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Advaitaarkopanishad

Advaitaarkopanishad yajurvediy upnishad

॥अद्वयतारकोपनिषद्॥

Advaitaarkopanishad yajurvediy upnishad

शुक्लयजुर्वेद से सम्बद्ध इस उपनिषद् में राजयोग का सविस्तार वर्णन है, जिसका सुपरिणाम ब्रह्म प्राप्ति के रूप में विवेचित है। इसमें सर्वप्रथम तारकयोग की व्याख्या करने का निश्चय व्यक्त करते हुए योग के उपाय और उसके फल की विवेचना की गई है।

तदुपरान्त ‘तारक’ का स्वरूप, लक्ष्यत्रय के अनुसंधान की विधि अन्तर्लक्ष्य, बहिर्लक्ष्य एवं मध्यलक्ष्य का लक्षण दो प्रकार के तारक का स्वरूप, तारकयोग की सिद्धि तारकयोग का स्वरूप, शाम्भवी मुद्रा अन्तलक्ष्य के विकल्प, आचार्य का लक्षण एवं अन्त में उपनिषद् की फलश्रुति वर्णित है। इस प्रकार इस उपनिषद् में भवसागर संसार बन्धन से त्राण पाने का अति सुगम उपाय तारक ब्रह्म की साधना का विधान प्रस्तुत किया गया है।

।।शांतिपाठः।।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

ॐ रूप में जिसे अभिव्यक्त किया जाता है, वह परब्रह्म स्वयं में सब प्रकार से पूर्ण है और यह सृष्टि भी स्वयं में पूर्ण है। उस पूर्ण तत्त्व में से इस पूर्ण विश्व की उत्पत्ति हुई है। उस पूर्ण में से यह पूर्ण निकाल लेने पर भी वह शेष भी पूर्ण ही रहता है। आधिदैविक आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक ताप-संताप शान्त हों।

अब अद्वयतारकोपनिषद् की व्याख्या योगियों, संन्यासियों जितेन्द्रियों तथा शम, दम आदि पड्गुणों से पूर्ण साधकों के लिए करते हैं १ ॥

वह नेत्रों को बन्द अथवा अधखुले रखकर अंत: दृष्टि से भृकुटी के ऊर्ध्व स्थल में “मैं चित् स्वरूप हूँ” इस प्रकार का भाव चिन्तन करते हुए सच्चिदानन्द के तेज से युक्त कूट रूप (निश्चल) ब्रह्म का दर्शन करता हुआ ब्रह्ममय ही हो जाता है।। २।॥

जो (तेजोमय परब्रह्म) गर्भ, जन्म, जरा, मरण एवं संहार आदि पापों से तारता है अर्थात् मुक्ति दिला देता है, उसे तारक” ब्रह्म कहा गया है। जीव एवं ईश्वर को मायिक (माया से आवृत) जानते हुए अन्य सभी को नेति-नेति’ कहते हुए छोड़कर जो कुछ शेष बचा रहता है, वही ‘अद्वय ब्रह्म’ कहा गया है॥ ३॥
उस (तेजोमय परब्रह्म) की सिद्धि के लिए तीन लक्ष्यों का अनुसंधान ही करणीय कर्त्तव्य है॥ ४॥

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(उस योगी के) शरीर के बीच में ‘सुषुम्रा’ नामक ब्रह्मनाडी पूर्ण चन्द्रमा की भाँति प्रकाशयुक्त है। वह मूलाधार से शुरू होकर ब्रह्मरन्ध्र तक विद्यमान है। इस नाड़ी के बीच में कोटि-कोटि विद्युत् के सदृश तेजोमयी मृणालसूत्र की तरह सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति प्रख्यात है।

उस शक्ति का मन के द्वारा दर्शन करने मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष-प्राप्ति का अधिकारी बन जाता है। मस्तिष्क के ऊपर विशेष मण्डल में निरन्तर विद्यमान तेज (प्रकाश) को तारक ब्रह्म के योग से जो देखता है, वह सिद्ध हो जाता है। दोनों कानों के छिद्रों को को तर्जनी अँगुलियों के अग्रभाग से बन्द कर लेने पर ‘फूत्कार’ (सर्प के फुफकार की तरह) का शब्द सुनाई पड़ता है। उसमें मन को केन्द्रित करके नेत्रों के मध्य नीली ज्योति को आन्तरिक दृष्टि से देखने पर अत्यधिक आनन्दानुभूति होती है।

ऐसा ही दर्शन हृदय में भी किया जाता है। इस प्रकार के अन्तर्लक्ष्य (अन्तःकरण में देखे जाने योग्य) लक्षणों का अभ्यास मुमुक्षु (मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले साधक) को करना चाहिए॥ ५ ॥

