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वेद पुराण

puran tatha paryavaran

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संस्कृत वाड.मय में पुराणों का एक विशिष्ट स्थान है । इसमें वेदों के गुढ़ार्थ के स्पष्टीकरण की अपूर्व क्षमता है। अतः पुराण सर्वथा वेदानुकूल है । पुराणों का एक भी विषय वेद विरुद्ध नहीं है। और इसकी प्रमाणिकता के प्रति भी संदेह नहीं हैं ।

वेद पुराण-स्मृति न्याय दर्शन आदि में पुराणों की अति प्राचीनकता सिद्ध की गयी है :

ऋचः समानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह ।
उच्छिष्टाज्जाज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रिताः ।। 2411
अर्थववेद।111/7/24

इतिहासं पुराणं पंचम वेदानां वेदम् ।।62।।
न्याय दर्शन। 14/1/62

पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं व्रहमणा स्मृतम् ।
अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ।।
मत्स्य पुराण 153/3

पुराण क्या है ? इसका अर्थ क्या – क्या है ? अनेक ग्रन्थों में
इसकी व्याख्या कैसे की गई है ।

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पुरा अपि नवं पुराणम् ‘ से यह प्रतीत होता है कि
पुराना होने पर भी जो नवीन हो वह पुराण है ।
वायु पुराण के अनुसार

यस्मात् पुरा ह्यनतीदं पुराणं तेन तत स्मृतम ।
वायु०।11/1/83

जो पूर्व में सजीव था वह पुराण कहा गया है। हमारे धर्म-शास्त्रों में पुराणों की बड़ी महिमा बखान किया गया है

उन्हें साक्षात हरि का रुप बताया गया है । जिस प्रकार सम्पूर्ण जगत को आलोकित करने के लिए भगवान सूर्य के रुप
में प्रकट होकर बाहरी अन्धकार को नष्ट कर देते हैं। उसी प्रकार हमारे हृदयान्धकर को दूर करने के लिए हरि पुराण विग्रह
धारण करते हैं। वेदों की भॉति पुराण भी हमारे यहाँ अनादि माने गये हैं और उनका रचयिता कोई नहीं माना गया है लेकिन बाद में व्यवस्थित ढंग से संकलन कर्ता वेद व्यास को माना जाता है । इराकी प्राचीनता के विषय में इसरो ही स्पष्ट हो जाता है कि सृष्टि कर्ता ब्रह्मा जी भी पुराणों का स्मरण करते हैं ।

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पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रहमणा स्मृत् ।
पुराण विघा महर्षियों का सर्वस्व है। 20वीं तथा 21वीं शताब्दी जिसे विज्ञान का मध्यान्ह काल माना जाता है, किन्तु जितने भी ज्ञान विज्ञान आज तक उच्च भूमि पर पहुंच चुके हैं, जितने अभी अधूरे तथा अभी गर्भ में ही हैं। उनमें से एक

भी ऐसा नहीं है, जिसके सम्बन्ध में पुराणों में कोई उल्लेख न मिलता हो । हजारों वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों को इन सब बातों
का ज्ञान था , जो आज के ज्ञान-विज्ञान में है अथवा नहीं है। राजनीति , धर्म-नीति, इतिहास, समाज-विज्ञान,

ग्रह-नक्षत्र ,विज्ञान, आयुर्वेद, भुगोल, ज्योतिष आदि समस्त विधाओं का प्रतिपादन पुराणों में हुआ है । पहले हम समझते
थे कि पुराणों में कथायें ही होगी परन्तु जब हमने इसका अध्ययन किया तब तो हम चकित रह गये । संसार का ऐसा

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कोई भी ज्ञान नहीं है जो पुराणों में न हो । वेदों का जहाँ मुख्य प्रतिपाघ विषय यज्ञ है वहीं पुराणों का मुख्य विषय
लोकवृत (चरित्र) है । लोकवृत्तीय समाज में प्रमुख स्थान मानव का होता है । समस्त जीवों का मूलाधार जल, वायु, सूर्य तथा पृथ्वी है। अतः इसी लिए पुराणों में इसके संरक्षण की बात कही गयी है । वैसे पुराणों के समय में पर्यावरण जैसी कोई समस्या की बात नहीं कही गयी है।

पुराणों के समय में पर्यावरण जैसी कोई समस्या नहीं थी फिर भी पुराणों में इसके संरक्षण को धर्म बताया गया है। अतः इससे यह प्रमाणित होता है कि प्राचीन काल में हमारे ऋषि पर्यावरण के संरक्षण तथा पर्याप्त संतुलन बनाए रखने की बात पर बल देते थे। यह तथ्य आज के परिवेश को देखते हुए भी अति प्रासांगिक है क्योंकि वर्तमान में

मानव विज्ञान तथा

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उसके द्वारा बनाए गए यंत्रों पर आधारित होता जा रहा है जिससे न केवल पर्यावरण असंतुलित हो रहा है अपितु प्रदूषित भी होता जा रहा है । यहाँ पर यह यक्ष प्रश्न भी हमारे सामने आता है कि वर्तमान यान्त्रिक जीवन शैली को

