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महाभारत तथा भौतिक विज्ञान
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आधुनिक युग का मानव प्रगतिशील हैं वह दिन-प्रतिदिन विकास के नये-नये स्रोतों की ओर अग्रसर है। इन सभी विकास के आयामों में भौतिक विज्ञान (Physics) का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

इस विज्ञान के द्वारा अनेक जीवनोपयोगी वस्तुओं का निर्माण किया गया है, यथा-रेडियो (Radio), दूरदर्शन (Television), गणना करने का यन्त्र (Calculator), विद्युत् यन्त्र (Electric-Ingine) विमान (Aeroplane) आदि। इस विज्ञान के द्वारा चिकित्सा, दूरसंचार तथा युद्ध आदि के क्षेत्र में अनेक अविष्कार किए गए हैं,

यथा-लेसर किरणों द्वारा उपचार, सङ्गणक (Computer), परमाणु बम (Atom Bomb) आदि। इस प्रकार दैनिक जीवन में भौतिक विज्ञान का महत्त्व स्पष्ट हो जाता है।
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भौतिक विज्ञान सामान्य परिचय

भौतिक विज्ञान (Physics), विज्ञान (Science) की शाखा है जिसमें ऊर्जा की विभिन्न स्वरूपों तथा द्रव्य से उसकी अन्योन्य क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।” विज्ञान की इस शाखा के द्वारा विकास के नये आयाम खुले हैं। आज समस्त विश्व नये-नये अविष्कार करके अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहा है। भौतिक विज्ञान की परिभाषा देते हुए में वर्णन मिलता है-

भौतिक विज्ञान का विस्तृत अध्ययन करने के लिए इसे निम्नलिखित क्षेत्रों में विभक्त किया जा सकता है

  • पदार्थ (Matter)- इसमें पदार्थ की तीनों अवस्थाओं (ठोस, द्रव, गैस) से निर्मित वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है।
  • बल (Force) इसमें गुरूत्वाकर्षण बल, उत्प्लावन बल आदि का अध्ययन किया जाता है।
  • प्रकाश (Light)- इसमें प्रकाश से सम्बन्धित घटनाओं जैसे- मरीचिका विक्षेपणादि का अध्ययन किया जाता है।
  • चुम्बकत्त्व (Magnetism)- इसमें चुम्बककीय शक्ति का अध्ययन किया जाता है।
  • गति (Motion)- इसमें गति के नियमों का अध्ययन किया जाता है।
  • ऊष्मा (Heat)- इसमें विद्युत् ऊर्जा का अध्ययन किया जाता है।
  • विद्युत् (Electricity) – इसमें विद्युत् की उत्पत्ति तथा प्रयोग का अध्ययन किया जाता है।
  1. ध्वनि (Sound)- इसमें ध्वनि की उत्पत्ति, प्रकार आदि का अध्ययन किया जाता है।
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महाभारत तथा भौतिक विज्ञान

प्राचीन भारतीय साहित्य में अमूल्य रत्नों का भण्डार है। इनमें ज्ञान-विज्ञान के गूढ रहस्य छिपे हुए हैं। प्राचीन कालीन विद्वानों तथा मन्त्रद्रष्टा ऋषियों ने अपने प्रज्ञाचक्षुओं के द्वारा ज्ञान के अपरिमित भण्डार को अलोकित किया है। अतः प्राचीन ग्रन्थों में भौतिक, रसायन, वनस्पति, गणित, भूगर्भ आदि विज्ञानों से सम्बद्ध विविध विषयों का उल्लेख मिलता है।

यथा- अश्व -शक्ति का द्योतक है इस सन्दर्भ में ऋग्वेद में वर्णन मिलता है।’ पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण शक्ति के विषय में प्रश्नोपनिषद में वर्णन मिलता है। इसी प्रकार प्राचीन परम्परा का अनुसरण करते हुए महर्षि व्यास ने महाभारत कालीन विज्ञान के महनीय तत्त्वों का उल्लेख महाभारत में किया है।

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महाभारत तथा पदार्थ

  • प्रत्येक मनुष्य के आस-पास के वातावरण में विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ पायी जाती हैं। ये वस्तुएँ पदार्थों से मिलकर बनी होती हैं जैसे-बाल्टी, प्लास्टिक और लोहे से बनी होती है, कुदाल-हथौड़ी लोहे तथा लकड़ी से बनी होती हैं, पुस्तक कागज से बनी होती हैं आदि। अतः इससे स्पष्ट होता है कि कोई वस्तु एक ही पदार्थ से बनी हो अथवा एक ही वस्तु कई पदार्थों से बनी हो सकती है।
  • संसार में प्रत्येक वस्तु जिस सामग्री से बनी होती है, उसे ‘पदार्थ’ कहते हैं। हवा, पानी, रेत का एक कण भी पदार्थ के उदाहरण हैं। इन सभी पदार्थों का कुछ द्रव्यमान होता है और ये कुछ स्थान घेरते हैं। पदार्थ को ‘द्रव्य’ भी कहा जाता है। विश्व में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जो पदार्थ से न बनी हो यहाँ तक कि सूर्य, चन्द्रमा, हवा पानी आदि सभी पदार्थ के ही उदाहरण हैं।
  • अंग्रेज वैज्ञानिक डॉल्टन के अनुसार सभी पदार्थ छोटे-छोटे कणों से मिलकर बने हैं। इन सूक्ष्म कणों को परमाणु कहते हैं। परमाणु अविभाज्य है अर्थात इनको तोड़ा नहीं जा सकता। पदार्थ की तीन अवस्थाओं का स्वरूप बताते हुए डॉल्टन ने कहा है

‘आ द्वाभ्यां हरिभ्यामिन्द्र या हया चतुर्भिराषङिभर्खमानः | अष्टाभिर्दशाभिः सोमपेयमयं सुतः सुमख मा मृधस्कः ।। ऋ.वे. 2.10.4 2

आदित्यो ह वै ब्रह्म प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुष प्राणमनुरक्षनः । पृथिव्या या देवता सैषा पुरूषस्य अपानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुया॑नः । – प्रश्नोप. 3.8

(1) जब परमाणुओं के मध्य आकर्षण बल बहुत अधिक होता है तब ठोस की रचना होती है। अतः ठोस का आकार निश्चित होता है।

(2) जब परमाणुओं के मध्य आकर्षण बहुत अधिक नहीं होता तथा वे इधर-उधर गति कर सकते हैं। इस स्थिति में द्रव की रचना होती है।

(3) तब परमाणु स्वतंत्रतापूर्वक गति करते हैं तब इस स्थिति में गैस की रचना होती है।

  • ठोस को गर्म करने पर द्रव्य का रूप उपस्थित हो जाता है इसे पिघलना (Melting) कहते हैं। जैसे-बर्फ का पानी में बदलना। द्रव को गर्म करने पर गैस की अवस्था में आना वाष्पन (Evaporation) कहलाता है, जैसे-द्रव का उबल कर गैस बनना।
  • इस वर्णन से यह समझा जा सकता है कि पदार्थ की तीन अवस्थाएँ ठोस, द्रव तथा गैस हैं। ये सभी अवस्थाएँ सूक्ष्म कणों (परमाणुओं) के आकर्षण पर निर्भर करती हैं।
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  • प्राचीन वैदिक युग में ऋषि, मुनि, प्रकृति तथा प्राकृतिक घटनाओं का प्रेक्षण करते थे और ध्यान से समाधिस्थ अवस्था में मनन तथा चिंतन द्वारा समझने का प्रयास करते थे। यह उनका सैद्धान्तिक तरीका था। जिसके आधार पर वह नये प्रेक्षण करके नई जानकारी प्राप्त करते थे। इन महत्त्वपूर्ण जानकारियों का उल्लेख प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में मिलता है। वेद, वेदाङ्गों, पुराणों तथा षड्दर्शनों आदि में भौतिक विज्ञान पर प्रकाश डाला गया है जो कि जड़, चेतन तथा जगत् के विभिन्न पहलुओं से सम्बन्धित है।
  • महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में भी भौतिक विज्ञान के तत्त्वों का अनेक स्थानों पर वर्णन किया है। महाभारत के शान्ति पर्व में राजा जनक तथा महर्षि वसिष्ठ का संवाद मिलता है। इस संवाद में क्षर-अक्षर तथा प्रकृति-पुरूष के विषय में राजा जनक की शङ्का का समाधान महर्षि वसिष्ठ द्वारा किया गया है। इस सन्दर्भ में
  • महर्षि वसिष्ठ द्वारा द्रव्य का उदाहरण देते हुए कथन है कि – जिस प्रकार बीज से बीज की उत्पत्ति होती है उसी प्रकार द्रव्य से द्रव्य, इन्द्रिय से इन्द्रिय तथा देह से देह की प्राप्ति होती है।’ इस वर्णन में महर्षि वसिष्ठ ने यह बतलाया है कि द्रव्य से द्रव्य की उत्पत्ति होती है अर्थात् पदार्थ से ही पदार्थ की प्राप्ति होती है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में पदार्थ के गुणों का ज्ञान महर्षियो को भली-भाँति था। महाभारत की नीलकण्ठ टीका में इस विषय में कहा गया है