मनुष्य बाह्य सुखोपभोगों की कामना से ही पाप कर्म में प्रवृत्त होता है। पापवृत्ति उक्त कामनाओं के आधार पर ही उभरती है।
अन्तःस्थित कुण्डलिनी की सामर्थ्य का दर्शन मन से होने पर यह विश्वास मन में जम जाता है कि सुखों में श्रेष्ठतम आनन्द का स्त्रोत अपने भीतर ही है,
इसलिए बाह्य उपलब्धियों के निमित्त उभरने वाली पापवृत्ति
उभरती ही नहीं है।

अब बाह्यलक्ष्य के लक्षणों का वर्णन करते हैं। नासिका के अग्रभाग से क्रमश: चार, छः, आठ, दस या बारह अंगुल की दूरी पर नील एवं श्याम रंग जैसा, रक्ताभ वर्ण का आकाश, जो पीत शुक्लवर्ण से युक्त होता है, उस आकाश तत्त्व को जो निरन्तर देखता रहता है, वही वास्तव में सच्चा योगी कहलाता है। उस चलायमान दृष्टि से आकाश में देखने पर वे ज्योति किरणें स्पष्टतया दृष्टिगोचर होती हैं, उन दिव्य किरणों को देखने वाला ही योगी होता है।

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जब दोनों चक्षुओं के कोने में तप्त सुवर्ण की भाँति ज्योति मयूख (किरण) का दर्शन होता है, तो फिर उसकी दृष्टि एकाग्र हो जाती है। मस्तिष्क के ऊर्ध्व में लगभग १२ अंगुल की दूरी पर ज्योति का दर्शन करने वाला योगी अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य चाहे जिस स्थल पर स्थित सिर के ऊर्ध्व में आकाश ज्योति का दर्शन करता है, वहीं ( पूर्ण) योगी कहलाता है॥ ६॥

इसके अनन्तर अब ‘मध्यलक्ष्य’ के लक्षण का वर्णन करते हैं। जो प्रात: काल के समय में चित्रादि वर्ण से युक्त अखण्ड सूर्य का चक्रवत्, अग्रि की ज्वाला की भाँति तथा उनसे विहीन अन्तरिक्ष के समान देखता है। उस आकार के सदृश होकर प्रतिष्ठित रहता है । पुनः उसके दर्शन मात्र से वह गुणरहित ‘आकाश’ रूप हो जाता है।

विस्फुरित (प्रकाशित) होने वाले तारागणों से प्रकाशमान एवं प्रातःकाल के अंधेरे की भाँति ‘परमाकाश’ होता है। ‘महाकाश’ कालाग्रि के समान प्रकाशमान होता है। ‘तत्त्वाकाश’ सर्वोत्कृष्ट प्रकाश एवं प्रखर ज्योति-सम्पन्न होता है। ‘सूर्याकाश’ करोड़ों सूर्यो के सदृश होता है। इस तरह बाह्य एवं अन्तः में प्रतिष्ठित ये ‘पाँच आकाश’ तारक-ब्रह्म के ही लक्ष्य हैं। इस क्रिया विधि द्वारा आकाश का दर्शन करने वाला उसी की भाँति समस्त बन्धनों को काटकर मुक्ति-प्राप्ति का अधिकारी हो जाता है। तारक का लक्ष्य ही अमनस्क फल-प्रदाता कहा गया है। ७ ॥

इस तारक योग की दो विधियाँ बतलाई गई हैं । जिसमें प्रथम पूर्वार्द्ध है और द्वितीय उत्तरार्द्ध। इस सन्दर्भ में यह श्लोक द्रष्टव्य है, यह योग पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दो प्रकार का होता है। पूर्व को ‘तारक’ एवं उत्तर को अमनस्क’ (मन: शून्य होना) कहा गया है । ८ ॥

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अक्ष्युपनिषद् खंड 1-2

हम आँखों के तारक (पुतलियों) से सूर्य एवं चन्द्र का दर्शन ( प्रतिफलन ) करते हैं। जिस तरह से हम आँखों के तारकों से ब्रह्म-ब्रह्माण्ड के सूर्य एवं चन्द्र को देखते हैं, वैसे ही अपने सिर रूपी ब्रह्माण्ड के मध्य में विद्यमान सूर्य एवं चन्द्र का निर्धारण करके उनका हमेशा दर्शन करना चाहिए तथा दोनों को एक ही रूप जान करके मन को एकाग्र कर उनका चिन्तन करना चाहिए,

क्योंकि यदि मन को इस भाव से ओत-प्रोत न किया जायेगा, तो समस्त इन्द्रियाँ विषयों में प्रवृत्त होने लगेंगी। इस कारण योगी- साधक को अपनी अन्त: की दृष्टि से ‘तारक’ का निरन्तर अनुसंधान करते रहना चाहिए।। ९ ॥

इस ‘तारक’ की दो विधियाँ कहीं गई हैं , जिसमें प्रथम मूर्त (मूर्ति) एवं द्वितीय अमूर्त (अमूर्ति) है। जो इन्द्रियों के अंत (अर्थात् मनश्चक्षु) में है , वह मूर्त तारक है तथा जो दोनों भृकुटियों से बाहर है, वह अमूर्त है। आंतरिक पदार्थों के विवेचन में सर्वत्र मन को एकाग्र करके अभ्यास करते रहना चाहिए।