अपना कर के आज का मानव किस दिशा में प्रगति कर रहा है ? क्या इस प्रकार की असंतुलित सोच से हम संपूर्ण मानव जाति का ही अस्तित्व तो खतरे में नहीं डाल रहे है ? इन प्रश्नों से उपजी शंकाओं का समाधान केवल पुराणों में वर्णित तथा समाव

ऋषिओं द्वारा दिए गए प्राकृतिक नियमों पर चल कर ही प्राप्त हो सकता है । अतएव , समस्त मानव जाति को पुराणों में
दिए गए सुविचरित आख्यानों पर पर्याप्त ध्यान देना चाहिए तथा अपनी जीवन शैली को पर्यावरण के अनुकूल बनाना चाहिए

पर्यावरण क्या है ?

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सरकत 4 वृ धातु का अर्थ है आवृत करना, जो भूमण्डल को परितः आवृत करे वहीं पर्यावरण है । पर्यावरण की परिधि मे समय सृष्टि गृहीत है । वैदिक वृत ही अवेस्ता में वॅरेथ (warrenth) अंग्रेजी में वीदर (Weather) हो
गया है। पर्यावरण शब्द · परि ‘ और आवरण से मिलकर बना है । इसके अन्तर्गत हमारे चारो ओर का विस्तृत वातावरण

आता है जिसमें सभी जीवित एवं निर्जीव वस्तुएँ और पदार्थ सम्पूर्ण जड़ और चेतन जगत सम्मिलित है । पृथ्वी के चारों
ओर प्रकृति तथा मानव निर्मित समस्त दृश्य या अदृश्य पदार्थ पर्यावरण के अंग हैं। हमारे चारों ओर का वातावरण और उसमें पाये जाने वाले प्राकृतिक

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अप्राकृतिक जड तथा चेतन जगत सभी का मिला-जुला नाम पर्यावरण है और उसके पारस्परिक तालमेल तथा अन्योन्य किया व पारस्परिक प्रभाव को पर्यावरण सन्तुलन कहते हैं। पर्यावरण अनेक कारकों का सम्मिश्रण है . अर्थात तापकम , प्रकाश , जल , मिट्टी इत्यादि । कोई वाह्य वल पदार्थ या स्थिति जो किसी भी प्रकार किसी प्राणी के जीवन

को पभावित करती है उसे पर्यावरण का कारक माना जाता है हमारा पर्यावरण , हमारे चारो ओर का समय वातावरण
है जिसमें जल,वायु, पेड़-पौधे , मिट्टी और प्रकृति के अन्य तत्व तथा जीव-जन्तु आदि शामिल है । हमारे चारों ओर का

वातावरण एवं परिवेश जिसमें हम आप और अन्य जीवधारी रहते हैं , सब मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते हैं। पर्यावरण का तात्पर्य उस समूची भौतिक जैविक व्यवस्था से भी है जिसमें समस्त जीवधारी रहते हैं , स्वभाविक विकास करते

हैं तथा फलते-फूलते हैं । इस तरह वो अपनी स्वभाविक प्रवृत्तियों का विकास करते हैं । ऐसा पुराणों में दिए गाए
उद्धरणों से भी स्पष्ट होता है।

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किसी भी जीव के पर्यावरण में वे सभी भौतिक व जैविक घटक सम्मिलित होते हैं । पृथ्वी से करोड़ों मील दूर होते हुए भी जीवो के पर्यावरण के लिए सूर्य का प्रकाश उतना ही महत्वपूर्ण है जितना जल, वायु तथा मिट्टी आदि । पर्यावरण के सभी घटक और कारक एक दूसरे को प्रभावित करते हैं । जैसे

सूर्य-उर्जा से जल व वायु गर्म होती है जिससे वाष्प बनती है और वायु उपर उठती है, वायु के बहने के साथ वाष्प बादलों के रुप में एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाती है । बादलों द्वारा सूर्य की उर्जा को पृथ्वी तक
पहुचने में बाधा उत्पन्न होती है । जिससे जल बरसता है फिर पेड़-पौधे पनपते हैं । अतः सपष्ट है कि पर्यावरण के किसी भी कारक के बिना अन्य कारक प्रभावित नहीं हो सकते हैं

वस्तुतः पर्यावरण के कारक आपस में इस तरह गुंथे होते हैं
जैसे जाल का ताना बाना ।
पर्यावरण एक व्यापक शब्द है , सीधे शब्दों में हम कह सकते हैं कि पर्यावरण है तो हम हैं , इसके बिना किसी भी प्राणी अथवा वनस्पति का कोई भी अस्तित्व नहीं है । जल, थल और वायुमण्टल किसी भी स्थान के पर्यावरण के मुख्य अंग होते है । इसके साथ मानव की जीवन कियाओं को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाले सभी

