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yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम् ॥ ३६॥

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

वाल्मीकीय रामायणवनकाण्डमें अगस्त्याश्रमके वर्णनमें आता है
यदाप्रभृति चाक्रान्ता दिगियं पुण्यकर्मणा। तदाप्रभृति निर्वैराः – प्रशान्ता रजनीचराः॥ अयं दीर्घायुषस्तस्य लोके विश्रुतकर्मणः।
अगस्त्यस्याश्रमः श्रीमान् विनीतमृगसेवितः ॥ नात्र जीवन्मृषावादी क्रूरो वा यदि वा शठः। नृशंसः पापवृत्तो वा मुनिरेष तथाविधः ।।
(सर्ग ११ । ८३, ८६, ९०) तुलसीकृत रामायणके अयोध्याकाण्डमें भी आया है खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।
(वाल्मीकि-आश्रमवर्णन) तथा बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा ॥ (चित्रकूटवर्णन) सत्यप्रतिष्ठायाम्-सत्यकी दृढ़स्थिति हो जानेपर (योगीमें); क्रिया फलाश्रयत्वम्-क्रियाफलके आश्रयका भाव (आ जाता है)।

व्याख्या- जब योगी सत्यका पालन करनेमें पूर्णतया परिपक्व हो जाता है, उसमें किसी प्रकारकी कमी नहीं रहती, उस समय वह योग कर्तव्यपालन रूप क्रियाओंके फलका आश्रय बन जाता है। जो कर्म किसीने नहीं किया है, उसका भी फल उसे प्रदान कर देनेकी शक्ति उस योगीमें आ जाती है, अर्थात् जिसको जो वरदान, शाप या आशीर्वाद देता है, वह सत्य हो जाता है ॥ ३६॥

अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ॥३७॥

व्याख्या- जब साधकमें चोरीका अभाव पूर्णतया प्रतिष्ठित हो जाता है, तब पृथ्वीमें जहाँ कहीं भी गुप्त स्थानमें पड़े हुए समस्त रत्न उसके सामने
प्रकट हो जाते हैं अर्थात् उसकी जानकारीमें आ जाते हैं ॥३७॥

ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ॥३८॥

व्याख्या- जब साधकमें ब्रह्मचर्यकी पूर्णतया दृढ़ स्थिति हो जाती है, तब उसके मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरमें अपूर्व शक्तिका प्रादुर्भाव हो जाता है, साधारण मनुष्य किसी काममें भी उसकी बराबरी
नहीं कर सकते ॥ ३८॥

अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः ॥ ३९॥

व्याख्या- जब योगीमें अपरिग्रहका भाव पूर्णतया स्थिर हो जाता है, तब उसे अपने पूर्वजन्मोंकी और वर्तमान जन्मकी सब बातें मालूम हो जाती हैं अर्थात् मैं पहले किस योनिमें हुआ था, मैंने उस समय क्या-क्या काम किये, किस प्रकार रहा ये सब स्मरण हो जाते हैं और इस जन्मकी भी बीती हुई सब बातें स्मरण हो जाती हैं। यह ज्ञान भी संसारमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाला और जन्म-मरणसे छुटकारा पानेके लिये योगसाधनमें प्रवृत्त करनेवाला है। जीत
यहाँतक यमोंकी सिद्धिका जो फल बतलाया गया है, उसके सिवा निष्कामभावसे यमोंका सेवन करनेसे कैवल्यकी प्राप्तिमें भी सहायता मिलती
है ॥ ३९॥

सम्बन्ध- अब नियमोंके पालनका फल बतलाते हैं; परंतु इन सूत्रोंमें पूर्णप्रतिष्ठाकी शर्त नहीं रखी गयी है। इससे यह मालूम होता है कि साधक इनका जितना पालन करता है, उतना ही उसे लाभ मिलता चला जाता है। सबसे पहले अगले सूत्रमें बाह्य शौचका फल बतलाते हैं

