पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है। जीवधारी जिस रूप में भोजन ग्रहण करता है वह उसी रूप में कोशिकाओं द्वारा प्रयुक्त नहीं होता। अतः अघुलनशील जटिल भोजन को सरल घुलनशील इकाइयों में बदलना आवश्यक होता है, जिससे रक्त, लसिका तथा ऊतक तरल (tissue fluid) के माध्यम से ये आवश्यक तत्त्व कोशिका में उपलब्ध हो सकें। इस तरह भोजन को शरीर में प्रयुक्त होने की योग्य दशा में बदलने की क्रिया पाचन (Digesition) कहलाती है।

  • ग्रसनी
  • मुख गुहा मुख अधोजभ और अधोजिह्वा ग्रंथियां
  • ग्रसिका
  • यकृत

मनुष्य के पाचन तन्त्र में निम्नलिखित पाँच अङ्ग सम्मिलित होते हैं –

(1.) आहारनाल,

(2.) ग्रासनाल,

(3.) आमाशय,

(4.) छोटी आंत,

(5.) बड़ी आंत।

मनुष्य के मुख से गुदा तक फैली 8-10 मीटर लम्बी, खोखली तथा कुण्डलित
नलिका को आहारनाल कहते हैं। मनुष्य कर्णपूर्व ग्रंथि द्वारा ग्रहण किया गया भोजन मुख से होकर मुखग्रासन गुहिका में जाता है,

इसके बाद ग्रासनाल तथा क्रमानुसार आमाशय में जाता है जहाँ भोजन लुग्दी जैसा बन जाता है तथा आ माशय की जठग्रन्थियों से जठर
रस स्रावित होता है। इसके बाद भोजन अग्र क्षुद्रांत्र छोटी आंत में जाता है जिसके तीन भाग होते हैं –

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

1. पक्वाशय (Duodenum),

2. मध्यान्त्र (Jejiumum),

3. शेषात्रन्त्र (Ileum)

इन तीनों भागों से होता हुआ भोजन बड़ी आंत में जाता है। इसके भी तीन भागों 1. सीकम,

2. कोलन,

3. मलाशय से होता हुआ भोजन अपने अन्तिम चरण मलाशय तक पहुँचता है। इस प्रकार पाचक क्रिया पूर्ण हो जाती है।

पित्ताशय
आमाशय
अग्नाशय
ग्रहणी –
अनुप्रस्थ वृदन
अवरोही वृहदंत्र
आरोही वृदंत्र क्षुद्रांत अंधनाल –
कृमिरूप परिशेषिका
मलाशय NEPARAcational
गुदा
मानव पाचन तंत्र

मानव शरीर विज्ञान में पाचन क्रिया का विशेष महत्त्व है। इस क्रिया द्वारा मानव शरीर को ऊर्जा तथा पोषक तत्त्वों की प्राप्ति होती है। मनुष्य के पाचन तन्त्र की सम्पूर्ण प्रक्रिया का उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है।

महर्षि व्यास ने महाभारत में पाचन क्रिया का विस्तृत उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में महर्षि भृगु द्वारा महर्षि भरद्वाज के समक्ष पाचन क्रिया का उल्लेख किया गया है, यथा –

अपानप्राणयोर्मध्ये प्राणापानसमाहितः। समन्वितस्त्वधिष्ठानं सम्यक्पचति पावकः ।। आस्यं हि पायुपर्यन्तमन्ते स्याद् गुदसंज्ञितम् । स्रोतस्तस्मात् प्रजायन्ते सर्वस्रोतांसि देहिनाम्।। प्राणानां संनिपाताच्च संनिपातः प्रजायते। ऊष्मा चाग्निरितिज्ञेयो योऽन्नं पचति देहिनाम् ।। अग्निवेगवहः प्राणो गुदान्ते प्रतिहन्यते। स ऊर्ध्वमागम्य पुनः समुत्क्षिपति पावकम् ।। पक्वाशयस्त्वधो नाभ्यामूर्ध्वमामाशयः स्थितः । नाभिमध्ये शरीरस्य सर्वे प्राणाश्च संस्थिताः ।। प्रस्थिता हृदयात् सर्वे तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा। वहन्यन्नरसान् नाऽयो दश प्राणप्रचोदिताः।।

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

उपर्युक्त वर्णन में मुख से लेकर गुदा तक के समस्त शारीरिक अङ्गों की क्रिया विधि का उल्लेख किया गया है कि किस प्रकार प्राणवायु गति करता है ?
और अन्न का पाचन तथा उत्सर्जन प्रक्रिया में उसका क्या योगदान होता है आदि । साथ ही यहाँ प्राण वायु के दस भेदों का भी नामोल्लेख हुआ है,

