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aitareya upanishad

aitareya upanishad adhyay 1

॥ॐ श्रीपरमात्मने नमः॥

ऐतरेयोपनिषद्

ऋग्वेदीय ऐतरेय आरण्यकमें दूसरे आरण्यकके चौथे, पाँचवें और छठे अध्यायोंको ऐतरेय

उपनिषद्के नामसे कहा गया है। इन तीन अध्यायोंमें ब्रह्मविद्याकी प्रधानता है। इस कारण इन्हींको उपनिषद्’ माना है। शान्तिपाठ

ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता। मनो मे वाचि प्रतिष्ठित माविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान्संदधाम्य॒तं वदिष्यामि।

सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

व्याख्या- इस शान्तिपाठमें सब प्रकारके विघ्नोंकी शान्तिके लिये परमात्मासे प्रार्थना की गयी है। प्रार्थनाका भाव यह है कि ‘हे सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मन्

मेरी वाणी मनमें स्थित हो जाय और मन वाणीमें स्थित हो जाय; अर्थात् मेरे मन-वाणी दोनों एक हो जायें। ऐसा न हो कि मैं वाणीसे एक पाठ पढ़ता रहूँ और मन

दूसरा ही चिन्तन करता रहे या मनमें दूसरा ही भाव रहे और वाणीद्वारा दूसरा प्रकट करूँ। मेरे संकल्प और वचन दोनों विशुद्ध होकर एक हो जायें। हे

प्रकाशस्वरूप परमेश्वर! आप मेरे लिये प्रकट हो जाइये-अपनी योगमायाका पर्दा मेरे सामनेसे हटा लीजिये। (इस प्रकार परमात्मासे प्रार्थना करके अब उपासक

अपने मन और वाणीसे कहता है कि) हे मन और वाणी! तुम दोनों मेरे लिये वेदविषयक ज्ञानकी प्राप्ति करानेवाले बनो-तुम्हारी सहायतासे मैं वेदविषयक

ज्ञान प्राप्त कर सकूँ। मेरा गुरुमुखसे सुना हुआ और अनुभवमें आया हुआ ज्ञान मेरा त्याग न करे अर्थात् वह सर्वदा मुझे स्मरण रहे—मैं उसे कभी न भूलूँ। मेरी

इच्छा है कि अपने अध्ययनद्वारा मैं दिन और रात एक कर दूं। अर्थात् रात-दिन निरन्तर ब्रह्मविद्याका पठन और चिन्तन ही करता रहूँ।

मेरे समयका एक क्षण भी व्यर्थ न बीते। aitareya upanishad adhyay 1

प्रथम अध्याय प्रथम खण्ड,

ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत्किञ्चन मिषत्। स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति॥१॥

व्याख्या– इस मन्त्रमें परमात्माके सृष्टि-रचनाविषयक प्रथम संकल्पका वर्णन है। भाव यह है कि देखने-सुनने और समझनेमें आनेवाले जड़-चेतनमय प्रत्यक्ष

जगत्के इस रूपमें प्रकट होनेसे पहले कारण-अवस्थामें एकमात्र परमात्मा ही थे। उस समय इसमें भिन्न-भिन्न नाम-रूपोंकी अभिव्यक्ति नहीं थी।

उस समय उन परब्रह्म परमात्माके सिवा दूसरा कोई भी चेष्टा करनेवाला नहीं था। सृष्टिके आदिमें उन परम पुरुष परमात्माने

यह विचार किया कि ‘मैं प्राणियोंके कर्म-फल-भोगार्थ भिन्न-भिन्न लोकोंकी रचना करूँ’॥१॥

सइमाँल्लोकानसृजत। अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठान्तरिक्षं मरीचयः पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः॥२॥

व्याख्या- यह विचार करके परब्रह्म परमेश्वरने अम्भ, मरीचि, मर और जल-इन लोकोंकी रचना की। इन शब्दोंको स्पष्ट करनेके लिये आगे श्रुतिमें ही कहा गया है

कि स्वर्गलोकसे ऊपर जो महः, जनः, तपः और सत्यलोक हैं, वे और उनका आधार द्युलोक-इन पाँचों लोकोंको यहाँ ‘अम्भः’ नामसे कहा गया है। उसके

नीचे जो अन्तरिक्षलोक (भुवर्लोक) है, जिसमें सूर्य, चन्द्र और तारागण–ये सब किरणोंवाले लोकविशेष हैं, उसका वर्णन यहाँ मरीचि नामसे किया गया है।

उसके नीचे जो यह पृथ्वीलोक है- जिसको मृत्युलोक भी कहते हैं, वह यहाँ ‘मर’ के नामसे कहा गया है और उसके नीचे अर्थात् पृथ्वीके भीतर जो पातालादि

लोक हैं, वे ‘आपः’ के नामसे कहे गये हैं। तात्पर्य यह कि जगत्में जितने भीलोक त्रिलोकी, चतुर्दश भुवन एवं सप्त लोकोंके

नामसे प्रसिद्ध हैं, उन सब लोकोंकी परमात्माने रचना की॥२॥

स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति सोऽद्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्छयत्॥३॥

व्याख्या- इस प्रकार इन समस्त लोकोंकी रचना करनेके अनन्तर परमेश्वरने फिर विचार किया कि ‘ये सब लोक तो रचे गये। अब इन लोकोंकी रक्षा करनेवाले

लोकपालोंकी रचना भी मुझे अवश्य करनी चाहिये; अन्यथा बिना रक्षकके ये सब लोक सुरक्षित नहीं रह सकेंगे। यह सोचकर उन्होंने जलमेंसे अर्थात् जल आदि

सूक्ष्म महाभूतोंमेंसे हिरण्यमय पुरुषको निकालकर उसको समस्त अङ्ग-उपाङ्गोंसे युक्त करके मूर्तिमान् बनाया। यहाँ ‘पुरुष’ शब्दसे सृष्टिकालमें सबसे