भौतिक तत्वों तथा अन्य जीवों का भी पर्यावरण के निर्माण में
यापर महत्वपूर्ण योगदान होता है । पर्यावरण मे समय के अनुसार
परिवर्तन होना स्वभाविक ही है । जीवों तथा वनस्पतियों के
विकास का सीधा सम्बन्ध पर्यावरण से है । इस लिए एक निश्चित सीमा तक प्राकृतिक परिवर्तनो को यथा वारिश , अकाल , हांडावात , बाढ़

तथा भूकंप आदि का सामना करने का तथा उससे बचाव का उपाय इत्यादि करते हुए जीवों को प्रकृति के ही अनकूल ढलने के लिए सामर्थ्य स्वय पर्यावरण ही प्रदान करता है । ऐसा वैज्ञानिकों द्वारा सिद्ध किया जा चुका है । जैसे कि चार्ल्स डारविन का प्राकृतिक चयन का सिद्धांत जिसके अनुसार प्रत्येक जीव की अग्रिम तथा विकसित प्रजाति के रुप में जन्म का कारण प्राकृतिक घटनागो तथा पारिस्थिकी से उसका संघर्ष है ।

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अतएव इस धरा पर विभिन्न प्रकार के जीव जन्तुओ तथा वनस्पतियों में
पाई जाने वाली विभिन्नताओं का अप्रत्यक्ष कारण पर्यावरण ही पृथ्वी का धरातल और उसकी सारी प्राकृतिक दशायें प्राकृतिक सशाधन . भूमि , जल पर्वत – मंदान . पाधे सम्पूर्ण प्राणी जगत , जो पृथ्वी पर विधमान होकर मानव को प्रभावित करती हैं । वे पर्यावरण के अन्तर्गत आती हैं ।

यधपि हमारे देश की प्राचीन संस्कृति पर्यावरण के संरक्षण के अनुरुप ही रही है । प्रत्येक जीव की पर्यावरण के कारकों के प्रति एक निश्चित सहनशीलता होती है सहनशीलता की सीमा से अधिकता के कारण मानवीय जीवन कियाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है । ऐसा पौराणिक धर्म ग्रन्थों में वर्णित है 

पर्यावरण के घटक पारस्परिक ताल-मेल नहीं रखते तो पर्यावरण में असतुलन की स्थिति व्याप्त हो जाती है। इसी लिए पारिरिशकी सन्तुलन को बनाये रखने के लिए हमारे प्राचीन मनीषीगण पर्यावरण के उपादनों पर दैवीय रुपों का प्रत्यारोपण किया है । इसी लिए पर्यावरण के सहायक तत्वों के सम्वर्धन के प्रति ऋषि गण काफी उत्साहित दिखाई देते है तथा पर्यावरण के विकास के तत्वों को धर्म तथा धार्मिक कियाओ से जोड़कर आम जनता को इसकी (पर्यावरण) महत्ता का दर्शन कराया ।

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जिससे आम जनता भी पर्यावरण के विकास में अपना योगदान दे सके । पौराणिक युगीन साहित्यकार शूद्रक ने अपने प्रसिद्ध सस्कृत नाटक ‘मृच्छकटिकम’ में भी तरह तरह को पर्यावरण पर आधारित उत्सवों जैसे वसन्तोत्सव , शरदोत्सव आदि का हर्षोल्लास से तत्कालीन नगरो में मनाए जाने का जिक्र किया है जिसमें आम जनता भी बढ़ चढ़ कर भाग लेती थी ।

इससे यह सिद्ध होता है कि पौराणिक समाज विशेष रुप से नगरीय समाज पर्यावरण के संतुलन के प्रति जागरुक था। पौराणिक कालीन संस्कृत साहित्य के महाकवि कालिदास के लगभग समस्त नाटकों में प्राकृतिक सौन्दर्य का विशद तथा मनोहारी वर्णन है जिससे यह पता चला है कि जीवन के प्रत्येक स्तर चाहे वह साहित्य सृजन हो या
फिर धार्मिक कियाओं का संपादन हो पौराणिक समाज
पर्यावरण के समस्त घटकों में उचित संतुलन बनाए रखने के
प्रति सचेष्ट था।

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विभूतिपाद-३

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shivling kya hai

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संक्षिप्त शिवपुराण

शिव-शक्ति और शिवलिंग क्या है❓

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सारा चराचर जगत् बिन्दु-नादस्वरूप है। बिन्दु शक्ति है और नाद शिव। इस तरह यह जगत् शिव-शक्तिस्वरूप ही है। नाद बिन्दुका और बिन्दु इस जगत का आधार है, ये बिन्दु और नाद ( शक्ति और शिव ) सम्पूर्ण जगत् के आधाररूपसे स्थित हैं। बिन्दु और नादसे युक्त सब कुछ शिवस्वरूप हैं;