यथा – 1. प्राण, 2. अपान, 3. व्यान, 4. उदान, 5. समान, 6. नाग, 7. कूर्म, 8. कृकल, 9. देवदत्त, 10. धनंजय ।

अतः इस विवरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकाल में मानव शरीर विज्ञान अत्यन्त विकसित था।
महा. भा. शान्ति. पर्व, 185. 10-15

संस्कृत वाङ्गमय में अपार ज्ञान-विज्ञान का भण्डार है। अतः प्राचीन ग्रन्थों में मानव शरीर विज्ञान का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। मानव शरीर में पाचन क्रिया का विस्तृत वर्णन करते हुए अनेक ऋषियों, चिकित्सकों ने अपने-अपने मत प्रस्तुत किये हैं, यथा- महर्षि सुश्रुत के मतानुसार जठराग्नि द्वारा अन्न के पाचन के सन्दर्भ में कहा गया है –

आमपक्वाशयचर समानो वृह्विसंगतः।
सोऽन्नं पचति तज्जांश्च विशेषाचिनक्ति हि।।’ महर्षि चरक के मतानुसार इस सन्दर्भ में कहा गया है

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

स्वेददोषाम्बुवाहीनि स्रोतांसि समधिष्ठितः । अन्तराग्नेश्च पार्श्वस्थः समानोऽग्निबल प्रदः ।।
अष्टाङ्ग संग्रह की इन्दुटीका में इस सन्दर्भ में निम्नलिखित वर्णन मिलता है
अन्तः अग्ने स्थानं आमाशय-पक्वाशयोर्मध्यं नाभेः अर्धांगुलभात्रेणवामपार्यो।’
शार्ङ्गधर संहिता में पाचन क्रिया का विस्तृत वर्णन मिलता है, यथा –
मात्यामाशयमाहारः पूर्व प्राणानिलेरितः। माधुर्य केनभावं च षड्रसोऽपि लभेत सः।’
अथपाचक तित्तेन विदग्धश्चाम्लतां वृजे……..” ततः समानमरुता ग्रहणीमभिनीयते…….”
‘सु. सं. 1.16

च. सं. 28.7 3 अष्टा. सं. 20.2 (इन्दुटीका) * शार्ङ्ग. सं. 6.1 5 वही. 6.2
वही. 6.2

इस प्रकार उपर्युक्त वर्णन से यह प्रतीत होता है कि प्राचीन भारतीय साहित्य में विज्ञान का अपूर्व तथा गूढ उल्लेख हुआ है।
मनुष्य के शरीर में पाचन क्रिया मुख से लेकर गुदा तक चलती है। इस सम्पूर्ण प्रक्रम में जठराग्नि का विशेष महत्त्व होता है। इसी की सहायता से अन्न पचता है। इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास ने गीता के उपदेश में भगवान श्रीकृष्ण के वचनों के द्वारा शरीर की अग्नि के विषय में वर्णन किया है, यथा – श्रीकृष्ण का कथन है- जाठरो भगवानग्नि ईश्वरोऽनस्य पाचकः ।

अर्थात् मैं ही वैश्वानर (अग्नि) बन कर प्राणियों के शरीर में आश्रित हूँ, मैं ही खाद्य, पेय, लेह्य और चळ सब प्रकार के अन्न को पचाता हूँ। इसी अग्नि की चिकित्सा इस अङ्ग में की जाती है।

महर्षि व्यास के उपर्युक्त वचन की पुष्टि करते हुए अनेक विद्वानों ने अपने-अपने मत प्रस्तुत किए हैं। इस सन्दर्भ में वाग्भट्ट ने अपनी रचनाओं में विस्तृत वर्णन किया है जिसके अनुसार समान वायु अन्तः अग्नि के समीप पक्वाशय तथा आमाशय में रहता है और उसको सुलगाता है। पक्वाशय, आमाशय, दोष, मल, शुक्र, आर्तव तथा अम्बु (रस) के साथ विचरण करता है।

mahabharat – मानव शरीर विज्ञान

महाभारत तथा पर्यावरण विज्ञान

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महाभारत परिचयात्मक विवरण

महाभारत – परिचयात्मक विवरण

महाभारत आर्य-संस्कृति तथा सनातन धर्म का एक महान् ग्रन्थ तथा अमूल्य रत्नों का भण्डार है। यह भारतीय लौकिक साहित्य में वाल्मीकीय रामायण की परवर्ती द्वितीय रचना है। रामायण तथा महाभारत न केवल विशालकाय आर्षकाव्य है

अपितु वे हमारे प्राचीन इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। महाभारत में भारतीय जीवन शैली की समग्र और यथार्थ प्रस्तुति मिलती है। इसमें धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक राजनैतिक और आर्थिक परिस्थितियों,

