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Advaitaarkopanishad

Advaitaarkopanishad yajurvediy upnishad

॥अद्वयतारकोपनिषद्॥

Advaitaarkopanishad yajurvediy upnishad

शुक्लयजुर्वेद से सम्बद्ध इस उपनिषद् में राजयोग का सविस्तार वर्णन है, जिसका सुपरिणाम ब्रह्म प्राप्ति के रूप में विवेचित है। इसमें सर्वप्रथम तारकयोग की व्याख्या करने का निश्चय व्यक्त करते हुए योग के उपाय और उसके फल की विवेचना की गई है।

तदुपरान्त ‘तारक’ का स्वरूप, लक्ष्यत्रय के अनुसंधान की विधि अन्तर्लक्ष्य, बहिर्लक्ष्य एवं मध्यलक्ष्य का लक्षण दो प्रकार के तारक का स्वरूप, तारकयोग की सिद्धि तारकयोग का स्वरूप, शाम्भवी मुद्रा अन्तलक्ष्य के विकल्प, आचार्य का लक्षण एवं अन्त में उपनिषद् की फलश्रुति वर्णित है। इस प्रकार इस उपनिषद् में भवसागर संसार बन्धन से त्राण पाने का अति सुगम उपाय तारक ब्रह्म की साधना का विधान प्रस्तुत किया गया है।

।।शांतिपाठः।।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

ॐ रूप में जिसे अभिव्यक्त किया जाता है, वह परब्रह्म स्वयं में सब प्रकार से पूर्ण है और यह सृष्टि भी स्वयं में पूर्ण है। उस पूर्ण तत्त्व में से इस पूर्ण विश्व की उत्पत्ति हुई है। उस पूर्ण में से यह पूर्ण निकाल लेने पर भी वह शेष भी पूर्ण ही रहता है। आधिदैविक आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक ताप-संताप शान्त हों।

अब अद्वयतारकोपनिषद् की व्याख्या योगियों, संन्यासियों जितेन्द्रियों तथा शम, दम आदि पड्गुणों से पूर्ण साधकों के लिए करते हैं १ ॥

वह नेत्रों को बन्द अथवा अधखुले रखकर अंत: दृष्टि से भृकुटी के ऊर्ध्व स्थल में “मैं चित् स्वरूप हूँ” इस प्रकार का भाव चिन्तन करते हुए सच्चिदानन्द के तेज से युक्त कूट रूप (निश्चल) ब्रह्म का दर्शन करता हुआ ब्रह्ममय ही हो जाता है।। २।॥

जो (तेजोमय परब्रह्म) गर्भ, जन्म, जरा, मरण एवं संहार आदि पापों से तारता है अर्थात् मुक्ति दिला देता है, उसे तारक” ब्रह्म कहा गया है। जीव एवं ईश्वर को मायिक (माया से आवृत) जानते हुए अन्य सभी को नेति-नेति’ कहते हुए छोड़कर जो कुछ शेष बचा रहता है, वही ‘अद्वय ब्रह्म’ कहा गया है॥ ३॥
उस (तेजोमय परब्रह्म) की सिद्धि के लिए तीन लक्ष्यों का अनुसंधान ही करणीय कर्त्तव्य है॥ ४॥

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(उस योगी के) शरीर के बीच में ‘सुषुम्रा’ नामक ब्रह्मनाडी पूर्ण चन्द्रमा की भाँति प्रकाशयुक्त है। वह मूलाधार से शुरू होकर ब्रह्मरन्ध्र तक विद्यमान है। इस नाड़ी के बीच में कोटि-कोटि विद्युत् के सदृश तेजोमयी मृणालसूत्र की तरह सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति प्रख्यात है।

उस शक्ति का मन के द्वारा दर्शन करने मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष-प्राप्ति का अधिकारी बन जाता है। मस्तिष्क के ऊपर विशेष मण्डल में निरन्तर विद्यमान तेज (प्रकाश) को तारक ब्रह्म के योग से जो देखता है, वह सिद्ध हो जाता है। दोनों कानों के छिद्रों को को तर्जनी अँगुलियों के अग्रभाग से बन्द कर लेने पर ‘फूत्कार’ (सर्प के फुफकार की तरह) का शब्द सुनाई पड़ता है। उसमें मन को केन्द्रित करके नेत्रों के मध्य नीली ज्योति को आन्तरिक दृष्टि से देखने पर अत्यधिक आनन्दानुभूति होती है।

ऐसा ही दर्शन हृदय में भी किया जाता है। इस प्रकार के अन्तर्लक्ष्य (अन्तःकरण में देखे जाने योग्य) लक्षणों का अभ्यास मुमुक्षु (मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले साधक) को करना चाहिए॥ ५ ॥

मनुष्य बाह्य सुखोपभोगों की कामना से ही पाप कर्म में प्रवृत्त होता है। पापवृत्ति उक्त कामनाओं के आधार पर ही उभरती है।
अन्तःस्थित कुण्डलिनी की सामर्थ्य का दर्शन मन से होने पर यह विश्वास मन में जम जाता है कि सुखों में श्रेष्ठतम आनन्द का स्त्रोत अपने भीतर ही है,
इसलिए बाह्य उपलब्धियों के निमित्त उभरने वाली पापवृत्ति
उभरती ही नहीं है।

अब बाह्यलक्ष्य के लक्षणों का वर्णन करते हैं। नासिका के अग्रभाग से क्रमश: चार, छः, आठ, दस या बारह अंगुल की दूरी पर नील एवं श्याम रंग जैसा, रक्ताभ वर्ण का आकाश, जो पीत शुक्लवर्ण से युक्त होता है, उस आकाश तत्त्व को जो निरन्तर देखता रहता है, वही वास्तव में सच्चा योगी कहलाता है। उस चलायमान दृष्टि से आकाश में देखने पर वे ज्योति किरणें स्पष्टतया दृष्टिगोचर होती हैं, उन दिव्य किरणों को देखने वाला ही योगी होता है।

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जब दोनों चक्षुओं के कोने में तप्त सुवर्ण की भाँति ज्योति मयूख (किरण) का दर्शन होता है, तो फिर उसकी दृष्टि एकाग्र हो जाती है। मस्तिष्क के ऊर्ध्व में लगभग १२ अंगुल की दूरी पर ज्योति का दर्शन करने वाला योगी अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य चाहे जिस स्थल पर स्थित सिर के ऊर्ध्व में आकाश ज्योति का दर्शन करता है, वहीं ( पूर्ण) योगी कहलाता है॥ ६॥

इसके अनन्तर अब ‘मध्यलक्ष्य’ के लक्षण का वर्णन करते हैं। जो प्रात: काल के समय में चित्रादि वर्ण से युक्त अखण्ड सूर्य का चक्रवत्, अग्रि की ज्वाला की भाँति तथा उनसे विहीन अन्तरिक्ष के समान देखता है। उस आकार के सदृश होकर प्रतिष्ठित रहता है । पुनः उसके दर्शन मात्र से वह गुणरहित ‘आकाश’ रूप हो जाता है।

विस्फुरित (प्रकाशित) होने वाले तारागणों से प्रकाशमान एवं प्रातःकाल के अंधेरे की भाँति ‘परमाकाश’ होता है। ‘महाकाश’ कालाग्रि के समान प्रकाशमान होता है। ‘तत्त्वाकाश’ सर्वोत्कृष्ट प्रकाश एवं प्रखर ज्योति-सम्पन्न होता है। ‘सूर्याकाश’ करोड़ों सूर्यो के सदृश होता है। इस तरह बाह्य एवं अन्तः में प्रतिष्ठित ये ‘पाँच आकाश’ तारक-ब्रह्म के ही लक्ष्य हैं। इस क्रिया विधि द्वारा आकाश का दर्शन करने वाला उसी की भाँति समस्त बन्धनों को काटकर मुक्ति-प्राप्ति का अधिकारी हो जाता है। तारक का लक्ष्य ही अमनस्क फल-प्रदाता कहा गया है। ७ ॥

इस तारक योग की दो विधियाँ बतलाई गई हैं । जिसमें प्रथम पूर्वार्द्ध है और द्वितीय उत्तरार्द्ध। इस सन्दर्भ में यह श्लोक द्रष्टव्य है, यह योग पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दो प्रकार का होता है। पूर्व को ‘तारक’ एवं उत्तर को अमनस्क’ (मन: शून्य होना) कहा गया है । ८ ॥

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अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2

हम आँखों के तारक (पुतलियों) से सूर्य एवं चन्द्र का दर्शन ( प्रतिफलन ) करते हैं। जिस तरह से हम आँखों के तारकों से ब्रह्म-ब्रह्माण्ड के सूर्य एवं चन्द्र को देखते हैं, वैसे ही अपने सिर रूपी ब्रह्माण्ड के मध्य में विद्यमान सूर्य एवं चन्द्र का निर्धारण करके उनका हमेशा दर्शन करना चाहिए तथा दोनों को एक ही रूप जान करके मन को एकाग्र कर उनका चिन्तन करना चाहिए,

क्योंकि यदि मन को इस भाव से ओत-प्रोत न किया जायेगा, तो समस्त इन्द्रियाँ विषयों में प्रवृत्त होने लगेंगी। इस कारण योगी- साधक को अपनी अन्त: की दृष्टि से ‘तारक’ का निरन्तर अनुसंधान करते रहना चाहिए।। ९ ॥

इस ‘तारक’ की दो विधियाँ कहीं गई हैं , जिसमें प्रथम मूर्त (मूर्ति) एवं द्वितीय अमूर्त (अमूर्ति) है। जो इन्द्रियों के अंत (अर्थात् मनश्चक्षु) में है , वह मूर्त तारक है तथा जो दोनों भृकुटियों से बाहर है, वह अमूर्त है। आंतरिक पदार्थों के विवेचन में सर्वत्र मन को एकाग्र करके अभ्यास करते रहना चाहिए।

सात्विक दर्शन से युक्त मन द्वारा अपने अंतःकरण में सतत निरीक्षण करने से दोनों तारकों के ऊर्ध्व भाग में सच्चिदानंदमय ज्योतिरूप परब्रह्म का दर्शन होता है। इससे ज्ञात होता है कि ब्रह्म शुक्ल-शुभ्र तेज स्वरूप है। उस ब्रह्म को मनसाहित नेत्रों की अंतःदृष्टि से देखकर जानना चाहिए।

अमूर्त तारक भी इसी विधि से मनः संयुक्त नेत्रों से ज्ञात हो जाता है। रूप दर्शन के संबंध में मन नेत्रों के आश्रित रहता है और बाहर के सदृश अंतः में भी रूप ग्रहण का कार्य इन दोनों के द्वारा ही सम्पन्न होता है। इस कारण मन के सहित नेत्रों के द्वारा ही ‘तारक’ का प्रकाश होता है।।१०।।

जो मनुष्य अपनी आन्तरिक दृष्टि के द्वारा दोनों भृकुटियों के स्थल से थोड़ा सा ऊपरी भाग में स्थित तेजोमय प्रकाश का दर्शन करता है, वही तारक योगी होता है। उसके साथ मन के द्वारा तारक की सुसंयोजना करते हुए प्रयत्नपूर्वक दोनों भौंहों को कुछ थोड़ा सा ऊँचाई पर स्थिर करे।

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यही तारक का पूर्वाद्ध योग कहलाता है। द्वितीय उत्तरार्द्ध भाग को अमूर्त कहा गया है । तालु-मूल के ऊर्ध्व भाग में महान् ज्योति किरण मण्डल स्थित
है। उसी का ध्यान योगियों का ध्येय (लक्ष्य) होता है । उसी से अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।॥ ११॥

योगी-साधक की अन्तः एवं बाह्य लक्ष्य को देखने की सामर्थ्य वाली दृष्टि जब स्थिर हो जाती है, तब वह स्थिति ही शांभवी मुद्रा कहलाती है। इस मुद्रा से ओत-प्रोत ज्ञानी पुरुष का निवास स्थल अत्यंत पवित्र माना जाता है तथा सभी लोक उसकी दृष्टि-मात्र से पवित्र हो जाते हैं। जो भी इस परम योगी की पूजा करता है, वह उसको प्राप्त करते हुए मुक्ति का अधिकारी हो जाता है।।१२।।

अन्तर्लक्ष्य उज्ज्वल शुभ्र ज्योति के रूप में हो जाता है। परम सद्गुरु का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर सहस्र दल कमल में स्थित उज्ज्वल-ज्योति अथवा बुद्धि-गुहा में स्थित रहने वाली ज्योति अथवा फिर वह सोलह कला के अन्तः में विद्यमान तुरीय चैतन्य स्वरूप अन्तर्लक्ष्य होता है। यही दर्शन सदाचार का मूल है॥ १३ ॥

वेदज्ञान से सम्पन्न, आचार्य (श्रेष्ठ आचरण वाला) , विष्णुभक्त, मत्सर आदि विकारों से राहित, योग का ज्ञाता, योग के प्रति निष्ठा रखने वाला, योगात्मा, पवित्रता युक्त, गुरुभक्त, परमात्मा की प्राति में विशेष रूप से संलग्न रहने वाला- इन उपर्युक्त लक्षणों से सम्पन्न पुरुष ही गुरु रूप में अभिहित किया जाता है।।१४-१५।।

गु अक्षर का अर्थ है-अन्धकार एवं रु अक्षर का अर्थ है अन्धकार को रोकने में समर्थ। अन्धकार (अज्ञान) को दूर करने वाला ही गुरु कहलाता है॥ १६ ॥

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गुरु ही पराकाष्ठा है, गुरु ही परम (श्रेष्ठ) धन है । जो श्रेष्ठ उपदेश करता है, वही गुरु से गुरुतर अर्थात् श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम गुरु है, ऐसा जानना चाहिए ॥ १८ ॥

जो मनुष्य एक बार (गुरु या इस उपनिषद् का) उच्चारण ( पाठ) करता है, उसकी संसार सागर से निवृत्ति हो जाती है। समस्त जन्मों के पाप तत्क्षण ही विनष्ट हो जाते हैं । समस्त इच्छाओं-आकांक्षाओं की पूर्ति हो जाती है। सभी पुरुषार्थ सफल -सिद्ध हो जाते हैं। जो ऐसा जानता है, वही उपनिषद् का यथार्थ ज्ञानी है, यही
उपनिषद् है ।।१९।।

ॐ पूर्णमदः……….इति शान्तिः ।।

।।इति अद्वयतारकोपनिषत्समाप्ता ।।

शिवाय नमः

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इतिहासं पुराणं पंचम वेदानां वेदम् ।।62।।

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Akshyupanishad

अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2

॥अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2॥

ह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें महर्षि सांकृति एवं आदित्य के बीच प्रश्रोत्तर के माध्यम से चाक्षुष्मती विद्या एवं योगविद्या पर प्रकाश डाला गया है। यह उपनिषद् दो खण्डों में प्रविभक्त है।
अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2

प्रथम खण्ड में चाक्षुष्मती विद्या का विवेचन है। द्वितीय खण्ड में सर्वप्रथम ब्रह्मविद्या का स्वरूप वर्णित है, तदुपरान्त ब्रह्मविद्या प्राप्ति के लिए योग की विविध भूमिकाओं का क्रमशः विवेचन किया गया है।

योग की कुल सात भूमिकाएँ हैं, जिनके माध्यम से साधक योग विद्या के क्षेत्र में क्रमिक उन्नति करता हुआ आगे बढ़ता है। सातवीं भूमिका में पहुँचने पर वह ब्रह्म साक्षात्कार की स्थिति में पहुँच जाता है। अन्त में ओंकार ब्रह्म के विषय में वह विवेचन प्रस्तुत किया गया है, जिसको जानकर और उस विधि से साधना करके व्यक्ति ब्रह्मपद प्राप्त कर लेता है। अपने को परम आनन्दमय-प्रज्ञानघन आनन्द की स्थिति में पाता हुआ- मैं ब्रह्म हूँ- ऐसी अनुभूति करने लगता है। यही उपनिषद का प्रमुख प्रतिपाद्य विषय है।
       

