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vibhutipaad 1-18

yog darshan vibhutipaad 1-18

ॐ श्रीपरमात्मने नमः

yog darshan vibhutipaad 1-18

विभूतिपाद-३

सम्बन्ध- दूसरे पादमें योगाङ्गोंके वर्णनका आरम्भ करके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार–इन पाँच बहिरङ्ग-साधनोंका फलसहित वर्णन किया गया; शेष धारणा, ध्यान और समाधि-इन तीन अन्तरङ्ग-साधनोंका वर्णन इस पादमें किया जाता है; क्योंकि ये तीनों जब किसी एक ध्येयमें पूर्णतया किये जाते हैं, तब इनका नाम संयम हो जाता है। योगकी विभूतियाँ प्राप्त करनेके लिये संयमकी आवश्यकता है, अतः इन अन्तरङ्ग-साधनोंका वर्णन साधनपाद में न करके इस विभूतिपादमें करते हुए पहले धारणाका स्वरूप बतलाते हैं

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥१॥

व्याख्या- नाभिचक्र, हृदय-कमल आदि शरीरके भीतरी देश हैं और आकाश या सूर्य-चन्द्रमा आदि देवता या कोई भी मूर्ति तथा कोई भी पदार्थ बाहरके देश हैं, उनमेंसे किसी एक देशमें चित्तकी वृत्तिको लगानेका नाम ‘धारणा’ है।॥१॥

सम्बन्ध- ध्यानका स्वरूप बतलाते हैं

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥२॥

व्याख्या- जिस ध्येय वस्तुमें चित्तको लगाया जाय, उसीमें चित्तका एकाग्र हो जाना अर्थात् केवल ध्येयमात्रकी एक ही तरहकी वृत्तिका प्रवाह चलना, उसके बीचमें किसी भी दूसरी वृत्तिका न उठना ‘ध्यान’ है ॥२॥

सम्बन्ध-समाधिका स्वरूप बतलाते हैं

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तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ॥३॥

व्याख्या- ध्यान करते-करते जब चित्त ध्येयाकारमें परिणत हो जाता है, उसके अपने स्वरूपका अभाव-सा हो जाता है, उसको ध्येयसे भिन्न उपलब्धि नहीं होती, उस समय उस ध्यानका ही नाम ‘समाधि’ हो जाता है। यह लक्षण निर्वितर्क समापत्तिके नामसे पहले पादमें किया गया है (योग० १ । ४३) ॥ ३॥

सम्बन्ध- उक्त तीनों साधनोंका सांकेतिक नाम बतलाते हैं

त्रयमेकत्र संयमः ॥४॥

व्याख्या- किसी एक ध्येय पदार्थमें धारणा, ध्यान और समाधि-ये तीनों होनेसे संयम कहलाता है। अतः इस ग्रन्थमें जहाँ-तहाँ किसी विषयमें संयम करनेको कहा जाय या संयमका फल बतलाया जाय तो संयमके नामसे किसी एक ध्येयमें तीनोंका होना समझ लेना चाहिये ॥ ४ ॥

सम्बन्ध- संयमकी सिद्धिका फल बतलाते हैं

तज्जयात्प्रज्ञालोकः ॥५॥

व्याख्या- साधन करते-करते जब योगी संयमपर विजय प्राप्त कर लेता है, अर्थात् चित्तमें ऐसी योग्यता प्राप्त कर लेता है कि जिस विषयमें वह संयम करना चाहे, उसीमें तत्काल संयम हो जाता है, उस समय योगीको बुद्धिका प्रकाश प्राप्त हो जाता है अर्थात् उसकी बुद्धिमें अलौकिक ज्ञानशक्ति आ जाती है। इसीको प्रथम पादमें अध्यात्मप्रसादके और ऋतम्भरा प्रज्ञाके नामसे कहा है (योग० १ । ४७-४८) ॥ ५॥

