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mahabharat krishi – 2

इसी प्रकार श्रीकृष्ण द्वारा कर्ण के प्रति पाण्डव पक्ष की विजय के वर्णन में यह उल्लेख मिलता है कि “इस सय मार्गशीर्ष का मास चल रहा है जिससे सर्वत्र

औषधियां, फल-फूल तथा धान के खेतों में समृद्धि बढ़ी हुई है। इससे स्पष्ट होता है कि मार्गशीर्ष के महीने में कृषि समृद्ध हो जाती थी। अतः इस समस्त विवरण से स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में कृषि विज्ञान अत्यन्त विकसित था। इस सन्दर्भ में कौटिल्य का अर्थशास्त्र में बीज वपन काल का उल्लेख मिलता है। कृषि पराशर में उचित काल में बीज वपन करने का निर्देश दिया गया है। mahabharat krishi – 2

वपन विधि और क्रम

कृषि विज्ञान के अनुसार बीज वपन की प्रमुख रूप से दो विधियां होती हैं –

(1.) बीज वपन
(2.) रोपण।

प्रायः औषधि आदि के बीज बोये जाते हैं और उनके लिये यथा प्रकृति स्थल, उपाय, भूमि तथा बोने हेतु बीज अनिवार्य है। यह क्रिया तीन प्रकार की होती है, यथा सीता श्रेणी में बीज बोना, बीज को फेंककर (प्रकीर्णन द्वारा) बोना और भूमि को गहराई तक खोदकर उसमें बीज बोना। इसी प्रकार बीज वपन की दूसरी विधि रोपण है जिसमें बीज के छोटे-छोटे पौधे रोपे जाते हैं। जैसे – धान के पौधे रोपना |

महाभारत काल में भी इन विधियों तथा क्रमों का प्रयोग कृषि हेतु किया जाता था। इस सन्दर्भ में संजय द्वारा धृतराष्ट्र के समक्ष शल्य के ध्वज की चर्चा की गयी है जिसमें प्रकारान्तर से ध्वज में स्थित शुभ लक्षणों से युक्त एक सीता (हल

सौम्योऽतं वर्तते मासः सुप्रापयवसेन्धनः । सर्वौषधिवन स्फीत: फलवानल्पमक्षिकः।।
निष्पको रसपत्तोयो नात्युषण शिशिरः सुखा।। महा. भा. उद्यो. पर्व. 142.16-17

ततः प्रभूतोदकमल्पोदकं वा सस्यवापयेत् ।
शालि-व्रीहि-कोद्रव-तिल-प्रियङ्गु-दारक-वरकाः पूर्ववायाः ।। मुदग्-माष-शैम्ब्याः मध्यवापाः । कुसुम्भ-मसूर-कुलत्थ-यव-गोधूम-कलायातसी-सर्षपाः पश्चाद्वायाः ।।
कौ अर्थशा. 2.24

वैशाखे वपनं श्रेष्ठं ज्येष्ठे तु मध्यमं स्मृतम् ।
आषाढ़े चाधमं प्रोक्तं श्रावणे चाधमाधमम्।। रोपणार्थं तु बीजानां शुचौ वपनमुत्तमम् । श्रावणे चाधमं प्रोक्तं भाद्रे चैवाधमाधमम् ।।
कृषि, परा० श्लोक. 168-169

द्वारा भूमि पर खींची गयी रेखा) का उल्लेख मिलता है तथा सभी बीजों के अङ्कुरित होने पर व्याप्त सीता की शोभा की तुलना शल्य के ध्वज से की गयी है। इस वर्णन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस काल में हल द्वारा रेखा खींचकर बीज वपन किया जाता था।

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महाभारत काल में बीज प्रकीर्णन विधि द्वारा कृषि की जाती थी। इस सन्दर्भ में धृतराष्ट्र द्वारा दुर्योधन के प्रति कथन है कि जिस प्रकार किसान खेतों में बीज बोता है उसी प्रकार समर भूमि में बाण बिखेरते हुए सात्यकि आदि द्वारा बाण फेंके जाएंगे। इससे प्रतीत होता है कि उस काल में बीज प्रकीर्णन विधि भी प्रचलित थी।

महाभारत के अनुशासन पर्व में श्री महेश्वर द्वारा उमा के प्रति मनुष्य के कर्मों के वर्णन में कृषि कर्म का उल्लेख किया गया है जिसमें रोपण विधि की बात कही गयी है। इससे प्रतीत होता है कि महाभारत काल में कृषि हेतु बीज की रोपण विधि प्रचलित थी।

प्राचीन ग्रन्थों में बीज वपन की विधि का उल्लेख मिलता है यथा यजुर्वेद में हलादि उपकरणों द्वारा भूमि खोदकर सीता श्रेणी में बीज वपन करने का उल्लेख मिलना है। अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में वपन विधि तथा वपन क्रम का प्रयोग आधुनिक कृषि विज्ञान के अनुसार किया जाता था।

मद्रराजस्य शल्यस्य ध्वजाग्रेऽग्नि शिखामिव ।।
सौवर्णी प्रतिपश्याम् सीतामप्रतिमां शुभाम्
सर्वबीज विरूदेव यथा सीता श्रिया वृता।
महा. भा. द्रोण पर्व. 105.18-19

सम्पूर्ण पूरयन् भूयो धनं पार्थस्य माधवः ।
शैनेयः समरे स्थाता बीजवत् प्रवप-शरान् ।।
महा. भा. उद्यो. पर्व. 58.22

रोपणं चैव लवनं यच्चान्यत् पौरूषं स्मृतम्।।
महा. भा. अनु. पर्व. 145 पृ. 5979

कृते योनौ वपते हबीजम् । नेदीय इत्सृण्य पक्वमेयात् ।।
यजु. वे. 12.68

अनुपयुक्त बीज –
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कृषि वैज्ञानिकों के मतानुसार, उत्तम बीज ही कृषि करने के लिये उपयुक्त होते हैं। इस सन्दर्भ में महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के प्रति गुरू-शिष्य संवाद में यह वर्णन मिलता है कि जिस प्रकार आग में भूने हुए बीज नहीं उगते उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि से दग्ध जीव संसार में जन्म नहीं लेता है।’ इस वर्णन के अनुसार भुने हुए बीज कृषि की दृष्टि से अनुपयुक्त माने जाते हैं। अतः यह प्रतीत होता है कि महाभारतकार कृषि के सन्दर्भ में उपयुक्त तथा अनुपयुक्त बीज से भली-भांति परिचित थे।

इस समस्त विवरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकाल में कृषि विज्ञान अत्यन्त विकसित था तथा उस काल में लोग कृषि के सन्दर्भ में वपन की समस्त तकनीकियों से परिचित थे।

महाभारत तथा सिंचाई के साधन

कृषि तंत्र में कृषि विज्ञान ने निरन्तर उन्नति की है। भारतीय कृषि में कृषि की उन्नति के लिए सिंचाई के साधनों का बड़ा महत्व है। सिंचाई के साधनों में जल स्रोतों को रखा गया है, इनमें वर्षा का जल, नदी, तालाब, कुएं, वापी, झरनों आदि द्वारा खेती की जाती है।

वृहत्संहिता में कृषि के सन्दर्भ में जल संसाधनों को दो भागों में बांटा गया है, यथा mahabharat krishi – 2