सात्विक दर्शन से युक्त मन द्वारा अपने अंतःकरण में सतत निरीक्षण करने से दोनों तारकों के ऊर्ध्व भाग में सच्चिदानंदमय ज्योतिरूप परब्रह्म का दर्शन होता है। इससे ज्ञात होता है कि ब्रह्म शुक्ल-शुभ्र तेज स्वरूप है। उस ब्रह्म को मनसाहित नेत्रों की अंतःदृष्टि से देखकर जानना चाहिए।

अमूर्त तारक भी इसी विधि से मनः संयुक्त नेत्रों से ज्ञात हो जाता है। रूप दर्शन के संबंध में मन नेत्रों के आश्रित रहता है और बाहर के सदृश अंतः में भी रूप ग्रहण का कार्य इन दोनों के द्वारा ही सम्पन्न होता है। इस कारण मन के सहित नेत्रों के द्वारा ही ‘तारक’ का प्रकाश होता है।।१०।।

जो मनुष्य अपनी आन्तरिक दृष्टि के द्वारा दोनों भृकुटियों के स्थल से थोड़ा सा ऊपरी भाग में स्थित तेजोमय प्रकाश का दर्शन करता है, वही तारक योगी होता है। उसके साथ मन के द्वारा तारक की सुसंयोजना करते हुए प्रयत्नपूर्वक दोनों भौंहों को कुछ थोड़ा सा ऊँचाई पर स्थिर करे।

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यही तारक का पूर्वाद्ध योग कहलाता है। द्वितीय उत्तरार्द्ध भाग को अमूर्त कहा गया है । तालु-मूल के ऊर्ध्व भाग में महान् ज्योति किरण मण्डल स्थित
है। उसी का ध्यान योगियों का ध्येय (लक्ष्य) होता है । उसी से अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।॥ ११॥

योगी-साधक की अन्तः एवं बाह्य लक्ष्य को देखने की सामर्थ्य वाली दृष्टि जब स्थिर हो जाती है, तब वह स्थिति ही शांभवी मुद्रा कहलाती है। इस मुद्रा से ओत-प्रोत ज्ञानी पुरुष का निवास स्थल अत्यंत पवित्र माना जाता है तथा सभी लोक उसकी दृष्टि-मात्र से पवित्र हो जाते हैं। जो भी इस परम योगी की पूजा करता है, वह उसको प्राप्त करते हुए मुक्ति का अधिकारी हो जाता है।।१२।।

अन्तर्लक्ष्य उज्ज्वल शुभ्र ज्योति के रूप में हो जाता है। परम सद्गुरु का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर सहस्र दल कमल में स्थित उज्ज्वल-ज्योति अथवा बुद्धि-गुहा में स्थित रहने वाली ज्योति अथवा फिर वह सोलह कला के अन्तः में विद्यमान तुरीय चैतन्य स्वरूप अन्तर्लक्ष्य होता है। यही दर्शन सदाचार का मूल है॥ १३ ॥

वेदज्ञान से सम्पन्न, आचार्य (श्रेष्ठ आचरण वाला) , विष्णुभक्त, मत्सर आदि विकारों से राहित, योग का ज्ञाता, योग के प्रति निष्ठा रखने वाला, योगात्मा, पवित्रता युक्त, गुरुभक्त, परमात्मा की प्राति में विशेष रूप से संलग्न रहने वाला- इन उपर्युक्त लक्षणों से सम्पन्न पुरुष ही गुरु रूप में अभिहित किया जाता है।।१४-१५।।

गु अक्षर का अर्थ है-अन्धकार एवं रु अक्षर का अर्थ है अन्धकार को रोकने में समर्थ। अन्धकार (अज्ञान) को दूर करने वाला ही गुरु कहलाता है॥ १६ ॥

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गुरु ही पराकाष्ठा है, गुरु ही परम (श्रेष्ठ) धन है । जो श्रेष्ठ उपदेश करता है, वही गुरु से गुरुतर अर्थात् श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम गुरु है, ऐसा जानना चाहिए ॥ १८ ॥

जो मनुष्य एक बार (गुरु या इस उपनिषद् का) उच्चारण ( पाठ) करता है, उसकी संसार सागर से निवृत्ति हो जाती है। समस्त जन्मों के पाप तत्क्षण ही विनष्ट हो जाते हैं । समस्त इच्छाओं-आकांक्षाओं की पूर्ति हो जाती है। सभी पुरुषार्थ सफल -सिद्ध हो जाते हैं। जो ऐसा जानता है, वही उपनिषद् का यथार्थ ज्ञानी है, यही
उपनिषद् है ।।१९।।

ॐ पूर्णमदः……….इति शान्तिः ।।

।।इति अद्वयतारकोपनिषत्समाप्ता ।।

शिवाय नमः

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इतिहासं पुराणं पंचम वेदानां वेदम् ।।62।।