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vedant darshan 1-2 sutra 16-32

vedant darshan adhyay 1 paad 2 sutra 16,32

सम्बन्धयदि इस प्रकरणमें नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाले प्रतिविम्ब, नेत्रेन्द्रियके अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा- इनमेंसे किसी एकको नेत्रान्तर्वती पुरुष मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते हैं—

अनवस्थितेरसंभवाच्च नेतरः ।।१२।१७ ॥

अनवस्थिते: अन्य किसीकी नेत्रमें निरन्तर स्थिति न होनेके कारण; च= तथा; असंभवात् ( श्रुतिमें बताये हुए अमृतत्व आदि गुग ) दूसरे किसीमे सम्भव न होनेसे; इतर:-ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई भी; न नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं है।

व्याख्या- छाया-पुरुष या प्रतिविम्ब नेत्रेन्द्रियमें सदा नहीं रहता; जब कोई पुरुष सामने आता है, तब उसका प्रतिविम्ब नेत्रमे दिखायी देता है और उसके हटते ही अदृश्य हो जाता है । इन्द्रियानुग्राहक देवताकी स्थिति भी नेत्रमे सदा नहीं रहती, जिस समय वह इन्द्रिय अपने विषयको ग्रहण करती है, उसी समय वह उसके सहायक रूपसे उसमें स्थित माना जाता है ।

इसी प्रकार जीवात्मा भी मनके द्वारा एक समय किसी एक इन्द्रियके विषयको ग्रहण करता है तो दूसरे समय दूसरी ही इन्द्रियके विषयको; और सुषुप्तिमे तो किसीके भी विषयको नहीं ग्रहण करता । अतः निरन्तर एक-सी स्थिति आँखमे न रहनेके कारण इन तीनोमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष
नहीं कहा जा सकता । इसके सिवा, नेत्रमे दिखायी देनेवाले पुरुषके जो अमृतत्व और निर्भयता आदि गुण श्रुतिन बताये है, वे ब्रह्मके अतिरिक्त और किसीमे’ सम्भव नहीं है। इस कारण भी उपर्युक्त तीनोंमेसे किसीको नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष नहीं माना जा सकता ।

इसलिये परब्रह्म परमेश्वरको ही यहाँ नेत्रमे दिखायी देनेवाला पुरुष कहा
गया है; यही मानना ठीक है।

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽस्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते। एतदुबै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मास पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः।

किन्तु जो तपस्याके साथ ब्रह्मचर्यपूर्वक और श्रद्धासे युक्त होकर अध्यात्मविद्याके द्वारा परमात्माकी खोज करके जीवन सार्थक कर लेते हैं,
वे उत्तरायण-मार्गसे सूर्यलोकको जीत लेते (प्राप्त कर लेते) हैं। यही प्राणोका केन्द्र है । यह अमृत और निर्मय पद है। यह परम गति है। इससे पुनः लौटकर नहीं आते । इस प्रकार यह निरोध– पुनरावृत्ति-निवारक है।

सम्बन्ध- पूर्वप्रकरणमें यह वात बतायी गयी है कि श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मके लिये भिन्न-भिन्न स्थान आदिका निर्देश किया गया है । अव पुन: अधिदैव, अधिभूत आदिमें उस ब्रह्मकी व्याप्ति वतलाकर उसी बातका समर्थन करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

अन्तर्याम्यधिदेवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १। २ । १८॥

अधिदेवादिषु-आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि समस्त वस्तुओंमे; अन्तर्यामी जिसे अन्तर्यामी वतलाया गया है ( वह परब्रह्म ही है ); तद्धर्म व्यपदेशात्-क्योंकि वहाँ उसीके धोका वर्णन है।

व्याख्या- बृहदारण्यकोपनिषद् (३ । ७ ) में यह प्रसङ्ग आया है। वहाँ उद्दालक ऋषिन याज्ञवल्क्य मुनिसे पहले तो सूत्रात्माके विपयमे प्रश्न किया है। फिर उस अन्तर्यामीके सम्बन्धमे पूछा है, जो इस लोक और परलोकको तथा समस्त भूत-प्राणियोंको उनके भीतर रहकर नियन्त्रणमे रखता है । इसके उत्तरमे याज्ञवल्क्यने सूत्रात्मा तो वायुको वताया है और अन्तर्यामीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए उसे जड़-चेतनात्मक समस्त भूतो, सब इन्द्रियो और सपूर्ण जीवोंका नियन्ता बताकर अन्तमे इस प्रकार कहा है,