शौचात्स्वाङजुगुप्सा परैरसंसर्गः ॥४०॥

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व्याख्या- बाह्य शुद्धिके पालनसे साधककी अपने शरीरमें अपवित्र बद्धि होकर उसमें वैराग्य हो जाता है अर्थात् उसमें आसक्ति नहीं रहती और दूसरे सांसारिक मनुष्योंके साथ संसर्ग करनेकी इच्छा नहीं रहती अर्थात उनके सङ्गमें भी प्रवृत्ति या आसक्ति नहीं रहती ॥ ४० ॥

सम्बन्ध- भीतरकी शुद्धिका फल बतलाते हैं

सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च ॥४१॥

व्याख्या- मैत्री आदिकी भावनाके द्वारा अथवा जप, तप आदि अन्य किसी साधनद्वारा आन्तरिक शौचके लिये अभ्यास करनेसे. राग-द्वेष, ईर्ष्या आदि मलोंका अभाव होकर मनुष्यका अन्तःकरण निर्मल और स्वच्छ हो जाता है। मनकी व्याकुलताका नाश होकर उसमें सदैव प्रसन्नता बनी रहती है; विक्षेप-दोषका नाश होकर एकाग्रता आ जाती है और सब इन्द्रियाँ मनके वशमें हो जाती हैं, अतः उसमें आत्मदर्शनकी योग्यता आ जाती है।
इस प्रकार इसके ऊपरवाले सूत्रमें तो बाह्य शौचका फल बतलाया गया है और इसमें भीतरकी शुद्धिका फल बतलाया गया है ॥४१॥

संतोषादनुत्तमसुखलाभः ॥४२॥

व्याख्या- संतोषसे अर्थात् चाहरहित होनेपर जो अनन्त सुख मिलता है, उसकी बराबरी दूसरा कोई सांसारिक सुख नहीं कर सकता। वह ही ‘ सर्वोत्तम सुख है ॥ ४२ ॥

कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः ॥४३॥
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व्याख्या- स्वधर्म-पालनके लिये व्रत-उपवास आदि करने या अन्य सब प्रकारके कष्ट सहन करनेका नाम ‘तप’ है (योग० २।१ की टीका) । इसके अभ्याससे शरीर और इन्द्रियोंके मलका नाश हो जाता है, तब योगीका शरीर स्वस्थ, स्वच्छ और हलका हो जाता है तथा तीसरे पादके पैंतालीसवें और छियालीसवें सूत्रमें बतलायी हुई काय-सम्पद्प शरीर-सम्बन्धी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं एवं सूक्ष्म, दूर देशमें और व्यवधानयुक्त स्थानमें स्थित विषयोंको देखना, सुनना आदि इन्द्रियसम्बन्धी सिद्धि भी प्राप्त हो जाती है ॥४३॥

स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः ॥४४॥

व्याख्या- शास्त्राभ्यास, मन्त्रजप और अपने जीवनका अध्ययनरूप स्वाध्यायके प्रभावसे योगी जिस इष्टदेवका दर्शन करना चाहता है, उसीका दर्शन हो जाता है ।। ४४ ॥

समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥ ४५ ॥

महाभारत तथा पर्यावरण विज्ञान

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व्याख्या- ईश्वरकी शरणागतिसे योगसाधनमें आनेवाले विघ्नोंका नाश होकर शीघ्र ही समाधि निष्पन्न हो जाती है (योग० १ । २३), क्योंकि ईश्वरपर निर्भर रहनेवाला साधक तो केवल तत्परतासे साधन करता रहता है, उसे साधनके परिणामकी चिन्ता नहीं रहती। उसके साधनमें आनेवाले विघ्नोंको दूर करनेका और साधनकी सिद्धिका भार ईश्वरके जिम्मे पड़ जाता है, अतः साधनका अनायास और शीघ्र पूर्ण होना स्वाभाविक ही है ॥ ४५ ॥

सम्बन्ध- यहाँतक यम और नियमोंका फलसहित वर्णन किया गया; अब आसनके लक्षण, उपाय और उसका फल क्रमसे बतलाते हैं

