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yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

सम्बन्ध-उक्त दृश्यके भेदोंका वर्णन अपने ग्रन्थकी परिभाषामें करते हैं

yog darshan sadhanpaad sutra 19-35

विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ॥ १९॥

व्याख्या- (१) विशेष-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश-ये पाँच स्थूल भूत तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और एक मनः—इस प्रकार सब मिलकर सोलहोंका नाम ‘विशेष’ है। गुणोंके विशेष धर्मोकी अभिव्यक्ति (प्रकटता) इन्हींसे होती है, इसलिये इनको विशेष कहते हैं। सांख्यकारिकामें इनका नाम विकार रखा है (सां. का० ३).

(२) अविशेष-शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध-ये पाँच तन्मात्राएँ हैं, इन्हींको सूक्ष्म महाभूत भी कहते हैं, क्योंकि ये स्थूल पञ्च महाभूतोंके कारण हैं तथा छठा अहंकार जो कि मन और इन्द्रियोंका कारण है, इन छहोंका नाम ‘अविशेष’ है। इनका स्वरूप इन्द्रियगोचर नहीं है, इसलिये इनको ‘अविशेष’ कहते हैं।

(३) लिङ्गमात्र- उपर्युक्त बाईस तत्त्वोंका कारणभूत जो महत्तत्त्व है, जिसका वर्णन उपनिषदोंमें और गीतामें बुद्धिके नामसे किया गया है, (कठ० १।३ । १०; गीता १३ । ५) उसका नाम ‘लिङ्गमात्र’ है। इसकी उपलब्धि केवल सत्तामात्रसे ही होती है, इस कारण इसको ‘लिङ्गमात्र’ कहते हैं। ..

(४) अलिङ्ग- मूल प्रकृति, (सां० का?). जो, कि तीनों गुणोंकी साम्यावस्था मानी गयी है, महत्तत्त्व जिसका पहला परिणाम (कार्य) है, उपनिषद्
और गीतामें जिसका वर्णन अव्यक्त नामसे किया गया है (कठ० १।३ । ११; गीता १३ । ५) उसका नाम ‘अलिङ्ग’ है । साम्यावस्थाको प्राप्त गुणोंके स्वरूपकी अभिव्यक्ति नहीं होती, इसलिये प्रकृतिको चिह्नरहित (अव्यक्त) कहते हैं।

इस प्रकार चार अवस्थाओंमें विद्यमान रहनेवाले ये सत्त्वादि गुण ही दृश्य नामसे कहे गये हैं ॥ १९ ॥

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सम्बन्ध-अब द्रष्टाके स्वरूपका वर्णन करते हैं

द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ॥२०॥

व्याख्या- केवल चेतनमात्र ही जिसका स्वरूप है, ऐसा आत्मतत्त्व स्वरूपसे सर्वथा शुद्ध, निर्विकार है तो भी बुद्धिके सम्बन्धसे बुद्धिवृत्तिके अनुरूप देखनेवाला होनेसे ‘द्रष्टा’ कहलाता है।

वास्तवमें द्रष्टा पुरुष (आत्मतत्त्व) सर्वथा शुद्ध, निर्विकार, कूटस्थ, असङ्ग है तथापि इसका सम्बन्ध प्रकृतिके साथ अनादिसिद्ध अविद्यासे माना जाता है। जबतक उस अविद्याके नाशद्वारा यह प्रकृतिसे अलग होकर अपने असली स्वरूपमें स्थित नहीं हो जाता तबतक बुद्धिके साथ एकताको प्राप्त हुआ-सा बुद्धिकी वृत्तियोंको देखता रहता है और जबतक उनको देखता है, तभीतक इसकी ‘द्रष्टा’ संज्ञा है। दृश्यका सम्बन्ध न रहनेपर द्रष्टा किसका? फिर तो यह केवल चेतनमात्र, सर्वथा शुद्ध और निर्विकार है ही ॥ २० ॥

सम्बन्ध-दृश्य और द्रष्टाके स्वरूपका वर्णन करनेके बाद अब दृश्यके स्वरूपकी सार्थकताका प्रतिपादन करते हैं

तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ॥ २१॥

व्याख्या- उक्त द्रष्टाको अपने दर्शनद्वारा भोग प्रदान करनेके लिये और द्रष्टाके निज स्वरूपका दर्शन कराकर अपवर्ग (मुक्ति) प्रदान करनेके लिये इस प्रकार पुरुषका प्रयोजन सिद्ध करनेके लिये ही दृश्य है। इसी में उसके होनेकी सार्थकता है। अठारहवें सूत्रमें दृश्यके लक्षणोंका वर्णन करते समय भी यही बात कही गयी है ।। २१ ।

सम्बन्ध-पुरुषको अपवर्ग प्रदान कर देनेके बाद प्रकृतिका कोई कार्य शेष नहीं रहता, फिर उसका बना रहना निरर्थक है; अतः उसका अभाव हो जाना चाहिये इसपर कहते हैं

कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात् ॥ २२ ॥

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व्याख्या- प्रकृतिका प्रयोजन किसी एक ही पुरुषके लिये भोग और अपवर्ग प्रदान करना नहीं है, वह तो सभी पुरुषोंके लिये समान है। अतः जिसका कार्य वह कर चुकी, उस कृतार्थ-मुक्त पुरुषके लिये उसकी आवश्यकता न रहनेके कारण यद्यपि वह उसके लिये नष्ट हो जाती है, तो भी दूसरे सब जीवोंको भोग और अपवर्ग प्रदान करना तो शेष है ही। इसलिये उसका सर्वथा नाश नहीं होता, वह विद्यमान रहती है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि प्रकृति परिणामी होनेपर भी अनादि और नित्य है। यहाँ जो मुक्त पुरुषके लिये उसका नष्ट होना बतलाया गया है, वह भी अदृश्य होना ही .. बतलाया गया है; क्योंकि योगके सिद्धान्तमें किसी भी वस्तुका सर्वथा अभाव नहीं माना गया है ।। २२ ॥

सम्बन्ध-अब संयोगके स्वरूपका वर्णन करते हैं

स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः ॥२३॥

व्याख्या- दृश्यका स्वरूप द्रष्टाके ही लिये है, यह बात पहले कह आये हैं, इसी भावको लेकर इस सूत्रमें पुरुषको प्रकृतिका स्वामी बतलाया है
और प्रकृतिको पुरुषका ‘स्व’ अर्थात् अपना यानी अधिकृत पदार्थ कहा है। उस प्रकृतिके साथ पुरुषका सम्बन्ध उन दोनोंके स्वरूपको जाननेके लिये ही है, अतः उस दर्शन (ज्ञान) शक्तिसे जबतक मनुष्य इस प्रकृतिके नाना रूपोंको देखता रहता है, तबतक तो भोगोंको भोगता रहता है। जब इनके : दर्शनसे विरक्त होकर अपने स्वरूप-दर्शनकी ओर झाँकता है, तब स्वरूपका दर्शन हो जाता. है (योग० ३ । ३५) । फिर संयोगकी कोई आवश्यकता न रहनेसे उसका अभाव हो जाता है । यही पुरुषकी कैवल्य’ अवस्था है (योग०३ । ३४) ॥ २३ ।।

सम्बन्ध-अब उक्त संयोगका कारण बतलाते हैं

तस्य हेतुरविद्या ॥ २४ ॥

व्याख्या- सर्वथा निर्विकार असङ्ग चेतन पुरुषका जो यह जड प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है यह अनादिसिद्ध अविद्यासे ही है, वास्तवमें नहीं है।
यहाँ अविद्या विपर्ययवृत्तिका नाम नहीं है, किंतु अपने स्वरूपके अनादिसिद्ध अज्ञानका नाम अविद्या है। इसीलिये अपने स्वरूपके ज्ञानसे इसका नाश हो जाता है और उसके बाद प्रयोजन न रहनेपर वह ज्ञान भी शान्त हो जाता है। यही पुरुषका ‘कैवल्य’ है ।। २४ ॥

