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महाभारत तथा पर्यावरण विज्ञान

वर्तमान समय में जनसंख्या वृद्धि के कारण पर्यावरण प्रदूषण की आशंका बढ़ गयी है। सम्प्रति न केवल यह वसुन्धरा ही प्रदूषण से आक्रान्त है अपितु जल, वायु, आकाश, तेजराशि युक्त आदित्य मण्डल भी प्रदूषण से आच्छादित है। आधुनिक वैज्ञानिकों के मतानुसार पृथ्वी मण्डल के रक्षा कवच ‘ओजोन परत’ में भी छिद्र हो गया है।

पर्यावरण प्रदूषण का परिणाम उत्तरोत्तर बढ़ ही रहा है। स्वार्थ साधन में संलग्न मानवों द्वारा गङ्गा, यमुना आदि नदियों का जल प्रदूषित हो रहा है, वनों को काटा जा रहा है, वन्य जीवों की हिंसा आदि की जा रही है। जिसके कारण वायुमण्डल में कार्बनडाई ऑक्साइड गैस (Co2) की मात्रा में वृद्धि हो रही है

तथा पृथ्वी की उर्वराशक्ति भी कम हो रही है। अतः सभी देशों के प्रबुद्ध वर्ग के चिन्तक पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रयत्नशील हैं। इस दृष्टि से समस्त लोगों के लिए पर्यावरण विज्ञान के ज्ञान का होना अनिवार्य है।

पर्यावरण विज्ञान-सामान्य परिचय
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समस्त विश्व प्राकृतिक पर्यावरण से घिरा हुआ है। इसे भौगोलिक पर्यावरण भी कहते हैं। इसके अन्तर्गत जलवायु ऋतु में तापक्रम, भूमि की उत्पादकता, जङ्गल, पर्वत, समुद्र, आकाश, सूर्य, चन्द्र, पशु-पक्षी आदि आते हैं।

‘पर्यावरण’ शब्द, दो शब्दों से मिलकर बना है ‘परि+आवरण’, ‘परि’ अर्थात् चारों ओर, आवरण अर्थात् ढके हुए। कोई भी वस्तु पदार्थ जो ढका हुआ हो या घिरा हुआ है, वह उसका आवरण है। उसी प्रकार जिन पदार्थों से, जिन क्रियाकलापों से हम घिरे हुए हैं, वही हमारा “पर्यावरण” है।
इस प्रकार वे सभी दशायें जो एक प्राणी के अस्तित्व के लिए आवश्यक है तथा उसे चारों ओर से घेरे हुये हैं, वह “पर्यावरण” कहलाती है।

मैकाइवर तथा पेज के अनुसार, “भौगोलिक पर्यावरण उन सभी दशाओं से मिलकर बना है जो प्रकृति ने मनुष्य को प्रदान की है। भौगोलिक पर्यावरण का सम्बन्ध ऐसी प्राकृतिक दशाओं से है जो मनुष्य से प्रभावित हुए बिना अपना कार्य करती है

तथा जो मनुष्य के अस्तित्व तथा कार्यों से स्वतन्त्र रहते हुए स्वयं परिवर्तित रहती है। वायु, जल, भूमि, पेड़-पौधे, वनस्पति और जीव-जन्तु सभी मिलकर वातावरण का निर्माण करते हैं,
इसे वैज्ञानिक भाषा में “पर्यावरण” (Environment) कहते हैं।

महाभारत तथा पर्यावरण विज्ञान

स्वस्थ पर्यावरण ही मानव तथा कृषि की आधारशिला होती है। इससे ही चतुर्दिक विकास सम्भव है। अतः पर्यावरण एक ऐसी व्यापक दशा है जो सभी प्राणियों के कार्यों, विचारों तथा व्यावहारों को प्रभावित करती है तथा विभिन्न प्रकार से लाभकारी सिद्ध होती है।

इसका विस्तृत उल्लेख वेदों, उपनिषदों, पुराणों रामायण-महाभारत आदि महाकाव्यों में मिलता है जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि प्राचीनकाल में ऋषि, मुनि, तपस्वी आदि विद्वान पर्यावरण विज्ञान के प्रति अत्यन्त चिन्तनशील थे।

इस सन्दर्भ में ऋग्वेद के दशम मण्डल का एक सौ छियालीसवां सूक्त “अरण्यानी सूक्तम्” नाम से प्राप्त होता है, जिसमें ‘अरण्यानी’ को सभी जीवों की माता के रूप में व्यक्त किया गया है। यजुर्वेद में वृक्षों को पूज्य मानकर प्रमाणित किया गया है।
आदि.गृह.विज्ञा. पृ. 107 ‘