स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥

व्याख्या- हठयोगमें आसनोंके बहुत भेद बतलाये गये हैं, परंतु यहाँ सूत्रकारने उनका वर्णन नहीं करके बैठनेका तरीका साधककी इच्छापर ही छोड़ दिया है। भाव यह है कि जो साधक अपनी योग्यताके अनुसार जिस रीतिसे बिना हिले-डुले स्थिरभावसे सुखपूर्वक बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके बहुत समयतक बैठ सके वही आसन उसके लिये उपयुक्त है। इसके सिवा,
जिसपर बैठकर साधन किया जाता है, उसका नाम भी आसन है; अतः वह .
भी स्थिर और सुखपूर्वक बैठनेलायक होना चाहिये ॥ ४६॥

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम् ॥४७॥

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व्याख्या- शरीरको सीधा और स्थिर करके सुखपूर्वक बैठ जानेके बाद शरीर-सम्बन्धी सब प्रकारकी चेष्टाओंका त्याग कर देना ही प्रयत्नकी शिथिलता . है, इससे और परमात्मामें मन लगानेसे-इन दो उपायोंसे आसनकी सिद्धि होती है।

यहाँ बहुत-से टीकाकारोंने अनन्तका अर्थ शेषनाग और समापत्तिका अर्थ समाधि किया है। भोजराजने अनन्तका अर्थ आकाशादि किया है और समापत्तिका अर्थ चित्तका तद्रूप हो जाना किया है; किंतु योगके अङ्गोंमें समाधि अन्तिम अङ्ग है, उसीके लिये आसन आदि अङ्गोंका अनुष्ठान है।
आसनको समाधिका बहिरंग साधन भी बतलाया गया है। अतः किसी प्रकारकी भी समाधिको आसनकी स्थिरताका उपाय बतलाना युक्तिसंगत नहीं होता। सज्जन विद्वान् अनुभवी महानुभाव इसपर विचार करें ॥४७॥

ततो द्वन्द्वानभिघातः ॥४८॥

व्याख्या- आसन-सिद्धि हो जानेसे शरीरपर सर्दी, गर्मी आदि द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता, शरीरमें उन सबको बिना किसी प्रकारकी पीड़ाके सहन करनेकी शक्ति आ जाती है। अतः वे द्वन्द्व चित्तको चञ्चल बनाकर साधनमें विघ्न नहीं डाल सकते ॥४८॥

सम्बन्ध- अब प्राणायामका सामान्य लक्षण बतलाते हैं

तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः ॥४९॥

व्याख्या- प्राणवायुका शरीरमें प्रविष्ट होना श्वास है और बाहर निकलना प्रश्वास है। इन दोनोंकी गतिका रुक जाना अर्थात् प्राणवायुकी गमनागमनरूप क्रियाका बंद हो जाना ही प्राणायामका सामान्य लक्षण है।
यहाँ आसनकी सिद्धिके बाद प्राणायामका सम्पन्न होना बतलाया है। इसमें यह प्रतीत होता है कि आसनकी स्थिरताका अभ्यास किये बिना ही जो प्राणायाम करते हैं, वे गलत रास्तेंपर हैं। प्राणायामका अभ्यास करते समय
आसनकी स्थिरता परम आवश्यक है ॥४९॥

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सम्बन्ध- उक्त प्राणायामके भेदोंको समझानेके लिये तीन प्रकारके प्राणायामोंका वर्णन करते हैं

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः ॥५०॥

व्याख्या- अगले सूत्रमें जिस प्राणायामके लक्षण किये गये हैं उसे
चौथा प्राणायाम बतलाया है। इससे यह सिद्ध होता है कि इस सूत्रमें तीन प्रकारके प्राणायामोंका वर्णन है और उन तीनों प्रकारके ही प्राणायामोंको साधक देश, काल और संख्याद्वारा देखता रहता है कि वे किस अवस्थातक पहुँच चुके हैं। इस प्रकार परीक्षा करते-करते वे प्राणायाम जैसे-जैसे उन्नत होते जाते हैं वैसे-ही-वैसे उनमें लम्बाई और हलकापन बढ़ता चला जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्तम्भवृत्तिरूप तृतीय प्राणायाममें भी देशका सम्बन्ध रहता है, अन्यथा वह देश, काल और संख्याद्वारा परिदृष्ट कैसे होगा? प्राणायामके तीन भेदोंको इस प्रकार समझना चाहिये।