यह अन्तर्यामी देखनमे न आने वाला किन्तु स्वयं सवको देखनेवाला है, सुननमें न आनेवाला किन्तु स्वयं सत्र कुछ सुननेवाला है और मनन करनेमे न
आनेवाला किन्तु खयं सबका मनन करनेवाला है । वह विशेषरूपसे किसीके जाननमे नहीं आता, किन्तु स्वयं सबको विशेषरूपसे भलीभाँति जानता है । ऐसा यह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है । इससे भिन्न सब कुछ विनाशशील है ।’ इस वर्णनमे आये हुए महत्त्वसूचक विशेषण परब्रह्ममे ही सङ्गत हो सकते हैं । जीवात्माका अन्तर्यामी आत्मा ब्रह्मके सिवा दूसरा कोई नहीं हो सकता । अतः इस प्रसङ्गमे ब्रह्मको ही अन्तर्यामी बताया गया है..–यही मानना ठीक है ।

सम्बन्ध- पूर्वसूत्रमें विधि-मुखसे यह बात सिद्ध की गयी कि अन्तर्यामी ब्रह्म ही है । अव निषेधमुखसे यह सिद्ध करते हैं कि अव्यक्त जड प्रकृति अन्तर्यामी नहीं हो सकती

न च स्मार्तमतधर्मामिलापात् ॥ १।२ । १६ ॥

सातम्-सांख्यस्मृतिद्वारा प्रतिपादित प्रधान ( जड प्रकृति); च-भी; न= अन्तर्यामी नहीं है; अतद्धर्मामिलापात-क्योकि इस प्रकरणमे बताये हुए द्रष्टापन आदि धर्म प्रकृतिके नहीं है ।

व्याख्या- सांख्य-स्मृतिद्वारा प्रतिपादित जड प्रकृतिके धर्मोका वर्णन वहाँ अन्तर्यामीके लिये नहीं हुआ है। अपितु चेतन परब्रह्मके धर्मोका ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । इस कारण वहाँ कहा हुआ अन्तर्यामी प्रकृति नहीं हो सकती । अतः यही सिद्ध होता है कि इस प्रकरणमे ‘अन्तर्यामी’ के नामसे पर ब्रह्म परमात्माका ही
वर्णन हुआ है।

सम्बन्ध- यह ठीक है कि जड होनेके कारण प्रकृतिको अन्तर्यामी नहीं कहा जा सकता। परन्तु जीवात्मा तो चेतन है तथा वह शरीर और इन्द्रियोंके भीतर रहनेवाला और उनका नियमन करनेवाला भी प्रत्यक्ष है । अतः उसीको अन्तर्यामी मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है ? इसपर कहते है

शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॥ १। २ । २० ॥

शारीरः शरीरमे रहनेवाला जीवात्मा; च-भी; (न= ) अन्तर्यामी नहीं है; हि-क्योकि; उभयेऽपि-माध्यन्दिनी तथा काण्व दोनो ही शाखावाले; एनम्-इस जीवात्माको; भेदेन अन्तर्यामीसे भिन्न समझते हुए; अधीयते अध्ययन करते है।

व्याख्या- माध्यन्दिनी और काण्व-दोनो शाखाओवाले विद्वान् अन्तर्यामीको पृथिवी आदिकी भॉति जीवात्माके भी भीतर रहकर उसका नियमन करनेवाला मानते है । वहाँ जीवात्माको नियम्य और अन्तर्यामीको नियन्ता बताया गया है। इस प्रकार दोनोका पृथक्-पृथक् वर्णन होनेके कारण वहाँ ‘अन्तर्यामी’ पद परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, जीवात्माका नहीं ।

य आत्मनि तिष्ठनात्सनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्थात्मा शरीरं य आत्मान मन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः।
(शतपथबा. १४ । ५ । ३०)

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

यो विज्ञाने तिष्ठन् विनानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञान र शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्पमृतः। (वृ० उ० ३ । ७ 1 २२ )

जो जीवात्मामे रहनेवाला, जीवात्माके भीतर है, जिसे जीवात्मा नही जानता: जीवात्मा जिसका शरीर है और जो उसके भीतर रहकर जीवात्माका नियमन करता है। वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।

सम्बन्ध- उन्नीसवें सूत्रमै यह बात कही गयी है कि द्रष्टापन आदि चंतनके धर्म जड प्रकृनिमें नहीं घट सकते, इसलिये वह अन्तर्यामी नहीं हो सकती । इसपर यह जिज्ञासा होती है कि मुण्डकोपनिपदमें जिसको अझ्यता, अग्राह्यता आदि धर्मोस युक्त वतलाकर अन्तमे भूतोंका कारण बताया गया है, वह तो प्रकृति हो सकती है। क्योंकि उस जगह बताये हुए सभी धर्म प्रकृतिमें पाये जाते है । इसपर कहते है

अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः॥ १।२।२१॥

अदृश्यत्यादिगुणक: अदृश्यता आदि गुणोवाला परब्रह्म परमेश्वर ही है; धर्मोक्तेः क्योंकि उस जगह उसीके सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है।

व्याख्या- मुण्डकोपनिपढ़े यह प्रसङ्ग आया है कि महर्षि शौनक विधि पूर्वक अगिरा ऋपिकी शरणमे गये । वहाँ जाकर उन्होंने पूछा भगवन् ! किसको जान लेनेपर यह सब कुछ जाना हुआ हो जाता है । इसपर अगिराने कहा- ‘जानने योग्य विद्याएँ दो है, एक अपरा, दूसरी परा । उनमेसे अपरा विद्या तो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष है और परा वह है, जिससे उस अक्षर ब्रह्मको जाना जाता है ।’ यह कहकर उस अक्षरको समझानेके लिये अगिराने उसके गुण और धोका वर्णन करते हुए ( मु० १ । १ । ६ मे ) कहा

यत्तदन्द्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्गमचक्षु.श्रोत्रं तपाणिपादम् । नित्यं त्रिभुं सर्वगनं लुसूक्ष्मं तदव्ययं तद्भूतयोनि परिपश्यन्ति धीराः ।।

अर्थात् ‘जो इन्द्रियोद्वारा अगोचर है, पकड़नेमे आनेवाला नहीं है, जिसका कोई गोत्र नहीं है, वर्ग नहीं है, जो आँख, कान तथा हाथ-पैरसे रहित है, नित्य, व्यापक, सर्वत्र परिपूर्ण, अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वथा अविनाशी है । उसको धीर पुरुष देखते हैं, वह समस्त भूतोका परम कारग है ।

फिर नवम मन्त्रम कहा है– ‘यः मर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥’जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, ज्ञान ही जिसका तप है, उसीसे यह विराटप समस्त जगत तथा नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते है । vedant darshan 1-2 sutra 16-32

यहाँ जिन सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है, वे परब्रह्म परमेश्वरके ही हैं। तथा एक ब्रह्मको जान लेनेपर ही सब कुछ जाना हुआ हो सकता है, अन्य किसीके जाननेसे नहीं । इसलिये उस प्रकरणमें जिसे अदृश्यता आदि गुणोंवाला बताया गया है, वह परब्रह्म परमात्मा ही है, जीवात्मा या प्रकृति नहीं।

सम्बन्ध-इसी बातकी पुष्टिके लिये दूसरी युक्ति देते हैं –

विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ॥ १ । २ । २२ ॥

विशेषणभेदव्यपदेशाभ्याम्=परमेश्वरसूचक विशेषणोंका कथन होनेसे तथा प्रकृति और जीवात्मासे उसको भिन्न बताये जानेके कारण च-भी; इतरौ-जीवात्मा और प्रकृति; न-अदृश्यता आदि गुणोंवाला जगत्कारण नहीं हो सकते ।

व्याख्या इस प्रकरणमे जिसको अदृश्यता आदिगुणोसे युक्त और सब भूतोंका कारण बताया गया है, उसके लिये ‘सर्वज्ञ’ आदि विशेषण दिये गये है, जो न तो प्रधान ( जड प्रकृति ) के लिये उपयुक्त हो सकते है और न अल्पज्ञ जीवात्माके लिये ही। इसके सिवा, उन दोनोको ब्रह्मसे भिन्न कहा मया है। मुण्डकोपनिषद् (३ । १ । ७) मे उल्लेख है कि

पश्यस्विहैव निहितं गुहायाम् ।’ अर्थात् वह देखनेवालोके शरीरके भीतर यहीं हृदय-गुफामे छिपा हुआ है।’ इसके अनुसार जीवात्मासे परमात्माकी भिन्नता खतः स्पष्ट हो जाती है। इसके सिवा, मुण्डक० ३ । १ । २ मे भी कहा है कि

समान वृक्षे पुरुषो निमानोऽनीशया शोचति मुह्यमान । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

