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mahabharat mai vigyaan secience

महाभारत में वैज्ञानिक तत्त्व
महर्षि वेदव्यास विरचित यह लक्ष-श्लोकात्मक संहिता भारत का राष्ट्रीय ग्रन्थ माना जाता है। महाभारत एक उत्तम आर्षमहाकाव्य कहलाता है। महर्षि व्यास ने ग्रन्थ के आरम्भ में ही इसे अत्यन्त सम्मानित काव्य कहा है –

कृतं मयेदं भगवन् काव्यं परमपूजितम्।’
भारतवर्ष के तत्कालीन धर्म–संस्कृति का समस्त ज्ञान इसमें निहित होने के कारण यह ‘पञ्चम वेद’ माना गया है। स्वयं महर्षि व्यास द्वरा अपने इस ग्रन्थ की श्रेष्ठता प्रतिपादन करते हुए कथन है –

mahabharat mai vigyaan secience.

धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ। यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्।।
उपर्युक्त श्लोक में महर्षि व्यास का यह कथन सर्वथा यथार्थ है कि जो इस महाभारत में है, वह अन्यत्र भी है किन्तु जो यहाँ नहीं है, वह कहीं नहीं है।

विज्ञान – अर्थ तथा उसकी सार्थकता
विज्ञान का अर्थ है – विशिष्ट ज्ञान। वैदिक कोश के अनुसार ‘विज्ञान’ का अर्थ समझाते हुए कहा गया है –
विज्ञानं वासोऽहरूष्णीहं।
महा. भा. आदि. पर्व. 1.61

  • विज्ञान विशिष्ट ज्ञान का वाचक है। ‘ज्ञा’ अवबोधम से ल्युट् प्रत्यय के द्वारा निष्पन्न ज्ञान वि उपसर्ग के योग से विज्ञान बनता है, जो विशिष्ट ज्ञान का द्योतक है। यह इन्द्रियगम्य ज्ञान है, जो तर्कों, तथ्यों और प्रयोगों के आङ्कलन पर आधारित है।
  • इसका अंग्रेजी पर्याय Science भी ज्ञानवाचक है, जो लैटिन शब्द Scienta = to know से बना है। विज्ञान की मूलभूत आवश्यकता जिज्ञासा, चिन्तन और प्रयोग है। इन आवश्यकताओं की जहाँ पूर्ति होती है वहाँ विज्ञान पद वाच्य है।
  • अमरकोश के प्रथम काण्ड के धीवर्ग’ में ज्ञान तथा विज्ञान को स्पष्ट किया गया है, यथा “मोक्षे धीमा॑नम्”
  • अर्थात् ज्ञान, मोक्ष विषयक बुद्धि का एक नाम है। अन्यत्र विज्ञानं शिल्पशास्त्रयोः। अर्थात् विज्ञान, शिल्प अथवा शास्त्र विषयक बुद्धि का एक नाम है।
  • इससे स्पष्ट होता है कि मोक्ष से अन्यत्र शिल्पविद्या और शास्त्र में बुद्धि लगाने का एक नाम ‘विज्ञान’ है।
    • mahabharat mai vigyaan secience
  • संस्कृत–प्राकृत-हिन्दी तथा अंग्रेजी शब्द कोश में ‘विज्ञान’ को परिभाषित किया गया है, यथा – विज्ञानं अर्थात्, ज्ञान, अनुभूति, अनुभव, प्रतीति, आत्म-ज्ञान, परमात्म प्रतीति, वस्तु तत्त्व ज्ञान Correct understanding science, hearing real grealsoil, अनध्वसाय, संदेह और विपरीत्ता से रहित ज्ञान। ‘स्व-पर-विषयक प्रतिभास। विशेषस्य ज्ञात्याद्याकारमय ज्ञानमवबोधनं निश्चयो यस्य तद्विज्ञानम् ।
  • विज्ञान मानव की अन्वेषी प्रकृति को रूप तथा आकार देता है। जिस प्रकार प्रकृति के रहस्य असीमित और अनन्त है, उसी प्रकार विज्ञान की भी कोई सीमा नहीं है। विज्ञान एक ओर मानव को इस नश्वर संसार में सुखी-सम्पन्न-संतुष्ट रहने के सभी साधन उपलब्ध कराता है तो दूसरी ओर नश्वरता के गर्भ में निहित अविनाशित सत्य को उद्भासितकर मोक्ष के लिए उत्सुक बनाता है,
  • यथा – अविद्यया मृत्यु तीर्खाविद्ययामृतमश्नुते जिस प्रकार प्रकृति की गतिशीलता या परिवर्तन का मूलोद्देश्य है – सन्तुलन बनाए रखना, विनाश से निर्माण और निर्माण से क्षय के चक्र को गतिमान रखना तथा समस्त कार्यों यथा – सूर्योदय, चन्द्रास्त, सूर्यग्रहण, फसल चक्र, शिशु जन्म तथा वृद्धावस्था, मृत्यु सभी को एकमात्र कारण रूप ब्रह्म की सत्ता की ओर लक्षित है उसी प्रकार विज्ञान का भी कर्तव्य है,
  • कार्य की गहराई में जाकर कारण की खोज करना तथा शून्य से पूर्ण की ओर ले जाना अतः यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि भारतीय विज्ञान पद्धति पाश्चात्य विज्ञान की भांति जड़ वस्तुओं का विज्ञान नहीं वरन् चेतना का विज्ञान है। इस विषय में तैत्तिरीय उपनिषद में वर्णन मिलता है, यथा – यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति, यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तत् विजिज्ञासस्व तत् ब्रह्मेति।’