कृत – इसमें मानव निर्मित जल के स्रोत आते हैं जैसे – कुआं, वापी, तालाब
आदि।
अकृत – इसमें प्राकृतिक जल के स्रोत आते हैं, जैसे – वर्षा, नदी, झरना
आदि।

बीजन्यग्नयुपदग्धानि न रोहन्ति यथा पुनः | ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैर्नात्मा सम्पद्यते पुनः ।।
महा. भा. शान्ति पर्व 211.17 2 वृहत् सं. 56.3

महाभारत में सिंचाई के साधनों का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। महाभारत काल में कृषि के लिए वर्षा का जल सर्वोत्तम साधन माना जाता था। इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास द्वारा शुकदेव के प्रति सृष्टि की उत्पत्ति के क्रम के वर्णन में वर्षा के महत्व का उल्लेख मिलता है जिसके अनुसार वर्षा द्वारा स्थावर तथा जङ्गम पदार्थ वृद्धि को प्राप्त करते हैं तथा वर्षा बीतने पर उनका हास भी होता है।

इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस काल में वर्षा पर कृषि प्रक्रिया निर्भर थी। इस सन्दर्भ में भीष्म द्वारा राजा के मित्र तथा अमित्र के वर्णन में प्रकारान्तर से यह उल्लेख मिलता है कि वर्षा का जल जिसके खेत से होकर दूसरे के खेत में जाता है, उसकी इच्छा के बिना उसके खेत की आड़ या मेड़ को नहीं तोड़ना चाहिए। इस वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि कृषि में वर्षा का जल विशेष महत्वपूर्ण माना जाता था तथा कृषि हेतु खेतों में मेड़ बनाकर जल तथा मृदा का संरक्षण भी किया जाता था।

महाभारत काल में कृषि विज्ञान अत्यन्त विकसित था। अतः सिंचाई के लिए कुएं, तालाब, पोखर आदि भी प्रयोग किये जाते थे। इस सन्दर्भ में अनुशासन पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर से प्रजा की रक्षा हेतु दिये गये उपदेश में यह उल्लेख मिलता है कि पानी न बरसने पर जब प्रजा कुआं खोदकर किसी तरह सिंचाई करके कुछ अन्न पैदा करे और उसी से जीविका चलाये तो राजा को वह धन नहीं लेना चाहिए। इस वर्णन में स्पष्ट रूप से कुएं द्वारा सिंचाई करने की बात कही गयी है। कृषि हेतु सिंचाई करने के साधन में जलाशय तथा पोखर आदि भी महत्वपूर्ण माने

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यथा विश्ववानि भूतानि वृष्टया भूयांसि प्रावृषि।
सृज्यन्ते जङ्गमस्थानि तथा धर्मा युगे युगे।।
महा. भा. शान्ति पर्व. 232.39

यस्य क्षेत्रादप्युदकं क्षेत्रमन्यस्य गच्छति ।
यमेवलक्षणं विधात् तममित्रं विनिर्दिशेत् ।।
महा. भा. शान्ति पर्व 80.14-15 ३

वृद्ध बालधनं रक्ष्यमन्धस्य कृपणस्य च। न खातपूर्वं कुर्वीत न रूदन्ती धनं हरेत् ।।
महा. भा. अनु. पर्व. 62.25

गये हैं। इस सन्दर्भ में अनुशासन पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के प्रति जलाशय तथा पोखर आदि बनवाने के लाभों की विस्तृत विवेचन किया गया है। इससे यह प्रतीत होता है कि उस काल में जलाशय, पोखर आदि द्वारा कृषि की जाती थी।

महाभारत तथा कृषि उपयोगी यंत्र

प्राचीन वैदिक काल से भी पहले कृषि के लिए हल आदि उपकरण प्रयोग किये जाते थे। वेदों में कृषि उपयोगी यंत्रों का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। यथा
अथर्ववेद में हल तथा जुओं में लगे बैलों का वर्णन किया गया है और इसी में आगे हल को उत्तम फाल से युक्त, सुगमता से चलने वाला तथा जुताई हेतु उपयोगी उपकरण बताया गया है।

यहां ‘हल’ को कृषि उपयोगी यंत्र के रूप में उल्लेख किया गया है। ‘हल’ शब्द का अर्थ है – विलेखन करने वाला उपकरण। हल को लाङ्गल कहा जाता था। इसके अन्य उपकरण सीता (फाल इति), सीर, शुन – ईषा–युग-वरत्र-अष्ट्रा आदि होते हैं। इस सन्दर्भ में ऋग्वेद में कृषि कार्य हेतु सीर, लाङ्गल, सीता (युग्म), वस्त्रा (रज्जु), अष्ट्रा (फाल) आदि का उल्लेख मिलता है।

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १।१ । १॥

वर्षाकाले तडागे तुसलिलं यस्य तिष्ठति ।
अग्निहोत्रफलं तस्य फलमाहुर्मनीषिणः।।
तडागे यस्य गावस्तु पिबन्ति तृषिता जलम् | मृगपक्षिमनुष्याश्च सोऽश्वमेधफलं लभेत्।।
महा. भा. अनु. पर्व. 58.10-17

सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वि तुन्वते पृथक् । धीरा देवेषुम्नयौ।। लाङ्गलं पवीरवत् सुशीमं सोमसत्सरू । उद्दिवपतु गावविं प्रस्थावद् रथवाहनं पीबरी च प्रफळम् ।।
अथर्व. वे. 3.17.1-3

हल् विलेखने धातोः घञर्थे करणेक प्रत्ययाद हलम्।।
आप्टे. को. पृ. 1167

शुनं वाहाः शुनं नरः शुनं कृषतु लाङ्गलम् ।
शुनं पर्जन्यो मधुना पयोभिः शुनासीरा शुनमस्मासु धत्तम् ।।
ऋ. वे. 4.57.4-9

महाभारत काल में भी कृषि का प्रमुख यंत्र हल (लाङ्गल) प्रचलित था। इस सन्दर्भ में महाभारत के शान्ति पर्व में जाजलि तथा तुलाधार के संवाद में हल द्वारा खेती करने का उल्लेख मिलता है। जिसके अनुसार कुछ लोग खेती को अच्छा मानते है परन्तु यह वृत्ति अत्यन्त कठोर है। वह हल, जिसके मुख पर फाल जुड़ा हुआ है, पृथ्वी को पीड़ा देता है और इससे पृथ्वी के भीतर रहने वाले जीवों का भी वध हो जाता है तथा उसमें जुते बैल भी दुर्दशा को प्राप्त होते हैं।’ यहां महाभारतकार ने स्पष्ट रूप से हल तथा अन्य उपकरणों का उल्लेख किया है।

अतः इस विवरण से अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में कृषि व्यवस्था अत्यन्त विकसित थी तथा हल, फाल आदि उपकरणों द्वारा कृषि की जाती थी जो उस काल के कृषि विज्ञान की विकसित दशा का परिचायक प्रतीत होता है।

महाभारत तथा कृषि संरक्षण

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कृषि की उन्नति और समृद्धि के लिए कृषि संरक्षण बहुत ही आवश्यक है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार कृषि संरक्षण से ही कृषि की फसलों में वृद्धि सम्भव है। किसी भी राष्ट्र के लिए कृषि का संरक्षण प्रथम कर्तव्य है। ऐसा वर्णन कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र में मिलता है। मूलतः कृषि संरक्षण का कार्य प्रशासन के अन्तर्गत माना जाता है। कृषि संरक्षण की दृष्टि से कृषि विज्ञान द्वारा इसे निम्न भागों में विभक्त किया जा सकता है –