पहले प्रकट किये जानेवाले ब्रह्माका वर्णन किया गया है; क्योंकि ब्रह्मासे ही सब लोकपालोंकी और प्रजाको बढ़ानेवाले प्रजापतियोंकी उत्पत्ति हुई है-इस विषयका

विस्तृत वर्णन शास्त्रोंमें पाया जाता है और ब्रह्माकी उत्पत्ति जलके भीतरसे कमलनालसे हुई, ऐसा भी वर्णन आता है।

अतः यहाँ ‘पुरुष’ शब्दका अर्थ ब्रह्मा मान लेना उचित जान पड़ता है॥३॥

तमभ्यतपत्तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं मुखाद्वार वाचोऽग्निर्नासिके निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाद्वायुरक्षिणी निरभिद्येतामक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुष

आदित्यः कर्णै निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्राद्दिशस्त्वङ् निरभिद्यत त्वचो लोमानि लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा

नाभिर्निरभिद्यत नाभ्याअपानोऽपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत शिश्नाद्रेतो रेतस आपः॥४॥

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व्याख्या- इस प्रकार हिरण्यगर्भ पुरुषको उत्पन्न करके उसके अङ्ग उपाङ्गोंके व्यक्त करनेके उद्देश्यसे जब परमात्माने संकल्परूप तप किया, तब उस तपके

फलस्वरूप हिरण्यगर्भ पुरुषके शरीरमें सर्वप्रथम अण्डेकी भाँति फूटकर मुख-छिद्र निकला। मुखसे वाक्-इन्द्रिय उत्पन्न हुई और वाक् इन्द्रियसे उसका

अधिष्ठातृ-देवता अग्नि उत्पन्न हुआ। फिर नासिकाके दोनों छिद्र हुए, उनमेंसे प्राणवायु प्रकट हुआ और प्राणोंसे वायुदेवता उत्पन्न हुआ। यहाँ प्राणेन्द्रियका

अलग वर्णन नहीं है; अतः प्राण-इन्द्रिय और उसके देवता अश्विनीकुमार भी नासिकासे ही उत्पन्न हुए–यों समझ लेना चाहिये। इसी प्रकार रसना-इन्द्रिय और

उसके देवताका भी अलग वर्णन नहीं है; अतः मुखसे वाक्-इन्द्रियके साथ-साथ रसना-इन्द्रिय और उसके देवताकी भी उत्पत्ति हुई—

यह समझ लेना चाहिये। फिर आँखोंके दोनों छिद्र प्रकट हुए, उनमेंसे नेत्र-इन्द्रिय और नेत्र-इन्द्रियसे उसका देवता सूर्य उत्पन्न हुआ। फिर कानोंके दोनों छिद्र

निकले, उनमेंसे श्रोत्र-इन्द्रिय प्रकट हुई और श्रोत्र-इन्द्रियसे उसके देवता दिशाएँ
उत्पन्न हुईं। उसके बाद त्वचा (चर्म) प्रकट हुई, त्वचासे रोम उत्पन्न हुए, रोमोंसे

ओषधियाँ और वनस्पतियाँ उत्पन्न हुईं। फिर हृदय प्रकट हुआ, हृदयसे मन और मनसे उसका अधिष्ठाता चन्द्रमा उत्पन्न हुआ। फिर नाभि प्रकट हुई, नाभिसे

अपानवायु और अपानवायुसे गुदा-इन्द्रियका अधिष्ठाता मृत्युदेवता उत्पन्न हुआ।
नाभिकी उत्पत्तिके साथ ही गुदा-छिद्र और गुदा-इन्द्रियकी उत्पत्ति भी समझ लेनी

चाहिये। यहाँ अपानवायु मलत्यागमें हेतु होनेके कारण और उसका स्थान नाभि होनेके कारण मुख्यतासे उसीका नाम लिया गया है। परंतु मृत्यु अपानका

अधिष्ठाता नहीं है, वह गुदा-इन्द्रियका अधिष्ठाता है; अतः उपलक्षणसे गुदा-इन्द्रियका वर्णन भी इसके अन्तर्गत मान लेना उचित प्रतीत होता है। फिर लिङ्ग

प्रकट हुआ, उसमेंसे वीर्य और उससे जल उत्पन्न हुआ। यहाँ लिङ्गकी उत्पत्तिसे उपस्थेन्द्रिय और उसका देवता प्रजापति उत्पन्न हुआ—यह बात भी समझ लेनी चाहिये॥४॥

॥प्रथम खण्ड समाप्त॥१॥

द्वितीय खण्ड

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ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन् महत्यर्णवे प्रापतंस्तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत् ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति॥१॥

व्याख्या- परमात्माद्वारा रचे गये वे इन्द्रियोंके अधिष्ठाता अग्नि आदि सब देवता संसाररूपी इस महान् समुद्रमें आ पड़े। अर्थात् हिरण्यगर्भ पुरुषके शरीरसे

उत्पन्न होनेके बाद उनको कोई निर्दिष्ट स्थान नहीं मिला जिससे वे उस समष्टि शरीरमें ही रहे। तब परमात्माने उस देवताओंके समुदायको भूख और पिपासासे

संयुक्त कर दिया। अतः भूख और प्याससे पीड़ित होकर वे अग्नि आदि सब देवता अपनी सृष्टि करनेवाले परमात्मासे बोले-‘भगवन् ! हमारे लिये एक ऐसे स्थानकी

व्यवस्था कीजिये, जिसमें रहकर हमलोग अन्न भक्षण कर सकें अपना-अपना आहार ग्रहण कर सकें’॥१॥

ताभ्यो गामानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति॥२॥

व्याख्या- इस प्रकार उनके प्रार्थना करनेपर सृष्टिकर्ता परमेश्वरने उन सबके रहनेके लिये एक गौका शरीर बनाकर उनको दिखाया। उसे देखकर उन्होंने

