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mahabharat physics bhag 2

mahabharat physics – bhaag 2

‘ यथा हि पुरूषः पश्येदादर्श मुखमत्मनः । एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले।।महा. भा. भीष्म पर्व 5.16 2 mahabharat physics – bhaag 2

यथाम्भसि प्रसन्ने तु रूपं पश्यति चक्षुष । तद्वत्प्रसन्नेन्द्रियत्वाज्ज्ञेयं ज्ञानेन पश्यति।।
तथेन्द्रियाकुलीभावे ज्ञेयं ज्ञाने न पश्यति ।।
महा. भा. शान्ति पर्व. 204 2-3

बहुप्रसादः सुस्वप्नो दर्पणोऽथ त्वमित्रजित् । वेदकारो मन्त्रकारो विद्वान् समरमर्दनः ।।’

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महाभारत के शान्ति पर्व में दर्पण, चश्मे, दूरबीन का उल्लेख मिलता है। इस सन्दर्भ में प्रजापति मनु, द्वारा महर्षि बृहस्पति के प्रति आत्मा के साक्षात्कार को स्पष्ट करते हुए कथन है कि जिस प्रकार शीघ्रगामी नौका पर बैठे हुए पुरूष की दृष्टि में पार्श्ववर्ती वृक्ष पीछे की ओर वेग से भागते हुए दिखाई देते हैं,

उसी प्रकार कूटस्थ निर्विकारी आत्मा बुद्धि के विकार से विकारवान सा प्रतीत होता है तथा जिस प्रकार “उपनेत्र” या “दूरबीन” से महीन अक्षर मोटा दीखता है और छोटी आकृति बहुत बड़ी दिखाई देती है, उसी प्रकार सूक्ष्म आत्मतत्त्व भी बुद्धि, विवेक समूह शरीर से संयुक्त होने के कारण शरीर के रूप में प्रतीत होने लगता है तथा जिस प्रकार स्वच्छ दर्पण में अपने मुख का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, उसी प्रकार शुद्ध बुद्धि में आत्मा के स्वरूप की झांकी उपलब्ध हो जाती है।

इस वर्णन में दर्पण के साथ-साथ उपनेत्र तथा दूरबीन का भी साङ्केतिक रूप में उल्लेख किया गया है। इस सन्दर्भ में नीलकण्ठ टीका में भी उपनेत्र तथा दर्पण का उल्लेख मिलता है। इस वर्णन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकार को भौतिक विज्ञान का गूढ़ ज्ञान था।

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उन्होंने सूक्ष्म तथा दूर स्थित वस्तुओं को देखने के सन्दर्भ में आधुनिक युग में प्रयुक्त होने वाले उपनेत्र (चश्मा) तथा दूर भी जैसे ही किसी यंत्र का उल्लेख साङ्केतिक रूप में यहाँ प्रस्तुत किया है। महा. भा. अनु. पर्व. 17.81 2

चलं यथा दृष्टिपथं परति सूक्ष्म महद् रूपमिवाभिभाति । स्वरूपमालोचयते च रूपं परं तथा बुद्धिपथं परैति।। – महा. भा. शान्ति पर्व 202.23 3

नन्वेवमपरिहार्यतवाद्वासनासंततेरलंमोक्षाशये…..सीलप्रपंच त्मना भाति । एवं यथारूपंस्व मुखप्रतिबिम्बस्वरूपस्व…… तत्र यथा उपनेत्रदर्पणयोरपायेऽक्षरस्थौल्यंमुखस्य दृश्यत्वं चापैत्येवंधी निग्रहेचितः सीलत्वं दृश्यत्वंचापैति । तदैव….. यायात्मज्ञानेयतितव्यमितिभावः ।। – महा. भा. शान्ति पर्व 202.23

लेंस (Lens)
लेंस कांच या किसी पारदर्शक पदार्थ से काटा गया एक ऐसा टुकड़ा होता है, जिसकी कम से कम एक सतह बहुत बड़े गोले (sphere) का हिस्सा होती है। अतः दो गोलीय पृष्ठों से घिरा पारदर्शी माध्यम लेंस (Lens) कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है –

1. उत्तल लेंस (Convex Lens)

2. अवतल लेंस (Concave Lens)

लेंसों का उपयोग प्रकाश को अपसारित करने (फैलाने) के लिए (Diverge) या अभिसारित (एकत्रित) (Converge) करने के लिए होता है। लेंसों में यह क्रिया अपवर्तन के प्रक्रम द्वारा होती है।

उत्तल लेंस (Convex Lens) – यह लेंस बीच में मोटा और किनारों पर पतला होता है। यह प्रकाशीय किरण को अभिसरित (Converge) करता है, इसलिए इसे अभिसारी लेंस (Converging Lens) भी कहते हैं।

उत्तल लेंस पर समानान्तर रूप से पड़ने वाली किरणें एक बिन्दु पर केन्द्रित हो जाती हैं, जिसे ‘फोकस’ कहते हैं। उत्तल लेंस एक अच्छे आवर्धी कांच (Magnifying glass) का काम करता है। इसके द्वारा सूर्य के प्रकाश को किसी कागज या घास-फूस पर केन्द्रित किया जाए तो अत्यधिक ऊष्मा के कारण उसमें अग्नि उत्पन्न हो जाती है।

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लेंस की अद्भुत शक्ति का ज्ञान प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में वर्णित है। महर्षि वेदव्यास ने शान्ति पर्व में उत्तल लेंस के गुणों से युक्त सूर्यकान्त मणि का उल्लेख किया है। जिस प्रकार उत्तल लेंस सूर्य की किरणों को अभिसारित करके एक ही बिन्दु पर केन्द्रित कर देता है।

उसी प्रकार सूर्यकान्त मणि भी सूर्य की किरणों को एक ही बिन्दु पर केन्द्रित कर देती है। अतः प्रयोगात्मक रूप में उत्तल लेंस सूर्य के प्रकाश को किसी कागज के तल पर एक ही बिन्दु पर केन्द्रित कर आग उत्पन्न कर देता है उसी प्रकार सूर्यकान्त मणि भी सूर्य के प्रकाश को केन्द्रित कर अग्नि उत्पन्न कर देता है।

महाभारत के शान्ति पर्व में राजा जनक तथा सुलभा का संवाद वर्णित है जिसमें राजा जनक उस पर दोषारोपण करते हैं तथा सुलभा युक्तियों द्वारा निराकरण करते हुए राजा जनक को अज्ञानी बताती है। इसी वार्तालाप में सुलभा ने राज जनक से उदाहरण देते हुए कहा –

“जैसे सूर्य की किरणों का सम्पर्क पाकर सूर्यकान्त मणि से आग प्रकट हो जाती है, परस्पर रगड़ जाने पर काठ से अग्नि का प्रादुर्भाव हो जाता है, इसी प्रकार पूर्वोक्त कलाओं के समुदाय से जीव जन्म ग्रहण करते हैं।’

इस वर्णन में सूर्यकान्तमणि को उत्तल लेंस के समान गुणों वाला बताया गया है अर्थात् जैसे उत्तल लेंस सूर्य की किरणों को केन्द्रित करके अग्नि उत्पन्न कर देता है उसी प्रकार सूर्यकान्त मणि भी आग प्रकट करता है। अतः ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में उत्तल लेंस (Convex Lens)
को सूर्यकान्तमणि के नाम से जाना जाता था।