सम्बन्ध- संयमके प्रयोगकी विधिका वर्णन करते हैं

तस्य भूमिषु विनियोगः ॥६॥

व्याख्या- संयमका प्रयोग क्रमसे करना चाहिये अर्थात् पहले स्थूल विषयमें संयम करना चाहिये। वह स्थिर हो जानेपर सूक्ष्म विषयोंमें क्रमसे संयम करना चाहिये। इसी प्रकार जिस-जिस स्थलमें संयम स्थिर होता जाय, उस-उससे आगे बढ़ते रहना चाहिये ॥६॥

सम्बन्ध- उक्त तीनों साधनोंकी विशेषता बतलाते हैं

त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः ॥७॥

व्याख्या- इसके पहले अर्थात् दूसरे पादमें जो योगके यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार-ये पाँच अङ्ग बतलाये गये हैं, उनकी अपेक्षा उपर्युक्त धारणा, ध्यान और समाधि-ये तीनों साधन अन्तरङ्ग हैं; क्योंकि इन तीनोंका योग-सिद्धिके साथ निकटतम सम्बन्ध है ॥७॥

सम्बन्ध- निर्बीज समाधिकी विशेषताका वर्णन करते हैं

तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य ॥८॥

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व्याख्या- पर-वैराग्यकी दृढ़तासे जब समाधिप्रज्ञाके संस्कारोंका भी निरोध हो जाता है, तब निर्बीज समाधि सिद्ध होती है (योग० १ । ५१) । अतः धारणा, ध्यान और समाधि भी उसके अन्तरङ्ग साधन नहीं हो सकते; क्योंकि उसमें सब प्रकारकी वृत्तियोंका अभाव किया जाता है (योग० १ । १८); किसी भी ध्येयमें चित्तको स्थिर करनेका अभ्यास नहीं किया जाता ॥८॥

सम्बन्ध- गुणोंका स्वभाव चञ्चल है, उनमें प्रतिक्षण परिणाम होता रहता है। चित्त गुणोंका ही कार्य है, अतः वह भी कभी एक अवस्थामें नहीं रह सकता। अतः निरोध समाधिके समय उसका कैसा परिणाम होता है, यह बतलानेके लिये कहते हैं

व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षण चित्तान्वयो निरोधपरिणामः ॥९॥

व्याख्या- निरोधसमाधिमें चित्तकी सम्पूर्ण वृत्तियोंका अभाव हो जानेपर भी उनके संस्कारोंका नाश नहीं होता । उस कालमें केवल संस्कार ही शेष रहते हैं, यह बात पहले पादमें कही है (योग० १ । १८) । अतः निरोधकालमें चित्त व्युत्थान और निरोध दोनों ही प्रकारके संस्कारमें व्याप्त रहता है, क्योंकि चित्त धर्मी है और संस्कार उसके धर्म हैं; धर्मी अपने धर्ममें सदैव व्याप्त रहता है यह नियम है (योग० ३ । १४) । उस निरोधकालमें जो व्युत्थानके संस्कारोंका दब जाना और निरोधसंस्कारोंका प्रकट हो जाना है तथा चित्तका निरोध संस्कारोंसे सम्बन्धित हो जाना है, यह व्युत्थानधर्मसे निरोधधर्ममें परिणत होनारूप निरोध-परिणाम है। निरोध-समाधिकी अपेक्षा सम्प्रज्ञात-समाधि
यहाँ समाधि-परिणाम और एकाग्रता-परिणामके लक्षण पहले न करके पहले निरोध-परिणामका स्वरूप बतलाया है।