मृदा–संरक्षण – कृषि संरक्षण हेतु सर्वप्रथम मृदा (मिट्टी) का संरक्षण आवश्यक है। मिट्टी के संरक्षण के मुख्यतः तीन कारण होते हैं –

(1.) अनावृष्टि
(2.) अतिवृष्टि,
(3.) तीव्र वायु और प्रवाह ।
भूमि के ऊपर उर्वरक शक्ति से युक्त, उपजाऊ परत होती है जो अतिवृष्टि (अधिक वर्षा), तीव्र वायु आदि द्वारा बहाकर ले जायी जाती है

कृषि साध्विति मन्यन्ते सा च वृत्तिः सुदारूणा।।
तथैवानडुहो युक्तान् समवेक्षस्व जाजले
महा. भा. शान्ति पर्व 262.45-46

जिससे भूमि की उपजाऊ शक्ति खत्म हो जाती है। अतः सामान्यतः देखा गया है कि अधिक वर्षा से नलिका अपरदन होता है। ऐसा उल्लेख ऋतुसंहार में भी मिलता है।’ इस सन्दर्भ में अग्निपुराण में अधिक वर्षा से कृषि को बहुत हानि होती है, ऐसा उल्लेख मिलता है।

महाभारत के सभा पर्व में अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि से उत्पन्न भयानक उपद्रव का उल्लेख मिलता है। जिससे प्रतीत होता है कि अतिवृष्टि होने से कृषि पर बुरा प्रभाव पड़ता है जिस कारण कृषि द्वारा फसल उत्पन्न नहीं होती है और जनता त्राहि-त्राहि करती है।

इस वर्णन में साङ्केतिक रूप में मृदा अपरदन का उल्लेख किया गया है। महाभारत काल में कृषक कृषि के संरक्षण की सभी विधियों से परिचित थे। वे भली-भांति जानते थे कि खेतों में उपजाऊ मिट्टी को बहने से रोकने के लिए मेड़ बनाना आवश्यक होता है तथा इससे मृदा संरक्षण सम्भव होता है।

इस सन्दर्भ में आदि पर्व में उपाध्याय की आज्ञानुसार खेत की टूटी क्यारियों में मेड़ बांधने का उल्लेख मिलता है। मृदा संरक्षण के लिए सर्वोत्तम उपाय वृक्षारोपण भी स्वीकार करते हैं।

इसी कारण अनुशासन पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के प्रति वृक्षारोपण के महत्व का विस्तृत वर्णन किया गया है। जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकार यह भलीभांति जानते थे कि वृक्ष अपनी जड़ों द्वारा मिट्टी को जकड़े रहते हैं जिससे उपजाऊ मिट्टी का अपरदन नहीं होता और भूमि उपजाऊ

दण्डविष्टिकराबाधैः रक्षेदुपहतां कृषिम्। स्तेनव्यालविषग्राहैर्व्याधिभिश्च पशुव्रजान् ।।
अर्थ. शा. 2.1.18 2

अग्नि. पुरा. 163.19 3 अवर्ष चातिवर्ष च व्याधिपावकमूर्छनम् ।
सवमेतत् तदा नासीद् धर्मनित्ये युधिष्ठिरे।।।
महा. भा. सभा. पर्व. 33.5

स तत्र संविवेश केदारखण्डे शयाने च तथा तस्मिंस्तदुदकं तस्थौ।।
महा. भा. आदि. पर्व. 3.24

स्थावराणां च भूतानां जातयः षट् प्रकीर्तिताः ।
तरयेद् वृक्षरोपी च तस्माद वृक्षांश्च रोपयेत् ।।
महा. भा. अनु. पर्व. 58.23-27

बनी रहती है। मनुस्मृति में भी वृक्षारोपण को मृदासंरक्षण के लिए अनिवार्य बताया गया है।
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इस विवरण से स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में कृषि संरक्षण हेतु मृदा संरक्षण को महत्वपूर्ण माना जाता था तथा उस काल के लोग वृक्षारोपण के महत्व से भली-भाँति परिचित थे।

क्षेत्र संरक्षण – कृषि विज्ञान के अनुसार उत्तम कृषि के लिए खेत का संरक्षण किया जाना आवश्यक है। यहां क्षेत्र संरक्षण से तात्पर्य – खेत की पशुओं-पक्षियों
आदि से सुरक्षा, प्रदूषण से सुरक्षा तथा चोरी आदि सुरक्षा से है।

ने महाभारत में अनेक स्थानों पर क्षेत्र संरक्षण का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में भीष्म द्वारा आयु की वृद्धि तथा क्षय करने वाले कर्मों का उल्लेख युधिष्ठिर के प्रति किया गया है जिसमें प्रकारान्तर से खेत के संरक्षण का उल्लेख मिलता है इस वर्णन में भीष्म का कथन है कि बोये हुये खेत में मल-मूत्र नहीं करना चाहिए तथा बढ़ी हुई खेती में भी मल-मूत्र त्याग नहीं करना चाहिए।’

इस कथन से खेत को प्रदूषण से बचाने का साङ्केतिक रूप से उल्लेख मिलता है। इस सन्दर्भ में महाभारत के सभा पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के प्रति हैहयराज अर्जुन के शासन प्रबन्ध के वर्णन में यह उल्लेख मिलता है कि वे (अर्जुन) बकरियों, गौओं आदि पशुओं तथा खेतों का संरक्षक थे। इससे प्रतीत होता है कि महाभारत

सीमावृक्षांश्च कुर्वीत न्यग्रोधाश्वत्थकिं शुकान् । शरान्कुब्जकगुल्मांश्च तथा सीमा न नश्यति ।।
मनु. स्मृ. 8.246-247

नोत्सृजेत पुरीषं च क्षेत्रे ग्रामस्य चान्तिक द्विचारामेद् यथान्यायं हृदगतं तु पिबन्नपः ।।
महा. भा. अनु. पर्व. 104.54

स एव राष्ट्रपालोऽभूत् स्त्रीपालोऽभवदुर्जनः। इदं तु कार्तवीर्यस्य बभूवासदृशं जनैः।।
महा. भा. सभा. पर्व. 38 पृ. 792

काल में कृषि से जुड़े पशुओं तथा खेतों की सुरक्षा अत्यधिक आवश्यक मानी जाती थी।

इस सन्दर्भ में कृषि पराशर का कथन है कि देखभाल की गयी खेती सोना उत्पन्न करती है तथा बिना देखभाल की वही कृषि दैन्य (निर्धनता) देने वाली होती है।’ इस समस्त विवरण से यह प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास क्षेत्र संरक्षण के विविध उपायों से परिचित थे।

बीज संरक्षण – समस्त फसलों का मूलभूत उपादान कारण बीज है। अतः कृषि शास्त्रों तथा कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार बीज संग्रह तथा बीज संरक्षण अत्यावश्यक है। बीज से बीज की उत्पत्ति होती है अतः इसका संरक्षण आवश्यक है ऐसा उल्लेख महाभारत के शान्ति पर्व के तीन सौ पांचवें अध्याय में मिलता है।

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गो संरक्षण – प्राचीन वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक भारतीय कृषि पद्धति गौ पर आश्रित है। गोपालन, गोसंरक्षण विषयक नियम तथा नीति आदि का उल्लेख प्राचीन धर्मग्रन्थों में मिलता है।