विचारधाराओं परम्पराओं तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोणों की प्रचुर सामग्री संग्रहीत है। महाभारत केवल अपने रचनाकाल के जीवन मूल्यों और घटनाओं का ही निदर्शन नहीं कराता अपितु यह आधुनिक युग के जीवन मूल्यों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है,

जितना पहले था और भविष्य में भी उतना होगा। यह न केवल प्राचीन संस्कृत महाकवियों को अपितु आज के अनेक भाषाओं के रचनाकारों को काव्य सृष्टि हेतु निरन्तर आकृष्ट कर रहा है।

इसकी उपजीव्यता व्यक्त करते हुए स्वयं महर्षि व्यास का कथन है –

इतिहासोत्तमादस्माज्जायन्ते कविबुद्धयः ।’ सर्वेषां कविमुख्यानामुपजीव्यो भविष्यति। पर्जन्य इव भूतानामक्षयो भारतद्रुमः ।।
महर्षि व्यास ने इसके महत्त्व और आकार-गौरव के कारण ही इसे ‘महाभारत’ कहा है, यथा –

महत्वाद् भारवत्वाच्च महाभारतमुच्यते।’

महा. भा. आदि. पर्व. 2.385 2, 1.92 3, 1.274
विद्वानों ने महाभारत को एशिया भूखण्ड की प्रतिभा का सर्वोत्कृष्ट मानदण्ड स्वीकार किया है,

जो संस्कारवान् मनुष्य सभी अङ्गों सहित चारों वेदों और उपनिषदों को अच्छी तरह जानता हो किन्तु महाभारत को नहीं जानता, उसे विद्वान् (विचक्षण) नहीं कहा जा सकता –

यो विद्याच्चतुरो वेदान् साङ्गोपनिषदो द्विजः । न चाख्यानमिदं विद्यान्नैव स स्याद्विचक्षणः।।’

महाभारत इतिहास तथा काव्य होने के साथ-साथ अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र और कामशास्त्र भी है। इसी कारण इसे मानव जीवन अथ च प्राणिमात्र अथवा चराचर जीव-जगत् का समग्र शास्त्र माना गया है, यथा –

अर्थशास्त्रमिदं प्रोक्तं धर्मशास्त्रमिदं महत्। कामशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेनामित बुद्धिना।।’ धर्मशास्त्रमिदं पुण्यमर्थशास्त्रमिदं परम् । मोक्षशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेनामित बुद्धिना।।’

महर्षि वेद व्यास का यह कथन सर्वथा यथार्थ है कि जो इस महाभारत में है, वह अन्यत्र भी है किन्तु जो इसमें नहीं है, वह कहीं नहीं है –

धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ। यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्।।’

महर्षि वेद व्यास द्वारा विरचित ‘पञ्चम वेद’ की मान्यता वाला यह विशाल
ग्रन्थ ‘कार्णवेद’ की संज्ञा से भी अभिहित किया जाता है।
महा. भा. आदि. पर्व. 2.382 2, 2.383 3, 62.23 4, 62.53, 62.18

महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की रचना तीन वर्षों में की थी। उन्होंने सर्वप्रथम इसकी रचना अपने मानस में की थी। तत्पश्चात् उसे लिपिबद्ध करने की इच्छा से

ब्रह्मदेव से निवेदन किया – भगवन् मैंने विविध ज्ञानों के कोष “महाभारत” की रचना की है। इसे लिपिबद्ध करने के लिए मुझे उपयुक्त लेखक की आवश्यकता है,

तब ब्रह्मा ने महर्षि से कहा – ‘इस कार्य के लिए गणेश सर्वथा उपयुक्त होंगे।’ तत्पश्चात् महर्षि व्यास ने भगवान गणेश का ध्यान किया और गणेश उनके समक्ष उपस्थित हो गए। महर्षि व्यास ने भगवान् श्रीगणेश से लेखन कार्य सम्पन्न करने की अभ्यर्थना की।

भगवान् गणेश ने प्रसन्नतापूर्वक स्वीकृति दे दी किन्तु एक शर्त यह रखी कि मेरी लेखनी रुकनी नहीं चाहिए। इस पर महर्षि व्यास ने भी गणेश से निवेदन किया कि आप प्रत्येक श्लोक का अर्थ समझकर ही लिखिएगा।

फलतः लेखन कार्य प्रारम्भ होने पर व्यास ऋषि बोलते जाते और गणेश समझकर ही लिखते जाते थे। अतः जब महर्षि व्यास को श्लोक बोलने में कुछ समय सोचने की अपेक्षा होती थी।

तब इसके लिए कुछ समय निकालने के लिए वे रहस्यात्मक अर्थ वाले कूट (गूढार्थ) श्लोक बोलते थे जिन्हें लिखने से पूर्व गणेश थोड़ी देर समझने में लगाते थे जिससे महर्षि व्यास अगला श्लोक निर्माण कर लेते थे।