सम्बन्ध-अब कारणसहित संयोगके अभावसे सिद्ध होनेवाले सर्वथा दुःखनाशरूप ‘हान’का वर्णन करते हैं

तदभावात्संयोगाभावो हानं तदृशेः कैवल्यम् ॥ २५ ॥

व्याख्या- जब आत्मदर्शनरूप ज्ञानसे अविद्याका यानी अज्ञानका सर्वथा अभाव हो जाता है, तब अज्ञानजनित संयोगका भी अपने-आप अभाव हो जाता है, फिर पुरुषका प्रकृतिसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता और उसके जन्म-मरण आदि सम्पूर्ण दुःखोंका सदाके लिये अत्यन्त अभाव हो जाता है तथा पुरुष अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है—यही उसका कैवल्य अर्थात् सर्वथा अकेलापन है ॥२५॥

सम्बन्ध-अब उक्त दुःखोंके अत्यन्त अभावरूप ‘हान’का उपाय बतलाते हैं

विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः ॥२६॥
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अथ योगानुशासनम्॥१॥

व्याख्या- प्रकृति तथा उसके कार्य-बुद्धि, अहंकार, इन्द्रियाँ और शरीर-इन सबके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेसे तथा आत्मा इनसे सर्वथा भिन्न और असङ्ग है, आत्माका इनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, इस प्रकार पुरुषके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान हो जानेसे जो प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका अलग-अलग यथार्थ ज्ञान होता है,

इसीका नाम ‘विवेकज्ञान’ है (योग ३। ५४) । उस समय चित्त विवेकज्ञानमें निमग्न और कैवल्यके अभिमुख रहता है। यह ज्ञान जब समाधिकी निर्मलता-स्वच्छता होनेपर पूर्ण और निश्चल हो जाता है, उसमें किसी प्रकारका भी मल नहीं रहता (योग) ४ । ३१), तब वह अविप्लव विवेकज्ञान कहलाता है। ऐसा विवेकज्ञान ही समस्त दुःखोंके अत्यन्त अभावरूप मुक्तिका उपाय है। इससे संसारके बीज अविद्यादि क्लेशोंका और समस्त कर्मोंका सर्वथा अभाव हो जाता है (योग ४। ३०)।

उसके बाद चित्त अपने आश्रयरूप-महत्तत्त्व आदिके सहित अपने कारणमें विलीन हो जाता है तथा प्रकृतिका जो स्वाभाविक परिणाम-क्रम है, वह उसके लिये बंद हो जाता है
(योग० ४।३२) ॥२६॥

सम्बन्ध-उक्त विवेकज्ञानके समय साधककी बुद्धि किस प्रकारकी होती है, यह बतलाते हैं

तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा ॥ २७॥

व्याख्या- जब निर्मल और अचल विवेकख्यातिके द्वारा योगीके चित्तका आवरण और मल सर्वथा नष्ट हो जाता है (योग० ४।३१) उस समय उस चित्तमें दूसरे सांसारिक ज्ञानोंका उदय नहीं होता। अतः सात प्रकारकी उत्कर्ष अवस्थावाली प्रज्ञा (बुद्धि) उत्पन्न होती है । उनमें पहली चार प्रकारकी तो कार्यविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस कारण वे ‘कार्यविमुक्तिप्रज्ञा’ कहलाती हैं और अन्तकी तीन चित्तविमुक्तिकी द्योतक हैं, इस कारण उनका नाम ‘चित्तविमुक्तिप्रज्ञा’ है। कार्यविमुक्तिप्रज्ञा यानी कर्तव्यशून्य अवस्थाके चार भेद इस प्रकार हैं

(१) ज्ञेयशून्य अवस्था- जो कुछ जानना था जान लिया; अब कुछ भी जानना शेष नहीं रहा अर्थात् जितना गुणमय दृश्य है (योग० २ । १८, १९), वह सब अनित्य और परिणामी है यह पूर्णतया जान लिया।