॥ शान्तिपाठः॥

ॐ सह नाववतु ।सह नौ भुनक्तु ।सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

हे परमात्मन् ! आप हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन करें। हम दोनों साथ-साथ शक्ति अर्जित करें। हम दोनों की पढ़ी हुई विद्या तेजस्वी (प्रखर) हो। हम दोनों एक दूसरे के प्रति कभी ईर्ष्या-द्वेष न करें। हे शक्ति सम्पन्न ! (हमारे) त्रिविध (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) तापों का शमन हो, अक्षय शान्ति की प्राप्ति हो।
 
   अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2

॥प्रथमः खण्डः॥

अथ ह सांकृतिर्भगवानादित्यलोकं जगाम।तमादित्यं नत्वा चाक्षुष्मतीविद्यया तमस्तुवत्॥ ॐ नमो भगवते श्रीसूर्यायाक्षितेजसे नमः। ॐ खेचराय नमः। ॐ महासेनाय नमः। ॐ तमसे नमः। ॐ रजसे नमः । ॐ सत्त्वाय नमः । ॐ असतो मा सद्गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय। हंसो भगवाञ्छुचिरूप: प्रतिरूपः। विश्वरूपं घृणिनं जातवेदसं हिरण्मयं ज्योतीरूपं तपन्तम्। सहस्त्ररश्मिः शतधा वर्तमानः पुरुषः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः। ॐ नमो भगवते श्रीसूर्यायादित्यायाक्षितेजसेऽहोऽवाहिनि वाहिनि स्वाहेति । एवं चाक्षुष्मतीविद्यया स्तुतः श्रीसूर्यनारायण: सुप्रीतोऽब्रवीच्चाक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो यो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुलेऽन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान्ग्राहयित्वाथ विद्यासिद्धिर्भवति। य एवं वेद स महान्भवति ॥ १॥

एक समय की कथा है कि भगवान सांकृति आदित्य लोक गये। वहाँ पहुंचकर उन्होंने भगवान् सूर्य को नमस्कार कर चाशुष्मती विद्या द्वारा उनकी अर्चना की-नत्रेेन्द्रिय के प्रकाशक भगवान् श्रीसूर्य को नमस्कार है। आकाश में विचरणशील सूर्यदेव को नमस्कार है। हजारों किरणों की विशाल सेना रखने वाले महासेन को नमस्कार है। अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2

तमोगुण रूप भगवान सूर्य को प्रणाम है। रजोगुण रूप भगवान् सूर्य को प्रणाम है। सत्वगुणरूप सूर्यनारायण को प्रणाम है। हे सुर्यदेव! हमें असत् से सत्पथ की ओर ले चलें। हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलें। हमें मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलें। भगवान् भास्कर पवित्ररूप और प्रतिरूप (प्रतिबिम्ब प्रकटकर्ता) हैं। अखिल विश्व के रूपों के धारणकर्ता, किरण समूहाँ से सुशोभित, जातवेदा (सर्वज्ञता), सोने के समान प्रकाशमान, ज्योतिःस्वरूप तथा तापसम्पन्न भगवान भास्कर को हम स्मरण करते हैं।

ये हज़ारों रश्मिसमूह वाले, सैकड़ों रूपों में विद्यमान सूर्यदेव सभी प्रणियों के समक्ष प्रकट हो रहे हैं। हमारे चक्षुओं के प्रकाशरूप अदितिपुत्र भगवान् सूर्य को प्रणाम है। दिन के वाहक, विश्व के वहनकर्ता सूर्यदेव के लिए हमारा सर्वस्व समर्पित है। इस चक्षुष्मती विद्या से अर्चना किये जाने पर भगवान सूर्यदेव अति हर्षित हुए और कहने लगे -जिस ब्राह्मण द्वारा इस चाक्षुष्मती विद्या का पाठ प्रतिदिन किया जाता है,

उसे नेत्ररोग नहीं होते और न उसके वंश में कोई अंधत्व को प्राप्त करता है। आठ ब्राह्मणों को इस विद्या का ज्ञान करा देने पर इस विद्या की सिद्धि होती है। इस प्रकार का ज्ञाता महानता को प्राप्त करता है ॥ १॥
अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2

[सूर्यदेव को प्रतिरूप और विश्वरूप कहा गया है। विज्ञान के अनुसार हम जो कुछ भी देखते हैं, उसका रूप उसके द्वारा किए जा रहे प्रकाश के परावर्तन (रिफलैक्शन) के कारण ही है। इसलिए उन्हें प्रतिरूप कहा जाता है। दिन में सूर्य के प्रकाश में हम जो भी रूप देखते हैं, वे सब प्रकारान्तर से सूर्य के प्रकाश के ही विविध रूप हैं। इसलिए सूर्य को विश्वरूप कहा गया है। ]

॥द्वितीयः खण्डः॥

अथ ह सांकृतिरादित्यं पप्रच्छ भगवन्ब्रह्मविद्यां मे ब्रूहीति। तमादित्यो होवाच। सांकृते श्रृणु वक्ष्यामि तत्त्वज्ञानं सुदुर्लभम्। येन विज्ञातमात्रेण जीवन्मुक्तो भविष्यसि॥१॥

उसके बाद सांकृति ऋषि ने भगवान सूर्य से कहा-भगवन् ! मुझे ब्रह्मविद्या का उपदेश करें। आदित्य देव ने उनसे कहा-सांकृते । आपसे अतिदुर्लभ तत्त्वज्ञान का विवेचन मैं करने जा रहा हूँ. उसे ध्यान से सुनें, जिसका ज्ञान प्राप्त कर लेने पर आप जीवन्मुक्त हो जाएंगे॥१॥

सर्वमेकमजं शान्तमनन्तं ध्रुवमव्ययम्। पश्यम्भूतार्थचिद्रूपं शान्त आस्व यथासुखम्॥२॥

अवेदनं विदुर्योगं चित्तक्षयमकृत्रिमम्। योगस्थः कुरु कर्माणि नीरसो वाथ मा कुरु ॥३
अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2

आप समस्त प्राणिमात्र को एक, अजन्मा, शान्त, अनन्त, ध्रुव, अव्यय तथा तत्त्वज्ञान से चैतन्यरूप देखते हए शान्ति और सुखपूर्वक रहें। अवेदन अर्थात आत्मा-परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी का आभास न हो-इसी का नाम योग है, यही यथार्थ चित्तक्षय है। इसलिए योग में स्थित होकर कर्त्तव्य कर्मों का निर्वाह करें, कर्म करते हुए नीरसता-विरक्तता न आने पाए ॥२-३॥

विरागमुपयात्यन्तर्वासनास्वनुवासरम् । क्रियासूदाररूपासु क्रमते मोदतेऽन्वहम्।।४।।

ग्राम्यासु जडचेष्टासु सततं विचिकित्सते । नोदाहरति मर्माणि पुण्यकर्माणि सेवते।।५।।

(अवेदन-योग की पहली भमिका इस प्रकार है-) योग की ओर प्रवृत्त होने पर अंतःकरण दिन-प्रतिदिन वासनात्मक चिन्तन से दूर होता जाता है। साधक नित्य ही परमार्थ कर्मों को करता हुआ हर्ष का अनभव करता है। जड़ मनुष्यों को अश्लील भोग प्रवृत्तियों (ग्राम्य चेष्टाओं) से वह हमेशा जुगुप्सा (घृणा) करता है।
किसी के गुप्त रहस्य प्रसंग को अन्यों के समक्ष नहीं कहता, अपितु वह पुण्य कृत्यों में ही हमेशा संलग्र रहता है। ४-५॥

अनन्योद्वेगकारीणि मदकर्माणि सेवते । पापाद्विभेति सततं न च भोगमपेक्षते ॥६॥

स्नेहप्रणयगर्भाणि पेशलान्युचितानि च । देशकालोपपन्नानि वचनान्यभिभाषते ॥७॥

जिन कृत्यों से किसी प्राणी को उत्तेजित न होना पड़े, ऐसे दया और उदारतापूर्ण सौम्य कर्मों को वह करता है। वह पाप से भयभीत रहता और भोग साधनों की अभिलाषा नहीं करता। वह ऐसी वाणी का प्रयोग करता है, जिसमें सहज स्नेह और प्रेम का प्राकट्य हो तथा जो मृदुल और औचित्यपूर्ण होने के साथ-साथ देश, काल, पात्र के अनुकूल हो।।६-७॥

मनसा कर्मणा वाचा सज्जनानुपसेवते । यतःकुतश्चिदानीय नित्यं शास्त्राण्यवेक्षते॥८॥

मन से, वचन से और कर्म से श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग करते हुए जहाँ कहीं से भी प्राप्त हो सके, प्रतिदिन सद्ग्रन्थों का अध्ययन करता है॥ ८॥

तदासौ प्रथमामेकां प्राप्तो भवति भूमिकाम्। एवं विचारवान्यः स्यात्संसारोत्तारणं प्रति॥९॥

स भूमिकावानित्युक्तः शेषस्त्वार्य इति स्मृतः। विचारनाम्नीमितरामागतो योगभूमिकाम्॥१०॥
अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2

इस स्थिति में ही वह प्रथम भूमिका वाला कहलाता है। भवसागर से उस पार जाने की जो अभिलाषा करता है, वही इस प्रकार के विचार को प्राथमिकता देता है। वह भूमिकावान् कहा जाता है और शेष ‘आर्य'(दूसरों की तुलना में श्रेष्ठ) कहे जाते हैं।

जो योग की दूसरी विचार भूमिका से युक्त हैं, (उनके लक्षण इस प्रकार से हैं-)॥९-१०॥

श्रुतिस्मृतिसदाचारधारणाध्यानकर्मणः । मुख्यया व्याख्यया ख्याताञ्छ्रयति श्रेष्ठपण्डितान्॥११॥

वह ऐसे ख्यातिलब्ध श्रेष्ठ विद्वानों का आश्रय ग्रहण करता है, जो श्रुति, स्मृति, सदाचार, धारणा और ध्यान की उत्तम व्याख्या के लिए अधिक चर्चित हों ॥११॥

पदार्थप्रविभागज्ञः कार्याकार्यविनिर्णयम्। जानात्यधिगतश्चान्यो गृहं गृहपतिर्यथा ॥१२॥

मदाभिमानमात्सर्यलोभमोहातिशायिताम्। बहिरप्यास्थितामीषत्त्यजत्यहिरिव त्वचम्॥ १३॥

इत्थंभूतमति: शास्त्रगुरुसज्जनसेवया । सरहस्यमशेषेण यथावदधिगच्छति ॥१४॥
अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2

वह पदार्थों के विभाग और पद को उचित रीति से जानता है तथा श्रवण करने योग्य सतशास्त्रों में पारंगत हो जाने पर कर्त्तव्य-अकर्तव्य के निर्णय में कुशल हो जाता है। मद, अहंकार, मात्सर्य, लोभ और मोहादि की अधिकता उसके चित्त को डांवाडोल नहीं करती, बाह्य आचरण में यत्किंचित् यदि उसकी स्थिति रहती है, तो उसका भी उसी प्रकार परित्याग कर देता है,

जैसे साँप अपनी केंचुल को छोड़ देता है। इस प्रकार का सद्ज्ञान सम्पन्न साधक शास्त्र, गुरु और सत्पुरुषों के सेवा-सहयोग द्वारा रहस्यपूर्ण गूढ़ज्ञान को भी प्रयत्नपूर्वक स्वाभाविक रूप में हस्तगत कर लेता है ॥१२-१४॥

असंसर्गाभिधामन्यां तृतीयां योगभूमिकाम्। तत: पतत्यसौ कान्तः पुष्पशय्यामिवामलाम्॥१५

यथावच्छास्त्रवाक्यार्थे मतिमाधाय निश्चलाम्। तापसाश्रमविश्रान्तैरध्यात्मकथनक्र मैः ॥१६॥

शिलाशय्याऽऽसनासीनो जरयत्यायुराततम्। वनावनिविहारेण चित्तोपशमशोभिना ॥१७॥

असङ्गसुखसौख्येन कालं नयति नीतिमान्। अभ्यासात्साधुशास्त्राणां करणात्पुण्यकर्मणाम्॥ जन्तोर्यथावदेवेयं वस्तुदृष्टिः प्रसीदति। तृतीयां भूमिकां प्राप्य बुद्धोऽनुभवति स्वयम् ॥ १९॥
अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2

इसके पक्षात् वह योग की असंसर्गनाम्री तीसरी भूमिका में प्रवेश करता है-ठीक उसी प्रकार, जैसे कोई सुन्दर मनुष्य साफ-सुथरे फूलों के बिछौने पर अवस्थित होता है।

समाधिपाद-१

शास्त्र जैसा अभिमत व्यक्त करते हैं, उसमें अपनी स्थिर मति को संयुक्त करके, तपस्वियों के आश्रम में वास करता हुआ अध्यात्म शास्त्र की चर्चा करते हए (कष्टकर) पाषाण-शय्या पर आरूढ़ होते हुए ही वह सम्पूर्ण आयु बिता देता है।

वह नीति पुरुष चित्त को शान्ति पहुंचाने वाले अधिक शोभाप्रद वन भूमि के विहार द्वारा विषयोपभोग से विरत होकर स्वाभाविक रूप में उपलब्ध सुख-साधनों को भोगता हुआ अपना जीवनयापन करता है। सद्ग्रन्थों के अभ्यास और पुण्य कर्मों के किये जाने से प्राणी की वास्तविक पर्यवेक्षण दृष्टि पवित्र होती है। इस तृतीय भूमिका को प्राप्त करके साधक स्वयमेव ज्ञानवान् होकर इस स्थिति का अनुभव करता है। १५-१९॥

द्विप्रकारमसंसर्गं तस्य भेदमिमं श्रृणु । द्विविधोऽयमसंसर्ग: सामान्यः श्रेष्ठ एव च ॥२०॥

नाहं कर्ता न भोक्ता च न बाध्यो न च बाधकः । इत्यसंजनमर्थेषु सामान्यासङ्गनामकम्॥२१॥

प्राक्कर्मनिर्मितं सर्वमीश्वराधीनमेव वा । सुखं वा यदि वा दुःखं कैवात्र मम कर्तृता ॥ २२॥

भोगाभोगा महारोगाः संपदः परमापदः । वियोगायैव संयोगा आधयो व्याधयोऽधियाम्॥२३॥

कालश्च कलनोद्युक्तः सर्वभावाननारतम्।अनास्थयेति भावानां यदभावनमान्तरम्।वाक्यार्थलब्धमनसः सामान्योऽसावसङ्गमः॥ २४॥

असंसर्ग-सामान्य और श्रेष्ठ भेद से दो तरह का है। (उनके इस प्रकार के भेदों पर अब प्रकाश डालते है-) में न तो कर्ता, न भोक्ता, न बाध्य और न बाधक ही हैं- इस प्रकार से विषयोपभोग में आसक्ति से रहित होने की भावना ही सामान्य असंसर्ग कहलाती है।

सब कुछ पूर्वजन्म कृत कर्मों का प्रतिफल है या सब कुछ परमात्मा के अधीन है-ऐसी मान्यता रखना, सुख हो या दुःख इसमें मेरे किये गये कार्यों का अस्तित्व ही क्या है? भोगसाधनों का अतिसंग्रह महारोगरूप है और समस्त वैभव परम आपत्तियों के स्वरूप हैं।

सभी संयोगों की अन्तिम परिणति वियोग के रूप में है। मानसिक चिन्ताएँ अज्ञानग्रस्तों के लिए व्याधिरूप हैं। सभी क्षणभंगुर पदार्थ अनित्य हैं, सभी को काल-कराल अपना ग्रास बनाने में संलग्न है। (शास्त्रवचनों को जान लेने से उत्पन्न) अनास्था से मन में उनके अभाव की भावना को पैदा करता है, यह सामान्य असंसर्ग कहलाता है। २०-२४॥