महाभारत में गोरक्षा, गोशाला निर्माण, गो-चिकित्सा आदि का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है। महाभारतकार ने सभा पर्व में अर्जुन को गौओं का पालक’ कहा है। इसी प्रकार जाजलि तथा तुलाधार संवाद में कृषि तथा पशुओं को वैश्य धर्म वाले लोगों के जीवन का आधार बताया गया है। इसी प्रकार भीष्म पर्व में भी वैश्यों के स्वाभाविक कर्मों में भी गोपालन का उल्लेख हुआ है। इससे प्रतीत होता

फलत्यवेक्षिता स्वर्ण दैन्यं सैवानवेक्षिता। कृषिः कृषि पुराणज्ञ इत्युवाच पराशरः ।।
कृषि परा. (कृषि खण्ड) 1 पृ. 36 2 महा. भा. शान्तिपर्व 305.21 3 महा. भा. सभा पर्व 38 पृ. 792

कृष्या ह्यन्नं प्रभवति ततस्त्वमपि जीवसि। पशुभिश्चौषधीभिश्च मा जीवन्ति वणिज ।।
महा. भा. शान्ति पर्व. 263.2 5
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
महा. भा. भीष्म. पर्व. 42-44

है कि कृषि के सन्दर्भ में गो संरक्षण अनिवार्य है। इस तथ्य से महर्षि व्यास भली-भांति परिचित थे।

प्रशासन द्वारा संरक्षण – कृषि साधनों, फसलों आदि का संरक्षण शासकीय संरक्षण से ही सफल होते हैं। फलतः कृषि के प्रति प्रशासन की संरक्षणशील नीति राष्ट्रीय कृषि संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्राचीनकाल से ही राजा का कर्तव्य कृषि की समृद्धि, विकास तथा सुरक्षा माना गया है।

महाभारतकार ने भी अनेक स्थानों पर प्रशासन को कृषि संरक्षण हेतु जिम्मेदार माना है। इस सन्दर्भ में राजा के होने से लाभों का उल्लेख शान्ति पर्व में बृहस्पति द्वारा वसुमना के प्रति किया गया है जिसमें राजा द्वारा कृषि संरक्षण करने की बात कही गयी है। इसी प्रकार शान्ति पर्व में भीष्म द्वारा राजा के कर्तव्यों के वर्णन में प्रशासन संरक्षण की झलक मिलती है।

इस वर्णन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकाल में कृषिसंरक्षण हेतु नाना प्रकार के उपायों का प्रयोग किया जाता था जिससे उस काल में कृषि व्यवस्था उन्नत दशा में पहुंच गयी थी।

महाभारत तथा कृषि में ज्योतिषीय प्रभाव

कृषि विज्ञान के अनुसार कृषि कर्म का मूल वृष्टि है। वृष्टि द्वारा ही कृषि योग्य भूमि शस्य उत्पादन में सफल होती है। कृषि पर वर्षा के साथ-साथ आकाशीय पिण्डों, ग्रह-नक्षत्रों, सूर्य, चन्द्रमा आदि का भी प्रभाव पड़ता है। कृषि वैज्ञानिक तथा ज्योतिष के ज्ञाता भी नक्षत्र राशि आदि को कृषि के लिये प्रभावशाली बताते हैं। प्राचीन ग्रन्थों में कृषि पर ज्योतिषीय प्रभाव का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है, यथा – वृहत्संहिता के अनुसार, कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा के बाद वर्षागर्भ

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वार्तामूले ह्ययं लोकस्रय्या वैधार्यते सदा। तत् सर्व वर्तते सम्यग् यदा रक्षति भूमिपः ।।
महा. भा. शान्ति पर्व. 68.35

कच्चित् कृषिकरा राष्ट्रं न जहत्यति पीडिताः |
ये वहन्ति धुरं राज्ञां ते भरन्तीततरानपि।।
महा. भा. शान्ति पर्व 89.24

काल में परीक्षण करना चाहिए क्योंकि सम्यक् गर्भ के सम्भव होने से फसल उत्पन्न होती है।’ महाभारत में भी अनेक स्थानों पर ज्योतिष से प्रभावित कृषि का उल्लेख मिलता है। इस सन्दर्भ में चन्द्रमा के द्वारा कृषि पर पड़ने वाले प्रभाव का वर्णन वैशम्पायन द्वारा जनमेजय के प्रति किया गया है। जिसके अनुसार चन्द्रमा के क्षय होने पर औषधियां, लता, भांति-भांति के बीज आदि भी क्षीण होने लगे थे।

महाभारत काल में कृषि पर ज्योतिषीय प्रभाव को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता था। इस सन्दर्भ में व्यास ऋषि द्वारा संजय से अमङ्गल सूचक, उत्पातों तथा विजयसूचक लक्षणों का वर्णन किया गया है जिसके अनुसार, मङ्गल ग्रह मघानक्षत्र में स्थित है तथा बार-बार वक्र होकर ब्रह्मराशि (बृहस्पति से युक्त) श्रवण नक्षत्र को पूर्ण रूप से आवृत करके स्थित है जिसका प्रभाव कृषि पर अनुकूल पड़ा है जिससे पृथ्वी पर सब प्रकार के अनाज पौधे बढ़ गये हैं, शस्य की मालाओं से अलंकृत है,

जौ में पांच-पांच तथा जड़हन धान में सौ-सौ बालियां लग गयी हैं। इस वर्णन से स्पष्ट होता है कि कृषि पर ज्योतिष का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। अतः यह कहा जा सकता है कि महाभारतकाल में कृषि, काल तथा ग्रह-नक्षत्रों पर आधारित थी। जिसे आधुनिक वैज्ञानिक तथा ज्योतिषी भी स्वीकार करते हैं। अतः इस समस्त विवरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में कृषि व्यवस्था अत्यन्त विकसित थी तथा वैज्ञानिक तकनीकियों से सुव्यवस्थित भी थी।

शुक्ल पक्षमतिक्रम्य कार्तिकस्य विचारयेत् । गभोणा सम्भवं सम्यक् सस्यसम्पत्ति कारकम् ।।
वहत् सं. (गर्भलक्षणाध्याय) 6

क्षीयमाणे ततः सोमे ओषध्यो न प्रजज्ञिरे।।
वीरूदोषधयश्चैव बीजानि विविधानि च ।।
महा. भा. शल्य. पर्व. 35.64-71

वक्रानुवकं कृत्वा च श्रवणं पावकप्रभः । ब्रह्मराशिं समावृत्य लोहिताङ्गे व्यवस्थितः ।। सर्वसस्यपरिच्छन्ना पृथिवी सस्यमालिनी। पञ्चशीर्षा यवाश्चापि शतशीर्षाश्चशालयः ।। महा. भा. भीष्म पर्व. 3.18-19

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महाभारत तथा कृषि विज्ञान

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महाभारत तथा कृषि विज्ञान

पृथ्वी पर जीवन धारण करने के लिये जिस प्रकार वायु, जल आदि आवश्यक हैं। उसी प्रकार भूख शान्त करने के लिए भोजन आवश्यक है और यह भोजन मुख्य रूप से धान्य, कन्द, मूल, फल आदि कृषि द्वारा प्राप्त होते हैं, इस प्रकार कृषि अधिकृत प्रवर्तित विज्ञान ‘कृषि विज्ञान’ कहलाता है।