(२) हेयशून्य अवस्था- जिसका अभाव करना था, उसका अभाव कर दिया; अर्थात् द्रष्टा और दृश्यके संयोगका, जो कि हेयका हेतु है, अभाव कर दिया, अब कुछ भी अभाव करनेयोग्य शेष नहीं रहा।

(३) प्राप्यप्राप्त अवस्था— जो कुछ प्राप्त करना था, प्राप्त कर लिया अर्थात् समाधिद्वारा केवल अवस्थाकी प्राप्ति हो चुकी; अतः अब कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहा।

(४) चिकीर्षाशून्य अवस्था- जो कुछ करना था, कर लिया अर्जत हानका उपाय जो निर्मल और अचल विवेकज्ञान है, उसे सिद्ध कर लिया
अब और कुछ करना शेष नहीं रहा।

चित्तविमुक्तिप्रज्ञाके तीन भेद इस प्रकार हैं

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(१) चित्तकी कृतार्थता- चित्तने अपना अधिकार ‘भोग और अपने देना पूरा कर दिया, अब उसका कोई प्रयोजन शेष नहीं रहा।

(२) गुणलीनता- चित्त अपने कारणरूप गुणोंमें लीन हो रहा है. क्योंकि अब उसका कोई कार्य शेष नहीं रहा।

(३) आत्मस्थिति- पुरुष सर्वथा गुणोंसे अतीत होकर अपने स्वरूपमें अचल भावसे स्थित हो गया।

इस सात प्रकारकी प्रान्तभूमिप्रज्ञाको अनुभव करनेवाला योगी कुशल . (जीवन्मुक्त) कहलाता है और चित्त जब अपने कारणमें लीन हो जाता है,
तब भी कुशल (विदेहमुक्त) कहलाता है ॥ २७॥

सम्बन्ध-अब उक्त निर्मल विवेकज्ञानकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं

योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः ॥ २८॥

व्याख्या- आगे बतलाये जानेवाले योगके आठ अङ्गोंका अनुष्ठान करनेसे अर्थात् उनको आचरणमें लानेसे चित्तके मलका अभाव होकर वह सर्वथा निर्मल हो जाता है, उस समय योगीके ज्ञानका प्रकाश विवेकख्यातितक हो जाता है अर्थात् उसे आत्माका स्वरूप, बुद्धि, अहंकार और इन्द्रियोंसे सर्वथा भिन्न प्रत्यक्ष दिखलायी देता है ॥ २८॥

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सम्बन्ध- उक्त योगाङ्गोंके नाम और उनकी संख्या बतलाते हैं

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयो ऽष्टावङ्गानि ॥ २९॥

व्याख्या- इन आठोंके लक्षण और फलोंका वर्णन अगले सूत्रोंमें स्वयं सूत्रकारने ही किया है, अतः यहाँ विस्तारकी आवश्यकता नहीं है ॥ २९॥

सम्बन्ध- पहले यमोंका वर्णन करते हैं

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥३०॥

व्याख्या- (१) अहिंसा-मन, वाणी और शरीरसे किसी प्राणीको कभी किसी प्रकार किंचिन्मात्र भी दुःख न देना ‘अहिंसा’ है, परदोष-दर्शनका सर्वथा त्याग भी इसीके अन्तर्गत है।

(२) सत्य-इन्द्रिय और मनसे प्रत्यक्ष देखकर, सुनकर या अनुमान करके जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा-का-वैसा ही भाव प्रकट करनेके लिये प्रिय और हितकर तथा दूसरेको उद्वेग उत्पन्न न करनेवाले जो वचन बोले जाते हैं, उनका नाम ‘सत्य’ है। इसी प्रकार कपट और छलरहित व्यवहारका नाम सत्यव्यवहार समझना चाहिये।

(३) अस्तेय- दूसरेके स्वत्वका अपहरण करना, छलसे या अन्य , किसी उपायसे अन्यायपूर्वक अपना बना लेना ‘स्तेय’ (चोरी) है, इसमें सरकारकी टैक्सकी चोरी और घूसखोरी भी सम्मिलित है; इन सब प्रकारकी चोरियोंके अभावका नाम ‘अस्तेय’ है।