शरीररूप वृक्षपर रहनेवाला यह जीवात्मा शरीरमे आसक्त होकर डूब रहा है। अपनेको असमर्थ समझकर मोहित हो शोक करता रहता है। परन्तु वह जब वहीं स्थित तथा भक्तजनोद्वारा सेवित अपनेसे भिन्न परमेश्वरको देख लेता है और उसकी महिमाको समझ लेता है, तब सर्वथा शोकरहित हो जाता है । इस प्रकार इस मन्त्रमे स्पष्ट शब्दोद्वारा परमेश्वरको जीवात्मासे तथा शरीररूपी वृक्षसे भी भिन्न बताया गया है । अतः यहाँ जीव और प्रकृति दोनों से कोई भी अदृश्यता आदि गुणोंसे युक्त जगत्-कारण नहीं हो सकता।

सम्बन्ध- इस प्रकरणमें जिसे समस्त भूतोंका कारण बताया गया है, वह परब्रह्म परमेश्वर ही है, इसकी पुष्टिके लिये दूसरा प्रमाण उपस्थित करते हैं

रूपोपन्यासाच्च ॥ १।२ । २३ ॥

रूपोपन्यासात्-श्रुतिमे उसीके निखिल लोकमय विराट् खरूपका वर्णन किया गया है, इससे; चम्भी (वह परमेश्वर ही समस्त भूतोका कारण सिद्ध होता है)।

व्याख्या- मुण्डकोपनिषद् (२ । १ । ४ ) में परब्रह्म परमेश्वरके सर्वलोकमय विराटखरूपका वर्णन इस प्रकार किया गया है ‘अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यों दिश: श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥’

अग्नि इस परमेश्वरका मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र है, सब दिशाएँ दोनो कान हैं और प्रकट हुए वेद उसकी वाणी हैं । वायु इसका प्राण और संपूर्ण विश्व हृदय है । इसके पैरोंसे पृथिवी उत्पन्न हुई है। यही समस्त प्राणियोंका अन्तरात्मा है । इस प्रकार परमात्माके विराट् स्वरूपका उल्लेख करके उसे सबका अन्तरात्मा बताया गया है। इसलिये उक्त प्रकरणमे भूतयोनि के नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है, यह निश्चय होता है।

सम्बन्ध- यहॉ यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद् (५।१८।२) में ‘वैश्वानर’ के स्वरूपका वर्णन करते हुए ‘धुलोक’ को उसका मस्तक बताया है। ‘वैश्वानर’ शब्द जठराग्निका वाचक है । अतः वह वर्णन जटरानलके विषयमें है या अन्य किसीके ? इस शङ्काका निवारण करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है

वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॥ १ । २ । २४ ॥

वैश्वानरः= ( वहाँ) वैश्वानर’ नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है; साधारणशब्दविशेपात्=क्योकि उस वर्णनमे ‘वैश्वानर’ और ‘आत्मा’ इन साधारण शब्दोकी अपेक्षा ( परब्रह्मके बोधक ) विशेष शब्दोका प्रयोग हुआ है।

व्याख्या- छान्दोग्योपनिषद्म पाँचवे अध्यायके ग्यारहवे खण्डसे जो प्रसङ्ग आरम्भ हुआ है, वह इस प्रकार है.—‘प्राचीनशाल, सत्ययज्ञ, इन्द्रद्युम्न, जन तथा बुडिल ये पाँचो ऋषि श्रेष्ठ गृहस्थ और महान् वेदवेत्ता थे। इन्होने एकत्र होकर परस्पर विचार किया कि ‘हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्मका क्या स्वरूप है ११ जब वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सके तो यह निश्चय किया कि इस समय महर्षि उद्दालक वैश्वानर आत्माके ज्ञाता है, हमलोग उन्हींके पास चले ।’ इम निश्चयके अनुसार वे पॉचो ऋषि उद्दालक मुनिके यहाँ गये । उन्हे देखते ही मुनिने अनुमान कर लिया कि ये लोग मुझसे कुछ पूछो, किन्तु मै इन्हे पूर्णतया उत्तर नहीं दे सकूँगा।

अतः अच्छा हो कि मै इन्हे पहलेसे ही दूसरा उपदेष्टा बतला दूं ।’ यह सोचकर उद्दालकने उनसे कहा ‘आदरणीय महर्षियो ! इस समय केवल राजा अश्वपति ही वैश्वानर आत्माके ज्ञाता है। आइये, हम सब लोग उनके पास चले ।’ यो कहकर उन सबके साथ उद्दालक मुनि वहाँ गये । राजाने उन सबका यथोचित सत्कार किया और दूसरे दिन उनसे यज्ञमे सम्मिलित होनेके लिये प्रार्थना करते हुए उन्हे पर्याप्त धन देनकी बात कही। इसपर उन महर्षियोने कहा—‘हमे धन नहीं चाहिये, हम जिस प्रयोजनसे आपके पास आये हैं, वही दीजिये । हमे पता लगा है, आप वैश्वानर आत्माको जानते है, उसीका हमारे लिये उपदेश करे । vedant darshan 1-2 sutra 16-32