ऐसे कूट श्लोकों की संख्या आठ हजार आठ सौ है। इन श्लोकों का अर्थ गणेश, व्यास ऋषि, शुकदेव भली-भाँति जानते थे, सञ्जय इसका अर्थ जानते थे या नहीं इसमें सन्देह है, ऐसा वर्णन महर्षि व्यास द्वारा स्वयं किया गया है,

यथा –
अष्टौ श्लोकसहस्राणि अष्टौ श्लोक शतानि च। अहं वेदिम् शुको वेत्ति संजयो वेत्ति वानवा।।’

महाभारत-रचनाकार

महाभारत के रचयिता ‘महर्षि वेदव्यास’ का सम्बन्ध महाभारत के पात्रों के साथ अत्यन्त घनिष्ठ है। उनकी माता का नाम ‘सत्यवती’ था, जो चेदिराज वसु उपरिचर के वीर्य से यमुना के किसी द्वीप में उत्पन्न हुई थी। मल्लाहों के राजा
महा. भा. आदि. पर्व 1.81

दासराज के द्वारा जन्मकाल से ही उनकी रक्षा तथा पोषण हुआ था। यमुना के किसी द्वीप में जन्म के कारण व्यास “द्वैपायन” कहलाते थे, शरीर के रङ्ग के कारण ‘कृष्णमुनि’ तथा यज्ञीय उपयोग के लिए एक वेद को चार संहिताओं में विभाग करने के कारण ‘वेद व्यास’ के नाम से विख्यात थे।

महर्षि व्यास, ऋषि पराशर के पुत्र थे। इस सन्दर्भ में महाभारत के आदि पर्व में निम्नलिखित श्लोक मिलता है –

तपसा ब्रह्मचर्येण व्यस्य वेदं सनातनम्। इतिहासमिमं चक्रे पुण्यं सत्यवतीसुतः ।। पराशरात्मजो विद्वान् ब्रह्मर्षिः संशितव्रतः । तदाख्यानवरिष्ठं स कृत्वा द्वैपायनः प्रभुः ।।

महाभारत – रचनाकाल

महाभारत की घटना भारतीय इतिहास की एक अद्भुत तथा अद्वितीय घटना है। महाभारत का रचनाकाल निर्धारित करना असम्भव तो नहीं, किन्तु दुष्कर अवश्य है।

प्राचीन वैदिक ग्रन्थों में जय, भारत अथवा महाभारत का किसी भी रूप में कोई उल्लेख प्राप्त नहीं होता है – न तो कथा का और न ही किसी पात्र का।

इस महाकाव्य का रचनाकाल निर्धारित करने में सर्वाधिक कठिनाई पाश्चात्य विद्वानों के नकारात्मक दृष्टिकोण से उत्पन्न होती है

क्योंकि वे महाभारत युद्ध को ऐतिहासिक घटना नहीं मानते और न ही महाभारत के पात्रों को भी ऐतिहासिक व्यक्ति मानते हैं।

वे महाभारत युद्ध, महाभारत ग्रन्थ और महाभारत के पात्रों को असङ्ग रूप से एक दूसरे से जोड़ते हैं। जबकि महाभारत के रचनाकार महर्षि वेदव्यास का स्वयं का व्यक्तित्व लोकातिशायी और पौराणिक है।

उन्होंने महाभारत में कहीं भी स्पष्ट रूप से महाभारत के रचनाकाल का सङ्केत नहीं किया है। उन्होंने तीन वर्षों में महाभारत की रचना करने की बात कही है किन्तु वे तीन वर्ष कब के हैं, यह बताना असम्भव ही है।

वस्तुतः अब तक महाभारत के रचनाकाल के विषय में जो मन्तव्य प्रकट किए गए हैं, वे प्रमाणों पर कम, गतानुगतिकता पर अधिक हैं। अतः इतना तो सुनिश्चित
महा. भा. आदि. पर्व. 1.54-55
है कि महाभारत ग्रन्थ की रचना महाभारत युद्ध के बाद ही हुई।

जैसे – रामायण के प्रणेता महर्षि वाल्मीकि राम के समकालिक थे, वैसे ही महर्षि व्यास भी पाण्डव-कौरव, श्रीकृष्ण तथा महाभारत युद्ध के समकालिक थे।

महर्षि व्यास तो भरत से ही संबंधित थे और महाभारत युद्ध एक प्रकार से उनके परिवार के ही दो पक्षों के मध्य का ही युद्ध था।

वे पाण्डवों के पक्षधर तथा महाभारत युद्ध के साक्षी भी थे। अतः ऐसे प्रतिभाशाली महर्षि द्वारा महाभारत ग्रन्थ की रचना एक सत्य वृत्तान्त ही प्रतीत होती है।