कहा-‘भगवन् ! यह हमारे लिये पर्याप्त नहीं है, अर्थात् इस शरीरसे हमारा कार्य अच्छी तरह नहीं चलनेका। इससे श्रेष्ठ किसी दूसरे शरीरकी रचना कीजिये।’ तब

परमात्माने उनके लिये घोड़ेका शरीर रचकर उनको दिखाया। उसे देखकर वे फिर बोले-‘भगवन्! यह भी हमारे लिये यथेष्ट नहीं है, इससे भी हमारा कार्य नहीं

चल सकता। आप कोई तीसरा ही शरीर बनाकर हमें दीजिये’॥२॥

ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति। पुरुषो वाव सुकृतम्। ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति॥३॥

व्याख्या- इस प्रकार जब उन्होंने गाय और घोड़ेके शरीरोंको अपने लिये यथेष्ट नहीं समझा, तब परमात्माने उनके लिये पुरुषकी अर्थात् मनुष्य-शरीरकी रचना

की और वह उनको दिखाया। उसे देखते ही सब देवता बड़े प्रसन्न हुए और बोले-‘यह हमारे लिये बहुत सुन्दर निवास-स्थान बन गया। इसमें हम आरामसे रह

सकेंगे और हमारी सब आवश्यकताएँ भलीभाँति पूर्ण हो सकेंगी।’ सचमुच मनुष्य-शरीर परमात्माकी सुन्दर और श्रेष्ठ रचना है; इसीलिये यह देवदुर्लभ माना

गया है और शास्त्रोंमें जगह-जगह इसकी महिमा गायी गयी है; क्योंकि इसी शरीरमें जीव परमात्माके आज्ञानुसार यथायोग्य साधन करके उन्हें प्राप्त कर

सकता है। जब सब देवताओंने उस शरीरको पसंद किया, तब उनसे परमेश्वरने कहा,

तुमलोग अपने-अपने योग्य स्थान देखकर इस शरीरमें प्रवेश कर जाओ’ ॥३॥

अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाक्षिणी प्राविशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कौँ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं

प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन्॥४॥

व्याख्या- सृष्टिकर्ता परमेश्वरकी आज्ञा पाकर अग्निदेवताने वाक्-इन्द्रियका रूप धारण किया और पुरुषके (मनुष्य-शरीरके) मुखमें प्रविष्ट होकर जिह्वाको अपना

आश्रय बना लिया। यहाँ वरुणदेवता भी रसना-इन्द्रिय बनकर मुखमें प्रविष्ट हो गये, यह बात अधिक समझ लेनी चाहिये। फिर वायुदेवता प्राण होकर नासिकाके

छिद्रोंमें (उसी मार्गसे समस्त शरीरमें) प्रविष्ट हो गये। अश्विनीकुमार भी प्राण-इन्द्रियका रूप धारण करके नासिकामें प्रविष्ट हो गये—

यह बात भी यहाँ उपलक्षणसे समझी जा सकती है; क्योंकि उसका पृथक् वर्णन नहीं है। उसके बाद सूर्यदेवता नेत्र-इन्द्रिय बनकर आँखोंमें प्रविष्ट हो गये।

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दिशाभिमानी देवता श्रोत्रेन्द्रिय बनकर दोनों कानोंमें प्रविष्ट हो गये। ओषधि और वनस्पतियोंके अभिमानी देवता रोम बनकर चमड़ेमें प्रविष्ट हो गये तथा चन्द्रमा

मनका रूप धारण करके हृदयमें प्रविष्ट हो गये। मृत्युदेवता अपान (और पायु-इन्द्रिय) का रूप धारण करके नाभि में प्रविष्ट हो गये। जलके अधिष्ठातृ-देवता

वीर्य बनकर लिङ्गमें प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार सब-के-सब देवता

इन्द्रियोंके रूपमें अपने अपने उपयुक्त स्थानोंमें प्रविष्ट होकर स्थित हो गये॥४॥

मशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति। ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति।

तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः॥५॥

व्याख्या- तब भूख और प्यास-ये दोनों परमेश्वरसे कहने लगीं ‘भगवन्! इन सबके लिये तो आपने रहनेके स्थान निश्चित कर दिये, अब हमारे लिये भी किसी स्थान-

विशेषकी व्यवस्था करके उसमें हमें स्थापित कीजिये।’ उनके यों कहनेपर उनसे सृष्टिके रचयिता परमेश्वरने कहा-तुम दोनोंके लिये पृथक् स्थानकी आवश्यकता

नहीं है। तुम दोनोंको मैं इन देवताओंके स्थानों में भाग दिये देता हूँ। इन देवताओंके आहारमें मैं तुम दोनोंको भागीदार बना देता हूँ। सृष्टिके आदिमें ही

परमेश्वरने ऐसा नियम बना दिया था; इसीलिये जब जिस किसी भी देवताको देनेके लिये इन्द्रियोंद्वारा विषय भोग ग्रहण किये जाते हैं, उस देवताके भागमें ये

क्षुधा और पिपासा भी हिस्सेदार होती ही हैं अर्थात् उस इन्द्रियके अभिमानी देवताकी तृप्तिके साथ क्षुधा-पिपासाको भी शान्ति मिलती है॥५॥

॥द्वितीय खण्ड समाप्त॥२॥
खण्ड ३]
ऐतरेयोपनिषद्

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तृतीय खण्ड स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति॥१॥

व्याख्या- इन सबकी रचना हो जानेपर परमेश्वरने फिर विचार किया ‘ये सब लोक और लोकपाल तो रचे गये—इनकी रचनाका कार्य तो पूरा हो गया। अब इनके

निर्वाहके लिये अन्न भी होना चाहिये-भोग्य पदार्थों की भी व्यवस्था होनी चाहिये; क्योंकि इनके साथ भूख-प्यास भी लगा दी गयी है।

अतः उस अन्नकी भी रचना करूँ॥१॥

सोऽपोऽभ्यतपत्ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत। या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत्॥२॥