राजाने दूसरे दिन उन्हे अपने पास बुलाया और एक-एकसे क्रमशः पूछा, ‘इस विषयमे आपलोग क्या जानते हैं ?’ उनमेसे उपमन्युपुत्र प्राचीनशालने उत्तर दिया– मैं ‘धुलोक’को आत्मा समझकर उसकी उपासना करता हूँ।’ फिर सत्ययज्ञ बोले-‘मै सूर्यकी उपासना करता हूँ। इन्द्रद्युम्नने कहा-‘मै वायुकी उपासना करता हूँ।’ जनने अपनेको आकाशका और बुडिलने जलका उपासक बताया। इन सबकी बात सुनकर राजाने कहा- आपलोग उस विश्वके आत्मा वैश्वानरकी उपासना तो करते है।

परन्तु उसके एक-एक अङ्गकी ही उपासना आपके द्वारा होती है; अतः यह सर्वाङ्गपूर्ण नहीं है,

क्योकि-‘तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्वैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथावात्मा संदेहोबहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हि दयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ।

अर्थात्उ- स इस विश्वके आत्मा वैश्वानरका धुलोक मस्तक है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, आकाश शरीरका मध्यभाग है, जल वस्ति-स्थान है, पृथिवी दोनो चरण है, वेही वक्षःस्थल है, दर्भ लोम है, गार्हपत्य अग्नि हृदय है
अन्वाहार्यपचन अग्नि मन है और आहवनीय अग्नि मुख है । इस वर्णनसे मालूम होता है कि यहॉ विश्वके आत्मारूप विराट् पुरुपको ही वैश्वानर कहा गया है। क्योकि इस प्रकरणमे जठराग्नि आदिके वाचक साधारण शब्दोकी अपेक्षा, परब्रह्मके वाचक विशेष शब्दोका जगह-जगह प्रयोग हुआ है।

सम्बन्ध- इसी वातको दृढ करनेके लिये दूसरा कारण प्रस्तुत करते हैं–

स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ॥ १।२ । २५॥

सर्यमाणम्- स्मृतिमे जो विराटस्वरूपका वर्णन है, वह, अनुमानम् मूलभूत श्रुतिके वचनका अनुमान कराता हुआ वैश्वानरके ‘परमेश्वर’ होनेका निश्चय करनेवाला है; इति स्यात् इसलिये इस प्रकरणमे वैश्वानर परमात्मा ही है ।

व्याख्या- महाभारत, शान्तिपर्व (१७ । ७० ) मे कहा है, प्यस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः । सूर्यश्चक्षु. दिशः श्रोत्रं तस्मै लोकात्मने नमः ॥’ ‘अग्नि जिसका मुख, धुलोक मस्तक, आकाश नाभि, पृथिवी दोनो चरण, सूर्य नेत्र तथा दिशाएँ कान है, उस सर्वलोकवरूप परमात्माको नमस्कार है।’ इस प्रकार इस स्मृतिमे परमेश्वरका अखिल विश्वके रूपमें वर्णन आया है। स्मृति के वचनसे उसकी मूलभूत किसी श्रुतिका होना सिद्ध होता है। उपर्युक्त छान्दोग्य-श्रुतिम जो वैश्वानरके स्वरूपका वर्णन है, वही पूर्वोक्त स्मृतिवचनका मूल आधार है । अतः यहाँ उस परब्रह्मके विराटरूपको ही वैश्वानर कहा गया है, यह बात स्मृतिसे भी सिद्ध होती है । vedant darshan 1-2 sutra 16-32

अतएव जहाँ-जहाँ आत्मा या परमात्माके वर्णनमे ‘वैश्वानर’ शब्दका प्रयोग आवे, वहाँ उसे परब्रह्मके विराट्खरूपका ही वाचक मानना चाहिये, जठरानल या जीवात्माका नहीं। माण्डूक्योपनिपने ब्रह्मके चार पाटोका वर्णन करते समय ब्रह्मका पहला पाद वैश्वानरको बताया है । वहाँ भी बह परमेश्वरके विराट्वरूपका हीवाचक है; जठराग्नि या जीवात्माका नहीं।

सम्बन्ध- उपर्युक्त वातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शङ्का उपस्थित करके उसका समाधान करते है