निश्चय ही उन्होंने इस सत्य वृतान्त को लोकप्रिय तथा शाश्वत बनाने के लिए इसे काव्यमयता और वेदमयता प्रदान की जिससे लोक उससे शिक्षा ग्रहण कर सके।

महर्षि व्यास ने अपने जीवन के किस काल में महाभारत की रचना की इसका निर्धारण भी असम्भव है।

इस प्रकार महाभारत का रचनाकाल निर्धारित करना अत्यन्त दुष्कर कार्य है। अतः इस सन्दर्भ में इसके पूर्व तथा अपर काल सीमा का अनुमान आङ्कलित करते हुए निम्नलिखित सामग्री उपलब्ध होती है –

संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध नाटककार महाकवि भास के छ: नाटक –
दूतकाव्य, उरूभङ्ग, कर्णभार, पञ्चरात्र, दूतघटोत्कट और मध्यमव्यायोग – महाभारत की विभिन्न कथाओं पर आधारित हैं।

महाकवि भास का स्थिति काल प्रायः 450 ई.पू. माना जाता है। अतः महाभारत पाञ्चवीं शताब्दी ई. पू. तक अपने वर्तमान रूप में प्रसिद्ध हो चुका था।

महर्षि पाणिनि ने व्याकरण सूत्रग्रन्थ ‘अष्टाध्यायी’ में महाभारत और महाभारत
के कतिपय पात्रों का उल्लेख किया है।

अष्टाध्यायी अथ च महर्षि पाणिनि का काल ईसा पूर्व पाञ्चवीं शताब्दी माना जाता है। अतः महाभारत की रचना निश्चित रूप से ईसा पूर्व पाञ्चवीं शताब्दी से पहले हो चुकी थी।
सं. वाङ् वृ. इति, पृ. 442 2, पृ. 442

महाभारत के शान्ति पर्व में जहाँ विष्णु के अवतारों का उल्लेख किया गया है।
वहाँ दशावतारों में बुद्ध की गणना नहीं की गई है।’

इससे प्रतीत होता है कि महाभारत की रचना बुद्ध काल के पूर्व ही हो चुकी थी अन्यथा परवर्ती काल में महाभारत के रचनाकार दशावतारों में बुद्धावतार का उल्लेख अवश्य करते।

ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण 543 ई. पू. में हुआ था। अतः असन्दिग्ध रूप से महाभारत ईसा
पूर्व छठी शताब्दी से पूर्व ही निर्मित हो चुका था।

प्रो. हापकिंस और प्रो. सिल्वालेबी ने महाभारत का रचनाकाल निर्धारित करने
का प्रयत्न करते हुए निम्नलिखित तथ्य प्रस्तुत किए हैं –
महाभारत परिचयात्मक विवरण

क. प्रसिद्ध मीमांसक (सातवीं ई. के अन्त और आठवीं ई. के प्रारम्भ में)
कुमारिल भट्ट ने महाभारत को महर्षि व्यास विरचित महान् स्मृतिग्रन्थ कहा है। उन्होंने महाभारत के प्रायः सभी पर्यों से महत्वपूर्ण उद्धरण प्रस्तुत किये हैं।

ख. सातवीं शताब्दी के महान गद्य–कवि बाणभट्ट और सुबन्धु ने अपनी
साहित्यिक कृतियों में महाभारत तथा महर्षि व्यास का सादर उल्लेख किया है।

ग. 442 ई. के एक गुप्त शिलालेख में महाभारत को ‘शत साहस्री संहिता’
कहा गया है।

घ. 450 ई. से 500 ई. के मध्य लिखे हुए उपलब्ध दान पात्रों
“शतसाहस्रीसंहितायां वेदव्यासेनोक्तम्” लिखकर महाभारत तथा वेद व्यास दोनों का उल्लेख किया है।

मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहश्च वामनः ।
रामो रामश्च कृष्ण: कल्की च ते दश।। – महा. भा. शान्ति. पर्व 339, पृ 5390 – सं. हि. को. पृ. 718, 3 सं. वाङ् वृ. इति. पृ. 443

ङ. दक्षिण-पूर्व एशिया के कम्बोडिया नामक देश में प्राप्त हुए 600 ई. के
एक शिलालेख से यह प्रमाणित होता है कि छठी शताब्दी ई.