(४) ब्रह्मचर्य- मन, वाणी और शरीरसे होनेवाले सब प्रकारके मैथुनोंका सब अवस्थाओंमें सदा त्याग करके सब प्रकारसे वीर्यकी रक्षा करना ‘ब्रह्मचर्य’ है।

अतः साधकको चाहिये कि न तो कामदीपन करनेवाले पदार्थोंका सेवन करे, न ऐसे दृश्योंको देखे, न ऐसी बातोंको सुने, न ऐसे साहित्यको पढ़े और न ऐसे विचारोंको ही मनमें लावे तथा स्त्रियोंका और स्त्री आसक्त पुरुषोंका संग भी ब्रह्मचर्यमें बाधक है, अतः ऐसे संगसे सदा सावधानीके साथ अलग रहे।

(५) अपरिग्रह- अपने स्वार्थके लिये ममतापूर्वक धन, सम्पत्ति
कर्मणा मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा। सर्वत्र मैथुनत्यागी ब्रह्मचर्य प्रचक्षते ॥
(गरुड० पूर्व आचार० २३८ । ६) और भोग-सामग्रीका संचय करना ‘परिग्रह’ है, इसके अभावका नाम ‘अपरिग्रह’ है ॥ ३०॥

सम्बन्ध-उक्त यमोंकी सबसे ऊँची अवस्था बतलाते हैं

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ॥३१॥

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व्याख्या- उक्त अहिंसादिका अनुष्ठान जब सार्वभौम अर्थात् सबके साथ, सब जगह और सब समय समानभावसे किया जाता है, तब ये महाव्रत हो जाते हैं। जैसे किसीने नियम लिया कि मछलीके सिवा अन्य जीवोंकी हिंसा नहीं करूँगा तो यह जाति-अवछिन्न अहिंसा है, इसी तरह कोई नियम ले कि मैं तीर्थों में हिंसा नहीं करूँगा तो यह देश-अवछिन्न अहिंसा है। कोई यह नियम करे कि मैं एकादशी, अमावास्या और पूर्णिमाको हिंसा नहीं करूँगा तो यह कालावच्छिन्न अहिंसा है।

कोई नियम करे कि मैं विवाहके अवसरके सिवा अन्य किसी निमित्तसे हिंसा नहीं करूँगा तो यह समयावच्छिन्न (निमित्तसे सम्बन्धित) अहिंसा है। इसी प्रकार सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रहके भी भेद समझ लेने चाहिये। ऐसे यम व्रत तो हैं, परंतु सार्वभौम न होनेके कारण महाव्रत नहीं हैं। उपर्युक्त प्रकारका प्रतिबन्ध न लगाकर जब सभी प्राणियोंके साथ सब देशोंमें सदा-सर्वदा इनका पालन किया जाय, किसी भी निमित्तसे इनमें शिथिलता आनेका अवकाश न दिया जाय, तब ये सार्वभौम होनेपर ‘महाव्रत’ कहलाते हैं ॥ ३१ ॥

सम्बन्ध- यमोंका वर्णन करके अब नियमोंका वर्णन करते हैं
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥३२॥

व्याख्या- (१) शौच-जल, मृत्तिकादिके द्वारा शरीर, वस्त्र और मकान आदिके मलको दूर करना बाहरकी शुद्धि है, इसके सिवा अपने वर्णाश्रम और योग्यताके अनुसार न्यायपूर्वक धनको और शरीरनिर्वाहके लिये आवश्यक अन्न आदि पवित्र वस्तुओंको प्राप्त करके उनके द्वारा शास्त्रानुकूल शुद्ध भोजनादि करना तथा सबके साथ यथायोग्य पवित्र बर्ताव करना—यह भी बाहरी शुद्धिके ही अन्तर्गत है। जप, तप और शुद्ध विचारोंके द्वारा एवं मैत्री आदिकी भावनासे अन्तःकरणके राग-द्वेषादि मलोंका नाश करना भीतरकी पवित्रता है।