वेद तथा विज्ञान

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प्राचीन काल से ही ऋषियों, मुनियों तथा विद्वानों ने अपनी असाधारण प्रतिभा से प्रकृति के रहस्यों को समझने तथा मानव जीवन में उनकी महत्ता को स्पष्ट करने

का प्रयास किया है। वे विद्वान् अपनी बौद्धिक तथा तार्किक क्षमता द्वारा तथ्यों का सूक्ष्म विश्लेषण करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचते थे। अतः उन्होंने सम्पूर्ण

प्रकृति को ही विज्ञान की प्रयोगशाला माना है और यह सत्य भी है कि विज्ञान के परीक्षण-प्रयोग आदि बन्द प्रयोगशाला में ही होना आवश्यक नहीं है बल्कि

उनका परीक्षण मुक्त संसार-प्रयोगशाला, में प्रत्यक्ष और यथार्थ के धरातल पर कहीं भी सम्भव है। प्राचीन वैदिक ग्रन्थों में विज्ञान को ऐसे अद्भुत वर्णन प्राप्त

होते हैं जो हमारे गौरवशाली अतीत को संसार के समक्ष अभिव्यक्त करते हैं। यथा –

“देवानां भिषजा”2 यजुर्वेद के इस मंत्र में दम्र और नासत्य नामक अश्विनी
कुमारों को देवताओं का वैद्य बतलाया गया है।
1 तैत्ति. उप. 3.1 2 यजु. वे. 21.53

“दैव्या भिषजा शं नः करतो अश्विना।’ ऋग्वेद के इस श्लोक में भी अश्विनी
कुमारों को देवताओं का वैद्य बतलाया गया है।

ऋग्वेद में सूर्य की सात किरणों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें आज हम VIBGYOR के नाम से सम्बोधित करते हैं,

यथा – अधुक्षत् पिप्युषीमिषमूर्ज सप्तपदीमरिः । सूर्यस्य सप्त रश्मिभिः ।।यजुर्वेद में सूर्य की आकर्षण शक्ति का उल्लेख मिलता है –

आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मृर्त्यञ्च । हिरण्ययेन सविता रथेनादेवो यादि भुवनानि पश्यन्।।’ अथर्ववेद में गण्डमाला अथवा अपचित्

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की शल्य क्रिया का उल्लेख करते हुए यह बताया गया है कि मुनिद्रुम से छेदकर मवाद निकाला जाता था,

यथा – मुनेर्देवस्य मूलेन सर्वा विध्यामि ता अहम् ।। ऋग्वेद में अस्त्र-शस्त्रों के विषय में वर्णन मिलता है,

यथा – संग्राम में शत्रु को पराजित करने के लिए अस्त्र-शस्त्र सुदृढ़ करो इति –

स्थिरा वः सन्त्वायुधाः। विज्ञान के अनुसार, पदार्थ (Matter) अविनाशी है। सांख्यदर्शन का यह सिद्धान्त मुण्डकोपनिषद् में निहित है –