में महाभारत का प्रचार-प्रसार भारतवर्ष के बाहर भी सुदूर पूर्व के देशों में हो चुका था और उस समय उसका ग्रन्थात्मक रूप भी स्थित हो चुका था।

आद्य शङ्कराचार्य ने महर्षि बादरायण कृत ‘ब्रह्मसूत्र पर अपने भाष्य में लिखा है
कि कृष्णद्वैपायन कलि और द्वापर युग के सन्धिकरण में हुए थे –

‘ब्रह्मविदामपि केषांचिदितिहासपुराणयोदेहान्तरोत्पत्तिदर्शनात्। तथाहि अपान्तरतमा नाम वेदाचार्यः पुराणर्षिर्विष्णुनियोगात्कलिद्वापरयोः सन्धौ कृष्णद्वैपायनः सम्बूभवेति स्मरन्ति।

इस प्रकार महाभारत के रचनाकाल के विषय में कुछ भी सुनिर्णीत रूप से “इदमित्थं” नहीं कहा जा सकता।

परन्तु उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यह ग्रन्थ कम से कम 500 ई. पू. सम्पूर्णता को प्राप्त हो चुका था।

महाभारत – स्वरूप
आधुनिक समय में महाभारत में एक लाख श्लोक मिलते हैं। इसलिए इसे ‘शतसाहस्र संहिता’ कहते हैं।

इसका यह स्वरूप कम से कम डेढ़ हजार वर्ष से भी पुराना अवश्य है, क्योंकि गुप्तकालीन शिलालेख में यह शतसाहस्री संहिता उल्लिखित हुआ है।

विद्वानों का मत है कि महाभारत का वह रूप अनेक शताब्दियों में विकसित हुआ है।
ब्रह्म सू. 3.3.19.32 यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम्’ – पर शाङ्करभाष्य का अंश

mahabharat mai vigyaan secience.

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महाभारत में वैज्ञानिक तत्त्व
महर्षि वेदव्यास विरचित यह लक्ष-श्लोकात्मक संहिता भारत का राष्ट्रीय ग्रन्थ माना जाता है। महाभारत एक उत्तम आर्षमहाकाव्य कहलाता है। महर्षि व्यास ने ग्रन्थ के आरम्भ में ही इसे अत्यन्त सम्मानित काव्य कहा है –

कृतं मयेदं भगवन् काव्यं परमपूजितम्।’
भारतवर्ष के तत्कालीन धर्म–संस्कृति का समस्त ज्ञान इसमें निहित होने के कारण यह ‘पञ्चम वेद’ माना गया है। स्वयं महर्षि व्यास द्वरा अपने इस ग्रन्थ की श्रेष्ठता प्रतिपादन करते हुए कथन है –

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धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ। यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्।।
उपर्युक्त श्लोक में महर्षि व्यास का यह कथन सर्वथा यथार्थ है कि जो इस महाभारत में है, वह अन्यत्र भी है किन्तु जो यहाँ नहीं है, वह कहीं नहीं है।

विज्ञान – अर्थ तथा उसकी सार्थकता
विज्ञान का अर्थ है – विशिष्ट ज्ञान। वैदिक कोश के अनुसार ‘विज्ञान’ का अर्थ समझाते हुए कहा गया है –
विज्ञानं वासोऽहरूष्णीहं।
महा. भा. आदि. पर्व. 1.61