कृषि विज्ञान-सामान्य परिचय
mahabharat mai krishi

कृषि शब्द की व्युत्पत्ति कृष् धातु में विलेखन प्रत्यय के योग से हुई है, जिसका अर्थ है – विलेखन क्रिया। विलेखन को उत्कीर्ण, कर्षण, अपकर्षण भी कहा जाता है। अतः भूमि पर कर्षण द्वारा फसलों को उगाना, उनकी कटाई और पशुपालन आदि कृषि-विज्ञान के अन्तर्गत आते हैं। कृषि शब्द की व्युत्पत्ति के
आधार पर निम्नलिखित अर्थ स्पष्ट होते हैं

कृष्यते इति कृषिः, कृष्यतेऽनेनेति कृषिः कर्मसामान्यं कृषिः कर्षण क्रियायाः फलं कृषिः

शतपथ ब्राह्मण में कृषि को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया गया है –
अथैनं विकृषति, अन्नं वै कृषिः। तथा आदि पुराण के अनुसार,
कृषिभूकर्षणे प्रोक्ता।
. सं. वाङ् कृषि. विज्ञा. परिच्छेद पृ. 20 १ शत. ब्रा. 7.2.2.6
आदि. पु. 16.181

इस प्रकार कृषि का प्रारम्भ अनादि काल से माना गया है। इस क्षेत्र में निरन्तर विज्ञान के आधार पर विकास होते रहे हैं। यह विज्ञान वैदिक काल से लेकर उत्तर काल तथा आधुनिक काल तक निरन्तर विकास करता आया है।

महाभारत तथा कृषि विज्ञान
mahabharat mai krishi

महाभारत काल में कृषि विज्ञान अत्यन्त विकसित स्थिति में था। कृषि के महत्व से सभी परिचित थे तथा इस क्षेत्र में विकास हेतु अनेक कार्य महाभारत काल में किये गये। महर्षि व्यास ने कृषि को इस जगत् के जीवन का मूल माना है तथा राजा द्वारा उचित शासन व्यवस्था से इसका पालन-पोषण सम्भव बताया है।

इस सन्दर्भ में राजा के न होने पर प्रजा की हानि का उल्लेख करते हुए वसुमना तथा बृहस्पति के संवाद में वर्णन मिलता है। इसी प्रकार कृषि के प्रयोजन को अन्न की उत्पत्ति का आधार बताते हुए बृहस्पति द्वारा अन्न के महत्व का उल्लेख युधिष्ठिर के प्रति किया गया है। इस वर्णन से महाभारत में कृषि के महत्व का बोध होता है।

महाभारत में श्रीकृष्ण द्वारा गीता में कृषि के स्वरूप का उल्लेख किया गया है जिसमें अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव, ये पांच कर्म कृषि विज्ञान की दृष्टि
से अत्यन्त महत्वपूर्ण बताये गये हैं। यथा –

अधिष्ठान – कृषि की अधिष्ठात्री देवी ‘पृथ्वी’ हैं, जो सभी बीजों की प्रसवयित्री
और भूतधात्री हैं। इस सन्दर्भ में अथर्ववेद में भी वर्णन मिलता है।
वार्तामूलो ह्ययं लोकसय्या वैधार्यते सदा।
तत् सर्वं वर्तते सम्यग् यदा रक्षति भूमियः ।। महा. भा. शान्ति. पर्व. 68.35

प्राणा ह्यन्नं मनुष्याणां तस्माज्जन्तुश्च जायते।
अन्ने प्रतिष्ठितो लोकस्तस्मादन्नं प्रशस्यते।। सतां पन्थानमावृत्य सर्वपापैः प्रमुच्यते।। महा. भा. अनु. पर्व 112.11-23

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथकचेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ।। गीता. 18.14

यस्यामन्नं कृष्टयः सम्बभूव, यस्यामिदं जिन्वन्ति प्राणदेजत् सा नो भूमि: अथर्व. वे. 12.1.3
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कर्ता – कृषि कर्म का कर्ता बुद्धि कौशलयुक्त तथा कृषि तंत्र का जानकार होता है। धान्य उत्पादन के कारण ‘धान्यकृत’, कर्षण व्यापार से ‘कृषक तथा कृषि रूप वृत्ति से ‘कृषीवल और हल के मुख से भूमिगत कीट आदि जीवों का नाश करने से ‘कीनाश” कहलाता है।

करण – कृषि कर्म के साधन यथा – जल, बीज, हल आदि करण कहलाते

चेष्टा – क्षेत्रकर्षण, बीजवपन, फसल सींचना, धान्य निस्तृणीकरण धान्य लवन, मर्दन आदि कर्म चेष्टा कहलाते हैं।

दैव – कृषि की सिद्धि पर दैव प्रभाव निश्चित रूप से पड़ता है। यथा – इन्द्र, सूर्य, वायु, पर्जन्य, प्रजापति, पृथ्वी आदि दिव्य शक्तियां ग्रह नक्षत्र तथा काल आदि कृषि को प्रभावित करते हैं। ऋग्वेद के क्षेत्रपति सूक्त में दिव्य शक्तियों की स्तुति का उल्लेख मिलता है।

इस विवरण से स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में कृषि के सभी तत्त्वों का ज्ञान प्रचलित था। इसके अतिरिक्त महर्षि व्यास ने महाभारत में अनेक स्थानों पर कृषि विज्ञान से सम्बन्धित तथ्यों का उल्लेख किया है, जैसे – कृषि कर्माधिकारी, भूमि, कृषि-प्रक्रिया, सिंचाई के साधन, कृषि उपयोगी यंत्र, वपन क्रिया, कृषि संरक्षण, कृषि पर ज्योतिषीय प्रभाव आदि ।

महाभारत तथा कृषि कर्माधिकार
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भारतीय जीवन दर्शन का मूल आधार कर्म है। कर्म प्राणियों का स्वभाव है। महाभारत में गीता में कहा गया है कि जीव का प्रतिपल किया गया कर्म ही ठहरता

वपन्तो बीजमिव धान्यकृतः । ऋ. वे. 10.94.13 – कृषि पराशर 1.1 3 ऋ. वे. 8.6.4 * इरायै कीनाशम् – शुक्ल. यजु. वे. 30.11 5 ऋ. वे. 4.57
है।

इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का ज्ञान दिया है।’ महर्षि व्यास द्वारा में कृषि कर्म के अधिकारी को दो भागों में विभक्त किया गया है, यथा –

वर्णधर्म के अनुसार कृषि कर्म का अधिकार – महर्षि व्यास ने मनुस्मृति के नियम के आधार पर वर्णों को चार भागों में विभक्त किया है, यथा – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और इनमें वैश्य धर्म वालों को ही कृषि का अधिकारी माना है। इस सन्दर्भ में महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म द्वारा वैश्यों के कर्म का उल्लेख युधिष्ठिर के प्रति किया गया है,

जिसके अनुसार वैश्य का कार्य कृषि, गोरक्षा तथा व्यापार करना है। इसी प्रकार शान्ति पर्व में महर्षि भृगु ने भरद्वाज ऋषि के समक्ष यह वर्णन किया है कि कुछ ब्राह्मणों ने कृषि कर्म को अपनी जीविका चलाने की वृत्ति मान लिया था जिससे उनका रङ्ग पीला पड़ गया था,