महाभारत के शान्ति पर्व के दौ सौ सत्तासीवें अध्याय में सूर्यकान्तमणि के विषय में वर्णन मिलता है। इस सन्दर्भ में नारद मुनि द्वारा गालव मुनि के प्रति कथन है कि घमण्डी मूखों की कही हुई असार बातें उनके दूषित अन्तःकरण का ही प्रदर्शन कराती हैं, ठीक उसी तरह जैसे सूर्य सूर्यकान्तमणि के योग से अपने दाहक अग्निरूप को ही प्रकट करता है।

यहाँ नारदमुनि द्वारा सूर्य तथा सूर्यकान्तमणि दोनों के संयोग से ही अग्नि उत्पन्न होने का वर्णन किया गया है। महाभारत के शान्तिपर्व में महर्षि पञ्चशिख द्वारा महाराज जनक को उपदेश दिए जाने का वर्णन मिलता है जिसमें महर्षि पञ्चशिख ने नास्तिक मतों के निराकरणपूर्वक शरीर से भिन्न आत्मा की नित्य सत्ता का प्रतिपादन किया है।

इसी सन्दर्भ में सूर्यकान्त मणि की विशेषता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए महर्षि पञ्चशिख का कथन है कि जिस प्रकार वटवृक्ष के बीज में पत्र, पुष्प, फल, मूल

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‘ यथाऽऽदित्यान्मणेश्चापि वीरूद्भयश्चैव पावकः ।
जायन्त्येवं समुदयात् कलानामिव जन्तवः ।।महा. भा. शान्ति पर्व 320.126 – मूढानामवलिप्तानामसारं भाषितं बहु। दर्शयत्यन्तरात्मानमग्निरूपमिवांशुमान् ।।महा. भा. शान्ति पर्व 287.33

तथा त्वचा आदि छिपे होते हैं, जैसे गाय के द्वारा खायी हुई घास में से घी, दूध आदि प्रकट होते हैं तथा जिस प्रकार अनेक औषध द्रव्यों के पाक तथा अधिवासन करने से उसमें नशा पैदा करने वाली शक्ति आ जाती है,

उसी प्रकार वीर्य से ही शरीर आदि के साथ चेतनता भी प्रकट होती है। इसके अतिरिक्त जाति स्मृति, अयस्कान्तमणि, सूर्यकान्तमणि और बड़वानल के द्वारा समुद्र के जल का पान आदि दृष्टान्तों से भी देहातिरिक्त चैतन्य की सिद्धि नहीं होती।’

इस वर्णन में सूर्यकान्तमणि के सन्दर्भ में कहा गया है कि जैसे (कान्तमणि शीतल होकर भी सूर्य की किरणों के संयोग से आग प्रकट करने लगती है, उसी प्रकार वीर्य शीतल होकर भी रस और रक्त के संयोग से जठरानल का आविष्कार करता है।

यहाँ महर्षि पंचशिख ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सूर्य के संयोग से ही सूर्यकान्तमणि अग्नि प्रकट करता है। अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है महाभारत काल में उत्तल लेंस को सूर्यकान्त मणि के रूप में जाना जाता था। इस सन्दर्भ में न्यायदर्शन में भी उल्लेख मिलता है, यथा

अप्राप्यग्रहणं काचाभ्रपटलस्फटिकान्तरितोपलब्धेः ।।
न्यायदर्शनम् अ. ३.४६

रेतो वटकणीकायां घृतपाकाधिवासनम् । जातिः स्मृतिरयस्कान्तः सूर्यकान्तोऽम्बुभक्षणम् ।।
-महा भा. शान्ति पर्व 218.29

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सूर्यकान्तमणि द्वारा अग्नि उत्पन्न होने के सन्दर्भ में यास्काचार्य ने ‘निरूक्त’ में निम्नलिखित रूप में कहा है –

अथादित्यात्-प्रदीचिप्रथम समावृत्ते आदि कंसं वा मणि वा परिमृज्य प्रतिस्वरेयत्र गोभयमसंस्पर्शयन् धारयति, तत् प्रदीप्तते, सोऽयमेव सम्पचते।’

अर्थात् जब सूर्य ऊपर की ओर पहले लौटता है, तब यदि हम कंस या मणि (लेंस) को साफ करके उसके सामने प्रतिताप (फोकस) में उसे पकड़ रखें जहाँ सूखा गोबर उस कंस या मणि से बिना छुआये दूर पड़ा है, तब वह गोबर जल पड़ता है। इस वर्णन में सूर्यकान्त मणि को लेंस रूप में व्यक्त किया गया है।

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महाभारत तथा चुम्बकत्व (Magnetism)

एशिया माइनर के ‘मैगनीशिया’ नामक स्थान में लगभग छ: सौ ई.पू. कुछ ऐसे पत्थर पाये गए, जिनमें लोहे के छोटे-छोटे टुकड़ों को अपनी ओर आकर्षित करने के गुण विद्यमान थे। ये पत्थर लोहे के एक ऑक्साइड मैगनेटाइट (FesOA) के थे। चूंकि ये पत्थर मैगनीशिया नामक स्थान पर पाए गए, इसलिए इन्हें “मैगनेट” (Magnet) कहा जाने लगा।

मैगनेट का हिन्दी रूपान्तर शब्द “चुम्बक” कहलाता है। अतः कोई भी पदार्थ जिसमें लोहे को आकर्षित करने का गुण होता है चुम्बक (Magnet) कहलाता है और इस गुण को चुम्बकत्व (Magnetism) कहते हैं।

चुम्बक के गुणों का उल्लेख महाभारत में मिलता है। महर्षि व्यास ने महाभारत में चुम्बकत्व के गुणों का वर्णन अयस्कान्तमणि क रूप में किया है। महाभारत के शान्ति पर्व में गुरू-शिष्य के संवाद का उल्लेख करते हुए संसार चक्र
और जीवात्मा की स्थिति का वर्णन किया गया है,

जिसमें गुरू द्वारा शिष्य के प्रति कथन है कि जिस प्रकार लोहा अचेतन होने पर भी चुम्बक की ओर खिंच जाता है, उसी प्रकार ही शरीर के उत्पन्न होने पर प्राणी के स्वाभाविक संस्कार तथा अविद्या, काम, कर्म आदि दूसरे गुण उसकी ओर खिंच जाते हैं। इस वर्णन में चुम्बक के
निरूक्त अ.-7, पाद-6, mahabharat physics science bhaag2

अभिद्रवत्ययस्कान्तमयो निश्चेतनं यथा। स्वभावहेतुजा भावा यद्वदन्यदपीदृशम् ।।महा भा. शान्तिपर्व 211.3

चुम्बकत्व गुण का उल्लेख किया गया है। अतः इससे यह प्रतीत होता है कि महाभारत काल में लोगों को चुम्बक के गुणों का ज्ञान था। महर्षि व्यास ने चुम्बक को ‘अयस्कान्तमणि’ के नाम से सम्बोधित किया है।