व्याख्या- उपर्युक्त प्रकारसे विचार करके परमेश्वरने जलको अर्थात् पाँचों सूक्ष्म महाभूतोंको तपाया-अपने संकल्पद्वारा उनमें क्रिया उत्पन्न की। परमात्माके

संकल्पद्वारा संचालित हुए उन सूक्ष्म महाभूतोंसे मूर्ति प्रकट हुई अर्थात् उनका स्थूल रूप उत्पन्न हुआ। वह जो मूर्ति अर्थात् उन पाँच महाभूतोंका स्थूलरूप

उत्पन्न हुआ; वही अन्न-देवताओंके लिये भोग्य है॥२॥

तदेनत् सृष्टं पराडत्यजिघांसत्तद्वाचाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोद्वाचा ग्रहीतुम्। यद्धैनद्वाचाग्रहैष्यदभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत्॥३॥

व्याख्या- लोकों और लोकपालोंकी आहारसम्बन्धी आवश्यकताको पूर्ण करनेके लिये उत्पन्न किया हुआ वह अन्न यों समझकर कि यह मुझे खानेवाला तो मेरा

विनाशक ही है, उससे छुटकारा पानेके लिये मुख फेरकर भागने लगा। तब उस मनुष्यके रूपमें उत्पन्न हुए जीवात्माने उस अन्नको वाणीद्वारा पकड़ना चाहा;

परंतु वह उसे वाणीद्वारा पकड़ नहीं सका। यदि उस पुरुषने वाणीद्वारा अन्नको ग्रहण कर लिया होता तो अब भी मनुष्य अन्नका वाणीद्वारा उच्चारण करके ही

तृप्त हो जाते-अन्नका नाम लेनेमात्रसे उनका पेट भर जाता; परंतु ऐसा नहीं होता॥३॥

तत्प्राणेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुं यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत्॥४॥

व्याख्या- तब उस पुरुषने अन्नको प्राणके द्वारा अर्थात् घ्राण-इन्द्रियके द्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको घ्राण-इन्द्रियके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि

वह इस अन्नको घ्राण-इन्द्रियद्वारा पकड़ सकता तो अब भी लोग अन्नको नाकसे सूंघकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसा नहीं देखा जाता॥४॥

तच्चक्षुषाजिघृक्षत्तन्नाशनोच्चक्षुषा ग्रहीतुं स यद्धैनच्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत्॥५॥

व्याख्या- फिर उस पुरुषने अन्नको आँखोंसे पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको आँखोंके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इस अन्नको आँखोंसे ग्रहण कर

सकता तो अवश्य ही आजकल भी लोग अन्नको केवल देखकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात नहीं देखी जाती ॥५॥

तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत्॥६॥

व्याख्या- फिर उस पुरुषने अन्नको कानोंद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको कानोंद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको कानोंसे पकड़ सकता तो

अवश्य ही अब भी मनुष्य केवल अन्नका नाम सुनकर ही तृप्त हो जाते; परंतु यह देखने में नहीं आता॥६॥

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तत्त्वचाजिघृक्षत्तन्नाशनोत्त्वचा ग्रहीतुं स यद्धैनत्त्वचाग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत्॥७॥

व्याख्या- तब उस पुरुषने अन्नको चमड़ीद्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको चमड़ीद्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको चमड़ीद्वारा पकड़ पाता तो

अवश्य ही आजकल भी मनुष्य अन्नको छूकर ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात नहीं है॥७॥

तन्मनसाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुं स यद्धैनन्मनसाग्रहैष्यद्ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत्॥८॥

व्याख्या- तब उस पुरुषने अन्नको मनसे पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको मनके द्वारा भी नहीं पकड़ सका। यदि वह इसको मनसे पकड़ पाता तो अवश्य ही

आज भी मनुष्य अन्नका चिन्तन करके ही तृप्त हो जाते; परंतु ऐसी बात देखनेमें नहीं आती॥८॥

खण्ड ३]

ऐतरेयोपनिषद् तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुं स यद्धै नच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत्॥९॥

व्याख्या- फिर उस पुरुषने अन्नको उपस्थ (लिङ्ग) द्वारा पकड़ना चाहा; परंतु वह उसको उपस्थके द्वारा नहीं पकड़ सका। यदि वह उसको उपस्थद्वारा पकड़

पाता तो अवश्य ही अब भी मनुष्य अन्नका त्याग करके ही तृप्त हो जाते; परंतु यह देखने में नहीं आता॥९॥

तदपानेनाजिघृक्षत्तदावयत् सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद्वायुरन्नायुर्वा एष यद्वायुः॥१०॥

व्याख्या- अन्तमें उस पुरुषने अन्नको मुखके द्वारसे अपानवायुद्वारा ग्रहण करना चाहा, अर्थात् अपानवायुद्वारा मुखसे शरीरमें प्रवेश करानेकी चेष्टा की; तब वह

अन्नको अपने शरीरमें ले जा सका। वह अपानवायु जो बाहरसे शरीरके भीतर प्रश्वासके रूपमें जाता है, यही अन्नका ग्रह-उसको पकड़नेवाला अर्थात् भीतर ले

जानेवाला है। प्राणवायुके सम्बन्धमें जो यह प्रसिद्धि है कि यही अन्नके द्वारा मनुष्यके जीवनकी रक्षा करनेवाला होनेसे साक्षात् आयु है, वह इस अपानवायुको

लेकर ही है, जो प्राण आदि पाँच भेदोंमें विभक्त मुख्य प्राणका ही एक अंश है; इससे यह सिद्ध हुआ कि प्राण ही मनुष्यका जीवन है॥१०॥

स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति। स ईक्षत यदि वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि

श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति॥११॥

व्याख्या- इस प्रकार जब लोक और लोकपालोंकी रचना हो गयी, उन सबके लिये आहार भी उत्पन्न हो गया तथा मनुष्य-शरीरधारी पुरुषने उस आहारको