क्योंकि वही सबका आधार है। आधारमें ही आधेयका समावेश अथवा लय होता है।यही सकलीकरण है। इस सकलीकरणकी स्थितिसे ही सृष्टिकालमें जगत् का प्रादुर्भाव होता है, इसमें संशय नहीं है। शिवलिंग बिन्दु नादस्वरूप है। अतः उसे जगत का कारण बताया जाता है। बिन्दु देव है और नाद शिव, इन दोनोंका संयुक्तरूप ही शिवलिंग कहलाता है।

अतः जन्मके संकटसे छुटकारा पानेके लिये शिवलिंग की पूजा करनी चाहिये। बिन्दुरूपा देवी उमा माता हैं और नादस्वरूप भगवान् शिव पिता। इन माता-पिताके पूजित होनेसे परमानन्दकी ही प्राप्ति होती है।

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अतः परमानन्दका लाभ लेनेके लिये शिवलिंगका विशेषरूपसे पूजन करे।देवी उमा जगत्की माता हैं और भगवान् शिव जगतके पिता। जो इनकी सेवा करता है, उस पुत्रपर इन दोनों माता-पिताकी कृपा नित्य अधिकाधिक बढ़ती रहती है । वे पूजकपर कृपा करके उसे अपना आन्तरिक ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।

अत: मुनीश्वरो ! आन्तरिक आनन्दकी प्राप्तिके लिये,शिवलिंगको माता-पिताका स्वरूप मानकर उसकी पूजा करनी चाहिये। भर्ग (शिव) पुरुषरूप है और भर्गा (शिवा अथवा शक्ति ) प्रकृति कहलाती है। अव्यक्त आन्तरिक अधिष्ठानरूप गर्भको पुरुष कहते हैं और सुव्यक्त आन्तरिक अधिष्ठानभूत गर्भको प्रकृति। पुरुष आदिगर्भ है,

वह प्रकृतिरूप गर्भसे युक्त होनेके कारण गर्भवान् है; क्योंकि वही प्रकृतिका जनक है। प्रकृतिमें जो पुरुषका संयोग होता है, यही पुरुषसे उसका प्रथम जन्म कहलाता है।अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्वादिके क्रमसे जो जगत्का व्यक्त होना है, यही उस प्रकृतिका द्वितीय जन्म कहलाता है।

जीव पुरुषसे ही बारंबार जन्म और मृत्युको प्राप्त होता है। मायाद्वारा अन्य रूपसे प्रकट किया जाना ही उसका जन्म कहलाता है, जीवका शरीर जन्मकालसे ही जीर्ण ( छः भावविकारोंसे युक्त) होने लगता है, इसीलिये उसे ‘जीव’ संज्ञा दी गयी है। जो जन्म लेता और विविध पाशोंद्वारा तनाव ( बन्धन) -में पडता है,

उसका नाम जीव है; जन्म और बंधन जीव शब्द का अर्थ ही है । अतः जन्म – मृत्युरूपी बन्धनकी निवृतिके जन्मके अधिष्ठानभूत मातृ-पितृस्वरूप शिवलिंगक पूजन करना चाहिए ।

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गायका दूध , गायका दही और गायका घी – इन तीनोंको पूजनके लिए शहद और शक्करके साथ पृथक-पृथक भी रखे और इन सबको मिलाकर समिल्लितरूपसे पंचामृत भी तैयार कर ले । (इनके द्वारा शिवलिंगका अभिषेक एवं स्नान कराये) , फिर गायके दूध और अन्नके मेल से नैवेद्य तैयार करके प्रणव मन्त्रके उच्चारणपूर्वक उसे भगवान शिवको अर्पित करे ।

सम्पूर्ण प्रणवको ध्वनिलिंग कहते हैं । स्वम्भूलिंग नादस्वरूप होनेके कारण नादलिंग कहा गया है । यन्त्र या अर्घा बिंदुस्वरूप होने के कारण बिंदुलिंगके रूपमें विख्यात है ।

उसमें अचल – रूपसे प्रतिष्ठित जो शिवलिंग है , वह मकार स्वरूप है , इसलिए मकारलिंग कहलाता है । सवारी निकालने आदि के लिए जो चरलिंग होता है , वह उकार स्वरूप होने से उकारलिंग कहा गया है तथा पूजाकी दीक्षा देनेवाले जो गुरु या आचार्य हैं , उनका विग्रह अकारका प्रतीक होने से अकारलिंग माना गया है।

इस प्रकार अकार , उकार , मकार ,बिन्दु , नाद और ध्वनिके रूपमें लिंगके छः भेद हैं । इन छहों लिंगोकी नित्य पूजा करनेसे साधक जीवनमुक्त हो जाता है , इसमें संशय नही है ।

लिंग पुराण
पूर्वभाग

चौथा अध्याय

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अलिङ्ग एवं लिङ्गतत्त्वका स्वरूप, शिवतत्त्वकी व्यापकता, महदादि तत्त्वोंका विवेचन,जगत्की उत्पत्तिका क्रम तथा महेश्वर शिवकी महिमा