अनेन क्रमयोगेन संयोगेन महात्मनाम् । नाहं कर्तेश्वरः कर्ता कर्म वा प्राक्तनं मम॥२५॥

कृत्वा दूरतरे नूनमिति शब्दार्थभावनम्। यन्मौनमासनं शान्तं तच्छ्रेष्ठासङ्ग उच्यते॥२६॥

इस प्रकार महान पुरुषों के निरन्तर सत्संग से जो यह कहे कि मैं कर्त्ता नहीं, ईश्वर ही कर्ता है या मेरे पूर्व जन्म में किए गये कर्म ही कर्ता हैं। इस प्रकार से समस्त चिन्ताओं और शब्द-अर्थ के भाव को विसर्जित कर देने के पश्चात् जो मौन (मन-इन्द्रियों का संयम), आसन (आन्तरिक अवस्था) और शान्त भाव (बाहरी ‘भावों के विस्मरण) की प्राप्ति होती है, वह श्रेष्ठ असंसर्ग कहा जाता है ।। २५-२६॥

संतोषामोदमधुरा प्रथमोदेति भूमिका । भूमिप्रोदितमात्रोऽन्तरमृताङ्कुरिकेव सा ॥२७॥

एषा हि परिमष्टान्तरन्यासां प्रसवैकभूः। द्वितीयां च तृतीयां च भूमिकां प्राप्नुयात्ततः॥२८॥

श्रेष्ठा सर्वगता ह्येषा तृतीया भूमिकात्र हि। भवति प्रोज्झिताशेषसंकल्पकलनः पुमान्॥२९॥

भूमिकात्रितयाभ्यासादज्ञाने क्षयमागते । समं सर्वत्र पश्यन्ति चतुर्थीं भूमिकां गताः॥३०॥

अद्वैते स्थैर्यमायाते द्वैते च प्रशमं गते। पश्यन्ति स्वप्नवल्लोकं चतुर्थीं भूमिकां गताः॥३१॥
अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2

अन्तःकरण की भूमि में अमृत के छोटे अंकुर के प्रस्फुटन की तरह ही सन्तोष और आह्लादप्रद होने से मधुर प्रतीत होने वाली प्रथम भूमिका का अभ्युदय होता है। इसके उत्पन्न होते ही अन्तरंग में शेष भूमिकाओं के लिए भूमि तैयार हो जाती है।

इसके बाद होने वाली दूसरी एवं तीसरी भूमिका में भी साधक कुशलता प्राप्त कर लेता है। इस तीसरी भूमिका को इसलिए सर्वोत्कृष्टता की श्रेणी में गिना गया है; क्योंकि इसमें साधक सभी संकल्पजन्य वृत्तियों को पूर्णत: त्याग देता है। अद्वैतभाव की दृढभावना से द्वैतभाव स्वतः समाप्त हो जाता है। चौथी भूमिका को प्राप्त साधक इस लोक को स्वप्न की तरह स्वीकार करता है ॥ २७-३१॥

भूमिकात्रितयं जाग्रच्चतुर्थी स्वप्न उच्यते । चित्तं तु शरदभ्रांशविलयं प्रविलीयते॥ ३२॥

सत्त्वावशेष एवास्ते पञ्चमीं भूमिकां गतः। जगद्विकल्पो नोदेति चित्तस्यात्र विलापनात्॥३३॥

पञ्चमीं भूमिकामेत्य सुषुप्तपदनामिकाम् । शान्ताशेषविशेषांशस्तिष्ठत्यद्वैतमात्रकः ॥ ३४॥

गलितद्वैतनिर्भसो मुदितोऽन्तःप्रबोधवान् । सुषुप्तघन एवास्ते पञ्चमीं भूमिकां गताः ॥ ३५॥

अन्तर्मुखतया तिष्ठन्बहिर्वृत्तिपरोऽपि सन् । परिश्रान्ततया नित्यं निद्रालुरिव लक्ष्यते॥३६॥

कुर्वन्नभ्यासमेतस्यां भूमिकायां विवासनः । षष्ठी तुर्याभिधामन्यां क्रमात्पतति भूमिकाम्॥३७॥

यत्र नासन्नसद्रूपो नाहं नाप्यनहंकृतिः । केवलं क्षीणमननमास्तेऽद्वैतेऽतिनिर्भयः ॥ ३८॥

निर्ग्रन्थिः शान्तसंदेहो जीवन्मुक्तो विभावनः।अनिर्वाणोऽपि निर्वाणश्चित्रदीप इव स्थितः॥३९॥

षष्ठयां भूमावसौ स्थित्वा सप्तमीं भूमिमाप्नुयात्। विदेहमुक्तताऽत्रोक्ता सप्तमी योगभूमिका ॥४०॥

प्रारम्भिक तीन भूमिकायें जाग्रत् स्वरूपा हैं तथा चौथी भूमिका स्वप्न कही जाती है। पंचम भूमिका में आरूढ़ होने पर साधक का चित्त शरद्ऋतु के बादलों की तरह विलीन हो जाता है,

मात्र सत्त्व ही शेष बचता है। चित्त के विलीन हो जाने से जागतिक विकल्पों का अभ्युदय नहीं होता। सुषुप्तपद नाम की इस पंचम भूमिका में सम्पूर्ण विभेद शान्त हो जाने पर साधक मात्र अद्वैत अवस्था में ही अवस्थित रहता है। द्वैत के समाप्त हो जाने से आत्मबोध से युक्त हर्षित हुआ साधक पंचम भूमिका में जाकर सुषुप्तघन (आनन्दप्रद अवस्था) को प्राप्त कर लेता है।

वह बहिर्मुखी व्यवहार करते हुए भी हमेशा अन्तर्मुखी ही रहता है तथा सदा थके हुए की तरह निद्रातुर सा दिखता है। इस भूमिका में कुशलता हासिल करते हुए वासनाविहीन होकर वह साधक क्रमशः तुर्या नाम वाली छठी भूमिका में प्रविष्ट होता है।

जहाँ सत्-असत् का अभाव है, अहंकार-अनहंकार भी नहीं है तथा विशुद्ध अद्वैत स्थिति में मननात्मक वृत्ति से रहित होने पर वह अत्यन्त निर्भयता को प्राप्त करता है।

हृदय ग्रन्थियों के उद्घाटित होने पर संशय मिट जाते हैं। जीवन्मुक्त होकर उसकी भावशून्यता की सी स्थिति रहती है। निर्वाण को उपलब्ध न किये जाने पर भी उसकी स्थिति निर्वाण पद को प्राप्त साधक जैसी हो जाती है। उस समय वह निश्चेष्ट दीपक की तरह निश्चल रहता है। छठी भूमिका के पश्चात् वह सातवीं भूमिका की स्थिति प्राप्त करता है। विदेह-मुक्त की स्थिति ही सातवीं भूमिका कही गयी है॥ ३२-४०॥

अगम्या वचसां शान्ता सा सीमा सर्वभूमिषु।लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा त्यक्त्वा देहानुवर्तनम्॥४१॥

शास्त्रानुवर्तनं त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं कुरु।ओंकारमात्रमखिलं विश्वप्राज्ञादिलक्षणम्॥४२॥

वाच्यवाचकताभेदात् भेदेनानुपलब्धितः। अकारमात्रं विश्वः स्यादुकारस्तैजसः स्मृतः॥४३॥

प्राज्ञो मकार इत्येवं परिपश्येत्क्रमेण तु। समाधिकालात्प्रागेव विचिन्त्यातिप्रयत्नतः॥ ४४

स्थूलसूक्ष्मक्रमात्सर्वं चिदात्मनि विलापयेत् । चिदात्मानं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तसदद्वयः ॥ ४५।।

परमानन्दसंदोहो वासुदेवोऽहमोमिति । आदिमध्यावसानेषु दुःखं सर्वमिदं यतः ॥४६॥

तस्मात्सर्वं परित्यज्य तत्त्वनिष्ठो भवानघ।अविद्यातिमिरातीतं सर्वाभासविवर्जितम्॥ ४७॥

आनन्दममलं शुद्धं मनोवाचामगोचरम् । प्रज्ञानघनमानन्दं ब्रह्मास्मीति विभावयेत्। इत्युपनिषत् ॥४८ ॥

यह भूमिका परम शांत की है तथा वाणी की सामर्थ्य से अवर्णीनीय है। यह सब भूमिकाओं की सीमारूप है तथा यहाँ सम्पूर्ण योग भूमिकाओं की समाप्ति है। लोकाचार, देहाचार और शास्त्रानुगमन को छोड़कर अपने अध्यास को नष्ट करे। विश्व, प्राज्ञ और तैजस के रूप में यह समस्त विश्व

ॐ कार’ स्वरूप ही है। वाच्य और वाचक में अभेदता रहती है और भेद होने पर इसकी उपलब्धि सम्भव नहीं। इन्हें क्रमश: इस प्रकार जाने-प्रणव की प्रथम मात्रा ‘अकार विश्व, उकार तैजस और मकार प्राज्ञ रूप है।

समाधिकाल से पहले विशेष प्रयासपूर्वक इस सम्बन्ध में चिन्तन-मनन करके स्थूल और सूक्ष्म से क्रमश: सब कुछ चिदात्मा में विलीन करे। चिदात्मा का स्व-स्वरूप स्वीकार करते हुए ऐसा दृढ़ विश्वास करे-में ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्तारूप, अद्वितीय, परमआनन्द सन्दोह रूप एवं वासुदेव प्रणव ॐ कार हूँ।

चूँकि आदि, मध्य और अन्त में यह सम्पूर्ण प्रपञ्च दु:ख देने वाला ही है, इसलिए हे निष्पाप! सबका परित्याग करके तत्त्वनिष्ठ बने । मैं अज्ञानरूपी अन्धकार से अतीत, सभी प्रकार के आभास से रहित, आनन्दरूप, मलरहित, शुद्ध, मन और वाणी से अगोचर, प्रज्ञानघन, आनन्दस्वरूप ब्रह्म हूँ,ऐसी भावना करे। यही उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) है ॥ ४१-४८ ।।

     ॥ ॐ सह नाववतु……… इति शान्तिः ॥
   ।। इति अक्ष्युपनिषत्समाप्ता ॥

अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2

ईशावास्योपनिषद

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॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥

ऐतरेयोपनिषद्

ऋग्वेदीय ऐतरेय आरण्यकमें दूसरे आरण्यकके चौथे, पाँचवें और छठे अध्यायोंको ऐतरेय

उपनिषद्के नामसे कहा गया है। इन तीन अध्यायोंमें ब्रह्मविद्याकी प्रधानता है। इस कारण इन्हींको उपनिषद्’ माना है। शान्तिपाठ

ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता। मनो मे वाचि प्रतिष्ठित माविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान्संदधाम्य॒तं वदिष्यामि।

सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

व्याख्या- इस शान्तिपाठमें सब प्रकारके विघ्नोंकी शान्तिके लिये परमात्मासे प्रार्थना की गयी है। प्रार्थनाका भाव यह है कि ‘हे सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मन्

मेरी वाणी मनमें स्थित हो जाय और मन वाणीमें स्थित हो जाय; अर्थात् मेरे मन-वाणी दोनों एक हो जायें। ऐसा न हो कि मैं वाणीसे एक पाठ पढ़ता रहूँ और मन

दूसरा ही चिन्तन करता रहे या मनमें दूसरा ही भाव रहे और वाणीद्वारा दूसरा प्रकट करूँ। मेरे संकल्प और वचन दोनों विशुद्ध होकर एक हो जायें। हे

प्रकाशस्वरूप परमेश्वर! आप मेरे लिये प्रकट हो जाइये-अपनी योगमायाका पर्दा मेरे सामनेसे हटा लीजिये। (इस प्रकार परमात्मासे प्रार्थना करके अब उपासक

अपने मन और वाणीसे कहता है कि) हे मन और वाणी! तुम दोनों मेरे लिये वेदविषयक ज्ञानकी प्राप्ति करानेवाले बनो-तुम्हारी सहायतासे मैं वेदविषयक

ज्ञान प्राप्त कर सकूँ। मेरा गुरुमुखसे सुना हुआ और अनुभवमें आया हुआ ज्ञान मेरा त्याग न करे अर्थात् वह सर्वदा मुझे स्मरण रहे—मैं उसे कभी न भूलूँ। मेरी

इच्छा है कि अपने अध्ययनद्वारा मैं दिन और रात एक कर दूं। अर्थात् रात-दिन निरन्तर ब्रह्मविद्याका पठन और चिन्तन ही करता रहूँ।

मेरे समयका एक क्षण भी व्यर्थ न बीते। aitareya upanishad adhyay 1

प्रथम अध्याय प्रथम खण्ड,

ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत्किञ्चन मिषत्। स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति॥१॥

व्याख्या– इस मन्त्रमें परमात्माके सृष्टि-रचनाविषयक प्रथम संकल्पका वर्णन है। भाव यह है कि देखने-सुनने और समझनेमें आनेवाले जड़-चेतनमय प्रत्यक्ष

जगत्के इस रूपमें प्रकट होनेसे पहले कारण-अवस्थामें एकमात्र परमात्मा ही थे। उस समय इसमें भिन्न-भिन्न नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति नहीं थी।

उस समय उन परब्रह्म परमात्माके सिवा दूसरा कोई भी चेष्टा करनेवाला नहीं था। सृष्टिके आदिमें उन परम पुरुष परमात्माने

यह विचार किया कि ‘मैं प्राणियोंके कर्म-फल-भोगार्थ भिन्न-भिन्न लोकोंकी रचना करूँ’॥१॥

सइमाँल्लोकानसृजत। अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः॥२॥

व्याख्या- यह विचार करके परब्रह्म परमेश्वरने अम्भ, मरीचि, मर और जल-इन लोकोंकी रचना की। इन शब्दोंको स्पष्ट करनेके लिये आगे श्रुतिमें ही कहा गया है

कि स्वर्गलोकसे ऊपर जो महः, जनः, तपः और सत्यलोक हैं, वे और उनका आधार द्युलोक-इन पाँचों लोकोंको यहाँ ‘अम्भः’ नामसे कहा गया है। उसके

नीचे जो अन्तरिक्षलोक (भुवर्लोक) है, जिसमें सूर्य, चन्द्र और तारागण–ये सब किरणोंवाले लोकविशेष हैं, उसका वर्णन यहाँ मरीचि नामसे किया गया है।

उसके नीचे जो यह पृथ्वीलोक है- जिसको मृत्युलोक भी कहते हैं, वह यहाँ ‘मर’ के नामसे कहा गया है और उसके नीचे अर्थात् पृथ्वीके भीतर जो पातालादि

लोक हैं, वे ‘आपः’ के नामसे कहे गये हैं। तात्पर्य यह कि जगत्में जितने भीलोक त्रिलोकी, चतुर्दश भुवन एवं सप्त लोकोंके

नामसे प्रसिद्ध हैं, उन सब लोकोंकी परमात्माने रचना की॥२॥

स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति सोऽद्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत्॥३॥

व्याख्या- इस प्रकार इन समस्त लोकोंकी रचना करनेके अनन्तर परमेश्वरने फिर विचार किया कि ‘ये सब लोक तो रचे गये। अब इन लोकोंकी रक्षा करनेवाले

लोकपालोंकी रचना भी मुझे अवश्य करनी चाहिये; अन्यथा बिना रक्षकके ये सब लोक सुरक्षित नहीं रह सकेंगे। यह सोचकर उन्होंने जलमेंसे अर्थात् जल आदि

सूक्ष्म महाभूतोंमेंसे हिरण्यमय पुरुषको निकालकर उसको समस्त अङ्ग-उपाङ्गोंसे युक्त करके मूर्तिमान् बनाया। यहाँ ‘पुरुष’ शब्दसे सृष्टिकालमें सबसे

पहले प्रकट किये जानेवाले ब्रह्माका वर्णन किया गया है; क्योंकि ब्रह्मासे ही सब लोकपालोंकी और प्रजाको बढ़ानेवाले प्रजापतियोंकी उत्पत्ति हुई है-इस विषयका