तदव्ययं यद् भूतयोनिं पीरपश्यन्ति धीराः। भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि

में भूगोल की केन्द्रीय आकर्षक शक्ति का वर्णन किया है। जिसे छह सौ वर्ष बाद न्यूटन ने दोहराया।

भास्कराचार्य का कथन है –
1, ऋ वे. 8.18.8
2, ऋ. वे. 8.72.16 ३ यजु. वे. 33.43 4 अर्थ. वे. 7.74.1 5 ऋ. वे. 1.39.2
मुण्डको. 1.1.6

आकृष्टिशक्तिश्च महीतपाचत् स्वस्थं गुरूस्वाभिमुखं स्वशक्तया। आकृष्यते तत् पततीव भाति समे समत्वात् न पतत्वियं खे।।’

भास्कराचार्य ने अपने ज्यामितीशास्त्रीय ग्रन्थ ‘लीलावती’ में L का मान दिया
व्यासे भनन्दाग्निहते विभक्ते

खबाणसूर्यः परिधिस्तु सूक्ष्मः। द्वविंशतिघ्ने विहतेऽथ शैले स्थूलोऽथवा स्याद् व्यवहारयोग्यः ।।

आर्यभट्ट ने त्रिकोण का क्षेत्रफल निकालने का सूत्र बताया,
यथा – त्रिभुजस्य फलशरीरं समदल कोटी भुजार्ध संवर्गः।’

उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह प्रतीत होता है कि भारत में प्राचीन काल से ही विज्ञान अपने सर्वोच्च शिखर पर विद्यमान हो चुका था। यह परम्परा वैदिक

काल से लेकर महाभारत काल तक बनी रही क्योंकि महाभारत में महर्षि व्यास ने तत्कालीन विज्ञान को सुस्पष्ट तथा विस्तृत रूप में वर्णन किया है।

महाभारत में विज्ञान का महत्त्व
महर्षि व्यास अद्वितीय प्रतीभा के धनी थे। उन्होंने महाभारत में विज्ञान के विविध प्रकारों का उल्लेख किया है।

महर्षि वेदव्यास द्वारा महाभारत में विज्ञान की परिभाषा देते हुए कथन है कि

प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः । एतद् विज्ञानसामर्थ्य न बालैः समतामियात्।।
अर्थात् मानसिक दुःख को बुद्धि तथा विचार द्वारा और शारीरिक कष्ट को औषधियों द्वारा दूर करे, यही विज्ञान का सामर्थ्य है,

जिससे मनुष्य दुःख में पड़ने पर बच्चों के समान बैठकर रोये नहीं।

उपर्युक्त वर्णन में व्यास मुनि ने विज्ञान के सामर्थ्य का ज्ञान होना सभी प्राणियों के लिए अत्यावश्यक बताया है जिससे दुःख आदि के समय वह बैठकर रोने के

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स्थान पर विज्ञान द्वारा दुःख दूर करने का प्रयास करे। इससे महर्षि व्यास के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का बोध होता है। महर्षि व्यास द्वारा शान्तिपर्व में राजा जनक

द्वारा शुकदेव के प्रश्न का उत्तर देते हुए ज्ञान-विज्ञान के विषय में कथन है –
न बिना ज्ञानविज्ञाने मोक्षस्याधिगमो भवेत्।’ अर्थात् ज्ञान-विज्ञान के बिना मोक्ष की

प्राप्ति नहीं होती है। उपर्युक्त वर्णन में विज्ञान की सार्थकता का उल्लेख किया गया है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म द्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणों की महिमा का

वर्णन युधिष्ठिर के समक्ष किया गया है जिसमें विज्ञान के गुणों से सम्पन्न श्रोताओ को श्रेष्ठ बताया गया है यथा –

ये चापि तेषां श्रोतारः सदा सदसि सम्मताः । विज्ञान गुण सम्पन्नास्तेभ्यश्च स्पृहयाम्यहम्।।
उपर्युक्त वर्णन में विज्ञान के गुणों से युक्त श्रोता श्रेष्ठ बताया गया है,

इससे विज्ञान के महत्व का बोध होता है।

अतः यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महर्षि व्यास ने महाभारत में विज्ञान

के महत्व का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है।
महा. भा. शान्ति पर्व, 326.22 2 महा. भा. अनु. पर्व. 8.8
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