सूतजी बोले-वह निर्गुण ब्रह्म शिव (अलिङ्ग) ही लिङ्ग (प्रकृति) -का मूल कारण है तथा स्वयं लिङ्गरूप (प्रकृतिरूप) भी है। लिङ्ग (प्रकृति) को भी शिवोद्भासित जाना गया है शब्द, स्पर्श, रूप, रस,गन्ध आदिसे रहित, अगुण, ध्रुव,अक्षय,अलिङ्ग (निर्गुण) तत्त्वको ही शिव कहा गया है।तथा शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धादिसे संयुक्त प्रधान प्रकृतिको ही उत्तम लिङ्ग कहा गया है॥ १-३ ।।

हे श्रेष्ठ विप्रो! वह जगत्का उत्पत्तिस्थान है, पंचभूतात्मक अर्थात् पृथ्वी, जल, तेज, आकाश, वायुसे युक्त है, स्थूल है, सुक्ष्म है, जगत्का विग्रह है तथा यह लिङ्गतत्व निर्गुण परमात्मा शिवसे स्वयं उत्पन्न हुआ है।

उस अलिङ्ग अर्थात् निर्गुण परमात्माकी मायासे
सात, आठ तथा फिर ग्यारह इस तरह कुल छब्बीस रूपवाले लिङ्गतत्व इस व्रह्माण्डमें व्याप्त हैं ॥ ५ ॥

उन्हीं माया वितत लिङ्गोंसे उद्धत तीनों प्रधान देव
शिवात्मक हैं। उन तीनोंमें एक ब्रह्मासे यह जगत् उत्पन्न हुआ, एक विष्णुसे जगत्की रक्षा होती है तथा एक रुद्रसे जगत्का संहार होता है। इस प्रकार शिवतत्त्वसे यह विश्व व्याप्त है।

वह परमात्मा निर्गुण भी है तथा सगुण भी है। लिङ्ग अर्थात् व्यक्त तथा अलिङ्ग अर्थात् अव्यक्तरूपमें कही गयी सभी मूर्तियाँ शिवात्मक ही हैं; इसलिए यह ब्रह्मांड साक्षात ब्रह्मरूप है । वही अलिंगी अर्थात अव्यक्त तथा बीजी भगत्तत्व परमेश्वर है ।। ६ – ८ ।।

वह परमात्मा बीज ( ब्रह्मा) भी है, योनि (विष्णु) भी है तथा निर्बीज (शिव) भी है और बीजरहित वह शिव जगत्का बीज अर्थात् मूल कारण कहा जाता है।
बीजरूप ब्रह्मा, योनिरूप विष्णु तथा प्रधानरूप शिवकी इस जगत्में अपनी-अपनी विश्व, प्राज्ञ तथा तैजस अवस्थाकी संज्ञा भी है॥ ९॥

यह विशुद्ध मुनिरूप परब्रह्म नित्यबुद्धस्वभावके कारण पुराणोंमें ‘शिव’ कहे गये
हैं॥ १० ॥

हे विप्रो! शिवकी दृष्टिमात्रसे प्रकृति ‘शैवी’ हो गयी तथा सृष्टिके समय अव्यक्त स्वभाववाली वह प्रकृति गुणोंसे युक्त हो गयी॥ ११ ॥

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अव्यक्त तथा महत्तत्त्वादिसे लेकर स्थूल पंचमहाभूतपर्यन्त सम्पूर्ण जगत् उसी प्रकृतिके अरधीन है। अत: विश्वको धारण करनेवाली शैवीशक्ति प्रकृति
ही अजा नामसे कही गयी है॥ १२ ॥

रक्तवर्णा अर्थात् रजोगुणवाली, शुक्लवर्णा अर्थात् सत्त्वगुणवाली तथा कृष्णवर्णा अर्थात् तमोगुणवाली एवं बहुविध प्रजाओंकी उत्पत्ति करनेवाली अजास्वरूपिणी उस प्रकृतिकी प्रेमपूर्वक सेवा करता हुआ यह बद्ध जीव उसका अनुसरण करता है॥ १३ ॥

दूसरे प्रकारका अनासक्त जीव प्रकृतिके भोगोंको भोगकर और उसकी असारता तथा क्षणभंगुरताको समझकर उस मायाका परित्याग कर देता है । परमेश्वर द्वारा अधिष्ठित वह अजा अंनत ब्रह्मांड की उत्पत्तिकर्त्री है।।१४।।

सृष्टिके समयमें तीन गुणोंसे युक्त अजरूप पुरुषकी आज्ञासे उसमें अधिष्ठित मायासे वह महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ ।।१५।।

सृष्टि करनेकी इच्छासे युक्त होकर उस अधिष्ठित महत्त्त्वने स्वत: अव्यय तथा अव्यक्त पुरुषमें प्रविष्ट होकर व्यक्त सृष्टिमें विक्षोभ उत्पन्न किया॥ १६॥