इसका यह कारण मालूम होता है कि आठवें सूत्रमें निरोधसमाधिका वर्णन आ गया। इसलिये पहले निरोध-परिणामका लक्षण बतलाना आवश्यक हो गया; क्योंकि पहले (योग० १।५१ में) निरोध-समाधिका लक्षण करते हुए सब वृत्तियोंके निरोधसे निर्बीज-समाधिका होना बतलाया है। अतः उसमें परिणाम न होनेकी धारणा स्वाभाविक हो जाती है। परन्तु जबतक चित्तकी गुणोंसे भिन्न सत्ता रहती है, भी व्युत्थान-अवस्था ही है (योग० ३ । ८) । अतः उसके संस्कारोंको यहाँ व्युत्थान-संस्कारोंके ही अन्तर्गत समझना चाहिये ॥९॥

सम्बन्ध- इसके बाद क्या होता है, सो बतलाते हैं

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तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात् ॥ १०॥

व्याख्या- पहले सूत्रके कथनानुसार जब व्युत्थानके संस्कार सर्वथा दब जाते हैं और निरोधके संस्कार बढ़कर भरपूर हो जाते हैं, उस समय उस संस्कारमात्र शेष चित्तमें निरोध-संस्कारोंकी अधिकतासे केवल निर्मल. निरोध-संस्कारधारा चलती रहती है अर्थात् केवल निरोध-संस्कारोंका ही प्रवाह चलता रहता है। यह निरुद्ध चित्तका अवस्था-परिणाम है ॥ १० ॥

सम्बन्ध- अब सम्प्रज्ञात-समाधिमें चित्तका जैसा परिणाम होता है, उसका वर्णन करते हैं

सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः ॥११॥

व्याख्या- निरोध-समाधिके पहले जब योगीका सम्प्रज्ञात योग सिद्ध होता है, उस समय चित्तकी विक्षिप्तावस्थाका क्षय होकर एकाग्र-अवस्थाका उदय हो जाता है। निर्वितर्क और निर्विचार सम्प्रज्ञात-समाधिमें केवल ध्येयमात्रका ही ज्ञान रहता है, चित्तके निज स्वरूपतकका भान नहीं रहता
वह अपने कारणमें विलीन नहीं हो जाता, तबतक उसमें परिणामी होना अनिवार्य है। इसलिये निरोध-परिणाम किस प्रकार होता है, यह जाननेकी इच्छा स्वाभाविक हो जाती है। (योग० १।४३); वह चित्तका विक्षिप्तावस्थासे एकाग्र-अवस्थामें परिणत हो जानारूप समाधि-परिणाम है ॥ ११ ॥

सम्बन्ध- उसके बादकी स्थितिका वर्णन करते हैं।

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ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रता परिणामः ॥ १२ ॥

व्याख्या- जब चित्त विक्षिप्त-अवस्थासे एकाग्र-अवस्थामें प्रवेश करता है, उस समय चित्तका जो परिणाम होता है उसका नाम समाधि-परिणाम है। जब चित्त भलीभाँति समाहित हो चुकता है, उसके बाद जो चित्तमें परिणाम होता रहता है, उसे एकाग्रता-परिणाम कहते हैं। उसमें शान्त होनेवाली वृत्ति
और उदय होनेवाली वृत्ति एक-सी ही होती है।

महाभारत तथा ज्योतिष विज्ञान

पहले कहे हुए समाधि-परिणाममें तो शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली वृत्तिमें भेद होता है, किन्तु इसमें शान्त होनेवाली और उदय होनेवाली वृत्तिमें भेद नहीं होता, यही समाधि-परिणाममें और एकाग्रता-परिणाममें अन्तर है । सम्प्रज्ञात-समाधिकी प्रथम अवस्थामें समाधि परिणाम होता है और उसकी परिपक्व-अवस्थामें एकाग्रता-परिणाम होता है। इस एकाग्रता-परिणामके समय होनेवाली स्थितिको ही पहले पादमें निर्विचार-समाधिकी निर्मलताके नामसे कहा है (योग० १।४७) ॥ १२ ॥

सम्बन्ध- उपर्युक्त परिणामोंके नाम बतलाते हुए उनके उदाहरणसे अन्य समस्त वस्तुओंमें होनेवाले परिणामोंकी व्याख्या करते हैं

एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ॥ १३ ॥

व्याख्या- पहले नवें और दसवें सूत्रमें तो निरोध-समाधिके समय होनेवाले चित्तके धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणामका वर्णन किया गया है तथा ग्यारहवें और बारहवें सूत्रमें सम्प्रज्ञात-समाधिके समय होनेवाले चित्तके धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था परिणामका वर्णन किया गया है। इसी तरह संसारकी समस्त वस्तुओंमें ये परिणाम बराबर होते रहते हैं, क्योंकि तीनों ही गुण परिणामी हैं, अतः उनके कार्योंमें परिवर्तन होते रहना अनिवार्य है। इसलिये इस सूत्रमें यह बात कही गयी है कि ऊपरके वर्णनसे ही पाँचों भूतोंमें और समस्त इन्द्रियोंमें होनेवाले धर्म, लक्षण और अवस्था-परिणामोंको समझ लेना चाहिये। इनका भेद उदाहरणसहित समझाया जाता है।

यह ध्यानमें रखना चाहिये कि सांख्य और योगके सिद्धान्तमें कोई भी पदार्थ बिना हुए उत्पन्न नहीं होता। जो कुछ वस्तु उत्पन्न होती है, वह उत्पन्न होनेसे पहले भी अपने कारणमें विद्यमान थी और लुप्त होनेके बाद भी विद्यमान है (योग०.४ । १२)।।

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(१) धर्म-परिणाम- जब किसी धर्मीमें एक धर्मका लय होकर दूसरे धर्मका उदय होता है, उसे ‘धर्म-परिणाम’ कहते हैं। जैसे नवें सूत्र में चित्तरूप धर्मीके व्युत्थानसंस्काररूप धर्मका दब जाना और निरोधसंस्काररूप धर्मका प्रकट होना बतलाया गया है । यही धर्मों में विद्यमान रहनेवाले चित्तरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है। इसी प्रकार ग्यारहवें सूत्रमें जो सर्वार्थतारूप धर्मका क्षय और एकाग्रतारूप धर्मका उदय बतलाया गया है, यह भी चित्तरूप धर्मीका धर्म परिणाम है। इसी तरह मिट्टीमें पिण्डरूप धर्मका क्षय और घटरूप धर्मका उदय होना, फिर घटरूप धर्मका क्षय और ठीकरी. (फूटे हुए घटके टुकड़े) रूप धर्मका उदय होना-सब प्रकारके धर्मों में विद्यमान रहनेवाले मिट्टीरूप धर्मीका धर्म-परिणाम है। इसी तरह अन्य समस्त वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये।

(२) लक्षण-परिणाम- यह परिणाम भी धर्म-परिणामके साथ-साथ हो जाता है। यह लक्षण-परिणाम धर्ममें होता है (योग० ४ । १२) । वर्तमान धर्मका लुप्त हो जाना उसका अतीत लक्षण-परिणाम है, अनागत धर्मका प्रकट होना उसका वर्तमान लक्षण-परिणाम है और प्रकट होनेसे पहले वह अनागत लक्षणवाला रहता है। इन तीनोंको धर्मका ‘लक्षण-परिणाम’ कहते हैं। ग्यारहवें सूत्रमें जो चित्तके सर्वार्थता-धर्मका क्षय होना बतलाया गया है, वह उसका अतीत लक्षण-परिणाम है और जो एकाग्रतारूप धर्मका उदय होना बतलाया है, वह उसका वर्तमान लक्षण-परिणाम है। उदय होनेसे पहले वह अनागत लक्षण-परिणाममें था। इसी प्रकार दूसरी वस्तुओंके परिणामोंके विषयमें भी समझ लेना चाहिये।