  • विज्ञान विशिष्ट ज्ञान का वाचक है। ‘ज्ञा’ अवबोधम से ल्युट् प्रत्यय के द्वारा निष्पन्न ज्ञान वि उपसर्ग के योग से विज्ञान बनता है, जो विशिष्ट ज्ञान का द्योतक है। यह इन्द्रियगम्य ज्ञान है, जो तर्कों, तथ्यों और प्रयोगों के आङ्कलन पर आधारित है।
  • इसका अंग्रेजी पर्याय Science भी ज्ञानवाचक है, जो लैटिन शब्द Scienta = to know से बना है। विज्ञान की मूलभूत आवश्यकता जिज्ञासा, चिन्तन और प्रयोग है। इन आवश्यकताओं की जहाँ पूर्ति होती है वहाँ विज्ञान पद वाच्य है।
  • अमरकोश के प्रथम काण्ड के धीवर्ग’ में ज्ञान तथा विज्ञान को स्पष्ट किया गया है, यथा “मोक्षे धीमा॑नम्”
  • अर्थात् ज्ञान, मोक्ष विषयक बुद्धि का एक नाम है। अन्यत्र विज्ञानं शिल्पशास्त्रयोः। अर्थात् विज्ञान, शिल्प अथवा शास्त्र विषयक बुद्धि का एक नाम है।
  • इससे स्पष्ट होता है कि मोक्ष से अन्यत्र शिल्पविद्या और शास्त्र में बुद्धि लगाने का एक नाम ‘विज्ञान’ है।
    • mahabharat mai vigyaan secience
  • संस्कृत–प्राकृत-हिन्दी तथा अंग्रेजी शब्द कोश में ‘विज्ञान’ को परिभाषित किया गया है, यथा – विज्ञानं अर्थात्, ज्ञान, अनुभूति, अनुभव, प्रतीति, आत्म-ज्ञान, परमात्म प्रतीति, वस्तु तत्त्व ज्ञान Correct understanding science, hearing real grealsoil, अनध्वसाय, संदेह और विपरीत्ता से रहित ज्ञान। ‘स्व-पर-विषयक प्रतिभास। विशेषस्य ज्ञात्याद्याकारमय ज्ञानमवबोधनं निश्चयो यस्य तद्विज्ञानम् ।
  • विज्ञान मानव की अन्वेषी प्रकृति को रूप तथा आकार देता है। जिस प्रकार प्रकृति के रहस्य असीमित और अनन्त है, उसी प्रकार विज्ञान की भी कोई सीमा नहीं है। विज्ञान एक ओर मानव को इस नश्वर संसार में सुखी-सम्पन्न-संतुष्ट रहने के सभी साधन उपलब्ध कराता है तो दूसरी ओर नश्वरता के गर्भ में निहित अविनाशित सत्य को उद्भासितकर मोक्ष के लिए उत्सुक बनाता है,
  • यथा – अविद्यया मृत्यु तीर्खाविद्ययामृतमश्नुते जिस प्रकार प्रकृति की गतिशीलता या परिवर्तन का मूलोद्देश्य है – सन्तुलन बनाए रखना, विनाश से निर्माण और निर्माण से क्षय के चक्र को गतिमान रखना तथा समस्त कार्यों यथा – सूर्योदय, चन्द्रास्त, सूर्यग्रहण, फसल चक्र, शिशु जन्म तथा वृद्धावस्था, मृत्यु सभी को एकमात्र कारण रूप ब्रह्म की सत्ता की ओर लक्षित है उसी प्रकार विज्ञान का भी कर्तव्य है,
  • कार्य की गहराई में जाकर कारण की खोज करना तथा शून्य से पूर्ण की ओर ले जाना अतः यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि भारतीय विज्ञान पद्धति पाश्चात्य विज्ञान की भांति जड़ वस्तुओं का विज्ञान नहीं वरन् चेतना का विज्ञान है। इस विषय में तैत्तिरीय उपनिषद में वर्णन मिलता है, यथा – यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति, यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तत् विजिज्ञासस्व तत् ब्रह्मेति।’

वेद तथा विज्ञान

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प्राचीन काल से ही ऋषियों, मुनियों तथा विद्वानों ने अपनी असाधारण प्रतिभा से प्रकृति के रहस्यों को समझने तथा मानव जीवन में उनकी महत्ता को स्पष्ट करने

का प्रयास किया है। वे विद्वान् अपनी बौद्धिक तथा तार्किक क्षमता द्वारा तथ्यों का सूक्ष्म विश्लेषण करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचते थे। अतः उन्होंने सम्पूर्ण

प्रकृति को ही विज्ञान की प्रयोगशाला माना है और यह सत्य भी है कि विज्ञान के परीक्षण-प्रयोग आदि बन्द प्रयोगशाला में ही होना आवश्यक नहीं है बल्कि

उनका परीक्षण मुक्त संसार-प्रयोगशाला, में प्रत्यक्ष और यथार्थ के धरातल पर कहीं भी सम्भव है। प्राचीन वैदिक ग्रन्थों में विज्ञान को ऐसे अद्भुत वर्णन प्राप्त

होते हैं जो हमारे गौरवशाली अतीत को संसार के समक्ष अभिव्यक्त करते हैं। यथा –

“देवानां भिषजा”2 यजुर्वेद के इस मंत्र में दम्र और नासत्य नामक अश्विनी
कुमारों को देवताओं का वैद्य बतलाया गया है।
1 तैत्ति. उप. 3.1 2 यजु. वे. 21.53

“दैव्या भिषजा शं नः करतो अश्विना।’ ऋग्वेद के इस श्लोक में भी अश्विनी
कुमारों को देवताओं का वैद्य बतलाया गया है।

ऋग्वेद में सूर्य की सात किरणों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें आज हम VIBGYOR के नाम से सम्बोधित करते हैं,

यथा – अधुक्षत् पिप्युषीमिषमूर्ज सप्तपदीमरिः । सूर्यस्य सप्त रश्मिभिः ।।यजुर्वेद में सूर्य की आकर्षण शक्ति का उल्लेख मिलता है –

आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मृर्त्यञ्च । हिरण्ययेन सविता रथेनादेवो यादि भुवनानि पश्यन्।।’ अथर्ववेद में गण्डमाला अथवा अपचित्

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की शल्य क्रिया का उल्लेख करते हुए यह बताया गया है कि मुनिद्रुम से छेदकर मवाद निकाला जाता था,

यथा – मुनेर्देवस्य मूलेन सर्वा विध्यामि ता अहम् ।। ऋग्वेद में अस्त्र-शस्त्रों के विषय में वर्णन मिलता है,