उस महत्तत्त्वसे संकल्प-अध्यवसायवृत्तिरूप सात्त्विक अहंकार उत्पन्न हुआ तथा उसी महत्तत्वसे त्रिगुणात्मकरूप रजोगुणकी अधिकतावाला राजस अहंकार उत्पन्न हुआ और उस रजोगुणसे सम्यक् प्रकारसे आवृत तमोगुणकी अधिकतावाला तामस अहंकार भी उसी महत्तत्वसे उत्पन्न हुआ है तथा उसी अहंकारसे सुष्टिको व्याप्त करनेवाली शब्द, स्पर्श आदि तन्मात्राएँ भी उत्पन्न हुई हैं॥ १७-१८॥

महत्तत्त्वजन्य उस तामस अहंकारसे शब्द तन्मात्रावाले अव्यय आकाशकी उत्पत्ति हुई और बादमें शब्दके कारणरूप उस अहंकारने शब्दयुक्त आकाशको व्याप्त कर लिया। हे विप्रो! इसी प्रकार तन्मात्रात्मक भूतसर्ग के विषयमें कहा गया है।

हे मुने! उस आकाशसे स्पर्श-तन्मात्रावाला महान् वायु उत्पन्न हुआ। पुन: उस वायुसे रूपतन्मात्रावाले अग्निकी उत्पत्ति हुई तथा अग्निसे रसतन्मात्रावाले जलका प्रादुर्भाव हुआ। फिर रसतन्मात्रावाले उस जलसे गन्धतन्मात्रावाली कल्याणमयी पृथ्वीकी उत्पत्ति हुई।॥ १९-२१ ॥

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हे श्रेष्ठ विप्रो! आकाश स्पर्शतन्मात्रावाले वायुको आवृत किये रहता है तथा रूपतन्मात्रावाले अग्निको आच्छादित करके यह क्रियाशील वायु रहता है॥ २२ ॥

साक्षात् अग्निदेव रसतन्मात्रावाले जलको आच्छादित किये रहते हैं तथा सभी रसोंसे युक्त जलतत्त्व गन्धतन्मात्रावाली पृथ्वीको आच्छादित किये रहता है॥ २३ ॥

इस प्रकार पृथ्वी पाँच (शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध) गुणोंसे, गन्धरहित शेष चार गुणोंसे जल, भगवान् अग्नि तीन गुणोंसे तथा स्पर्शसमन्वित वायु दो गुणोंसे युक्त हुए और अन्य अवयवोंसे रहित आकाशदेव मात्र एक गुणवाले हुए। इस प्रकार तन्मात्राओंके पारस्परिक संयोगवाला भूतसर्ग कहा गया है ॥ २४-२५ ॥

राजस, तामस तथा सात्त्विक सर्ग साथ-साथ
प्रवृत्त होते हैं, किंतु यहाँ पर तामस अहंकारसे ही सर्गका होना बताया गया है॥ २६ ॥

शब्द-स्पर्श आदिको ग्रहण करनेके लिये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा उभयात्मक मन इस जीवके लिये बनाये गये हैं॥ २७ ॥

महत्तत्त्वादिसे लेकर पंचमहाभूतपर्यन्त सभी तत्त्व अण्डकी उत्पत्ति करते हैं। वह परमात्मा ही पितामह ब्रह्मा, शंकर तथा विश्वव्यापी प्रभु विष्णुके रूपमें उस अण्डसे जलके बुलबुलेकी भाँति अवतीर्ण हुआ। ये सभी लोक तथा उनके भीतरका यह सम्पूर्ण जगत् उस अण्डमें सन्निविष्ट था ॥ २८-२९ ॥

वह अण्ड अपनेसे दस गुने जलसे बाहरसे व्याप्त था और जल बाहरसे अपनेसे दस गुने तेजसे आवृत था॥ ३० ॥

तेज अपनेसे दस गुने वायुसे बाहरसे आवृत था और वायु अपनेसे दस गुने आकाशसे बाहरसे आवृत था॥ ३१॥

शब्दजन्य वायुको आवृत किये हुए वह आकाश तामस अहंकारसे आवृत है। शब्द-हेतु आकाशको आवृत करनेवाला वह तामस अहंकार महत्तत्त्वसे घिरा हुआ है और वह महत्त्त्व स्वयं अव्यक्त प्रधानसे आवृत है ॥ ३२ ॥

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उस अण्ड (ब्रह्माण्ड)-के ये सात प्राकृत आवरण कहे गये हैं। कमलासन ब्रह्माजी उसकी आत्मा हैं। इस सृष्टिमें करोड़ों-करोड़ों अण्डों (ब्रह्माण्डों)-की स्थितिके विषयमें कहा गया है॥ ३३॥

प्रधान (प्रकृति) ही सदाशिवके आश्रयको प्राप्त करके इन करोड़ों ब्रह्माण्डोंमें सर्वत्र चतुर्मुख ब्रह्मा, विष्णु और शिवका सृजन करती है अन्तमें शम्भुका सहयोग प्राप्तकर वहीं प्रधान लय भी करती है।