(३) अवस्था-परिणाम- जो वर्तमान लक्षणयुक्त धर्ममें नयापनसे पुरानापन आता-जाता हैं, वह प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है और वर्तमान लक्षणको छोड़कर अतीत लक्षणमें चला जाता है, यह लक्षणका ‘अवस्था परिणाम’ है। एकादश सूत्रके वर्णनानुसार जब चित्तरूप धर्मीका वर्तमान । लक्षणवाला सर्वार्थतारूप धर्म दबकर अतीत लक्षणको प्राप्त होता है, उस । वर्तमान कालमें जो उसके दबनेका क्रम है वह उसका अवस्था-परिणाम है
और जो एकाग्रतारूप धर्म अनागत लक्षणसे वर्तमान लक्षणमें आता है तब उसका जो उदय होनेका क्रम हैं, वह भी अवस्था-परिणाम है। दसवें सूत्रमें निरुद्ध चित्तके अवस्था-परिणामका और बारहवेंमें एकाग्रचित्तके अवस्था परिणामका वर्णन है। इस प्रकार यह एक अवस्थाको छोड़कर दूसरी अवस्थामें परिवर्तन होते जाना ही अवस्था-परिणाम है । यह अवस्था परिणाम

प्रतिक्षण होता रहता है। कोई भी त्रिगुणमय वस्तु क्षणभर भी एक अवस्थामें नहीं रहती। यही बात दसवें और बारहवें सूत्रोंमें निरोधधर्मके और एकाग्रधर्मके वर्तमान लक्षण-परिणाममें एक प्रकारके संस्कार और वृत्तियोंका क्षय और उदय बतलाकर दिखलायी गयी है। हम बालकसे जवान और जवानसें बूढ़े किसी एक दिनमें या एक घड़ीमें नहीं हुए, हमारा यह अवस्था परिणाम अर्थात् अवस्थाका परिवर्तन प्रतिक्षणमें होता हुआ ही यहाँतक पहुँचा है। इसीको अवस्था-परिणाम कहते हैं। यह परिणाम विचारद्वारा समझमें आता है, सहसा प्रतीत नहीं होता। आगे कहेंगे भी कि क्रमका ज्ञान परिणामके अवसानमें होता है (योग० ४।३३)।

धर्मपरिणाममें तो धर्मीके धर्मका परिवर्तन होता है, लक्षण-परिणाममें पहले धर्मका अतीत हो जाना और नये धर्मका वर्तमान हो जाना—इस प्रकार धर्मका लक्षण बदलता है और अवस्था-परिणाममें धर्मके वर्तमान लक्षणसे युक्त रहते हुए ही उसकी अवस्था बदलती रहती है। पहले परिणामकी अपेक्षा दूसरा सूक्ष्म है और दूसरेकी अपेक्षा तीसरा सूक्ष्म है ॥ १३॥

सम्बन्ध- धर्म और धर्मीका विवेचन करनेके लिये धर्मीका स्वरूप बतलाते हैं

शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी ॥ १४ ॥

व्याख्या- द्रव्यमें सदा विद्यमान रहनेवाली अनेकों शक्तियोंका नाम धर्म है और उसके आधारभूत द्रव्यका नाम धर्मी है । भाव यह है कि जिस कारणरूप पदार्थसे जो कुछ बन चुका है, जो बना हुआ है और जो बन सकता है; वे सब उसके धर्म हैं, वे एक धर्मीमें अनेक रहते हैं तथा अपने-अपने निमित्तोंके मिलनेपर प्रकट और शान्त होते रहते हैं। उनके तीन भेद इस प्रकार हैं

(१) अव्यपदेश्य- जो धर्म धर्मीमें शक्तिरूपसे विद्यमान रहते हैं, व्यवहारमें आने लायक न होनेके कारण जिनका निर्देश नहीं किया जा सकता, वे ‘अव्यपदेश्य’ कहलाते हैं। इन्हींको अनागत या आनेवाले भी कहते हैं। जैसे जलमें बर्फ और मिट्टीमें बर्तन अपना व्यापार करनेके लिये प्रकट होनेसे पहले शक्तिरूपमें छिपे रहते हैं।