ऐद्रियकं धातु सप्तकं बीजद्वीजांतर मिवाजायते न्ह्येकं कार्य बीज द्वयोत्पत्तिकमिति दृष्टमस्तीव्याशयवानाह द्रव्यादिति।’

  • महाभारत के शल्य पर्व में वैशम्पायन ने राजा जनमेजय से मङ्कणक मुनि का का चरित्र बताया है जिसके अनुसार भगवान शिव ने ब्राह्मण रूप धारण करके महर्षि मङ्कणक के भ्रम को दूर किया जिसके फलस्वरूप महर्षि मङ्कणक ने भगवान शिव की स्तुति करते हुए कहा है कि सम्पूर्ण देवता भी आपको यथार्थ रूप से नही जान सकते, फिर मैं कैसे जान सकूगाँ? संसार में जो-जो पदार्थ स्थित हैं वे सब आप में देखे जाते हैं। इस वर्णन में यह कहा जा सकता है कि ईश्वर (भगवान शिव) संसार के सभी पदार्थों में विद्यमान हैं। इससे प्रतीत होता है कि ईश्वर सम्पूर्ण पदार्थों में स्थित है जोकि तीन रूपों में पाया जाता है जैसे-ठोस, द्रव तथा गैस । इस पृथ्वी पर पदार्थ के विषय में प्राचीन काल से ही वैज्ञानिकों ने बहुत सी विचारधाराएँ व्यक्त की हैं।
  • अतः महर्षि व्यास ने महर्षि वसिष्ठ के वचनों द्वारा भगवान शिव के संसार के सभी कणों में स्थित होने की बात कहकर अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण का ही उल्लेख

द्रव्याद् द्रव्यस्य निर्वृत्तिरिन्द्रियादिन्द्रियं तथा। देहाद् देहमवाप्नोति बीजाद् बीजं तथैव च || – महा. भा. शान्ति पर्व. 305.21 2 महा. भा. शान्ति पर्व. 305.21.

देवैरपि न शक्यत्त्व परिज्ञातुं कुतोमया। त्वयि सर्वेस्म दृश्यन्ते भावा ये जगति स्थिताः । – महा. भा. शल्य पर्व. 38.52

किया है इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि समस्त पदार्थों (ठोस, द्रव, गैस) में ईश्वर का वास होता है।

  • महाभारत के शान्तिपर्व में व्यासमुनि ने अपने पुत्र शुकदेव को वैराग्य और धर्मपूर्ण उपदेश देते हुए सावधान किया है। इसी सन्दर्भ में महर्षि व्यास ने शुकदेव से कहा है – “दिन सब पदार्थों को प्रकाशित करता है और रात्रि उन्हें छिपा लेती है। ये सर्वत्र व्याप्त है और सभी वस्तुओं का स्पर्श करते हैं, अतः तुम इनकी वेला में सर्वदा अपने धर्म का ही पालन करो।’ इस वर्णन में यह स्पष्ट कहा गया है कि दिन सभी पदार्थों को प्रकाशित करता है और रात्रि उन्हें छिपा लेती है।
  • अर्थात् दिन के प्रकाश में पृथ्वी पर उपस्थित सभी पदार्थ (ठोस-द्रव-गैस) दृष्टिगोचर होते हैं। तथा रात्रि में सभी पदार्थ प्रकाश की अनुपस्थिति में दिखाई नहीं देते हैं। अतः यह प्रतीत होता है कि महाभारत काल में पदार्थ से जुड़े रहस्यों का ज्ञान सर्वत्र प्रचलित था।
  • आधुनिक वैज्ञानिकों का यह मानना है कि समस्त पदार्थ सूर्य की रोशनी में भलीभाँति दिखाई देते हैं। इस तथ्य से महाभारत कालीन विद्वान् भी परिचित थे। अतः महर्षि व्यास ने उद्योगपर्व में सूर्य को पदार्थों का अधिपति तथा संरक्षक बताया है।
  • इस सन्दर्भ में उद्योगपर्व में दुर्योधन द्वारा सेनापति के पद पर भीष्म पितामह की नियुक्ति के विषय में कथन है कि “जिस प्रकार किरणों वाले तेजस्वी पदार्थों के सूर्य, वृक्ष और औषधियों के चन्द्रमा, यक्षों के कुबेर, देवताओं के इन्द्र, पर्वतों के मेरू, पक्षियों के गरूड़, समस्त देवयोनियों के कार्तिकेय और वस्तुओं के अग्निदेव अधिपति तथा संरक्षक हैं (उसी प्रकार आप आप हमारी समस्त सेनाओं के अधिनायक और संरक्षक हो)।

अहर्निशेषु सर्वतः स्पृशत्सु सर्वचारिषु । प्रकाशगूढ़वृत्तिषु स्वधर्ममेव पालय ।।महा.भा.शान्तिपर्व. 321.56 2

रश्मिवतामिवादित्यो वीरूधामिव चन्द्रमाः । कुबेर इव यक्षाणां देवानामिव वासवः ।। पर्वतानां यथा मेरूः सुपर्णः पक्षिणां यथा। कुमार इव देवानां वसूनामिव हव्यवाट् ।। – महा. भा. उद्यो. पर्व 156.12-13

इस वर्णन से प्रतीत होता है कि समस्त पदार्थों के संरक्षक सूर्य हैं। अर्थात् सम्पूर्ण संसार में जो-जो पदार्थ उपस्थित हैं उन सभी पदार्थों के अधिपति तथा संरक्षक सूर्य हैं क्योंकि समस्त पदार्थ सूर्य के प्रकाश में ही स्पष्ट दिखाई देते हैं।

विज्ञान के ज्ञाताओं के अनुसार पदार्थ को ‘द्रव्य’ भी कहा गया है। महर्षि व्यास ने महाभारत में भी पदार्थ को द्रव्य नाम से सम्बोधित किया है। महाभारत के आदि पर्व में ज्वलनशील द्रव्यों का वर्णन मिलता है।

इस सन्दर्भ में दुर्योधन द्वारा लाक्षागृह के निर्माण हेतु पुरोचन को आदेश देते हुए कथन है कि “सन तथा राल आदि, जो कोई भी आग भड़काने वाले द्रव्य संसार में हैं, उन सबको उस मकान की दीवारों में लगवाना।

इस वर्णन में दुर्योधन ने ज्वलनशील द्रव्यों के उपयोग करने का आदेश पुरोचन को दिया है इससे यह प्रतीत होता है कि दुर्योधन को पदार्थ के गुणों तथा अवस्थाओं का भली-भाँति ज्ञान था क्योंकि उसने पुरोचन को संसार में पाई जाने वाले समस्त ज्वलनशील पदार्थों (सन, राल, घी, तेल, चर्बी आदि) का प्रयोग करने का आदेश दिया था।

यहाँ महर्षि व्यास ने पदार्थ को ‘द्रव्य’ नाम से सम्बोधित किया है।
महाभारत में महर्षि व्यास ने अनेक स्थानों पर द्रव्यों (पदार्थों) का उल्लेख किया है। उस काल में राजभवनों, सभाओं आदि का निर्माण विभिन्न द्रव्यों से किया जाता था।

महाभारत के सभा पर्व में नारद मुनि से ब्रह्माजी की सभा के विषय में प्रश्न करते हुए युधिष्ठिर का कथन है कि “ब्रह्मन् उन सभाओं का निर्माण किस द्रव्य से हुआ है। उनकी लम्बाई-चौड़ाई कितनी है ? ब्रह्माजी की उस दिव्य सभा में कौन-कौन सभासद उन्हें चारों ओर से घेरकर बैठते हैं ?”2

इस वर्णन में विशेष द्रव्यों (पदार्थों) से निर्मित ब्रह्मा की सभा के विषय में युधिष्ठिर नारद मुनि से प्रश्न करते हैं। यहाँ ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि

शणसर्जरसादीनि यानि द्रव्याणि कानिचित् ।
आग्नेयान्युत सन्तीह तानि तत्र प्रदापय || – महा. भा. आदि पर्व 143.9 2

किंद्रव्यास्ताः सभाः ब्रह्मन् किं विस्ताराः किमायताः । पितामहं च के तस्यां सभायां पर्युपासते।।। – महा. भा. सभा पर्व 6.16
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उस सभा के निर्माण में अनेक पदार्थ जैसे – लोहा, लकड़ी, सोना आदि प्रयोग किए गए होंगे। आधुनिक वैज्ञानिकों ने पदार्थ को तीन भागों में बाँटा है – ठोस, द्रव, गैस । परन्तु महाभारत में पदार्थों के मात्र दो भाग बताए गए हैं – शीत और उष्ण । महाभारत के अनुशासन पर्व में श्री महेश्वर द्वारा उमा से पदार्थों के दो भागों का वर्णन करते हुए कथन है कि “जगत् के सारे पदार्थ दो भागों में विभक्त हैं –

शीत और उष्ण (अग्नि और सोम)। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि महाभारत काल में पदार्थ को भागों में बाँटा गया था – अग्नि और सोम परन्तु आधुनिक वैज्ञानिकों ने इसे तीन भागों में ही बाँटा है।