ऐसा इसलिए कहा जा सकता है कि अयस्कान्तमणि तथा चुम्बक के गुण समान हैं। इस सन्दर्भ में महाभारत के शान्ति पर्व में महर्षि पञ्चशिख द्वारा महाराज जनक को उपदेश दिए जाने का वर्णन मिलता है जिसमें महर्षि पञ्चशिख ने नास्तिक मतों के निराकरण पूर्वक शरीर से भिन्न आत्मा की नित्य सत्ता का प्रतिपादन किया है।

महर्षि पञ्चशिख ने अयस्कान्तमणि का उदाहरण देते हुए राजा जनक से कहा है

रेतो वट कणीकायां घृतपाकाधिवासनम् । जातिः स्मृतिश्यस्कान्तः सूर्यकान्तोऽम्बुभक्षणम्।।’
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इस श्लोक के अनुसार शरीर से भिन्न आत्मा की सत्ता मानने की कोई आवश्यकता नहीं है इसके लिए अयस्कान्त मणि (चुम्बक) का उदाहरण दिया गया है कि जैसे अयस्कान्तमणि जड़ होकर भी लोहे को खींच लेती है,

उसी प्रकार जड़ शरीर भी इन्द्रियों का संचालन और नियंत्रण कर लेता है, अतः आत्मा उससे भिन्न नहीं है। इस श्लोक से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में चुम्बक (अयस्कान्तमणि) के गुणों से विद्वान्, मनीषी आदि भली-भाँति परिचित थे।

वैशेषिक दर्शन में चुम्बक (अयस्कान्त) क उल्लेख मिलता है। इस दर्शन की व्याख्या रूप में प्रस्तुत ‘वैशेषिक सूत्रोपस्कारः’ नामक पुस्तक के 5वें अध्याय में कहा गया है –

मणिगमनं सूच्यभिसर्पणमदृष्टकारणकम् ।।

अर्थात् चोर के पास अभिमंत्रितमणि, कांसे का कटोरा इत्यादिकों का पहुंचना तथा लोह चुम्बक के पास सुई इत्यादि को लोहा का पहुंचना यह सब क्रिया अदृष्ट
महा भा. शान्ति पर्व 218.29 2

से होती है। इस सन्दर्भ में ‘रस वर्णव’ नामक ग्रन्थ में चुम्बक का उल्लेख निम्नवत् प्राप्त होता है, यथा-

Varieties Of Magnets

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मामकं चुम्बकं चैव कर्षकं दावकं तथा। एवं चतुर्विधं कान्तं रोमकान्तं च पञ्चमम्।। एकद्धित्रिचतुः पञ्चसर्वतोमुखमेचतत। पीतं कृष्णं तथा रतं त्रिवर्ण स्यात् पृथक् पृथका

इस समस्त विवरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकार द्वारा जिस अयस्कान्तमणि का उल्लेख किया गया है वह चुम्बक का ही रूप है। यद्यपि उपर्युक्त कुछ प्राचीन विद्वानों ने अयस्कान्तमणि का अक्षरशः नामोल्लेख तो नहीं किया है किन्तु साङ्केतिक रूप से अवश्य स्पष्ट किया है।

महाभारत तथा गति (Motion)

सामान्यतः मनुष्य अपने चारों ओर वस्तुओं में समय के साथ-साथ परिवर्तन देखता है तथा कुछ को अपने स्थान पर ही स्थित देखता है। जैसे – जाती हुई गाड़ी, रेलगाड़ी आदि तथा मेज पर रखी पुस्तक आदि।

इससे स्पष्ट होता है कि वस्तुएं या तो स्थिर होती हैं या गतिमान। प्रत्येक गतिमान वस्तु में चाल होती है आधुनिक भौतिक विज्ञान के अनुसार, किसी गतिमान वस्तु के स्थिति परिवर्तन की दर अर्थात् 1 सेकेण्ड में चली गई दूरी को उस वस्तु की ‘चाल’ होती हैं।

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चाल = दूरी समय

यह एक अदिश राशि है। इसका मात्रक मीटर/सेकेण्ड है।
महाभारत में महर्षि व्यास ने अनेक स्थानों पर चाल का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में अर्जुन, युधिष्ठिर से अपने तथ निवातकवचों के मध्य युद्ध का वर्णन सुनाते हुए अपने अश्वों की चाल के विषय में कथन है कि सारथि से प्रेरित होकर

वे अश्व नाना प्रकार की चालें दिखाते हुए वायु के समान वेग से चलने लगे।’
इस वर्णन में चाल और वेग दोनों का उल्लेख है। यहा वेग से तात्पर्य है – गतिशील वस्तु के 1 सेकेण्ड में विस्थापन को उसका वेग कहते हैं,

वेग = विस्थापन/समय

यह एक सदिश राशि है। इसका मात्रक मीटर/सेकेण्ड है।
महाभारत के अनुशासन पर्व में भी चाल का वर्णन मिलता है। इस सन्दर्भ में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के समक्ष विपुल द्वारा गुरू की आज्ञा से दिव्य पुष्प लाने की कथा का वर्णन किया है।

इस वर्णन के अनुसार विपुल पुष्प लाने उस निर्जन वन में जाते हैं और वहां एक स्त्री-पुरूष के जोड़े को देखते हैं जो कुम्हार के चाक के समान एक दूसरे का हाथ पकड़कर घूम रहे थे। इस पर पुनः भीष्म का कथन है –

राजन् ! उनमें से एक ने अपनी चाल तेज कर दी और दूसरे ने वैसा नहीं किया। इस पर दोनों आपस में झगड़ने लगे। यहाँ भीष्म द्वारा चाल का उल्लेख किया गया

महाभारत के उद्योग पर्व में गति और वेग का वर्णन मिलता है। इस सन्दर्भ में भीम के बल तथा पराक्रम का वर्णन करते हुए धृतराष्ट्र द्वारा शोकमग्न हो संजय के प्रति कथन है कि “उसका आक्रमण दुःरूह है। उसकी गति को कोई रोक नहीं

मार्गान् बहुविधांस्तत्र विचेरूर्वातरंहसः।
सुसंयता मातलिना प्रमथ्नन्तदितेः सुतान् ।।
महा. भा. वन पर्व. 170.8

तत्रैकस्तूर्णमगनत् तत्पदे च विवर्तयन्
एकस्तु न तदा राजश्चक्रुतुः कलहं ततः।। – महा. भा. अनु. पर्व. 42.18

सकता। उसका वेग और पराक्रम तीव्र है।’ इसी प्रकार धृतराष्ट्र द्वारा अर्जुन के पराक्रम का वर्णन करते हुए कथन है कि जो एक वेग से पांच सौ बाण चलाता है तथा जे बाहुबल में कार्तवीर्य अर्जुन के समान है,

इन्द्र और विष्णु के समान पराक्रमी उस महाधनुर्धर पाण्डु नन्दन अर्जुन को मैं इस महासमर में शत्रु सेनाओं का संहार करता हुआ सा देख रहा हूँ। यहाँ महाभारतकार ने धृतराष्ट्र के वचनों में गति तथा वेग का उल्लेख किया है।

महर्षि व्यास वेग को भली-भाँति समझते थे अतः उन्होंने इसके बढ़ने की विधि का भी उल्लेख महाभारत में शल्य पर्व में किया है। संजय द्वारा धृतराष्ट्र से युधिष्ठिर द्वारा किए युद्ध के विषय में कथन है कि बल और प्रयत्न के द्वारा उसका वेग बहुत बढ़ गया था,