विस्तृत वर्णन शास्त्रोंमें पाया जाता है और ब्रह्माकी उत्पत्ति जलके भीतरसे कमलनालसे हुई, ऐसा भी वर्णन आता है।

अतः यहाँ ‘पुरुष’ शब्दका अर्थ ब्रह्मा मान लेना उचित जान पड़ता है॥३॥

तमभ्यतपत्तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं मुखाद्वार वाचोऽग्निर्नासिके निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुरक्षिणी निरभिद्येतामक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुष

आदित्यः कर्णै निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्राद्दिशस्त्वङ् निरभिद्यत त्वचो लोमानि लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा

नाभिर्निरभिद्यत नाभ्याअपानोऽपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत शिश्नाद्रेतो रेतस आपः॥४॥

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व्याख्या- इस प्रकार हिरण्यगर्भ पुरुषको उत्पन्न करके उसके अङ्ग उपाङ्गोंके व्यक्त करनेके उद्देश्यसे जब परमात्माने संकल्परूप तप किया, तब उस तपके

फलस्वरूप हिरण्यगर्भ पुरुषके शरीरमें सर्वप्रथम अण्डेकी भाँति फूटकर मुख-छिद्र निकला। मुखसे वाक्-इन्द्रिय उत्पन्न हुई और वाक् इन्द्रियसे उसका

अधिष्ठातृ-देवता अग्नि उत्पन्न हुआ। फिर नासिकाके दोनों छिद्र हुए, उनमेंसे प्राणवायु प्रकट हुआ और प्राणोंसे वायुदेवता उत्पन्न हुआ। यहाँ प्राणेन्द्रियका

अलग वर्णन नहीं है; अतः प्राण-इन्द्रिय और उसके देवता अश्विनीकुमार भी नासिकासे ही उत्पन्न हुए–यों समझ लेना चाहिये। इसी प्रकार रसना-इन्द्रिय और

उसके देवताका भी अलग वर्णन नहीं है; अतः मुखसे वाक्-इन्द्रियके साथ-साथ रसना-इन्द्रिय और उसके देवताकी भी उत्पत्ति हुई—

यह समझ लेना चाहिये। फिर आँखोंके दोनों छिद्र प्रकट हुए, उनमेंसे नेत्र-इन्द्रिय और नेत्र-इन्द्रियसे उसका देवता सूर्य उत्पन्न हुआ। फिर कानोंके दोनों छिद्र

निकले, उनमेंसे श्रोत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई और श्रोत्र-इन्द्रियसे उसके देवता दिशाएँ
उत्पन्न हुईं। उसके बाद त्वचा (चर्म) प्रकट हुई, त्वचासे रोम उत्पन्न हुए, रोमोंसे

ओषधियाँ और वनस्पतियाँ उत्पन्न हुईं। फिर हृदय प्रकट हुआ, हृदयसे मन और मनसे उसका अधिष्ठाता चन्द्रमा उत्पन्न हुआ। फिर नाभि प्रकट हुई, नाभिसे

अपानवायु और अपानवायुसे गुदा-इन्द्रियका अधिष्ठाता मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ।
नाभिकी उत्पत्तिके साथ ही गुदा-छिद्र और गुदा-इन्द्रियकी उत्पत्ति भी समझ लेनी

चाहिये। यहाँ अपानवायु मलत्यागमें हेतु होनेके कारण और उसका स्थान नाभि होनेके कारण मुख्यतासे उसीका नाम लिया गया है। परंतु मृत्यु अपानका

अधिष्ठाता नहीं है, वह गुदा-इन्द्रियका अधिष्ठाता है; अतः उपलक्षणसे गुदा-इन्द्रियका वर्णन भी इसके अन्तर्गत मान लेना उचित प्रतीत होता है। फिर लिङ्ग

प्रकट हुआ, उसमेंसे वीर्य और उससे जल उत्पन्न हुआ। यहाँ लिङ्गकी उत्पत्तिसे उपस्थेन्द्रिय और उसका देवता प्रजापति उत्पन्न हुआ—यह बात भी समझ लेनी चाहिये॥४॥

॥प्रथम खण्ड समाप्त॥१॥

द्वितीय खण्ड

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ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन् महत्यर्णवे प्रापतंस्तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत् ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति॥१॥

व्याख्या- परमात्माद्वारा रचे गये वे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता अग्नि आदि सब देवता संसाररूपी इस महान् समुद्रमें आ पड़े। अर्थात् हिरण्यगर्भ पुरुषके शरीरसे

उत्पन्न होनेके बाद उनको कोई निर्दिष्ट स्थान नहीं मिला जिससे वे उस समष्टि शरीरमें ही रहे। तब परमात्माने उस देवताओंके समुदायको भूख और पिपासासे

संयुक्त कर दिया। अतः भूख और प्याससे पीड़ित होकर वे अग्नि आदि सब देवता अपनी सृष्टि करनेवाले परमात्मासे बोले-‘भगवन् ! हमारे लिये एक ऐसे स्थानकी

व्यवस्था कीजिये, जिसमें रहकर हमलोग अन्न भक्षण कर सकें अपना-अपना आहार ग्रहण कर सकें’॥१॥

ताभ्यो गामानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति॥२॥

व्याख्या- इस प्रकार उनके प्रार्थना करनेपर सृष्टिकर्ता परमेश्वरने उन सबके रहनेके लिये एक गौका शरीर बनाकर उनको दिखाया। उसे देखकर उन्होंने

कहा-‘भगवन् ! यह हमारे लिये पर्याप्त नहीं है, अर्थात् इस शरीरसे हमारा कार्य अच्छी तरह नहीं चलनेका। इससे श्रेष्ठ किसी दूसरे शरीरकी रचना कीजिये।’ तब

परमात्माने उनके लिये घोड़ेका शरीर रचकर उनको दिखाया। उसे देखकर वे फिर बोले-‘भगवन्! यह भी हमारे लिये यथेष्ट नहीं है, इससे भी हमारा कार्य नहीं

चल सकता। आप कोई तीसरा ही शरीर बनाकर हमें दीजिये’॥२॥

ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति। पुरुषो वाव सुकृतम्। ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति॥३॥

व्याख्या- इस प्रकार जब उन्होंने गाय और घोड़ेके शरीरोंको अपने लिये यथेष्ट नहीं समझा, तब परमात्माने उनके लिये पुरुषकी अर्थात् मनुष्य-शरीरकी रचना

की और वह उनको दिखाया। उसे देखते ही सब देवता बड़े प्रसन्न हुए और बोले-‘यह हमारे लिये बहुत सुन्दर निवास-स्थान बन गया। इसमें हम आरामसे रह

सकेंगे और हमारी सब आवश्यकताएँ भलीभाँति पूर्ण हो सकेंगी।’ सचमुच मनुष्य-शरीर परमात्माकी सुन्दर और श्रेष्ठ रचना है; इसीलिये यह देवदुर्लभ माना

गया है और शास्त्रोंमें जगह-जगह इसकी महिमा गायी गयी है; क्योंकि इसी शरीरमें जीव परमात्माके आज्ञानुसार यथायोग्य साधन करके उन्हें प्राप्त कर

सकता है। जब सब देवताओंने उस शरीरको पसंद किया, तब उनसे परमेश्वरने कहा,

तुमलोग अपने-अपने योग्य स्थान देखकर इस शरीरमें प्रवेश कर जाओ’ ॥३॥

अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाक्षिणी प्राविशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कौँ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं

प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन्॥४॥

व्याख्या- सृष्टिकर्ता परमेश्वरकी आज्ञा पाकर अग्निदेवताने वाक्-इन्द्रियका रूप धारण किया और पुरुषके (मनुष्य-शरीरके) मुखमें प्रविष्ट होकर जिह्वाको अपना

आश्रय बना लिया। यहाँ वरुणदेवता भी रसना-इन्द्रिय बनकर मुखमें प्रविष्ट हो गये, यह बात अधिक समझ लेनी चाहिये। फिर वायुदेवता प्राण होकर नासिकाके

छिद्रोंमें (उसी मार्गसे समस्त शरीरमें) प्रविष्ट हो गये। अश्विनीकुमार भी प्राण-इन्द्रियका रूप धारण करके नासिकामें प्रविष्ट हो गये—

यह बात भी यहाँ उपलक्षणसे समझी जा सकती है; क्योंकि उसका पृथक् वर्णन नहीं है। उसके बाद सूर्यदेवता नेत्र-इन्द्रिय बनकर आँखोंमें प्रविष्ट हो गये।

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दिशाभिमानी देवता श्रोत्रेन्द्रिय बनकर दोनों कानोंमें प्रविष्ट हो गये। ओषधि और वनस्पतियोंके अभिमानी देवता रोम बनकर चमड़ेमें प्रविष्ट हो गये तथा चन्द्रमा

मनका रूप धारण करके हृदयमें प्रविष्ट हो गये। मृत्युदेवता अपान (और पायु-इन्द्रिय) का रूप धारण करके नाभि में प्रविष्ट हो गये। जलके अधिष्ठातृ-देवता

वीर्य बनकर लिङ्गमें प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार सब-के-सब देवता

इन्द्रियोंके रूपमें अपने अपने उपयुक्त स्थानोंमें प्रविष्ट होकर स्थित हो गये॥४॥

मशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति। ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति।

तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः॥५॥

व्याख्या- तब भूख और प्यास-ये दोनों परमेश्वरसे कहने लगीं ‘भगवन्! इन सबके लिये तो आपने रहनेके स्थान निश्चित कर दिये, अब हमारे लिये भी किसी स्थान-

विशेषकी व्यवस्था करके उसमें हमें स्थापित कीजिये।’ उनके यों कहनेपर उनसे सृष्टिके रचयिता परमेश्वरने कहा-तुम दोनोंके लिये पृथक् स्थानकी आवश्यकता

नहीं है। तुम दोनोंको मैं इन देवताओंके स्थानों में भाग दिये देता हूँ। इन देवताओंके आहारमें मैं तुम दोनोंको भागीदार बना देता हूँ। सृष्टिके आदिमें ही

परमेश्वरने ऐसा नियम बना दिया था; इसीलिये जब जिस किसी भी देवताको देनेके लिये इन्द्रियोंद्वारा विषय भोग ग्रहण किये जाते हैं, उस देवताके भागमें ये

क्षुधा और पिपासा भी हिस्सेदार होती ही हैं अर्थात् उस इन्द्रियके अभिमानी देवताकी तृप्तिके साथ क्षुधा-पिपासाको भी शान्ति मिलती है॥५॥

॥द्वितीय खण्ड समाप्त॥२॥
खण्ड ३]
ऐतरेयोपनिषद्

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तृतीय खण्ड स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति॥१॥

व्याख्या- इन सबकी रचना हो जानेपर परमेश्वरने फिर विचार किया ‘ये सब लोक और लोकपाल तो रचे गये—इनकी रचनाका कार्य तो पूरा हो गया। अब इनके

निर्वाहके लिये अन्न भी होना चाहिये-भोग्य पदार्थों की भी व्यवस्था होनी चाहिये; क्योंकि इनके साथ भूख-प्यास भी लगा दी गयी है।

अतः उस अन्नकी भी रचना करूँ॥१॥

सोऽपोऽभ्यतपत्ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत। या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत्॥२॥

व्याख्या- उपर्युक्त प्रकारसे विचार करके परमेश्वरने जलको अर्थात् पाँचों सूक्ष्म महाभूतोंको तपाया-अपने संकल्पद्वारा उनमें क्रिया उत्पन्न की। परमात्माके

संकल्पद्वारा संचालित हुए उन सूक्ष्म महाभूतोंसे मूर्ति प्रकट हुई अर्थात् उनका स्थूल रूप उत्पन्न हुआ। वह जो मूर्ति अर्थात् उन पाँच महाभूतोंका स्थूलरूप

उत्पन्न हुआ; वही अन्न-देवताओंके लिये भोग्य है॥२॥

तदेनत् सृष्टं पराडत्यजिघांसत्तद्वाचाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोद्वाचा ग्रहीतुम्। यद्धैनद्वाचाग्रहैष्यदभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत्॥३॥

व्याख्या- लोकों और लोकपालोंकी आहारसम्बन्धी आवश्यकताको पूर्ण करनेके लिये उत्पन्न किया हुआ वह अन्न यों समझकर कि यह मुझे खानेवाला तो मेरा

विनाशक ही है, उससे छुटकारा पानेके लिये मुख फेरकर भागने लगा। तब उस मनुष्यके रूपमें उत्पन्न हुए जीवात्माने उस अन्नको वाणीद्वारा पकड़ना चाहा;

परंतु वह उसे वाणीद्वारा पकड़ नहीं सका। यदि उस पुरुषने वाणीद्वारा अन्नको ग्रहण कर लिया होता तो अब भी मनुष्य अन्नका वाणीद्वारा उच्चारण करके ही

तृप्त हो जाते-अन्नका नाम लेनेमात्रसे उनका पेट भर जाता; परंतु ऐसा नहीं होता॥३॥

तत्प्राणेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुं यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत्॥४॥

व्याख्या- तब उस पुरुषने अन्नको प्राणके द्वारा अर्थात् घ्राण-इन्द्रियके द्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको घ्राण-इन्द्रियके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि

वह इस अन्नको घ्राण-इन्द्रियद्वारा पकड़ सकता तो अब भी लोग अन्नको नाकसे सूंघकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसा नहीं देखा जाता॥४॥

तच्चक्षुषाजिघृक्षत्तन्नाशनोच्चक्षुषा ग्रहीतुं स यद्धैनच्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत्॥५॥

व्याख्या- फिर उस पुरुषने अन्नको आँखोंसे पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको आँखोंके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इस अन्नको आँखोंसे ग्रहण कर

सकता तो अवश्य ही आजकल भी लोग अन्नको केवल देखकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात नहीं देखी जाती ॥५॥

तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत्॥६॥

व्याख्या- फिर उस पुरुषने अन्नको कानोंद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको कानोंद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको कानोंसे पकड़ सकता तो

अवश्य ही अब भी मनुष्य केवल अन्नका नाम सुनकर ही तृप्त हो जाते; परंतु यह देखने में नहीं आता॥६॥

aitareya upanishad adhyay 1

तत्त्वचाजिघृक्षत्तन्नाशनोत्त्वचा ग्रहीतुं स यद्धैनत्त्वचाग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत्॥७॥

व्याख्या- तब उस पुरुषने अन्नको चमड़ीद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको चमड़ीद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको चमड़ीद्वारा पकड़ पाता तो

अवश्य ही आजकल भी मनुष्य अन्नको छूकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात नहीं है॥७॥

तन्मनसाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुं स यद्धैनन्मनसाग्रहैष्यद्ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत्॥८॥

व्याख्या- तब उस पुरुषने अन्नको मनसे पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको मनके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको मनसे पकड़ पाता तो अवश्य ही

आज भी मनुष्य अन्नका चिन्तन करके ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात देखनेमें नहीं आती॥८॥

खण्ड ३]

ऐतरेयोपनिषद् तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुं स यद्धै नच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत्॥९॥

व्याख्या- फिर उस पुरुषने अन्नको उपस्थ (लिङ्ग) द्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको उपस्थके द्वारा नहीं पकड़ सका। यदि वह उसको उपस्थद्वारा पकड़

पाता तो अवश्य ही अब भी मनुष्य अन्नका त्याग करके ही तृप्त हो जाते; परंतु यह देखने में नहीं आता॥९॥

तदपानेनाजिघृक्षत्तदावयत् सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद्वायुरन्नायुर्वा एष यद्वायुः॥१०॥

व्याख्या- अन्तमें उस पुरुषने अन्नको मुखके द्वारसे अपानवायुद्वारा ग्रहण करना चाहा, अर्थात् अपानवायुद्वारा मुखसे शरीरमें प्रवेश करानेकी चेष्टा की; तब वह

अन्नको अपने शरीरमें ले जा सका। वह अपानवायु जो बाहरसे शरीरके भीतर प्रश्वासके रूपमें जाता है, यही अन्नका ग्रह-उसको पकड़नेवाला अर्थात् भीतर ले