महाभारत में उपलब्ध पदार्थों का उल्लेख निराधार नहीं है वरन् वैदिक काल में भी पदार्थों के रहस्यों का गूढ़ ज्ञान महर्षियों, मुनियों आदि को था। इस सन्दर्भ में ऋग्वेद में पदार्थ विद्या का उल्लेख विस्तृत रूप में मिलता है।

यथा –
आपो भूयिष्ठा इत्येको अब्रवीग्निभूपिष्ठ इत्यन्यो अब्रवीत्। वधर्यन्ती बहुभ्यः प्रैको अब्रवीदृता वदन्तश्चमसां अपिंशत।।’
ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में पदार्थों के गुणों का उल्लेख किया गया है यथा

ये चिद्धि त्वामृषयः पूर्व ऊतये जुहूरेड वसे महि। सा नः स्तोमा अभि गृणीहि राधसोषः शुक्रेण शोचिषो।।’

इस मन्त्रानुसार उषा अपने प्रकाश से समस्त पदार्थों को प्रकाशित करती हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि दिन में समस्त पदार्थ (ठोस-द्रव-गैस) आदि दृष्टिगत होते हैं परन्तु रात्रि में प्रकाश के अभाव में इन्हें देखना असम्भव है। इसलिए ऐसा

‘तदहं कथयिष्यामि श्रृणु तत्वं समाहिता। द्विविधो लौकिको भावः शीतमुष्णमिति प्रिये ।। – महा. भा. अनु. पर्व , – ऋ.वे. 1.16.9 3 ऋ. वे. 1.48.14 102

प्रतीत होता है कि पदार्थों के इन गुणों से प्राचीन वैदिक ऋषि भी अवगत थे। महाभारत के रचनाकार ने भी वेदों को आधार मानकर ही सर्वत्र पदार्थों का उल्लेख किया है। इस सन्दर्भ में ‘तैत्तिरीय उपनिषद में पदार्थ का वर्णन मिलता है, यथा- PHYSICS Origin Of Matter

तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाराः सम्भूतः । आकाशात् वायुः । वायोः अग्निः । अग्नेः आपः । अद्भ्यः पृथिवी।।

महाभारत तथा बल (Force) यह संसार परिवर्तनशील है। मनुष्य के आस-पास के वातावरण में परिवर्तन प्रायः होता रहता है। यह परिवर्तन अधिकांशतः बल के कारण होता है जैसे – किसी वस्तु को बल लगाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाना।

मनुष्य अपने दैनिक कार्यों में बल का प्रयोग करता रहता है। अतः ‘बल वह बाह्य कारण है जो किसी वस्तु पर लगाने पर वस्तु की गति में परिवर्तन करता है।” बल के महत्व को जानते हुए प्राचीन ऋषियों तथा मुनियों ने वेद, रामायण, महाभारत आदि में इसका उल्लेख किया है।

Science in Sanskrit, महाभारत के अनुशासन पर्व में बल को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया है। इस सन्दर्भ में भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर से परम शुद्धिदायक तीर्थों का वर्णन करते हुए कथन है कि “जैसे क्रियाहीन बल अथवा बलरहित क्रिया इस जगत् में कार्य का साधन नहीं कर सकती।

बल और क्रिया दोनों के संयुक्त होने पर ही कार्य की सिद्धि होती है, इसी प्रकार शरीर-शुद्धि और तीर्थ शुद्धि से युक्त पुरूष ही पवित्र होकर परमात्म प्राप्ति रूप सिद्धि प्राप्त करता है। अतः दोनों प्रकार की शुद्धि ही उत्तम मानी गयी है।

इस वर्णन में महर्षि व्यास ने बल तथा क्रिया को स्पष्ट करते हुए कहा है कि दोनों के संयुक्त होने पर ही कार्य की सिद्धि होती है। बल के द्वारा दैनिक कार्यों की सिद्धि प्रायः होती है। बल और क्रिया के द्वारा मनुष्य चलता, दौड़ता, उठता, बैठता आदि कार्य करता है।

महाभारत में बल का प्रयोग अधिकांशतः युद्ध आदि के वर्णन में किया गया है। जैसे – बल, पराक्रम आदि के द्वारा युद्ध में शत्रु पर विजय पाना आदि । महाभारत के कर्ण पर्व में दुर्योधन शल्य को शिव के विचित्र रथ का विवरण सुनाता है जिसमें ब्रह्मदेव से प्राप्त वर का दुरूपयोग करके दानवों के उपद्रवों सेव्याकुल देवता, शिव भगवान के समीप जाते हैं तो शिवजी उनसे कहते हैं कि –

“देवताओं ! मेरा ऐसा विचार है कि तुम्हारे सभी शत्रुओं का वध किया जाय, परन्तु मैं अकेला ही उन सबको नहीं मार सकता, क्योंकि वे देशद्रोही दैत्य बड़े बलवान हैं। अतः तुम सब लोग एक साथ सङ्घ बनाकर मेरे आधे तेज से पुष्ट हो युद्ध में उन शत्रुओं को जीत लो क्योंकि जो संगठित होते हैं वे महान् बलशाली हो जाते हैं।

देवता बोले – प्रभो ! युद्ध में हम लोगों का जितना भी तेज और बल है, उससे
दूना उन दैत्यों का है, ऐसा हम मानते हैं क्योंकि उनके तेज और बल को हमने
यथा बलं क्रियाहीनं क्रिया वा बलवर्जिता। नेह साधयते कार्य समायुक्ता तु सिध्यति।। एवं शरीरशौचेन तीर्थशौचेन चान्वितः । शुचिः सिद्धिभवाप्नोति द्विविधं शौचमुक्तमम् ।। – महा. भा अनु. पर्व 108.20-21 देख लिया है।

इस वर्णन के अनुसार संगठित बल, एकाकी बल की अपेक्षा अधिक होता है। जैसे – यदि एक लकड़ी तोड़ी जाय तो कम बल लगता है और यदि लकड़ियों का संग्रह हो तो उसे तोड़ने में अधिक बल लगता है।

अतः इससे प्रतीत होता है कि महाभारत काल में बल (Force) के गुणों से लोग भली-भाँति परिचित थे। भौतिक विज्ञान के अन्तर्गत बल के दो अन्य प्रकार माने गए हैं – (क.) गुरूत्वाकर्षण (ख.) उत्क्षेप

ब्रह्माण्ड में किन्हीं दो पिण्डों के बीच कार्य करने वाले आकर्षण बल को ‘गुरूत्वाकर्षण बल कहते हैं तथा किसी वस्तु को जल में डुबोने पर जल के भीतर से उस वस्तु पर लगने वाले बल को ‘उत्क्षेप’ या ‘उत्प्लावन’ बल कहते हैं। यह बल वायु में भी लगता है।

(क.) गुरूत्वाकर्षण (Gravitation)
प्राचीन काल से ही ऋषियों, मनीषियों आदि विद्वानों ने प्रकृति के रहस्यों को समझने का प्रयास किया है। उनकी इस जिज्ञासु प्रवृत्ति ने ही उस काल की वैज्ञानिक पद्धति को श्रेष्ठ तथा अतुलनीय बना दिया है। प्राचीन वैदिक ग्रन्थों, धर्मशास्त्रों तथा महाकाव्यों आदि में उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उल्लेख मिलता है।

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महर्षि वेद व्यास ने पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण बल का उल्लेख, महाभारत के शान्ति पर्व में किया है। इस पर्व में पञ्चमहाभूतों के गुणों का विस्तृत वर्णन भीष्म

हन्तव्याः शत्रवः सर्वे युष्माकमिति मे मतिः । न त्वेक उत्सहे हन्तुं बलस्था हि सुरद्विषः ।। ते यूयं संहताः सर्वे मदीयेनार्धतेजसा । जयध्वं युधि ता शत्रून् संहताहि महाबलाः ।। अस्मतेजोबलं यावत् तावद्विगुणमाहवे। तेषामिति हिमन्यामो दृष्टतेजोबला हिते।। – महा. भा. कर्ण पर्व 34.6-8

द्वारा युधिष्ठिर के सम्मुख किया गया है, जिसमें पृथ्वी के दस गुणों का वर्णन मिलता है यथा
भूमेः स्थैर्य गुरूत्वं च काठिन्यं प्रसवार्थता। गन्धो गुरूत्वं शक्तिश्च संघातः स्थापना धृतिः।।’

अर्थात् स्थिरता, भारीपन, कठिनता (कड़ापन), बीज को अङ्कुरित करने की शक्ति, गंध विशालता, शक्ति (गुरूत्व), संघात, स्थापना और धारण शक्ति – ये दस पृथ्वी के गुण हैं। इस वर्णन में भीष्म ने पृथ्वी के दस गुणों में से एक गुण शक्ति अर्थात् गुरूत्व शक्ति (गुरूत्वाकर्षण बल) का उल्लेख किया है जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण बल से सभी भली-भाँति परिचित थे।

महाभारत के भीष्म पर्व में गीता के उपदेशों में पृथ्वी की धारिता शक्ति (गुरूत्वाकर्षण बल) का वर्णन मिलता है। इस सन्दर्भ में भगवान श्रीकृष्ण का अर्जुन के प्रति कथन है कि –

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।’