ग्रहण करना भी सीख लिया, तब उस सर्वस्रष्टा परमात्माने फिर विचार किया-‘यह मनुष्यरूप पुरुष मेरे बिना कैसे रहेगा? यदि इस जीवात्माके साथ मेरा सहयोग

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नहीं रहेगा तो यह अकेला किस प्रकार टिक सकेगा?* साथ ही यह भी विचार किया कि ‘यदि मेरे सहयोगके बिना इस पुरुषने वाणीद्वारा इसीलिये तो भगवान्ने

गीतामें कहा है कि समस्त भूतोंका जो कारण है, वह मैं हूँ। ऐसा कोई भी चराचर प्राणी नहीं है, जो मुझसे रहित हो (१०। ३९)। बोलनेकी क्रिया कर ली, घ्राण-

इन्द्रियसे सूंघनेका काम कर लिया, प्राणोंसे वायुको भीतर ले जाने और बाहर छोड़नेकी क्रिया कर ली, नेत्रोंद्वारा देख लिया, श्रवणेन्द्रियद्वारा सुन लिया, त्वक्-

इन्द्रियद्वारा स्पर्श कर लिया, मनके द्वारा मनन कर लिया, अपानद्वारा अन्न निगल लिया और यदि जननेन्द्रियद्वारा मूत्र और वीर्यका त्याग करनेकी क्रिया सम्पन्न कर

ली तो फिर मेरा क्या उपयोग रह गया? भाव यह कि मेरे बिना इन सब इन्द्रियोंद्वारा कार्य सम्पन्न कर लेना इसके लिये असम्भव है!’ यह सोचकर

परमात्माने विचार किया कि मैं इस मनुष्य शरीरमें पैर और मस्तक-इन दोमेंसे किस मार्गसे प्रविष्ट होऊँ॥११॥

स एतमेव सीमानं विदातया द्वारा प्रापद्यत। सैषा वितिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनम्। तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्नाः; अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति॥१२॥

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व्याख्या– परमात्मा इस मनुष्य-शरीरकी सीमा (मूर्धा) को अर्थात् ब्रह्मरन्ध्रको चीरकर (उसमें छेद करके) इसके द्वारा उस सजीव मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट हो

गये। वह यह द्वार विदृति (विदीर्ण किया हुआ द्वार) नामसे प्रसिद्ध है। वही यह विदृति नामका द्वार (ब्रह्मरन्ध्र) आनन्द देनेवाला अर्थात् आनन्दस्वरूप

परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है। परमेश्वरकी उपलब्धिके तीन स्थान हैं और स्वप्न भी तीन हैं। एक तो यह हृदयाकाश उनकी उपलब्धिका स्थान है। दूसरा

विशुद्ध आकाशरूप परमधाम है-जिसको सत्यलोक, गोलोक, ब्रह्मलोक, साकेतलोक, कैलास आदि अनेक नामोंसे पुकारा जाता है। तीसरा यह सम्पूर्ण

ब्रह्माण्ड है तथा इस जगत्की जो स्थूल, सूक्ष्म और
कारणरूप तीन अवस्थाएँ हैं, वे ही इसके तीन स्वप्न हैं॥१२॥

स जातो भूतान्यभिव्यख्यत् किमिहान्यं वावदिषदिति। स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत्। इदमदर्शमिती३॥१३॥

व्याख्या- मनुष्यरूपमें उत्पन्न हुए उस पुरुषने इस भौतिक जगत्की विचित्र रचनाको बड़े आश्चर्यपूर्वक चारों ओरसे देखा और मन-ही-मन इस प्रकार कहा-

इस विचित्र जगत्की रचना करनेवाला यहाँ दूसरा कौन है? क्योंकि यह मेरी की हुई रचना तो है नहीं और कार्य होनेके कारण इसका कोई न-कोई कर्ता अवश्य

होना चाहिये। इस प्रकार विचार करनेपर उस साधकने अपने हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान पुरुषको ही इस सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त परब्रह्मके

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रूपमें प्रत्यक्ष किया। तब वह आनन्दमें भरकर मन-ही-मन कहने लगा-‘अहो! बड़े ही सौभाग्यकी बात है कि मैंने परब्रह्म परमात्माको देख लिया-साक्षात् कर

लिया। इससे यह भाव प्रकट किया गया है कि इस जगत्की विचित्र रचनाको देखकर इसके कर्ता-धर्ता परमात्माकी सत्तामें विश्वास करके यदि मनुष्य उन्हें

जानने और पानेको उत्सुक हो, उन्हींपर निर्भर होकर चेष्टा करे तो अवश्य ही उन्हें जान सकता है। परमात्माको जानने और पानेका काम इस मनुष्य-शरीरमें

ही हो सकता है, दूसरे शरीरमें नहीं। अतः मनुष्यको अपने जीवनके अमूल्य समयका सदुपयोग करना चाहिये, उसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिये। इस अध्यायमें

मानो परमात्माकी महिमाका और मनुष्य-शरीरके महत्त्वका दिग्दर्शन करानेके लिये ही सृष्टि-रचनाका वर्णन किया गया है॥१३॥

तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण। परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः॥१४॥

व्याख्या– परब्रह्म परमात्माको उस मनुष्य-शरीरमें उत्पन्न हुए पुरुषने पूर्वोक्त प्रकारसे प्रत्यक्ष कर लिया, इसी कारण परमात्माका नाम ‘इदन्द्र’ है। अर्थात् ‘इदम्

द्रः इसको मैंने देख लिया’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार उसका ‘इदन्द्र’ नाम है। इस प्रकार यद्यपि उस परमात्माका नाम ‘इदन्द्र’ ही है, फिर भी लोग इसे परोक्षभावसे

इन्द्र कहकर पुकारते हैं; क्योंकि देवता लोग मानो छिपाकर ही कुछ कहना पसंद करते हैं। ‘परोक्षप्रिया इव हि देवा,