इस प्रकार परस्पर सम्बद्ध आदि (सृष्टि) तथा अन्त (प्रलय) – के विषयमें कहा गया है। इस सृष्टिकी रचना, पालन तथा संहार करनेवाले वे ही एकमात्र महेश्वर हैं॥ ३४-३५|॥

वे ही महेश्वर क्रमपूर्वक तीन रूपोंमें होकर सृष्टि करते समय रजोगुणसे युक्त रहते हैं, पालनकी स्थितिमें सत्त्वगुणमें स्थित रहते हैं तथा प्रलयकालमें तमोगुणसे आविष्ट रहते हैं॥ ३६ ॥

वे ही भगवान् शिव प्राणियोंके सृष्टिकर्ता, पालक तथा संहर्ता हैं। अतएव वे महेश्वर ब्रह्माके अधिपतिरूपमें प्रतिष्ठित हैं,

जिस कारणसे भगवान्स दाशिव भव, विष्णु, ब्रह्मा आदि रूपोंमें स्थित हैं तथा सर्वात्मक हैं, इसी कारण वे ही ब्रह्माण्डवर्ती इन लोकोंके रूपमें तथा इनके कर्ता पितामहके रूपमें कहे गये हैं॥ ३७-३८॥

हे द्विजो! पुरुषाधिष्ठित यह प्राथमिक ईश्वरकृत अबुद्धिपूर्वक उत्पन्न तथा कल्याणकारी प्राकृत सर्ग मैंने तुम्हें सुनाया है॥ ३९॥

श्री शिव गीता
अध्याय
श्लोक – २६

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भगवान श्रीराम जी और महर्षि अगस्त्य जी के बीच संवाद
महर्षि अगस्त्य उवाच

दुर्ज्ञेया शांभवी माया तया संमोह्यते जगत् ।
माया तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।।२६।।

अनुवाद-अगस्त्य जी बोले-शिव जी की माया कठिनता से जानने योग्य है जिसने जगत् को मोह लिया है। उस माया को प्रकृति जानो और मायामय महेश्वर को जानो।

व्याख्या-एक ही ईश्वर से दो प्रकार की शक्तियों का अविर्भाव होता है जिनमें एक है उसकी चेतन शक्ति तथा दूसरी है उसकी जड़ शक्ति।

जड़ शक्ति से जड़ प्रकृति की रचना होती है तथा चेतना शक्ति से चेतन शरीरों की रचना होती है। ये दोनों शक्तियाँ अपने-अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करती हैं

इसलिए ईश्वर को कर्ता नहीं माना गया है। जिस प्रकार सूर्य का स्वभाव गर्मी देना है, बर्फ का स्वभाव शीतलता है, चीनी का स्वभाव उसका मीठापन है,

चुम्बक का स्वभाव लोहे को खींचना है, चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति से समुद्र में ज्वारभाटा आता है, चन्द्रमा के कारण कुमुदनी खिलती है।
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ये सभी कार्य इनके स्वभाव के कारण होते हैं ये स्वयं अपनी इच्छा से करते नहीं हैं। इसी प्रकार ईश्वर की मायाशक्ति से सृष्टि में सभी क्रियाएँ हो रही है। इसी को ईश्वर अथवा महेश्वर की माया शक्ति, प्रकृति अथवा उस शक्ति का स्वभाव कहा गया है।

इसलिए अगस्त्यजी कहते हैं कि सुख-दुःख का अनुभव न आत्मा को होता है,

न शरीर को बल्कि उस ईश्वर की चेतना शक्ति जब शरीर में कार्य करके उसी को अपना स्वरूप मान लेने के कारण उसे सुख-दुःख की अनुभूति होती है ।

यदि शरीर से उसका तादात्म्य छूट जाये तो उसको इसकी अनुभूति नहीं होती। हे रामचन्द्र! तुमको जो दुःख की अनुभूति हो रही है

उसका कारण तुमने शरीर के साथ अपना तादात्म्य कर दिया है। यदि इसका त्याग कर आत्मा में स्थित हो जाओ तो तुम इस दुःख से मुक्त हो सकते हो।

तुमने सीता को अपनी स्त्री माना है इसलिए तुम्हे दुःख हो रहा है । यदि किसी अन्य पुरुष की स्त्री का हरण होता तो तुम्हें दुःख नही होता ।

रावन तो कई कई स्त्रियों का अपहरण किया था उससे तुमको दुःख नही हुआ । किसी को अपना मान लेना ही दुःखों का कारण है ।

यही महेश्वर की माया है जो अज्ञान है । ज्ञान प्राप्ति पर इस माया का बंधन नही रहता ।

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श्री शिव गीता

अध्याय – २
श्लोक – २७ – २८

भगवान श्रीराम जी और महर्षि अगस्त्य जी के बीच संवाद

महर्षि अगस्त्य उवाच

तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत्।
सत्यज्ञानात्मकोऽनन्तो विभुरात्मा महेश्वरः।।२७।।