आश्चनगन्धिं सुरभिं बह्वन्नामकृषीवलाम् । प्राहं मृगाणां मातरं अरण्यामनिमशंसितम्।।।
ऋ.वे. 10.146.6 ‘

नमो वृक्षेभ्यः।
यजु. वे. 16.17

ओषधीनां पतये नमः |16.19

अरण्यानां पतये नमः | 16.20

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ऋग्वेद में जल को प्राणियों का हितैषी बन्धु कहा गया है।’ महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में पर्यावरण विज्ञान से सम्बद्ध वैज्ञानिक चेतना का उल्लेख किया है। महाभारतकार ने पर्यावरण शुद्धि का सम्बन्ध धर्म से जोड़कर अभिव्यक्त किया है तथा प्रकृति को देवतामय माना है।

महर्षि व्यास ने नदी, पर्वत, समुद्र, वृक्षों की जड़, गोशाला, दुर्गम मार्ग, वन, चौराहे, सड़क, चबूतरे, किनारे गजशाला, अश्वशाला, रथशाला, जीर्ण उपवन, जीर्ण गृह पञ्चभूत, दिशा, विदिशा, चन्द्रमा, सूर्य उनकी किरणें, रसातल तथा अन्यान्य स्थानों में उनके अधिष्ठाता देवता को श्रद्धासहित प्रणाम किया है।

इन समस्त स्थानों में रूद्र देवता का वास होना स्वीकार किया है। महर्षि व्यास ने महाभारत के शान्तिपर्व में जाजलि और तुलाधार के आत्मयज्ञ विषयक धर्मोपदेश में समस्त नदियों को सरस्वती के रूप में व्यक्त किया है तथा पर्वतों को पूजनीय बताया है। यहाँ इस विवरण से ऐसा प्रतीत होता है

कि व्यास द्वारा प्रकृति को धार्मिक भाव से जोड़ने का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के सन्दर्भ में ही है क्योंकि धार्मिक भाव रखने पर मानव स्वतः ही ऐसे स्थलों को प्रदूषित नहीं करेगा तथा इससे पर्यावरण प्रदूषण की समस्या का समाधान स्वतः हो सकेगा। महाभारतकार ने गीता में भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से कहे गये वचनों में मानसिक पर्यावरण के संरक्षण का उल्लेख किया है।

यथा –
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।’
अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम् । पृञ्चतीमधुना पयः ।।
ऋ. वे. 1.23.16 2

ये नदीषु समुद्रेषु पर्वतेषु गुहासु च। वृक्षमूलेषु गोष्ठेषु कान्तारे गहनेषु च।।
रसतलगता ये च ये च तस्मै परं गताः । नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्योऽस्तुनित्यशः ।।
महा. भा. शान्ति पर्व 284.172-175 3

सर्वा नद्यः सरस्वत्यः सर्वेपुण्याः शिलोच्चया
वही 263.42 4 गीता. 7.4

इस वर्णन में भूमि से अहङ्कार पर्यन्त सभी को पर्यावरण कहा गया है। ऐसा संस्कृत वाङ्मय में वर्णित है। काम, क्रोध, लोभ आदि मानसिक पर्यावरण को दूषित करते हैं। विवेक ज्ञान से ऐसा आवृत होता है। अतः गीता के अध्याय तीन में भगवान श्रीकृष्ण का कथन है –

इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमच्यते। एतैर्विमोध्यत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ।।


जब विवेक ज्ञान का तिरोधान होता है तब ज्ञान-विज्ञान का नाश होता है। जिससे सर्वत्र हिंसा, आतङ्कवाद, अपहरण आदि उत्पन्न होता है। गीता में कहा गया है कि

आधिभौतिक पदार्थ स्थूल और आधिदैविक पदार्थ सूक्ष्म है, यथा –
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु पराबुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ।।

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इन्द्रियां, मन, बुद्धि और आत्म ये सूक्ष्म जगत के पदार्थ हैं। ये सभी काम, क्रोध आदि भावों से आवृत्त होते हैं जिससे मानसिक तथा रासायनिक पर्यावरण प्रदूषित होता है। अतः इस आधार पर पर्यावरण के तीन भेद किये जा सकते हैं ,

भौतिक पर्यावरण – इसमें वृक्ष, वनस्पति, नदी, पर्वत, खगोल आदि से मानव जीवन पर प्रभाव पड़ता है,