युधिष्ठिर ने उस समय मद्रराज का वध करने के लिए उसे घोर मंत्रों से अभिमंत्रित करके उत्तम मार्ग के द्वारा प्रयत्नपूर्वक छोड़ा था। इस वर्णन में वेग के बढ़ने की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है।

वेग, बल तथा प्रयत्न के द्वारा बढ़ता है जैसे – किसी गतिमान वस्तु पर और भी बल लगाया जाए तो उसकी गति में वेग परिवर्तन होगा और वह अधिक वेग से आगे बढ़ेगी। अतः यह भौतिक विज्ञान की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।

इससे स्पष्ट होता है कि महर्षि व्यास को भौतिक विज्ञान का वृहत् ज्ञान था।
महर्षि कणाद ने वैशेषिक दर्शन में गति (Motion) का स्पष्ट उल्लेख किया
है,

अविषह्यमनावार्य तीव्रवेगपराक्रमम् । पश्यामीवातिताम्राक्षमापतन्तं वृकोदरम्। – महा. भा. उद्यो. पर्व. 15 43 पृ.

क्षिपत्येकेन वेगेन पंच वाजश तानि यः । सदृशं बाहुलीर्येण कार्तवीर्यस्य पाण्डवम् । तमअर्जुनं महेष्वासं महेन्द्रोपेन्द्रविक्रमम् निहन्तमिव पश्यामि विमर्देऽस्मिन् महाहवे। महा. भा. उद्यो. पर्व 60 19-20

बलप्रयत्नादधिरूढ़वेगां मन्त्रैश्च घोरैरभिमंत्र्य यत्नात्। ससर्ज मार्गेण च तां परेण वधाय मद्राधिपतेस्तदानीम् ।। महा. भा. शल्य. पर्व.

संयोग-विभाग-वेगानां कर्म समानम्।
(वैशेषिकदर्शनम् -१.१.२०)

गुरुत्व-प्रयत्न-संयोगानाम् उत्क्षेपणम्
(वैशेषिकदर्शनम् -१.१.२१)

मणिगमनं सूच्याभिसर्पणम् अदृष्टकरणम्
(वैशेषिकदर्शनम् -५.१.२५)

इस समस्त विवरण से ऐसा प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास, महर्षि कणाद आदि प्राचीन विद्वान् महान वैज्ञानिक थे।

महाभारत तथा ध्वनि (Sound)

ध्वनि एक प्रकार की ऊर्जा है जिसका प्रभाव कानों पर पड़ता है। ध्वनि सदैव कम्पनों के कारण उत्पन्न होती है। ध्वनि के संचारण के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है। यह ठोस, द्रव तथा गैस सभी माध्यमों में चल सकती है। ध्वनि तरङ्गों द्वारा चलती है। यह तरङ्गे दो प्रकार की होती हैं –

अनुप्रस्थ तरङ्ग – वह तरङ्ग जिसमें माध्यम के कण तरङ्ग के चलने की दिश के लम्बवत् दिशा में कम्पन करते हैं, अनुप्रस्थ तरङ्ग कहलाती है। उदाहरण – वायलिन तथा सितार आदि की तनी हुई डोरियों में उत्पन्न तरङ्गे, जल की सतह पर चलने वाली तरङ्गे।

अनुदैर्ध्य तरङ्ग – वह तरङ्ग जिसमें माध्यम के कण तरङ्ग के चलने की दिशा के समान्तर कम्पन करते हैं अनुदैर्ध्य तरङ्ग कहलाती है। उदाहरण – वायु में चलने वाली ध्वनि तरङ्गे, स्प्रिंग में उत्पन्न तरङ्गे आदि। ये तरङ्गं ठोस, द्रव तथा गैस तीनों में उत्पन्न की जा सकती है।

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प्राचीन काल में विद्वान, ऋषि आदि ध्वनि के गुणों तथा प्रकारों से भली-भाँति परिचित थे। महर्षि व्यास ने भी महाभारत में अनेक स्थानों पर ध्वनि-विज्ञान का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में महाभारत के आदि पर्व में उग्रश्रवा ऋषि द्वारा गरूड़ चरित विषयक वृत्तान्त में समुद्र विस्तार का वर्णन करते हुए कथन है कि समुद्र तट पर तीव्र वेग से चलने वाली वायु झूले के समान समुद्र को चंचल कर रही थी जिससे क्षोभ और उद्वेग के कारण जल की लहरें बहुत ऊँची उठती थी

तथा मानो समुद्र सब ओर चंचल तरङ्गरूपी हाथों को हिला हिलाकर नृत्य सा कर रहा था। उसमें चन्द्रमा की वृद्धि तथा क्षय के कारण लहरें ऊँची उठती तथा उतरती थी जिसके कारण वह उत्ताल-तरङ्गों से व्याप्त जान पड़ता था।’ यहाँ महर्षि ने समुद्र में उत्पन्न होने वाली उत्ताल तरङ्गों का उल्लेख किया है

जिसे हम आधुनिक समय में ‘अनुप्रस्थ-तरङ्ग के नाम से सम्बोधित करते हैं। महर्षि व्यास ने समुद्र में उत्पन्न इन तरङ्गों का उल्लेख उद्योग पर्व में विदुर द्वारा धृतराष्ट्र के समझाने हेतु संवाद में तथा शान्ति पर्व में बुद्धि की श्रेष्ठता के विवेचन के सन्दर्भ में और द्रोण पर्व में संजय द्वारा युद्ध क्षेत्र के वर्णन के सन्दर्भ में किया है।’ अतः

वेलादोलानिलचलं क्षोभोद्वेगसमुच्छ्रितम् । वीचीहस्तैः प्रचलितैनृत्यन्तामिव सर्वतः । चन्द्रवृद्धि क्षयवशादुद्वर्तोर्मिसमाकुलम् । पांचजन्यस्य जननं रत्नाकरमनुत्तमम् ।।

महाभा. आदि पर्व 21.10-11 2 लेखाशशिनि भाः सूर्ये महोर्मिरिव सागरे। धर्मस्त्वयि तथा राजनितिव्यवसिताः पजाः ।।

महा. भा. उद्यो. पर्व. 87.3 3 सेयं भवात्मिका भावांस्त्रीनेतानतिवर्तते।
सरितां सागरो भर्ता महावेलामिवोर्मिमान् ।।

महा. भा. शान्ति पर्व 248.8

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इस उल्लेख से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में ध्वनि के गूढ़ रहस्यों का ज्ञान सर्वत्र स्वाभाविक रूप में फैला हुआ था।

दोलन गति (oscillatory Motion)

ध्वनि में दोलन गति (Oscillatory Motion) पायी जाता है। यदि कोई पिण्ड एक ही पथ पर किसी निश्चित बिन्दु के इधर-उधर आवर्ती गति करता है तो उसकी गति को “दोलन गति” कहते हैं।

उदाहरण – सरल लोलक की गति, दीवार घड़ी के लोलक की गति, झूले की गति आदि।
Polnit of suspension

इस सन्दर्भ में महाभारत में दोलन गति का उल्लेख मिलता है। महाभारत के
वन पर्व में वृहदश्व मुनि द्वारा युधिष्ठिर से नल के हृदय की दशा का वर्णन करते हुए कथन है कि “उस समय दुःखी राजा नल का हृदय मानो दुविधा में पड़ गया था। जैसे झूला बार-बार नीचे ऊपर आता जाता रहता है,