अतः वे ब्राह्मण वैश्यभाव को प्राप्त हुए। इससे स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में वैश्य धर्म वाले ही कृषि कर्म के अधिकारी थे। इस सन्दर्भ में अर्थशास्त्र में वैश्यों को कृषि कर्म का अधिकारी बताया है। महर्षि वाल्मीकि ने भी रामायण के अयोध्याकाण्ड में वैश्य वर्ण को कृषि कर्म का अधिकारी माना है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संङोस्त्वकर्मणि।।
गीता. 2.47

वैश्यस्तु कृत संस्कारः कृत्वा दारपारिग्रहम् । वार्तायां नित्ययुक्तः स्यात्पशूनां चैवरक्षणे।। मनु. स्मृ. 6.326 3

करोति कर्म यद् वैश्यस्तद् गत्वा ह्युपजीवति ।
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यमकुत्सा वैश्यकर्मणि।। महा. भा. अनु. पर्व. 1359

गोभ्यो वृत्ति समास्थाय पीताः कृष्युपजीविनः। स्वधर्मान् नानुतिष्ठन्ति ते द्विजा वैश्यगतां गताः ।। महा. भा. शान्ति. पर्व. 188.12

कृषि पशुपाल्ये वाणिज्या च वार्ता। अर्थ. शा. 1.4.1
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कच्चित् ते दयिताः सर्वे कृषिगोरक्षजीविनः । वार्तायां संश्रितस्तात लोकोऽयं सुखमेधते।। वा. रा. अयोध्याकाण्ड 100.47

कृषि कर्म राजा का अधिकार – प्राचीन काल में प्रजा की रक्षा तथा पालन-पोषण करना राजा का कर्तव्य माना जाता था। अतः इस दृष्टि से उसे अपने
राज्य की कृषि व्यवस्था को भी उत्तम बनाने का प्रयास करना पड़ता था।
महाभारतकार ने अनेक स्थानों पर राजा के कर्तव्यों में कृषि की रक्षा, पोषण आदि का उल्लेख किया है।

इस सन्दर्भ में सभा पर्व में नारद मुनि द्वारा प्रश्नोत्तर शैली में युधिष्ठिर के समक्ष शासनोपदेश दिया गया है। जिसमें नारद मुनि ने राजा द्वारा कृषि व्यवस्था को संचालित करने वाले महत्वपूर्ण तत्त्वों का उल्लेख किया है।’ इस वर्णन से स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में कृषि व्यवस्था राजा के अधीन होती थी।

महाभारत तथा भूमि
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कृषि के सन्दर्भ में भूमि का विशेष महत्व है। यदि भूमि उपजाऊ होती है तभी उत्तम फसल होती है और यदि भूमि उपजाऊ न हो तो वह बंजर कहलाती है और इस पर फसल नहीं उत्पन्न होती है। यहां उपजाऊ भूमि से तात्पर्य ‘उर्वरा युक्त भूमि’ से है।

महाभारत के अनुशासन पर्व भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर के प्रति कृषि योग्य भूमि को श्रेष्ठ बताया गया है। इसके अनुसार प्रबल मिट्टी से युक्त अन्न उपजाने वाली तथा धातुओं से विभूषित भूमि उत्तम मानी गयी है। कृषि योग्य भूमि, जिसमें कुआं हो, बीज सहित फल लगे हों तथा जिसे हल से जोता गया हो, वह दान करने योग्य होती है। ऐसा दान करने वाला व्यक्ति जगत् में शुभ सम्पत्ति प्राप्त

कच्चिन्न चौरैर्लुब्धैर्वा कुमारैः स्त्रीवलेन वा। त्वया वा पीडयते राष्ट्र कच्चित् तुष्टाः कृषीवलाः।। वार्तायां संश्रितस्तात लोकोऽयं सुखमेधते।। महा. भा. सभा. पर्व. 5.77-81

सुप्रदर्शा बलवती चित्रा धातुविभूषिता। उपेता सर्वभूतैश्च श्रेष्ठा भूमिरियेच्यते ।। महा. भा. अनु. पर्व. 58.2

हलकृष्टां महीं दद्याद् यत्सबीजफलान्विताम् । सुकूपशरणां वापि सा भवेत् सर्वकामदा।। महा. भा. अनु. पर्व 145. पृ. 5998
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करता है, परन्तु ऊसर अथवा जली हुई भूमि दान नहीं करनी चाहिए। ऐसा उल्लेख ब्रह्मदेव द्वारा भूमि के महात्म्य के वर्णन में देवों के प्रति दिया गया है।’ महाभारत के शान्ति पर्व में भूमि की विशेषता के सन्दर्भ में मनु द्वारा बृहस्पति के प्रति कथन है कि जिस प्रकार भूमि में एक ही रस होता है तो भी उसमें जैसा बीज बोया जाता है उसी के अनुसार वह उसमें रस उत्पन्न करती है,

उसी तरह अन्तरात्मा से ही प्रकाशित बुद्धि पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार ही एक शरीर से दूसरे शरीर को प्राप्त होती है। यहां मनु द्वारा स्पष्ट कहा गया है कि भूमि में एक ही रस विद्यमान होत है फिर भी इससे भिन्न-भिन्न रसों से युक्त फसल उत्पन्न होती है। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास भूमि के महत्त्व तथा उसकी विशेषताओं से भली-भाँति परिचित थे।

महाभारत तथा कृषि प्रक्रिया
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शिव-शक्ति और शिवलिंग क्या है

प्राचीन काल से कृषि कर्म को श्रेष्ठ माना गया है। सम्पूर्ण कृषि प्रक्रिया का आधार वैज्ञानिक तकनीक है। कृषि प्रक्रिया के अन्तर्गत सर्वप्रथम भूमि को जोता जाता है फिर बीजारोपण होता है इसके बाद सिंचाई, निराई, कटाई आदि कार्य किये जाते हैं।

इस सन्दर्भ में महाभारत शल्य पर्व में ऋषियों द्वारा बलराम के समक्ष कुरूक्षेत्र के नामकरण का कारण बताते हुए कथन है कि पूर्व समय में अमित तेजस्वी राजर्षि प्रवर महात्मा कुरू ने इस क्षेत्र को बहुत वर्षों तक जोता था, इसी कारण इसका नाम ‘कुरूक्षेत्र’ पड़ा। यहां कृषि कर्म जोताई का उल्लेख किया गया

क्षेत्रभूमिं ददल्लोके शुभां श्रियमवाप्युयात् | रत्नभूमिं प्रदद्यात् तु कुलवंशं प्रवर्धयेत् ।। न चोषरा न निर्दग्धां महीं दद्यात् कथंचन । न श्मशान परीतां च न च पापनिषेविताम् ।। शल्य पर्व 66.31.32

यथा ह्येकरसा भूमिरोषध्यर्थानुसारिणी। तथा कर्मानुगा बुद्धिरन्तरात्मानुदर्शिनी।। महा. भा. शान्ति. पर्व. 206.5

पुरा च राजर्षिवरेण धीमता बहूनि वर्षाण्यामितेन तेजसा। प्रकृष्टमेतत् कुरूणा महात्मना ततः कुरूक्षेत्रमितीहपप्रथे।। महा. भा. शान्ति. पर्व 53.2

है। महर्षि व्यास ने श्रीमहेश्वर तथा उमा देवी के संवाद में कृषि की समस्त प्रक्रिया का विस्तृत विवेचन किया है इसके अनुसार श्री महेश्वर द्वारा जैव तथा मनुष्य दोनों से सम्पादित होने वाले कार्यों के सन्दर्भ में कथन है कि कृषि में जो जुताई, बोवाई, रोपनी, कटनी तथा ऐसे ही और भी जो कार्य देखे जाते हैं, वे सब मानुष कहे गये हैं।