इस अन्तिम वाक्यको दुबारा कहकर इस खण्डकी समाप्ति सूचित की गयी है॥१४॥

॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥३॥

॥प्रथम अध्याय समाप्त॥१॥

aitareya upanishad adhyay 1

ईशावास्योपनिषद ishavasya

Categories
aitareya Adhyay 2-3

aitareya upanishad Adhyay 2-3

द्वितीय अध्याय

[अध्याय २
प्रथम खण्ड
खण्ड १
ऐतरेयोपनिषद्

सम्बन्ध- प्रथम अध्याय में सृष्टि की उत्पत्ति का क्रम और मनुष्य शरीर का महत्त्व बताया गया और यह बात भी संकेत से कही गयी कि जीवात्मा इस

शरीरमें परमात्माको जानकर कृतकृत्य हो सकता है। अब इस शरीरकी अनित्यता दिखाकर वैराग्य उत्पन्न करनेके लिये इस

अध्यायमें मनुष्य-शरीरकी उत्पत्तिका वर्णन किया जाता है,

पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति।

यदेतद्रेतस्तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनज्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म॥१॥

व्याख्या- यह संसारी जीव पहले-पहल पुरुष-शरीरमें (पिताके शरीरमें) वीर्यरूपसे गर्भ बनता है-प्रकट होता है। पुरुषके शरीरमें जो यह वीर्य है, वह

सम्पूर्ण अङ्गोंमेंसे निकलकर उत्पन्न हुआ तेज (सार) है। यह पिता अपने स्वरूपभूत उस वीर्यरूप तेजको पहले तो अपने शरीरमें ही धारण-पोषण करता

है-ब्रह्मचर्यके द्वारा बढ़ाता एवं पुष्ट करता है, फिर जब यह उसको स्त्रीके गर्भाशयमें सिञ्चन (स्थापित) करता है, तब इसे गर्भरूपमें उत्पन्न करता है। वह

माताके शरीरमें प्रवेश करना ही इसका पहला जन्म है॥१॥

तत्स्त्रिया आत्मभूतं गच्छति। यथा स्वमङ्गं तथा। तस्मादेनां न हिनस्ति। सास्यैतमात्मानमत्रगतं भावयति॥२॥

aitareya upanishad Adhyay 2-3

व्याख्या- उस स्त्री (माता) के शरीरमें आया हुआ वह गर्भ-पिताके द्वारा स्थापित किया हुआ तेज उस स्त्रीके आत्मभावको प्राप्त हो जाता है अर्थात् जैसे उसके

दूसरे अङ्ग हैं, उसी प्रकार वह गर्भ भी उसके शरीरका एक अङ्ग-सा ही हो जाता है। यही कारण है कि वह गर्भ उस स्त्रीके उदरमें रहता हुआ भी गर्भिणी स्त्रीको

पीड़ा नहीं पहुँचाता-उसे भाररूप नहीं प्रतीत होता। वह स्त्री अपने शरीरमें आये हुए अपने पतिके आत्मारूप इस गर्भको अपने अङ्गोंकी भाँति ही भोजनके रससे

पुष्ट करती है और अन्य सब प्रकारके आवश्यक नियमोंका पालन करके उसकी भलीभाँति रक्षा करती है॥२॥


व्याख्या- अपने पतिके आत्मस्वरूप उस गर्भकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाली गर्भिणी स्त्री घरके लोगोंद्वारा और विशेषतः उसके पतिद्वारा पालन पोषण

करनेयोग्य होती है। अर्थात् घरके लोगोंका और पतिका यह परम आवश्यक कर्तव्य है कि वे सब मिलकर उसके खान-पान और रहन सहनकी सुव्यवस्था

करके सब प्रकारसे उसकी सँभाल रखें। उस गर्भको पहले अर्थात् प्रसव होनेतक तो स्त्री (माता) अपने शरीरमें धारण करती है; फिर जन्म लेनेके बाद-जन्म लेते ही

उसका पिता जातकर्म आदि संस्कारोंसे और नाना प्रकारके उपचारोंसे उस कुमारको अभ्युदयशील बनाता है और जन्मसे लेकर जबतक वह सर्वथा योग्य

नहीं बन जाता, तबतक हर प्रकारसे उसका पालन-पोषण करता है नाना प्रकारकी विद्या और शिल्पादिका अध्ययन कराके उसे सब प्रकारसे उन्नत

बनाता है। वह पिता जन्मके बाद उस बालकको उपयुक्त बना देनेके पहले-पहले जो उसकी रक्षा करता है, उसे सब प्रकारसे योग्य बनाता है, वह मानो इन

लोकोंको अर्थात् मनुष्योंकी परम्पराको बढ़ानेके द्वारा अपनी ही रक्षा करता है; क्योंकि इसी प्रकार एक से-एक उत्पन्न होकर ये सब मनुष्य विस्तारको प्राप्त हुए

हैं। यह जो इस जीवका गर्भसे बाहर आकर बालकरूपमें उत्पन्न होना है, वह इसका दूसरा जन्म है। इस वर्णनसे पिता और पुत्र दोनोंको अपने-अपने

कर्तव्यकी शिक्षा दी गयी है। पुत्रको तो यह समझना चाहिये कि
उसपर अपने माता-पिताका बड़ा भारी उपकार है; अतः वह उनकी जितनी सेवा कर सके, थोड़ी है और पिताको इस प्रकारका अभिमान नहीं करना चाहिये कि

मैंने इसका उपकार किया है, वरं यह समझना चाहिये कि मैंने अपनी ही वृद्धि करके अपने कर्तव्यका पालन किया है॥३॥

सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः प्रतिधीयते। अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति। स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म॥४॥

व्याख्या- पूर्वोक्त प्रकारसे इस पिताका ही आत्मस्वरूप पुत्र जब कार्य करनेयोग्य हो जाता है, तब वह पिता उसको अपना प्रतिनिधि बना देता है-अग्निहोत्र, देवपूजा