अर्थात् हे अर्जुन ! मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ। इस वर्णन से यह प्रतीत होता है कि भगवान श्रीकृष्ण ही पृथ्वी की गुरूत्व शक्ति के रूप में विद्यमान हो सभी भूतों को धारण करते हैं। यहाँ भगवान के कथन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पृथ्वी में धारिता शक्ति है। इस गुरूत्व शक्ति के बिना प्राणी टिक ही नहीं सकते हैं। यहाँ पृथ्वी का पर्यायवाची ‘गो’ शब्द प्रयुक्त हुआ है जिसका अर्थ है – ‘गमन करने वाली’ | अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकार पृथ्वी की परिक्रमण गति और गुरूत्वाकर्षण शक्ति को भली-भाँति जानते थे।
महा. भा. शान्ति पर्व 255.3 2 महा. भा. भीष्म पर्व 39.13 (गीता. अ-15)

इस गुरूत्वाकर्षण शक्ति का स्पष्ट उल्लेख प्रश्नोपनिषद में प्राप्त होता है। प्रश्नोपनिषद् के अनुसार, पृथिवी की शक्ति मनुष्य को खड़ा रहने में अपान वायु की सहायता करती है।’ इस पर भाष्य लिखते हुए आदि शंकराचार्य ने लिखा है –

“यदि पृथिवी देवी इस शरीर को अपान वायु के द्वारा सहायता न करे तो यह शरीर या तो इस ब्रह्माण्ड में तैरेगा या फिर नीचे गिर जायगा।”2 इस वर्णन से स्पष्ट होता है कि आदि शंकराचार्य गुरूत्वाकर्षण शक्ति को भली-भाँति जानते थे।

अन्यथा वे इतनी विशद व्याख्या केवल कल्पना के आधार पर नहीं कर सकते। यद्यपि शंकराचार्य का काल 7-9वीं सदी माना गया है तो भी इससे भी बहुत पहले महाभारत काल में गुरुत्वाकर्षण शक्ति का ज्ञान विद्वानों को हो चुका था। जबकि आधुनिक वैज्ञानिक गुरूत्वाकर्षण बल की खोज का श्रेय न्यूटन (Newton) को देते हैं।

न्यूटन ने “गुरूत्वाकर्षण का सिद्धान्त” प्रतिपादित किया है जिसके अनुसार गुरूत्वाकर्षण बल को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है
प्रत्येक वस्तु छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनी होती है। गुरूत्वाकर्षण के नियमानुसार पृथ्वी प्रत्येक कण को अपने केन्द्र की ओर आकर्षित करती है जिससे वस्तु पृथ्वी पर गिर पड़ती है।

इस आकर्षण शक्ति को ‘गुरूत्वाकर्षण बल’ कहते हैं। न्यूटन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘प्रिंसिपिया‘ (Principia – 1687) में गुरूत्वाकर्षण का नियम लिखा कि – “ब्रह्माण्ड में प्रत्येक पिण्ड दूसरे पिण्ड को अपनी ओर आकर्षित करता है।” न्यूटन के इस नियम का महत्व खगोल तथा भौतिक विज्ञान दोनों में है।

आदित्यो ह वै ब्राह्मः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्या या देवता सैषा पुरूषस्य अपानमवपृभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुव्यनिः | – प्रश्नो . 3/8 2

तथा पृथिव्यामभिमानिनी या देवता प्रसिद्धा सैषा पुरूषस्य अपानमपानवृत्तिमवष्टभ्याकृष्य वशीकृत्याध एवापकर्षणेनानुग्रहं कुर्वती वर्तत इत्यर्थः अन्यथा हि शरीरं गुरूत्वात् पतेत्सावकाशे वा उदगच्छेत।। सं. विज्ञा., पृ. 87

पाश्चात्य वैज्ञानिक न्यूटन (Newton) ने गुरूत्वाकर्षण का जो नियम बताया है, इसका ज्ञान भारत के प्राचीन ग्रन्थों में बहुत पहले लिखा जा चुका है। इस विषय में प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ तथा खगोलशास्त्री भास्कराचार्य द्वारा सिद्धान्त शिरोमणि में कथन है –

मरूच्चलो भूरचला स्वभावतो यतो विचित्रावतवस्तु शक्त्यः ।। आकृष्टिशक्तिश्च मही यथायत् खस्थं गुरू स्वाभिमुखं स्वशक्तया। आकृष्यते तत्पततीव भाति समेसमन्तात क्व पतत्वियं खे।।’

अर्थात् पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर आकर्षित करती है और आकर्षण के कारण वह जमीन पर गिरते हैं। पर जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगे, तो कोई कैसे गिरे ?

अर्थात् आकाश में ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरूत्व शक्तियां सन्तुलन बनाए रखती है। अतः इससे यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन महर्षि भास्कराचार्य ने 550 वर्ष पूर्व (न्यूटन से) यह सिद्धान्त प्रतिपादित कर दिया था। पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के विषय में महाभाष्य व्याकरण में कहा गया है कि

लोष्ठः क्षिप्तो बाहुवेगं गत्वा नैव तिर्यग्गच्छति नोर्ध्वमारोहति पृथिवी विकारः
पृथिवीमेव गच्छति।

अर्थात् मिट्टी का ढेला ऊपर फेंका हुआ बाहुवेग को पूरा करके न ही टेढ़ा जाता है और न अधिक ऊपर चढ़ता है किन्तु पृथ्वी का विकार होने के पृथिवी पर ही आता है।

‘भास्कराचार्य – सिद्धा. शिरो. गोला. भुवनकोश, 5-6 ? Science in Vedic Literature – Pg. 178

वराहमिहिर की पंचसिद्धान्तिका में पृथिवी की स्थिति के सम्बन्ध में कहा गया
है
पञ्च महाभूतमय स्तारागण पंजरे महीगोलः | स्वेयस्कान्तान्तः स्थो लोह इवावस्थितो वृतः।।’

अर्थात् तारागण के पंजर में पञ्च महाभूतों से युक्त पृथिवी गोल आकाश में चुम्बकों के मध्य में लोहे के समान अवस्थित है। तारागण चुम्बक और पृथ्वी लोहे के समान है। इससे स्पष्ट है कि तारों में आकर्षण शक्ति है। उसी आकर्षण से आकृष्ट हो यह पृथ्वी स्थित है।

पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण शक्ति का उल्लेख वैदिक ग्रन्थों में भी मिलता है। अथर्ववेद के द्वादश काण्ड में पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण शक्ति तथा गति का उल्लेख मिलता है। इस वर्णन से यह स्पष्ट होता है कि पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण बल का ज्ञान वेदों के काल से चला आ रहा है। अतः इसकी खोज न्यूटन (Newton) से बहुत पहले ही हो चुकी थी। आदि शंकराचार्य भास्कराचार्य, प्रश्नोपनिषद तथा महाभारत में इस सिद्धान्त (गुरूत्वाकर्षण बल) का उल्लेख यह प्रमाणित करता है कि पृथ्वी की धारिता शक्ति से प्राचीन विद्वान् भली-भाँति परिचित थे।

उत्क्षेप (Upthrust)

आधुनिक भौतिक विज्ञान के अनुसार उत्क्षेप (upthrust) से तात्पर्य है कि – ‘यदि किसी पिण्ड को रस्सी से बांधकर जल में डुबोया जाय तो उस पर नीचे से एक बल लगता है तथा वह वस्तु वायु की अपेक्षा जल में कम भारी प्रतीत होती है। भार में यह कमी जल द्वारा वस्तु पर लगाए गए बल के कारण होती है। इस बल
को द्रव का ‘उत्क्षेप’ (upthrust) अथवा ‘उत्प्लावन बल’ कहते हैं।

मल्वं बिभ्रती गुरूभृद् भद्रपापस्य निधनं तितिक्षुः । वराहेण पृथिवी संविदानां सूकराय वि जिहीते मृगाय ।। अथर्व. वे. 12.1.48

द्रव की भाँति वायु भी वस्तुओं पर उत्क्षेप लगाती है। यदि किसी वस्तु को पहले निर्वात में तथा फिर वायु में तोला जाए तो दोनों भारों में कुछ अन्तर आता है, जोकि वस्तु द्वारा हटायी गयी वायु के भार के बराबर होता है अर्थात् वायु भी द्रव की तरह वस्तुओं पर उत्क्षेप (upthrust) लगाती है क्योंकि वायु का घनत्व बहुत

कम होता है अतः वायु का उत्क्षेप बहुत कम होता है।
महाभारत काल में विद्वान्, ऋषि आदि वायु के उत्क्षेप से सम्बन्धित गुणों से भली-भाँति परिचित थे। इस सन्दर्भ में महाभारत के शान्ति पर्व में भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर के प्रति वायु के गुणों का वर्णन करते हुए कथन है कि –

अनियत स्पर्श, वाइन्द्रिय की स्थिति, चलने-फिरने आदि की स्वतंत्रता, बल, शीघ्रगामिता, मलमूत्र आदि को शरीर से बाहर निकालना, उत्क्षेपण आदि कर्म क्रिया-शक्ति, प्राण

और जन्म मृत्यु ये सब वायु के गुण हैं।’ इस वर्णन में वायु का एक गुण उत्क्षेप बताया गया है जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारतकार

उत्क्षेपण के वैज्ञानिक रहस्य से भली-भाँति परिचित थे।
महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में वायु तथा जल दोनों के उत्क्षेप (Upthrust) को उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया है। जल के उत्क्षेप के सन्दर्भ में अनुशासन पर्व के प्रथम अध्याय में वर्णन मिलता है।

इस अध्याय में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को सांत्वना देने के लिए (गौतमी) ब्राह्मणी, व्याघ्र, सर्प, मृत्यु और काल के संवाद का उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार एक बूढ़ी ब्राह्मणी (गौतमी) का पुत्र सांप के काटने से मर जाता है तभी एक व्याघ्र उस सांप को पकड़कर गौतमी के पास लाता है तब ब्राह्मणी (गौतमी) द्वारा उस व्याध के प्रति कथन है कि संसार में धर्माचरण करके जो अपने को हल्के रखते हैं (अपने ऊपर पाप का भारी बोझ नहीं लादते हैं) वे पानी के ऊपर चलने वाली नौका के समान भवसागर से पार हो जाते हैं,

परन्तु जो पाप के बोझ से अपने को बोझिल बना लेते हैं, वे जल में फेंके गए हथियार की भाँति नरक

वायोरनियमस्पर्शी वादस्थानं स्वतंत्रता। बलं शैध्यं च मोक्षं च कर्म चेष्टाऽऽत्मता भवः ।। महा. भा. शान्ति पर्व 255.6

समुद्र में डूब जाते हैं।’ इस वर्णन में ब्राह्मणी द्वारा कहे गए वचनों की समानता प्लवन के सिद्धान्तों से की जा सकती है, यथा – पाप के बोझ से हीन व्यक्ति हल्का हो नाव के समान तैरता है,

प्लवन ने अपने सिद्धान्त में भी यही कहा है कि हल्की वस्तु पानी में तैरती है क्योंकि यदि वस्तु अपने वजन से अधिक पानी हटाती है तो वह तैरती है और पाप के बोझ से युक्त मनुष्य भारी हो हथियार के समान समुद्र में डूब जाता है क्योंकि यदि कोई हथियार समुद्र में फेंका जाए तो वह भारी होने के कारण तथा अपने वजन से कम पानी हटाने के कारण डूब जाता है।

इसी कारण बड़े-बड़े जहाज तैरते हैं और लोहे की कील डूब जाती है।
महाभारत के अनुशासन पर्व में जल उत्क्षेपण या उत्पलावन बल का उल्लेख किया गया है। इस पर्व में विश्वामित्र को ब्राह्मणत्व की प्राप्ति का वर्णन करते हुए भीष्म का युधिष्ठिर के प्रति कथन है कि- पूर्वकाल में विश्वामित्र के भय से अपने शरीर को रस्सी से बाँधकर श्रीमान् वसिष्ठ अपने आपको एक नदी के जल में डुबो रहे थे, परन्तु उस नदी के द्वारा पाशरहित (बन्धनमुक्त) हो पुनः ऊपर उठ आये।

महात्मा वसिष्ठ के उस महान कर्म से विख्यात हो वह पवित्र नदी उसी दिन से विपाशा कहलाने लगी। इस वर्णन से प्रतीत होता है कि नदी ने उत्पलावन बल उत्क्षेपण के कारण ही महर्षि वसिष्ठ को ऊपर उठा दिया। इसे इस रूप में भी समझा जा सकता है कि जब कोई वस्तु जल में गिर जाती है या डुबोयी जाती है तो उसपर नीचे (पानी) की ओर से एक बल कार्य करता है जिसे उत्पलावन बल उत्क्षेपण कहते हैं।

प्लवन्ते धर्मलाघवो लोकेऽम्भसि यथा प्लवाः। भज्जन्ति पापगुरवः शस्त्रं स्फन्नमिवोदेक।।- महा. भा. अनु. पर्व. 1.22. 2

तथैवस्यभयाद् वद्ध्वा वसिष्ठः सलिले पुरा।
आत्मानं मञ्ज प श्रीमान् विपाशाः पुनरूत्थितः ।। तदाप्रभृति पुण्या हि विपाशाभून्महानदी। विख्याता कर्मणा तेन वसिष्ठस्य महात्मनः ।।- महा. भा. अनु. पर्व. 3.12.13

आधुनिक भौतिक विज्ञान के अनुसार, सर्वप्रथम उत्लावन बल अर्थात् जल के उत्क्षेप का अध्ययन आर्कमिडीज नामक वैज्ञानिक ने किया था। इसके आधार पर उन्होंने एक सिद्धान्त निकाला जिसे “आर्किमिडीज का सिद्धान्त” कहते हैं। यथा – “जब कोई वस्तु किसी द्रव में पूरी अथवा आंशिक रूप से डुबोयी जाती है तो उसके भार में कमी का आभास होता है।

भार में यह आभासी कमी उस वस्तु के डूबे हुए भाग द्वारा हटाये गये द्रव के भार के बराबर होती है।

महर्षि वेद व्यास ने महाभारत में अनेक वैज्ञानिक तथ्यों का उल्लेख किया है। महाभारत के वन पर्व में कर्ण के जन्म की कथा भी वैज्ञानिक रहस्य से अनुस्यूत प्रतीत होती है। इस सन्दर्भ में महात्मा वैशम्पायन द्वारा राजा जनमेजय के प्रति कर्ण के जन्म की कथा का वर्णन किया गया है जिसके अनुसार दुर्वासा ऋषि की सेवा-शुश्रूषा के फलस्वरूप कुन्ती (पृथा) ने एक अद्भुत मंत्र प्राप्त किया। \

जिसकी सहायता से वह किसी भी देवता को बुला सकती थी तथा उसके द्वारा पुत्र प्राप्त कर सकती थी। अतः कौमार्यवस्था की चञ्चलता के कारण कुन्ती ने कौतूहलवश सूर्यदेव का आवाहन कर उस मंत्र की परीक्षा की।

जिसके कारण उसे सूर्यदेव से एक पुत्र प्राप्त हुआ परन्तु लोक लाज के भय से कुन्ती ने अपने पुत्र को त्यागना ही उचित समझा। उस बालक के उत्पन्न होते ही भामिनी कुन्ती ने धाय से सलाह लेकर एक पिटारी मंगवायी और उसमें सब ओर सुन्दर मुलायम बिछौने बिछा दिए।

इसके बाद उस पिटारी में चारों आर मोम लगा दिया, जिससे उसके भीतर जल न प्रवेश कर सके। जब वह (पिटारी) सब तरह से चिकनी और सुखद हो गयी तब उसके भीतर उस बालक को सुला दिया और उसका सुन्दर ढक्कन बंद कर दिया तथा रोते-रोते उस पिटारी को अश्वनदी में छोड़ दिया।’

इस वर्णन के अनुसार कुन्ती ने बालक को पिटारी में रखने से पूर्व पिटारी के चारों ओर मोम लगा दिया। इससे कुन्ती के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का बोध होता है क्योंकि कुन्ती को यह बात

जातमात्रं च तं गर्भ धात्र्या सम्मन्त्र्य भाविनी। मञ्जूषायां समाधाय स्वास्तीर्णायां समन्ततः ।।
मधूच्छिष्ट स्थितायां सा सुखायां रूदती तथा। श्लक्षणायां सुपिधानायामश्वनद्या मवा सृजत् ।।- महा. भा. वन पर्व 3086-7

भली-भाँति ज्ञात थी कि यदि पिटारी के चारों ओर मोम लगा दिया जाए तो नदी का जल उसमें प्रवेश नहीं करेगा। वैज्ञानिक दृष्टि से इस तथ्य को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है कि पिटारी के छिद्र, मोम के लगा देने से लगभग बन्द हो जाते हैं अथवा बहुत सूक्ष्म हो जाते हैं जिससे पानी के अणु उस छिद्र से बड़े होने के कारण पिटारी में प्रवेश नहीं कर पाते हैं।

साथ ही पिटारी की लकड़ी गीली होकर भारी नहीं हो पाती है। अतः इससे यह प्रतीत होता है कि कुन्ती को अणु-परमाणु तथा उत्प्लावन बल का भली-भाँति ज्ञान था, वह जानती थी कि पिटारी में शिशु को रखने पर तथा नदी में डालने पर वह नदी के जल में डूब सकता है।

इसी कारण उसने पिटारी के चारों ओर मोम लगवाया जिससे जल पिटारी में न जा सके और जल से न भीगकर लकड़ी हल्की बनी रहे और नदी में डाले जाने पर वह अपने वजन से अधिक जल हटाकर तैरती रहे।
अतः पिटारी के तैरने के सन्दर्भ में प्लवन के सिद्धान्त का सङ्केत मिलता है। अतः यह माना जा सकता है कि कुन्ती एक विदुषी महिला थी जिसे अणु परमाणु तथा प्लवन के सिद्धान्त का भली-भाँति ज्ञान था।

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महाभारत तथा प्रकाश (Light)

प्रकाश एक प्रकार की ऊर्जा है, जो दृष्टि को संवेदना देती है। अंधेरे में रखी वस्तुएं प्रकाश पड़ने पर ही दिखाई देती है। अतः इससे स्पष्ट होता है कि “प्रकाश वह कारक है जिससे वस्तुएं दिखाई देती हैं।”