उसी प्रकार उनका हृदय कभी बाहर जाता, कभी सभा भवन में लौट आता था।” इस वर्णन में झूले की ऊपर-नीचे की गति का वर्णन किया गया है। इस गति के दोलन गति कहते हैं। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि इस श्लोक में वर्णित “दोलेव” शब्द का अर्थ ‘दोलन’ है

जिसे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महर्षि व्यास दोलन गति से भली-भाँति परिचित थे।

‘महारथशतवर्ती भूमिरेणूमिमालिनीम् । महावीर्यवतां संख्ये सुतरा भीरूदुस्तराम् ।। महा. भा. द्रो. पर्व. 14.17 2

द्विधेव हृदयं तस्य दुःखितस्याभवत् तदा। दोलेव मुहुरायाति याति चैव सभां प्रति।। महा. भा. वन पर्व 62.27

प्रतिध्वनि (Echo)

जब ध्वनि तरङ्गे दूर स्थित किसी दृढ़ वस्तु से टकराकर परावर्तित होती हैं तो इस परावर्तित ध्वनि को प्रतिध्वनि (Echo) कहते हैं। प्रतिध्वनि का दैनिक जीवन में बहुत उपयोग है। इसके द्वारा समुद्र की गहराई, कुओं की गहराई, वायुयान की ऊँचाई, स्वयं से पहाड़ आदि की दूरी ज्ञात की जाती है।

प्रतिध्वनि सुनने के लिए आधुनिक भौतिक विज्ञान के अनुसार श्रोता व परावर्तक तल के बीच की दूरी कम से कम सत्रह मीटर होनी चाहिए।

महाभारत में महर्षि व्यास ने अनेक स्थानों पर प्रतिध्वनित’ शब्द का प्रयोग किया है। इस सन्दर्भ में वन पर्व में वृहदश्व मुनि, द्वारा युधिष्ठिर से ऋतुपर्वा के रथ का वर्णन करते हुए कथन है कि –

“भीम के अनुरोध से राजा ऋतुपर्ण ने अपने स्थ की घर्घराहट द्वारा सम्पूर्ण दिशा-विदिशाओं को प्रतिध्वनित करते हुए कुण्डिनपुर में प्रवेश किया।” इस वर्णन में राजा ऋतुपर्ण ने अपने स्थ की घर्घराहट से सम्पूर्ण दिशा-विदिशाओं को प्रतिध्वनित किया अर्थात् रथ से निकलने वाली ध्वनि दिशा-प्रतिदिशाओं से परावर्तित होकर सर्वत्र गुञ्जायमान हो रही थी।

अतः ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकार प्रतिध्वनि के नियम से भली-भाँति परिचित थे। इस सन्दर्भ में महाभारत के आदि पर्व में वैशम्पायन ऋषि द्वारा राजा जनमेजय से भरत (दुष्यन्त पुत्र) के चक्र का वर्णन करते हुए कथन है कि महात्मा राजा भरत का विख्यात चक्र सब ओर घूमने लगा। वह अत्यन्त प्रकाशमान दिव्य और अजेय था।

वह महान चक्र अपनी भारी आवाज से सम्पूर्ण जगत् को प्रतिध्वनित करता चलता था। इस वर्णन से स्पष्ट हो रहा है कि राजा भरत का चक्र भारी आवाज (ध्वनि) उत्पन्न करता था जोकि समस्त जगत् को प्रतिध्वनित करता चलता

स भीमवचनाद् राजा कुण्डिनं प्राविशत् पुरम् । नादयन् रथघोषेण सर्वाः स विदिशो दिशः।। महा. भा. वन पर्व. 73.2

तस्य तत् प्रथितं चक्रं प्रावर्तत महात्मनः | भास्वरं दिव्यमजितं लोकसंनादनं महत।। महा. भा. आ. पर्व 74.127

था अर्थात् उस चक्र की ध्वनि उसके आस-पास की वस्तुओं से टकराकर परावर्तित हो जाती थी। जिसके कारण वह प्रतिध्वनित करता हुआ आगे चलता था। अतः यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस काल में ध्वनि के विज्ञान से विद्वान तथा सामान्य सभी लोग भली-भाँति परिचित थे।

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महाभारत तथा ऊष्मा (Heat)

ऊष्मा वह भौतिक कारण है जिसके द्वारा गर्मी अथवा ठण्डक का आभास होता है। वास्तव में ऊष्मा एक प्रकार की ऊर्जा है, अर्थात् इसमें कोई भार अथवा द्रव्य नहीं होता है। किसी वस्तु में ऊष्मा विद्यमान होने पर वह वस्तु गर्म प्रतीत होती है तथा ऊष्मा निकल जाने पर ठंडी प्रतीत होती है।

प्राचीन काल में ही मनुष्य इस बात को स्पष्ट रूप से समझ गया था कि दो वस्तुओं को रगड़ने से ऊष्मा उत्पन्न होती है। पाषाण काल में आदिमानव ने दो पत्थरों को रगड़कर ऊष्मा उत्पन्न की जिससे उसे आग, (गर्म) का ज्ञान हुआ। दैनिक जीवन में यह प्रायः देखा जाता है कि “यांत्रिक कार्य करने में ऊष्मा उत्पन्न होती है।” जैसे – हथौड़े से कील ठोंकने पर कील का गर्म होना आदि।

ऊष्मीय ऊर्जा को निम्नलिखित रूप से स्पष्ट किया जा सकता है – किसी गर्म वस्तु को किसी ठण्डी वस्तु के सम्पर्क में लाने पर उनमें तापान्तर के कारण ऊष्मीय-ऊर्जा गर्म वस्तु से ठण्डी वस्तु की ओर प्रवाहित होने लगती है।

महर्षि व्यास ने महाभारत में ऊष्मीय ऊर्जा को स्पष्ट रूप से समझाने का प्रयास किया है। इस सन्दर्भ में वन पर्व में शौनक ब्राह्मण ने राजा जनक के द्वारा पूर्वकाल में कहे हुए वचनों को युधिष्ठिर के समक्ष पुनः दोहराते हुए कहा कि –

मन में दुःख होने पर शरीर भी संतप्त होने लगता है, ठीक वैसे ही, जैसे तपाया हुआ लोहे का गोला डाल देने पर घड़े में रखा हुआ शीतल जल भी गरम हो जाता है।’

मानसेन हि दुःखेन शरीरमुपतप्यते।
अयः पिण्डेन तप्तेन कुम्भसंस्थमिवोदकम् । महा. भा. वन पर्व 2.25

इस वर्णन के अनुसार तपाया हुआ लाहे का गोला घड़े के शीतल जल में डाल दिये जाने पर उसे गर्म कर देता है। यहाँ ऊष्मा गर्म वस्तु से ठंडे जल में जा रही है जिससे ऊष्मीय ऊर्जा का स्थानान्तरण हो रहा है।

अतः ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि ऊष्मीय ऊर्जा के स्थानान्तरण के प्रक्रिया का ज्ञान महाभारतकार को भली-भाँति था। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि महाभारत काल में भौतिक विज्ञान अपने उत्कर्ष पर था।