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शब्दादिभ्योऽन्तःप्रतिष्ठानाच्च नेति चेन्न तथा दृष्टयुपदेशादसंभवात्पुरुषमपि चैनमधीयते ॥ ।। २ । २६ ॥

चेत् यदि कहो; शब्दादिभ्यः शब्दादि हेतुओंसे अर्थात् अन्य श्रुतिमे वैश्वानर शब्द अग्निके अर्थमे विशेषरूपमें प्रयुक्त हुआ है और इस मन्त्रमे गार्हपत्य आदि अग्नियोंको वैश्वानरका अङ्ग बताया गया है, इसलिये; च-तथा; अन्त: प्रतिष्ठानात्-श्रुतिमें वैश्वानरको शरीरके भीतर प्रतिष्ठित कहा गया है। इसलिये भी; न-(यहाँ वैश्वानर शब्द परब्रह्म परमात्माका वाचक) नहीं है; इति न तो यह कहना ठीक नहीं है। तथा दृष्टयुपदेशात्-क्योंकि वहाँ वैश्वानरमें ब्रह्मदृष्टि ‘करनेका उपदेश है; असंभवात् इसके सिवा, केवल जठरानलका विराट्रपमें वर्णन होना संभव नहीं है, इसलिये; च-तथा; एनम् इस वैश्वानरको; पुरुषम् ‘पुरुष’ नाम देकर; अपि-भी; अधीयते-पढ़ते है
( इसलिये उक्त प्रकरणमे वैश्वानर शब्द परब्रह्मका ही वाचक है)।

व्याख्या यदि कहो कि अन्य श्रुतिमे ‘स यो हैतमेवमग्नि वैश्वानरं पुरुषविध पुरुषेन्तःप्रतिष्ठितं वेद । (शतपथब्रा० १०। ६ । १ । ११ ) अर्थात् ‘जो इस वैश्वानर अग्निको पुरुषके आकारका तथा पुरुषके भीतर प्रतिष्ठित जानता है । इस प्रकार वैश्वानर शब्द अग्निके विशेषणरूपसे प्रयुक्त हुआ है, तथा जिस श्रुतिपर विचार चल रहा है, इसमे भी गार्हपत्य आदि तीनो अग्नियोको वैश्वानरका अङ्ग बताया गया है । इसी प्रकार भगवद्गीतामें भी कहा है कि मैं ही वैश्वानररूपसे प्राणियोंके शरीरमे स्थित हो चार प्रकारके अन्नका पाचन करता हूँ।’ (१५।१४) इन सब कारणोसे यहॉ वैश्वानरके नामसे जठराग्निका ही वर्णन है, परमात्माका नहीं, तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योकि
शतपथब्राह्मणकी श्रुतिमें जो वैश्वानर अग्निको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्म दृष्टि करानेके उद्देश्यसे ही है ।

यदि ऐसा न होता तो उसको पुरुष नहीं कहा जाता । तथा श्रीमद्भगवद्गीतामे भी जो वैश्वानर अग्निको सब प्राणियोंके शरीरमें स्थित बताया है, वहाँ भी उसमे परमात्मबुद्धि करानेके लिये भगवान्ने अपनी विभूतिके रूपमे ही कहा है। इसके सिवा, जिसपर विचार चल रहा है, उस श्रुतिमे समस्त ब्रह्माण्डको ‘वैश्वानर’ का शरीर बताया है,

सिरसे लेकर पैरोतक उसके अङ्गोमे समस्त लोकोंकी कल्पना की गयी है। यह जठराग्निके लिये असम्भव भी है । एवं शतपथब्राह्मणमें तथा यहाँ भी इस वैश्वानरको पुरुषके आकारवाला और पुरुष कहा गया है, जो कि जठराग्निके उपयुक्त नहीं है। इन सब कारणोंसे इस प्रकरणमे कहा हुआ वैश्वानर परब्रह्म परमेश्वर ही है। जठराग्नि या अन्य कोई नहीं। vedant darshan 1-2 sutra 16-32

सम्बन्ध- इस प्रसङ्गमें पृथक्-पृथक् उपास्यरूपसे आये हुए ‘दिव’, ‘आदित्य’, ‘वायु,’ ‘आकाश’, ‘जल’ तथा ‘पृथिवी’ भी वैश्वानर नहीं है। यह सिद्ध करनेके लिये कहते हैं

अत एव न देवता भूतं च ॥ १ । २ । २७ ॥

अतः उपर्युक्त कारणोंसे; एच-ही ( यह भी सिद्ध होता है कि); देवता-चौ, सूर्य आदि लोकोंके अधिष्ठाता देवगण; च और; भूतम्-आकाश आदि भूतसमुदाय ( भी ); न वैश्वानर नहीं है ।