(२) उदित— जो धर्म पहले शक्तिरूपसे धर्मीमें छिपे हुए थे, वे जब अपना कार्य करनेके लिये प्रकट हो जाते हैं, तब ‘उदित’ कहलाते हैं। इन्हींको ‘वर्तमान’ भी कहते हैं। जैसे जलमें शक्तिरूपसे विद्यमान बर्फका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना, मिट्टीमें शक्तिरूपसे विद्यमान बर्तनोंका प्रकट होकर वर्तमानरूपमें आ जाना।

(३) जो धर्म अपना व्यापार पूरा करके धर्मीमें विलीन हो जाते हैं, वे ‘शान्त’ कहलाते हैं, इन्हींको ‘अतीत’ भी कहते हैं। जैसे बर्फका गलकर जलमें विलीन हो जाना और घड़ेका फूटकर मिट्टीमें विलीन हो जाना। म धर्मोकी शान्त, उदित और अव्यपदेश्य-इन तीनों स्थितियोंमें ही धर्मी सदा ही अनुगत रहता है। किसी कालमें धर्मीके बिना धर्म नहीं रहते ॥ १४ ॥

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सम्बन्ध- एक ही धर्मीके भिन्न-भिन्न अनेक धर्म-परिणाम कैसे होते हैं, यह बतलाते हैं

क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः ॥ १५ ॥

व्याख्या- एक ही द्रव्यका किसी एक क्रमसे जो परिणाम होता है, दूसरे क्रमसे उससे भिन्न दूसरा ही परिणाम होता है। अन्य प्रकारके क्रमसे तीसरा ही परिणाम होता है। जैसे हमें रूईस वस्त्र बनाना है तो पहले रूईको धुनकर उसकी पूनी बनाकर चरखेपर कातकर उसका सूत बनाना पड़ेगा, फिर उस सूतका लम्बा ताना करेंगे, फिर उसे तानेमेंसे पार करके रोलपर चढ़ायेंगे, फिर ‘वै’ मेंसे पार करके उसके आधे तन्तुओंको ऊपर उठायेंगे, आधोंको नीचे ले जायँगे और बीचमें भरनीका सूत फेंककर उस धागेको यथास्थान बैठायेंगे, फिर ऊपरवाले धागोंको नीचे लायेंगे और नीचेवालोंको ऊपर ले जायँगे, इस तरह क्रमसे करते रहनेपर अन्तमें वस्त्ररूपमें रूईका परिणाम होगा।

पर यदि हमें उसी रूईसे दीपककी बत्ती बनानी है तो उसे कुछ फैलाकर थोड़ा बट दे देनेसे तुरंत बन जायगी और यदि कुएँ मेंसे जल निकालनेकी रस्सी बनानी है तो पहले सूत बनाकर उन धागोंको तीन या चार भागोंमें लम्बा करके बट लगानेसे रस्सी बन जायगी। इनमें भी जैसा वस्त्र या जैसी बत्ती या जिस प्रकारकी रस्सी बनानी है वैसे ही उनमें क्रमका भेद करना पड़ेगा। इसी तरह दूसरी वस्तुओंमें भी समझ लेना चाहिये।

इससे यह सिद्ध हो गया कि क्रममें परिवर्तन करनेसे एक ही धर्मी भिन्न-भिन्न नाम-रूपवाले धर्मीसे युक्त हो जाता है, उसके परिणामकी भिन्नताका कारण क्रमकी भिन्नता ही है, दूसरा कुछ नहीं। क्रमकी भिन्नता सहकारी कारणोंके सम्बन्धसे होती है। जैसे ठंडके सम्बन्धसे जलमें बर्फरूप धर्मके प्रकट होनेका क्रम चलता और गर्मीके संयोगसे स्टीम (भाप) बननेका क्रम आरम्भ हो जाता है ॥ १५॥ बार