सामाजिक पर्यावरण – इसमें आचार, भाव, विचार आदि का मानव जीवन पर प्रभाव पड़ता है,

मानसिक पर्यावरण – इसमें काम, क्रोध आदि मनोवेग द्वारा संयम, शिव सङ्कल्प से शान्ति लाभ प्राप्त होता है।

महाभारत तथा जीवों की रक्षा

प्राचीन वैदिक युग से ही ऋषियों और विद्वानों ने वन्य जीवों की रक्षा को महत्वपूर्ण बताया है। प्राचीन ग्रन्थों में इससे सम्बन्धित अनेक तथ्यों का उल्लेख मिलता है। महर्षि व्यास ने गीता में श्रीकृष्ण के वचनों में प्रकारान्तर से यह उल्लेख
गीता. 3.40 2 वही 3.42

किया है कि प्रकृति के पञ्चमहाभूतों से निर्मित सभी प्राणी, वनस्पति, पशु आदि देवताओं का ही रूप है तथा प्रत्येक प्राणी के हृदय में परमपिता परमात्मा का निवास है।’ महाभारतकार ने जीव तथा उसके परिवेश में परस्पर मैत्री तथा प्रेम भाव का होना अनिवार्य बताया है।

अतः उन्होंने जन्तुओं के प्रति हो रहे अत्याचार जैसे – बैलों को बधिया करना, उनसे भारी बोझ उठवाना, दमन करके काम में लगाना आदि को घृणित कार्य बताया है।

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साथ ही पशुओं का क्रय-विक्रय भी अनुचित बताया है। इस विषय में कारण का उल्लेख भी किया है कि पांच इन्द्रियों वाले समस्त प्राणियों में सूर्य,

चन्द्रमा, वायु, ब्रह्मा, यज्ञ और यमराज-इन सभी देवताओं का वास रहता है। जो इन्हें बेचकर आजीविकार्जन करते हैं,

वे पाप के भागी होते हैं। अतः महाभारतकार ने धर्म के आवरण में तुलाधार द्वारा धर्म विषयक चर्चा में जाजलि के प्रति प्रकारान्तर में यह कहा है कि

बकरा अग्नि का, भेड़ वरूण का, घोड़ा सूर्य का और बछड़ा चन्द्रमा का स्वरूप है। अतः इस कथन से यह प्रतीत होता है कि महाभारतकाल में जीव की रक्षा के प्रति समाज चेतनाशील था।

महाभारत काल में जन्तुओं की हिंसा करना तथा मांसाहार करना पाप माना जाता था, परन्तु कहीं-कहीं अपवाद रूप मांसाहार का उल्लेख भी महाभारत में मिलता है।

महाभारत के वन पर्व में धर्म-व्याध तथा कौशिक के संवाद में हिंसा और अहिंसा का विवेचन किया गया है

जिसके अनुसार प्रकारान्तर से यह कथन मिलता है कि प्राणियों का वध करने वाला मनुष्य तो निमित्त मात्र है अतिथियों तथा पोष्य वर्ग के भोजन में और पितरों की पूजा में मांस का उपयोग होने से धर्म होता है।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
महा. भा. भीष्म पर्व, 42.61 (गीता 18.81)

ये चच्छिन्दन्ति वृषणान् ये च भिन्दन्ति नस्तकान्। वहन्ति महतो भारान् वध्नन्ति दमयन्ति च ।। अजोऽग्निर्वरूणो मेषः सूर्योऽश्वः पृथिवी विराट ।। धेनुर्वत्मश्च सोमो वै विक्रीयैतन्न सिध्यति।
262.37-41

निमित्तभूता हि वयं कर्मणोऽस्य द्विजोत्तम | येषां हतानां मांसानि विक्रीणामीह वैद्विज ।। तेषामपि भवेद् धर्म उपयोगे च भक्षणे। देवतातिथिभृत्यानां पितॄणां चापि पूजनम् ।।
महा. भा. वन पर्व. 208.4-5

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वहीं दूसरी ओर शान्तिपर्व में राजा विचख्नु के द्वारा अहिंसा धर्म की प्रशंसा की गयी है जिसमें स्पष्ट रूप से यह कहा गया है कि जो यह सोचते हैं कि

यज्ञ में वृक्ष, अन्न, पशु आदि की आहूति से प्राप्त मांसाहार करना उचित है तो यह ठीक नहीं है अपितु कोई भी ऐसे धर्म की प्रशंसा नहीं करता है।