व्याख्या- उक्त प्रकरणमे ‘यौ’ ‘सूर्य’ आदि लोकोकी तथा आकाश, वायु आदि भूतसमुदायकी अपने आत्माके रूपमे उपासना करनेका प्रसङ्ग आया है। इसलिये सूत्रकार स्पट कर देते है कि पूर्वसूत्रमे बताये हुए कारणोसे यह भी समझ लेना चाहिये कि उन-उन लोकोके अभिमानी देवताओ तथा आकाश आदि भूतोंका भी वैश्वानर’ शब्दसे ग्रहण नहीं है क्योकि समस्त ब्रह्माण्डको वैश्वानरका शरीर बताया गया है ।

यह कथन न तो देवताओके लिये सम्भव हो सकता है और न भूतोके लिये ही । इसलिये यही मानना चाहिये कि जो विश्वरूप भी है और नर (पुरुप ) भी, वह वैश्वानर है ।’ इस व्युत्पत्तिके अनुसार परब्रह्म परमेश्वरको ही वैश्वानर कहा गया है ।

सम्बन्ध- पहले २६वे सूत्र में यह बात बतायीं गयी है कि शतपथब्राह्मणके मन्त्रमे जो वैश्वानर अमिको जाननेकी बात कही गयी है, वह जठराग्निमें ब्रह्मदृष्टि करानके उद्देश्यसे है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि शालग्राम-शिलामें विष्णुकी उपासनाके सदृश यहाँ ‘वैश्वानर’ नामक जठराग्निमें परमेश्वरकी प्रतीकोपासना बतलानेके लिये वैश्वानर’ नामसे उस परब्रह्मका वर्णन है। अतः इसपर सूत्रकार आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं—

साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॥ १ । २ । २८॥

साक्षात=”वैश्वानर’ शब्दको साक्षात् परब्रह्मका वाचक माननेमे; अपि-भी; अविरोधम् कोई विरोध नहीं है, ऐसा; जैमिनिः (आह ) आचार्य जैमिनि कहते हैं।

व्याख्या- आचार्य जैमिनिका कथन है कि वैश्वानर शब्दको साक्षात् विश्वरूप परमात्माका वाचक माननेमे कोई विरोध नहीं है । अतः यहाँ जठराग्निको प्रतीक मानकर उसके रूपमे परमात्माकी उपासना माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है।

सम्बन्ध- उपर्युक्त सूत्रोंद्वारा यह बात सिद्ध की गयी कि ‘वैश्वानर’ नामसे इस प्रकरणमें परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन किया गया है। परन्तु निर्विकार निराकार अव्यक्त परब्रह्म परमात्माको इस प्रकार साकार विराट्पमें देशविशेषसे सम्बद्ध बतलाना किस अभिप्रायसे है ? निर्गुण निराकारको सगुण साकार बताना विरुद्ध-सा प्रतीत होता है । इसपर २९ वें सूत्रसे ३१ वें तक विभिन्न आचार्यो का मत बताते हुए अन्तमें ३२ वें सूत्रमें अपना सिद्धान्त कहकर सूत्रकार इस दूसरे पादको समाप्त करते है–

अभिव्यक्तरित्याश्मरथ्यः ॥ १ । २ । २९ ॥

अभिव्यक्ते:-( भक्तोपर अनुग्रह करनेके लिये ) देश-विशेषमे ब्रह्मका प्राकट्य होता है, इसलिये ( अविरोधा)कोई विरोध नहीं है; इति-ऐसा; आश्मरथ्या-आश्मरथ्य आचार्य मानते है।

vedant darshan 1-2 sutra 16-32

व्याख्या- आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि भक्तजनोपर अनुग्रह करके उन्हें दर्शन देनेके लिये भगवान् समय-समयपर उनकी श्रद्धाके अनुसार नाना रूपोमे प्रकट होते है; तथा अपने भक्तोको दर्शन, स्पर्श और प्रेमालाप आदिके द्वारा सुख पहुँचाने, उनका उद्धार करने और जगत्मे अपनी कीर्ति फैलाकर उसके कथन-मननद्वारा साधकोको परम लाभ पहुँचानेके लिये भगवान् मनष्य आदिके रूपमे भी समय-समयपर प्रकट होते है। यह बात उपनिषद् (केन० ३।२), गीता (४।६-९) और अन्यान्य सद्ग्रन्थोसे भी प्रमाणित है । इस कारण विराटरूपमे उस परब्रह्म परमात्माको सगुण-साकार तथा देश-विशेषसे सम्बद्ध माननेमे कोई विरोध नहीं है,