सम्बन्ध- उक्त संयम किस ध्येय-वस्तुमें सिद्ध कर लेनेपर उससे क्या फल मिलता है, इसका वर्णन यहाँसे इस पादकी समाप्तिपर्यन्त किया गया है। इनको ही योगकी विभूति अर्थात् भिन्न-भिन्न प्रकारका महत्त्व कहते हैं।
ऊपर तीन प्रकारके परिणामोंका वर्णन किया गया, अतः पहले इनमें संयम करनेका फल बतलाते हैं

परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम् ॥ १६ ॥

व्याख्या- धर्म-परिणाम, लक्षण-परिणाम और अवस्था-परिणाम इस प्रकार जिन तीन परिणामोंका पहले वर्णन किया गया है, उन तीनों परिणामोंमें संयम अर्थात् धारणा, ध्यान और समाधि कर लेनेसे योगीको उनका साक्षात्कार होकर भूत और भविष्यका ज्ञान हो जाता है। अभिप्राय यह है कि जिस वर्तमान वस्तुके विषयमें योगी यह जानना चाहे कि इसका मूल कारण क्या है और यह किस ढंगसे बदलती हुई कितने कालमें वर्तमान रूपमें आयी है और भविष्यमें किस प्रकार बदलती हुई कितने कालमें किस प्रकार अपने कारणमें विलीन होगी? तो ये सब बातें उक्त तीनों परिणामोंमें संयम करनेसे जान सकता है ॥ १६॥

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सम्बन्ध- इसी प्रकार अब दूसरी विभूतियोंका वर्णन करते हैं

शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभाग संयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम् ॥ १७॥

व्याख्या- वस्तुके नाम, रूप और ज्ञान-यह तीनों यद्यपि परस्पर भिन्न हैं, जैसे घट यह शब्द मिट्टीसे बने हुए जिस पदार्थका संकेत करता है, उस पदार्थसे सर्वथा भिन्न वस्तु है। इसी प्रकार उस घटरूप पदार्थकी जो प्रतीति होती है, वह चित्तकी वृत्तिविशेष है। अतः वह भी घटरूप पदार्थसे सर्वथा भिन्न वस्तु है, क्योंकि शब्द वाणीका धर्म है, घटरूप पदार्थ मिट्टीका धर्म है और वृत्ति चित्तका धर्म है तथापि तीनोंका परस्पर अभ्यासके कारण मिश्रण हुआ रहता है। अतः जब योगी विचारद्वारा इनके विभागको समझकर उस विभागमें संयम कर लेता है, तब उसको समस्त प्राणियोंकी वाणीके अर्थका ज्ञान हो जाता है ॥ १७॥

संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम् ॥ १८॥

व्याख्या- प्राणी जो कुछ कर्म करता है एवं अपने इन्द्रियों और मन-बुद्धिद्वारा जो कुछ अनुभव करता है, वे सब उसके अन्तःकरणमें संस्काररूपमें संचित रहते हैं। उक्त संस्कार दो प्रकारके होते हैं-एक वासनारूप, जो कि स्मृतिके कारण हैं. दूसरे धर्माधर्मरूप जो कि जाति, आयु
और भोगके कारण हैं, ये दोनों ही प्रकारके संस्कार अनेक जन्म-जन्मान्तरोंसे संगृहीत होते आ रहे हैं (योग० २ । १२, ४।८ से ११)। उन संस्कारोंमें संयम करके उनको प्रत्यक्ष कर लेनेसे योगीको पूर्वजन्मका ज्ञान हो जाता है। जैसे अपने पूर्व संस्कारोंके साक्षात्कारसे अपने पूर्वजन्मका ज्ञान होता है,
उसी प्रकार दूसरेके संस्कारोंमें संयम करनेसे उसके पूर्वजन्मका भी ज्ञान हो सकता है ॥ १८॥

yog darshan vibhutipaad 1-18

yog darshan sadhanpaad sutra 36-55

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