सुरा, आसव, मधु, मांस और मछली तथा तिल और चावल की खिचड़ी, इन सब वस्तुओं को धूर्तो ने यज्ञ में प्रचलित कर दिया है।

वेदों में इनके उपयोग का विधान नहीं है। अतः इस कथन से यह प्रतीत होता है कि महाभारत काल में यज्ञजनित पशु-पक्षियों की हिंसा को अनुचित माना जाता था।

साथ ही अहिंसा को परम धर्म भी माना जाता था। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अहिंसा को परम धर्म स्वीकार किया है।

इस सन्दर्भ में महाभारत के उद्योग पर्व में सप्तर्षियों तथा नहुष के मध्य यज्ञ-बलि के सन्दर्भ में चर्चा की गयी है जिसमें ऋषियों के मतानुसार वेद में प्रयुक्त गवालम्भ इस बात का प्रमाण है

कि पशु हिंसा यज्ञ के सन्दर्भ में धर्म ही कहलाती है। इस कथन पर नहुष ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वह प्रमाण नहीं है।

नहुष ने किस आधार पर यह उत्तर दिया उल्लेख नहीं मिलता है किन्तु टीकाकार के मतानुसार नहुष का कथन है कि ब्राह्मण ग्रन्थों में हवन के मंत्र हैं

तथा यज्ञ की हवि अर्थात्, दूध, घी, कण्डे आदि गौओं में हैं। इसी कारण गौ और ब्राह्मण दोनों ही पवित्र और अवध्य हैं। अतः यह

यदि यज्ञांश्च वृक्षांश्च यूपांश्चोद्दिश्य मानवाः । वृथा मांस न खादन्ति नैष धर्मः प्रशस्यते।। सुरा मत्स्या मधु मांस मासवं कृसरौदनम् । धूर्तेः प्रर्वाततं ह्येतन्नैद् वेदेषु कल्पितम् ।।
महा. भा. शान्तिपर्व 2658-9

प्राणिनामवधस्तात सर्वज्यायान्मतो मम | अनृतं वा वेदद्वाचं नच हिंस्यात्कथंचन।।
महा. भा. कर्ण पर्व. 23.69

य इमे ब्राह्मणा प्रोक्तामंत्रा वै प्रोक्षणे गवाम् । एते प्रमाणं भवत उताहो नेति वारूप।। नहुषो नेति तानाह तमसा मूढ़ चेतनः।
महा.भा.उद्यो. पर्व 17.9-10

ब्राह्मणांश्चैव गावश्च कुलमेकं द्विधाकृतम् । एकत्र मन्त्रास्तिष्ठन्ति हविरेकत्र तिष्ठति।।

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प्रतीत होता है कि यज्ञ में गो बलि का निषेध तभी (नहुष के समय) से ही है। यहाँ महाभारतकार ने प्रकारान्तर में जीवों की हिंसा करना अनुचित बताया है।

महर्षि व्यास ने महाभारत में अनेक स्थानों पर गोवंश का रक्षण, पालन तथा संवर्धन का उल्लेख किया है।

इस सन्दर्भ में महाभारत के अनुशासन पर्व के सत्तहत्तरवें अध्याय में कपिला गौओं की उत्पत्ति तथा महिमा का वर्णन,

इसी पर्व के अठहत्तरवें अध्याय में वसिष्ठ द्वारा सौ दास के प्रति गोदान की विधि तथा महिमा का वर्णन किया गया है।

इसी पर्व में आगे लक्ष्मी और गौओं के संवाद की चर्चा की गयी है जिसमें गौओं के द्वारा गोबर तथा गोमूत्र में लक्ष्मी के निवास का उल्लेख मिलता है।

इससे यह प्रतीत होता है कि धार्मिक सन्दर्भ में गौओं का विशेष महत्व है। अतः यह कथन महाभारतकालीन जीव संरक्षण की ओर सङ्केत देता है।

ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में यह वर्णन मिलता है कि जो मनुष्य गौ, बैल आदि पशुओं, धनी, वणिजनों और खेती करने वालों की भलीभांति रक्षा करता है, वह मनुष्यों में शिरोमणि है।

अथर्ववेद में गौओं को पूजनीय बताय गया है। इस सन्दर्भ में अथर्ववेद के चतुर्थ काण्ड में सभी दिशाओं को गौओं के समान तथा चन्द्रमा को उनके बछड़ों के समान बताया गया है।