क्योकि वह सर्वसमर्थ भगवान देश-कालातीत और देशकालसे सम्बन्ध रखनेवाला भी है। वह जिस प्रकार निर्गुण-निराकार है, उसी प्रकार सगुण-साकार भी है । यह बात माण्डूक्यो पनिपमें परब्रह्म परमात्माके चार पादोका वर्णन करके भलीभॉति समझायी गयी है।

सम्बन्ध-अब इस विषयमे वादरि आचार्यका मत उपस्थित करते है

अनुस्मृतेर्बादरिः ॥ १ । २ । ३० ॥

अनुस्मृतेः-विराटपमें परमेश्वरका निरन्तर स्मरण करनेके लिये; उसको देश-विशेषसे सम्बद्ध बतानेमे ( अविरोधा= ) कोई विरोध नहीं है; (इति) ऐसा; वादरिस वाटरि नामक आचार्य मानते है ।

व्याख्या- परब्रह्म परमेश्वर यद्यपि देशकालातीत है, तो भी उनका निरन्तर भजन, ध्यान, स्मरण करनेके लिये उन्हे देश-विशेपमे स्थित मानने, कहने और समझनेमें कोई विरोध नहीं है; क्योकि भगवान् सर्वसमर्थ है । उनके भक्त उनका जिस-जिस रूपमे चिन्तन करते है, उनपर कृपा करनेके लिये वे उसी उसी रूपमे उनको मिलते है ।

सम्बन्ध-इसी विषयमे आचार्य जैमिनिका मत बताते है

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सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॥ १ । २ । ३१ ॥

सम्पत्तेः-परब्रह्म परमेश्वर अनन्त ऐश्वर्यसे सम्पन्न है, इसलिय ( उसे देश-विशेषमे सम्बन्ध रखनेवाला माननेने कोई विरोध नहीं है ); इति=ऐसा; जैमिनि: जैमिनि आचार्य मानते हैं। हि-क्योकि तथा ऐसा ही भाव; दर्शयति दूसरी श्रुनि भी प्रकट करती है।

व्याख्या- आचार्य जैमिनिका यह कथन है कि परब्रह्म परमेश्वर अनन्त श्वर्यमे सम्पन्न है. अत: उस निर्विकार, निराकार, देशकालातीत परमात्माको सगुण. साकार और किसी देश-विशेषसे सम्बन्ध रखनेवाला माननेमे कोई विरोध नहीं है: क्योकि दूसरी श्रुति भी ऐसा ही भाव प्रकट करती है। (मु० ३०२।१।४)

सम्बन्ध- अब मुत्रकार अपने मतका वर्णन करते हुए इस पादका उपसंहार करते है..

आमनन्ति चैनमस्मिन् ॥ १ । २ । ३२॥

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अस्मिन्-इस वेदान्त-शास्त्रमे, एनम् इस परमेश्वरको; ( एवम् ) ऐसा; च= ही; आमनन्ति प्रतिपादन करते है । श्रीमद्भागवत भी ऐमा ही कहा गया है—- यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय । (३।९।१२) ‘महान् यतास्वी परमेश्वर! आपके भक्तजन अपने हृदयमे आपको जिस-जिस रूपमें चिन्तन करते है। आप उन संत-महात्माओपर अनुग्रह करनेके लिये वहीं-वही शरीर धारण कर लेते हैं।

व्याख्या- इस वेदान्तशास्त्रमे सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सबके निवास स्थान, सर्वसमर्थ परब्रह्म परमेश्वरका ज्ञानीजन ऐसा ही प्रतिपादन करते है* इस विषयमे शास्त्र ही प्रमाण है । युक्ति-प्रमाण यहाँ नहीं चल सकता क्योंकि परमात्मा तर्कका विषय नहीं है । वह सगुण, निर्गुण, साकार निराकार, सविशेष-निर्विशेष आदि सब कुछ है ।

यह विश्वास करके साधकको उसके स्मरण और चिन्तनमे लग जाना चाहिये । वह व्यापक भगवान् सभी देशोंमे सर्वदा विद्यमान है । अतः उसको किसी भी देश-विशेषसे संयुक्त मानना विरुद्ध नहीं है तथा वह सब देशोंसे सदा ही निर्लिस है ! इस कारण उसको देश-कालातीत मानना भी उचित ही है । अतः सभी आचार्योंकी मान्यता ठीक है।

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दूसरा पाद सम्पूर्ण ।

॥अद्वयतारकोपनिषद्॥

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