जानेवाला है। प्राणवायुके सम्बन्धमें जो यह प्रसिद्धि है कि यही अन्नके द्वारा मनुष्यके जीवनकी रक्षा करनेवाला होनेसे साक्षात् आयु है, वह इस अपानवायुको

लेकर ही है, जो प्राण आदि पाँच भेदोंमें विभक्त मुख्य प्राणका ही एक अंश है; इससे यह सिद्ध हुआ कि प्राण ही मनुष्यका जीवन है॥१०॥

स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति। स ईक्षत यदि वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि

श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति॥११॥

व्याख्या- इस प्रकार जब लोक और लोकपालोंकी रचना हो गयी, उन सबके लिये आहार भी उत्पन्न हो गया तथा मनुष्य-शरीरधारी पुरुषने उस आहारको

ग्रहण करना भी सीख लिया, तब उस सर्वस्रष्टा परमात्माने फिर विचार किया-‘यह मनुष्यरूप पुरुष मेरे बिना कैसे रहेगा? यदि इस जीवात्माके साथ मेरा सहयोग

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नहीं रहेगा तो यह अकेला किस प्रकार टिक सकेगा?* साथ ही यह भी विचार किया कि ‘यदि मेरे सहयोगके बिना इस पुरुषने वाणीद्वारा इसीलिये तो भगवान्ने

गीतामें कहा है कि समस्त भूतोंका जो कारण है, वह मैं हूँ। ऐसा कोई भी चराचर प्राणी नहीं है, जो मुझसे रहित हो (१०। ३९)। बोलनेकी क्रिया कर ली, घ्राण-

इन्द्रियसे सूंघनेका काम कर लिया, प्राणोंसे वायुको भीतर ले जाने और बाहर छोड़नेकी क्रिया कर ली, नेत्रोंद्वारा देख लिया, श्रवणेन्द्रियद्वारा सुन लिया, त्वक्-

इन्द्रियद्वारा स्पर्श कर लिया, मनके द्वारा मनन कर लिया, अपानद्वारा अन्न निगल लिया और यदि जननेन्द्रियद्वारा मूत्र और वीर्यका त्याग करनेकी क्रिया सम्पन्न कर

ली तो फिर मेरा क्या उपयोग रह गया? भाव यह कि मेरे बिना इन सब इन्द्रियोंद्वारा कार्य सम्पन्न कर लेना इसके लिये असम्भव है!’ यह सोचकर

परमात्माने विचार किया कि मैं इस मनुष्य शरीरमें पैर और मस्तक-इन दोमेंसे किस मार्गसे प्रविष्ट होऊँ॥११॥

स एतमेव सीमानं विदातया द्वारा प्रापद्यत। सैषा वितिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनम्। तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्नाः; अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति॥१२॥

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व्याख्या– परमात्मा इस मनुष्य-शरीरकी सीमा (मूर्धा) को अर्थात् ब्रह्मरन्ध्रको चीरकर (उसमें छेद करके) इसके द्वारा उस सजीव मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट हो

गये। वह यह द्वार विदृति (विदीर्ण किया हुआ द्वार) नामसे प्रसिद्ध है। वही यह विदृति नामका द्वार (ब्रह्मरन्ध्र) आनन्द देनेवाला अर्थात् आनन्दस्वरूप

परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है। परमेश्वरकी उपलब्धिके तीन स्थान हैं और स्वप्न भी तीन हैं। एक तो यह हृदयाकाश उनकी उपलब्धिका स्थान है। दूसरा

विशुद्ध आकाशरूप परमधाम है-जिसको सत्यलोक, गोलोक, ब्रह्मलोक, साकेतलोक, कैलास आदि अनेक नामोंसे पुकारा जाता है। तीसरा यह सम्पूर्ण

ब्रह्माण्ड है तथा इस जगत्की जो स्थूल, सूक्ष्म और
कारणरूप तीन अवस्थाएँ हैं, वे ही इसके तीन स्वप्न हैं॥१२॥

स जातो भूतान्यभिव्यख्यत् किमिहान्यं वावदिषदिति। स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत्। इदमदर्शमिती३॥१३॥

व्याख्या- मनुष्यरूपमें उत्पन्न हुए उस पुरुषने इस भौतिक जगत्की विचित्र रचनाको बड़े आश्चर्यपूर्वक चारों ओरसे देखा और मन-ही-मन इस प्रकार कहा-

इस विचित्र जगत्की रचना करनेवाला यहाँ दूसरा कौन है? क्योंकि यह मेरी की हुई रचना तो है नहीं और कार्य होनेके कारण इसका कोई न-कोई कर्ता अवश्य

होना चाहिये। इस प्रकार विचार करनेपर उस साधकने अपने हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान पुरुषको ही इस सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त परब्रह्मके

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रूपमें प्रत्यक्ष किया। तब वह आनन्दमें भरकर मन-ही-मन कहने लगा-‘अहो! बड़े ही सौभाग्यकी बात है कि मैंने परब्रह्म परमात्माको देख लिया-साक्षात् कर

लिया। इससे यह भाव प्रकट किया गया है कि इस जगत्की विचित्र रचनाको देखकर इसके कर्ता-धर्ता परमात्माकी सत्तामें विश्वास करके यदि मनुष्य उन्हें

जानने और पानेको उत्सुक हो, उन्हींपर निर्भर होकर चेष्टा करे तो अवश्य ही उन्हें जान सकता है। परमात्माको जानने और पानेका काम इस मनुष्य-शरीरमें

ही हो सकता है, दूसरे शरीरमें नहीं। अतः मनुष्यको अपने जीवनके अमूल्य समयका सदुपयोग करना चाहिये, उसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिये। इस अध्यायमें

मानो परमात्माकी महिमाका और मनुष्य-शरीरके महत्त्वका दिग्दर्शन करानेके लिये ही सृष्टि-रचनाका वर्णन किया गया है॥१३॥

तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण। परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः॥१४॥

व्याख्या– परब्रह्म परमात्माको उस मनुष्य-शरीरमें उत्पन्न हुए पुरुषने पूर्वोक्त प्रकारसे प्रत्यक्ष कर लिया, इसी कारण परमात्माका नाम ‘इदन्द्र’ है। अर्थात् ‘इदम्

द्रः इसको मैंने देख लिया’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार उसका ‘इदन्द्र’ नाम है। इस प्रकार यद्यपि उस परमात्माका नाम ‘इदन्द्र’ ही है, फिर भी लोग इसे परोक्षभावसे

इन्द्र कहकर पुकारते हैं; क्योंकि देवता लोग मानो छिपाकर ही कुछ कहना पसंद करते हैं। ‘परोक्षप्रिया इव हि देवा,

इस अन्तिम वाक्यको दुबारा कहकर इस खण्डकी समाप्ति सूचित की गयी है॥१४॥

॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥३॥

॥प्रथम अध्याय समाप्त॥१॥

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ईशावास्योपनिषद ishavasya

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aitareya Adhyay 2-3

aitareya upanishad Adhyay 2-3

द्वितीय अध्याय

[अध्याय २
प्रथम खण्ड
खण्ड १
ऐतरेयोपनिषद्

सम्बन्ध- प्रथम अध्याय में सृष्टि की उत्पत्ति का क्रम और मनुष्य शरीर का महत्त्व बताया गया और यह बात भी संकेत से कही गयी कि जीवात्मा इस

शरीरमें परमात्माको जानकर कृतकृत्य हो सकता है। अब इस शरीरकी अनित्यता दिखाकर वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये इस

अध्यायमें मनुष्य-शरीरकी उत्पत्तिका वर्णन किया जाता है,

पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति।

यदेतद्रेतस्तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनज्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म॥१॥

व्याख्या- यह संसारी जीव पहले-पहल पुरुष-शरीरमें (पिताके शरीरमें) वीर्यरूपसे गर्भ बनता है-प्रकट होता है। पुरुषके शरीरमें जो यह वीर्य है, वह

सम्पूर्ण अङ्गोंमेंसे निकलकर उत्पन्न हुआ तेज (सार) है। यह पिता अपने स्वरूपभूत उस वीर्यरूप तेजको पहले तो अपने शरीरमें ही धारण-पोषण करता

है-ब्रह्मचर्यके द्वारा बढ़ाता एवं पुष्ट करता है, फिर जब यह उसको स्त्रीके गर्भाशयमें सिञ्चन (स्थापित) करता है, तब इसे गर्भरूपमें उत्पन्न करता है। वह

माताके शरीरमें प्रवेश करना ही इसका पहला जन्म है॥१॥

तत्स्त्रिया आत्मभूतं गच्छति। यथा स्वमङ्गं तथा। तस्मादेनां न हिनस्ति। सास्यैतमात्मानमत्रगतं भावयति॥२॥

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व्याख्या- उस स्त्री (माता) के शरीरमें आया हुआ वह गर्भ-पिताके द्वारा स्थापित किया हुआ तेज उस स्त्रीके आत्मभावको प्राप्त हो जाता है अर्थात् जैसे उसके

दूसरे अङ्ग हैं, उसी प्रकार वह गर्भ भी उसके शरीरका एक अङ्ग-सा ही हो जाता है। यही कारण है कि वह गर्भ उस स्त्रीके उदरमें रहता हुआ भी गर्भिणी स्त्रीको

पीड़ा नहीं पहुँचाता-उसे भाररूप नहीं प्रतीत होता। वह स्त्री अपने शरीरमें आये हुए अपने पतिके आत्मारूप इस गर्भको अपने अङ्गोंकी भाँति ही भोजनके रससे

पुष्ट करती है और अन्य सब प्रकारके आवश्यक नियमोंका पालन करके उसकी भलीभाँति रक्षा करती है॥२॥


व्याख्या- अपने पतिके आत्मस्वरूप उस गर्भकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाली गर्भिणी स्त्री घरके लोगोंद्वारा और विशेषतः उसके पतिद्वारा पालन पोषण

करनेयोग्य होती है। अर्थात् घरके लोगोंका और पतिका यह परम आवश्यक कर्तव्य है कि वे सब मिलकर उसके खान-पान और रहन सहनकी सुव्यवस्था

करके सब प्रकारसे उसकी सँभाल रखें। उस गर्भको पहले अर्थात् प्रसव होनेतक तो स्त्री (माता) अपने शरीरमें धारण करती है; फिर जन्म लेनेके बाद-जन्म लेते ही

उसका पिता जातकर्म आदि संस्कारोंसे और नाना प्रकारके उपचारोंसे उस कुमारको अभ्युदयशील बनाता है और जन्मसे लेकर जबतक वह सर्वथा योग्य

नहीं बन जाता, तबतक हर प्रकारसे उसका पालन-पोषण करता है नाना प्रकारकी विद्या और शिल्पादिका अध्ययन कराके उसे सब प्रकारसे उन्नत

बनाता है। वह पिता जन्मके बाद उस बालकको उपयुक्त बना देनेके पहले-पहले जो उसकी रक्षा करता है, उसे सब प्रकारसे योग्य बनाता है, वह मानो इन

लोकोंको अर्थात् मनुष्योंकी परम्पराको बढ़ानेके द्वारा अपनी ही रक्षा करता है; क्योंकि इसी प्रकार एक से-एक उत्पन्न होकर ये सब मनुष्य विस्तारको प्राप्त हुए

हैं। यह जो इस जीवका गर्भसे बाहर आकर बालकरूपमें उत्पन्न होना है, वह इसका दूसरा जन्म है। इस वर्णनसे पिता और पुत्र दोनोंको अपने-अपने

कर्तव्यकी शिक्षा दी गयी है। पुत्रको तो यह समझना चाहिये कि
उसपर अपने माता-पिताका बड़ा भारी उपकार है; अतः वह उनकी जितनी सेवा कर सके, थोड़ी है और पिताको इस प्रकारका अभिमान नहीं करना चाहिये कि

मैंने इसका उपकार किया है, वरं यह समझना चाहिये कि मैंने अपनी ही वृद्धि करके अपने कर्तव्यका पालन किया है॥३॥

सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः प्रतिधीयते। अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति। स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म॥४॥

व्याख्या- पूर्वोक्त प्रकारसे इस पिताका ही आत्मस्वरूप पुत्र जब कार्य करनेयोग्य हो जाता है, तब वह पिता उसको अपना प्रतिनिधि बना देता है-अग्निहोत्र, देवपूजा

और अतिथि-सेवा आदि वैदिक और लौकिक जितने भी शुभकर्म हैं, उन सबका भार पुत्रको सौंप देता है। गृहस्थका पूरा दायित्व पुत्रपर छोड़कर स्वयं कृतकृत्य

हो जाता है अर्थात् अपनेको पितृ-ऋणसे मुक्त मानता है। उसके बाद इस शरीरकी आयु पूर्ण होनेपर जब वह (पिता) इसे छोड़कर यहाँसे विदा हो जाता है,

तब यहाँसे जाकर दूसरी जगह कर्मानुसार जहाँ जिस योनिमें जन्म लेता है, वह इसका तीसरा जन्म है। इसी तरह यह जन्म-जन्मान्तरकी परम्परा चलती रहती

है। जबतक जन्म-मृत्युके महान् कष्टका विचार करके इससे छुटकारा पानेके लिये जीवात्मा मनुष्य-शरीरमें चेष्टा नहीं करता, तबतक यह परम्परा नहीं टूटती।

अतः इसके लिये मनुष्यको अवश्य चेष्टा करनी चाहिये। यही इस प्रकरणका उद्देश्य प्रतीत होता है॥४॥

सम्बन्ध- इस प्रकार बार-बार जन्म लेना और मरना एक भयानक यन्त्रणा है; और जबतक यह जीव इस रहस्यको समझकर इस शरीररूप पिंजरेको काटकर

इससे सर्वथा अलग न हो जायगा तबतक इसका इस जन्म-मृत्युरूप यन्त्रणासे छुटकारा नहीं होगा—

यह भाव अगले दो मन्त्रोंमें वामदेव ऋषिके दृष्टान्तसे समझाया जाता है

तदुक्तमृषिणा गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा। शतं मा पुर आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति। गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच॥५॥

व्याख्या- उपर्युक्त चार मन्त्रों में कही हुई बातका ही रहस्य यहाँ ऋषिद्वारा बताया गया है। गर्भमें रहते हुए ही अर्थात् गर्भके बाहर आनेसे पहले ही वामदेव

ऋषिको यथार्थ ज्ञान हो गया था, इसलिये उन्होंने माताके उदरमें ही कहा था,

अहो कितने आश्चर्य और आनन्दकी बात है कि गर्भ में रहते रहते ही मैंने इन

अन्तःकरण और इन्द्रियरूप देवताओंके अनेक जन्मोंका रहस्य भलीभाँति जान लिया। अर्थात् मैं इस बातको जान गया कि ये जन्म आदि वास्तवमें इन

अन्त:करण और इन्द्रियोंके ही होते हैं, आत्माके नहीं। इस रहस्यको समझनेसे पहले मुझे सैकड़ों लोहेके समान कठोर शरीररूपी पिंजरोंने अवरुद्ध कर रखा

था। उनमें मेरी ऐसी दृढ़ अहंता हो गयी थी कि उससे छूटना मेरे लिये कठिन हो रहा था। अब मैं बाज पक्षीकी भाँति ज्ञानरूप बलके वेगसे उन सबको तोड़कर

उनसे अलग हो गया हूँ। उन शरीररूप पिंजरोंसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं रहा,

मैं सदाके लिये उन शरीरोंकी अहंतासे मुक्त हो गया हूँ’॥५॥

स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान्कामानाप्त्वामृतः समभवत् समभवत्॥६॥

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व्याख्या- इस प्रकार जन्म-जन्मान्तरके तत्त्वको जाननेवाला अर्थात् जबतक यह जीव इन शरीरोंके साथ एक हुआ रहता है, शरीरको ही अपना स्वरूप माने