अनुवाद – उसी के अवयव रूप जीवों से सम्पूर्ण जगत व्याप्त है , वह महेश्वर सत्य स्वरूप , ज्ञान स्वरूप , अंनत और सर्वव्यापी है ।

व्याख्या-अगस्त्यजी कहते हैं कि वह महेश्वर तो सत्य स्वरूप है, चैतन्य शक्ति है, वही ज्ञान स्वरूप भी है तथा सर्वव्यापी है ।

वह सृष्टि की किसी क्रिया में न भाग लेता है, न उनमें कोई हस्तक्षेप ही करता है। वह तो निर्लिप्त रहकर दृष्टामात्र है। सृष्टि की सभी क्रियाएँ उसकी दोनों प्रकार की शक्तियों के स्वभाव के कारण हो रही हैं।

इसलिए दुःखों का कारण आत्मा नहीं बल्कि उसका स्वभाव है।

तस्यैवांशो जीवलोके हृदये प्राणिनां स्थितः ।
विस्फुलिङ्गा यथा वह्नेर्जायन्ते काष्ठयोगतः ॥ २८॥

अनुवाद – उसी का अंश जीवलोक में सब प्राणियों के हृदय में स्थित हुआ है । जिस प्रकार काष्ठ के योग से अग्नि में स्फुल्लिंग उठते हैं उसी प्रकार जीव भी परमात्मा से उतपन्न होता है ।

व्याख्या-वह परमात्मा सत् चित् व आनन्द स्वरूप है तथा वहीं सर्वव्यापी है जो इस जीवलोक में अर्थात् समस्त जीवों के शरीर में अंशरूप से व्याप्त है। वही सबके हृदय में स्थित है।

जिस प्रकार काष्ठ के संयोग से अग्नि में कई चिनगारियाँ उठती है उसी प्रकार ईश्वर की चेतनाशक्ति का जब प्रकृति से संयोग होता है

तो जीव- सृष्टि की रचना होती है। अकेली चेतना से जीवों की रचना नहीं हो सकती,

न अकेली प्रकृति जड़ होने से जीव सृष्टि की रचना कर सकती है। अत: जड़प्रकृति और ईश्वर की चेतनाशक्ति ही समस्त जीव जगत् की रचना करती है।

shiv puran – shivling kya hai

श्री शिव गीता

अध्याय – २
श्लोक – २६

भगवान श्रीराम जी और महर्षि अगस्त्य जी के बीच संवाद

महर्षि अगस्त्य उवाच

दुर्ज्ञेया शांभवी माया तया संमोह्यते जगत् ।
माया तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्।।२६।।

अनुवाद-अगस्त्य जी बोले-शिव जी की माया कठिनता से जानने योग्य है जिसने जगत् को मोह लिया है।

उस माया को प्रकृति जानो और मायामय महेश्वर को जानो।

व्याख्या-एक ही ईश्वर से दो प्रकार की शक्तियों का अविर्भाव होता है जिनमें एक है उसकी चेतन शक्ति तथा दूसरी है उसकी जड़ शक्ति।

जड़ शक्ति से जड़ प्रकृति की रचना होती है तथा चेतना शक्ति से चेतन शरीरों की रचना होती है। ये दोनों शक्तियाँ अपने-अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करती हैं
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इसलिए ईश्वर को कर्ता नहीं माना गया है। जिस प्रकार सूर्य का स्वभाव गर्मी देना है, बर्फ का स्वभाव शीतलता है,

चीनी का स्वभाव उसका मीठापन है, चुम्बक का स्वभाव लोहे को खींचना है, चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति से समुद्र में ज्वारभाटा आता है, चन्द्रमा के कारण कुमुदनी खिलती है।

ये सभी कार्य इनके स्वभाव के कारण होते हैं ये स्वयं अपनी इच्छा से करते नहीं हैं। इसी प्रकार ईश्वर की मायाशक्ति से सृष्टि में सभी क्रियाएँ हो रही है।

इसी को ईश्वर अथवा महेश्वर की माया शक्ति, प्रकृति अथवा उस शक्ति का स्वभाव कहा गया है। इसलिए अगस्त्यजी कहते हैं कि सुख-दुःख का अनुभव न आत्मा को होता है,

न शरीर को बल्कि उस ईश्वर की चेतना शक्ति जब शरीर में कार्य करके उसी को अपना स्वरूप मान लेने के कारण उसे सुख-दुःख की अनुभूति होती है ।

यदि शरीर से उसका तादात्म्य छूट जाये तो उसको इसकी अनुभूति नहीं होती। हे रामचन्द्र! तुमको जो दुःख की अनुभूति हो रही है

उसका कारण तुमने शरीर के साथ अपना तादात्म्य कर दिया है। यदि इसका त्याग कर आत्मा में स्थित हो जाओ तो तुम इस दुःख से मुक्त हो सकते हो।

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