(१) बाह्यवृत्ति- प्राणवायुको शरीरसे बाहर निकालकर बाहर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रहना और साथ-ही-साथ इस बातकी भी परीक्षा करते रहना कि वह बाहर आकर कहाँ ठहरा है, कितने समयतक ठहरा है और उतने समयमें स्वाभाविक प्राणकी गतिकी कितनी संख्या होती है। यह ‘बाह्यवृत्ति’ प्राणायाम है, इसे रेचक’ भी कहते हैं; क्योंकि इसमें रेचनपूर्वक प्राणको रोका जाता है । अभ्यास करते-करते यह दीर्घ (लम्बा) अर्थात् बहुत कालतक रुके रहनेवाला और सूक्ष्म अर्थात् हलका अनायास साध्य हो,जाता है।

(२) आभ्यन्तरवृत्ति- प्राणवायुको भीतर ले जाकर भीतर ही जितने कालतक सुखपूर्वक रुक सके, रोके रहना और साथ-ही-साथ यह देखते रहना कि आभ्यन्तर देशमें कहाँतक जाकर प्राण रुकता है; वहाँ कितने कालतक सुखपूर्वक ठहरता है और उतने समयमें प्राणकी स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है। यह ! आभ्यन्तर’ प्राणायाम है; इसे ‘पूरक’ प्राणायाम भी कहते हैं; क्योंकि इसमें शरीरके अंदर ले जाकर प्राणको रोका जाता है। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता जाता है।

(३) स्तम्भवृत्ति- शरीरके भीतर जाने और बाहर निकलनेवाली जो प्राणोंकी स्वाभाविक गति है, उसे प्रयत्नपूर्वक बाहर या भीतर निकलने या ले
जानेका अभ्यास न करके प्राणवायु स्वभावसे बाहर निकला हो या भीतर गया हो, जहाँ हो, वहीं उसकी गतिको स्तम्भित कर देना (रोक देना) और यह देखते रहना कि प्राण किस देशमें रुके हैं, कितने समयतक सुखपूर्वक रुके रहते हैं, इस समयमें स्वाभाविक गतिकी कितनी संख्या होती है, यह ‘स्तम्भवृत्ति’ . प्राणायाम है; इसे ‘कुम्भक’ प्राणायाम भी कहते हैं। अभ्यासबलसे यह भी दीर्घ और सूक्ष्म होता है। कोई-कोई टीकाकार इसे केवल ‘कुम्भक’ कहते हैं और कोई-कोई चौथे प्राणायामको केवल कुम्भक कहते हैं । इस तीसरे और अगले सूत्रमें बतलाये हुए चौथे प्राणायामके भेदका निर्णय करनेमें बहुत मतभेद है।
– साधक किसी भी प्राणायामका अभ्यास करें, उसके साथ मन्त्र अवश्य रहना चाहिये ॥ ५० ॥

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सम्बन्ध- चौथे प्राणायामका वर्णन करते हैं

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः ॥ ५१ ॥

व्याख्या- बाहर और भीतरके विषयोंके चिन्तनका त्याग कर देनेसे अर्थात इस समय प्राण बाहर निकल रहे हैं या भीतर जा रहे हैं अथवा चल रहे हैं कि ठहरे हुए हैं, इस जानकारीका त्याग करके मनको इष्टचिन्तनमें लगा देनेसे देश, काल और संख्याके ज्ञानके बिना ही अपने-आप जो प्राणोंकी गति जिस-किसी देशमें रुक जाती है; वह चौथा प्राणायाम है । यह पहले बतलाये हुए तीन प्रकारके प्राणायामोंसे सर्वथा भिन्न है, यह बात दिखलानेके लिये