रहता है, तबतक इसका जन्म-मृत्युसे छुटकारा नहीं होता, इसको जब बार-बार नाना योनियोंमें जन्म लेकर नाना प्रकारके कष्ट भोगने पड़ते हैं इस रहस्यको

समझनेवाला वह ज्ञानी वामदेव ऋषि गर्भसे बाहर आकर अन्तमें शरीरका नाश होनेपर संसारसे ऊपर उठ गया तथा ऊर्ध्वगतिके द्वारा भगवान्के परमधाममें

पहुँचकर वहाँ समस्त कामनाओंको पाकर अर्थात् सर्वथा आप्तकाम होकर अमृत हो गया! अमृत हो गया। जन्म-मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट गया।

समभवत्’ पदको दुहराकर यहाँ अध्यायकी समाप्तिको सूचित किया गया है॥६॥


॥प्रथम खण्ड समाप्त॥१॥
॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥२॥

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तृतीय अध्याय
[अध्याय ३
प्रथम खण्ड

कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे। कतरः स आत्मा, येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु

चास्वादु च विजानाति॥१॥

व्याख्या- इस उपनिषद्के पहले और दूसरे अध्यायोंमें दो आत्माओंका वर्णन आया है-एक तो वह आत्मा (परमात्मा), जिसने इस सृष्टिकी रचना की और सजीव

पुरुषको प्रकट करके उसका सहयोग देनेके लिये स्वयं उनमें प्रविष्ट हुआ; दूसरा वह आत्मा (जीवात्मा), जिसको सजीव पुरुषरूपमें परमात्माने प्रकट किया था

और जिसके जन्म-जन्मान्तरकी परम्पराका वर्णन दूसरे अध्यायमें गर्भमें आनेसे लेकर मरणपर्यन्त किया गया है। इनमेंसे उपास्य देव कौन है, वह कैसा है,

उसकी क्या पहचान है-इन बातोंका निर्णय करनेके लिये यह तीसरा अध्याय कहा गया है। केनोपनिषद्के आरम्भकी इसके साथ बहुत अंशोंमें समानता है।

मन्त्रका तात्पर्य यह है कि उस उपास्यदेव परमात्माके तत्त्वको जाननेकी इच्छावाले कुछ मनुष्य आपसमें विचार करने लगे जिसकी हमलोग उपासना

करते हैं अर्थात् जिसकी उपासना करके हमें उसे प्राप्त करना चाहिये, वह आत्मा कौन है? दूसरे शब्दोंमें जिसके सहयोगसे मनुष्य नेत्रोंके द्वारा समस्त दृश्य देखता

है, जिससे कानोंद्वारा शब्द सुनता है, जिससे घ्राणेन्द्रियके द्वारा नाना प्रकारकी गन्ध सूंघता है, जिससे वाणीद्वारा वचन बोलता है; जिससे रसनाद्वारा स्वादयुक्त

और स्वादहीन वस्तुको अलग-अलग पहचान लेता है, वह पहले और दूसरे अध्यायमें वर्णित दो आत्माओंमेंसे कौन है?॥१॥

यदेतद्धदयं मनश्चैतत। संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिकृतिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥२॥

व्याख्या- इस प्रकार विचार उपस्थित करके उन्होंने सोचा कि जो यह हृदय

अर्थात् अन्तःकरण है, यही पहले बताया हुआ मन है, इस मनकी जो यह सम्यक्

प्रकारसे जाननेकी शक्ति देखनेमें आती है-अर्थात् जो दूसरोंपर आज्ञाद्वारा शासन करनेकी शक्ति, पदार्थोंका अलग-अलग विवेचन करके जाननेकी शक्ति, देखे-

सुने हुए पदार्थों को तत्काल समझ लेनेकी शक्ति अनुभवको धारण करनेकी

शक्ति, देखनेकी शक्ति, धैर्य अर्थात् विचलित न होनेकी शक्ति, बुद्धि अर्थात्

निश्चय करनेकी शक्ति, मनन करनेकी शक्ति, वेग अर्थात् क्षणभरमें कहीं-से-कहीं चले जानेकी शक्ति, स्मरण-शक्ति, संकल्प शक्ति, मनोरथ-शक्ति, प्राण-शक्ति,

कामना-शक्ति और स्त्री-सहवास आदिकी अभिलाषा-इस प्रकार जो ये शक्तियाँ हैं, वे सब-की-सब उस स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्माके नाम हैं अर्थात् उसकी

सत्ताका बोध करानेवाले लक्षण हैं; इन सबको देखकर इन सबके रचयिता, संचालक और रक्षककी सर्वव्यापिनी सत्ताका ज्ञान होता है॥२॥

एष ब्रह्मेष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्च महाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतीषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि

चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं

तत्प्रज्ञानेत्रम्। प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥३॥

aitareya upanishad Adhyay 2-3

व्याख्या- इस प्रकार विचार करके उन्होंने निश्चय किया कि सबको उत्पन्न करके

सब प्रकारकी शक्ति प्रदान करनेवाले और उनकी रक्षा करनेवाले स्वच्छ

ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही उपास्यदेव हैं। ये ही ब्रह्मा हैं, ये ही पहले अध्यायमें

वर्णित इन्द्र हैं। ये ही सबकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले समस्त प्रजाओंके

स्वामी प्रजापति हैं। ये सब इन्द्रादि देवता, ये पाँचों महाभूत-जो पृथ्वी, वायु,

आकाश, जल और तेजके रूपमें प्रकट हैं तथा ये छोटे-छोटे मिले हुए-से

बीजरूपमें स्थित समस्त प्राणी तथा उनसे भिन्न दूसरे भी- अर्थात् अंडेसे उत्पन्न

होनेवाले, जेरसे उत्पन्न होनेवाले, पसीनेसे अर्थात् शरीरके मैलसे उत्पन्न होनेवाले

और जमीन फोड़कर उत्पन्न होनेवाले तथा घोड़े, गाय, हाथी, मनुष्य ये सब

मिलकर जो कुछ यह जगत् है; जो भी कोई पंखोंवाले तथा चलने फिरनेवाले और नहीं चलनेवाले जीवोंके समुदाय हैं, वे सब-के-सब प्राणी प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे

शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्य में समर्थ होते हैं और उन प्रज्ञानस्वरूप

परमात्मामें ही स्थित हैं। यह समस्त ब्रह्माण्ड प्रज्ञानस्वरूप परमात्माकी शक्तिसे

ही ज्ञान-शक्तियुक्त है। इसकी स्थितिके आधार प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा ही हैं।

अतः जिनको पहले इन्द्र और प्रजापतिके नामसे कहा गया है, जो सबकी रचना

और रक्षा करनेवाले तथा सबको सब प्रकारकी शक्ति देनेवाले प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा हैं, वे ही हमारे उपास्यदेव ब्रह्म हैं—यह निश्चय हुआ॥३॥


स एतेन प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन्स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वामृतः समभवत्समभवत्॥४॥

व्याख्या- जिसने इस प्रकार प्रज्ञानस्वरूप परमेश्वरको जान लिया, वह इस लोकसे ऊपर उठकर अर्थात् शरीरका त्याग करके उस परमानन्दमय परम

धाममें, जिसके स्वरूपका पूर्वमन्त्रमें वर्णन किया गया है, इस प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्मके साथ सम्पूर्ण दिव्य अलौकिक भोगरूप परम आनन्दको प्राप्त होकर

अमर हो गया अर्थात् सदाके लिये जन्म-मृत्युसे छूट गया।

समभवत्हो गया इस वाक्यकी पुनरुक्ति उपनिषद्की समाप्ति सूचित करनेके लिये की गयी है॥४॥

ishavasya upanishad

॥प्रथम खण्ड समाप्त ॥१॥
॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥३॥
ऋग्वेदीय ऐतरेयोपनिषद् समाप्त aitareya upanishad Adhyay 2-3

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ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

शांति मंत्र

उपनिषदों का मूल विषय ब्रह्मविद्या को माना गया है। ब्रह्मविद्या का क्षेत्र बड़ा व्यापक है।

upnishad

विद्वानों ने विभिन्न उपनिषदों में वर्णित विषयों के आधार पर ब्रह्मविद्या के अन्तर्गत ३२ विद्याओं को समाविष्ट माना है। ये विद्याएँ क्रमश: स्पष्ट करती हैं कि

(१) परब्रह्म अपने सङ्कल्पानुसार सबके कारण हैं,

(२) वे कल्याणगुणाकर वैभवसम्पत्र आनन्दमय हैं,

(३) उनका रूप दिव्य है, upnishad

(४) उपाधि रहित होकर वे सबके प्रकाशक हैं,

(५) वे चराचर के प्राण हैं,

(६) चे प्रकाशमान हैं,

(७) वे इन्द्र, प्राण आदि चेतनाचेतनों के आत्मा हैं,

(८) प्रत्येक पदार्थ की सत्ता, स्थिति एवं यन्त्र उनके अधीन हैं,

(९) समस्त संसार को लीन कर लेने की सामर्थ्य उनमें है,

(१०) उनकी नित्य स्थिति नेत्र में है,

(११) जगत् उनका शरीर है,

(१२) उनके विराट् रूप की कल्पना में अग्नि आदि अङ्ग बनकर रहते हैं,

(१३) स्वर्लोक,आदित्य आदि के अङ्गी बने हुए बे वैश्वानर हैं,

(१४) वे अनन्त ऐश्वर्य सम्पन्न हैं,

(१५) वे नियन्ता हैं,

(१६) वे मुक्त पुरुषों के भोग्य हैं,

(१७) वे सबके आधार हैं,

(१८) वे अन्तर्यामी रूप से सबके हृदय में विराजमान हैं,

(१९) वेसभी देवताओं के उपास्य है,

(२०) वे वसु, रुद्र, आदित्य, मरुत् और साभ्यों के आत्मा के रूप में उपास्य हैं,

(२१) अधिकारानुसार वे सभी के उपासनीय हैं,

(२२)वेप्रकृतितत्त्व के नियन्ता हैं,

(२३) समस्त जगत् उनका कार्य है,

(२४) उनका साक्षात्कार कर लेना मोक्ष का साधन है,

(२५) ब्रह्मा, रुद्र आदि-आदि देवताओं के अन्तर्यामी होने के कारण उन-उन देवताओं की उपासना के द्वारा वे प्राप्त होते हैं,

(२६) संसार के बन्धन से

मुक्ति उपनिषद् की अपनी शैली अद्भुत है।

गूढ़ रहस्यों को समझने की तीव्र उत्कण्ठा अनुभूति की गहन क्षमता तथाअभिव्यक्ति की सहजता का दर्शन जगह-जगह होता ही रहता है।

कठोपनिषद् में नचिकेता अपनी जिज्ञासा को लेकर यम के सामने इतने अविचल

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भाव से डटे रहते हैं कि यम को द्रवित होना ही पड़ता है। प्रकृति के गूढ़ रहस्यों

को जन सामान्य के लिए सुलभ उपमाओं के माध्यम से व्यक्त करने का बड़ा

सुन्दर प्रयास किया गया है। श्वेताश्वतर उपनिषद् के १.४ में विश्व व्यवस्था को एक विशिष्ट पहिये की उपमा से समझाने का प्रयास किया गया है,

तो १.५ में विश्व के जीवन प्रवाह को एक नदी के प्रसंग से व्यक्त करने का कौशल दिखाया गया है।

ब्राह्मी चेतना किस प्रकार विभिन्न चरणों को पूरा करती हुई ‘जीव’ रूप में व्यक्त होती है, यह

तथ्य मात्र विवेचनात्मक ढंग से समझना-समझाना बड़ा दुष्कर है; किन्तु छान्दोग्योपनिषद् (५.४-८) में ऋषि उसे क्रमश: पाँच प्रकार की अग्नियों में पाँच

आहुतियों के उदाहरण से बहुत सहज रूप से समझाते हैं। प्रत्येक अग्नि में एक हव्य की आहुति होती है,

उससे नये चरण में पदार्थ की उत्पत्ति होती है। उपनिषदों में कर्मकाण्ड का तथा

उनकी फलश्रुतियों का उल्लेख भी जहाँ-तहाँ मिलता है; लेकिन वे वहीं तक सीमित नहीं रह जाते। ,

कर्मकाण्ड के स्थूल स्वरूप को भेदकर उसके मर्म तक पहुँचते हैं, वे सामगान की व्याख्या करते हैं,

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥

ईशावास्योपनिषद ishavasya upanishad

यह ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वशाखीय संहिताका चालीसवाँ अध्याय है। मन्त्र-भागका अंश होनेसे इसका विशेष महत्त्व है। इसीको सबसे पहला

उपनिषद् माना जाता है। शुक्लयजुर्वेदके प्रथम उनतालीस अध्यायोंमें कर्मकाण्डका निरूपण हुआ है। यह उस काण्डका अन्तिम अध्याय है

और इसमें भगवत्तत्त्वरूप ज्ञानकाण्डका निरूपण किया गया है। इसके पहले

मन्त्रमें ‘ईशा वास्यम्’ वाक्य आनेसे इसका नाम ‘ईशावास्य’ माना गया है

शान्तिपाठ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

ॐ सच्चिदानन्दघन

व्याख्या- वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म पुरुषोत्तम सब प्रकारसे सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत् भी उस परब्रह्मसे ही पूर्ण है; क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से

ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्मकी पूर्णतासे जगत् पूर्ण है, इसलिये भी वह

परिपूर्ण है। उस पूर्ण ब्रह्ममें से पूर्णको निकाल लेनेपर भी वह पूर्ण ही बच रहता है।

त्रिविध तापकी शान्ति हो। यह मन्त्र बृहदारण्यक-उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके प्रथम ब्राह्मणकी प्रथम कण्डिकाका पूर्वार्द्धरूप है।

ॐ ईशा वास्यमिद सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्॥१॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- मनुष्योंके प्रति वेदभगवान्का पवित्र आदेश है कि अखिल विश्व-

ब्रह्माण्डमें जो कुछ भी यह चराचरात्मक जगत् तुम्हारे देखने-सुननेमें आ रहा है, सब-का

सब सर्वाधार, सर्वनियन्ता, सर्वाधिपति, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वकल्याणगुणस्वरूप परमेश्वरसे व्याप्त है; सदा-सर्वत्र उन्हींसे परिपूर्ण है (गीता ९। ४)।

इसका कोई भी अंश उनसे रहित नहीं है (गीता १०। ३९, ४२)। यों समझकर उन

ईश्वरको निरन्तर अपने साथ रखते हुए-सदा-सर्वदा उनका स्मरण करते हुए ही

तुम इस जगत्में ममता और आसक्तिका त्याग करके केवल कर्तव्य-पालनके लिये

ही विषयोंका यथाविधि उपभोग करो अर्थात्- विश्वरूप ईश्वरकी पूजाके लिये

ही कर्मोंका आचरण करो। विषयोंमें मनको मत फँसने दो, इसीमें तुम्हारा निश्चित कल्याण है (गीता २। ६४; ३। ९; १८। ४६)। वस्तुतः ये भोग्य-पदार्थ किसीके भी

नहीं हैं। मनुष्य भूलसे ही इनमें ममता और आसक्ति कर बैठता है। ये सब

परमेश्वरके हैं और उन्हींकी प्रसन्नताके लिये इनका उपयोग होना चाहिये ॥

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- पूर्व मन्त्रके कथनानुसार जगत्के एकमात्र कर्ता, धर्ता, हर्ता, सर्वशक्तिमान्, सर्वमय परमेश्वरका सतत स्मरण रखते हुए सब कुछ उन्हींका

समझकर उन्हींकी पूजाके लिये शास्त्रनियत कर्तव्यकर्मोंका आचरण करते हुए

ही सौ वर्षतक जीनेकी इच्छा करो-इस प्रकार अपने पूरे जीवनको परमेश्वरके प्रति समर्पण कर दो।

ऐसा समझो कि शास्त्रोक्त स्वकर्मका आचरण करते हुए जीवन-निर्वाह करना

केवल परमेश्वरकी पूजाके लिये ही है, अपने लिये नहीं-भोग भोगनेके लिये नहीं।

यों करनेसे वे कर्म तुझे बन्धनमें नहीं डाल सकेंगे। कर्म करते हुए कर्मोंसे लिप्त न

होनेका यही एकमात्र मार्ग है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी मार्ग