(२) संतोष- कर्तव्यकर्मका पालन करते हुए उसका जो कुछ परिणाम हो तथा प्रारब्धके अनुसार अपने-आप जो कुछ भी प्राप्त हो एवं जिस अवस्था
और परिस्थितिमें रहनेका संयोग प्राप्त हो जाय, उसीमें संतुष्ट रहना और किसी प्रकारकी भी कामना या तृष्णा न करना ‘संतोष’ है।

(३) तप, (४) स्वाध्याय और (५) ईश्वर-प्रणिधान-इन तीनोंकी व्याख्या क्रियायोगके वर्णनमें कर चुके हैं (देखिये योग० २ । १ की व्याख्या) उसी प्रकार यहाँ भी समझ लेना चाहिये ॥ ३२ ॥

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सम्बन्ध- यम-नियमोंके अनुष्ठानमें विघ्न उपस्थित होनेपर उन विघ्नोंको हटानेका उपाय बतलाते हैं

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥ ३३ ॥

व्याख्या- जब कभी संगदोषसे या अन्यायपूर्वक किसीके द्वारा सताये नारपर बदला लेनेके लिये या अन्य किसी भी कारणसे मनमें अहिंसादिके विरोधी भाव बाधा पहुँचावें अर्थात् हिंसा, झूठ, चोरी आदिमें प्रवृत्त होकर यम-नियमादिका त्याग कर देनेकी परिस्थिति उत्पन्न कर दें तो उस समय उन विरोधी विचारोंका नाश करनेके लिये उन विचारोंमें दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षकी भावना करनी चाहिये ।। ३३ ।।

सम्बन्ध- इस दोषदर्शनरूप प्रतिपक्षभावनाका ही अगले सूत्रोंमें वर्णन करते हैं

वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोध मोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ॥ ३४ ॥

व्याख्या- स्वयं किये हुए, दूसरोंसे करवाये हुए, दूसरोंको करते . देखकर अनुमोदन किये हुए—इस तरह तीन प्रकारसे होनेवाले हिंसा, झूठ, चोरी और व्यभिचार आदि अवगुण, जो कि यम-नियमोंके विरोधी हैं, उनका नाम ‘वितर्क’ है।

ये दोष कभी लोभसे, कभी क्रोधसे और कभी मोहसे एवं कभी छोटे रूपमें, कभी मध्यम और कभी भयंकररूपमें साधकके सामने उपस्थित होकर उसे सताते हैं। उस समय साधकको सावधान होकर विचार करना चाहिये कि ये हिंसादि दोष महान् हानिकारक और नरकमें ले जानेवाले हैं, इनका परिणाम अनन्तकालतक बारम्बार दुःख भोगना और अज्ञानके वशमें होकर शूकर-कूकर आदि मूढ़ योनियोंमें पड़ना है, अतः इनसे सर्वथा दूर रहकर दृढ़तापूर्वक यम-नियमोंका पालन करते रहना चाहिये । इस प्रकारके विचारोंको बारम्बार करते रहना ही ‘प्रतिपक्षकी भावना’ है ॥ ३४॥

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सम्बन्ध- इस प्रकार यम-नियमोंके विरोधी हिंसादिको हटानेका उपाय उसमें दोष देखना बतलाकर अब यम-नियमोंमें प्रीति उत्पन्न करनेके लिये उनके पालनका भिन्न-भिन्न फल बतलाते हैं

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः ॥ ३५॥

व्याख्या- जब योगीका अहिंसाभाव पूर्णतया दृढ़ स्थिर हो जाता है तब उसके निकटवर्ती हिंसक जीव भी वैरभावसे रहित हो जाते हैं। इतिहास ग्रन्थोंमें जहाँ मुनियोंके आश्रमोंकी शोभाका वर्णन आता है, वहाँ वनचर जीवोंमें स्वाभाविक वैरका अभाव दिखलाया गया है, यह उन ऋषियोंके अहिंसाभावकी प्रतिष्ठाका द्योतक है॥ ३५ ॥

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साधनपाद-२

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