दैव से उस कर्म में सफलता और असफलता होती है। इसमें बीज का रोपना और काटना आदि मनुष्य का काम है, परन्तु समय पर वर्षा होना, बुवाई का सुन्दर परिणाम निकलना, बीज में अङ्कुर उत्पन्न होना और शस्य का श्रेणीबद्ध होकर प्रकट होना इत्यादि कार्य देवसम्बन्धी बताये गये हैं। दैव की अनुकूलता से ही इन कार्यों का सम्पादन होता है। यहां व्यास द्वारा कृषि की सम्पूर्ण प्रक्रिया का विवेचन किया गया है।

कृषि प्रक्रिया में निराई विधि अत्यन्त महत्वपूर्ण मानी जाती है। इससे खेती की उपज काफी बढ़ जाती है। इस विधि में किसान खेत में व्यर्थ निकले घास तथा जङ्गली पौधे आदि को काटकर साफ कर देता है। इस विधि का उल्लेख भीष्म, युधिष्ठिर के समक्ष क्षत्रियों के कर्तव्य के वर्णन में प्रकारान्तर से किया गया है। कृषि पराशर में भी निराई विधि को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। यथा
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निष्पन्नमपि यद्धान्यं न कृतं तृणविजतम्। न सम्यक् फलमाप्नोति तृणक्षीणा कृषिर्भवेत् ।। कुलीरभाद्रयोर्मध्ये यद्धान्यं निस्तृण भवेत। तृणैरपि तु सम्पूर्ण तद्धान्यं द्विगुणं भवेत्।।
लौकिकं तु प्रवक्ष्यामि दैवमानुषनिर्मितम् । कृषौ व दृश्यते कर्म कर्षणं वपनं तथा।।
एवमादि तु यच्चान्यत् तद् दैवतमिति स्मृतम् ।। महा. मा. अनु. पर्व. 145 पृ.

यथैव क्षेत्रनिर्याता निर्यात क्षेत्रमेव च। हिनस्ति धान्यं कक्षं च न च धान्यं विनश्यति ।।
एवं शस्त्राणि मुञ्चन्तो ध्नन्ति वध्याननेकधा। तस्यैषां निष्कृतिः कृत्स्ना भूतानां भावनं पुनः ।।
महा. भा. शान्ति पर्व 97.6-7

कृषि प्रक्रिया में वर्षा का अत्यधिक महत्व है क्योंकि वर्षा का जल नदी, तालाब, कुओं आदि के साथ-साथ भूमि को गहराई तक सींच देता है। इसी कारण प्राचीन काल में वैदिक ऋषि, मुनि आदि उत्तम वर्षा के लिए निरन्तर यज्ञ, हवन आदि का कार्य करते रहते थे।

महाभारत काल में भी कृषि के लिए वर्षा का जल अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता था। इस सन्दर्भ में शान्ति पर्व में पूजनी चिड़िया द्वारा ब्रह्मदत्त के प्रति कथन है कि जो किसान वर्षा के समय का विचार न करके खेत जोतता है उसका पुरूषार्थ व्यर्थ जाता है और उस जुताई से उसको अनाज नहीं मिल पाता।’

इस वर्णन के अनुसार किसान को उचित समय में (वर्षा को ध्यान में रखते हुए) कृषि करनी चाहिए। महाभारत के शान्ति पर्व में जाजलि तथा तुलाधार के मध्य वर्षा के महत्व तथा जल चक्र के विषय में संवाद मिलता है जिसमें तुलाधार का कथन है कि सूर्य से जल की वृष्टि होती है, वृष्टि से अन्न उपजता है और अन्न से सम्पूर्ण प्रजा जन्म और जीवन धारण करती है तथा यज्ञ भी अत्यन्त शुभदायी है।

इसी प्रकार कृषि पराशर द्वारा भी कृषि के सन्दर्भ में वर्षा का ज्ञान होना आवश्यक बताया गया है। सूर्य की किरणें वर्षा का सृजन करने वाली है इस सन्दर्भ में मत्स्य पुराण में वर्णन मिलता है। इस समस्त विवरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में कृषि प्रक्रिया अत्यन्त विकसित थी।
कृषि प्रक्रिया में उत्पन्न धान्य प्राणियों का आहार योग्य अन्न कहलाता है। मनुष्य अपने दैनिक आहार के लिये धान्य पर ही आश्रित है। कृषकों को धान्य की

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यस्तु वर्षमविज्ञाय क्षेत्रं कर्षति कर्षकः । हीनः पुरूषकारेण सस्यं नैवाश्नुते ततः ।। महा. भा. शान्ति पर्व 139.79

यज्ञात् प्रजा प्रभवति नभसोऽम्भ इवामलम् अग्नौ प्रास्ताहुतिर्तद्भन्नादित्यमुपगच्छति।। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः | तस्मात् सुनिष्ठिताः पूर्वे सर्वान् कामांश्च लेभिरे।। अकृष्टपच्या पृथिवी आशीर्भिर्नीरूधोऽभवन । महा. भा. शान्ति पर्व 263.11-12

वृष्टिमूलाकृषिः सर्वा वृष्टिमूलं च जीवनम् । तस्मादादौ प्रत्यत्नेन वृष्टिज्ञानं समाचरेत् ।। कृषि. परा. 10

अमृता जीवना सर्वा रश्मयो वृष्टि सर्जनाः। मत्स्य. पु. 128.20

पूर्वावस्था, फसल के प्रकार भूमि के अनुसार और धान्य के गुण तथा भेदों का सम्यक ज्ञान होना आवश्यक है। इस सन्दर्भ में महाभारत के अनुशासन पर्व में ब्रह्मदेव द्वारा वसिष्ठ के समक्ष बीज के विकास के क्रम का विस्तृत उल्लेख किया गया है।

महाभारतकार ने महाभारत में नाना प्रकार के धान्यों का उल्लेख अनेक स्थानों पर किया है। इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास द्वारा शुकदेव के प्रति वानप्रस्थ आश्रम की महिमा के वर्णन के प्रसङ्ग में धान, जौ, नीवार आदि अन्न का उल्लेख किया गया है।

इस सन्दर्भ में अनुशासन पर्व में राजा कुशिक तथा उनकी पत्नी द्वारा महर्षि च्यवन की सेवा में नाना प्रकार के अन्नों, फलों आदि द्वारा निर्मित व्यंजन लाये जाने का उल्लेख मिलता है जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस काल में कृषि द्वारा नाना प्रकार के धान्य होते थे।

इसी सन्दर्भ में शान्ति पर्व में अहिंसा की प्रशंसा करते हुए नारद मुनि द्वारा सांवा चावल, सूर्यपर्णी (जङ्गली उड़द) तथा शाक (सुवर्जला) आदि का उल्लेख किया गया है।
इस समस्त विवरण से ऐसा प्रतीत होता है कि महाभारत काल में कृषि प्रक्रिया अत्यन्त विकसित थी तथा इससे नाना प्रकार के धान्य प्राप्त किये जाते थे।
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बीजतो ह्यङ्करोत्पत्तिरङ्गकुरात् पर्णसम्भवः । पर्णान्नालाः प्रसूयन्ते नालात् स्कन्धः प्रवर्तते।। क्षेत्रबीजसमायोगात् ततः सस्यं समृद्धयते।। महा. भा. अनु. पर्व. 6.4-8