वाल्मीकि रामायण में भगवान राम के पूर्वज महाराज दिलीप द्वारा नन्दिनी गाय की पूजा करने का उल्लेख मिलता है। यही नहीं महाभारत काल में उत्पन्न हुए

दिष्टया प्रसादो युष्माभिः कृतो मेऽनुग्रहात्मकः | एवं भवतु भद्रं वः पूजितास्मि सुखप्रदाः ।।
महा. भा. अनु. पर्व 82.85

पूर्वामनु प्रयंतिमा ददे वस्त्रीन् युक्तां अष्टावरिधांयसो गाः ।
सुबर्धवो ये विश्योइव वा अनस्वन्तुः श्रव ऐषन्त पज्राः ।।
ऋ. वे 1.26.5

दिशो धेनवस्तासां चन्द्रो वत्सः ।
अथर्व वे. 4.39.8

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भगवान् श्रीकृष्ण का एक सर्वप्रिय नाम ‘गोपाल’ है। अतः इस समस्त विवरण से प्रतीत होता है कि प्राचीन वैदिक युग से ही जीवों की सुरक्षा का विशेष महत्व था।

महाभारत तथा वृक्षारोपण

मानव जीवन में वृक्षों का विशेष महत्व है। वृक्ष पर्यावरण को स्वच्छ, सन्तुलित बनाये रखने में सर्वाधिक योगदान देते हैं। ये मिट्टी के कटाव (Soil Erosion) को रोककर मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं जिससे उत्तम फसल प्राप्त होती है। इनके द्वारा कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2) के अवशोषित करने तथा ऑक्सीजन (O2) प्रदान करने के कारण ही वातावरण की वायु शुद्ध होती है,

अतः इतने महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कारणों के कारण वृक्ष ‘जीवनदाता’ कहलाते हैं। प्राचीन काल में ऋषि, मुनि, तपस्वी आदि वृक्षों की उपयोगिताओं से भली-भांति परिचित थे।

इस सन्दर्भ में प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों जैसे – वेदों, पुराणों, उपनिषदों, महाकाव्यों आदि में उल्लेख मिलता है। यथा – ऋग्वेद के दशम मण्डल में लिखित मंत्रानुसार, ‘विश्व भेषज’ नामक संबोधन द्वारा आरोग्यकर (औषधीकृत) भेषज वायु प्रवाहित होने का सङ्केत मिलता है।’

यजुर्वेद में वनस्पति, वृक्ष आदि को औषधि के अर्थ में व्यक्त किया गया है।’ ऋग्वेद के दशम मण्डल का एक सम्पूर्ण सूक्त वन देवता के लिए वर्णित है यथा – अरण्यानी सूक्त।

महाभारत में वृक्षारोपण से सम्बन्धित विस्तृत विवेचन मिलता है। इस सन्दर्भ में भीष्म द्वारा युधिष्ठिर के प्रति बगीचे लगाने से प्राप्त फल की चर्चा की गयी है जिसके अनुसार, वृक्षारोपण करने वाला पुरूष अपने मरे हुए पूर्वजों और भविष्य में आने वाली सन्तानों का तथा पितृकुल का ही उद्धार कर देता है, जो वृक्ष लगाता है

आ वात वाहि भेषजं विवातं वाहि यद्रपः । त्वं हि विश्वभेषजो देवानां दूत ईयसे ।।
ऋ. वे. 10.137.7 2

ओषधयः शान्तिः वनस्पतयः शान्तिः ।
यजु. वे. 36.17

माध्वीनः सन्त्वोषधीः 13.27 3 ऋ. वे. 10.146वां सूक्त

उसके लिये ये वृक्ष पुत्ररूप होते हैं, इसमें संशय नहीं है। फूले–फले वृक्ष इस जगत में मनुष्यों को तृप्त करते है, जो वृक्ष का दान करता है, उसको वे वृक्ष पुत्र की भांति परलोक में तार देते हैं।’ महर्षि व्यास द्वारा वर्णित इस कथन से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि महाभारत काल में पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामान्यतः लोग सचेत थे।

वे वृक्षारोपण के महत्व से भली-भांति परिचित थे।
महाभारतकार ने सभा पर्व में श्रीकृष्ण द्वारा स्वयं वृक्षारोपण किये जाने का उल्लेख किया है। जिससे यह प्रतीत होता है कि भगवान द्वारा इस कर्म के किये जाने से इस कर्म (वृक्षारोपण) का महत्व और भी बढ़ गया।