प्रकाश से सम्बन्धित रहस्यों तथा विशेषताओं का ज्ञान प्राचीन काल के विद्वानों को भलीभाँति था। महर्षि व्यास ने महाभारत में अनेक स्थानों पर प्रकाश से जुड़े रहस्यों का उद्घाटन किया है।

महाभारत के वन पर्व में रेगिस्तान की मरीचिका का उल्लेख मिलता है। इस सन्दर्भ में वन पर्व में द्रौपदी द्वारा दुःख से मोहित हो युधिष्ठिर को उलाहना देते हुए कथन है कि तत्त्वदर्शी मुनियों ने वस्तुओं के स्वरूप कुछ और प्रकार से देखे हैं,

किन्तु अज्ञानियों के सामने किसी और ही रूप में भासित होते हैं। जैसे आकाशवाणी सूर्य की किरणें मरूभूमि में पड़कर जल के रूप में प्रतीत होने लगती हैं। इस वर्णन में द्रौपदी, युधिष्ठिर को रेगिस्तान की मरीचिका का उदाहरण देते हुए समझा रही है।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि रेगिस्तान की मरीचिका से तात्पर्य प्रकाश के पूर्ण आन्तरिक परावर्तन से है। यह एक वैज्ञानिक घटना है जिसमें सूर्य की किरणें मरूस्थल पर पड़ती हैं तो दूर से जल का आभास कराती हैं। इस घटना को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है।

रेगिस्तान की मरीचिका (Mirage) –

ग्रीष्म ऋतु का दोपहर में कभी-कभी रेगिस्तान में यात्रियों को दूर से पेड़ के साथ-साथ उसका उल्टा प्रतिबिम्ब भी दिखाई देता है और उन्हें ऐसा भ्रम हो जाता है कि वहां कोई जल का तालाब है जिसमें पेड़ का उल्टा प्रतिबिम्ब दिखाई दे रहा है जबकि वास्तव में वहां कोई जल का तालाब नहीं होता। इसे रेगिस्तान की मरीचिका कहते हैं।

to Sky Light ray from sky
दिन में सूर्य की गर्मी से रेगिस्तान की रेत गर्म हो जाती है तो रेत के
Inferior Mirage DIrect sight

सम्पर्क में आने वाली वायु गर्म तथा विरल हो जाती है। इसकी तुलना में इस
Cool Air Cool Air

पर्त के ऊपर की वायु की Har AirTS परत अपेक्षाकृत ठण्डी और सघन होती है। दूसरे शब्दों में इससे कुछ ऊपर तक वायु की विभिन्न परतें नीचे की परतों की अपेक्षा सघन तथा ऊपर से नीचे की ओर वायु की विभिन्न परतें नीचे की परतों की अपेक्षा सघन तथा ऊपर से नीचे की ओर वायु की विभिन्न परतें अपेक्षाकृत विरल होती हैं। जब किसी पेड़ की चोटी से आने

Hot Air pparent Image

अन्यथा परिदृष्टानि मुनिभिस्तत्वदर्शिभिः ।
अन्यथा परिवर्तन्ते वेगा इव नभस्वतः ।। महा. भा. वन पर्व. 30.33

वाली प्रकाश-किरणें पृथ्वी की ओर आती हैं तो उन्हें अधिकाधिक विरल परतों से होकर आना पड़ता है। प्रत्येक परत पर अपवर्तित किरणें अभिलम्ब से दूर हट जाती हैं। अतः प्रत्येक अगली परत पर आपतन कोण बढ़ता जाता है तथा किसी विशेष परत पर क्रान्तिक कोण से बड़ा हो जाता है।

इस परत पर किरणें पूर्ण परावर्तित होकर ऊपर की ओर चलने लगती हैं चूंकि ऊपर वाली परतें अधिकाधिक सघन हैं। अतः ऊपर उठती हुई किरणें अभिलम्ब की ओर झुकती जाती हैं। जब ये किरणें यात्री की आंख में प्रवेश करती हैं तो उसे ये पृथ्वी के नीचे से आती प्रतीत होती है तथा यात्री को पेड़ का उल्टा प्रतिबिम्ब (I) दिखाई देता है। जिससे वह समझता है कि प्रतिबिम्ब के बनने का कारण जल के द्वारा परावर्तन है तथा कुछ दूरी पर जल का तालाब है। इसे ही ‘रेगिस्तान की मरीचिका’ कहते हैं।

महाभारत के आदि पर्व में भी प्रकाश के पूर्ण आन्तरिक परावर्तन का एक और उदाहरण मिलता है। जिसके अनुसार दुर्योधन युधिष्ठिर के भवन को देखने आया। यह भवन मय नामक दानव ने बनाया था जिसमें अद्भुत वस्तुओं का निर्माण किया गया था।

उस भवन में जल की तरह दिखने वाले तालाब वास्तव में फर्श होते थे तथा फर्श दिखने वाले स्थान वास्तव में तालाब होते थे। अतः इस मायावी भवन को देखते-देखते दुर्योधन “जल में स्थल और स्थल में जल का भ्रम” करते हुए जल में गिर पड़ा और भीमसेन द्वारा अपमानित हुआ।

महाभारत के आदि पर्व में उग्रश्रवा ऋषि, अन्य ऋषियों से महाभारत के अधिकांश विषयों को संक्षिप्त रूप में वर्णन करते हुए कथन है कि उसी सभा भवन में जल सम्भ्रम (जल में स्थल और स्थल में जल का भ्रम) होने के कारण दुर्योधन के पांव फिसलने से लगे, तब भगवान श्रीकृष्ण के सामने ही भीमसेन ने उसे गंवार सा सिद्ध करते हुए उसकी हंसी उड़ायी थी।’ यहाँ साङ्केतिक रूप में मरिचिका की घटना का बोध होता है।

तत्रावहसितश्चासीत् प्रस्कन्दन्निव सम्भ्रमात् । प्रत्यक्षं वासुदेवस्य भीमेनानभिजातवत् ।। – महा. भा. आदि पर्व 1.136

इस सन्दर्भ में मयदानव द्वारा निर्मित उस अद्भुत सभा का वर्णन महाभारत के सभापर्व में विस्तृत रूप से मिलता है। वैशम्पायन ऋषि, द्वारा राजा जनमेजय से उस सभा का वर्णन करते हुए कथन है कि “मणियों तथा रत्नों से व्याप्त होने के कारण कुछ राजा उस पुष्करिणी के पास आकर और उसे देखकर भी उसकी यथार्थता पर विश्वास नहीं करते थे और भ्रम से उसे स्थल समझकर उसमें गिर पड़ते थे।

इस वर्णन में जल को स्थल रूप में तथा स्थल को जल रूप में समझना प्रकाश के पूर्ण आन्तरिक परावर्तन पर ही निर्भर करता है। उस पुष्करिणी के पास जड़ित मणि तथा रत्न उस पर पड़ने वाले प्रकाश को पूर्ण रूप से परावर्तित करते होंगे तभी देखने वाले मनुष्य की आंखों में जल का स्थल रूप में तथा स्थल का जल रूप में भ्रम उत्पन्न हो जाता था।

यह भी मरीचिका का ही उदाहरण प्रतीत होता है। अतः ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि वह मयदानव एक वैज्ञानिक सोच भी रखता था जो इस प्रकार की अद्भुत सभा का निर्माण करने में सफल हो सका। अतः ऐसा प्रतीत हो रहा है कि महाभारत काल में प्रकाश के गूढ़ रहस्यों का ज्ञान सर्वत्र प्रचलित था।

प्रकाश का वर्ण विक्षेपण (Spectrum of Light)

सूर्य की किरणों में अनेक रङ्ग की किरणें समाहित होती हैं। जब ये किरणें किसी प्रिज्म से होकर गुजरती हैं तो सात रङ्गों में विभाजित हो जाती हैं। इस घटना को “प्रकाश का वर्ण विक्षेपण” कहते हैं।

वर्षा ऋतु में इन्द्रधनुष इसी कारण दिखाई देता है। न्यूटन ने यह नियम सन् 1966 ई. में प्रतिपादित किया था। महाभारत में महर्षि व्यास ने सूर्य की किरणों के पृथक-पृथक होने की घटना का उल्लेख किया है।

महाभारत के शान्ति पर्व में व्यास ऋषि का जीवात्मा तथा परमात्मा के साक्षात्कार के विषय में कथन हैं कि जिस प्रकार सूर्य की किरणें परस्पर मिली हुई ही सर्वत्र विचरती हैं तथा स्थित हुई दृष्टिगोचर होती हैं, उसी

मणिरत्नचिंता तां तु केचिदभ्येत्य पार्थिवाः। दृष्ट्वापि नाभ्यजानन्त तेऽज्ञानात् प्रपतन्त्युत।। – महा. भा. सभा पर्व 3.33

प्रकार अलौकिक जीवात्मा स्थूल शरीर से ही निकलकर सम्पूर्ण लोकों में जाते हैं (यह ज्ञान दृष्टि से ही जानने में आ सकता है)। जैसे – विभिन्न जलाशयों के जल में सूर्य की किरणों का पृथक-पृथक् दर्शन होता है,