महाभारत तथा विद्युत् (Electricity)
भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में विद्युत् (Electricity) की खोज तथा निर्माण सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी गई है। दैनिक जीवन में यह बहुत उपयोगी सिद्ध होती है। रात्रि-काल में जब सूर्य का प्रकाश नहीं होता तो इस विद्युत् के द्वारा ही
समस्त वस्तुएं प्रकाशित होकर स्पष्ट दिखाई देती हैं।

विद्युत् का ज्ञान आधुनिक युग में ही नहीं वरन् प्राचीन वैदिक काल से विद्वानों को भलीभाँति रहा है। जिस तरह वर्तमान समय में लोग विद्युत् के प्रकाश से रात्रि में सर्वत्र प्रकाश फैलाते हैं तथा सजावट आदि के लिए भी प्रयोग करते हैं

उसी तरह प्राचीन वैदिक काल में भी लोग विद्युत् का प्रयोग करते थे। इसका उल्लेख धर्मग्रन्थों में कई स्थानों पर मिलता है। प्राकृतिक रूप से वायुमण्डल में भी विद्युत् पायी जाती है जो वर्षाकाल में मेघों द्वारा उत्पन्न होती है। विद्युत् का प्रयोग ‘महाभारत’ काल में भी किया जाता था।

वायुमण्डलीय विद्युत् (Atmospheric Electricity)

महाभारत के वन पर्व में महर्षि व्यास ने वायुमण्डलीय विद्युत् के उत्पन्न होने के वैज्ञानिक रहस्य का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में अष्टावक्रीयोपाख्यान महाभारत में मिलता है जिसमें राजा जनक तथा अष्टावक्र के मध्य शास्त्रार्थ हुआ है।

इस शास्त्रार्थ में राजा जनक ने अष्टावक्र से प्रश्न किया – “जो दो घोड़ियों की भाँति संयुक्त रहती हैं तथा जो बाज पक्षी की भाँति हठात् गिरने वाली हैं, उन दोनों के गर्भ को देवताओं में से कौन धारण करता है तथा वे दोनों किस गर्भ को उत्पन्न
करती हैं ? mahabharat physics science bhaag2

अष्टावक्र ने उत्तर दिया – राजन् ! वे दोनों तुम्हारे शत्रुओं के घर पर भी कभी न गिरे। वायु जिसका सारथि है, वह मेघरूप देव ही इन दोनों के गर्भ को धारण करने वाला है और ये दोनों उस मेघ रूप गर्भ को उत्पन्न करने वाले हैं।
इस वर्णन के अनुसार भाव यह है कि दो तत्त्व, जिनको वैदिक भाषा में रयि और प्राण के नाम से जाना जाता है।

इन्हें अंग्रेजी भाषा में (Positive) धनात्मक तथा (Negative) ऋणात्मक कहते हैं, ये स्वभाव से संयुक्त रहने वाले हैं। इनका ही व्यक्त रूप ‘विद्युत् शक्ति’ कहलाता है। उसे मेघ गर्भ के रूप में धारण करते हैं। परस्पर मेघों के संघर्ष के कारण विद्युत् प्रकट होती है और आकर्षण होने पर बाज की भाँति गिरती है।

जहाँ यह बिजली (विद्युत्) गिरती है वहां सब कुछ भस्म कर देती है, इसलिये यहाँ कहा गया है कि वह कभी आपके शत्रुओं के घर पर भी न पड़े। इन दो तत्त्वों की संयुक्त शक्ति से ही मेघ की उत्पत्ति होती है इसलिए यह कहा गया है कि उस मेघरूप गर्भ को ये (विद्युत्) उत्पन्न करते हैं।
यहाँ वायुमण्डलीय विद्युत् (Atmospheric Electricity) का उल्लेख किया गया है।

अतः ऐसा प्रतीत होता है कि अष्टावक्र को मेघ द्वारा उत्पन्न विद्युत् की वैज्ञानिक प्रक्रिया का पूर्ण ज्ञान था तभी उन्होंने धनात्मक (+) तथा ऋणात्मक (-) आवेश से संयुक्त होने तथा इनसे विद्युत् उत्पन्न होने की वैज्ञानिक घटना का स्पष्ट वर्णन किया है।

आधुनिक युग में भी वैज्ञानिक वायुमण्डलीय विद्युत् के रहस्यों आदि का पता लगाने में लगे हुए हैं। सन् 1708 ई. में ब्रिटेन के विलियम वॉल (William Wal) नामक वैज्ञानिक ने यह बताया कि बादलों में बिजली का चमकना उच्च पैमाने पर एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके अनुसार यदि एक विद्युत आवेशित वस्तु को एक चालक के पास लाकर निरावेशित (Discharge) किया जाए तो दोनों के बीच एक

वऽवे इव संयुक्ते श्येनपाते दिवौकसाम् । कस्तयोर्गर्भमाधत्ते गर्भ सुषुवतुश्च कम् ।। मा स्म ते ते गृहे राजच्छात्रवाणामपि ध्रुवम् । वातसारथिरागन्ता गर्ने सुषुवतुश्च तम् ।। महा. भा. वन पर्व 133.26-27

चिंगारी पैदा होती है। इसके पचास वर्ष बाद बेंजामिन फ्रेंकलिन (Benjamin Franklin) नामक अमरीकन आविष्कारक ने बादलों में बिजली चमकने की क्रिया को एक प्रयोग द्वारा सिद्ध किया।’

अतः इस वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि वैज्ञानिक फ्रैंकलिन (Benjamin Franklin) ने वायुमण्डलीय विद्युत् के लिए जो सिद्धान्त बताया, उसका उल्लेख महाभारत में बहुत पहले ही किया जा चुका है। अतः यह कहा जा सकता है कि

महाभारत काल में भौतिक विज्ञान उन्नत स्थिति में था।
विद्युत् शक्ति का ज्ञान वैदिक काल में भी प्रचलित था। इसका उल्लेख वेदों में स्पष्ट रूप से मिलता है। ऋग्वेद में कहा गया है कि – इस संसार में तीन प्रकार का प्रकाश है –

एक सूर्य का, दूसरा बिजली का, तीसरा पृथ्वी में वर्तमान अग्नि का, उन तीनों को जो क्षत्रिय आदि जानें वे अक्षयराज करने को समर्थ होवें।’
इस विवरण से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वैदिक काल में विद्युत् शक्ति का पूर्ण ज्ञान ऋषियों को था। महर्षि अगस्त ने विद्युत् निर्माण की प्रक्रिया का उल्लेख अगस्त संहिता में किया है यथा –

संस्थाप्य मृण्मये पात्रे ताम्रपत्तं सुसंस्कृतम्। छादयेच्छिखिग्रीवेन चार्द्राभिः काष्ठपांसुभिः ।। दस्तालोष्टो निधातव्यः पारदाच्छादितस्ततः संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरूणसंज्ञितम्।।’

अर्थात् एक मिट्टी का पात्र (Earthen pot) लें, उसमें ताम्र पट्टिका (Copper Sheet) डालें तथा ‘शिखिग्रीवा’ डालें, फिर बी में गीली काष्ठ पांसुत्री रोचना वरूण त्रीरूत धून्त्रीणि मित्र धारयथो रजांसि | वावृधानावमंति क्षत्रियस्यानु व्रतं रक्षमाणावजुर्यम् ।।