अफालकृष्टं ब्रीहियवं नीवारं विघसानि च। हवीषिं सम्प्रयच्छेत मखेष्वत्रापि पञ्चसु ।। महा. भा. शान्ति पर्व 244.7

मांसप्रकारान् विविधा शाकानि विविधानि च। वेसवारविकारांश्च पानकानि लघूनि च।।
सर्वमाहारयामास राजा शापभयात् ततः । महा. भा. अनु. पर्व 53.17-20

श्यामाकमशनं तत्र सूर्यपर्णी सुवर्चला। तिक्तं च विरसं शाकं तपसा स्वादुतां ग्राम ।। महा. भा. शान्ति पर्व 272.4

महाभारत तथा वपन
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बीज वपन कृषि विज्ञान का मेरूदण्ड कहलाता है। जिस प्रकार भारतीय संस्कृति में गर्भाधान संस्कार का विशेष महत्व है उसी प्रकार कृषि विज्ञान में बीज वपन का महत्व है। उत्तम कृषि का प्रथम संस्कार कर्षण तथा द्वितीय कर्म, वपन होता है। मनुस्मृति में कृषि करने वाले कृषक का प्रथम गुण ‘बीजनामुप्तिविद’ कहलाता है। ऋग्वेद में बीज की उत्पत्ति के लिये ‘वपन’ शब्द आया है। कृषि पराशर के अनुसार, भूमि में बीज वपन की दो विधियां हैं – (1.) वपन (2.) रोपण
संस्कृत वाङ्मय में अनेक ग्रन्थों में बीज के वपन के लिये निम्नलिखित बिन्दुओं का वर्णन मिलता है

वपन बीज संग्रह

बीजवपन काल

वपन विधि

अनुपयुक्त बीज

वपन बीज संग्रह – कृषि कर्म में बीज का संग्रह करना बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। कृषि विज्ञान के अनुसार वपन के लिये बीजों का संग्रह यथासमय कर लेना चाहिए। सामान्यतः फसल से प्राप्त अन्न को बाजार तथा घर में उपयोग हेतु निकालने के बाद थोड़ा अन्न के बीजों का संग्रह कर बचा लिया जाता है।

यही बीज बोकर नयी फसल उत्पन्न होती है। अतः बीज संग्रह अत्यन्त अनिवार्य है। इस सन्दर्भ में बीज के संग्रह को महत्वपूर्ण बताते हुए ब्रह्मदेव द्वारा नारायण के प्रति कथन है कि आप ही जगत् के सभी बीजों के संग्रहकर्ता हैं।
मनु. स्मृ. (मनवथमुक्तावली) 9.330 ऋ. वे. 10.64.13

धान्यबीजानां वपनं भवति काण्डबीजानां रोपणञ्च ।कृषि परा. 3.103 * देवानामपि देवस्त्वं सर्वविद्यापरायणः।। जगद्वीज समाहार जगतः परमो ह्यसि ।। महा. भा. अनु. पर्व. 13. पृ. 5488

महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के प्रति आपत्ति के समय राजा के धर्म का उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार धर्मज्ञ पुरूषों का कथन है कि मनुष्य को अपने भोजन के लिये संचित अन्न में से भी बीज बचाकर रखना चाहिए।’ इस सन्दर्भ में महर्षि व्यास द्वारा यह भी कथन मिलता है कि बीज से बीज की उत्पत्ति होती है। कृषि पराशर में भी बीज संग्रह का उल्लेख मिलता है, यथा

माघे वा फाल्गुने मासि सर्वबीजानि संहरेत् । शोषयेदातपे सम्यक् नेवाधो विनिधापयेत्।।१७५।।
(Krishi-paraashara) कृषिपराशर

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बीज वपन काल – कृषि विज्ञान के अनुसार वपन के लिये उपयुक्त काल वह है जिसमें उप्त बीज को वायु, जल, अग्नि द्वारा पोषण प्राप्त कर पृथ्वी गर्भ में धारण करती है। अतः सभी औषधियों का वपन काल और कृषिकाल ज्योतिष चक्र के अधीन होता है। कृषि वैज्ञानिक भी वपन काल के महत्व को स्वीकार करते हैं। इस

बीजं भक्तेन सम्पाद्यमिति धर्मविदोविदुः । अत्रैतच्छम्बरस्याहुमहामायस्य दर्शनम् ।। महा. भा. शान्ति पर्व 130.33

बीजाद् बीजं तथैव च ।। महा. भा. शान्ति पर्व 305.21

सन्दर्भ में महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के समक्ष पृथ्वी के दस गुणों का उल्लेख किया गया है, जिसमें से पृथ्वी का एक गुण बीज को अङ्कुरित करने की शक्ति है।

महाभारतकार ने महाभारत में अनेक स्थानों पर कथानक को स्पष्ट करने हेतु प्रकारान्तर से बीज वपन काल का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में द्रोण पर्व के कर्ण द्वारा कृपाचार्य के प्रति कथन है कि “शूरवीर वर्षाकाल के मेघों की तरह सदा गरजते हैं और ठीक ऋतु में बोये हुए बीज के समान शीघ्र ही फल भी देते हैं।

यहां महाभारतकार ने साङ्केतिक रूप में बीज वपन हेतु उचित काल का उल्लेख किया है। इसी प्रकार कर्ण पर्व में युधिष्ठिर द्वारा अर्जुन के प्रति क्रोधपूर्ण वचन है कि जिस प्रकार बोया हुआ बीज समय पर मेघ द्वारा की हुई वर्षा की प्रतीक्षा में जीवित रहता है, उसी प्रकार हम सभी ने तेरह वर्षों तक सदा तुम पर ही आशा लगाकर जीवन धारण किया है।

इस वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि महाभारत काल में कृषि कर्म में बीज वपन काल को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता था। महाभारतकार ने कथानक के प्रवाह में अनायास ही कृषि सम्बन्धित महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख कर डाला है।

इस सन्दर्भ में उद्योग पर्व में श्रीकृष्ण की यात्रा का उल्लेख वैशम्पायन द्वारा जनमेजय के प्रति किया गया है जिसमें अगहनी धान के मनोहर खेतों के लहलहाने का वर्णन मिलता है। जिससे यह प्रतीत होता है कि महाभारत काल में धान की फसल अगहन के मास में लगभग तैयार हो जाती थी।
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भूमेः स्थैर्य गुरूत्वं च काठिन्यं प्रसवार्यता। गन्धो गुरूत्वं शक्तिश्च संघातः स्थापना धृतिः ।। महा. भा. शान्ति पर्व. 255.3 2

शूरा गर्जन्ति सततं प्रावृषीव बलाहकाः ।। फलं चाशु प्रयच्छन्ति बीजमुप्तमृताविव। महा. भा. द्रोण, पर्व. 158.25

ॐ त्रयोदेशेमा हि समाः सदा वयं त्वामन्वजीविष्म धनंजयाशया।
काले वर्ष देवमिवोप्तबीजं तन्नः सर्वान् नरके त्वं न्यमज्जः।। महा. भा. कर्ण पर्व. 68.9

स शालिभवनं रम्यं सर्वसस्यसमाचितम् ।
सुखं परमधर्मिष्ठमभ्यगाद् भरतर्षभ।।। महा. भा. उद्यो. पर्व. 84.15

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महाभारत तथा पर्यावरण विज्ञान