सूत्रमें ‘चतुर्थः’ पदका प्रयोग किया गया है। कि
यह अनायास होनेवाला राजयोगका प्राणायाम है। इसमें मनकी चञ्चलता शान्त होनेके कारण अपने-आप प्राणोंकी गति रुकती है और पहले बतलाये हुए प्राणायामोंमें प्रयत्नद्वारा प्राणोंकी गतिको रोकनेका अभ्यास करते करते प्राणोंकी गतिका निरोध होता है, यही इसकी विशेषता है ॥ ५१ ॥

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् ॥ ५२ ॥

व्याख्या- जैसे-जैसे मनुष्य प्राणायामका अभ्यास करता है, वैसे-ही वैसे उसके संचित कर्म-संस्कार और अविद्यादि क्लेश दुर्बल होते चले जाते हैं। ये कर्म, संस्कार और अविद्यादि क्लेश ही ज्ञानका आवरण (परदा) है। इस परदेके कारण ही मनुष्यका ज्ञान ढका रहता है, अतः वह मोहित हुआ रहता है। जब यह परदा दुर्बल होते-होते सर्वथा क्षीण हो जाता है, तब साधकका ज्ञान सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो जाता है (गीता ५। १६)। इसलिये साधकको प्राणायामका अभ्यास अवश्य करना चाहिये ।। ५२ ॥

सम्बन्ध- प्राणायामका दूसरा फल बतलाते हैं

धारणासु च योग्यता मनसः ॥ ५३॥

व्याख्या- प्राणायामके अभ्याससे मनमें धारणाकी योग्यता भी आ जाती है, यानी उसे चाहे जिस जगह अनायास ही स्थिर किया जा सकता है ।। ५३॥

सम्बन्ध-अब प्रत्याहारके लक्षण बतलाते हैं

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स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां
प्रत्याहारः ॥ ५४॥

व्याख्या- उक्त प्रकारसे प्राणायामका अभ्यास करते-करते मन और इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाते हैं, उसके बाद इन्द्रियोंकी बाह्यवृत्तिको सब ओरसे समेटकर मनमें विलीन करनेके अभ्यासका नाम ‘प्रत्याहार’ है। जब साधनकालमें साधक इन्द्रियोंके विषयोंका त्याग करके चित्तको अपने ध्येयमें लगाता है, उस समय जो इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर न जाकर चित्तमें विलीन-सा हो जाना है, यह प्रत्याहार सिद्ध होनेकी पहचान है। यदि उस समय भी इन्द्रियाँ पहलेके अभ्याससे इसके सामने बाह्य विषयोंका चित्र उपस्थित करती रहें तो समझना चाहिये कि प्रत्याहार नहीं हुआ। उपनिषदोंमें भी ‘वाक्’ शब्दसे उपलक्षित इन्द्रियोंको मनमें निरुद्ध करनेकी बात कहकर यही भाव दिखलाया है॥ ५४॥

सम्बन्ध- अब प्रत्याहारका फल बतलाकर इस द्वितीय पादकी समाप्ति करते हैं

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ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् ॥ ५५ ॥

व्याख्या- प्रत्याहार सिद्ध हो जानेपर योगीकी इन्द्रियाँ उसके सर्वथा वशमें हो जाती हैं, उनकी स्वतन्त्रताका सर्वथा अभाव हो जाता है। प्रत्याहारकी सिद्धि हो जानेके बाद इन्द्रिय-विजयके लिये अन्य साधनकी आवश्यकता नहीं रहती ॥ ५५ ॥

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः। (कठ० १।३।१३) . ‘बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह वाक आदि इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनमें विलीन कर दे अर्थात् इनकी ऐसी स्थिति कर दे कि इनकी कोई भी क्रिया न हो मनमें विषयोंकी स्फुरणा न रहे।

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