कर्मबन्धनसे मुक्त होनेका नहीं है (गीता २। ५०,५१; ५। १०)॥२॥

सम्बन्ध- इस प्रकार कर्मफलरूप जन्मबन्धनसे मुक्त होनेके निश्चित मार्गका

निर्देश करके अब इसके विपरीत मार्गपर चलनेवाले मनुष्योंकी गतिका वर्णन करते हैं,

असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः। तास्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥३॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- मानव-शरीर अन्य सभी शरीरोंसे श्रेष्ठ और परम दुर्लभ है एवं वह

जीवको भगवान्की विशेष कृपासे जन्म-मृत्युरूप संसार-समुद्रसे तरनेके लिये ही मिलता

है। ऐसे शरीरको पाकर भी जो मनुष्य अपने कर्मसमूहको ईश्वर-पूजाके लिये

समर्पण नहीं करते और कामोपभोगको ही जीवनका परम ध्येय मानकर विषयोंकी


आसक्ति और कामनावश जिस किसी प्रकारसे भी केवल विषयोंकी प्राप्ति और उनके यथेच्छ उपभोगमें ही लगे रहते हैं; वे वस्तुतः आत्माकी हत्या करनेवाले ही

हैं, क्योंकि इस प्रकार अपना पतन करनेवाले वे लोग अपने जीवनको केवल व्यर्थ

ही नहीं खो रहे हैं वरं अपनेको और भी अधिक कर्मबन्धनमें जकड़ रहे हैं। इन काम भोग-परायण लोगोंको


चाहे वे कोई भी क्यों न हों, उन्हें चाहे संसारमें कितने ही विशाल नाम, यश, वैभव

या अधिकार प्राप्त हों, मरनेके बाद कर्मोंके फलस्वरूप बार-बार उन कूकर

शूकर, कीट, पतंगादि विभिन्न शोक संतापपूर्ण आसुरी योनियोंमें और भयानक

नरकोंमें भटकना पड़ता है (गीता १६। १६, १९, २०), जो कि ऐसे आसुरी स्वभाववाल

दुष्टोंके लिये निश्चित किये हुए हैं और महान् अज्ञानरूप अन्धकारसे आच्छादित

हैं। इसीलिये श्रीभगवान्ने गीतामें कहा है कि मनुष्यको अपने द्वारा अपना उद्धार

करना चाहिये, अपना पतन नहीं करना चाहिये (६। ५)

सम्बन्ध- जो परमेश्वर सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त हैं, जिनका सतत स्मरण करते हुए

तथा जिनकी पूजाके लिये ही समस्त कर्म करने चाहिये, वे कैसे हैं-इस जिज्ञासापर कहते हैं,

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्। तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥४॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- वे सर्वान्तर्यामी सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अचल और एक हैं, तथापि मनसे

भी अधिक तीव्र वेगयुक्त हैं। जहाँतक मनकी गति है, वे उससे भी कहीं आगे

पहलेसे ही विद्यमान हैं। मन तो वहाँतक पहुँच ही नहीं पाता। वे सबके आदि और

ज्ञानस्वरूप हैं अथवा सबके आदि होनेके कारण सबको पहलेसे ही जानते हैं।

पर उनको देवता तथा महर्षिगण भी पूर्णरूपसे नहीं जान सकते (गीता १० । २)।

जितने भी तीव्र वेगयुक्त बुद्धि, मन और इन्द्रियाँ अथवा वायु आदि देवता हैं,

अपनी शक्तिभर परमेश्वरके अनुसंधानमें सदा दौड़ लगाते रहते हैं; परंतु परमेश्वर नित्य अचल रहते हुए ही उन सबको पार करके आगे निकल जाते हैं।

वे सब वहाँतक पहुँच ही नहीं पाते। असीमकी सीमाका पता ससीमको कैसे लग

सकता है। बल्कि वायु आदि देवताओंमें जो शक्ति है, जिसके द्वारा वे जलवर्षण,

प्रकाशन, प्राणिप्राणधारण आदि कर्म करनेमें समर्थ होते हैं, वह इन

अचिन्त्यशक्ति परमेश्वरकी शक्तिका एक अंशमात्र ही है
उनका सहयोग मिले बिना ये सब कुछ भी नहीं कर सकते ॥४

सम्बन्ध- अब परमेश्वरकी अचिन्त्यशक्तिमत्ता तथा व्यापकता प्रकारान्तरसे पुनः वर्णन करते हैं

तदेजति तन्नजति तद् दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥५॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- वे परमेश्वर चलते भी हैं और नहीं भी चलते; एक ही कालमें परस्परविरोधी भाव, गुण तथा क्रिया जिनमें रह सकती है, वे ही तो परमेश्वर हैं।

यह उनकी अचिन्त्य शक्तिकी महिमा है। दूसरे प्रकारसे यह भी कहा जा
सकता है कि भगवान् जो अपने दिव्य परमधाममें और लीलाधाममें अपने प्रिय

भक्तोंको सुख पहुँचानेके लिये अप्राकृत सगुण-साकार रूपमें प्रकट रहकर लीला किया करते हैं, यह उनका चलना है; और निर्गुणरूपसे जो सदा-सर्वथा

अचल स्थित हैं, यह उनका न चलना है। इसी प्रकार वे श्रद्धा-प्रेमसे रहित मनुष्योंको कभी दर्शन

नहीं देते, अतः उनके लिये दूर-से-दूर हैं; और प्रेमकी पुकार सुनते ही जिन प्रेमीजनोंके सामने चाहे जहाँ उसी क्षण प्रकट हो जाते हैं, उनके लिये वे समीप

से-समीप हैं। इसके अतिरिक्त वे सदा-सर्वत्र परिपूर्ण हैं, इसलिये दूर-से-दूर भी वे ही हैं और समीप-से-समीप भी वे ही हैं; क्योंकि ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ

वे न हों। सबके अन्तर्यामी होनेके कारण भी वे अत्यन्त समीप हैं; पर जो अज्ञानी लोग उन्हें इस रूपमें नहीं पहचानते, उनके लिये वे बहुत दूर हैं (गीता १३ । १५)।

वस्तुत: वे इस समस्त जगत्के परम आधार हैं और परम कारण वे ही हैं; इसलिये बाहर-भीतर सभी जगह वे ही परिपूर्ण हैं (गीता ७। ७)॥

सम्बन्ध- अब अगले दो मन्त्रों में इन परब्रह्म परमेश्वरको जाननेवाले महापुरुषकी स्थितिका वर्णन किया जाता है

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥६॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- इस प्रकार जो मनुष्य प्राणिमात्रको सर्वाधार परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मामें देखता है और सर्वान्तर्यामी परम प्रभु परमात्माको प्राणिमात्रमें देखता

है, वह कैसे किससे घृणा या द्वेष कर सकता है। वह तो सदा-सर्वत्र अपने परम

प्रभुके ही दर्शन करता हुआ (गीता ६। २९-३०)। मन-ही-मन सबको प्रणाम करता रहता है तथा

सबकी सब प्रकारसे सेवा करना और उन्हें सुख पहुँचाना चाहता है॥६॥

यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥७॥

व्याख्या- इस प्रकार जब मनुष्य परमात्माको भलीभाँति पहचान लेता है, जब

उसकी सर्वत्र भगवदृष्टि हो जाती है-जब वह प्राणिमात्रमें एकमात्र तत्त्व

श्रीपरमात्माको ही देखता है, तब उसे सदा-सर्वत्र परमात्माके दर्शन होते रहते हैं।

उस समय उसके अन्तःकरणमें शोक, मोह आदि विकार कैसे रह सकते हैं

वह तो इतना आनन्दमग्न हो जाता है कि शोक-मोहादि विकारोंकी छाया भी कहीं

उसके चित्तप्रदेशमें नहीं रह जाती। लोगोंके देखनेमें वह सब कुछ करता हुआ भी

वस्तुतः अपने प्रभुमें ही क्रीडा करता है (गीता ६। ३१)। उसके लिये प्रभु और

प्रभुकी लीलाके अतिरिक्त अन्य कुछ रह ही नहीं जाता ॥७

सम्बन्ध- अब इस प्रकार परमप्रभु परमेश्वरको तत्त्वसे जाननेका तथा सर्वत्र देखनेका फल बतलाते हैं

पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण _ मस्नाविर शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतो ऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥८॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- उपर्युक्त वर्णनके अनुसार परमेश्वरको सर्वत्र जानने-देखनेवाला महापुरुष उन परब्रह्म पुरुषोत्तम सर्वेश्वरको प्राप्त होता है, जो शुभाशुभ

कर्मजनित प्राकृत सूक्ष्म देह तथा पाञ्चभौतिक अस्थि-शिरा-मांसादिमय षड्विकारयुक्त स्थूल देहसे रहित, छिद्ररहित, दिव्य शुद्ध सच्चिदानन्दघन हैं; एवं जो क्रान्तदर्शी-सर्वद्रष्टा हैं,

सबके ज्ञाता, सबको अपने नियन्त्रणमें रखनेवाले सर्वाधिपति हैं, और कर्मपरवश

नहीं वरं स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले हैं तथा जो सनातन कालसे सब प्राणियोंके लिये

उनके कर्मानुसार समस्त पदार्थोंकी यथायोग्य रचना और विभागव्यवस्था करते आये हैं॥

सम्बन्ध- अब अगले तीन मन्त्रोंमें विद्या और अविद्याका तत्त्व समझाया जायगा।

इस प्रकरणमें परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिके साधन ‘ज्ञान’ को विद्याके नामसे कहा

गया है और स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति अथवा इस लोकके विविध भोगैश्वर्यकी

प्राप्तिके साधन ‘कर्म’को अविद्याके नामसे। इन ज्ञान और कर्म-दोनोंके तत्त्वको

भलीभाँति समझकर उनका अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य ही इन दोनों साधनोंके

द्वारा सर्वोत्तम तथा वास्तविक फल प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं-इस

रहस्यको समझानेके लिये पहले, उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं

अन्धंतमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः॥९॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- जो मनुष्य भोगोंमें आसक्त होकर उनकी प्राप्तिके साधनरूप अविद्याका-विविध प्रकारके कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं, वे उन कर्मोंके

फलस्वरूप अज्ञानान्धकारसे परिपूर्ण विविध योनियों और भोगोंको ही प्राप्त होते

हैं। वे मनुष्य-जन्मके चरम और परम लक्ष्य श्रीपरमेश्वरको न पाकर निरन्तर जन्म

मृत्युरूप संसारके प्रवाहमें पड़े हुए विविध तापोंसे संतप्त होते रहते हैं।
दूसरे जो मनुष्य न तो अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्तापनके अभिमानसे रहित

कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं और न विवेक-वैराग्यादि ज्ञानके प्राथमिक साधनोंका ही सेवन करते हैं; परंतु केवल शास्त्रोंको पढ़-सुनकर अपनेमें विद्याका-ज्ञानका

मिथ्या आरोप करके ज्ञानाभिमानी बन बैठते हैं, ऐसे, मिथ्या ज्ञानी मनुष्य अपनेको ज्ञानी मानकर

हमारे लिये कोई भी कर्तव्य नहीं है’ इस प्रकार कहते हुए कर्तव्यकर्मोंका त्याग

कर देते हैं और इन्द्रियोंके वशमें होकर शास्त्रविधिसे विपरीत मनमाना आचरण

करने लगते हैं। इससे वे लोग सकामभावसे कर्म करनेवाले विषयासक्त

मनुष्योंकी अपेक्षा भी अधिकतर अन्धकारको-पशु-पक्षी, शूकर-कूकर आदि नीच योनियोंको और रौरव कुम्भीपाकादि घोर नरकोंको प्राप्त होते हैं॥९॥

सम्बन्ध- शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर ज्ञान तथा कर्मका अनुष्ठान करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, उसका संकेतसे वर्णन करते हैं

अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुरविद्यया । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥१०॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले ज्ञानका यथार्थ स्वरूप है नित्यानित्यवस्तुका विवेक, क्षणभङ्गर विनाशशील अनित्य ऐहलौकिक और

पारलौकिक भोग-सामग्रियों और उनके साधनोंसे पूर्ण विरक्ति, संयमपूर्ण पवित्र जीवन और एकमात्र सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्मके चिन्तनमें अखण्ड संलग्नता।

इस यथार्थ ज्ञानके अनुष्ठानसे प्राप्त होता है-परब्रह्म पुरुषोत्तम (गीता १८। ४९-५५)। यथार्थ ज्ञानका यह सर्वोत्तम फल, ज्ञानाभिमानमें रत स्वेच्छाचारी

मनुष्योंको जो दुर्गतिरूप फल मिलता है, उससे सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।
इसी प्रकार सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले कर्मका स्वरूप है-कर्ममें कर्तापनके

अभिमानका अभाव, राग-द्वेष और फल-कामनाका अभाव एवं अपने वर्णाश्रम तथा परिस्थितिके अनुरूप केवल भगवत्सेवाके भावसे श्रद्धापूर्वक शास्त्रविहित

कर्मोंका यथायोग्य सेवन। इसके अनुष्ठानसे समस्त दुर्गुण और दुराचारोंका
अशेष रूपसे नाश हो जाता है और हर्ष-शोकादि समस्त विकारोंसे रहित होकर

साधक मृत्युमय संसार-सागरसे तर जाता है। सकामभावसे किये जानेवाले कर्मोंका जो पुनर्जन्मरूप फल उन कर्ताओंको मिलता है, उससे इस यथार्थ कर्म-

सेवनका यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।। इस प्रकार हमने उन परम

ज्ञानी महापुरुषोंसे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक्-पृथक्-रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था॥१०॥

सम्बन्ध- अब उपर्युक्त प्रकारसे ज्ञान और कर्म-दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट शब्दोंमें बतलाते हैं

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभय सह। अविद्यया मृत्युं तीर्वा विद्ययामृतमश्नुते॥११॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- कर्म और अकर्मका वास्तविक रहस्य समझनेमें बड़े-बड़े बुद्धिमान् पुरुष भी भूल कर बैठते हैं (गीता ४। १६)। इसी कारण कर्म रहस्यसे अनभिज्ञ

ज्ञानाभिमानी मनुष्य कर्मको ब्रह्मज्ञानमें बाधक समझ लेते हैं और अपने वर्णाश्रमोचित अवश्यकर्तव्य कर्मोंका त्याग कर देते हैं; परंतु इस प्रकारके त्यागसे

उन्हें त्यागका यथार्थ फल-कर्मबन्धनसे छुटकारा नहीं मिलता (गीता १८। ८)। इसी प्रकार ज्ञान (अकर्मावस्था-नैष्कर्म्य)-का तत्त्व न समझनेके कारण मनुष्य अपनेको

ज्ञानी तथा संसारसे ऊपर उठे हुए मान लेते हैं। अतः वे या तो अपनेको पुण्य-पापसे अलिप्त मानकर मनमाने कर्माचरणमें प्रवृत्त हो जाते हैं, या कर्मोंको

भाररूप समझकर उन्हें छोड़ देते हैं और आलस्य, निद्रा तथा प्रमादमें अपने दुर्लभ मानव-जीवनके अमूल्य समयको नष्ट कर देते हैं।

इन दोनों प्रकारके अनर्थोंसे बचनेका एकमात्र उपाय कर्म और ज्ञानके रहस्यको साथ-साथ समझकर उनका यथायोग्य अनुष्ठान करना ही है। इसीलिये इस मन्त्रमें

यह कहा गया है कि जो मनुष्य इन दोनोंके तत्त्वको एक ही साथ भलीभाँति समझ लेता है, वह अपने वर्णाश्रम और परिस्थितिके अनुरूप शास्त्रविहित कर्मोंका

स्वरूपतः त्याग नहीं करता, बल्कि उनमें कर्तापनके अभिमानसे तथा रागद्वेष और फलकामनासे रहित होकर उनका यथायोग्य आचरण करता है। इससे