और अतिथि-सेवा आदि वैदिक और लौकिक जितने भी शुभकर्म हैं, उन सबका भार पुत्रको सौंप देता है। गृहस्थका पूरा दायित्व पुत्रपर छोड़कर स्वयं कृतकृत्य

हो जाता है अर्थात् अपनेको पितृ-ऋणसे मुक्त मानता है। उसके बाद इस शरीरकी आयु पूर्ण होनेपर जब वह (पिता) इसे छोड़कर यहाँसे विदा हो जाता है,

तब यहाँसे जाकर दूसरी जगह कर्मानुसार जहाँ जिस योनिमें जन्म लेता है, वह इसका तीसरा जन्म है। इसी तरह यह जन्म-जन्मान्तरकी परम्परा चलती रहती

है। जबतक जन्म-मृत्युके महान् कष्टका विचार करके इससे छुटकारा पानेके लिये जीवात्मा मनुष्य-शरीरमें चेष्टा नहीं करता, तबतक यह परम्परा नहीं टूटती।

अतः इसके लिये मनुष्यको अवश्य चेष्टा करनी चाहिये। यही इस प्रकरणका उद्देश्य प्रतीत होता है॥४॥

सम्बन्ध- इस प्रकार बार-बार जन्म लेना और मरना एक भयानक यन्त्रणा है; और जबतक यह जीव इस रहस्यको समझकर इस शरीररूप पिंजरेको काटकर

इससे सर्वथा अलग न हो जायगा तबतक इसका इस जन्म-मृत्युरूप यन्त्रणासे छुटकारा नहीं होगा—

यह भाव अगले दो मन्त्रोंमें वामदेव ऋषिके दृष्टान्तसे समझाया जाता है

तदुक्तमृषिणा गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा। शतं मा पुर आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति। गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच॥५॥

व्याख्या- उपर्युक्त चार मन्त्रों में कही हुई बातका ही रहस्य यहाँ ऋषिद्वारा बताया गया है। गर्भमें रहते हुए ही अर्थात् गर्भके बाहर आनेसे पहले ही वामदेव

ऋषिको यथार्थ ज्ञान हो गया था, इसलिये उन्होंने माताके उदरमें ही कहा था,

अहो कितने आश्चर्य और आनन्दकी बात है कि गर्भ में रहते रहते ही मैंने इन

अन्तःकरण और इन्द्रियरूप देवताओंके अनेक जन्मोंका रहस्य भलीभाँति जान लिया। अर्थात् मैं इस बातको जान गया कि ये जन्म आदि वास्तवमें इन

अन्त:करण और इन्द्रियोंके ही होते हैं, आत्माके नहीं। इस रहस्यको समझनेसे पहले मुझे सैकड़ों लोहेके समान कठोर शरीररूपी पिंजरोंने अवरुद्ध कर रखा

था। उनमें मेरी ऐसी दृढ़ अहंता हो गयी थी कि उससे छूटना मेरे लिये कठिन हो रहा था। अब मैं बाज पक्षीकी भाँति ज्ञानरूप बलके वेगसे उन सबको तोड़कर

उनसे अलग हो गया हूँ। उन शरीररूप पिंजरोंसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं रहा,

मैं सदाके लिये उन शरीरोंकी अहंतासे मुक्त हो गया हूँ’॥५॥

स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान्कामानाप्त्वामृतः समभवत् समभवत्॥६॥

aitareya upanishad Adhyay 2-3

व्याख्या- इस प्रकार जन्म-जन्मान्तरके तत्त्वको जाननेवाला अर्थात् जबतक यह जीव इन शरीरोंके साथ एक हुआ रहता है, शरीरको ही अपना स्वरूप माने

रहता है, तबतक इसका जन्म-मृत्युसे छुटकारा नहीं होता, इसको जब बार-बार नाना योनियोंमें जन्म लेकर नाना प्रकारके कष्ट भोगने पड़ते हैं इस रहस्यको

समझनेवाला वह ज्ञानी वामदेव ऋषि गर्भसे बाहर आकर अन्तमें शरीरका नाश होनेपर संसारसे ऊपर उठ गया तथा ऊर्ध्वगतिके द्वारा भगवान्के परमधाममें

पहुँचकर वहाँ समस्त कामनाओंको पाकर अर्थात् सर्वथा आप्तकाम होकर अमृत हो गया! अमृत हो गया। जन्म-मृत्युके चक्रसे सदाके लिये छूट गया।

समभवत्’ पदको दुहराकर यहाँ अध्यायकी समाप्तिको सूचित किया गया है॥६॥


॥प्रथम खण्ड समाप्त॥१॥
॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥२॥

aitareya upanishad Adhyay 2-3


तृतीय अध्याय
[अध्याय ३
प्रथम खण्ड

कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे। कतरः स आत्मा, येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु

चास्वादु च विजानाति॥१॥

व्याख्या- इस उपनिषद्के पहले और दूसरे अध्यायोंमें दो आत्माओंका वर्णन आया है-एक तो वह आत्मा (परमात्मा), जिसने इस सृष्टिकी रचना की और सजीव

पुरुषको प्रकट करके उसका सहयोग देनेके लिये स्वयं उनमें प्रविष्ट हुआ; दूसरा वह आत्मा (जीवात्मा), जिसको सजीव पुरुषरूपमें परमात्माने प्रकट किया था

और जिसके जन्म-जन्मान्तरकी परम्पराका वर्णन दूसरे अध्यायमें गर्भमें आनेसे लेकर मरणपर्यन्त किया गया है। इनमेंसे उपास्य देव कौन है, वह कैसा है,

उसकी क्या पहचान है-इन बातोंका निर्णय करनेके लिये यह तीसरा अध्याय कहा गया है। केनोपनिषद्के आरम्भकी इसके साथ बहुत अंशोंमें समानता है।