अतः महाभारतकार ने सामान्य जनता में पर्यावरण के प्रति वैज्ञानिक चेतना को जाग्रत करने के उद्देश्य से ही श्रीकृष्ण द्वारा वृक्षारोपण का उल्लेख किया है।
पर्यावरण संरक्षण हेतु वृक्षों के महत्व से महाभारतकालीन लोग भलीभांति परिचित थे। महाभारतकार ने वृक्षारोपण कर्म को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना है।

उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के माध्यम से भी अनेक स्थानों पर वृक्षों के महत्व तथा विशेषताओं का उल्लेख महाभारत में किया है।

गीता के पन्द्रहवें अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा संसारवृक्ष का उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार आदिपुरूष परमेश्वर संसार रूपी वृक्ष की जड़ (मूल) है, ब्रह्मा उस वृक्ष की शाखायें, वेद उसके पत्ते हैं। इस तरह भगवान ने स्वयं वृक्षों के महत्व को

अतीतानागते चोभे पितृवंशं च भारत | तारयेद् वृक्षरोपी च तस्माद् वृक्षांश्च रोपयेत् ।। तस्य पुत्रा भवन्त्येते पादपानात्र संशयः। परलोकगतः स्वर्ग लोकांश्चाप्नोति सोऽव्ययान् ।। पुष्पिताः फलवन्तश्वतर्पयन्तीह मानवान् । वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र तु।।
महा. भा. अनु. पर्व 58.26, 27.30 2

ये च हैमवता वृक्षा ये च नन्दनजास्तथा । आहृत्य यदुसिंहेन तेऽपि तत्र निवेशिताः ।।
महा. भा. सभा. पर्व. 38

ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुख्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ।।
गीता 15.1

सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना है। पुराणों में भी वृक्षों को देवत्व रूप में स्वीकार किया गया है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने शोध के आधार पर यह बताया है कि पीपल के वृक्ष से सर्वाधिक ऑक्सीजन (O2) मुक्त होती है।

अतः पर्यावरण की शुद्धि के लिए यह वृक्ष अत्यन्त आवश्यक है। महर्षि व्यास ने भी महाभारत में पीपल के वृक्ष को विशेष रूप से लाभकारी बताया है। गीता के दशम अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं को ‘पीपल का वृक्ष’ कहकर सम्बोधित किया है।

इसी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्होंने पीपल की विशेषता को प्रकट करने तथा पर्यावरण को शुद्ध बनाने के उद्देश्य से ही स्वयं को पीपल का वृक्ष कहा होगा। इस सन्दर्भ में यजुर्वेद में कहा गया है कि पीपल के नीचे बैठना चाहिए और पलाश के वृक्षों के समीप बस्ती बनानी चाहिए।

ऋग्वेद में वायु प्रदूषण से बचने के लिये निर्देश दिया गया है कि वन में वनस्पतियां उगाओ।’ अथवा ‘वृक्षारोपण करो’ ‘वन महोत्सव’ मनाओ। यदि मानव स्वार्थवश वृक्षों, वनों आदि को काटता ही रहेगा और नये वृक्ष नहीं लगाएगा तो पृथ्वी पर कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ जाएगी,

पर्वतों पर जमी बर्फ पिघलने लगेगी, जिससे जल प्लावन की समस्या उत्पन्न हो जाएगी।

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इस सन्दर्भ में यजुर्वेद में मानवता की रक्षा हेतु यह वर्णन मिलता है कि “हे वनस्पति ! इस तेज कुल्हाड़े ने महान् सौभाग्य के लिए तुझे काटा है, तेरा उपयोग हम सहस्राङ्कुर होते हुए करेंगे।

इससे प्रतीत होता है कि वृक्ष को ऐसा काटने के बाद में उस स्थान पर अनेक अङ्कर उत्पन्न हो सके और इसके वायु प्रदूषण का निवारण हो सके।

मूले ब्रह्मा त्वचे विष्णु शाखायांच महेश्वरः ।
सं. वाइ विज्ञा. पृ. 212 2
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गीता. 10.26
अश्अश्वत्थ वो निषदनं पणे वो वसतिष्कृता।
यजु. वे. 12.79 4
“वनस्पतिं वन आस्थापयध्वम्”
ऋ.वे. 10.101.11 5

अयं हि वा स्वधितिस्तेतिजानः प्रणिनाय महते सौभाग्याय ।
अतस्त्वं देव वनस्पते शान्तवल्शो विरोह, सहस्रवल्शा विषयं रूहेम |
यजु. वे. 5.43

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