उसकी जीवनयात्रा भी सुखपूर्वक चलती है और इस भावसे कर्मानुष्ठान करनेके फलस्वरूप उसका अन्तःकरण समस्त दुर्गुणों एवं विकारोंसे रहित होकर

अत्यन्त निर्मल हो जाता है और भगवत्कृपासे वह मृत्युमय संसारसे सहज ही तर जाता है। इस कर्मसाधनके साथ-ही साथ विवेक-वैराग्यसम्पन्न होकर निरन्तर

ब्रह्मविचाररूप ज्ञानाभ्यास करते रहनेसे श्रीपरमेश्वरके यथार्थ ज्ञानका उदय होनेपर वह शीघ्र ही परब्रह्म परमेश्वरको साक्षात् प्राप्त कर लेता है॥११॥

सम्बन्ध- अब अगले तीन मन्त्रों में असम्भूति और सम्भूतिका तत्त्व बतलाया जायगा। इस प्रकरणमें ‘असम्भूति’ शब्दका अर्थ है- जिनकी पूर्णरूपसे सत्ता न

हो, ऐसी विनाशशील देव, पितर और मनुष्यादि योनियाँ एवं उनकी भोग-सामग्रियाँ। इसीलिये चौदहवें मन्त्रमें ‘असम्भूति’ के स्थानपर स्पष्टतया ‘विनाश’

शब्दका प्रयोग किया गया है

। इसी प्रकार सम्भूति शब्दका अर्थ है-जिसकी सत्ता पूर्णरूपसे हो वह सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाला अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम (गीता

७। ६-७)। देव, पितर और मनुष्यादिकी उपासना किस प्रकार करनी चाहिये और अविनाशी परब्रह्मकी किस प्रकार-इस तत्त्वको समझकर उनका अनुष्ठान

करनेवाले
मनुष्य ही उनके सर्वोत्तम फलोंको प्राप्त हो सकते हैं, अन्यथा नहीं। इस भावको समझानेके लिये पहले, उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान

करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽर ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यारताः॥१२॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- जो मनुष्य विनाशशील स्त्री, पुत्र, धन, मान, कीर्ति, अधिकार आदि इस लोक और परलोककी भोग-सामग्रियोंमें आसक्त होकर उन्हींको सुखका हेतु

समझते हैं तथा उन्हींके अर्जन-सेवनमें सदा संलग्न रहते हैं एवं इन भोग-सामग्रियोंकी प्राप्ति, संरक्षण तथा वृद्धिके लिये उन विभिन्न देवता, पितर और

मनुष्यादिकी
उपासना करते हैं, जो स्वयं जन्म-मरणके चक्रमें पड़े हुए होनेके कारण अभावग्रस्त और शरीरकी दृष्टिसे विनाशशील हैं, उनके उपासक वे भोगासक्त

मनुष्य अपनी उपासनाके फलस्वरूप विभिन्न देवताओंके लोकोंको और विभिन्न भोगयोनियोंको प्राप्त होते हैं। यही उनका अज्ञानरूप घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है।

(गीता ७। २० से २३) दूसरे जो मनुष्य शास्त्रके तात्पर्यको तथा भगवान्के दिव्य गुण, प्रभाव, तत्त्व और रहस्यको न समझनेके कारण न तो भगवान्का भजन-ध्यान

ही करते हैं और न श्रद्धाका अभाव तथा भोगोंमें आसक्ति होनेके कारण लोकसेवा और शास्त्रविहित देवोपासनामें ही प्रवृत्त होते हैं, ऐसे वे विषयासक्त

मनुष्य झूठ-मूठ ही अपनेको ईश्वरोपासक बतलाकर सरलहृदय जनतासे अपनी पूजा कराने लगते हैं। ये लोग मिथ्याभिमानके कारण देवताओंको तुच्छ बतलाते

हैं और शास्त्रानुसार अवश्यकर्तव्य देवपूजा तथा गुरुजनोंका सम्मान-सत्कार करना भी छोड़ देते हैं। इतना ही नहीं, दूसरोंको भी अपने वाग्जालमें फँसाकर

उनके मनोंमें भी देवोपासना आदिके प्रति अश्रद्धा उत्पन्न कर देते हैं। ये लोग अपनेको ही ईश्वरके समकक्ष मानते-मनवाते हुए मनमाने दुराचरणमें प्रवृत्त हो

जाते हैं। ऐसे दम्भी मनुष्योंको अपने दुष्कर्मोंका कुफल भोगनेके लिये बाध्य होकर कूकर-शूकर आदि नीच योनियोंमें और रौरव-कुम्भीपाकादि नरकोंमें

जाकर भीषण यन्त्रणाएँ भोगनी पड़ती हैं। यही उनका विनाशशील देवताओंकी उपासना करनेवालोंकी अपेक्षा भी अधिकतर घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है

(गीता १६। १८-१९)॥१२॥

सम्बन्ध- शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर सम्भूति और असम्भूतिकी

उपासना करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, अब संकेतसे उसका वर्णन करते हैं

अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्। इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥१३॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- अविनाशी ब्रह्मकी उपासनाका यथार्थ स्वरूप है-परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्को सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वाधार, सर्वमय, सम्पूर्ण संसारके कर्ता, धर्ता,

हर्ता, नित्य अविनाशी समझना और भक्ति, श्रद्धा तथा प्रेमपरिपूरित हृदयसे नित्य-निरन्तर उनके दिव्य परम मधुर नाम, रूप, लीला, धाम तथा प्राकृत गुणरहित एवं दिव्य

गुणगणमय सच्चिदानन्दघन स्वरूपका श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि करते रहना। इस प्रकारकी सच्ची उपासनासे उपासकको शीघ्र ही अविनाशी परब्रह्म

पुरुषोत्तमकी प्राप्ति हो जाती है (गीता ९।३४)। ईश्वरोपासनाका मिथ्या स्वाँग भरनेवाले दम्भियोंको जो फल मिलता है, उससे इन सच्चे उपासकोंको मिलनेवाला यह फल

सर्वथा भिन्न और विलक्षण है। इसी प्रकार विनाशशील देवता, पितर, मनुष्य आदिकी उपासनाका यथार्थ स्वरूप है-शास्त्रों एवं श्रीभगवान्के आज्ञानुसार (गीता

१७।१४) देवता, पितर, ब्राह्मण, माता-पिता, आचार्य और ज्ञानी महापुरुषोंकी सेवा-पूजादि अवश्य कर्तव्य समझकर करना और उसको भगवान्की आज्ञाका पालन एवं

उनकी परम सेवा समझना। इस प्रकार निष्कामभावसे देव-पितर-मनुष्य आदिकी सेवा-पूजा करनेवालोंके अन्तःकरणकी शुद्धि होती है तथा उनको

श्रीभगवान्की कृपा एवं प्रसन्नता प्राप्त होती है, जिससे वे मृत्युमय संसारसागरसे तर जाते हैं। विनाशशील देवता आदिकी सकाम उपासनासे जो फल मिलता है,

उससे यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है।
इस प्रकार हमने उन धीर तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंसे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक्-पृथक्-रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था॥१३॥

सम्बन्ध- अब उपर्युक्त प्रकारसे सम्भूति और असम्भूति दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट बतलाते हैं

सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभय सह। विनाशेन मृत्यु ती| सम्भूत्यामृतमश्नुते॥१४॥

व्याख्या- जो मनुष्य यह समझ लेता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम नित्य, अविनाशी, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वाधिपति, सर्वात्मा और सर्वश्रेष्ठ हैं, वे

परमेश्वर नित्य निर्गुण (प्राकृत गुणोंसे सर्वथा रहित) और नित्य सगुण (स्वरूपभूत दिव्यकल्याण-गुणगण-विभूषित) हैं और इसीके साथ जो यह भी समझ लेता है कि देवता, पितर,

मनुष्य आदि जितनी भी योनियाँ तथा भोगसामग्रियाँ हैं, सभी विनाशशील, क्षणभङ्गर और जन्म-मृत्युशील होनेके कारण महान् दुःखके कारण हैं; तथापि

इनमें जो सत्ता-स्फूर्ति तथा शक्ति है, वह सभी भगवान्की है और भगवान्के जगच्चक्रके सुचारुरूपसे चलते रहनेके लिये भगवत्प्रीत्यर्थ ही इनकी यथायोग्य सेवा-पूजा आदि

करनेकी शास्त्रोंने आज्ञा दी है और शास्त्र भगवान्की ही वाणी हैं, वह मनुष्य ऐहलौकिक तथा पारलौकिक देव-पितरादि लोकोंके भोगोंमें आसक्त न होकर

कामना ममता आदि हृदयसे निकालकर इन सबकी यथायोग्य शास्त्रविहित सेवा पूजादि करता है। इससे उसकी जीवन-यात्रा सुखपूर्वक चलती है और उसके आभ्यन्तरिक

विकारोंका नाश होकर अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है एवं भगवत्कृपासे वह सहज ही मृत्युमय संसार-सागरसे तर जाता है। विनाशशील देवता आदिकी निष्काम

उपासनाके साथ-ही-साथ अविनाशी परात्पर प्रभुकी उपासनासे वह शीघ्र ही अमृतरूप परमेश्वरको प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है॥१४

सम्बन्ध- श्रीपरमेश्वरकी उपासना करनेवालेको परमेश्वरकी प्राप्ति होती है, यह

कहा गया। अतः भगवान्के भक्तको अन्तकालमें परमेश्वरसे उनकी प्राप्तिके लिये किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥१५॥

ishavasya upanishad

व्याख्या- भक्त इस प्रकार प्रार्थना करे कि ‘हे भगवन् ! आप अखिल ब्रह्माण्डके पोषक हैं, आपसे ही सबको पुष्टि प्राप्त होती है। आपकी भक्ति ही सत्यधर्म है

और मैं उसमें लगा हुआ हूँ; अतएव मेरी पुष्टि-मेरे मनोरथकी पूर्ति तो आप अवश्य ही करेंगे। आपका दिव्य श्रीमुख–सच्चिदानन्दस्वरूप प्रकाशमय सूर्यमण्डलकी

चमचमाती हुई ज्योतिर्मयी यवनिकासे आवृत है। मैं आपका निरावरण-प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहता हूँ, अतएव आपके पास पहुँचकर आपका निरावरण-दर्शन

करनेमें बाधा देनेवाले जितने भी, जो भी आवरण–प्रतिबन्धक हों, उन सबको मेरे लिये आप हटा लीजिये! अपने सच्चिदानन्दस्वरूपको प्रत्यक्ष प्रकट कीजिये’ ॥१५॥

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन्समूह। तेजो यत्ते रूपंकल्याणतमंतत्ते पश्यामियोऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि॥१६॥

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व्याख्या- भगवन्! आप अपनी सहज कृपासे भक्तोंके भक्ति-साधनमें दृष्टि प्रदान करके उनका पोषण करनेवाले हैं; आप समस्त ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, परम

ज्ञानस्वरूप तथा अपने भक्तोंको अपने स्वरूपका यथार्थ ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं (गीता १०। ११); आप सबका यथायोग्य नियमन, नियन्त्रण और शासन करनेवाले

हैं, आप ही भक्तों या ज्ञानी महापुरुषोंके लक्ष्य हैं और अविज्ञेय होनेपर भी अपने भक्तवत्सल स्वभावके कारण भक्तिके द्वारा उनके जाननेमें आ जाते हैं, आप

प्रजापतिके भी प्रिय हैं। हे प्रभो! इस सूर्यमण्डलकी तप्त रश्मियोंको एकत्र करके अपनेमें लुप्त कर लीजिये। इसके उग्र तेजको समेटकर अपनेमें मिला लीजिये

और मुझे अपने दिव्यस्वरूपके प्रत्यक्ष दर्शन कराइये। अभी तो मैं आपकी कृपासे आपके सौन्दर्य-माधुर्य निधि दिव्य परम कल्याणमय

सच्चिदानन्दस्वरूपका ध्यान-दृष्टिसे दर्शन कर रहा हूँ; साथ ही बुद्धिके द्वारा समझ भी रहा हूँ कि जो आप परम पुरुष इस सूर्यके और समस्त विश्वके आत्मा

हैं, वही मेरे भी आत्मा हैं; अतः मैं भी वही हूँ॥१६॥

सम्बन्ध- ध्यानके द्वारा भगवान्के दिव्य मङ्गलमय स्वरूपके दर्शन करता हुआ साधक अब भगवान्की साक्षात् सेवामें पहुँचनेके लिये व्यग्र हो रहा है और

शरीरका त्याग करते समय सूक्ष्म तथा स्थूल शरीरके सर्वथा विघटनकी भावना करता हुआ भगवान्से प्रार्थना करता है

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त शरीरम्। ॐक्रतो स्मर कृत स्मर क्रतो स्मर कृत स्मर॥१७॥

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व्याख्या– परमधामका यात्री वह साधक अपने प्राण, इन्द्रिय और शरीरको अपनेसे सर्वथा भिन्न समझकर उन सबको उनके अपने-अपने उपादान तत्त्वमें

सदाके लिये विलीन करना एवं सूक्ष्म और स्थूल शरीरका सर्वथा विघटन करना चाहता है। इसलिये कहता है कि प्राणादि समष्टिवायु आदिमें प्रविष्ट हो जायँ और स्थूल शरीर

जलकर भस्म हो जाय। फिर वह अपने आराध्य देव परब्रह्म पुरुषोत्तम श्रीभगवान्से प्रार्थना करता है कि ‘हे यज्ञमय विष्णु–सच्चिदानन्द विज्ञानस्वरूप

परमेश्वर! आप अपने निजजन मुझको और मेरे कर्मोंको स्मरण कीजिये। आप स्वभावसे ही मेरा और मेरे द्वारा बने हुए भक्तिरूप कार्योंका स्मरण करेंगे क्योंकि आपने कहा है,

अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमां गतिम्’ मैं अपने भक्तका स्मरण करता हूँ और उसे परम गतिमें पहुँचा देता हूँ, अपनी सेवामें स्वीकार कर लेता हूँ, क्योंकि यही

सर्वश्रेष्ठ गति है।’ इसी अभिप्रायसे भक्त यहाँ दूसरी बार फिर कहता है कि ‘भगवन्! आप मेरा और मेरे कर्मोंका स्मरण कीजिये। अन्तकालमें मैं आपकी

स्मृतिमें आ गया तो फिर निश्चय ही आपकी सेवामें शीघ्र पहुँच जाऊँगा॥१७॥

सम्बन्ध- इस प्रकार अपने आराध्य देव परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्से प्रार्थना करके

अब साधक अपुनरावर्ती अर्चि आदि मार्गके द्वारा परम धाममें जाते समय उस मार्गके अग्निअभिमानी देवतासे प्रार्थना करता है

अग्ने नय सुपथा राये अस्माविश्वानिदेव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम* ॥१८॥

व्याख्या-साधक कहता है-हे अग्निदेवता ! मैं अब अपने परम प्रभु भगवान्की सेवामें पहुँचना और सदाके लिये उन्हींकी सेवामें रहना चाहता हूँ। आप शीघ्र ही

मुझे परम सुन्दर मङ्गलमय उत्तरायणमार्गसे भगवान्के परमधाममें पहुँचा दीजिये। आप मेरे कर्मोंको जानते हैं। मैंने जीवनमें भगवान्की भक्ति की है और

उनकी कृपासे इस समय भी मैं ध्याननेत्रोंसे उनके दिव्य स्वरूपके दर्शन और उनके नामोंका उच्चारण कर रहा हूँ। तथापि आपके ध्यानमें मेरा कोई ऐसा कर्म

शेष हो, जो इस मार्गमें प्रतिबन्धकरूप हो, तो आप कृपा करके उसे नष्ट कर

दीजिये। मैं आपको बार-बार विनयपूर्वक नमस्कार करता हूँ* ॥ १८॥

यजुर्वेदीय ईशावास्योपनिषद् समाप्त !!!

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