यथा – संग्राम में शत्रु को पराजित करने के लिए अस्त्र-शस्त्र सुदृढ़ करो इति –

स्थिरा वः सन्त्वायुधाः। विज्ञान के अनुसार, पदार्थ (Matter) अविनाशी है। सांख्यदर्शन का यह सिद्धान्त मुण्डकोपनिषद् में निहित है –

तदव्ययं यद् भूतयोनिं पीरपश्यन्ति धीराः। भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि

में भूगोल की केन्द्रीय आकर्षक शक्ति का वर्णन किया है। जिसे छह सौ वर्ष बाद न्यूटन ने दोहराया।

भास्कराचार्य का कथन है –
1, ऋ वे. 8.18.8
2, ऋ. वे. 8.72.16 ३ यजु. वे. 33.43 4 अर्थ. वे. 7.74.1 5 ऋ. वे. 1.39.2
मुण्डको. 1.1.6

आकृष्टिशक्तिश्च महीतपाचत् स्वस्थं गुरूस्वाभिमुखं स्वशक्तया। आकृष्यते तत् पततीव भाति समे समत्वात् न पतत्वियं खे।।’

भास्कराचार्य ने अपने ज्यामितीशास्त्रीय ग्रन्थ ‘लीलावती’ में L का मान दिया
व्यासे भनन्दाग्निहते विभक्ते

खबाणसूर्यः परिधिस्तु सूक्ष्मः। द्वविंशतिघ्ने विहतेऽथ शैले स्थूलोऽथवा स्याद् व्यवहारयोग्यः ।।

आर्यभट्ट ने त्रिकोण का क्षेत्रफल निकालने का सूत्र बताया,
यथा – त्रिभुजस्य फलशरीरं समदल कोटी भुजार्ध संवर्गः।’

उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह प्रतीत होता है कि भारत में प्राचीन काल से ही विज्ञान अपने सर्वोच्च शिखर पर विद्यमान हो चुका था। यह परम्परा वैदिक

काल से लेकर महाभारत काल तक बनी रही क्योंकि महाभारत में महर्षि व्यास ने तत्कालीन विज्ञान को सुस्पष्ट तथा विस्तृत रूप में वर्णन किया है।

महाभारत में विज्ञान का महत्त्व
महर्षि व्यास अद्वितीय प्रतीभा के धनी थे। उन्होंने महाभारत में विज्ञान के विविध प्रकारों का उल्लेख किया है।

महर्षि वेदव्यास द्वारा महाभारत में विज्ञान की परिभाषा देते हुए कथन है कि

प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः । एतद् विज्ञानसामर्थ्य न बालैः समतामियात्।।
अर्थात् मानसिक दुःख को बुद्धि तथा विचार द्वारा और शारीरिक कष्ट को औषधियों द्वारा दूर करे, यही विज्ञान का सामर्थ्य है,

जिससे मनुष्य दुःख में पड़ने पर बच्चों के समान बैठकर रोये नहीं।

उपर्युक्त वर्णन में व्यास मुनि ने विज्ञान के सामर्थ्य का ज्ञान होना सभी प्राणियों के लिए अत्यावश्यक बताया है जिससे दुःख आदि के समय वह बैठकर रोने के

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स्थान पर विज्ञान द्वारा दुःख दूर करने का प्रयास करे। इससे महर्षि व्यास के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का बोध होता है। महर्षि व्यास द्वारा शान्तिपर्व में राजा जनक

द्वारा शुकदेव के प्रश्न का उत्तर देते हुए ज्ञान-विज्ञान के विषय में कथन है –
न बिना ज्ञानविज्ञाने मोक्षस्याधिगमो भवेत्।’ अर्थात् ज्ञान-विज्ञान के बिना मोक्ष की

प्राप्ति नहीं होती है। उपर्युक्त वर्णन में विज्ञान की सार्थकता का उल्लेख किया गया है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म द्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणों की महिमा का

वर्णन युधिष्ठिर के समक्ष किया गया है जिसमें विज्ञान के गुणों से सम्पन्न श्रोताओ को श्रेष्ठ बताया गया है यथा –

ये चापि तेषां श्रोतारः सदा सदसि सम्मताः । विज्ञान गुण सम्पन्नास्तेभ्यश्च स्पृहयाम्यहम्।।
उपर्युक्त वर्णन में विज्ञान के गुणों से युक्त श्रोता श्रेष्ठ बताया गया है,

इससे विज्ञान के महत्व का बोध होता है।

अतः यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महर्षि व्यास ने महाभारत में विज्ञान

के महत्व का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है।
महा. भा. शान्ति पर्व, 326.22 2 महा. भा. अनु. पर्व. 8.8
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vedant darshan adhyay 1 paad 1