ऋ. वे. 5.69.1 3
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लगाए, ऊपर पारा (Mercury) तथा दस्त लोष्ठ (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाने पर उससे मित्रावरूण शक्ति का उदय होगा।

इस श्लोक के आधार पर श्री होले तथा उनके मित्र ने प्रयोग किया, जिसके लिए ‘शिखिग्रीवा’ का अर्थ एक आयुर्वेदाचार्य के कथनानुसार मोर की गरदन के रङ्ग जैसा पदार्थ कापर सल्फेट (Cusos) का प्रयोग किया।

और उन्होंने इस आधार पर एक सेल बनाया और डिजिटल मल्टीमीटर द्वारा उसको नापा। उसका Open Curcuit Voltage था, 1.38 Volts और Short Circuit Current था 23 Milli amperes इस प्रयोग के सफल होने पर इस सेल का प्रदर्शन 7 अगस्त 1990 को स्वदेशी विज्ञान संशोधन संस्था नागपुर के चौथे वार्षिक सर्वसाधारण सभा में अन्य विद्वानों के सामने हुआ। जिसमें इस सेल के इलेक्ट्रिक सेल कहा गया।’

भारतीय वैज्ञानिक राव साहब वझे ने अगस्त संहिता तथा अन्य ग्रन्थों के आधार पर विद्युत् के विभिन्न प्रकार से उत्पत्ति के विषय में अलग-अलग नाम रखे हैं, यथा –

तड़ित – रेशमी वस्त्रों के घर्षण से उत्पन्न ।

सौदामिनी – रत्नों के घर्षण से उत्पन्न ।

विद्युत् – बादलों के द्वारा उत्पन्न ।

शतकुंभी – सौ सेलों या कुंभों से उत्पन्न ।

हृदनि – हृद या स्टोर की हुई बिजली।

अशनि – चुम्बकीय दण्ड से उत्पन्न ।’
इस वर्णन के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि प्राचीन काल से ही विद्युत् आदि शक्तियों का वृहत् ज्ञान प्राचीन ऋषियों, मुनियों को भली-भाँति था।

अतः महाभारत में महर्षि व्यास द्वारा वायुमण्डलीय विद्युत् का उल्लेख निराधार नहीं प्रतीत होता है क्योंकि वेदों में इसका उल्लेख अनेक स्थानों परा आया है।
महर्षि वेद व्यास ने महाभारत के अनेक पर्यों में वायुमण्डलीय विद्युत् का वर्णन किया है।

महाभारत के आदि पर्व में समुद्र मन्थन का उल्लेख मिलता है जिसमें उग्रश्रवा मुनि द्वारा भृगुनन्दन से मन्दराचल पर्वत द्वारा मथे गए समुद्र का वर्णन करते हुए कथन है कि उनकी आपस की रगड़ से बार-बार आग प्रकट होकर ज्वालाओं के साथ प्रज्जवलित हो उठी और जैसे बिजली नीले मेघ को ढंक ले, उसी प्रकार उसने मन्दराचल को आच्छादित कर लिया।’

इस वर्णन में महर्षि व्यास ने नीले मेघों में विद्युत् के उत्पन्न होने का उल्लेख किया है जिससे यह प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास को विद्युत् उत्पत्ति का पूर्ण
ज्ञान था।

इस सन्दर्भ में महाभारत के द्रोणपर्व में व्यास ऋषि ने अर्जुन द्वारा शिव भगवान की महिमा का वर्णन किया है, जिसमें शिव भगवान का एक नाम ‘विद्युत् बताया गया है।

महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म द्वारा परमात्मा की प्राप्ति के साधनों का वर्णन किया गया है, जिसमें भीष्म का युधिष्ठिर के प्रति कथन है कि कोई तो योग धारणा के द्वारा सगुण ब्रह्म की उपासना करते हैं और कोई उस परम देव का चिन्तन करते हैं,

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जो विद्युत् के समान ज्योतिर्मय और अविनाशी कहा गया है। इस वर्णन में विद्युत् के समान ज्योतिर्मय ईश्वर का स्वरूप बताया गया है। अतः इससे यह प्रतीत होता है कि महाभारत काल में लोग विद्युत् से भली-भाँति परिचित थे। विद्युत् के प्रकाश से ही सर्वत्र वस्तुएं स्पष्ट दिखाई देती है। अतः

विद्युत् ज्योतिर्मय तेषां संघर्षजश्चाग्निरर्चिभिः प्रज्वलन् मुहुः । विद्युद्भिरिव नीलाभ्रमावृणोन्मन्दरं गिरिम् ।। महा. भा. आदि पर्व

स वैरूद्रः स च शिवः सोऽग्निः सर्वश्चसर्ववित् । स चेन्द्रश्चैव वायुश्च सोऽश्विनौ च स विद्युत्ःः ।।
महा. भा. द्रोण पर्व 202.102 3

युक्तं धारणया सम्यक् सतः केचिदुपासते। अभ्यस्यन्ति परं देवं विद्युत्संशब्दिताक्षरम् ।। महा. भा. शान्ति पर्व 217.28

है। यहाँ विद्युत् के साथ ‘ज्योतिर्मय’ शब्द का प्रयोग प्रकाश के लिए ही किया गया इस समस्त विवरण से यह प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास को वायुमण्डलीय विद्युत की उत्पत्ति का वैज्ञानिक रहस्य ज्ञात था।

विद्युत् (Electric)
आधुनिक युग में विद्युत् बल्ब का प्रयोग विश्व के समस्त भागों में किया जा रहा है। यह विज्ञान की सर्वोत्तम उपलब्धि मानी जाती है क्योंकि इसके प्रकाश से
रात्रि का अन्धकार दूर हो जाता है।

विद्युत् बल्ब का सिद्धान्त – विद्युत् बल्ब वैद्युत धारा के ऊष्मीय प्रभाव पर आधारित है। किसी तार में विद्युत् धारा प्रवाहित करने पर उसमें ऊष्मा उत्पन्न होती है, जिसमें तार का ताप बढ़ जाता है तथा ताप बढ़ने पर वह श्वेत-तप्त होकर चमकने लगता है अर्थात् प्रकाश उत्पन्न होता है।
बल्ब में निर्वात या निष्क्रिय गैस भरने का कारण – विद्युत् बल्ब में निर्वात या निष्क्रिय गैस भरने के दो कारण हैं –

पीतल की टोपी
-सुचालक तार
निर्वात या
आर्गन गैस
-फिलामेन्ट

यदि बल्ब में वायु भरी हो तो बल्ब का तंतु गर्म होकर वायु की ऑक्सीजन से संयोग करके जल जाएगा। लेकिन बल्ब में वायु के स्थान पर नाइट्रोजन तथा आर्गन भरी होने से तंतु गर्म होकर जल नहीं पाता है क्योंकि ये अक्रिय गैस हैं।
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बल्ब में निर्वात रखने पर तन्तु का पदार्थ गर्म होकर वाष्पित हो जाता है और शीघ्र ही पतला होकर जल जाता है।

लेकिन आर्गन तथा नाइट्रोजन भर देने से तंतु के पदार्थ की वाष्पन की दर बहुत कम हो जाती है तथा बल्ब की आयु बढ़ जाती