उसी प्रकार योगी पुरूष सभी सजीव शरीरों के भीतर सूक्ष्म रूप से स्थित पृथक्-पृथक् जीवों को देखता है।’ इस वर्णन के अनुसार सूर्य की किरणें परस्पर मिली हुई सब ओर विचरती हैं।

अतः ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि जलाशय का जल प्रिज्म के समान कार्य कर रहा है और वह सूर्य की किरणों को अलग-अलग विभक्त कर रहा है। यह क्रिया भौतिक विज्ञान की दृष्टि से प्रकाश का वर्ण-विक्षेपण कहलाती है। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार प्रकाश की वर्ण-विक्षेपण क्रिया को निम्नलिखित रूप से व्यक्त किया जा सकता है, यथा
Glass prism
White light

जब सूर्य के प्रकाश की कोई किरण किसी प्रिज्म में से गुजरती है तो यह प्रिज्म के आधार की ओर झुकने के साथ-साथ विभिन्न रङ्गों में विभाजित हो जाती है। इस प्रकार उत्पन्न विभिन्न रङ्गों के प्रकाश के समूह को वर्णक्रम (Spectrum) कहते हैं। इस वर्णक्रम को VIBGYOR कह सकते हैं। इससे ज्ञात होता है कि सूर्य का प्रकाश विभिन्न रङ्गों के प्रकाश से मिलकर बना है। प्रिज्म इन रङ्गों के प्रकाश को

यथा मरीच्यः सहिताश्चरन्ति सर्वत्र तिष्ठन्ति च दृश्यमानाः । देहैर्विमुक्तानि चरन्ति लोकांस्तथैव सत्वान्यतिमानुषाणि ।। प्रतिरूपं यथैवाप्सु तापः सूर्यस्य लक्ष्यते। सत्ववत्सु तथा सत्वं प्रतिरूपं स पश्यति।।
महा. भा. शान्ति पर्व. 253. 2-3

अलग-अलग कर देता है क्योंकि प्रिज्म का अपवर्तनांक भिन्न-भिन्न रङ्गों के प्रकाश के लिए अलग-अलग होता है। महाभारत के उपर्युक्त श्लोक के अनसार जलाशय का जल, प्रिज्म के समान कार्य कर रहा है तभी उस जल में पड़ने वाली सूर्य की किरण पृथक-पृथक प्रतीत हो रही है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि महर्षि व्यास
को वर्ण-विक्षेपण की प्रक्रिया का अद्भुत ज्ञान था।
(ग.) इन्द्रधनुष (Rainbow) –

प्रकाश के वर्ण-विक्षेपण द्वारा ‘इन्द्रधनुष’ नभ में दिखाई देता है। महाभारत के वन पर्व में इन्द्रधनुष का वर्णन मिलता है। यह इन्द्रधनुष प्रकाश के वर्ण विक्षेपण द्वारा ही बनता है और लोगों को आकाश में दिखाई देता है। वर्तमान भौतिक वैज्ञानिक इन्द्रधनुष के बनने का यही कारण मानते हैं। यह वर्षा ऋतु में प्रायः देखा जाता है।

न्यूटन के अनुसार सामान्य जीवन में प्रतिदिन बहुत से स्पेक्ट्रम (Spectrum) के उदाहरण देखने को मिलते हैं, यथा – इन्द्रधनुष (Rainbow)। इन्द्रधनुष का निर्माण वर्षाकाल में बनी असंख्य जल-बूंदों पर सूर्य का प्रकाश पड़ने से होता है। वर्षा की किरणें लगभग गोलाकार होती हैं। सूर्य की किरणें इन बूंदों पर इस प्रकार पड़ती हैं कि उनसे अपवर्तित (Refract) होकर रङ्गों की एक चौड़ी पट्टी

बनाती हैं, इसे ही इन्द्रधनुष (Rainbow) कहते हैं।
महाभारत के वन पर्व में मार्कण्डेय ऋषि, द्वारा भगवान शिव तथा पार्वती के स्थ पर आरूढ़ होने की दशा का वर्णन करते हुए कथन है कि उस स्थ पर भगवती उमा के साथ बैठे हुए भगवान शिव इस प्रकार शोभित हो रहे थे,

मानो इन्द्रधनुषयुक्त मेघों की घटा में विद्युत् के साथ भगवान सूर्य प्रकाशित हो रहे हों।’ इस वर्णन में इन्द्रधनुष का उल्लेख किया गया है जोकि मेघों की छटा में विद्यमान

तस्मिन् रथे पशुपतिः स्थितो भात्युमया सह ।। विद्युत्ा सहितः सूर्यः सेन्द्रचपे घने यथा। – महा. भा. वन. पर्व. 231.31 पृ. 1611

है। यह निश्चित रूप से वर्षा ऋतु का ही वर्णन प्रतीत हो रहा है। भौतिक वैज्ञानिक भी यही मानते हैं कि वर्षा ऋतु में घने बादलों के मध्य जब कभी सूर्य की किरण नम वायुमण्डल पड़ती है तो प्रकाश की किरणों के लिए जल-बिन्दु प्रिज्म का कार्य करती है जिससे प्रकाश की किरणें सात रङ्गों में विभक्त हो जाती है और मनुष्यों की आंखों को ये सात रङ्ग इन्द्रधनुष के रूप में दिखाई देने लगते हैं।

अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में प्रकाश की विशेषताओं का ज्ञान महर्षियों को स्पष्ट रूप से था। वैदिक काल में ऋषियों को भली-भाँति यह ज्ञात था कि सूर्य का श्वेत प्रकाश सात रङ्गों से निर्मित होता है। इस प्रसङ्ग में निम्नलिखित ऋचाएं वेदों में वर्णित है’ –

mahabharat physics science

“अवधिवस्तारयन्ति सप्त सूर्यस्य रश्मयः।”
अर्थात् सूर्य की सात किरणें पानी को आकाश से नीचे गिरा रही है।

“यत्र गावा निहिता सप्त नाम”।
अर्थात् जहाँ एक सूर्य किरण ने अपने सात नाम रखे हैं।

“सप्त युंजन्ति स्थमेकचक्रमेको अश्वो वहति।”

अर्थात् सूर्य के एक चक्रीय रथ को सात नामों वाला एक ही घोड़ा चलाता है। (कोणार्क मन्दिर में निर्मित मूर्ति में भी सूर्य के रथ को सात घोड़े खींचते दिखाई देते हैं।)

यं सीमा कृण्वन् तमसे विप्रचे ध्रुवक्षे मा अनवस्यन्तो अर्थम् ।
तं सूर्य हरितः सप्त यहीः स्पाशं विश्वस्य जगतो वहन्ति।।

इस विवरण से यह प्रतीत होता है कि सूर्य के श्वेत किरणों में सात रङ्ग होने का ज्ञान प्राचीन वैदिक ऋषियों को भलीभाँति था।
Science in Vedic Literature, pg. 50

सर आइजक न्यूटन 17वीं सदी के महान वैज्ञानिक माने जाते थे। ऐसा माना जाता है कि वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने यह प्रदर्शित किया कि प्रकाश को विभिन्न रङ्गों में विभक्त किया जा सकता है,

परन्तु प्राचीन वैदिक ग्रन्थों, धर्मशास्त्रों तथा महाकाव्यों में बहुत पहले ही प्रकाश के वर्ण विक्षेपण की क्रिया का उल्लेख किया जा चुका है। इस सन्दर्भ वृहत् संहिता में इन्द्रधनुष के बनने के वैज्ञानिक कारण का उल्लेख मिलता है, यथा- Physics RAINBOW

सूर्यस्य विवधवर्णाः पवनेन बिघट्टिताः करा: साभ्रे । वियति धनुः संस्थानाः
ये दृश्यन्ते तदिन्द्रधनुः ।।

Bruhatsamhita-chapter 35

इस वर्णन से स्पष्ट होता है कि विक्रमादित्य के काल में वराह मिहिर द्वारा लिखित वृहत् संहिता के अनुसार आर्यों को सूर्य की किरणों से जुड़े रहस्यों का पूर्ण ज्ञान था, जैसे – सूर्य की किरणें कई रङ्गों की हैं, उनके मिलने से श्वेत धूप बनती है, वे वायुमण्डल के जल कणों में होकर निकलने से पृथक् पृथक् होकर अलग-अलग रङ्ग की दिखाई देती है।
Science in Sanskrit, Pg. 19

प्रकाश-प्रकीर्णन (Scattering)

जब प्रकाश किसी ऐसे माध्यम से गुजरता है जिसमें धूल तथा अन्य पदार्थों के अत्यन्त सूक्ष्म कण होते हैं तो इनके द्वारा प्रकाश सभी दिशाओं में प्रसारित हो जाता है। इस घटना को प्रकाश का प्रकीर्णन कहते हैं।

बैंगनी रङ्ग के प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे अधिक तथा लाल रङ्ग के प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे कम होता है।प्रकीर्णन के कारण ही सूर्योदय अथवा सूर्यास्त के समय सूर्य लाल दिखाई पड़ता है।