मन्त्रका तात्पर्य यह है कि उस उपास्यदेव परमात्माके तत्त्वको जाननेकी इच्छावाले कुछ मनुष्य आपसमें विचार करने लगे जिसकी हमलोग उपासना

करते हैं अर्थात् जिसकी उपासना करके हमें उसे प्राप्त करना चाहिये, वह आत्मा कौन है? दूसरे शब्दोंमें जिसके सहयोगसे मनुष्य नेत्रोंके द्वारा समस्त दृश्य देखता

है, जिससे कानोंद्वारा शब्द सुनता है, जिससे घ्राणेन्द्रियके द्वारा नाना प्रकारकी गन्ध सूंघता है, जिससे वाणीद्वारा वचन बोलता है; जिससे रसनाद्वारा स्वादयुक्त

और स्वादहीन वस्तुको अलग-अलग पहचान लेता है, वह पहले और दूसरे अध्यायमें वर्णित दो आत्माओंमेंसे कौन है?॥१॥

यदेतद्धदयं मनश्चैतत। संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिकृतिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥२॥

व्याख्या- इस प्रकार विचार उपस्थित करके उन्होंने सोचा कि जो यह हृदय

अर्थात् अन्तःकरण है, यही पहले बताया हुआ मन है, इस मनकी जो यह सम्यक्

प्रकारसे जाननेकी शक्ति देखनेमें आती है-अर्थात् जो दूसरोंपर आज्ञाद्वारा शासन करनेकी शक्ति, पदार्थोंका अलग-अलग विवेचन करके जाननेकी शक्ति, देखे-

सुने हुए पदार्थों को तत्काल समझ लेनेकी शक्ति अनुभवको धारण करनेकी

शक्ति, देखनेकी शक्ति, धैर्य अर्थात् विचलित न होनेकी शक्ति, बुद्धि अर्थात्

निश्चय करनेकी शक्ति, मनन करनेकी शक्ति, वेग अर्थात् क्षणभरमें कहीं-से-कहीं चले जानेकी शक्ति, स्मरण-शक्ति, संकल्प शक्ति, मनोरथ-शक्ति, प्राण-शक्ति,

कामना-शक्ति और स्त्री-सहवास आदिकी अभिलाषा-इस प्रकार जो ये शक्तियाँ हैं, वे सब-की-सब उस स्वच्छ ज्ञानस्वरूप परमात्माके नाम हैं अर्थात् उसकी

सत्ताका बोध करानेवाले लक्षण हैं; इन सबको देखकर इन सबके रचयिता, संचालक और रक्षककी सर्वव्यापिनी सत्ताका ज्ञान होता है॥२॥

एष ब्रह्मेष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्च महाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतीषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि

चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं

तत्प्रज्ञानेत्रम्। प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥३॥

aitareya upanishad Adhyay 2-3

व्याख्या- इस प्रकार विचार करके उन्होंने निश्चय किया कि सबको उत्पन्न करके

सब प्रकारकी शक्ति प्रदान करनेवाले और उनकी रक्षा करनेवाले स्वच्छ

ज्ञानस्वरूप परमात्मा ही उपास्यदेव हैं। ये ही ब्रह्मा हैं, ये ही पहले अध्यायमें

वर्णित इन्द्र हैं। ये ही सबकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले समस्त प्रजाओंके

स्वामी प्रजापति हैं। ये सब इन्द्रादि देवता, ये पाँचों महाभूत-जो पृथ्वी, वायु,

आकाश, जल और तेजके रूपमें प्रकट हैं तथा ये छोटे-छोटे मिले हुए-से

बीजरूपमें स्थित समस्त प्राणी तथा उनसे भिन्न दूसरे भी- अर्थात् अंडेसे उत्पन्न

होनेवाले, जेरसे उत्पन्न होनेवाले, पसीनेसे अर्थात् शरीरके मैलसे उत्पन्न होनेवाले

और जमीन फोड़कर उत्पन्न होनेवाले तथा घोड़े, गाय, हाथी, मनुष्य ये सब

मिलकर जो कुछ यह जगत् है; जो भी कोई पंखोंवाले तथा चलने फिरनेवाले और नहीं चलनेवाले जीवोंके समुदाय हैं, वे सब-के-सब प्राणी प्रज्ञानस्वरूप परमात्मासे

शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्य में समर्थ होते हैं और उन प्रज्ञानस्वरूप

परमात्मामें ही स्थित हैं। यह समस्त ब्रह्माण्ड प्रज्ञानस्वरूप परमात्माकी शक्तिसे

ही ज्ञान-शक्तियुक्त है। इसकी स्थितिके आधार प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा ही हैं।

अतः जिनको पहले इन्द्र और प्रजापतिके नामसे कहा गया है, जो सबकी रचना

और रक्षा करनेवाले तथा सबको सब प्रकारकी शक्ति देनेवाले प्रज्ञानस्वरूप परमात्मा हैं, वे ही हमारे उपास्यदेव ब्रह्म हैं—यह निश्चय हुआ॥३॥


स एतेन प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन्स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वामृतः समभवत्समभवत्॥४॥

व्याख्या- जिसने इस प्रकार प्रज्ञानस्वरूप परमेश्वरको जान लिया, वह इस लोकसे ऊपर उठकर अर्थात् शरीरका त्याग करके उस परमानन्दमय परम

धाममें, जिसके स्वरूपका पूर्वमन्त्रमें वर्णन किया गया है, इस प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्मके साथ सम्पूर्ण दिव्य अलौकिक भोगरूप परम आनन्दको प्राप्त होकर

अमर हो गया अर्थात् सदाके लिये जन्म-मृत्युसे छूट गया।

समभवत्हो गया इस वाक्यकी पुनरुक्ति उपनिषद्की समाप्ति सूचित करनेके लिये की गयी है॥४॥

ishavasya upanishad

॥प्रथम खण्ड समाप्त ॥१॥
॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥३॥
ऋग्वेदीय ऐतरेयोपनिषद् समाप्त aitareya upanishad Adhyay 2-3