इस वर्णन में विद्युत् बल्ब में विशेष रूप से निर्वात अक्रिय गैस के प्रयोग का उल्लेख किया गया है।

इससे निर्वात का विद्युत् बल्ब में विशेष महत्व परिलक्षित होता है, बिना निर्वात या अक्रिय गैस के विद्युत् बल्ब नहीं जल सकता।

विद्युत् बल्ब की इस वैज्ञानिक प्रक्रिया का उल्लेख महाभारत में मिलता है। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में अनेक स्थानों पर निर्वात में निरन्तर जलने वाली दीपक की लौ का उल्लेख किया है

जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि निर्वात् अर्थात् वायुरहित स्थान में निरन्तर दीपक की लौ जलना विद्युत् बल्ब के सिद्धान्त का ही एक रूप है।

इस विषय में महाभारत के शान्ति पर्व में युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण का संवाद मिलता है। जिसमें श्रीकृष्ण ध्यान मुद्रा में विराजमान है तभी युधिष्ठिर का श्रीकृष्ण की प्रशंसा करते हुए कथन है कि –

भगवन् ! देवदेव ! जैसे वायु शून्य स्थान में रखे हुए दीपक की लौ कांपती नहीं, निरन्तर एक सी जलती रहती है, उसी तरह आप भी स्थिर हैं, मानो पाषाण की मूर्ति हों।’

यहाँ स्पष्ट रूप से वायु रहित स्थान में दीपक की बिना कम्पन की बात कही गयी है। इसी प्रकार शान्ति पर्व के दो सौ छियालिसवें अध्याय में महर्षि व्यास ने परमात्मा की श्रेष्ठता तथा उसके दर्शन के उपाय आदि का उल्लेख अपने पुत्र शुकदेव के समक्ष किया है,

जिसमें उदाहरण रूप में विद्युत् बल्ब के सिद्धान्त के विषय में प्रकारान्तर से महर्षि व्यास का कथन है

कि – मनुष्य नींद के समय जैसे सुख से सोता है, सुषुप्ति के सुख का अनुभव करता है अथवा जैसे वायुरहित स्थान में जलता हुआ दीपक कम्पित नहीं होता, एक तार जला करता है, उसी प्रकार मन

यथा दीपो निवातस्थो निरिङ्गो ज्वलते पुनः । तथासि भगवन् देव पाषाण इव निश्चलः ।। महा. भा. शान्तिपर्व 48.6

कभी चञ्चल न हो, यही उसके प्रसाद का अर्थात् परम शुद्धि का लक्षण है।’ यहाँ निर्वात् में बिना कम्पित दीपक की बात कही गयी है।

इन वर्णनों के आधार पर यह प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास ने विद्युत् बल्ब के सिद्धान्त की ओर ही सङ्केत देते हुए यह बताया है कि निर्वात में प्रकाश की लौ निरन्तर जलती रहती है और इसी से प्रकाश निकलता है।

यहाँ यह बात स्पष्ट होती है कि जैसे विद्युत् बल्ब में निर्वात् या अक्रिय गैस होना आवश्यक है, तभी धारा प्रवाहित होने पर बल्ब का फिलामेण्ट तप्त होकर प्रकाशित होता है।

उसी प्रकार निर्वात् में दीप की लौ का जलना (विद्युत् बल्ब के सिद्धान्त पर) आधारित है।

वर्तमान समय में विद्युत् बल्बों का प्रयोग सर्वत्र दिखाई देता है। इसका आविष्कार अमेरिकी वैज्ञानिक थामस एल्वा एडिसन ने किया था।

उन्होंने मार्च 1878 ई. में विद्युत् बल्ब के निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया तथा लगभग 1200 प्रयोग के पश्चात् वह सफल हो पाया।

इस आविष्कार के लिए 1929 ई. में अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा एडीसन को सम्मानित भी किया गया।

महाभारत काल में भी विद्युत् बल्बों का प्रयोग प्रकाश हेतु किया जाता था। जैसे आधुनिक समय में त्यौहार या किसी कार्यक्रम आदि में घर की सजावट हेतु सर्वत्र बल्बों की कतारें लगाकर प्रकाशित किया जाता है

उसी प्रकार महाभारत काल में भी भवनों आदि की सजावट हेतु बल्बों को प्रकाशित किया जाता था।

इस सन्दर्भ में महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णन मिलता हैं। इस पर्व में वायुदेव ने कार्तवीर्य अर्जुन के समक्ष महर्षि उतथ्य की कथा का वर्णन किया है

जिसके अनुसार चन्द्रमा की पुत्री भद्रा के लिए महर्षि उतथ्य ही योग्यवर है ऐसा विचार कर चन्द्रमा ने उन्हें कन्यादान करने का निर्णय लिया तभी वायुदेव उनकी पुत्री भद्रा का अपहरण कर उसे वरूण लोक ले गए। जहाँ के रमणीय वातावरण के विषय में वायुदेव का कथन

लक्षणं तु प्रसादस्य यथा स्वप्ने सुखं स्वपेत् । निवाते वा यथा दीपो दीप्यमानो न कम्पते।। महा. भा. शान्ति पर्व 246.11

है कि जलेश्चर वरूण उस स्त्री को हरा कर अपने परम अद्भुत नगर में ले गए, जहाँ छः हजार बिजलियों का प्रकाश छा रहा था।’

इस वर्णन में वायुदेव ने छ: हजार बिजलियों के प्रकाश का उल्लेख किया है जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ये छ: हजार विद्युत् के बल्ब होंगे। कुछ लोग ‘षट्सहस्रशतहृदम्’ का अर्थ –

वहां छ: लाख तालाब शोभा पा रहे थे, ऐसा उल्लेख करते हैं, परन्तु ‘शतहृदा’ शब्द बिजली का वाचक है, अतः यहाँ विद्युत् के बल्ब को ही समझना उचित प्रतीत होता है।

अतः इससे यह प्रतीत होता है कि महाभारत काल में भी विद्युत् बल्बों द्वारा घर की शोभा बढ़ाई जाती थी। यह उस काल के भौतिक विज्ञान की उत्कृष्टता दर्शाता है।
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इस समस्त विवरण में महर्षि व्यास द्वारा भौतिक विज्ञान से सम्बन्धित सिद्धान्तों, नियमों तथा उनके पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग तत्कालीन भौतिक विज्ञान की उन्नत दशा का सशक्त प्रमाण प्रतीत होता है।

महर्षि व्यास द्वारा गुरूत्वाकर्षण बल, उत्क्षेप, मरीचिका, वर्ण-विक्षेपण, दर्पण, लेंस, चुम्बकत्व प्रतिध्वनि, विद्युत् आदि का उल्लेख किया गया है जोकि वैज्ञानिक दृष्टि से उचित तथा सैद्धान्तिक प्रतीत होते हैं।

अतः यह माना जा सकता है कि महाभारत काल में भौतिक विज्ञान का अत्यधिक विकास हो चुका था।

जलेश्वरस्तु हत्वा तामनयत् स्वं पुरं प्रति । परमाद्भुतसंकाशं षट्सहस्रशतहृदम्म हा. भा. अनु.

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mahabharat physics science – bhaag 1