प्रकाश के प्रकीर्णन तथा अवशोषण के अध्ययन को स्पैक्ट्रोस्कोपी कहा जाता है। इसकी नींव डालने का श्रेय एण्डर्स जोनास एंगस्ट्रम (Anders Jonas Angstrom) (1817-1874) को दिया जाता है। इन्होंने प्रकाश के प्रकीर्णन को निम्नलिखित रूप में स्पष्ट किया है –

यदि प्रातः उगते तथा सायं डूबते सूर्य को देखा जाए तो यह लाल दिखाई देता है। इसका कारण यह है कि उगते अथवा डूबते सूर्य की किरणें वायुमण्डल में काफी अधिक दूरी तय करके मनुष्य की आँखों तक पहुँचती हैं।

इन किरणों का मार्ग में धूल के कणों तथा वायु के अणुओं द्वारा बहुत अधिक प्रकीर्णन होता है जिससे सूर्य के प्रकाश से नीली तथा बैंगनी किरणें निकल जाती हैं क्योंकि इन किरणों का प्रकीर्णन सबसे अधिक होता है।

अतः आँख में विशेष रूप से शेष लाल किरणें ही पहुँचती हैं जिसके कारण सूर्य लाल दिखाई देता है। दोपहर के समय जब सूर्य सिर पर होता है तब किरणें वायुमण्डल में अपेक्षाकृत बहुत कम दूरी तय करती हैं।

अतः प्रकीर्णन कम होता है और लगभग सभी रङ्गों की किरणें आँख तक पहुँच जाती हैं। अतः सूर्य श्वेत दिखाई देता है। इस घटना का वर्णन महाभारत में किया गया है। वन पर्व में सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय का वर्णन करते हुए मार्कण्डेय ऋषि द्वारा देवसेना तथा इन्द्र के मध्य हुए संवाद के विषय में कथन है कि

ऐश्वर्यशाली इन्द्र ने देखा, पूर्व संध्या
(प्रभात) का समय है, प्राची के आकाश में लाल रङ्ग के घने बादल घिर आये हैं और समुद्र का जल भी लाल ही दृष्टिगोचर हो रहा है। इस वर्णन में पूर्व संध्या (प्रभात) के अवसर पर आकाश में लाल रङ्ग के बादल तथा लाल रङ्ग के जल का उल्लेख किया गया है,

इससे यह घटना प्रकाश के प्रकीर्णन पर आधारित प्रतीत होती है क्योंकि सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य लाल दिखाई देता है जिसके कारण यहाँ लाल रङ्ग के सूर्य के प्रकाश में बादल तथा समुद्र का जल दोनों ही लाल दिखाई दे रहे हैं।

अतः ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रकाश के प्रकीर्णन की दशा का वर्णन कर महर्षि व्यास ने अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा का प्रदर्शन किया है।
प्रातःकाल तथा सायंकाल में आकाश का रङ्ग लोहित वर्ण (लाल रङ्ग) हो जाने के विषय में श्रीपत का निम्नलिखित श्लोक संस्कृत वाङ्मय में प्रचलित है –

भूम्युत्थितरजोधूमैदिर्गन्तव्योम्नि संस्थितैः । सूर्यस्य किरणौर्मित्रैश रूपेणायमेव भासते।। विरलाव्ययं वस्तुयद् दृष्टेर्व्यवधाय कम्। ते वाम्रमरूणोद्मतं दृश्यन्ते शक्रचापवत्।।

अर्थात् सम्पूर्ण वायुमण्डल में रजकण फैले हुए हैं और सूर्य की किरणें उनसे छनकर पृथ्वी पर पड़ती हैं। सूर्य का प्रकाश भिन्न-भिन्न रङ्गों की किरणों का समूह है।

लाल-किरणों की तरङ्ग-लम्बाई (Wave Lenght) अधिक होती है। उषा तथा गोधूली के समय सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं और नभ मण्डल का लोहित वर्ण (लाल रङ्ग) हो जाना इन्हीं किरणों पर निर्भर है।

लोहितैश्च घनैर्युक्तां पूर्व संध्यां शतक्रतुः । अपश्यल्लोहितोदं च भगवान् वरूणालयम् ।। – महा. भा. वन पर्व 224 13 2

दर्पण (Mirror)

आधुनिक समय में भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में बहुत से आविष्कार किए जा रहे हैं, जो दैनिक जीवन में बहुत उपयोगी हैं।

इनमें से एक आविष्कार दर्पण को कहा जा सकता है। दर्पण सामान्य रूप से मुख को देखने हेतु लोगों द्वारा प्रयोग किया जाता है।

दर्पण को निम्नलिखित रूप से परिभाषित किया जा सकता है -“

कोई चिकना तल जिसके एक पृष्ठ पर पॉलिश करके दूसरे पृष्ठ को परावर्तक बना दिया
जाए दर्पण कहलाता है। यह दो प्रकार के होते हैं –

1. समतल दर्पण,

2. गोलीय दर्पण।

महर्षि व्यास ने महाभारत में अनेक स्थानों पर कथानक को स्पष्ट करने के किलए दर्पण को उदाहरण के रूप में व्यक्त किया है।

इस सन्दर्भ में महाभारत के अनुशासन पर्व में विपुल द्वारा इन्द्र से गुरू पत्नी की रक्षा का वृत्तान्त सुनाते हुए भीष्म ने दर्पण का उदाहरण प्रस्तुत किया है,

जिसके अनुसार दर्पण मे प्रतिबिम्ब की भाँति विपुल अपने गुरू पत्नी के शरीर में परिलक्षित हो रहे थे।’ इस प्रकार महाभारतकार ने दर्पण को स्पष्ट करने हेतु

शाकुन्तलोपाख्यान में शकुन्तला द्वारा राजदरबार में दुष्यन्त के समक्ष यह कहलाया है कि पत्नी के गर्भ से उत्पन्न हुए पुत्र को पिता द्वारा उसी प्रकार देखा जाना चाहिए जिस प्रकार मनुष्य दर्पण में अपना मुँह देखता है।

महर्षि व्यास ने खगोल के रहस्य को उद्द्याटित करने के लिए सञ्जय द्वारा सुदर्शन द्वीप का वर्णन किया है जिसके

अनुसार जिस प्रकार पुरूष दर्पण में अपना मुँह देखता है उसी प्रकार सुदर्शन द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता

प्रतिबिम्बमिवादर्श गुरूपत्न्याः शरीरगम् । स तं धोरेण तपसा युक्तं दृष्टा पुरन्दरः ।। प्रावेपत सुरांत्रस्तः शापभीतस्तदा विभो ।- महा. भा. अनु. पर्व. 41.18 2

भार्यायां जनितं पुत्रमादर्शेष्विव चाननम् । हादते जनिता प्रेक्ष्य स्वर्गं प्राप्येव पुण्यकृत् ।।- महा. भा. आदि पर्व 74.49 है।

इस सन्दर्भ में शान्तिपर्व में प्रजापति मनु द्वारा आत्मा तथा परमात्मा के साक्षात्कार का विवेचन महर्षि बृहस्पति के समक्ष किया गया है, जिसके अनुसार जिस प्रकार

मनुष्य स्वच्छ और स्थिर जल के नेत्रों द्वारा अपना प्रतिबिम्ब देखता है उसी प्रकार मनसहित इन्द्रियों के शुद्ध तथा स्थिर हो जाने पर वह ज्ञान दृष्टि से ज्ञेय स्वरूप आत्मा का साक्षात्कार कर सकता है।

वही मनुष्य हिलते हुए जल में अपना रूप नहीं देख पाता है, उसी प्रकार मन सहित इन्द्रियों के चचल होने पर बुद्धि में ज्ञेय स्वरूप आत्मा का दर्शन नहीं कर

सकता।’ इस वर्णन में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि स्थिर जल में ही मनुष्य का प्रतिबिम्ब दिखता है परन्तु हिलते हुए जल में ऐसा सम्भव नहीं।

यहाँ स्वच्छ तथा स्थिर जल दर्पण के समान है। जब तक दर्पण स्थिर है तब तक प्रतिबिम्ब साफ-साफ दिखता है

परन्तु यदि दर्पण को हिलाते रहा जाय तो प्रतिबिम्ब साफ नहीं दिखता। अतः इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि दर्पण की समस्त विशेषताओं का ज्ञान महाभारतकालीन लोगों को था।

प्रतिबिम्ब (Image) – वस्तु के किसी बिन्दु से दो या दो से अधिक प्रकाश की किरणें चलकर परावर्तन या अपवर्तन के पश्चात् जिस बिन्दु पर जाकर मिलती हैं

या मिलती हुई प्रतीत होती हैं, तो वह बिन्दु पहले बिन्दु का प्रतिबिम्ब कहलाता है।

किसी वस्तु के विभिन्न बिन्दुओं के प्रतिबिम्बों को मिलाने पर उस वस्तु का प्रतिबिम्ब’ बन जाता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में शिव के सहस्रनास्तोत्र में

से एक नाम ‘दर्पण’ बताया गया है। क्योंकि जिस तरह दर्पण स्वच्छ तथा उपयोगी है, उसी प्रकार शिव भी स्वच्छ तथा सभी लोगों के लिए हितकारी है, यथा –

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